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Dears We are the children of god , Every one has 2 legs, 2 hands, minds, 2eyes & all things but after all few peoples success why ????????????????????????
समस्या कैसै भी समाधान जैसे भी.....

10/10/2024
19/08/2024

*रक्षाबंधन पर्व 2024 कब मनाये
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जानिए शुभ लाभ ज्योतिष परामर्श केंद्र
एस्ट्रो पंडित अरविंद पाठक गुरुजी से
9768051328 *

*आप सभी को रक्षाबंधन की अग्रिम हार्दिक शुभकामनाएं*

*जैसा कि आप जानते हैं भारतीय सनातन संस्कृति में प्रत्येक त्यौहार में मुहूर्त का विशेष महत्व है बिना मूहुर्त कोई भी त्योहार नहीं मनाया जाता*

*इसी प्रकार रक्षाबंधन में भी मुहूर्त देखना अति आवश्यक है । बहन भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है अगर बिना मुहूर्त बांधी जाए तो ऐसी मान्यता है उसका फल कम हो जाता है इसलिए इस बार रक्षाबंधन को लेकर थोड़ी असमंजस की स्थिति बनी हुई है उसकी निवृत्ति के लिए भारत के प्रतिष्ठित पंचांग श्री ऋषिकेश का अवलोकन किया गया जिसमें स्पष्ट लिखा है कि कल 19 अगस्त दिन सोमवार 2024 को दोपहर 1:26 से रक्षाबंधन का मुहूर्त शुरू होगा*

*अर्थात सभी बहनें अपने भाई की कलाई पर दोपहर 1:26 pm से राखी बांधना प्रारंभ करें *
नोट: चंद्रमा कुंभ राशि स्थित होने पर भद्र दोपहर 1:25 तक पृथ्वी लोक में निवास है इसलिए इसके उपरांत रक्षाबंधन त्योहार मनाएं
हर हर महादेव हर हर गंगे
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11/12/2023

*दिसंबर महीने में कौन सा ग्रह बदलेगा अपनी चाल और किस राशि पर कैसा प्रभाव*

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*✍🏻ज्योतिषशास्त्र में ग्रहों की भूमिका:-* वर्ष 2023 का आखिरी महीना दिसंबर चल रहा है एस्ट्रो पंडित अरविन्द पाठक गुरुजी ने बताया कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हर महीने का अपना महत्व होता है, ग्रहों के परिवर्तन का असर सभी 12 राशियों पर होता है, आइए जानते है वर्ष 2023 के बचे आखिरी महीने में किन-किन ग्रहों का गोचर होगा और इसका सभी पर कैसा प्रभाव पड़ेगा।
*सूर्य का धनु राशि में गोचर*
ज्योतिष शास्त्र में सूर्य का विशेष महत्व होता है एस्ट्रो पंडित अरविन्द पाठक गुरुजी ने बताया कि फलित ज्योतिष में जीवजगत की सृष्टि एवं आत्मा के कारक सूर्य ग्रह यश, नौकरी और वैभव के कारक है, ये सिंह राशि के स्वामी हैं, मेष राशि इनकी उच्च राशि और तुला राशि नीच मानी गई है 16 दिसंबर को सूर्य धनु राशि में प्रवेश करेंगे, सूर्य के राशि परिवर्तन से कई जातकों के जीवन में नौकरी और प्रमोशन मिलने की संभावन बढ़ जाती है।
*उपाय-* सूर्य को मजबूत करने के लिए प्रतिदिन स्नान के बाद अर्घ्य अर्पित करें और यह मंत्र का जाप करे ॐ घृणि सूर्याय नमः।
*चंद्रमा हर ढाई दिनों में अपनी राशि बदलते रहते हैं*
चंद्रमा हर ढाई दिनों में अपनी राशि बदलते रहते हैं, ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन का कारक कहा गया है।
*उपाय-* कुंडली में चंद्रमा को प्रबल बनाने के लिए शिवजी की पूजा करनी चाहिए।
*मंगल ग्रह का 27 दिसम्बर में धनु राशि मे प्रवेश होगा....*

*28 दिसंबर को बुध ग्रह बक्री होकर वृश्चिक राशि में गोचर करेंगे*

*गुरु देव मेष राशि में ही रहेंगे*
इस माह गुरु का किसी भी राशि में परिवर्तन नहीं होगा।

*25 दिसंबर को शुक्र वृश्चिक राशि में गोचर करने वाले है*
ज्योतिष में शुक्र को वैभव और ऐश्वर्य प्रदान करने वाला ग्रह माना गया है।
उपाय- शुक्र के लिए शिवलिंग पर दूध अर्पित करना चाहिए और ॐ शुं शुक्राय नमः यह मंत्र जाप करे।
*कुंभ राशि में ही रहेंगे शनि देव*
इस महीने शनि का राशि परिवर्तन नहीं होगा। शनि देव कुंभ राशि में ही भ्रमण करेंगे।
*राहु-केतु का अभी नही होगा राशि परिवर्तन*
राहु और केतु हमेशा वक्री ही रहते हैं। इस महीने इनका गोचर किसी भी राशि में नहीं होगा।
*"ज्योतिष शास्त्र, वास्तुशास्त्र, वैदिक अनुष्ठान व समस्त धार्मिक कार्यो के लिए संपर्क करें:-*
*✍🏻 🚩शुभ लाभ ज्योतिष परामर्श केंद्र 🚩
एस्ट्रो पंडित अरविन्द पाठक गुरुजी मुंबई/ काशी
9768051328

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20/11/2023

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भ्रम में ना हो जियुतिया व्रत और paaran को लेकर शास्त्र प्रमाणिक भी दे रहा हु...शुभ लाभ ज्योतिष परामर्श केंद्र..जिउतिया क...
04/10/2023

भ्रम में ना हो जियुतिया व्रत और paaran को लेकर शास्त्र प्रमाणिक भी दे रहा हु...
शुभ लाभ ज्योतिष परामर्श केंद्र..

