09/08/2026
आज विश्व आदिवासी दिवस पर एक आदिवासी महिला का परिचय देने जा रही हूं ।समाज और राष्ट्र के विकास में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण बहुआयामी और अपरिवर्तनीय है । वे परिवार की धुरी , संस्कृति की संरक्षक और देश की प्रगति की आधारशिला है ।
एक महिला बच्चों की प्रारंभिक शिक्षक और मार्गदर्शक होती है , जो भावी पीढ़ी में नैतिक मूल्य और संस्कार डालती है ।
इनका नाम श्रीमती राधा इलेश सस्तिया , ग्राम मथवाड़ , तहसील सोंडवा , जिला अलीराजपुर, मध्य प्रदेश । नर्मदा परिक्रमा मार्ग उत्तर तट शूलपानी ।
राधा का परिचय तो पढ़ लिया आपने ,अब उनके काम के बारे में भी जाने । MSc maths ,Med इतनी पढ़ी-लिखी महिला जो अपने क्षेत्र के लोगों के लिए सहारा बनी है । जिला मातृशक्ति संयोजिका हैं , वृद्ध लोगों को पेंशन दिलवाती है, बच्चों को पढाती है , परिक्रमा वासियों की सेवा करती है , जीवा पब्लिक स्कूल की डायरेक्टर है ।
राधा करोना काल तक एक गृहिणी थी , दो छोटे बच्चों की मां । पति सरकारी नौकरी में है उनका जहां ट्रांसफर होता उनके साथ रहती थी । करोना में जब सभी लोग अपने गांव लौटे तो राधा भी बच्चों के साथ ससुराल मथवाड़गांव में आ गई ,लेकिन औरों की तरह वापस शहर नहीं लौटी बस गांव की होकर रह गई । करोना काल में लंबे समय तक गांव में बच्चों के साथ रहने से उन्हें भी वहां की समस्याओं से दो-चार होना पड़ा । जब उन्होंने देखा कि यहां के बच्चों का सर्वांगीण विकास नहीं हो रहा है , ना हीं यहां की महिलाओं की स्थिति में सुधार है । वे इसी उधेड़बुन में रही कि मैं तो पढ़ी लिखी हूं , मेरे बच्चे भी पढ़ रहे हैं लेकिन इन सभी का क्या जो गांव में रह रहे हैं ।
राधा के माता-पिता भी आदिवासी थे , किसान थे , लेकिन इसके बावजूद भी उन्होंने अपनी बेटी को पढ़ाया लिखाया इसलिए राधा ने संकल्प लिया कि जिनके माता-पिता यह नहीं कर पा रहे हैं , वह उन बच्चों के लिए काम करेगी , उन महिलाओं के लिए काम करेगी जो शिक्षित नहीं है । इन्होंने इस बारे में अपने पति से और सास ससुर से चर्चा की । पति उनके साथ खड़े थे उन्होंने बोला आप जो निर्णय लेगी उसमें मैं आपके साथ हूं । ससुराल वालों ने भी साथ दिया बस फिर क्या था राधा ने अपना निर्णय ले लिया जो बहुत ही कठिन था एक मां के लिए ।
गांव के बच्चों के भविष्य लिए उन्होंने बहुत ही कठोर कदम लिया और अपने दोनों छोटे बच्चों को हॉस्टल में डाल दिया और खुद ने मथवाड गांव में रहने का निर्णय लिया ।
हम सोच कर देखें तो एक महिला के लिए कितना कठिन निर्णय था की दोनों बच्चे दो अलग हॉस्टल में , पति एक अलग स्थान पर नौकरी कर रहे थे और वह खुद पिछड़े इलाके के गांव में घूम-घूम कर काम करने का मन बना रही थी । राधा की हिम्मत को मेरा साधुवाद ।
इसके बाद की कहानी राधा के दृढ़ संकल्प की है । मुश्किलों से भरी डगर थी लेकिन उन्होंने सबको साइड में करके मथवाड में एक स्कूल खोल लिया और आसपास के गांव गांव घूम कर बच्चों को घर से निकालकर स्कूल तक लेकर आई । उनके लिए हर सामान की व्यवस्था की , शिक्षिकाओं की नियुक्ति की , धीरे-धीरे यह स्कूल अब आठवीं कक्षा तक हो गया है । यहां पर पढ़कर अब बच्चे आसपास के बड़े कस्बे तक पढ़ने जाने लगे हैं । आज 80 बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हैं ।
मथवाड उत्तर तट नर्मदा परिक्रमा में आता है । उत्तर तट की शुलपानी करने वाले परिक्रमावासी गांव में रुकते हैं । राधा द्वारा इन परिक्रमा वासियों की सेवा होती है । राधा ने अपने गांव में अपने घर के पास बोरिंग बनवाया । जिसे बनाने के लिए लोगों ने कहा था कि पानी बहुत गहराई में आता है लेकिन राधा ने नर्मदा मैया से प्रार्थना की और बोरिंग में इतनी जल्दी पानी आ गया कि सभी का आश्चर्य का ठिकाना ना रहा ।आज इतना पानी आ रहा है कि पूरा गांव उस पानी का उपयोग कर रहा है ।
स्कूटर चलाने वाली महिला साड़ी पहनकर और सिर ढक कर पूरे शुलपानी में घूमती है । यह आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है , लोग बहुत कम पढ़े लिखे हैं इसलिए लोगों की समस्याएं सुनती है और उसका समाधान निकालने के लिए सरकारी दफ्तरों में चक्कर मारती है ।
नर्मदा मैया आपसे प्रार्थना है राधा का मार्ग प्रशस्त करना। उस पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखना । उसके उन सपनों को साकार करना जिसके लिए उसने बहुत बड़ा त्याग किया है । आप सभी भी राधा को आशीर्वाद देना ।
आप सभी के स्वस्थ जीवन की मंगल कामनाओं के साथ सीमा वीरेंद्र का नर्मदे हर