20/05/2026
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🌹 *20.05.26* 🌹
💠 *सुबह संध्या सत्संग* 💠
🏵️ *पूज्यश्री के अनमोल वचन*🏵️
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🌼 *लभते ब्रह्म निर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।*
🌼 *छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥*
✨️जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गए हैं जो संपूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चल भाव से परमात्मा में स्थित है वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं. भगवत गीता के पांचवें अध्याय का 25वां श्लोक है.
🌼 *लभते ब्रह्म निर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।*
🌼 *छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥*
✨️सब पाप नष्ट हुए बिना ब्रह्मनिष्ठा होती नहीं सब पाप नष्ट हुए जिनके उनको सब उनको ज्ञान के द्वारा सब संशय निवृत्त हो जाते हैं और संपूर्ण प्राणियों के हित में रत होते हैं ऐसा भगवान कहते हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चल भाव से परमात्मा में स्थित है वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं ओम ओम ओम ओम ओम
✨️सब पाप नष्ट होने का सौभाग्य जिनको मिल जाता है वे संशय रहित होते हैं वैतथ्य प्रकरण है मांडूक्य उपनिषद में.. कि ब्रह्म साक्षात्कार करके वो ज्ञानी कैसा रहे.. जड़वत्लोकम आचरेत्.. लोगों में जड़ जैसा रहे अज्ञानियों की नाई रहे.. चार आदमियों ने भांग पी ली भांग के नशे में चारों ही चूर हुए हैं एक आदमी नशा होने से उठपटांग बोलने लग गया दूसरा आदमी गाना गाने लग गया तीसरा आदमी नाचने लग गया नशे में और चौथा आदमी प्रगाढ़ निद्रा में सो गया नशा तो सबका एक जैसा था लेकिन नशा एक जैसा होते हुए भी चित्त के जैसे-जैसे संस्कार थे ऐसी-ऐसी चेष्टा हुई उसे जिनके सब पाप अलविदा हो गए वे अपने परमात्म स्वभाव में आत्म स्वभाव में निसंशय हो जाते हैं लौकिक आचरण व्यवहार खानपान से ज्ञानी को मापा नहीं जाता वेशभूषा से आपको ज्ञान हुआ कि नहीं हुआ उससे भी नहीं मापा जाता लेकिन आप अपने आप को माप सकते हैं कैसे जिनके जिस जिसके सब पाप नष्ट हो गए हैं जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गए हैं जो संपूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चल भाव से परमात्मा में स्थित है वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को पाते हैं निश्चल भाव से जिनका मन ब्रह्म परमात्मा में स्थित है जिनके सब संशय निवृत्त हो गए वे शांत ब्रह्म को पाते हैं
✨️स्कंद पुराण में कथा आती है कि एक महात्मा जी थे भिक्षा करने को गए जीवन मुक्त थे एक कुम्हारन रो रही थी महात्मा ने पूछा क्यों रोती है बोले महाराज मेरे पति देव हो गए बोले न कोई मारता है न कोई जीता है ये तो भ्रांति मात्र है पति मरना मेरा पति ये सुन-सुन के मान लिया तूने सब पांच भूत हैं और पांच भूत माया मात्र है भ्रम मात्र है क्षिति ब्रह्म जल ब्रह्म पावक ब्रह्म सब भ्रम ही भ्रम है ऐसा पृथ्वी भ्रांति मात्र है सत्य नहीं है जल भ्रांति मात्र है तेज भ्रांति मात्र है वायु भ्रांति मात्र है आकाश भ्रांति मात्र है उनसे बने हुए पुतले भ्रांति मात्र था कौन किसका पति कौन किसकी पत्नी क्या रो रही है जीवन मुक्त महात्मा का तो अनुभव अपने ढंग का है लेकिन वो कुम्हारन तो बेचारी अपनी दृष्टि से जी रही है बोले महाराज ये ज्ञान तो आप ही जानो लेकिन मैं तो उसको रोती हूं कि अब मिट्टी कौन लाएगा..पति चले गए तो मिट्टी कौन लाएगा और रौंदेगा कौन मेरे से रौंदी नहीं जाएगी फिर चाक पे कौन चढ़ाएगा और घड़े कौन बनाएगा सेकेगा कौन घड़े और बाजार में लेके बेचने कौन जाएगा और जो बचा हुआ माल है उसको भी बेच के पैसा कौन लाएगा और सीधा कौन लाएगा बच्चों का गुजारा कैसे होगा न कोई पति के लिए रोता है न कोई पत्नी के लिए रोता है रोता है अपनी सुविधाओं के लिए जय जय..
