Ishwar Ki Aur

Ishwar Ki Aur ईश्वर के सिवाय कहीं भी मन लगाया तो अंत में रोना ही पड़ेगा। Can Also Follow On Telegram And Instagram

21/08/2026

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🌹 *21.08.26* 🌹
💠 *सुबह संध्या सत्संग* 💠
🏵️ *पूज्यश्री के अनमोल वचन* 🏵️

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💥*ब्रह्मज्ञान और जीवन के गूढ़ रहस्यों पर एक अटपटी चर्चा।*🪔

✨️कपट से व्यवहार करते हैं तो बुद्धि में ब्रह्मज्ञान नहीं ठहर सकता। आहे गाल अलबिलड़ी अटपटी बात है। है बात अटपटी झटपट समझ में ना आए। सतगुरु कृपा से समझ आए तो सारी खटपट मिट जाए। हां बेटा। आहे गाल अलबिलड़ी। सियाणा समझ ना की न की थोड़े मजला सकन मिली। स्वामी साहब ने कहा। सिंधी जगत के ब्रह्मवेता संत के कवित्व में उनके उपदेश। आहे गाल अलबिलड़ी अटपटी। स्वामी शुद्ध स्वरूप जी अपना जो शुद्ध स्वरूप। ये शरीर अंतःकरण अपना शुद्ध स्वरूप नहीं है मिथ्या है, मायिक है। आहे गाल अलबिलड़ी स्वामी शुद्ध स्वरूप जी। सियाणा समझ न की न की थोड़े मजला सकन मिली।

✨️बड़े-बड़े चतुर, बड़े-बड़े विद्वान, बड़े-बड़े बाल की खाल चार वेद रट लिए। छह दर्शन, छह शास्त्र, 18 पुराण सारे चाट गए एक दूसरे के साथ। फलाने श्लोक से फलाने ऋचा का नंबर ये फलाना है, फलाना मंडल है। ये फलाना अध्याय है, फलाना श्लोक है और फलाने ऋषि है इसके मंत्र दृष्टा। ऐसा बयान करने वाले लोग भी होंगे। घटी शतक एक घड़ी भर में शतक 100 श्लोक बनाकर नए शास्त्रार्थ करते थे। एक राजा के पास ऐसा विद्वान था कि किसी का भी कैसा भी श्लोक हो। एक बार वो बोले तो सामने वाला वो व्यक्ति विद्वान उसी श्लोक को वैसे का वैसा धड़ाक से बोल देता था। राजा ने घोषणा की कि मेरे पास कोई शास्त्र की बात ऐसी ले आवे जो मेरा विद्वान ना जानता हो तो उसको हां एक ने 100 मोहर मिलेंगे। तो कोई कैसे-कैसे गुप्त शास्त्रों से कुछ ना कुछ ले आवे। तो विद्वान बोले ये तो हम जानते हैं। ये तो हम जानते हैं। तो सारे विद्वानों को सारे लोगों को काम मिल गया खोजने का। इस बहाने पब्लिक का विद्वानों का थोड़ा मनोरंजन भी हो जाता और ज्ञान का भी विस्तार होता था।

✨️तो एक बड़ा सियाणा था। विश्रांति पाने में गुरुजी से पूछा कि गुरुजी ये विद्वान कैसा है? घटी शतक तो हमने देखे घड़ी भर में शतक श्लोक बनाता है। लेकिन सब श्रोतव्य सारा उसने सुन रखा है। सब ज्ञातव्य। धरती में ऐसा भी आदमी होता है सब ज्ञातव्य। सारे शास्त्र जानता है। ऐसे-ऐसे-ऐसे श्लोक लोग ले जाते हैं ऐसे-ऐसे तो गुरु बोलता है हम जानते हैं। बता देता है उनका। गुरुजी ने कहा नहीं उसकी स्मृति शक्ति मेधावी बनने के लिए उसने उपासना किया होगा या तो निर्गुंडी खा के दूध पिया होगा और स्मृति शक्ति बढ़ाने के लिए कुछ उपासना मंत्र क्या होगा गुरु की कृपा से। तो सुनते ही उसको वैसे का वैसा बोल देता होगा। तो बोले गुरुजी बस हो गया काम। मैं इनाम जीत के आऊंगा। हां बोले जा करके आ जरा खेल। गया। तो उसने श्लोक रचा। अपना नया। कि आपका परपितामह और हमारा परपितामह मित्र थे। और 1 लाख सोना मोहर। हमारे परपितामह ने आपके परपितामह को दी थी। राजा साहब का नाम उनका नाम परपितामह का नाम और अपने अपने परदादा का नाम और उसके परदादा का नाम जोड़ के बोला 1 लाख मुद्रा दे दो। उसने बोला ये तो हमने सुना है। ये तो हम जानते हैं। बोले ठीक है हम हार गए आपके राजा साहब लाखों धन्य हो। राजा को राम से बना दिया। बब्लू बना दिया।

✨️एक होटल पे हमने बोर्ड लगा दिया कि आइए खाइए भोगिए लीजिए बिल आपके पोतों से ही लिया जाएगा आपको पैसा देने की कोई चिंता नहीं करना। आदमी गए खाए पिए। बिल पकड़ा दिया बोले ये क्या बात है बिल तो हमारे पोते देंगे। बोले कोई बात नहीं ये आपके दादा खा के गए उनका है। इस बात में कैसा मजा आ गया जल्दी? क्योंकि हम असत में जीते हैं। जय राम जी की। असत शरीर असत मन में जीते तो तुरंत मजा आ गया। सत में वो मजा नहीं आता। हकीकत में असत में जीते तो असत में मजा आया। लेकिन सत्ता सत की थी लेकिन सत्ता को नहीं देखा। असत में जी रहे हैं असत में आ गया मजा बड़ा मजा आया तो बापू प्रसन्न थे विनोद में सत्संग हो गया। यहां हम मार खा जाते हैं। देखा कैसे मार खा लिया आपने। अच्छा लग गया बढ़िया मजा आ गया। आज तो बापू विनोद में थे। अभी ये याद रह जाएगा बाकी वो अपने मैं को हम छोड़ नहीं सकते पर को रख नहीं सकते। ये बात इतनी याद नहीं रहेगी। सत्संग में जो हल्की-फुल्की बात होती है वो याद रह जाती है। क्यों सार समझाने के लिए जो हल्की-फुल्की बात के लिए थोड़ा ताजगी लानी पड़ती है मजबूरी है। हल्की-फुल्के जीवन में जीते हैं इसीलिए हल्की-फुल्की बातें हमको बोलनी पड़ती है नहीं तो कुछ बोलने की जरूरत ही नहीं है।

✨️गुरु मौन व्याख्यानम शिष्यस्य छिन्न संशय। ऊंची बात बोल के चुप मौन। कभी-कभी तो ऊंची बात बोले नहीं केवल मन से ही ऊंची बात का संकल्प डाल देते हैं। लेकिन सब पकड़ नहीं पाते। एंटीना ही नहीं है लोगों के पास आध्यात्मिक ब्रह्मवेताओं को झेलने के एंटीना ही मरे हुए हैं, काट चढ़ गया। कपट से व्यवहार करते हैं तो बुद्धि में ब्रह्मज्ञान नहीं ठहर सकता। छल छिद्र कपट मोहे स्वप्न ना भावा। छल कपट और दूसरे का छिद्र अन्वेषण। ऐसी बुद्धि जिसकी है उसको ब्रह्मज्ञान नहीं हो सकता। उसको अंतरात्मा की शांति नहीं मिल सकती। शराबी है उसकी रुचि भगवान के तरफ नहीं हो सकती। शराब पीने से चार जो महापाप हैं वो ईश्वर प्राप्ति की योग्यता नाश कर देते हैं। शराब महापापों में पांच गिनाए गए। शराब महापापों में गिनाया गया है। भ्रूण हत्या गर्भस्थ शिशु की हत्या ये महापापों में है। ओम ओम नारायण नारायण।