जिउतिया का व्रत पूजन 6 oct को करे तथा पारण 7 oct को मुंबई में 11.15 के बाद करे धन्यवाद
एस्ट्रो पण्डित अरविन्द पाठक गुरुजी मुंबई

प्रिय मित्रों इस वर्ष रक्षा बंधन को लेकर ऊहापोह की स्तिथि बनीं हुई हैकि 11अगस्त या 12 को मनाये! 11 को पूणिमा9:35am से प्...
03/08/2022

प्रिय मित्रों इस वर्ष रक्षा बंधन को लेकर ऊहापोह की स्तिथि बनीं हुई हैकि 11अगस्त या 12 को मनाये! 11 को पूणिमा9:35am से प्रारंभ होकर 12 को प्रातः 7:16तक है! लेकिन 11 को9:35 प्रातः से ही भद्रा भी लग रहा है! भद्रा में राखी नहीं बाधने कानियम है! भद्रा की समाप्ति 8:25pm पर होगी! इस तरह राखी कब बांधा जाय! भद्रा के विषय में जयोतिष सरव संग्रह में कहा गया कि मकर राशि का भद्रा सर्वग में रहता है जिसका फल कहा गया कि (स्वगे भद्रा शुभम् र्कूयात पातले च धनागम मृत्यु लोक यदा भद्रा सर्व कार्य विनशयति) इस प्रकार 11 को भद्रा से कोई हानि नहीं है बल्कि लाभ है! अत:11 को रक्षा बंधन का र्पव मनाने में कोई परेशानी नहीं है!
एस्ट्रो पंडित अरविन्द पाठक गुरुजी मुम्बई
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06/06/2022

पूजा अर्चना में वर्जित काम
१) गणेश जी को तुलसी
२) देवी पर दुर्वा
३) शिव लिंग पर केतकी फूल
४) विष्णु को तिलक में अक्षत
५) दो शंख एक समान
६) तीन गणेश
७) तुलसी चबाना
८) द्वार पर जूते चप्पल उल्टे
९) दर्शन करके बापस लौटते समय घंटा
१०) एक हाथ से आरती लेना
११) ब्राह्मण को बिना आसन बिठाना
१२) स्त्री द्वारा दंडवत प्रणाम
१३) बिना दक्षिणा ज्योतिषी से पूछना
१४) घर में अंगूठे से बड़ा शिवलिंग
१५) तुलसी पेड़ में शिवलिंग
१६) गर्भवती महिला को शिवलिंग स्पर्श
१७) स्त्री द्वारा मंदिर में नारियल फोडना
१८) रजस्वला स्त्री का मंदिर प्रवेश
१९) परिवार में सूतक हो तो पूजा प्रतिमा स्पर्श
२०) शिव जी की पूरी परिक्रमा
२१) शिव लिंग से बहते जल को लांघना
२२) एक हाथ से प्रणाम
२३) दूसरे के दीपक में अपना दीपक जलाना
२४) अगरबत्ती जलाना बांस की सींक वाली
२५) देवता को लोभान या लोभान की अगरबत्ती
२६) स्त्री द्वारा हनुमानजी शनिदेव को स्पर्श
२७) कन्या ओ से पैर पडवाना
२८) मंदिर में परस्त्री को ग़लत निगाह से देखना
२९) मंदिर में भीड़ में परस्त्री से धक्का मुक्की
३०) साईं की अन्य प्रतिमाओं के साथ स्थापना
३१) शराबी का भैरव के अलावा अन्य मंदिर प्रवेश
३२) किसी तांत्रिक का दिया प्रसाद

