Ishwar Ki Aur

Ishwar Ki Aur ईश्वर के सिवाय कहीं भी मन लगाया तो अंत में रोना ही पड़ेगा। Can Also Follow On Telegram And Instagram

20/05/2026

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🌹 *20.05.26* 🌹
💠 *सुबह संध्या सत्संग* 💠
🏵️ *पूज्यश्री के अनमोल वचन*🏵️

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🌼 *लभते ब्रह्म निर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।*
🌼 *छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥*

✨️जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गए हैं जो संपूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चल भाव से परमात्मा में स्थित है वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं. भगवत गीता के पांचवें अध्याय का 25वां श्लोक है.

🌼 *लभते ब्रह्म निर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।*
🌼 *छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥*


✨️सब पाप नष्ट हुए बिना ब्रह्मनिष्ठा होती नहीं सब पाप नष्ट हुए जिनके उनको सब उनको ज्ञान के द्वारा सब संशय निवृत्त हो जाते हैं और संपूर्ण प्राणियों के हित में रत होते हैं ऐसा भगवान कहते हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चल भाव से परमात्मा में स्थित है वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं ओम ओम ओम ओम ओम

✨️सब पाप नष्ट होने का सौभाग्य जिनको मिल जाता है वे संशय रहित होते हैं वैतथ्य प्रकरण है मांडूक्य उपनिषद में.. कि ब्रह्म साक्षात्कार करके वो ज्ञानी कैसा रहे.. जड़वत्लोकम आचरेत्.. लोगों में जड़ जैसा रहे अज्ञानियों की नाई रहे.. चार आदमियों ने भांग पी ली भांग के नशे में चारों ही चूर हुए हैं एक आदमी नशा होने से उठपटांग बोलने लग गया दूसरा आदमी गाना गाने लग गया तीसरा आदमी नाचने लग गया नशे में और चौथा आदमी प्रगाढ़ निद्रा में सो गया नशा तो सबका एक जैसा था लेकिन नशा एक जैसा होते हुए भी चित्त के जैसे-जैसे संस्कार थे ऐसी-ऐसी चेष्टा हुई उसे जिनके सब पाप अलविदा हो गए वे अपने परमात्म स्वभाव में आत्म स्वभाव में निसंशय हो जाते हैं लौकिक आचरण व्यवहार खानपान से ज्ञानी को मापा नहीं जाता वेशभूषा से आपको ज्ञान हुआ कि नहीं हुआ उससे भी नहीं मापा जाता लेकिन आप अपने आप को माप सकते हैं कैसे जिनके जिस जिसके सब पाप नष्ट हो गए हैं जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गए हैं जो संपूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चल भाव से परमात्मा में स्थित है वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को पाते हैं निश्चल भाव से जिनका मन ब्रह्म परमात्मा में स्थित है जिनके सब संशय निवृत्त हो गए वे शांत ब्रह्म को पाते हैं

✨️स्कंद पुराण में कथा आती है कि एक महात्मा जी थे भिक्षा करने को गए जीवन मुक्त थे एक कुम्हारन रो रही थी महात्मा ने पूछा क्यों रोती है बोले महाराज मेरे पति देव हो गए बोले न कोई मारता है न कोई जीता है ये तो भ्रांति मात्र है पति मरना मेरा पति ये सुन-सुन के मान लिया तूने सब पांच भूत हैं और पांच भूत माया मात्र है भ्रम मात्र है क्षिति ब्रह्म जल ब्रह्म पावक ब्रह्म सब भ्रम ही भ्रम है ऐसा पृथ्वी भ्रांति मात्र है सत्य नहीं है जल भ्रांति मात्र है तेज भ्रांति मात्र है वायु भ्रांति मात्र है आकाश भ्रांति मात्र है उनसे बने हुए पुतले भ्रांति मात्र था कौन किसका पति कौन किसकी पत्नी क्या रो रही है जीवन मुक्त महात्मा का तो अनुभव अपने ढंग का है लेकिन वो कुम्हारन तो बेचारी अपनी दृष्टि से जी रही है बोले महाराज ये ज्ञान तो आप ही जानो लेकिन मैं तो उसको रोती हूं कि अब मिट्टी कौन लाएगा..पति चले गए तो मिट्टी कौन लाएगा और रौंदेगा कौन मेरे से रौंदी नहीं जाएगी फिर चाक पे कौन चढ़ाएगा और घड़े कौन बनाएगा सेकेगा कौन घड़े और बाजार में लेके बेचने कौन जाएगा और जो बचा हुआ माल है उसको भी बेच के पैसा कौन लाएगा और सीधा कौन लाएगा बच्चों का गुजारा कैसे होगा न कोई पति के लिए रोता है न कोई पत्नी के लिए रोता है रोता है अपनी सुविधाओं के लिए जय जय..