✨️ तो महाराज मैं अब रो रही हूं बोले इतना काम तो हम ही कर देंगे बेटी चिंता मत कर हैं तो महात्मा ज्ञानी लेकिन...जड़वल्लोकम आचरेत्...अज्ञानी के जैसा उनको ये नहीं होता कि मैं ब्रह्मवेत्ता हूं अब ये कैसे होगा मेरे से ये पकड़ नहीं होती ज्ञानी तो अपने सहित सारे विश्व को अपना आत्मा मानते हैं ज्ञानी के भीतर भेद नहीं होता इसलिए उन्हें शांति होती है और अपने लोगों के अंदर भेद होता है इसलिए अपना मन इंद्रियों से अच्छा व्यवहार होता है तो हम हर्ष को प्राप्त होते हैं और मन इंद्रियों से कुछ इधर-उधर का व्यवहार होता है तो हमको शोक होता है हमारे शरीर का मन का कोई आदर करता है तो हम खुशी होते हैं और कोई अनादर करता है या उंगली उठाता है तो हम बेचैन होते हैं क्योंकि हम अपने को देह मानते हैं जय जय हम अपने को देह मानते हैं और फिर दूसरों के प्रति ये अपेक्षा करते हैं कि मेरे से फलाना व्यवहार फलाना आदमी ऐसा व्यवहार करे पत्नी ऐसा चले पुत्र ऐसा चले परिवार ऐसा चले कुटुंबी मेरे से ऐसा चले तो हम एक अपनी मान्यता की एक पोटली सिर पर लेकर घूमते हैं तो हमारी पोटली के अनुसार अगर कोई हमसे आचरण करता है तो वहां हमारा राग हो जाता है जय जय और हमारी मान्यता की गठरिया के खिलाफ कोई व्यवहार या परिस्थितियां आती है तो हमें द्वेष होता है या भय हो जाता है
✨️हमारी मान्यता के खिलाफ अगर कोई परिस्थितियां आ जाती है तो हमें भय होता है और हमारी मान्यता के अनुकूल कोई परिस्थिति आ जाती है तो हमें राग होता है ये राग और द्वेष हमारे चित्त को मलिन करता है जय जय राग भी हमारे चित्त में रेखा डालता है और द्वेष भी हमारे चित्त में रेखा डालता है तो अनुकूलता आती है तो राग की रेखा गहरी होती है और प्रतिकूलता आती है तो द्वेष या भय की रेखा गहरी होती है तो हमारे चित्त में ये रेखाएं पड़ जाती है इसलिए हमारा चित्त स्वस्थ शांत नहीं रहता है
✨️अशांतस्य कुतः सुखम्.. अशांत को सुख कहां संशय वाले को सुख कहां उद्विग्न को सुख कहां मैंने सुनाई थी वो कहानी के कोई जीवन मुक्त महात्मा के चरणों में अद्भुत स्वभाव वाला आदमी पहुंचा बोले महाराज मैं चंबल की घाटी का हूं डाकू हूं आपकी शरण में रखोगे बोले हां ठीक है महाराज मैं दारू पीता हूं बोले कोई बात नहीं महाराज मैं बीड़ी पीता हूं बोले कोई बात नहीं महाराज मैं जुआ खेलता हूं बोले कोई बात नहीं महाराज मैं चरस भी पीता हूं बोले कोई बात नहीं बोले महाराज मैं दुराचार भी करता हूं बोले कोई बात नहीं बोले महाराज मेरे में दुनिया भर के दोष हैं बोले कोई बात नहीं बोले महाराज