19/03/2022

यह वस्तुएँ देव पूजा के योग्य नहीं रहती हैं
१. घर में पूजा करने वाला एक ही मूर्ति की पूजा नहीं करें। अनेक देवी-देवताओं की पूजा करें। घर में दो शिवलिंग की पूजा ना करें तथा पूजा स्थान पर तीन गणेश नहीं रखें।
२. शालिग्राम की मूर्ति जितनी छोटी हो वह ज्यादा फलदायक है।
३. कुशा पवित्री के अभाव में स्वर्ण की अंगूठी धारण करके भी देव कार्य सम्पन्न किया जा सकता है।
४. मंगल कार्यो में कुमकुम का तिलक प्रशस्त माना जाता हैं। पूजा में टूटे हुए अक्षत के टूकड़े नहीं चढ़ाना चाहिए।
५. पानी, दूध, दही, घी आदि में अंगुली नही डालना चाहिए। इन्हें लोटा, चम्मच आदि से लेना चाहिए क्योंकि नख स्पर्श से वस्तु अपवित्र हो जाती है अतः यह वस्तुएँ देव पूजा के योग्य नहीं रहती हैं।
६. तांबे के बरतन में दूध, दही या पंचामृत आदि नहीं डालना चाहिए क्योंकि वह मदिरा समान हो जाते हैं।
७. आचमन तीन बार करने का विधान हैं। इससे त्रिदेव ब्रह्मा-विष्णु-महेश प्रसन्न होते हैं। दाहिने कान का स्पर्श करने पर भी आचमन के तुल्य माना जाता है।
८. कुशा के अग्रभाग से दवताओं पर जल नहीं छिड़के।
९. देवताओं को अंगूठे से नहीं मले। चकले पर से चंदन कभी नहीं लगावें। उसे छोटी कटोरी या बांयी हथेली पर रखकर लगावें।
९. पुष्पों को बाल्टी, लोटा, जल में डालकर फिर निकालकर नहीं चढ़ाना चाहिए।
१०. भगवान के चरणों की चार बार, नाभि की दो बार, मुख की एक बार या तीन बार आरती उतारकर समस्त अंगों की सात बार आरती उतारें।
११. भगवान की आरती समयानुसार जो घंटा, नगारा, झांझर, थाली, घड़ावल, शंख इत्यादि बजते हैं उनकी ध्वनि से आसपास के वायुमण्डल के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। नाद ब्रह्मा होता हैं। नाद के समय एक स्वर से जो प्रतिध्वनि होती हैं उसमे असीम शक्ति होती हैं।
१२. लोहे के पात्र से भगवान को नैवेद्य अपर्ण नहीं करें।
१३. हवन में अग्नि प्रज्वलित होने पर ही आहुति दें। समिधा अंगुठे से अधिक मोटी नहीं होनी चाहिए तथा दस अंगुल लम्बी होनी चाहिए। छाल रहित या कीड़े लगी हुई समिधा यज्ञ-कार्य में वर्जित हैं। पंखे आदि से कभी हवन की अग्नि प्रज्वलित नहीं करें।
१४. मेरूहीन माला या मेरू का लंघन करके माला नहीं जपनी चाहिए। माला, रूद्राक्ष, तुलसी एवं चंदन की उत्तम मानी गई हैं। माला को अनामिका (तीसरी अंगुली) पर रखकर मध्यमा (दूसरी अंगुली) से चलाना चाहिए।
१५. जप करते समय सिर पर हाथ या वस्त्र नहीं रखें। तिलक कराते समय सिर पर हाथ या वस्त्र रखना चाहिए। माला का पूजन करके ही जप करना चाहिए। ब्राह्मण को या द्विजाती को स्नान करके तिलक अवश्य लगाना चाहिए।
१६. जप करते हुए जल में स्थित व्यक्ति, दौड़ते हुए, शमशान से लौटते हुए व्यक्ति को नमस्कार करना वर्जित हैं। बिना नमस्कार किए आशीर्वाद देना वर्जित हैं।
१७. एक हाथ से प्रणाम नही करना चाहिए। सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए। बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करें।
१८. जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं। इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं।
१९. जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए। जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए।
२०. संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं।
२१. दीपक से दीपक को नही जलाना चाहिए।
२२. यज्ञ, श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं।
किसी भी समस्या के समाधान के लिये समय लेकर सम्पर्क करे.
WhatsApp : 9768051328

07/12/2021

राजयोग सभी योगों का राजा कहलाता है क्योंकि इसमें प्रत्येक प्रकार के योग की कुछ न कुछ विशेषता अवश्‍य मिल जाती है। अलग-अलग सन्दर्भों में राजयोग के अलग-अलग अनेक अर्थ हैं। ऐतिहासिक रूप में योग की अन्तिम अवस्था समाधि' को ही 'राजयोग' कहते थे। किन्तु आधुनिक सन्दर्भ में हिन्दुओं के छः दर्शनों में से एक का नाम 'राजयोग' (या केवल योग) है। ज्योतिष में राजयोग का अर्थ होता है कुंडली में ग्रहों का इस प्रकार से मौजूद होना की सफलताएं, सुख, पैसा, मान-सम्मान आसानी से प्राप्त हो।

32 प्रकार के राजयोग

ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों में कुल 32 प्रकार के मुख्य राजयोग बताए गए हैं। जिस मनुष्य की कुंडली में 32 प्रकार के सभी योग पूर्ण रूप से घटित हो जाते हैं, वह मनुष्य चक्रवर्ती सम्राट बनता है। इसमें नीचभंग राजयोग भी प्रमुख माने जाते हैं। राजयोग होने पर व्यक्ति को उच्च पद, मान सम्मान, धन तथा अन्य प्रकार की सुख-संपत्ति प्राप्त होती हैं। अगर जन्म कुंडली के नौवें या दसवें घर में सही ग्रह मौजूद रहते हैं तो उन परिस्थितियों में राजयोग का निर्माण होता है। जन्म कुंडली में नौवां स्थान भाग्य का और दसवां कर्म का स्थान होता है। कोई भी व्यक्ति इन दोनों घरों की वजह से ही सबसे ज्यादा सुख और समृद्धि प्राप्त करता है। राजयोग का आंकलन करने के लिए जन्म कुंडली में लग्न को आधार बनाया जाता है। कुंडली के लग्न में सही ग्रह मौजूद होते हैं तो राजयोग का निर्माण होता है।

कुंडली में जब शुभ ग्रहों का योग बनता है उसके आधार पर राजयोग का आंकलन किया जाता है। कुंडली के किसी भी भाव में चंद्र-मंगल का योग बन रहा है तो जीवन में धन की कमी नहीं होती है, मान-सम्मान मिलता है, सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है। कुंडली में राजयोग का अध्ययन करते वक़्त अन्य शुभ और अशुभ ग्रहों के फलों का भी अध्ययन जरुरी है। इनके कारण राजयोग का प्रभाव कम या ज्यादा हो सकता है।

राजयोग वे ग्रह स्थितियां हैं जिनसे व्यक्ति विपुल धन संपदा, पद, गौरव, सुख और ऐश्वर्य पाता है। विपरीत राजयोग में व्यक्ति को प्राप्तियां तो होती हैं लेकिन वह उनका आनंद नहीं ले पाता। जिस किसी व्यक्ति की कुंडली में ये ज्योतिषीय योग बनता है तो व्यक्ति राज्याधिकारी बनता है। जब कुंडली में 2, 3, 5, 6, 8, 9 तथा 11, 12 में से किसी स्थान में बृहस्पति की स्थिति हो और शुक्र 8वें स्थान में हो तो ऐसी ग्रह स्थिति में जन्म लेने वाला जातक राज्याधिकारी ही बनता है। कभी-कभी हम लोग किसी साधारण परिवार में जन्मे बालक के राजसी लक्षण देखते हैं जो इसी योग के कारण बनते हैं। जब भी मनुष्य कोई कोशिश करता है या किसी चीज़ की इच्छा करता है तो उसके प्रयत्न विभिन्न योगों के अनुसार ही विकसित होते हैं।

