Srila Prabhupad's messengers

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20/10/2022
09/10/2022

शरद पूर्णिमा

शरद पूर्णिमा आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को कहते हैं। इसे 'रास पूर्णिमा' भी कहते हैं। ज्योतिष विज्ञान की मान्यता है कि संपूर्ण वर्ष में केवल इसी दिन चंद्रमा षोडश कलाओं का होता है। धर्मशास्त्रों में इस दिन 'कोजागर व्रत' माना गया है। इसी को 'कौमुदी व्रत' भी कहते हैं। रासोत्सव का यह दिन वास्तव में भगवान कृष्ण ने जगत की भलाई के लिए निर्धारित किया है, क्योंकि कहा जाता है इस रात्रि को चंद्रमा की किरणों से सुधा झरती है। इस दिन श्रीकृष्ण को 'कार्तिक स्नान' करते समय स्वयं (कृष्ण) को पति रूप में प्राप्त करने की कामना से देवी पूजन करने वाली कुमारियों को चीर हरण के अवसर पर दिए वरदान की याद आई थी और उन्होंने मुरली वादन करके यमुना के तट पर गोपियों के संग रास रचाया था। इस दिन मंदिरों में विशेष सेवा-पूजन किया जाता है।
धार्मिक मान्यता
शरद पूर्णिमा से ही स्नान और व्रत प्रारम्भ हो जाता है। माताएं अपनी संतान की मंगल कामना से देवी-देवताओं का पूजन करती हैं। इस दिन चंद्रमा पृथ्वी के अत्यंत समीप आ जाता है। कार्तिक का व्रत भी शरद पूर्णिमा से ही प्रारम्भ होता है। विवाह होने के बाद पूर्णिमा (पूर्णमासी) के व्रत का नियम शरद पूर्णिमा से लेना चाहिए। शरद ऋतु में मौसम एकदम साफ़ रहता है। इस दिन आकाश में न तो बादल होते हैं और न ही धूल-गुबार। इस रात्रि में भ्रमण और चंद्रकिरणों का शरीर पर पड़ना बहुत ही शुभ माना जाता है। प्रति पूर्णिमा को व्रत करने वाले इस दिन भी चंद्रमा का पूजन करके भोजन करते हैं। इस दिन शिव-पार्वती और कार्तिकेय की भी पूजा की जाती है। यही पूर्णिमा कार्तिक स्नान के साथ, राधा-दामोदर पूजन व्रत धारण करने का भी दिन है।

कैसे मनाएँ
इस दिन प्रात: काल स्नान करके आराध्य देव को सुंदर वस्त्राभूषणों से सुशोभित करके आवाहन, आसान, आचमन, वस्त्र, गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, सुपारी, दक्षिणा आदि से उनका पूजन करना चाहिए।
रात्रि के समय गौदुग्ध (गाय के दूध) से बनी खीर में घी तथा चीनी मिलाकर अर्द्धरात्रि के समय भगवान को अर्पण (भोग लगाना) करना चाहिए।
पूर्ण चंद्रमा के आकाश के मध्य स्थित होने पर उनका पूजन करें तथा खीर का नैवेद्य अर्पण करके, रात को खीर से भरा बर्तन खुली चांदनी में रखकर दूसरे दिन उसका भोजन करें तथा सबको उसका प्रसाद दें।
पूर्णिमा का व्रत करके कथा सुननी चाहिए। कथा सुनने से पहले एक लोटे में जल तथा गिलास में गेहूं, पत्ते के दोनों में रोली तथा चावल रखकर कलश की वंदना करके दक्षिणा चढ़ाएँ। फिर तिलक करने के बाद गेहूं के 13 दाने हाथ में लेकर कथा सुनें। फिर गेहूं के गिलास पर हाथ फेरकर मिश्राणी के पांव स्पर्श करके गेहूं का गिलास उन्हें दे दें। लोटे के जल का रात को चंद्रमा को अर्ध्य दें।
शरद पूर्णिमा की कथा
एक साहूकार की दो पुत्रियां थीं। वे दोनों पूर्णमासी का व्रत करती थीं। बड़ी बहन तो पूरा व्रत करती थी पर छोटी बहन अधूरा। छोटी बहन के जो भी संतान होती, वह जन्म लेते ही मर जाती। परन्तु बड़ी बहन की सारी संतानें जीवित रहतीं। एक दिन छोटी बहन ने बड़े-बड़े पण्डितों को बुलाकर अपना दु:ख बताया तथा उनसे कारण पूछा। पण्डितों ने बताया- 'तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती हो, इसीलिए तुम्हारी संतानों की अकाल मृत्यु हो जाती है। पूर्णिमा का विधिपूर्वक पूर्ण व्रत करने से तुम्हारी संतानें जीवित रहेंगी।' तब उसने पण्डितों की आज्ञा मानकर विधि-विधान से पूर्णमासी का व्रत किया। कुछ समय बाद उसके लड़का हुआ, लेकिन वह भी शीघ्र ही मर गया। तब उसने लड़के को पीढ़े पर लेटाकर उसके ऊपर कपड़ा ढक दिया। फिर उसने अपनी बड़ी बहन को बुलाया और उसे वही पीढ़ा बैठने को दे दिया। जब बड़ी बहन बैठने लगी तो उसके वस्त्र बच्चे से छूते ही लड़का जीवित होकर रोने लगा। तब क्रोधित होकर बड़ी बहन बोली- 'तू मुझ पर कलंक लगाना चाहती थी। यदि मैं बैठ जाती तो लड़का मर जाता।' तब छोटी बहन बोली- 'यह तो पहले से ही मरा हुआ था। तेरे भाग्य से जीवित हुआ है। हम दोनों बहनें पूर्णिमा का व्रत करती हैं तू पूरा करती है और मैं अधूरा, जिसके दोष से मेरी संतानें मर जाती हैं। लेकिन तेरे पुण्य से यह बालक जीवित हुआ है।' इसके बाद उसने पूरे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि आज से सभी पूर्णिमा का पूरा व्रत करें, यह संतान सुख देने वाला है।