ये क्या आप सब स्वीकार कर रहे हैं बोले भैया जब सृष्टिकर्ता तुझे अपनी सृष्टि से नहीं निकालता है तो मैं अपनी दृष्टि से तुझे क्यों निकालूं तो जो जीवन मुक्त महात्मा है वे ऐसा नहीं समझते कि मेरा आचरण सही है दूसरे का आचरण गलत है मेरा शरीर पवित्र है शुद्ध है और एकदम मैं ठीक हूं दूसरा गलत मैं ठीक और दूसरा गलत नहीं लेकिन दूसरे को भी मेरा अनुभव समझ में आ जाए ऐसा उनका लक्ष्य होता है इसलिए वो सर्वभूत हिते रता हो जाते हैं हम लोगों का हित उसी में होता है कि हम अपने को समझें हम अपने को नहीं समझेंगे तो कैसी भी परिस्थिति होगी चित्त का राग और द्वेष जाएगा नहीं वस्तुओं से प्राप्त जो सुख है या हमारी मान्यताओं का प्राप्त जो सुख है वो वास्तविक में राग का सुख है आत्मा का सुख नहीं है श्री राम और हमारी इच्छा के खिलाफ जो हो रहा है उससे जो दुख होता है वो वास्तविक में बाहर दुख नहीं है मान्यताएं हमको दुख दे रही है...
*को काहू को नहीं सुख दुख कर दाता*
*निज कृत कर्म ही भोगत ही भ्राता*
✨️हम लोग अपने ही विचार अपनी गठरियां अपने संस्कार तैयार करके सुख की रेखाएं खींच के भी अपने को जंजीर में बांधते हैं और दुख की रेखाएं खींच के अपने को जंजीर में बांधते हैं गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज मन में आ गए कि प्रभु जी सरकार जिस रास्ते से गए यात्रा करने को उसी रास्ते से मैं यात्रा को जाऊं यात्रा करते-करते दंडकारण्य का रास्ता आया सकड़ा रास्ता उस सकड़े रास्ते के पगडंडी के किनारे कोई भोगी आदमी वैश्या के साथ विलास कर रहा था अब वो बीच रास्ते तो आ गए पीछे मुड़ते तो भी उनको संदेह होगा संशय होगा शर्मिंदे होंगे और आगे जाते तब भी भी शर्मिंदे होंगे संदेह होगा और संत ने क्या करा कि अपनी लट्ठी तो थी आंखें बंद कर दी अंधा होने का एक्शन कर लिया लकड़ी ठोक रहे हैं हे भाई भगवान के नाम पर कोई रास्ता दिखा दो दंडकारण्य का वो भोगी आदमी ने देखा कि अच्छा हुआ चलो आ तो रहा था बाबा लेकिन अंधा है बोले महाराज सीधे-सीधे चले जाओ चुपचाप जल्दी से यही रास्ता है जल्दी चले जाओ वो महाराज लकड़ी टेकते-टेकते वो घाटी की झाड़ी से बाहर निकले आंख खोल दी आंख खोली तो सियाराम जी सामने मुस्कुराते हुए मिले बोले प्रभु आप कहां आप इधर कैसे के अरे रे तुलसीदास अपनी मान्यता के अनुसार सब में राम देखने वाले तो लोग मिल जाएंगे लेकिन सज्जन में भगवान देखना तो आसान है लेकिन सब में भगवान जो देखते हैं तुम्हारे जैसे संत जो दुर्जन में भी प्रभु को देख लेते हैं उनको देखने के लिए मैं आ जाता हूं..