निम्नलिखित स्थितियों में राजयोगों का सृजन होता है:

1. जब किसी व्यक्ति की कुंडली में ग्रह एक-दूसरे की राशि में होते हैं तो शुभ फल प्राप्त होते हैं।
2. जब किसी व्यक्ति की कुंडली में ग्रह एक-दूसरे से दृष्टि संबंध में हो तो शुभ फल प्राप्त होते हैं।
3. कुंडली में ग्रहों की परस्पर युति होने पर शुभ फल प्राप्त होते हैं।
4. कुंडली में एक ग्रह दूसरे ग्रह को संदर्भित करता हो तो शुभ।
5. नवम और पंचम स्‍थान के अधिपतियों के साथ बलवान केन्‍द्राधिपति का संबंध शुभफलदायक होता है। इसे राजयोग कारक भी बताया गया है।
6. योगकारक ग्रहों (यानी केन्‍द्र और त्रिकोण के अधिपतियों) की दशा में बहुधा राजयोग की प्राप्ति होती है। योगकारक संबंध रहित ऐसे शुभ ग्रहों की दशा में भी राजयोग का फल मिलता है।

• योगकारक ग्रहों से संबंध करने वाला पापी ग्रह अपनी दशा में तथा योगकारक ग्रहों की अंतरदशा में जिस प्रमाण में उसका स्‍वयं का बल है, तदनुसार वह योगज फल देगा। (यानी पापी ग्रह भी एक कोण से राजयोग में कारकत्‍व की भूमिका निभा सकता है।)
• धर्म और कर्म भाव के अधिपति यानी नवमेश और दशमेश यदि क्रमश: अष्‍टमेश और लाभेश हों तो इनका संबंध योगकारक नहीं बन सकता है। (उदाहरण के तौर पर मिथुन लग्‍न) इस स्थिति को राजयोग भंग भी मान सकते हैं।
• यदि मारक ग्रहों की अंतरदशा में राजयोग आरंभ हो तो वह अंतरदशा मनुष्‍य को उत्‍तरोतर राज्‍याधिकार से केवल प्रसिद्ध कर देती है। पूर्ण सुख नहीं दे पाती है।
• अगर राजयोग करने वाले ग्रहों के संबंधी शुभग्रहों की अंतरदशा में राजयोग का आरंभ हो तो राज्‍य से सुख और प्रतिष्‍ठा बढ़ती है। राजयोग करने वाले से संबंध न करने वाले शुभग्रहों की दशा प्रारंभ हो तो फल सम होते हैं। फलों में अधिकता या न्‍यूनता नहीं दिखाई देगी। जैसा है वैसा ही बना रहेगा।
• राहु-केतु यदि केन्‍द्र (विशेषकर चतुर्थ और दशम स्‍थान में) अथवा त्रिकोण में स्थित होकर किसी भी ग्रह के साथ संबंध नहीं करते हों तो उनकी महादशा में योगकारक ग्रहों की अंतरदशा में उन ग्रहों के अनुसार, शुभयोगकारक फल देते हैं। (यानी शुभारुढ़ राहु-केतु शुभ संबंध की अपेक्षा नहीं रखते। बस वे पाप संबंधी नहीं होने चाहिए तभी कहे हुए अनुसार फलदायक होते हैं।) राजयोग रहित शुभग्रहों की अंतरदशा में शुभफल होगा, ऐसा समझना चाहिए।
• दशम स्‍थान का स्‍वामी लग्‍न में और लग्‍न का स्‍वामी दशम में, ऐसा योग हो तो वह राजयोग समझना चाहिए। इस योग पर विख्‍यात और विजयी ऐसा मनुष्‍य होता है।
• नवम स्‍थान का स्‍वामी दशम में और दशम स्‍थान का स्‍वामी नवम में हो तो ऐसा योग राजयोग होता है। इस योग पर विख्‍यात और विजयी पुरुष होता है।
• जन्मपत्री में जो नीच ग्रह अपने उच्चांश में बली हो तो व्यक्ति राजा के समान ऐश्वर्य भोगता है। जबकि उच्च के ग्रह अपने नीचांशों में होने पर व्यक्ति को गरीबी में जीवन बिताना पड़ता है।
• जिस मनुष्य का पूर्ण बली चन्द्रमा लग्न को छोड़कर शेष केन्द्र या त्रिकोण (4,7,10,5,9) में यदि पूर्ण बली शुक्र या बृहस्पति से युति बनाता हो तो वह मनुष्य साक्षात् राजा के समान ही सुख-संपत्ति और वैभवपूर्ण जीवन जीता है।
• किसी व्यक्ति के जन्म समय में जो भी ग्रह अपनी नीच संज्ञा वाली राशि में स्थित हो या बैठा हो, यदि उस राशि का स्वामी और उसकी उच्च संज्ञा राशि का स्वामी त्रिकोण (5,9) या केंद्र (1,4,7,10) में बैठा हो तो वह मनुष्य या तो राजा होता है या फिर चारों दिशाओं में घूमने वाला यशस्वी, धार्मिक नेता होता है। ऐसा व्यक्ति राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री, योगी, शंकराचार्य या इसी तरह के पद पर विराजमान होता है।
• जिस मनुष्य का कर्क लग्न बृहस्पति से युक्त हो, शुक्र धर्म स्थान में विराजमान हो तथा शनि व मंगल सातवें घर में बैठे हों तो वह मनुष्य सम्राट होता है।
• किसी व्यक्ति के जन्म के समय जो ग्रह नीच राशि में हो, उस राशि का स्वामी या उसकी उच्चराशि का स्वामी लग्न में हो या चंद्रमा से केंद्र (1,4,7,10) में हो तो वह व्यक्ति स्वभाव से अत्यंत धार्मिक तथा चक्रवर्ती सम्राट होता है।
• जिस व्यक्ति के दूसरे, पांचवें तथा नवें या ग्यारहवें घर में सभी शुभ ग्रह विराजमान हो तो वह मनुष्य धनवान होता है। यदि लग्नेश शुभ ग्रहों से युक्त होकर केंद्र त्रिकोण में उच्च या स्वगृही बैठा हो तो मनुष्य बहुत धनवान राजनीतिज्ञ होता है।
• यदि व्यक्ति की कुंडली में नवमेश अपने नवांशनाथ के साथ केन्द्र में पंचमेश से युति बना रहा हो तो ऐसे व्यक्ति का राजा भी सम्मान करते हैं। प्राय: ऐसे लोग उच्च पदस्थ सरकारी अफसर बनते हैं।
• यदि मेष में गुरु, धन में शनि और चन्द्रमा, दशम में राहु-शुक्र साथ बैठे हों तो व्यक्ति बहुत बड़ा राजनेता बनता है। यदि सभी ग्रह (2,6,7,12) में बैठे हो तो व्यक्ति बहुत ही बड़ा प्रभावशाली राजपुरुष होता है।