✨️ तो महाराज मैं अब रो रही हूं बोले इतना काम तो हम ही कर देंगे बेटी चिंता मत कर हैं तो महात्मा ज्ञानी लेकिन...जड़वल्लोकम आचरेत्...अज्ञानी के जैसा उनको ये नहीं होता कि मैं ब्रह्मवेत्ता हूं अब ये कैसे होगा मेरे से ये पकड़ नहीं होती ज्ञानी तो अपने सहित सारे विश्व को अपना आत्मा मानते हैं ज्ञानी के भीतर भेद नहीं होता इसलिए उन्हें शांति होती है और अपने लोगों के अंदर भेद होता है इसलिए अपना मन इंद्रियों से अच्छा व्यवहार होता है तो हम हर्ष को प्राप्त होते हैं और मन इंद्रियों से कुछ इधर-उधर का व्यवहार होता है तो हमको शोक होता है हमारे शरीर का मन का कोई आदर करता है तो हम खुशी होते हैं और कोई अनादर करता है या उंगली उठाता है तो हम बेचैन होते हैं क्योंकि हम अपने को देह मानते हैं जय जय हम अपने को देह मानते हैं और फिर दूसरों के प्रति ये अपेक्षा करते हैं कि मेरे से फलाना व्यवहार फलाना आदमी ऐसा व्यवहार करे पत्नी ऐसा चले पुत्र ऐसा चले परिवार ऐसा चले कुटुंबी मेरे से ऐसा चले तो हम एक अपनी मान्यता की एक पोटली सिर पर लेकर घूमते हैं तो हमारी पोटली के अनुसार अगर कोई हमसे आचरण करता है तो वहां हमारा राग हो जाता है जय जय और हमारी मान्यता की गठरिया के खिलाफ कोई व्यवहार या परिस्थितियां आती है तो हमें द्वेष होता है या भय हो जाता है

✨️हमारी मान्यता के खिलाफ अगर कोई परिस्थितियां आ जाती है तो हमें भय होता है और हमारी मान्यता के अनुकूल कोई परिस्थिति आ जाती है तो हमें राग होता है ये राग और द्वेष हमारे चित्त को मलिन करता है जय जय राग भी हमारे चित्त में रेखा डालता है और द्वेष भी हमारे चित्त में रेखा डालता है तो अनुकूलता आती है तो राग की रेखा गहरी होती है और प्रतिकूलता आती है तो द्वेष या भय की रेखा गहरी होती है तो हमारे चित्त में ये रेखाएं पड़ जाती है इसलिए हमारा चित्त स्वस्थ शांत नहीं रहता है

✨️अशांतस्य कुतः सुखम्.. अशांत को सुख कहां संशय वाले को सुख कहां उद्विग्न को सुख कहां मैंने सुनाई थी वो कहानी के कोई जीवन मुक्त महात्मा के चरणों में अद्भुत स्वभाव वाला आदमी पहुंचा बोले महाराज मैं चंबल की घाटी का हूं डाकू हूं आपकी शरण में रखोगे बोले हां ठीक है महाराज मैं दारू पीता हूं बोले कोई बात नहीं महाराज मैं बीड़ी पीता हूं बोले कोई बात नहीं महाराज मैं जुआ खेलता हूं बोले कोई बात नहीं महाराज मैं चरस भी पीता हूं बोले कोई बात नहीं बोले महाराज मैं दुराचार भी करता हूं बोले कोई बात नहीं बोले महाराज मेरे में दुनिया भर के दोष हैं बोले कोई बात नहीं बोले महाराज ये क्या आप सब स्वीकार कर रहे हैं बोले भैया जब सृष्टिकर्ता तुझे अपनी सृष्टि से नहीं निकालता है तो मैं अपनी दृष्टि से तुझे क्यों निकालूं तो जो जीवन मुक्त महात्मा है वे ऐसा नहीं समझते कि मेरा आचरण सही है दूसरे का आचरण गलत है मेरा शरीर पवित्र है शुद्ध है और एकदम मैं ठीक हूं दूसरा गलत मैं ठीक और दूसरा गलत नहीं लेकिन दूसरे को भी मेरा अनुभव समझ में आ जाए ऐसा उनका लक्ष्य होता है इसलिए वो सर्वभूत हिते रता हो जाते हैं हम लोगों का हित उसी में होता है कि हम अपने को समझें हम अपने को नहीं समझेंगे तो कैसी भी परिस्थिति होगी चित्त का राग और द्वेष जाएगा नहीं वस्तुओं से प्राप्त जो सुख है या हमारी मान्यताओं का प्राप्त जो सुख है वो वास्तविक में राग का सुख है आत्मा का सुख नहीं है श्री राम और हमारी इच्छा के खिलाफ जो हो रहा है उससे जो दुख होता है वो वास्तविक में बाहर दुख नहीं है मान्यताएं हमको दुख दे रही है...