✨️ तो ये जरूरी नहीं कि हम जैसा चाहते हैं ऐसा जगत बन जाएगा संभव नहीं है हम जैसा चाहेंगे बेटा ऐसा ही होगा ये संभव नहीं है हम जैसा चाहेंगे पत्नी ऐसी ही होगी ये संभव नहीं है पति ऐसा ही होगा ये संभव नहीं है शिष्य ऐसा ही होगा ये संभव नहीं है गुरु ऐसा ही होगा ये संभव नहीं है हम जैसा चाहते हैं गुरु ऐसा बने ये संभव नहीं है जय जय हम जैसा चाहते हैं सब शिष्य ऐसा बने ये संभव नहीं है ये संभव नहीं ऐसा समझ के भी जितना कुछ उनका हित हो सके ऐसे उनको यात्रा करना कि अपने हृदय को भी खुश रखना और उनका भी कल्याण करना अगर हमने अपनी पकड़ बांध रखी तो हमें दुख होगा भगवान कृष्ण के कुल में पैदा हुए यदुवंश और श्री कृष्ण के होते ही आपस में बोतल पीते हुए युद्ध करके मर गए जय जय सबके अपने-अपने संस्कार होते हैं और जीव अपने संशय संस्कार मान्यताओं के पाश में बंधा है तो ये पाश तब खत्म होती है जब हमारे पुण्य पावरफुल होते हैं हमारे पुण्य जब जोर नहीं करेंगे तो हम निसंशय नहीं हो सकेंगे जितने अंश में संशय है या मान्यताओं का आग्रह है उतने अंश में हमारे पुण्यों की कमजोरी है हमारी मान्यताओं का जोर ज्यादा है पुण्य का जोर कम है पुण्य तो है लेकिन मान्यताओं का इतना जोर है कि पुण्य कमजोर हो रहे हैं तो बुद्धि फल अनाग्रह बुद्धि का फल क्या है कि अनाग्रह..
✨️*हम जगत को ठीक कर सकें ये हमारे हाथ की बात नहीं है हम सबको अन्न वस्त्र दे दें ये हमारे हाथ की बात नहीं है सबको घर दे दें ये हमारे हाथ की बात नहीं है सबको अपनी इच्छा के अनुसार चलाएं ये हमारे हाथ की बात नहीं है लेकिन सब में जो बैठा हुआ परमात्मा असंग निर्लेप नारायण है और ये प्रकृति की लीला है ऐसा समझ के सुखी रहना हमारे हाथ की बात है*... अच्छा ऐसा समझ के सुखी रहना उसका मतलब ये नहीं कि हम आलसी हो जाएं हम प्रमादी हो जाएं कोई भूखा है तो भले भूखा मरे कोई नंगा है और हमारे पास वस्त्र पड़े तो छुपा के रखे नहीं फिर अपना आत्मा देखकर आप उनके हित के लिए यथायोग्य करेंगे लेकिन आपको ये नहीं होगा कि यथायोग्य मैं इनका नहीं करता तो इनका क्या होता मैं इनको वस्त्र नहीं देता बच्चे को नहीं पढ़ाता तो बच्चे का क्या होता मैं फलाने की सेवा नहीं करता तो उसका क्या होता नहीं वो और आप फिर पृथक नहीं रहते जैसे आप अपने शरीर के अंगों को ढकते हैं या अंगों को पोषते हैं तो आपको ऐसा नहीं होता कि आज मैंने अपने पैरों को मजबूत करने के लिए भोजन किया आंखों को रोशनी देने के लिए भोजन किया कानों को सुनने की सत्ता देने के लिए मैंने भोजन किया ये आप रटते नहीं है ये आप सहज करते हैं स्वाभाविक करते हैं फिर आंखों को पोषण आंखों का हित हो जाता है पैरों का हित हो जाता है घुटनों का हित हो जाता है पेट का हित हो जाता है पूरे सारे शरीर रूपी नगर का हित हो जाता है लेकिन आपको ये नहीं होता कि मैं शरीर का हित करता हूं ये अहंकार आपको नहीं आता सहज करते हैं तो आप शरीर के हित में तो रत हैं इसमें तो संदेह नहीं शरीर के हित में तो आप सतत रत हैं फिर भी जो कुछ चाहते हैं वो सब तो शरीर के लिए आप सुविधाएं नहीं पा सकते जितनी कर सकते हैं करते हैं