हर राशि में राजयोग निर्माण के लिए अलग-अलग दशा होती है:

1 मेष लग्न- मेष लग्न में मंगल और बृहस्पति अगर कुंडली के नौवें या दसवें भाव में विराजमान होते हैं तो यह राजयोग कारक बन जाता है।
2 वृष लग्न- वृष लग्न में शुक्र और शनि अगर नौवें या दसवें स्थान पर विराजमान होते हैं तो यह राजयोग का निर्माण कर देते हैं। इस लग्न में शनि राजयोग के लिए अहम कारक बताया जाता है।
3 मिथुन लग्न- मिथुन लग्न में अगर बुध या शनि कुंडली के नौवें या दसवें घर में एक साथ आ जाते हैं तो ऐसी कुंडली वाले जातक का जीवन राजाओं जैसा बन जाता है।
4 कर्क लग्न- कर्क लग्न में अगर चंद्रमा और ब्रहस्पति भाग्य या कर्म के स्थान पर मौजूद होते हैं तो यह केंद्र त्रिकोण राज योग बना देते हैं। इस लग्न वालों के लिए बृहस्पति और चन्द्रमा बेहद शुभ ग्रह भी बताये जाते हैं।
5 सिंह लग्न- सिंह लग्न के जातकों की कुंडली में अगर सूर्य और मंगल दशम या भाग्य स्थान में बैठ जाते हैं तो जातक के जीवन में राज योग कारक का निर्माण हो जाता है।
6 कन्या लग्न- कन्या लग्न में बुध और शुक्र अगर भाग्य स्थान या दशम भाव में एक साथ आ जाते हैं तो जीवन राजाओं जैसा हो जाता है।
7 तुला लग्न- तुला लग्न वालों का भी शुक्र या बुध अगर कुंडली के नौवें या दसवें स्थान पर एक साथ विराजमान हो जाता है तो इस ग्रहों का शुभ असर जातक को राजयोग के रूप में प्राप्त होने लगता है।
8 वृश्चिक लग्न- वृश्चिक लग्न में सूर्य और मंगल, भाग्य स्थान या कर्म स्थान (नौवें या दसवें) भाव में एक साथ आ जाते हैं तो ऐसी कुंडली वाले का जीवन राजाओं जैसा हो जाता है। यहाँ एक बात और ध्यान देने वाली है कि अगर मंगल और चंद्रमा भी भाग्य या कर्म स्थान पर आ जायें तो यह शुभ रहता है।
9 धनु लग्न- धनु लग्न के जातकों की कुंडली में राजयोग के कारक, बृहस्पति और सूर्य माने जाते हैं। यह दोनों ग्रह अगर नौवें या दसवें घर में एक साथ बैठ जायें तो यह राजयोग कारक बन जाता है।
10 मकर लग्न- मकर लग्न वाली की कुंडली में अगर शनि और बुध की युति, भाग्य या कर्म स्थान पर मौजूद होती है तो राजयोग बन जाता है।
11 कुंभ लग्न- कुंभ लग्न वालों का अगर शुक्र और शनि नौवें या दसवें स्थान पर एक साथ आ जाते हैं तो जीवन राजाओं जैसा हो जाता है।
12 मीन लग्न- मीन लग्न वालों का अगर बृहस्पति और मंगल जन्म कुंडली के नवें या दशम स्थान पर एक साथ विराजमान हो जाते हैं तो यह राज योग बना देते हैं।

विभिन्न प्रकार के राजयोग:

• लक्ष्मी योग- कुंडली के किसी भी भाव में चंद्र-मंगल का योग बन रहा है तो जीवन में धन की कमी नहीं होती है। मान-सम्मान मिलता है। सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है।

• रूचक योग- मंगल केंद्र भाव में होकर अपने मूल त्रिकोण (पहला, पांचवा और नवा भाव), स्वग्रही (मेष या वृश्चिक में हो तो) अथवा उच्च राशि (मकर राशि) का हो तो रूचक योग बनता है। रूचक योग होने पर व्यक्ति बलवान, साहसी, तेजस्वी, उच्च स्तरीय वाहन रखने वाला होता है। इस योग में जन्मा व्यक्ति विशेष पद प्राप्त करता है।

• भद्र योग- बुध केंद्र में मूल त्रिकोण स्वगृही (मिथुन या कन्या राशि में हो) अथवा उच्च राशि (कन्या) का हो तो भद्र योग बनता है। इस योग से व्यक्ति उच्च व्यवसायी होता है। व्यक्ति अपने प्रबंधन, कौशल, बुद्धि-विवेक का उपयोग करते हुए धन कमाता है। यह योग सप्तम भाव में होता है तो व्यक्ति देश का जाना माना उद्योगपति बन जाता है।