✨️बोले बापूजी भगवान ब्रह्मज्ञान में और भगवान के दर्शन में क्या फर्क है? भगवान का दर्शन अंतःकरण की रसमय प्रेममय भावमय अंतःकरण की वृत्तियों की प्रगाढ़ता से आपका भगवान प्रकट होंगे। और रस आएगा। और तत्वज्ञान ये ब्रह्मज्ञान ये है कि जिससे अंतःकरण आपकी भावना बनाता है रसमय बनता है और जिससे भगवान आते हैं और आप देखते हैं इन दोनों का आधार का ज्ञान तत्वज्ञान है। जैसे जगत की चीजें पाकर थोड़ा रस आ जाता है इससे तो भगवान का दर्शन-दर्शन पाकर रस तो आएगा। लेकिन रस आएगा भगवान आए तो भगवान गए तो रस गया। मन के अनुरूप भगवान ने कर दिया तो रस आ गया। भगवान ने कहा नहीं तुम जरा ये करो। ऐसा उचित नहीं तुम्हारे लिए। तो उचित क्या है ऐसा फिर समझेंगे तब काम होगा। भगवान अपनी तरफ से आग्रह नहीं करते कि यही करो। जहां तुम्हारी रुचि हो कर-कर के थको तब आओ। उचित को समझो। क्या चाहिए क्या चाहिए? आपकी इच्छा के अनुसार इतना तो भजन किया इतना त्याग किया इतना तप किया जिस इच्छा के लिए किया वही चलो पूरा करो। जैसे कोई पेमेंट देते हैं दुकान वाले को तो जो चीज के लिए दिया वही माल उसको अच्छा नहीं लगता। इसलिए अपनी सूझ बढ़े तो भगवान से भगवान को ही पाएं। भगवान से भगवान को ही जाने अपनी ऐसी ऊंची सूझ बने तब ऊंचा ज्ञान की भूख लगती है। नहीं तो कोई काहू में मगन कोई काहू में मगन। गुरुजी बस इतना बदली हो जाए और ऐसी जगह पर रहूं एकांत हो। वो जगह मिल गई। फिर वहां फिर दूसरी इच्छा पैदा हो जाएगी। ऐसी जगह हो गया ऐसा कुछ हुआ ऐसा कुछ हुआ ऐसा हुआ।

*एक भूला दूजा भूला भूला सब संसार।*
*फिर भूला एक गोरखा जिसको गुरु का आधार।*

गुरु के ब्रह्मज्ञान का आधार जिसको है वो सीधा चल निकल जाएगा बाकी तो सब भूलों में ही भटक रहे हैं।

✨️लहरी महाशय बड़े उच्च कोटि के योगी। उनका जीवन चरित्र में आता है कि वो ऑफिस में काम करते थे। उनके बॉस को उनके मुखिया को वो आके अपना नैनीताल रानीखेत में एक चौकी करनी है एक ऑफिस में। लहरी महाशय तुमको वहां जाना है। उनकी बदली वहां हो गई। उस इलाके में पहुंचे देखा कि यार हां कितना ठंडा मीठा पहाड़ी इलाका सुंदर वातावरण। आवाज आई कि लहरी महाशय देखा कि मेरे को यहां कौन पुकारा? तो आवाज की तरफ चलते-चलते-चलते ऊपर दूर तक कहीं पहुंचे। तो एक आदमी एक संत पुरुष हाथ पसारे हुए स्नेह से मैंने ही आवाज दी थी आओ आओ आओ। संध्या हो गई पहुंचते-पहुंचते तो पहाड़ पे चढ़ते अब बाहर बोले देखो कैसा वातावरण ये सुंदर गुफा दिख रही है कैसा है हां ये बड़ा सुंदर है बड़ा वातावरण। तो बोले तुम्हारी गुफा है। मेरे को तो समझ में नहीं आया लहरी महाशय का वचन। फिर उन्होंने बताया कि देखो जाओ तुम उसमें जरा आराम करो चलो मैं दिखाता हूं। कितनी साफ-सुथरी कंबल पड़े हैं एक कोने में कंबल पड़ा था। बोले पहचाना ये कंबल तुम्हारा ही कंबल है। तो लहरी महाशय दंग रह गए कि मेरा कंबल?

✨️तुम पूर्व काल में साधना करते थे। तो तुम्हारे को आगे ऐसा करो वैसा तो वो वृत्ति नीचे आ गई। तो उसी करने-धरने में मरे और फिर कहीं जन्मे और अब अभी बाबूजी नौकर होकर काम कर रहे हो। ये देखो कटोरी हमने साफ-सुथरी रखी है कि हमारे लहरी आएंगे फिर इसमें प्रसाद पाएंगे और ये खप्पर देखो तुम्हारा। मुझे समझ में नहीं आ रहा। बोले अच्छा लो ये थोड़ा तेल पी लो। अब तेल क्या पता कौन सी वनस्पति का कैसा था उन्होंने पिलाया। बोले जाओ लेट जाओ तुम। और थोड़े लेट के क्या-क्या अंदर शुद्धिकरण हुआ। अब फिर पूर्व काल का सारा दिखा कि मैं तो यहां था। कैसे भटका कि ये करूं वैसा मिले ऐसा कौन से इतने साल भटक गए। बोले इतने साल क्या कई युग ऐसे ही तो भटकते हैं पाने की इच्छा में करने की वासना में। पाना है करना है पकड़ना है और छोड़ना है। ये छोड़ना है ये पकड़ना है। नया ठेका लेना है और पुराना झंझट छोड़ना है। पुराने से पैसे वसूल करके उससे काम बंद करना है। लेकिन आयुषा तो अपना खत्म हो रहा है इसमें फिर आखिर तो ये शरीर भी छोड़ना है। क्या पकड़ोगे क्या छोड़ोगे?

*क्या करिए क्या जोड़िए थोड़े जीवन काज।* *छोड़ी-छोड़ी सब जात है देह, गेह, धन, राज।*

✨️जरा ये ठीक कर लूं वो सेट कर लूं वो सेट कर लूं। अपने को देह मानते हैं और देह के नाम को सच्चा मानते हैं। बस उसी में लगते हैं और उसी का नाम रहे कोई ऐसा ना कहे कि ऐसा नहीं किया ऐसी जिम्मेदारी ना निभाई। इसलिए रगड़े जा रहे हैं। तो जिम्मेदारियां दो प्रकार की होती हैं। फिर तो उन्होंने साधन किए और लहरी महाशय बड़े उच्च कोटि के संत साबित हुए। विवेकानंद भी गए थे उनके दर्शन करने। नहीं दूसरे कोई संत गए ऊंचे-ऊंचे। परमहंस जी के साथ उनका संबंध था। उनके गुरु थे क्या ऐसा अगले जन्म के जैसे भी अब लेखकों के लेख के अनुसार लेकिन ये संभव है। कि ये तुम्हारी ऑफिस मैंने यहां करवाई तुम्हारे मुखिया को मैंने प्रेरणा की यहां चौकी हो। और इस बहाने तुम तुम्हारी बदली करने की उनको मैंने प्रेरणा की। तो तुम मिल सको आ सको और अपना यात्रा तुम्हारी चालू रहे। ये तो होता है। ये सामर्थ्य तो होता है सब होता है महापुरुषों में। ये तो हमने अनुभव किए करके देखे हैं। उनका अपने अपने तो ऐसी स्थिति होती है उनके संकल्प में। ये सब खेल हो जाते हैं। लेकिन आखिर क्या ईश्वर में शांत और समता राग द्वेष का उतना ऊंचा। जितना कपट जितनी खुन्नस गहरी उतना आदमी हलकट। खुन्नस ये हलकटपने के निशान है। बैर लेना बदला लेना। ये अंतःकरण हलकट हलकट अंतःकरण की निशानी है। राग द्वेष ये अंतःकरण हलकट। तो हलकट अंतःकरण की हलकटपन निकालने में बहादुरी है। ऐसा नहीं कि हलकट की आदत पूरी हो। मैं इससे बदला लूं और उसको बदला दिला दूं। अच्छा अब खुश हुआ बोले हां खुश हुआ। लेकिन वो बदला लेने का हलकटपन तो बढ़ गया। क्षमा सीखो। खुन्नस मिटाने के लिए क्षमा सीखो।

✨️इसीलिए राजे-महाराजे राजपाट छोड़ के भिक्षा लेने जाते और भिक्षा में अपमान हो जावे तो सह ले। देह का होता है। ऐसा थोड़ी रोटी नहीं है इसलिए भिक्षा मंगवाते थे राजाओं से। जो राग है पुजवाने की आदत है वाहवाही की वो मिटे। द्वेष है बदला लेने की आदत मिटे। उंगली मार बुद्ध के शिष्य हो गए। अब भिक्षा लेने गए तो लोगों ने देखा कि इसने तो मेरे चाचा की उंगली काट के गले में पहनी थी। ये तो मेरे भतीजे का हत्या करने वाला है। ये तो मेरे फलाने का है तो लोगों ने मिलकर उनको तो पत्थर-वत्थर मारे। भिक्षा क्या दे? साधु बन गए तो सिर फोड़ दिया। कुछ बोला नहीं बुद्ध ने कहा कि करुणा सब का भला गुरु की बात मान के भिक्षा के बदले में सिर फुड़वा के आ गए। बड़ा शांत। बुद्ध ने पूछा, "क्या हुआ?" बोले, "वो सब जो मेरे प्रति उंगली माल डाकू था ना कईयों की उंगलियां काट के माला बना के घूमता था फिरता था।" तो वो सारे भिक्षा लेने गया तो सारे अपना वैर निकालने के लिए उन पर पत्थर मारा करते थे, लग गए। तो शांत। बुद्ध ने देखा खुन्नस नहीं है वैर लेने का। बोले, "तूने तो कई जन्मों का काम अभी निपटा लिया।" वाह! बोले, "बनते आपकी कृपा है।" मेरी तो कृपा तो कईयों पे है। तुमने पहचान ली। अब खुन्नस वाले पहचान ले तो काम हो जाए। वैर निकालें, आलस से निकालें अपने हर की आदत आप ही निकालेगा तभी।

