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You'll grow beautifully in your own way!
11/04/2024

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नवरात्र में उपासना के चरम की संसिद्धि के लिए अंतःकरण की शुचिता और पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। माँ ब्रह्मचारिणी अपने भ...
10/04/2024

नवरात्र में उपासना के चरम की संसिद्धि के लिए अंतःकरण की शुचिता और पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। माँ ब्रह्मचारिणी अपने भक्तों के मन की मलिनता, दुर्गणों व समस्त दोषों को विनष्ट करने वाली हैं। साधक हृदय में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार , संयम की संस्थापना और लक्ष्य प्राप्ति के लिए एकनिष्ठ स्थिरता माँ ब्रह्मचारिणी की आराधना की फलश्रुति है।

सर्वविध आह्लादकारी बसंत ऋतु के साथ प्रकृति में सर्वत्र नावीन्यता एवं उल्लास को अभिव्यक्त करती हुई सृष्टि निर्माण की आद्य...
09/04/2024

सर्वविध आह्लादकारी बसंत ऋतु के साथ प्रकृति में सर्वत्र नावीन्यता एवं उल्लास को अभिव्यक्त करती हुई सृष्टि निर्माण की आद्य बेला वैदिक हिन्दू नववर्ष नूतन संवत्सर की हार्दिक शुभकामनाएँ ।
नव संवत्सरोयं शुभं भवतु !! 🎉👏
#गुड़ीपड़वा

"सर्वस्व मे राष्ट्रकम् " की अभिप्रेरणा से राष्ट्र के भू भाग को अपना परम आराध्य मानकर भारत की स्वतंत्रता का जयघोष अर्थात ...
08/04/2024

"सर्वस्व मे राष्ट्रकम् " की अभिप्रेरणा से राष्ट्र के भू भाग को अपना परम आराध्य मानकर भारत की स्वतंत्रता का जयघोष अर्थात "वन्दे मातरम्" जैसे श्रेष्ठ गीत का सृजन करने वाले हिन्दी, बांग्ला और संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान स्वर्गीय बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय जी की पुण्यतिथि पर सादर श्रद्धांजलि 🎉👏।

The International Day of Sport for Development and Peace is an annual celebration of the power of sport to drive social ...
06/04/2024

The International Day of Sport for Development and Peace is an annual celebration of the power of sport to drive social change community development and to foster peace and understanding.

इस कठिन कलिकाल में भगवन्नाम का आश्रय सर्वथा श्रेयस्कर है। भगवान प्रायः श्रद्धा, भक्ति, समर्पण और विश्वास के अधीन हैं। सम...
05/04/2024

इस कठिन कलिकाल में भगवन्नाम का आश्रय सर्वथा श्रेयस्कर है। भगवान प्रायः श्रद्धा, भक्ति, समर्पण और विश्वास के अधीन हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में उनकी सत्ता त्रिकालाबाधित है। सब प्रकार के पापों का शमन कर भोग मोक्ष एवं सर्वविध अभ्युदय प्रदान करने वाली पापमोचिनी एकादशी की हार्दिक शुभेच्छा।

संबंधों का धन सबसे बड़ा धन है , किन्तु आज के समय में अधिक भागदौड़ एवं अपनों से अत्याधिक अपेक्षाओं के कारण संबंधों में पा...
05/04/2024

संबंधों का धन सबसे बड़ा धन है , किन्तु आज के समय में अधिक भागदौड़ एवं अपनों से अत्याधिक अपेक्षाओं के कारण संबंधों में पारस्परिक दूरी आ रही है। किसी संबंध का दीर्घकाल तक निर्वहन करने के लिए अपेक्षाओं को कम कीजिए । हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि संबंधियों की शक्ति सामर्थ्य और युक्तियाँ सीमित हैं, और हम उनसे अविलंब एवं असीम पाना चाहते हैं । अधिक आशा और अपेक्षाएं तनाव का कारण बन रही हैं।
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प्रकृति हमारा मातृवत पोषण कर रही है। हमें जीवन में जो कुछ भी प्राप्त है वह प्रकृति द्वारा प्रदत्त है। अतः प्रकृति संरक्ष...
04/04/2024

प्रकृति हमारा मातृवत पोषण कर रही है। हमें जीवन में जो कुछ भी प्राप्त है वह प्रकृति द्वारा प्रदत्त है। अतः प्रकृति संरक्षण,धरा को हरितिमा संपन्न बनाना तथा जल जमीन जंगल एवं अन्यान्य प्राकृतिक अवयवों को सहेज कर रखना हमारा सबका पहला उत्तरदायित्व है।
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परमात्मा ने हमारे प्रति बड़ी उदारता दिखाई है। प्रकृति परमात्मा की भांति नित्य प्रति हमारी सेवा सुश्रुषा में संलग्न है, इ...
03/04/2024

परमात्मा ने हमारे प्रति बड़ी उदारता दिखाई है। प्रकृति परमात्मा की भांति नित्य प्रति हमारी सेवा सुश्रुषा में संलग्न है, इसका आशय यह है कि हमें अपने अधीनस्थों एवं प्रकृति के अन्यान्य जंतु और वनस्पतियों के प्रति संवेदनशील रहकर उनके सम्मान, स्वाभिमान, निजता और हितों की रक्षा करनी चाहिए। परमात्मा द्वारा निर्मित यह संपूर्ण सृष्टि और उसके प्रत्येक घटक का आदर ही भारतीय संस्कृति की विशेषता एवं परमात्मा की अभ्यर्थना है।
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यह संसार नश्वर और नित्य परिवर्तनशील है। यहाँ  कुछ भी स्थायी नही है। इस मरणधर्मा संसार की भांति यहाँ  के वस्तु पदार्थ भी ...
02/04/2024

यह संसार नश्वर और नित्य परिवर्तनशील है। यहाँ कुछ भी स्थायी नही है। इस मरणधर्मा संसार की भांति यहाँ के वस्तु पदार्थ भी नाशवान है। इंद्रियाँ और मन जिन विषयों में आसक्त हैं, वे सभी विषय और उनके रस एक जैसे नहीं है। सभी विषय मिटते रहते हैं, बदलते रहते हैं और दृश्य खोते रहते हैं। अतः हमारे सम्पूर्ण प्रयत्न यथार्थ बोध के लिये हों।
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जैसे सरिताएँ स्वयं चलकर सागर में समाहित होने को आतुर रहती हैं, वैसे ही सत्यनिष्ठ साधक को सभी अनूकूलताएँ स्वतः प्राप्त हो...
01/04/2024

जैसे सरिताएँ स्वयं चलकर सागर में समाहित होने को आतुर रहती हैं, वैसे ही सत्यनिष्ठ साधक को सभी अनूकूलताएँ स्वतः प्राप्त हो जाती हैं। सत्यनिष्ठ रहें, क्योंकि सत्याचरण की फलश्रुति स्वयं सत्य नारायण हैं।
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