• शश योग- यदि कुंडली में शनि की खुद की राशि मकर या कुम्भ में हो या उच्च राशि (तुला राशि) का हो या मूल त्रिकोण में हो तो शश योग बनता है। यह योग सप्तम भाव या दशम भाव में हो तो व्यक्ति अपार धन-सम्पति का स्वामी होता है। व्यवसाय और नौकरी के क्षेत्र में ख्याति और उच्च पद को प्राप्त करता है।

• गजकेसरी योग- जिसकी कुंडली में शुभ गजकेसरी योग होता है, वह बुद्धिमान होने के साथ ही प्रतिभाशाली भी होता है। इनका व्यक्तित्व गंभीर व प्रभावशाली भी होता है। समाज में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त करते हैं। शुभ योग के लिए आवश्यक है कि गुरु व चंद्र दोनों ही नीच के नहीं होने चाहिए। साथ ही, शनि या राहु जैसे पाप ग्रहों से प्रभावित नहीं होना चाहिए।

• सिंघासन योग- अगर सभी ग्रह दूसरे, तीसरे, छठे, आठवें और बारहवें घर में बैठ जाए तो कुंडली में सिंघासन योग बनता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति शासन अधिकारी बनता है और नाम प्राप्त करता है।

• चतुःसार योग- अगर कुंडली में ग्रह मेष, कर्क तुला और मकर राशि में स्थित हो तो ये योग बनता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति इच्छित सफलता जीवन में प्राप्त करता है और किसी भी समस्या से आसानी से बाहर आ जाता है।

• श्रीनाथ योग- अगर लग्न का स्वामी, सातवें भाव का स्वामी दसवें घर में मौजूद हो और दसवें घर का स्वामी नवें घर के स्वामी के साथ मौजूद हो तो श्रीनाथ योग का निर्माण होता है। इसके प्रभाव से जातक को धन, नाम, यश, वैभव की प्राप्ति होती है।

• विपरीत राजयोग - त्रिक स्थानों के स्वामी त्रिक स्थानों में हो या युति अथवा दृष्टि संबंध बनते हों तो विपरीत राजयोग बनता है। यह व्यक्ति को अत्यंत धनवान और खुशहाल बनाता है इस योग में व्यक्ति महाराजाओं के समान सुख प्राप्त करता है। ज्योतिष ग्रंथों में यह भी बताया गया है कि अशुभ फल देने वाला ग्रह जब स्वयं अशुभ भाव में होता है तो अशुभ प्रभाव नष्ट हो जाते है।

• हंस योग- बृहस्पति केंद्र भाव में होकर मूल त्रिकोण स्वगृही (धनु या मीन राशि में हो) अथवा उच्च राशि (कर्क राशि) का हो तब हंस योग होता है। यह योग व्यक्ति को सुन्दर, हंसमुख, मिलसार, विनम्र और धन-सम्पति वाला बनाता है। व्यक्ति पुण्य कर्मों में रूचि रखने वाला, दयालु, शास्त्र का ज्ञान रखने वाला होता है।

• मालव्य योग- कुंडली के केंद्र भावों में स्थित शुक्र मूल त्रिकोण अथवा स्वगृही (वृष या तुला राशि में हो) या उच्च (मीन राशि) का हो तो मालव्य योग बनता है। इस योग से व्यक्ति सुन्दर, गुणी, तेजस्वी, धैर्यवान, धनी तथा सुख-सुविधाएं प्राप्त करता है

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20/07/2021

*देवशयनी एकादशी मंगलवार जुलाई 20 विशेष*
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एकादशी तिथि आरंभ👉 19 जुलाई 2021 सायं 0६:५८ बजे से।

एकादशी तिथि समाप्त 👉 20 जुलाई सायं ०४: २९ बजे तक।

पारण का समय 👉 21 जुलाई प्रातः ०६:३० से ०९: ३० बजे तक।

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार, इस दिन से भगवान विष्णु चार महीने तक पाताल में शयन करते हैं। ये चार महीने चातुर्मास कहलाते हैं। चातुर्मास को भगवान की भक्ति करने का समय बताया गया है। इस दौरान कोई मांगलिक कार्य भी नहीं किए जाते।

इसके दौरान जितने भी पर्व, व्रत, उपवास, साधना, आराधना, जप-तप किए जाते हैं उनका विशाल स्वरूप एक शब्द में 'चातुर्मास्य'* कहलाता है। चातुर्मास से चार मास के समय का बोध होता है और चातुर्मास्य से इस समय के दौरान किए गए सभी पर्वों का समग्र बोध होता है।

पुराणों में इस चौमासे* का विशेष रूप से वर्णन किया गया है। भागवत में इन चार माहों की तपस्या को एक यज्ञ की संज्ञा दी गई है। वराह पुराण में इस व्रत के बारे में कुछ उदारवादी बातें भी बताई गई हैं।

*शास्त्रों व पुराणों* में इन चार माहों के लिए कुछ विशिष्ट नियम बताए गए हैं। इसमें चार महीनों तक अपनी रुचि व अभीष्ठानुसार नित्य व्यवहार की वस्तुएं त्यागना पड़ती हैं। कई लोग खाने में अपने सबसे प्रिय व्यंजन का इन माहों में त्याग कर देते हैं। चूंकि यह विष्णु व्रत है, इसलिए चार माहों तक सोते-जागते, उठते-बैठते 'ॐ नमो नारायणाय' के जप की अनुशंसा की गई है।

इन चार माहों के दौरान *शादी-विवाह, उपनयन संस्कार व अन्य मंगल कार्य वर्जित* बताए गए हैं। चार मास की अवधि के पश्चात देवोत्थान एकादशी को भगवान जागते हैं।