जय श्री राधे राधे 🌹🌹🙏🏻 हरे कृष्णा 🌹🌹🙏🏻

26/09/2022

#फिर_प्रकट_हुए_बांके_बिहारी

भगवान की भक्त में डूबकर हरिदास जी जब भी गाने बैठते तो प्रभु में ही लीन हो जाते। इनकी भक्ति और गायन से रिझकर भगवान श्री कृष्ण इनके सामने आ जाते। हरिदास जी मंत्रमुग्ध होकर श्री कृष्ण को दुलार करने लगते। एक दिन इनके एक शिष्य ने कहा कि आप अकेले ही श्री कृष्ण का दर्शन लाभ पाते हैं, हमें भी सांवरे सलोने का दर्शन करवाएं।

इसके बाद हरिदास जी श्री कृष्ण की भक्ति में डूबकर भजन गाने लगे। राधा कृष्ण की युगल जोड़ी प्रकट हुई और अचानक हरिदास के स्वर में बदलाव आ गया और गाने लगे-

'भाई री सहज जोरी प्रकट भई, जुरंग की गौर स्याम घन दामिनी जैसे। प्रथम है हुती अब हूं आगे हूं रहि है न टरि है तैसे।। अंग अंग की उजकाई सुघराई चतुराई सुंदरता ऐसे। श्री हरिदास के स्वामी श्यामा पुंज बिहारी सम वैसे वैसे।।'

श्री कृष्ण और राधा ने हरिदास के पास रहने की इच्छा प्रकट की। हरिदास जी ने कृष्ण से कहा कि प्रभु मैं तो संत हूं। आपको लंगोट पहना दूंगा लेकिन माता को नित्य आभूषण कहां से लाकर दूंगा। भक्त की बात सुनकर श्री कृष्ण मुस्कुराए और राधा कृष्ण की युगल जोड़ी एकाकार होकर एक विग्रह रूप में प्रकट हुई। हरिदास जी ने इस विग्रह को बांके बिहारी नाम दिया।

बांके बिहारी मंदिर में इसी विग्रह के दर्शन होते हैं। बांके बिहारी के विग्रह में राधा कृष्ण दोनों ही समाए हुए हैं। जो भी श्री कृष्ण के इस विग्रह का दर्शन करता है उसकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। भगवान श्री कृष्ण अपने भक्त के कष्टों दूर कर देते हैं।

❤️🌸 श्री कुंज बिहारी श्री हरिदास 🌸❤️

26/09/2022

कलयुग की शबरी

चित्र में जो बुजुर्ग महिला बैठी हुई हैं इनके दर्शन करना भी बड़े सौभाग्य की बात है क्योंकि यह पिछले 46 वर्षों से राधारमन जी के प्रांगण में ही बैठी रहती हैं और कभी राधारमन जी की गलियाँ और राधारमन जी का मंदिर छोड़कर इधर-उधर वृंदावन में कहीं नहीं गई। इन बुजुर्ग महिला की आयु 81 वर्ष हो चुकी है। जब यह 35 वर्ष की थीं तब यह जगन्नाथ पुरी से चलकर अकेली वृंदावन के लिए आई थीं।