✨️*तो जैसे आप अपने एक शरीर के साथ हित का व्यवहार करते हैं और जितना कर सकें उतना करते हुए भी आपको अहंकार नहीं होता ऐसे ज्ञानवान सर्व भूतों का हित करता है जितना कर सकता है लेकिन करने का उसे अहंकार नहीं होता जय जय क्योंकि ज्ञानवान महापुरुष जानते हैं कि एक अंतःकरण में ही मैं नहीं और एक अंतःकरण से जो निकला वही मेरा नहीं अपितु एक अंतःकरण क्या अनंत-अनंत अंतःकरणों से निकला वो भी मेरा ही नहीं अपितु अनंत-अनंत अंतःकरण जिसमें कल्पित हैं वो मैं हूं उसी लिए उसको गहराई में कोई हर्ष शोक राग द्वेष भय या अभिनिवेश आदि नहीं होता ये बहुत ऊंची स्थिति है और ये बिना स्मृति के आएगी नहीं*
✨️शास्त्र तो कहता है स्मृति ब्रह्म में रखो उसका मतलब ब्रह्म को स्मरण सुमरण करो ऐसी बात नहीं कि विजातीय व्यवहार विजातीय चिंतन से आदमी बहिर्मुख हो जाता है वृत्ति जाड़ी हो जाती है आदमी तुच्छ हो जाता है इसलिए ब्रह्म का चिंतन करने से विजातीय चिंतन स्मरण छूट जाता है ब्रह्म का स्मरण हकीकत में होता नहीं दूसरे का स्मरण छोड़ने के लिए ब्रह्म के स्मरण का एक अवलंबन मात्र लेना पड़ता है ब्रह्म तो अपना स्वभाव है
वह आदमी निसंशय हो जाता है। जब भय आने लगे, शोक आने लगे, चिंता घेरने लगे या जवाबदारियां घेरने लगे या किसी ने बेवफाई की, अगर आप अपने शरीर को मैं मानेंगे और संसार को सच्चा मानेंगे, आपके पास जो कुछ भी है, उससे आप सुखी नहीं रहेंगे। जय जय। शरीर को मैं मानेंगे, संसार को सच्चा मानेंगे, तो आप सदा सुखी नहीं रह सकते। क्योंकि शरीर को जो मैं माना और संसार को सच्चा माना, तो सब तो तुम्हारे चित्त के अनुसार होगा नहीं और सब एक जैसा रहेगा नहीं।
✨️*हम जो चाहते हैं, वह सब होता नहीं।
जो होता है, वह भाता नहीं और जो भाता है, वह टिकता नहीं। जय जय। हम जो चाहेंगे, वह सब होगा नहीं। और जो होगा, वह सब भाएगा नहीं।* हमारा अंतःकरण है तो दूसरे का भी अंतःकरण अपने ढंग का है, तीसरे का अपने ढंग का, चौथे का अपने ढंग का है। अब हम दुखी क्यों होते हैं कि हमारा आग्रह होता है कि आऊ एने करू दे। छोरे को ऐसा चलना चाहिए, बाप को ऐसा चलना चाहिए, फलाने को ऐसा चलना चाहिए। पत्नी सोचती है कि पति को ऐसा नहीं करना चाहिए, ऐसा करना चाहिए। पति सोचता है कि पत्नी को ऐसा करना चाहिए, पुत्र सोचता है कि पिता को ऐसा करना चाहिए, पड़ोसी बोलता है पड़ोसी को ऐसा करना चाहिए। तो क्या कि हम लोग पर चिंतन में चले जाते हैं। और पर चिंतन होते ही, स्व की शक्ति क्षीण होने लगती है। स्व की शक्ति क्षीण होने लगती है। पर चिंतन छोड़ते ही, स्व की शक्ति जागृत होती है, आकर्षण होता है और प्रीति प्रगट होती है। तो स्व की प्रीति अगर मिल गई, जो अपने आप में तृप्त है, फिर बाहर चाहे कुछ हो, चाहे को नृप हो, हमें क्या हानि। आप अपने आप में तृप्त हैं, तो बाहर की बात आपकी किसी ने मानी तो क्या और नहीं मानी तो क्या।