पौराणिक महत्त्व
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पुराणों के अनुसार बलि नाम के राजा ने तीनो लोकों पर अधिकार कर लिया था। इसलिए इंद्र घबरा कर विष्णु जी के पास गए और उनसे सहायता मांगी। देवराज इंद्र के विनती करने पर व‌िष्‍णु ने वामन अवतार ल‌िया और राजा बल‌ि से दान मांगने पहुंच गए। उन्होंने बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी। बलि ने उन्हें तीन पग भूमि दान में देने के लिए हाँ कर दी। परन्तु भगवान वामन ने विशाल रूप धारण कर के दो पग में धरती और आकाश नाप ल‌िया और तीसरा पग कहां रखे जब यह पूछा तो बल‌ि ने कहा क‌ि उनके स‌िर पर रख दें। इस तरह विष्णु जी ने बलि का अभिमान तोड़ा तथा तीनो लोकों को बलि से मुक्त करवा दिया।

राजा बलि की दानशीलता और भक्त‌ि भाव देखकर भगवान ‌व‌िष्‍णु बहुत प्रसन्न हुए तथा उन्होंने बल‌ि से वर मांगने के ल‌िए कहा। बलि ने वरदान मांगते हुए विष्णु जी से कहा कि आप मेरे साथ पाताल चलें और हमेशा वहीं न‌िवास करें। भगवान विष्णु ने बलि को उसकी इच्छा के अनुसार वरदान दिया तथा उसके साथ पातल चले गए। यह देखकर सभी देवी देवता और देवी लक्ष्मी चिंतित हो उठे।

देवी लक्ष्मी भगवान व‌िष्‍णु को पाताल लोक से वापिस लाना चाहती थी। इसलिए उन्होंने एक चाल चली। देवी लक्ष्मी ने एक गरीब स्त्री का रूप धारण किया तथा राजा बलि के पास पहुँच गयी। राजा बलि के पास पहुँचने के बाद उन्होंने राजा बलि को राखी बाँध कर अपना भाई बना लिया और बदले में भगवान व‌‌िष्‍णु को पाताल से मुक्त करने का वचन मांग ल‌िया।

भगवान विष्णु अपने भक्त को निराश नही करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने बलि को वरदान दिया कि वह हर साल आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्त‌िक शुक्ल एकादशी तक पाताल लोक में न‌िवास करेंगे।

यही कारण है कि इन चार महीनो में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं और उनका वापन रूप में भगवान का अंश पाताल लोक में होता है।

देवशयनी एकादशी व्रत विधि
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देवशयनी एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठें। पहले घर की साफ-सफाई करें, उसके बाद स्नान आदि कर शुद्ध हो जाएं। घर के पूजन स्थल अथवा किसी भी पवित्र स्थान पर भगवान विष्णु की सोने, चांदी, तांबे अथवा पीतल की मूर्ति स्थापित करें। इसके उसका षोडशोपचार (16 सामग्रियों से) पूजन करें। भगवान विष्णु को पीतांबर (पीला कपड़ा) अर्पित करें। व्रत की कथा सुनें। आरती कर प्रसाद वितरण करें। ब्राह्मणों को भोजन कराएं तथा दक्षिणा देकर विदा करें। अंत में सफेद चादर से ढंके गद्दे-तकिए वाले पलंग पर श्रीविष्णु को शयन कराएं तथा स्वयं धरती पर सोएं। धर्म शास्त्रों के अनुसार, यदि व्रती (व्रत रखने वाला) चातुर्मास नियमों का पूर्ण रूप से पालन करे तो उसे देवशयनी एकादशी व्रत का संपूर्ण फल मिलता है।

देवशयनी एकादशी व्रत कथा
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एक बार देवर्षि नारद ने ब्रह्माजी से देवशयनी एकादशी का महत्व जानना चाहा। तब ब्रह्माजी ने उन्हें बताया कि सतयुग में मांधाता नामक एक चक्रवर्ती राजा थे। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी। एक बार उनके राज्य में भयंकर अकाल पड़ा। इस अकाल से चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। प्रजा ने राजा के पास जाकर अपनी व्यथा सुनाई। राजा मांधाता यह देखकर बहुत दु:खी हुए। इस समस्या का निदान जानने के उद्देश्य से राजा सेना को लेकर जंगल की ओर चल दिए।

वहां वे एक दिन ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंचे। अंगिरा ऋषि ने उनके जंगल में घूमने का कारण पूछा तो राजा ने अपनी समस्या बताई। तब महर्षि अंगिरा ने कहा कि सब युगों से उत्तम यह सतयुग है। इसमें छोटे से पाप का भी बड़ा भयंकर दंड मिलता है। ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी अन्य जाति को तप करने का अधिकार नहीं है, जबकि आपके राज्य में एक अन्य जाति का व्यक्ति तप कर रहा है। इसीलिए आपके राज्य में वर्षा नहीं हो रही है। जब तक उसका अंत नहीं होगा, तब तक यह अकाल समाप्त नहीं होगा।

किंतु राजा का हृदय एक निरपराध तपस्वी को मारने को तैयार नहीं हुआ। तब महर्षि अंगिरा ने राजा को आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने के लिए कहा। राजा के साथ ही सभी नागरिकों ने भी देवशयनी एकादशी का व्रत विधिपूर्वक किया। व्रत के प्रभाव से उनके राज्य में मूसलाधार वर्षा हुई और पूरा राज्य धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया।

भगवान जगदीश जी की आरती
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ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश…

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश…

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश…

तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतरयामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥ ॐ जय जगदीश…

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश…

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश…

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम रक्षक मेरे।
करुणा हाथ बढ़ाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश…

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश…
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ऐस्ट्रो पं. अरविन्द पाठक गुरूजी
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18/12/2020