✨️जैसे जो देखने के शौकीन है तो देखने देखने का मजा लेते तो दूसरे जन्म में पतंगिया बनो। दिया देख-देख के फिर जा के जल मरो। मांस खाने की आदत है तो दूसरे जन्म में फिर मछली बनो। स्वाद लेते-लेते फिर मरो। मछली उसके अनुरूप और भी शरीर कई हैं प्रकृति के पास। संभोग करने की आदत है तो और वो वासना खूब है तो दूसरे जन्म में फिर बकरा बनो। दिन में 40 बकरियों के साथ संभोग करो। और फिर कसाई के यहां कटो। या तो बूढ़े हो के बकरियों के पीछे पड़ते रहो। करते रहो। या तो फिर सूअर बनो। मांस खाने की आदत है तो गिद्ध बनो। या तो हिंसक प्राणी बनो। जैसी आपकी आदत तीव्र होती है उसी आदत को पूर्ति के लिए प्रकृति आपको शरीर देगी। अगर परमात्मा को पाने की इच्छा तीव्र है और अपने मैं को जानने की आदत है तो फिर तू ऐसा वातावरण मिलेगा कि अपने असली मैं को जान ले तो फिर कोई मजदूरी करनी ना पड़े।

✨️*जिसको आप छोड़ नहीं सकते वो है परमात्मा। जिसको रख नहीं सकते वो है माया। इतना आसान है। छोड़ नहीं सकते। जिसको छोड़ नहीं सकते उसको जान लो और जिसको रख नहीं सकते उसको भी जान लो। तभी भी आपको भगवान मिल जाएगा।* तो फिर वो कह रहे हैं, "उनको जान ले फिर भगवान के भजन की जरूरत क्या है?" अरे ये जान लिया तभी ये भगवान है तो सजातीय चिंतन मदद करता है। आप डॉक्टर बन जाओ लेकिन डॉक्टर का संपर्क तो करना पड़ेगा ऐसे ही डॉक्टर बन जाएगा क्या? वकील बन जाओ, ये तो बन गए पढ़ लिख के फिर भी पुराने वकील का संपर्क तो करना ही पड़ता है। ऐसे भगवान अपने स्वभाव में जगे हैं ब्रह्म ज्ञानी। आत्म रामी संत भी भगवत स्वरूप है। भगवान नारायण भी भगवान है। भगवान शिव भी भगवान है। जिसने अपना भगवत पना नहीं भूले वो भगवान है। *जिसको छोड़ नहीं सकते वो है परमात्मा और जिसको रख नहीं सकते वो है शरीर। अब शरीर को कितना भी रखो बाबा। शरीर के नातों को कितना भी संभालो। क्या हो जाए? कुछ मिट जाए, हट जाए, खप जाए तो डरो नहीं कि ये तो ऐसे ही है। कोई मिल जाए तो उसमें फूल होने की अपना ये बढ़ गया। नौकरी चल गई तो उसके लिए रोओ नहीं। प्रमोशन हो गया तो उसके लिए टट्टू बनो नहीं। आखिर क्या?*

✨️अपने को तो मैंने जाना नहीं है। मिला और बिछड़ा, मिला बिछड़ा। जिसको मिला और बिछड़ा वो भी तो मरेगा। इतना ही पक्का करो तभी भी ब्रह्म ज्ञान की सीढ़ी तक तो पहुंच जाओगे। फिर चढ़ाना तो गुरु बोलेगा आ जाओ आ जाओ एक कदम कदम चढ़ते जाओ। इन बातों को जरा मजबूती से पकड़ो। बोले वो जो बात है वो कैसे याद रहेगी जल्दी?
ऐसी मजाक की विनोद की बातें। हल्की बातें जल्दी याद आ जाती है। जल्दी मजा आ जाता है हल्का-फुल्का। सस्ती प्रसिद्धि। आजकल सब नेता भी सस्ती प्रसिद्धि सस्ता। सेवा का थोड़ा ढोंग कर के वोट-वोट ले के फिर टैक्सों पे टैक्स बढ़ा दिए। पहले तक क्या था?

✨️कि सोसाइटी में मेंबर हुए मकान में। अब तो मेंबर बनने के बाद भी मकान का रजिस्ट्री खर्च और बढ़ा दिया। इतना शोषित हो रहा है समाज। टैक्स पे टैक्स बढ़ते जा रहे हैं। पब्लिक बिचारी निचोई जा रही है। दाम पे दाम बढ़ते जा रहे हैं। बस वासना बढ़ गई, आवश्यकता बढ़ गई शासकों की। अधर्म कर्म भगवान का डर नहीं है। कुछ ले नहीं जाएंगे ऐसा ज्ञान नहीं है। लो इधर भी जमा करो परदेश में भी जमा करो। तो ये नीच मति, नीच प्रवृत्ति से नीच मति होती है और नीच मति से नीच प्रवृत्ति होती है। मति नीच होने से प्रवृत्ति नीच होती है। प्रवृत्ति नीच से मति और नीच है। फिर उनको वो फिर वो पैसे रख-रख के प्रेत हो के भटकते रहते हैं। इटली का मुसोलिनी कितने अरबों खरबों रुपए इकट्ठा किया। अंत में अभी अभी तक प्रेत हो के भटकता है। 1942 में मरा। अभी तक वो प्रेत हो के भटक रहा है। 60 साल हो गए। कम्युनिस्टों ने दावा बोल दिया था। हार गया था फिर अपनी जान बचाने के लिए छुप गया। मौका पा के अपनी प्रेयसी के साथ इटली से स्विट्जरलैंड जा रहा था। रास्ते में सिपाहियों ने जान लिया यही है। धांय धांय। लाश फिर इटली वापस लाए। और उसको जूतों के हार बार पहना के दफनाया जो भी है। तो जो संपत्ति थी तो पूरी ट्रक भरी थी। विदेशी करेंसी डॉलर आदि। हीरे जवाहरात कीमती। पूरी ट्रक भरी थी बंद बॉडी। बड़ी गाड़ी होती है विदेशों में। 1942 की घटना है। आए तो वो संपत्ति कहां गई? गाड़ी का चालक उसकी लाश पड़ी है। तो कौन ले गए?

✨️तो जिन्होंने दो जवानों ने जिन्होंने दो-चार राउंड छोड़े वो ले गए। तो बोले वो भी पागल हो के मर गए सिर फोड़ के। संपदा गायब। जांच कमीशन रखी। जांच कमीशन के वरिष्ठ ऑफिसर भी कोई बाथरूम में जा कर मर गया तो कोई पागल हो गया। कोई बदली का भाग गया वो। ऐसे करते-करते 72 आदमियों की हत्या हो गई। वो माल खोजते हुए। हां एक सोर्स मिला कि मुसोलिनी का रात्रि के समय एक मुसोलिनी जाता हुआ मिला। ये मुसोलिनी है। मुसोलिनी ने कहा, "मैं तो मर गया हूं लेकिन मेरी डिजायर मेरी इच्छा नहीं मरी।" तो फिर पता चला कि ये तो मुसोलिनी प्रेत हो के अपनी संपदा संभाल रहा है। कहां छुपा के रखा है?झील के किनारे। खोजने वालों को मार डाला। अब वो संपदा आखिर कब तक रखेगा?

✨️तो जो बाहर की संपदा में आसक्ति करते हो जीते जी तो शोषण करते हो मरने के बाद भी हानि करते हैं और अपना भी तो शोषण ही तो हो रहा है उनका। सुखी थोड़ी होते हैं प्रेत तो भटकते रहते हैं बेचारे। ऐसे मैंने सुना है अखबारों के द्वारा कि कभी-कभी मानवतावादी अमेरिका के राष्ट्रपति हैं अपने राष्ट्र भवन में लिंकन मिस्टर लिंकन कभी-कभी किसी दूसरे राष्ट्रपति को देखते हैं। तो शासन करने की वासना है। उनको गोली लग गई थी थिएटर में। तो प्रेत हो के बिचारे अब अपने राष्ट्रपति भवन में कभी-कभी दिखे हैं। ऐसे 1962 में चीन का वार हुआ था। तो अपनी बटालियन और रास्ता कहीं चौकी भूल गई थी, भटक गई थी। तो कैप्टन आया बोले, "चलो मैं दिखाता हूं।" तो आगे-आगे चला। अब्राहम लिंकन की बात में राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन मानवतावादी थे। लेकिन सराहनीय काम तो किए बेचारे ने लेकिन अपने मैं को तो नहीं जाना ना आत्मा को। तो जगत की सत्यता बनी रही।