✨️इसीलिए श्री कृष्ण कहते हैं... संतुष्टः सततम योगी। बाहर की परिस्थितियों से जो संतुष्ट होना चाहते हैं, वह भोगी है। जो अपनी समझ या अपनी स्मृति का सदुपयोग करके संतुष्ट रहते हैं, वह योगी हैं।
*संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः ।*
*मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥*
✨️उन्होंने मन और बुद्धि मुझ में अर्पित कर दिया। हम लोग क्या करते हैं, मन और बुद्धि हमारी मान्यताओं में अर्पित कर देते हैं। मन और बुद्धि दूसरों की मान्यताओं में अर्पित कर देते हैं। लोगों की नजर में हम भले दिखें। हजार-हजार बुद्धि वालों या हजार-हजार विचार वाले, हजार मुखी संसार को आप सबको संतुष्ट नहीं कर सकते। आप कैसा भी आचरण बनाएं, कैसा भी शरीर बनाएं, कैसा भी व्यवहार बनाएं, लेकिन सब आपसे संतुष्ट नहीं हो सकते। अगर हो गए हैं तो कृपा करके दर्शन दीजिए, उठ जाए कि आपसे सब संतुष्ट है, आप खड़े हो जाए। जय जय। क्योंकि सब अपने-अपने ढंग की मान्यता से जीते हैं। और उनकी जिस वक्त जैसी मान्यता होती है, ऐसा आपके प्रति उनका श्रद्धा, अश्रद्धा, राग, द्वेष, अपना परायापन भाव आ जाता है उन विचारों का। तो उन पर विशेष कृपा करो। बच्चे का भाव आपके प्रति नाराजगी का आ गया तो उस वक्त उसका विचार ऐसा हो गया। उसका भाव आपके प्रति धन्यवाद का आ गया तो उसका भाव उस वक्त ऐसा है। वह आप में श्रद्धा करता है, इसलिए आप बड़े हो जाते हैं तो आप गलती करते हैं। और वह आप में नफरत करते हैं और आप छोटे हो जाते हैं तो नारायण आप गलती करते हैं। जय जय।
✨️तो लोग कुछ 5, 25, 100, 200, 50, 25 अच्छे-बुरे आदमी आपकी वाहवाही करें तो आप बड़े हो जाए और कोई आपकी निंदा करें तो आप छोटे हो गए तो आप अपने में नहीं आए। श्री राम। आप निसंशय नहीं हुए। आप जितात्मा नहीं हुए। आप प्रशांत आत्मा नहीं हुए। आप ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित नहीं हुए। जैसे ब्रह्मचारी एकांकी रहता है, अकेले में रहता है। एकांकी और अकेले में रहने से ब्रह्मचर्य व्रत की रक्षा होती है। अधिक संपर्क में ब्रह्मचर्य व्रत का नाश होता है। ब्रह्मचर्य एक तो स्पर्श का है, आंखों का, कान का, इंद्रियों का संयम, ब्रह्म में विचरण करे हमारा मन, वह ब्रह्मचर्य है। तो जैसे ब्रह्मचारी व्रते स्थिता, ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित होता है योगी, वह संतुष्ट होता है। निष्पाप हो जाता है। एक बार उस परमात्मा को जान लिया और निसंशय रह गया। फिर