03/07/2026
No. 289
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2008 से शुरू हुआ खेल—आज हर हिन्दू संगठन तक पहुँच गया?
जब संत आसाराम बापू के समर्थक यह कहते रहे कि संत आसाराम बापू को झूठे आरोपों में फँसाकर बदनाम किया गया, तब बहुत से लोग चुप रहे।
कई लोगों ने कहा—“हमें क्या लेना-देना?” लेकिन आज सवाल बड़ा है।
क्या देश के धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक संगठनों की स्वतंत्र आवाज़ें धीरे-धीरे खत्म की जा रही हैं?
पहले हर संगठन और संस्था का विश्वास जीतकर उसमें अपने लोगों को शामिल करना, फिर उस संस्था के प्रमुख व्यक्ति को किसी न किसी विवाद में फँसा देना या रहस्यमय तरीके से उसकी मृत्यु हो जाना—क्या यह सब केवल संयोग है, या एक सोचा-समझा षड्यंत्र?
आज जितने भी बड़े संगठन या संस्थाएँ हैं, उनमें ज़्यादातर लोग BJP के बताए जाते हैं। चाहे वह RSS हो, विश्व हिन्दू परिषद हो या बजरंग दल। दिखने के लिए तो हिन्दू हितैषी हैं, पर काम BJP के हितों को देखकर ही करते हैं।
बजरंग दल के दारा सिंह को उम्रकैद, संत आसाराम बापू को लगभग 90 वर्ष की आयु में उम्रकैद, अशोक सिंघल जी की रहस्यमय मृत्यु, कमलेश तिवारी की हत्या, तथा प्रवीण तोगड़िया को जान से मारने की कथित साजिश—हालाँकि वे बच गए और बाद में उन्हें विश्व हिन्दू परिषद से बाहर कर दिया गया।
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करणी सेना के सुखदेव सिंह गोगामेड़ी, महिपाल सिंह मकराना, विनय सिंह सहित 15 से 20 लोगों की हत्या हो जाती है।
रामदेव बाबा, जो कभी देशहित, महँगाई, काले धन और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर खुलकर बोलते थे, आज एक शब्द तक नहीं बोलना चाहते।
क्योंकि सबको इस बात का पता है कि इस देश की सबसे बड़ी संस्थाओं में से एक, 10 करोड़ समर्थकों वाले संत आसाराम बापू को यदि झूठे आरोपों में फँसाकर निर्दोष होते हुए भी जेल में रखा जा सकता है, तो हमारा क्या हाल होगा।
जब संत आसाराम बापू को जेल में डालकर यह सब हो रहा था, तब अधिकांश लोग यह कहकर किनारा कर रहे थे कि “हमें इससे क्या, जो हो रहा है वह आसाराम बापू के साथ हो रहा है।” लेकिन उसी का परिणाम है कि आज हर संस्था और संगठन राजनीति की चपेट में आता जा रहा है।
राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, शिवराज सिंह जैसे नेता, जो कभी आसाराम बापू के सत्संगों में जाकर पार्टी के लिए उनके भक्तों को रिझाते थे, बापू के साथ हो रहे कथित अन्याय को देखकर भी अपने पद और कुर्सी को बचाने में लगे रहे। आज पार्टी में उनकी स्थिति क्या है, यह किसी से छिपा नहीं है।
जो हिन्दू समाज कांग्रेस की नीतियों और विधर्मियों के अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष कर रहा था, उसके उन नेताओं को, जो किसी पार्टी के नहीं बल्कि हिन्दुत्व के लिए कार्य करते थे, समाप्त करके मोदी और अमित शाह ने BJP की बैसाखी पर निर्भर बना दिया कि “हम हैं तो तुम खड़े हो, नहीं तो BJP की बैसाखी हटते ही तुम ज़मीन पर आ जाओगे।”
विपक्षी दल, जिन्होंने यह सोचकर चुप्पी साध ली कि आसाराम बापू से उनका कोई लेना-देना नहीं है, आज स्वयं ऐसी परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं जहाँ उनके निर्वाचित नेता भी दल बदलकर BJP में शामिल हो रहे हैं।
मोदी और अमित शाह की चाल बिल्कुल शकुनि के पासे की तरह फेंकी जा रही है। चुनाव कोई भी जीते, लेकिन सत्ता में आएगी तो BJP।
और इस काम में ईसाई मिशनरियों का मोदी और अमित शाह को पूरा समर्थन है, क्योंकि जो काम कांग्रेस के समय हिन्दुओं के विरोध के कारण कठिन था, वही काम मोदी और अमित शाह के हिन्दुत्व के नकाब के पीछे आसानी से किया जा रहा है।
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