✨️अब ये करना है वो करना है करना बाकी रह गया। तो प्रेत शरीर में भी अब भटकते हुए भी किसी को प्रेरणा करते होंगे कैसा करें। तो बटालियन जो थी भटक गई। उनको जाना था अपने हिंदुस्तान की चौकी पे। तो कैप्टन आया बोले, "चलो मैं ले जाता हूं।" तो बड़ा तेज से उसका जाना हुआ रास्ता था। तो देखा तो उसके पीछे गोली लगी हुई है और एक हॉल है। हॉल पड़ गया गोली। ये आदमी चल कैसे रहा है? तो वो बताया गया है, "बस यहां से चले।" बोले, "साहब आपको।" हां बोले, चार दिन पहले लड़ाई में हो गया था। इतना पीछे पीठ खाली हो गई। लड़ाई में चार दिन पहले लग गई गोली तो अभी तो बोले, "जाओ तुमको रास्ता दिखा दे।" फिर पता चला तो गायब हो गया था। अरे गोली लगी है तो जैसे गोली लगी शरीर की स्थिति हुई और तड़प के मरा तो वही शरीर की आकृति बनेगी। तो वो वास्तव में उसको जिसको गोली लगी वो स्थूल शरीर नहीं था लेकिन सूक्ष्म शरीर तो सारे शरीर में फैला हुआ था ना। तो सूक्ष्म शरीर में जैसे भी जो प्रेत होते तो जिस ढंग से मरते समय जैसी आदा में मरते हैं तो जो प्रेत आते तो उस आदमी में भी इसी प्रकार की आदा होती है मरते समय की। छटपटा के कांपते हुए ये वो कुछ दुखद ढूंढते। फिर उसको बातों में लाओ प्रेतों को तो तब हंसते हैं ये वो करते हैं। लेकिन पहले जब आते हैं और जाते हैं तो जिस भाव से जिस संस्कार से मन निकला शरीर से वो मन शरीर रहता है बाद में प्रेत में। तो मन को ये पता चलना चाहिए कि ये शरीर नहीं होने के बाद भी सूक्ष्म शरीर भी तुम नहीं हो। कारण शरीर भी तुम नहीं हो। ऐसा नहीं कि मैं मर गया हूं मेरा शब्द दिख रहा है तो वो सूक्ष्म शरीर से शब्द को देखेगा। फिर उसमें घुसेगा वो नहीं मिला तो दूसरे में घुसेगा दूसरा जन्म लेगा। तो तू वो नहीं है सूक्ष्म शरीर भी। जिससे तू देखता है।

✨️जैसे ये आंखें देखती है। तो आंखें देखती कि नहीं देखती उसको मन देख रहा है। मन ठीक देखता है कि नहीं देखता उसको बुद्धि देख रही है। तो यहां तक तो सूक्ष्म शरीर। अब बुद्धि ठीक देखती कि नहीं देख रही। तो ये जीवात्मा देखता है। लेकिन मेरा जीव चैन में है, बेचैन है, सुखी है, दुखी है उसको कौन देख रहा है? अब मैं। तो ये मैं मैं हूं जहां से बोला जाता है वही मैं हूं। मैं हूं बोलने के साधन स्थूल साधन, सूक्ष्म साधन, कारण साधन। इनके सिवाय का जो मैं है तो अति सूक्ष्म है ना। इसीलिए जरा समय लगता है। जरा बुद्धि ऊंची चाहिए।

📍इसीलिए धर्म करो ताकि वासना नियंत्रित हो।

📍उपासना करो ताकि चित्त वृत्ति एकाग्र हो मन।

📍और तत्व ज्ञान सुनो ताकि असली मैं का पता चले। आपको गुरु का संकल्प सहायता करे।

✨️इसीलिए कहते हैं, "गुरु कृपा ही केवलम शिष्यस्य परम मंगलम।" रिद्धि सिद्धि तो आप अपने तप से, योग से, सामर्थ्य से कर लो। उसमें भी गुरु चाहिए नहीं तो रिद्धि सिद्धि के चक्कर में लोग पागल हो जाते हैं। जैसे प्राणायाम से सामर्थ्य आता है तो ठोकं-ठोक प्राणायाम किया तो खुश्की चढ़ जाएगी। एकाग्रता से दे एकाग्रता हुई तो झोंके आ रहे हैं कई सदियां गुमित जाएगी। तो यहां योग योग करना है तो योग के गुरु चाहिए। उसकी भी तो कृपा चाहिए। अच्छा जो रुपए पैसे दे के योगा कराते हैं वो योगा आसन आसन करा के श्वासों-श्वास दिला के थोड़ा आपको संकल्प विकल्प थोड़े कम हो जाए तो आपको रिलीफ मिलता है बस आप अब योगा करते हैं। आप कोई योगी नहीं हो गए हैं। ना कर्म योगी है ना ज्ञान योगी है ना भक्ति योगी है। *ईश्वर प्राप्ति अलग बात है। थोड़ी बहुत योग की कसरत करना करवाना अलग बात है। ईश्वरीय ज्ञान पाना अलग बात है। स्वास्थ्य पाना अलग बात है।*

🙏🙏🕉️

21/08/2026

To,

धीरेंद्र शास्त्री .....

*🔅सच्चा संत कौन है ? यह पूछना है तो अपने गुरु से पूछ। जो बापू जी के प्रति सद्भाव रखते हैं।*
*🔅और तुझे पूछना है सच्चा संत कौन है ? तो जिनको तू अपना बड़ा भाई मानता है, उनसे पूछ तेरा भाई बापू जी को भगवान मानते हैं, उनसे पूछ कि सच्चा संत कौन है?*
*🔅जहां तू माथा टेकता है स्वामी प्रेमानंद जी, उनसे पूछ कि सच्चा संत कौन है? तुझे बताएंगे कि सच्चा संत कौन है।*

*🔅एक तरफ बोलता है कि भारत जोड़ो यात्रा करो, हिंदुओं को जोड़ो। और दूसरी तरफ तू लोगों के स्वाभिमान के साथ विश्वासघात करता है, धोखा करता है।*
*तुझे अकल होनी चाहिए कि सच्चा संत कौन है?*

*🔅अपनी जादूगरी जितने दिन दिखा दी, दिखा दी। पाखंड जितने दिन ढका रहे, उतना ही अच्छा है*
*🔅पाखंडी तू बताएगा सच्चा संत कौन है ?*

*🔅पूरे संत समाज से पूछ कि सच्चा संत कौन है ? सभी कथाकारों से पूछ जो रात दिन बापूजी की महिमा गाते है पूछ उनसे सच्चा संत कौन है ?*

*🔅तेरे अंदर भी अज्ञान का बड़ा प्रेत घुसा हुआ है, उसको निकाल, दूसरों के निकालने की सेवा करता है तो अपना अज्ञान का भूत निकाल, 🔅महान ब्रह्मज्ञानी संत के केस की जानकारी लें और अंधा मत बन, मीडिया टीवी चैनल देख देख कर।*

*🔅सच्चा संत की डिग्री अब तू समाज को देगा क्या ? अपने कर्म काट , तू तो चल पड़ा उल्टे रास्ते अपने गलत कर्म बढ़ा रहा जो ब्रह्मज्ञानी संत को गलत बोल रहा है !!*

*🔅समय बताइएगा सच्चा संत कौन है ? इस प्रश्न का जवाब तुझे अवश्य मिलेगा और फिर तू माफी भी मांगेगा बोलेगा मीडिया के कारण हमसे भूल हो गई बापूजी , हमें माफ कीजिए कहेगा । लिख ले मेरी बात को तू ।*

*🔅जब तक तू संत आशारामजी बापूजी केस की जानकारी नहीं लेगा तब तक तो तू धीरेंद्र शास्त्री नहीं धृतराष्ट्र शास्त्री ही है । ✊🏻*

*✊🏻 ब्रह्मज्ञानी महान संत श्री आशारामजी बापूजी की महाजय जयकार हो ✊🏻✊🏻✊🏻✊🏻*

21/08/2026

नीले कबूतरों को सही समझाया

20/08/2026

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🌹 *20.08.26* 🌹
💠 *सुबह संध्या सत्संग* 💠
🏵️ *पूज्यश्री के अनमोल वचन* 🏵️

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💥*सुख की लालच और दुख के भय से मुक्ति का आध्यात्मिक संदेश।*🥀

✨️विषय भोग में रस आता है। इसीलिए आदमी विषय भोग के पीछे पड़ता है। हर इंसान को रस की जरूरत है। बिना रस के कोई जीव ठहर नहीं सकता। कितने कायदे बनाओ, कितने डंडे दिखाओ, कितने नरक बता दो। लेकिन उसको रस की रुचि है, क्योंकि उसकी उत्पत्ति रस से है। विषय भोग में क्यों गिरता है? कि रस के लिए। यह बात ठीक है ना? सबके अनुभव की है। फिर चाहे आंख का रस हो, चाहे नाक का रस हो, चाहे जीभ का रस हो, चाहे पति-पत्नी के तू गड्ढे में पड़ने का रस हो। लेकिन रस आता है। उस रस से जो सुख की झलक मिलती है, उससे जीव समझता है कि ऐसा करने से रस मिला।