अगर व्यवहार में आया तो व्यवहार में तो जो होगा होगा। तो फिर व्यवहार में वह ज्ञानी अपने को कोई विशेष मानकर अंदर से नहीं रहता। ज्ञानी का अज्ञानी का खान-पान, शयन, उठ-बैठ, हेल-चाल सब ऐसे का ऐसा दिखेगा। लेकिन अज्ञानी की अंदर की समझ और ज्ञानी की समझ में फेर हो जाएगा। अज्ञानी तो समझेगा वह ज्ञानी है। अब महान है। लेकिन ज्ञानी अंदर से यह नहीं समझेगा कि मैं इतना सा ही महान हूं। जय जय।
*लभते ब्रह्म निर्वाणम् ऋषयः क्षीणकल्मषा।*
✨️जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गए। जो संपूर्ण प्राणियों के हित में रत है। अब होता क्या है, कि ज्ञान होने में सांख्य के मार्ग से तत्व ज्ञान होने में अड़चन यह आती है कि देह में प्रीति होती है। अपने देह में प्रीति होती है प्राणी मात्र की। इसीलिए तत्व ज्ञान नहीं होता जल्दी। और तत्व ज्ञान हुए बिना सब संशय दूर नहीं होते। दृष्टा-दृश्य का विवेक करके, साक्षित्व का विवेक करके, बिना वेदांत के भी इतना विवेक तो आदमी कर सकता है। विविध तत्व बोध के लिए साक्ष्य और साक्षी से भी आगे, साक्ष्य और साक्षी, दृष्टा और दृश्य, दृष्टा भी दृश्य की अपेक्षा है। सत्य तो एक कदम और आगे जाओ, उसके लिए वेदांत चाहिए। वेदांत का ज्ञान चाहिए। वेदांत निष्ठ महापुरुषों का थोड़ा प्रसाद चाहिए।
✨️अकेले में रहकर कितनी भी समाधि करो, जितेंद्रिय हो गया, ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित हो गया। लेकिन एक अंतःकरण में अहम प्रत्यय रहेगा। मैं इसको छोड़ दूं, उसको छोड़ दूं, नर्मदा किनारे जाऊं, तपस्या करूं, एकांत में रहूं, भगवान का ध्यान करूं। मैं बड़ा खुश रहा नर्मदा किनारे। तपस्या की, भगवान का ध्यान किया, एकांत में रहा। लेकिन वहां भी मच्छी मार आ जाएगा क्या, आ बलानु क्या दर्शन थे। अब मछुआरन आ जाएगी, मच्छी मार आ जाएंगे। साधक उठा, बिखरे थे केसा राग द्वेष ना किंचित लेसा। सरल लोगों ने साधु जाना, हत्यारों ने काल ही माना। भैरव जान दुष्ट घबराए, पहलवान जो मल ही पाए। अब नर्मदा किनारे झाड़ी जंगल में एकांत में रहने पर भी यह सब हो सकता है। उस वक्त तो यह रोना आएगा कि भगवान हम तो तेरी बंदगी करते हैं और ऐसा कर दिया, हाय रे हाय। फिर हम दुखी हो सकते हैं। क्योंकि समझ नहीं है ना। तत्व ज्ञान जब तक नहीं है, तो दुनिया के किसी कोने में चले जाओ। कैसी भी अवस्था में डाल दो अपने को। लेकिन देह की परिच्छिन्नता तो बनी रहेगी लाला। देह की परिच्छिन्नता जब तक बनी रहेगी, चाहे कितना धन रख ले, चाहे कितनी सत्ता रख ले, चाहे कितना परिचय रख ले, चाहे कितने पदार्थ रख ले, चाहे कितनी एकाग्रता रख ले। लेकिन देह एक देह में मैं है, तब तक द्वैत जिंदा रहेगा। अद्वितीया द्वैत भयं भवति। जब तक दूसरा दिखता रहेगा ना, तब तक भय रहेगा।
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