आज से 46 वर्ष पहले कल्पना कीजिए वृंदावन कैसा होगा। यह अकेली स्त्री सब कुछ छोड़कर केवल भगवान के भरोसे वृंदावन आ गईं और किसी बृजवासी ने जब इनको राधारमन जी का मंदिर दिखाकर यह कह दिया यही वृंदावन है, तब से लेकर आज तक इनको 46 वर्ष हो गए यह राधारमन जी का मंदिर छोड़कर कहीं नहीं गईं।

यह मंदिर के प्रांगण में बैठकर 46 वर्ष से भजन गाती हैं, मंगला आरती के दर्शन करती हैं, कभी-कभी गोपी गीत गाती हैं।

जब इनको कोई भक्त यह कहता है कि, माताजी! वृंदावन घूम आओ।

तो यह कहती हैं - मैं कैसे जाऊं?

लोग बोलते हैं - बस से या ऑटो से चली जाओ।

यह कहती हैं - जब मुझे किसी बृजवासी ने यह बोल दिया यही वृंदावन है तो मेरे बिहारी जी तो मुझे यही मिलेंगे। मेरे लिए तो सारा वृंदावन इसी राधारमन मंदिर में ही है।

देखिए प्रेम और समर्पण की कैसी पराकाष्ठा है! आज के समय में संत हो या आम जन सब धन-दौलत, रिश्ते-नातों के पीछे भाग रहे हैं तो आज भी संसार में ऐसे दुर्लभ भक्त हैं जो केवल और केवल भगवान के पीछे भागते हैं। यह देखने में बहुत निर्धन दिखते हैं परंतु इनका परम धन इनके भगवान "राधारमन" जी हैं।

हम लोग थोड़ी सी भक्ति करते हैं और अपने आप को भक्त समझ बैठते हैं। थोड़ी सी भी परेशानी आई नहीं कि भगवान को कोसने लगते हैं या उस भगवान को छोड़कर किसी अन्य देवी-देवता की पूजा करने लग जाते हैं। हमारे भीतर समर्पण तो है ही नहीं।

आज संसार के अधिकतर लोग परेशानियों से परेशान होकर कभी एक बाबा से दूसरे बाबा पर दूसरे बाबा से तीसरे बाबा पर भाग रहे हैं और तो ओर हम ना किसी एक देवता को अपना इष्ट मानते हैं। अधिकतर लोग भगवान को अगर प्रेम भी करते हैं तो किसी ना किसी भौतिक आवश्यकता के लिए करते हैं परंतु इन दुर्लभ संत योगिनी को देखिये जो सब कुछ त्याग कर केवल भगवान के भरोसे 46 वर्ष से राधारमन जी के प्रांगण में बैठी हैं। ऐसे संतो के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम है🙏

काॅपी पेस्ट

जय श्री राधारमन जी🙏

12/09/2022

#अवश्य #पढे
श्री लाडली का कृष्ण प्रेम श्री राधा जी ने अपने महल मै तोते पाल रखे थे, और उन्हें रोज़ हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कहती थी. तो तोते भी सारा दिन हरे कृष्ण हरे कृष्ण, बोलते रहते, और सब सखियाँ भी हरे-कृष्ण, हरे-कृष्ण, कहती. एक दिन राधाजी यमुना किनारे विचर रही थी. सखियाँ दूर झुंड मै किकोल कर रही थी. इतने मै उनकी सामने नज़र पड़ी तो क्या देखती है की श्यामसुंदर नारद जी से बतिया रहे है. श्रीजी को क्या सूझी वो छिप कर उनकी बातें सुनने लगीं. नारद जी कह रहे थे कि जहाँ भी मैं जाता हूँ वहीं पूरे ब्रज मै हरे-कृष्ण, हरे-कृष्ण, की गूँज सुनाई देती है. ठाकुरजी बोले पर मुझे तो राधे राधे नाम प्रिय है. इतना सुनते ही राधाजी कि आँखों से अश्रूयों की धार बहने लगी, वो तुरंत अपने महल पर लौट आयीं. और अब अपने तोतों से हरे कृष्ण की जगह राधे-राधे कहने लगी. जब सखियों ने कहा लोग तुम्हे अभिमानी कहेंगे कि तुम अपने नाम की जय बुलवाना चाहती हो, श्री जी ने कहा कि अगर मेरे प्रियतम को यही नाम पसंद है तो मैं तो यही नाम लूंगी.

09/09/2022

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