✨️यह पांच प्रकार के जो हमारे साधन हैं ना, आंख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, ये पांच विषय। इनको बोलते हैं विषय जन्य सुख। विषय जन्य रस। इस विषय जन्य रस में क्षण भर तो रस आता है। लेकिन जीवन भर गुलामी बन जाती है। और विषय जन्य रस के संकल्प पूर्ति में पराधीनता है। कोई भी विषय सुख लेने का जो रस लेने की इच्छा है, तो संकल्प होता है ना? उस संकल्प पूर्ति में पराधीनता है और संकल्प की अपूर्ति में भय है। कि संकल्प पूर्ण नहीं हो रहा है। मैं अभागा हूं, मेरी इच्छा पूरी नहीं हो रही। *तो इच्छा पूरी होती है, तो पदार्थों की दासता की रेखा अंतःकरण में बढ़ जाती है। और इच्छा जब पूरी नहीं होती है, तो अपूर्ति की आग दिलसाती रहती है। पूर्ति होती है, तो वासना बढ़ती है और पूर्ति नहीं होती है, तो दीनता बढ़ती है। दोनों तरफ से घाटा है। तो इच्छा पैदा होती है बेवकूफी से, पूरी होती है पराधीनता से। और इच्छा पूरी हो गई, तो फिर इच्छा पूर्ति होने के बाद समय जो सुख मिला, उसके बदले में दुख तो बंडलों का बंडल भोगना है।* फिर भी इच्छा पूर्ति का जो लकीर बन गया अंतःकरण में, वह बार-बार वह काम करने को ले जाती है।

✨️जैसे भोग भोगने के बाद जो वैराग्य आता है, वह वैराग्य टिक जाए। और कथा सुनने के बाद जो भगवान के लिए राग पैदा होता है, वह टिक जाए। ये दोनों हम लोगों के अनुभव हैं। आप ईश्वर को मानो, चाहे ना मानो, किसी संप्रदाय को स्वीकार करो, किसी गुरु को स्वीकार करो, चाहे ना करो, लेकिन यह सबके जीवन को छूती हुई बात है। यह बिल्कुल परम आस्तिकपना है। यह तो नास्तिक को भी आस्तिकपना पैदा कर दे, ऐसी बात है। यह खास बातें हैं। तो भोग भोगने के बाद जो ग्लानि पैदा होती है, वह आपका अनुभव है। और सत्संग सुनने के बाद जो आनंद प्राप्त होता है, या ईश्वर प्राप्ति की आवश्यकता अनुभव में आती है, यह भी आपका अनुभव है। तो सत्संग के बाद सत्य के लिए जो प्रीति पैदा होती है, और भोग के बाद जो भोग से अरुचि पैदा होती है, यह अपने अनुभव का अगर आदर करें तो हर इंसान परमात्मा का अनुभव कर सकता है। अपना अनुभव है। अपने अनुभव का हम आदर नहीं करते। अब थोड़ा ऊपर चलें।

✨️विषयों से जो रस आता है, तो संकल्प पूर्ति की दासता और अपूर्ति में चिंता देता है। संकल्प पूरा हो गया, तो उस पूरे संकल्प के समय जो झलक आई, उसको भी आदमी याद करते-करते उससे बंधता रहता है। कहीं सुख मिला, तो उसको याद करते-करते, उस झलक को याद करते-करते भी फिर ऐसा ही संकल्प करके संकल्प पूर्ति की जाल बुनता रहता है और फंसता रहता है। तो संकल्प पूर्ति स्वाभाविक हो जाया करे। जैसे हम सत्संग कर रहे हैं और बरसात ना हो। यह हो गई संकल्प पूर्ति। जय जय। स्वामी जी आ जाएं, सत्संग मिल जाए। यह हो गई संकल्प पूर्ति। लेकिन इस संकल्प पूर्ति में व्यक्तिगत सुख नहीं है। सुख का भोक्ता नहीं बनना है, लेकिन सुख स्वरूप के रास्ते का पतिग बनना है। इसलिए यह संकल्प बांधता नहीं। पत्नी का भोग, पुत्र-पुत्री का भोग या कोई विषय के भोग से सुख मिल गया, तो रसगुल्ले खाए, बड़ी मजा आई। अच्छा, फिर वह रसगुल्ले तुम्हारे को बांध दिया। भोजन आपने किया, मां ने, पत्नी ने अपनी मर्जी से सब्जी आदि बनाई। आपने भोजन किया, तो भोजन का स्वाद तो वही आएगा, पेट तो भरेगा। लेकिन अपनी इच्छा से अगर तुमने पदार्थ बनाकर खाए, तो संकल्प पूर्ति का जो सुख मिलेगा, उस सुख ने तुमको पदार्थ का, रसना का गुलाम बना दिया।

✨️संतान को जन्म देना, एक-दो बेटा हो गया, वह अलग बात है। लेकिन उस काम विकार से जो सुख बुद्धि आती है, वह शरीर को निचोड़ डालती है। और निचोया हुआ शरीर उस वक्त वैराग्य अनुभव करता है। थोड़े दिनों के बाद फिर वह काम की रति के समय जो जरा सा सुख आया, उस सुख की स्मृति करके बार-बार हम संकल्प पूर्ति की जाल में फंसते हैं। तुलसीदास महाराज ने कहा ➖️

*काम, क्रोध, अरु लोभ, मोह की जब लग मन में खान,*
*तुलसी दोनों एक हैं, क्या मूर्ख और विद्वान।*

✨️बड़ा विद्वान वाइसराय है। और हुक्म करता है, तो फौजी भागते हैं। हजारों सैनिक बंदूकें चला रहे हैं। लेकिन शाम को रात को देखो, लेडी के आगे गुदगुदी, गुदगुदी, गुदगुदी। क्रोध आता है, तो बुद्धिमान भी बुद्धि क्षीण हो जाती है उसकी। तो काम, क्रोध, अरु लोभ, मोह की जब लग मन में खान, तुलसी दोनों एक हैं, क्या मूर्ख और विद्वान। *तो संकल्प पूर्ति से जो सुख मिला, उसकी स्मृति नहीं करनी चाहिए, एक बात। और संकल्प अपूर्ति का जो भय है, उससे भयभीत नहीं होना चाहिए। सब संकल्प किसी के पूरे नहीं होते और सब संकल्प किसी के अपूर्ण नहीं होते। कुछ संकल्प पूरे होते हैं और कुछ अपूर्ण रहते हैं। जो चाहते हैं, वह सब होता नहीं, जो होता है, वह सब भाता नहीं और जो भाता है, वह टिकता नहीं। यह बिल्कुल सच्ची बात है, इसमें संदेह हो तो पूछो।*जो भी दुख है, जो परेशानियां हैं, वह केवल आप ईश्वर को नहीं मानते, इसीलिए परेशानी है? नहीं नहीं, ईश्वर को तो भतेरे लोग मानते हैं, फिर भी परेशान हैं। ठीक समझ नहीं है, इसलिए परेशान हैं। ईश्वर को तो हम लोग मानते हैं ना? कोई राम जी को मानता है, कोई कृष्ण को, कोई बुद्ध को, कोई किसी को, भगवान को तो मानो, फिर भी परेशानी है। तो ईश्वर के ज्ञान को जब तक अपन लोग नहीं स्वीकार करते हैं, तब तक वैद्य को तो मानो, लेकिन वैद्य की दवा ना लो, तो बीमारी कैसे जाएगी?

*यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।*
*ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥*

✨️जैसे लकड़ी के ढेर को आग जलाकर भस्म कर देती है, ऐसे ही हे अर्जुन, ज्ञान की अग्नि तेरे सारे कर्मों को जलाकर भस्म कर देगी। *तो सुख की लालसा और दुख का भय, इन दोनों कारणों से हमारा अंतःकरण मलिन होता है।* जैसे आईना है ना? तो आईने में आप लट्ठियां लगाओ, दरारें पार दो, टुकड़े-टुकड़े कर दो बड़े आईने को और वहीं चिपकाए रखो। तो आपका एक चेहरा अनेकों के दिखेगा। ऐसे ही अंतःकरण मलों का, वैसे परमात्मा की सत्ता पाकर अंतःकरण में स्फुरण होती है। तो जिसको परमात्मा की चेतना मिलता है, वह अंतःकरण मलिन क्यों होता है? कि सुख की इच्छा और दुख का भय। यह दोनों प्रकार की लकीरें बनती हैं, इसलिए अंतःकरण मलिन हो जाता है। अंतःकरण शुद्ध होता है, तो दूसरे के दिल की बात भी पता चल जाता है और संकल्प सत्य भी होने लगता है। तो अंतःकरण मलिन कैसे होता है? कि संकल्प पूर्ति की इच्छा और संकल्प अपूर्ण की चिंता। संकल्प पूर्ति का सुख और संकल्प अपूर्ति की लालसा, चिंता, भय। इससे अंतःकरण मलिन होता है। अब जो होना है, सो होना है। जैसे घर में दिया बुझ जाता है, यहां लाइट का फ्यूज उड़ जाता है, तो हाय रे हाय बोलते हैं। लेकिन सूरज शाम को अस्त हो जाता है, इतना बड़ा दिया शाम को रोज बुझ जाता है, तो हाय रे हाय नहीं बोलते। क्योंकि समझते हैं कि सूरज ढलता है। ऐसे समझते हैं कि यह शरीर ढलता है। संसार का नाम कोई यश करता है, कोई अपयश करता है, कोई मान देता है, कोई अपमान देता है। कभी अनुकूलता होती है, कभी प्रतिकूलता होती है। जो धूप सहते हैं, वही फिर बारिश का आनंद लेते हैं। जो बारिश का आनंद लेते हैं, उनको भी कीचड़ का मजा लेना ही पड़ता है। ध्यान दीजिए। यह सब एक-दूसरे से जुड़े हुए द्वंद हैं। बारिश तो हो, लेकिन कीचड़ ना हो। बारिश तो हो, लेकिन धूप ना लगे। यह नहीं, यह तो साथ में आएगा। और जो आदमी गर्मी नहीं पचा सकता, वह सर्दी नहीं पचा सकता।