*को काहू को नहीं सुख दुख कर दाता*
*निज कृत कर्म ही भोगत ही भ्राता*

✨️हम लोग अपने ही विचार अपनी गठरियां अपने संस्कार तैयार करके सुख की रेखाएं खींच के भी अपने को जंजीर में बांधते हैं और दुख की रेखाएं खींच के अपने को जंजीर में बांधते हैं गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज मन में आ गए कि प्रभु जी सरकार जिस रास्ते से गए यात्रा करने को उसी रास्ते से मैं यात्रा को जाऊं यात्रा करते-करते दंडकारण्य का रास्ता आया सकड़ा रास्ता उस सकड़े रास्ते के पगडंडी के किनारे कोई भोगी आदमी वैश्या के साथ विलास कर रहा था अब वो बीच रास्ते तो आ गए पीछे मुड़ते तो भी उनको संदेह होगा संशय होगा शर्मिंदे होंगे और आगे जाते तब भी भी शर्मिंदे होंगे संदेह होगा और संत ने क्या करा कि अपनी लट्ठी तो थी आंखें बंद कर दी अंधा होने का एक्शन कर लिया लकड़ी ठोक रहे हैं हे भाई भगवान के नाम पर कोई रास्ता दिखा दो दंडकारण्य का वो भोगी आदमी ने देखा कि अच्छा हुआ चलो आ तो रहा था बाबा लेकिन अंधा है बोले महाराज सीधे-सीधे चले जाओ चुपचाप जल्दी से यही रास्ता है जल्दी चले जाओ वो महाराज लकड़ी टेकते-टेकते वो घाटी की झाड़ी से बाहर निकले आंख खोल दी आंख खोली तो सियाराम जी सामने मुस्कुराते हुए मिले बोले प्रभु आप कहां आप इधर कैसे के अरे रे तुलसीदास अपनी मान्यता के अनुसार सब में राम देखने वाले तो लोग मिल जाएंगे लेकिन सज्जन में भगवान देखना तो आसान है लेकिन सब में भगवान जो देखते हैं तुम्हारे जैसे संत जो दुर्जन में भी प्रभु को देख लेते हैं उनको देखने के लिए मैं आ जाता हूं..

✨️ तो ये जरूरी नहीं कि हम जैसा चाहते हैं ऐसा जगत बन जाएगा संभव नहीं है हम जैसा चाहेंगे बेटा ऐसा ही होगा ये संभव नहीं है हम जैसा चाहेंगे पत्नी ऐसी ही होगी ये संभव नहीं है पति ऐसा ही होगा ये संभव नहीं है शिष्य ऐसा ही होगा ये संभव नहीं है गुरु ऐसा ही होगा ये संभव नहीं है हम जैसा चाहते हैं गुरु ऐसा बने ये संभव नहीं है जय जय हम जैसा चाहते हैं सब शिष्य ऐसा बने ये संभव नहीं है ये संभव नहीं ऐसा समझ के भी जितना कुछ उनका हित हो सके ऐसे उनको यात्रा करना कि अपने हृदय को भी खुश रखना और उनका भी कल्याण करना अगर हमने अपनी पकड़ बांध रखी तो हमें दुख होगा भगवान कृष्ण के कुल में पैदा हुए यदुवंश और श्री कृष्ण के होते ही आपस में बोतल पीते हुए युद्ध करके मर गए जय जय सबके अपने-अपने संस्कार होते हैं और जीव अपने संशय संस्कार मान्यताओं के पाश में बंधा है तो ये पाश तब खत्म होती है जब हमारे पुण्य पावरफुल होते हैं हमारे पुण्य जब जोर नहीं करेंगे तो हम निसंशय नहीं हो सकेंगे जितने अंश में संशय है या मान्यताओं का आग्रह है उतने अंश में हमारे पुण्यों की कमजोरी है हमारी मान्यताओं का जोर ज्यादा है पुण्य का जोर कम है पुण्य तो है लेकिन मान्यताओं का इतना जोर है कि पुण्य कमजोर हो रहे हैं तो बुद्धि फल अनाग्रह बुद्धि का फल क्या है कि अनाग्रह..