यदिआपका जन्म ' धनु लग्न में हुआ है तो
आपका कद लम्बा है , कान भी बड़े हैं , छाती चौड़ी है , शरीर सदैव स्वस्थ रहने वाला है । आपके लग्न का स्वामी गुरु ग्रह होने से आप सभी तरह की प्रतिभा के धनी बन सकते हैं । आप मेधावी व परोपकारी भी हैं , तो निःस्वार्थ कर्मयोगी भी । आप सदैव भविष्य के प्रति जागरूक रहेंगे तथा खुद के भाग्य निर्माता भी स्वयं होंगे । आप अनेक विद्याओं एवं कलाओं में दक्ष रहेंगे । बाह्य प्रदर्शन में आपकी अभिरुचि नहीं के बराबर रहेगी । कानून , विज्ञान , गुप्त विद्याओं ,साहित्य में आपकी रुचि रहेगी । आप ग्रन्थों के प्रणेता भी बन सकते हैं तो प्रकाशक भी । आप दयालु , सच्चरित्रवान , कर्तव्यनिष्ठ , धर्मनिष्ठ , नियमनिष्ठ , बैंकर , वकील , प्रोफेसर , संन्यासी , सलाहकार , धर्म उपदेशक , स्पष्टवक्ता हैं । आप अपने कुल के दीपक हैं और माता - पिता की कीर्ति व सम्पत्ति दोनों ही बढ़ायेंगे । ब्राह्मणों व साधु - संतों की सेवा भी पर्याप्त करेंगे तथा तीर्थ गमन व विदेश गमन भी करेंगे । विदेशियों से भी आपके प्रेम व मैत्री के सम्बन्ध बनेंगे । परिवार के सदस्यों से आपकी कम ही बिगड़ेगी ।

आप धार्मिक अनुष्ठान करने वाले भी बन सकते हैं तो मंदिर या मठ के महन्त भी बन सकते हैं । आपकी पत्नी भी धनाढ्य व विनम्र स्वभाव की सच्चरित्रा होगी किन्तु संतान कठिनता या विलम्ब से प्राप्त होगी । यदि आपका लग्नेश गुरु अच्छा या उच्चरात्रि में जन्म - काल में होगा तो आपको भूमि - भवन , वाहन व कृषि का सुख रहेगा किन्तु यदि गुरु ग्रह गड़बड़ हुआ या नीच हुआ या उसकी युति किसी पाप ग्रह से हुई या उस पर पाप ग्रह की दृष्टि से वह पीड़ित हुआ तो फिर आप कायर व दम्भी , कठोर हृदयवान व क्रोधी भी बन सकते हैं ।
आपको दुर्घटना से , फेफड़ों के रोगों से तथा वायु विकार से कष्ट रहेगा । जीवन के 8 , 12 , 15 , 20 , 38 , 40 , 42 , 53 व 62 वें वर्ष कष्टप्रद हैं । आपके हृदय पर कोई चिह्न भी है । आपकी मृत्यु जल से , जल के जीव से , भीषण गर्मी से , भीषण आघात से , दुश्मन के प्रहार से सम्भव है । आपकी आयु लगभग 81 वर्ष है । आपको भाइयों से लाभ नहीं होगा । आपका एक पुत्र व भाई भी आपका शत्रु होगा । आपकी संतानें स्वतंत्र विचारों एवं आधुनिक फैशन वाली होंगी । आपका मकान भी अनोखा बनेगा । राजनीति में भी आप सफलता प्राप्त कर सकते हैं । पुलिस , सेना व प्रशासन की सेवा में भी आप उन्नति करने में क्षमतावान हैं । आपकी मैत्री मेष , मिथुन व सिंह राशि व लग्न वालों से अच्छी रहेगी । रवि , बुध व गुरुवार के दिन भाग्यवर्धक एवं सोम व शनिवार के दिन चिन्तनीय रहेंगे ।
भाग्योदय हेतु 15 , 16 , 18 , 21 , 22 , 32 , 33 , 36 , 42 , 45 , 54 , 60 व 63 वें वर्ष अच्छे रहेंगे | कष्टकाल में " " मंत्र से आपको सुख - शान्ति प्राप्त होगी । भाग्यवृद्धि हेतु मंत्र के जप श्रेयस्कर रहेगा । पीला पुखराज आजीवन धारण करे तथा मगल की महादशा में भूगा रत्न धारण करना उचित रहेमा ।

इस लम्न में जन्मी महिनाए भी बुद्धिमती , किन्तु पुरुष समान आकार की होती है । वे सती ,साध्वी होती है , किन्तु गुरु ग्रह यदि गड़बड़ हो तो व्यवहार कठोर , निष्ठुर एवं विनम्रता रहित होती है । सफेट , हरा , नीला रंग ही शुभ रहता है । क्षय रोनिशों आपको खतरा है , अतः उनसे दूर रहें ।

09/12/2020

देशे, ग्रामे, गृहे, युद्धे,
सेवायां, व्यवहारके।
नाम राशे : प्रधानत्वं
जन्म राशिं न चिन्तयेत।।

विवाहे, सर्वमांगल्ये,
यात्रायां, ग्रह-गोचरे।
जन्म राशे : प्रधानत्वं
नाम राशिं न चिन्तयेत।।

अर्थ

*देश में, गांव में, घर में, युद्ध में और व्यवहार में यानी कार्य क्षेत्र में नाम राशि का चिंतन किया जाना चाहिए, जन्म राशि को प्रधानता नहीं दी जानी चाहिए।*

वहीं, *विवाह, मांगलिक कार्यक्रमों, यात्रा और ग्रहों के गोचर में जन्म राशि का चिंतन किया जाना चाहिए, वहां पर नाम राशि को प्रधानता नहीं दी जानी चाहिए।*

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