✨️*जो सुख नहीं पचा सकता, वह दुख नहीं पचा सकता। जो दुख नहीं पचा सकता है, वह सुख नहीं पचा सकता। जो अपमान नहीं पचा सकता, वह मान भी नहीं पचा सकता। तो हकीकत में यह सब चीजें पचा लेने के लिए हैं। हम लोग इन चीजों से बंध जाते हैं। सुख की लालच, यश की लालच, मान की लालच, फिर हमसे गंदा काम भी करवा लेंगे।* कूट कपट भी करवा लेंगे। अगर मान की लालच नहीं है, तो आपसे सत्कर्म होंगे। और सत्कर्म अपने में ही पूरते हैं, वह अपने आप मान पैदा कर देंगे।

✨️कालू नाम का लड़का था, अपनी अम्मा से पूछा, अम्मा, मुझे प्रसिद्ध होना है। कोई उपाय बता। बोले, अब्बा जान से पूछ। अब्बा जान, मुझे प्रसिद्ध होना है। अब्बा जान ने कहा, बेटे, प्रसिद्ध होना है, तो दो रास्ते हैं। एक तो तू सेवा करो, अच्छे काम करो। खुदा की बंदगी करो, लोगों का काम करो। इससे प्रसिद्ध होगा, लेकिन समय लगेगा इसमें। देर लगेगी। इसमें कई विरोध भी होंगे छोटे-मोटे। लेकिन तू अडिग रहेगा, प्रसिद्ध हो जाएगा और वह प्रसिद्धि लंबा समय टिकेगी। और दूसरा है तुरंत फायदा देने वाली। तुरंत फायदा देने वाली है, ऐसा कोई गंदा काम करो कि तेरा नाम हो जाए कि कैसे ऐसा किया, ऐसा किया, ऐसा किया। वह गया गांव के बाहर पनघट पर जहां महिलाएं पानी भरती थीं, वह सलवार ऊंची कर कर पनघट पर खड़ा होकर पिचकारी मारने लगा कुएं में। पिचकारी तो समझ गए आप, बाथरूम करने लगा। पिचकारी मारी कुएं पर, तो अरे रे, तोबा तोबा, यह नापाक कर दिया। कौन था? कह रहे, वह तो कालू मियां रे, वह तो कालू। कालू, कालू, कालू। गांव में तो क्या, चारों ओर, चारों तरफ के छोटे-छोटे गांव में। कालू ने ऐसा किया। कालू तो भाग गया । लेकिन नाम उसका प्रसिद्ध हो गया। कैसे प्रसिद्ध हो गया?कि कुकर्म कर के। अब यह प्रसिद्धि क्या है? कुप्रसिद्धि है। इससे भले शरीर का थोपा हुआ नाम तो हो।

✨️तो जो ऐसे हल्के साधन से प्रसिद्ध होना चाहते हैं, वे महाशय कुप्रसिद्ध हो जाते हैं। लेकिन जो सत्य का अवलंबन लेते हैं, प्रसिद्धि की इच्छा नहीं है और सत्कार्य करते हैं, तो उनको सुख भोग की इच्छा और दुख का भय उनका चला जाता है। जय राम जी की। सत्कार्य करने के बाद उनको सुख, यश भोग की इच्छा नहीं रखते हैं, तो सत्कार्य के बाद, कार्य के बाद उनको शांति का अनुभव होता है। जय राम जी की। *तो सुख की लालच मिटते ही उनका मन शांति का अनुभव करता है। शांति का अनुभव से सामर्थ्य पैदा होता है।* शांति का उपभोगता ना हो, तो फिर ज्ञान का किरण पैदा होता है, जिसे आत्मज्ञान कहते हैं।

📍स्व का ज्ञान, अपने मैं का ज्ञान, वह पैदा होता है। तो सुख की लालच, दुख का भय, यह दोनों निकाल देना चाहिए, एक पॉइंट यह।

📍चाहे फिर किसी मजहब को मानते हो, चाहे अल्लाह को माने, चाहे राम जी को माने, चाहे किसी गुरु को माने। यह बात जिसमें आ जाएगी, वह ऊंचा उठ जाएगा। चाहे वह नेता हो।

📍तो सुख की लालच मिटाने के लिए एक उपाय यह है कि सुख लेने की चीज नहीं है, सुख देने की चीज है। यह बात समझ लें।

📍मान लेने की चीज नहीं है, मान देने की चीज है। जो मान की इच्छा से काम करते हैं ना, तो उनको मान की इच्छा के अनुसार मान मिलता है, तो मान में आसक्त हो जाते हैं। और थोड़ा ज्यादा मिलता है, तो अजिर हो जाते हैं। और कम मिलता है, तो द्वेषी हो जाते हैं। दुखी हो जाते हैं कि नहीं?

✨️यह बिल्कुल हम लोगों के काम की बात है। यह हमारा रामायण है। आज की कथा जो है ना, हमारा रामायण है, हमारा भागवत है, हमारी उपनिषद है, हमारा ज्ञान है, हमारा गुरु है, हमारा माता-पिता है। आज का ज्ञान ऐसा है। यह बात आ गई, फिर चाहे आप किसी मजहब के हो, किसी उम्र के हो, आप महान हो जाएंगे। तो सुख की लालच, सुख की दासता मिटाने के लिए दूसरों के दुख निवृत्त करने में लग जाओ, तो आपके सुख की लालच मिट जाएगी। और दुख का भय मिटाने के लिए नया उपाय नहीं करना पड़ेगा।

✨️अमेरिका में रॉक्सफेलर नाम का एक लड़का 21 साल की उम्र में करोड़ों रुपया कमा लिया था। मिलियन डॉलर, मतलब यहां का करोड़ हो गया, एक करोड़ 30 लाख हो गए। 21 साल की उम्र में मिलियनेयर हो गया। और उसका हौसला और कायम हो गया। महाराज, 52 वर्ष की उम्र में इंडियन वॉकिंग, स्टैंडर्ड वैक्यूम कंपनी का मालिक हो गया। वह बड़ी कंपनी थी, वह अरबपति हो गया। लेकिन उन दिनों में धन से यशस्वी होने की जो उसकी लालच थी, धन से भोग भोगने की जो उसकी स्पीड थी, उन भोगों ने उसके शरीर को बिल्कुल निचोड़ डाला। नस नाड़ियां खाली हो गईं। आंखें भी कमजोर हो गईं। थोड़ी-थोड़ी बात में धूजारी पैदा हो गई। ऐसा नहीं कि कुंडली जाग गई और धूजारी पैदा हो गई। नहीं, कमजोरी के कारण। उसके बड़े-बड़े डॉक्टर, जो अरबपति हैं, उसके डॉक्टरों की क्या कमी? बड़े-बड़े स्पेशलिस्ट डॉक्टर। जांच करें और 10,000 रुपया फी ले लें, ऐसे डॉक्टर। उन डॉक्टरों ने कहा कि हमारे पास से भले तुम कितनी दवाइयां लो, लेकिन जब तक तुम्हें चिंता, भय और लोभ की वृत्तियां उठती रहेगी, तब तक हमारा इलाज सफल नहीं होगा। और अभी तुम्हारा शरीर जैसा चलता है, वैसा अगर चलता रहा, तो छह महीने से ज्यादा तुम नहीं जी सकते। रॉक्सफेलर ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि अब मैंने जीवन जीने का ढंग बदल दिया। मेरे को भय लगा कि छह महीने में मर जाऊंगा, यह अरबों रुपया, करोड़ों रुपया, मकान, यह किस काम में आएंगे? जब शरीर नहीं रहेगा, तो यह सब किस काम में?

✨️तो जो मैं धन कमाने की चिंता में था, अब मैंने चिंता को चिंतन में बदला। कि इस धन से बहुत जनों को फायदा कैसे हो? तो बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय, उस धन का उपयोग किया। तो चिंता चिंतन में बदल गई। और मेरा धन कोई छीन लेगा, वह भय निर्भयता में आ गई। और फिर दीन दुखियों को तो बाहर के साधनों से सारवा। लेकिन दूसरे जो कुछ पात्र हैं, उनको आध्यात्मिक ढंग का प्रसाद बंटवाने में, बांटने में, अगर आदमी लग गया, तो उस आदमी को सुख लेने की लालच और दुख का भय अपने आप चला गया। रॉक्सफेलर 92 वर्ष तक जिया है। जो 52 वर्ष में मरने वाला था, वह 92 वर्ष तक जिया है। प्रसिद्ध हो गया, आप इतिहास को देखें वहां के रॉक्सफेलर की बात।

✨️*तो जब-जब आदमी दुखी होता है, तो धन से दुख नहीं मिटता है। सत्ता से दुख नहीं मिटता है। लेकिन सुख की लालच और दुख के भय को छोड़ने से दुख मिटता है। जय जय।* अगर धन से दुख मिटता, तो धनवान पूरे सुखी होने चाहिए। अगर सत्ता से दुख मिटता, तो जो जिनके हाथ में आज के दिन भी सत्ता है, क्या वे निर्दुख हैं? वह आप लोगों से बेचारे ज्यादा दुखी हैं। कई मिनिस्टर मेरे शिष्य हैं। कई एमपी लोग मेरे साधक हैं, शिष्य हैं। बोलते थे कि जब तक सत्संग नहीं मिला था, गुरु मंत्र नहीं मिला था, तो हृदय को बिच्छू डंके, ऐसे घड़ी-घड़ी में डंक लगते थे। अभी समझ गए कि जीना, जीवन जीने का ढंग आ गया है। तो आज की यह पॉइंट यह समझ लें, आप लोग सुन रहे हैं ना सब लोग, किसान लोग, भाई लोग, बहनें लोग। सुख का विचार आए, तो सोचना कि संसार में अगर सुख होता, तो संसारी लोग सुखी होते। क्या राज-महाराजे पागल था क्या, गुरु के चरण में गए?

✨️संसार में सुख नहीं है, संसार में तो कर्म करके अपने बंधन काटना है। जय राम जी की। जेल में कोई सुख लेने जाए, तो तो मूर्ख है। रोटी खा ले, जेलर काम करवाएगा कि काम कर ले और दिन अपने पसार कर ले। कोई जेल में जाकर अगर सुख लेने की कोशिश करता है, तो वह तो पक्का जेलिक कैदी है। वह तो फिर बाहर निकलेगा और फिर गड़बड़ करेगा और कैद में आ जाएगा। ऐसे अगर संसार में सुख मिल गया, तो मरने के बाद फिर आदमी संसार की कैद में ही आएगा और माता के पेट में लटकना पड़ेगा। माता के पेट में ऊंधा होकर लटका, तो क्या सुख लिया? जैसे घड़ा कुम्हार पकाता है, तो उसको अग्नि में सेंकता है। ऐसे रजवीर्य जठराग्नि में, माता की गर्भाग्नि में पकता है, तब हड्डियां बनती हैं। खोपड़ी बनती है। कितना दुख भोग।


✨️संत चांगसेन चीन में किसी मरघट से गुजर रहे थे और मरघट कोई साधारण आदमियों का नहीं था। रजवाड़े का मरघट था। रात का समय था, उनके पैर से कोई खोपड़ी टकरा गई। चांगसेन ने कहा, "ठहराओ।" उस खोपड़ी को लेकर माफी मांगने लगा। आज ना विनय करने लगा, दंडवत प्रणाम करने लगा, "अरे भूल हो गई।" आंखों में से आंसू बरसने लगे। शिष्यों ने कहा, "गुरु महाराज, यह क्या कर रहे हैं?" "क्यों क्या कर रहा हूं?" बोले, "आप इस खोपड़ी से क्या माफी मांग रहे हैं?" "अरे इसको मेरा पैर लग गया, पैर की टक्कर लग गई और यह कोई साधारण आदमी की खोपड़ी नहीं है। यह तो किसी राजा की थी और यह खोपड़ी सिंहासन पर बैठती थी। उस वक्त इसके शरीर को कोई पैर भी लग जाता तो फांसी लग जाती। अब इसकी खोपड़ी को पैर लग गया है। मुझे तो माफी मांगनी चाहिए।" "अच्छा, आप इससे माफी मांगते हैं। फिर आंखों में आंसू क्यों हैं?" "यह आंखों में आंसू इसलिए है कि मनुष्य जन्म पाकर गर्भाग्नि में पककर फिर अहंकार को पोसने के लिए, वाह-वाही के लिए, भोग भोगने के लिए बड़े तख्त लिए हैं। सुख की इच्छा ने तुमसे कई बुरे काम करवाए और राजे-महाराजे कहलवाए। लेकिन जिसको राजे-महाराजे करके सलामी भरते थे, उस खोपड़ी की हालत बेचारी की। आज एक साधारण आदमी के पैर की ठोकर से अपने को नहीं बचा सकती। अरे खोपड़ी, तेरी ऐसी दुर्दशा की।" और ऐसी यह खोपड़ी 5 साल पहले अगर होती तो इसको जरा सा थोड़ा यूं भी कर देते, तू कह देते तो हम हमारे मुसीबत कर देती थी। और अभी पैरों से ठुकराई जाती है। इसलिए रोता हूं कि संसार तेरी नश्वरता और इंसान तेरा पागलपन। मृत्यु कब जपेट ले और यह राख हो जाए, कोई भरोसा नहीं। जो राख होने वाला शरीर है, उसके इंद्रिय सुख भोगने में दिन-रात लगे हैं।

*अलि पतंग मृगमीन गज एक-एक रस आंच,*
*तुलसी तिनकी कौन गति जिनको व्यापे पांच?*

✨️मीन स्वाद मे फसती है, अलि गंध में फंस जाता है। पतंग रूप में फंस जाता है। गज स्पर्श में फंस जाता है। एक-एक विषय का भोग भोगने से बर्बाद हो जाते हैं तो पांचों विषयों का जो भोग भोगने में लगे हैं, उनकी क्या हालत होगी? यह तो बड़े भाग्य होते कि दो वचन सत्संग के मिलते, कुछ पाप कटते हैं, कुछ अज्ञान कटता है, कुछ ज्ञान की मूड़ी मिल जाती है। नहीं तो मनुष्य से तो अन्याय है कि कुत्ते भी हैं तो उनकी सीजन होती है तब सत्यानाश करते। आदमी का तो कोई भरोसा ही नहीं। गाय जब जरूरत होती तब बोलते बोलती है। आदमी तो खामखा किसी की चुगली करेगा, किसी की निंदा करेगा, कोई अच्छा काम करता होगा तो पत्थर मारेगा। यह कर दो, वह कर दो। तो आदमी तो परनिंदा में, परचुगली में और भोग भोगने में अपनी तो खुद बर्बादी कर रहा है। पड़ोस की माई, उसकी बहू ऐसी है, उसकी ननद ऐसी है, उसकी अरे तू रोटी अपनी खावे, खोपड़ी दूसरों के लिए खर्च कर रहा है। नारायण नारायण नारायण नारायण।

✨️तो संकल्प अब बहुत ऊंची बात हम लोग समझेंगे। *संकल्प पूर्ति की जो लालच है, वह हमको चिंता में डाल देती है। और संकल्प अपूर्ति का जो भय है, वह हमको भय में तपाता रहता है।* तो संकल्प पूर्ति की लालच और संकल्प अपूर्ति के भय को निकाल देना चाहिए। कैसे निकालें? कि जन्म से, जन्मते वक्त प्रारब्ध, अन्न-जल और संबंध शादी-विवाह, यह सब पहले से नियत है। हमारा यहां आना निहित था। व्यास जी को भगवान ने निमित्त बना दिया। आप लोगों को निमित्त बना दिया। हमारा अन्न-जल था। ऑटोमेटिक हो रहा है जैसे फिल्म में एक चित्र आता है, फिर दूसरा आता है, तीसरा आता है। अब यहां आओ, अब तालाब आ जाए। अरे आप बोलो चाहे ना बोलो, तालाब आने वाला होगा आएगा कि नहीं। आप देखते रहो। फिल्म को चलने दो, समय की धारा को चलने दो। बेटा आने वाला होता है, बेटा को बाप भी नहीं रोक सकता, बेटा आखिर आता है। बेटी आएगी तो आएगी, जमाई आएगा तो आएगा। मिलेंगे वह मिलेंगे, बिछड़ेंगे वह बिछड़ेंगे। कितना भी संभालो बाप को, पत्नी को, मां को, जो बिछड़ेंगे वह बिछड़ेंगे। जो बिछड़ गए उनके लिए रोते, "हाय रे यार, मेरा पिताजी। हाय रे हाय मेरी औरत तू कहां गई रे?" अब तू सिर कूटे तो वापस थोड़ी आएगी। "मेरा पति रे, हाय रे हाय।" यह क्या है? कि जिससे थोड़ा सुख मिला, वह पति के लिए नहीं रो रहे हैं, लेकिन अब हमारा क्या होगा, उस लिए रोते हैं। पत्नी के लिए नहीं रो रहे हैं, अब हमारा क्या होगा, उस लिए रोते हैं।

*इंसान की बदबख्ती अंदाज़ से बाहर है,*
*कमबख्त खुदा होकर बंदा नजर आता है।*

✨️है तो सत्त चित्त आनंद स्वरूप स्वयं, लेकिन संकल्प पूर्ति की लालच में, सुख की लालच में और दुख के भय से वह अपने आप के पैर के ऊपर कुल्हाड़ा मार रहा है। अकेला था कि नहीं? तब भी जी रहा था। उस समय समझता था कि खिलौनों के बिना मैं नहीं जी सकता हूं, चॉकलेट के बिना नहीं जी सकता हूं। लेकिन भाई, तू चॉकलेट के बिना भी जी सकता था, खिलौनों के बिना भी जी सकता था। उस उस वक्त तू सिर पटकता था। ऐसे ही इस वक्त के जो व्यवहार हैं, वे भी वह तेरे खिलौने और चॉकलेट हैं। उनके बिना भी जी सकता है। तू शरीर के बिना भी हो सकता है, हे चेतन, तू इतना महान है। लोग बोलते, "चाय के बिना नहीं जी सकूंगा, बीड़ी के बिना नहीं जी सकूंगा, इतने रुपयों के बिना नहीं जी सकूंगा, लाडी के बिना नहीं जी सकूंगा, लाडे के बिना नहीं जी सकता हूं।" लेकिन लाडी सदा रहेगी क्या? लाडा सदा रहेगा क्या? यह गाड़ी-मोटर सदा रहेगी क्या? यह शरीर सदा रहेगा क्या? यह पूछो। यह तो जाने वाला है। जो जाने वाला है, उसको अपना मानो ही मत। यह तो जाने वाला है, पांच भूतों का है, माया का है। ऐसा समझ के जैसे दूसरे की वस्तुओं का उपयोग करते या दूसरे से व्यवहार करते, ऐसे शरीर से व्यवहार करो। भोजन आ जाए कि बेटे खाएगा ना। चलाना है तो जैसे स्कूटर में पेट्रोल डलाते हो कि नहीं। घोड़े को खाना खिलाते हो, पानी पिलाते हो। ऐसे ही शरीर घोड़ा है। शरीर को मैं मानते हैं तो भोग की वासना पैदा होती है। हकीकत में आप शरीर है ही नहीं। आप शरीर नहीं हैं।

✨️एक आदमी ने शाम के टाइम आरती हो रही थी, मंदिर में पेड़ा ले गया, बर्फी ले गया, जाकर थाल बांटने डिस्ट्रीब्यूट कर दिया। और पूरा-पूरा बर्फी का टुकड़ा बांट रहा है। पूरा-पूरा पेड़ा दे रहा है। लोगों ने बोला, "किस बात की खुशी में यह पेड़े बांट रहे हैं?"
बोले, "मैं बच गया।" "कैसे बच गया?" कि हर रोज शाम को मैं घोड़े पर बैठ बैठ के घूमने जाता था। आज मैंने सोचा कि मौसम ठीक नहीं है, नहीं गया। मेरा घोड़ा कोई गुम हो गया। घोड़ा गुम हो गया अच्छा हुआ, मैं नहीं बैठा। अगर मैं बैठता तो मैं भी तो गुम हो जाता कि नहीं। उस आदमी की बात पर लोगों को हंसाया कि पागल जैसी बात कर रहा है। फिर भी उस आदमी ने तो अपना घोड़ा खोया था, खुद बच गया था। हम लोग तो घोड़ा को ही मैं मान रहे हैं, खुद को खो दिया। मैं क्या हूं, इसका हमको पता ही नहीं।

✨️चेतन विमल सहज सुख राशि। हम चेतन हैं, विमल हैं, लेकिन संकल्प पूर्ति की इच्छा ने और अपूर्ति की आग ने हमको अपने पथ से भ्रष्ट कर दिया। संकल्प पूर्ति भी झुलसाती है, अपूर्ति भी तपाती है। अच्छा, संकल्प पूर्ति जब सुख लिया तो उसको याद करते हैं कोई क्षणिक सुख को तो वैसा संकल्प बार-बार उठता है। और फिर उसकी पूर्ति के पीछे पड़ते हैं। उसकी पूर्ति में अगर कोई विघ्न डालने वाला बड़ा आदमी है तो भय होता है। बराबरी का है तो ईर्ष्या होती है और छोटा होता है तो उससे द्वेष होता है। यह सब संकल्पों के कारण ही होता है और क्या है।

✨️अच्छा, *संकल्प पूर्ति की लालच नहीं रखेंगे तो आपका मन निसंकल्प दशा में आने लगेगा। संकल्प कम होते ही शांति बढ़ने लगेगी। और संकल्प जो आपके प्रारब्ध में हैं, जो आपसे काम करवाते हैं तो करवाया तो संकल्प पूर्ति का मजा मत लो और बार-बार याद करके वैसे नए संकल्प मत बनाओ तो यह संकल्प धीरे-धीरे निर्विकल्पता में बदल जाएंगे। जब निर्विकल्पता में बदल जाएंगे तो आपके अंतःकरण में सामर्थ्य आ जाएगा।*जय राम जी की। और उस सामर्थ्य को अपने विषय भोग में ना लगाओ, अपने देह के यश में ना लगाओ तो वह सामर्थ्य और बढ़ जाएगा। यह तो स्वामी जी बैठे हैं इसलिए हाई लेवल की बात कर रहा हूं और ज्यादा। जय राम जी की।

✨️वह सामर्थ्य अपने सुख में हम ना लगाएं। तो क्या होगा? वह सामर्थ्य परम सामर्थ्य का रूप ले लेगा। जैसे मूंगफली छोटी है और अभी से खाने लग गए तो नपा-तुला उसमें विटामिन है। थोड़े दिन पकने दो, जरा बराबर सेक सकें। अब मूंगफली ने तो केवल कवर बनाया, अंदर दाने लगे ही नहीं और आप तोड़ के निकालो तो क्या है। आज से एक महीना पहले मूंगफली तोड़ के निकालते थे तो क्या मिलता? कुछ तो ठहरने देना पड़ेगा कि नहीं। पकने देना पड़ेगा। *ऐसे ही संकल्प पूर्ति का सुख और अपूर्ति के भय से आप बचे तो आपके अंतःकरण में शांति आएगी। और शांति से सामर्थ्य आएगा। सामर्थ्य से क्या होगा? कि जो करना चाहिए वह सहज में होने लगेगा और जो नहीं करना चाहिए उधर की तरफ आकर्षण नहीं होगा। बहुत ऊंची स्थिति है।* जो करना चाहिए वह आपके आपके निगाह मात्र से, आपकी हाजिरी मात्र से हो जाएगा। अब सूरज लाखों टन मूंगफली बनाता होगा, लाखों टन धान बनाता होगा, करोड़ों टन पानी उठाता होगा और बरसाता होगा। लेकिन सूरज को कभी कर्तृत्व का बोझा लगा है क्या? सूरज को कोई तकलीफ हुई? सहज में हो रहा है। उसके हाजिरी मात्र से सुबह हो जाता है, ऑक्सीजन बढ़ जाता है, पक्षी किलौल करने लगते हैं, बच्चे जगने लगते हैं। बुड्ढे जगने लगते हैं। अरे रोगी आदमी भी निरोगता की कुछ सांसें लेता है प्रभात काल। और सूरज को इतना मेहनत नहीं कि इनको जगाना है, पक्षियों को किलौल कराना है, भूमि को जरा द्रस देना है और पौधों को ऊंचा करना है, पेड़ों को ऊंचा करना है, फूलों को खिलाना है, बुलबुल को गीत गुंजाना है। ऐसा कोई टेंशन है क्या सूरज को? उसके होने मात्र से जो होना चाहिए वह उसकी हाजिरी मात्र से हो रहा है। और जो नहीं होना चाहिए वह उसकी हाजिरी मात्र से हो रहा है। विषैले जंतु नहीं होने चाहिए। छोटे-छोटे जीव-जंतु जो हानि करता है, वह सूरज के ताप में तप के मर जाते हैं कि नहीं।

✨️*जो नहीं होना चाहिए वह अपने आप भस्म हो जाता है। और जो होना चाहिए वह अपने आप उभर आता है कि नहीं। अब इसका बोझा सूरज को है क्या? ऐसे ही आप ज्ञान के सूरज बन जाएंगे। आपके हाजिरी मात्र से कुतुब में, समाज में जो होना चाहिए होगा और जो नहीं होना चाहिए नहीं होगा।*

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