✨️*हम जगत को ठीक कर सकें ये हमारे हाथ की बात नहीं है हम सबको अन्न वस्त्र दे दें ये हमारे हाथ की बात नहीं है सबको घर दे दें ये हमारे हाथ की बात नहीं है सबको अपनी इच्छा के अनुसार चलाएं ये हमारे हाथ की बात नहीं है लेकिन सब में जो बैठा हुआ परमात्मा असंग निर्लेप नारायण है और ये प्रकृति की लीला है ऐसा समझ के सुखी रहना हमारे हाथ की बात है*... अच्छा ऐसा समझ के सुखी रहना उसका मतलब ये नहीं कि हम आलसी हो जाएं हम प्रमादी हो जाएं कोई भूखा है तो भले भूखा मरे कोई नंगा है और हमारे पास वस्त्र पड़े तो छुपा के रखे नहीं फिर अपना आत्मा देखकर आप उनके हित के लिए यथायोग्य करेंगे लेकिन आपको ये नहीं होगा कि यथायोग्य मैं इनका नहीं करता तो इनका क्या होता मैं इनको वस्त्र नहीं देता बच्चे को नहीं पढ़ाता तो बच्चे का क्या होता मैं फलाने की सेवा नहीं करता तो उसका क्या होता नहीं वो और आप फिर पृथक नहीं रहते जैसे आप अपने शरीर के अंगों को ढकते हैं या अंगों को पोषते हैं तो आपको ऐसा नहीं होता कि आज मैंने अपने पैरों को मजबूत करने के लिए भोजन किया आंखों को रोशनी देने के लिए भोजन किया कानों को सुनने की सत्ता देने के लिए मैंने भोजन किया ये आप रटते नहीं है ये आप सहज करते हैं स्वाभाविक करते हैं फिर आंखों को पोषण आंखों का हित हो जाता है पैरों का हित हो जाता है घुटनों का हित हो जाता है पेट का हित हो जाता है पूरे सारे शरीर रूपी नगर का हित हो जाता है लेकिन आपको ये नहीं होता कि मैं शरीर का हित करता हूं ये अहंकार आपको नहीं आता सहज करते हैं तो आप शरीर के हित में तो रत हैं इसमें तो संदेह नहीं शरीर के हित में तो आप सतत रत हैं फिर भी जो कुछ चाहते हैं वो सब तो शरीर के लिए आप सुविधाएं नहीं पा सकते जितनी कर सकते हैं करते हैं

✨️*तो जैसे आप अपने एक शरीर के साथ हित का व्यवहार करते हैं और जितना कर सकें उतना करते हुए भी आपको अहंकार नहीं होता ऐसे ज्ञानवान सर्व भूतों का हित करता है जितना कर सकता है लेकिन करने का उसे अहंकार नहीं होता जय जय क्योंकि ज्ञानवान महापुरुष जानते हैं कि एक अंतःकरण में ही मैं नहीं और एक अंतःकरण से जो निकला वही मेरा नहीं अपितु एक अंतःकरण क्या अनंत-अनंत अंतःकरणों से निकला वो भी मेरा ही नहीं अपितु अनंत-अनंत अंतःकरण जिसमें कल्पित हैं वो मैं हूं उसी लिए उसको गहराई में कोई हर्ष शोक राग द्वेष भय या अभिनिवेश आदि नहीं होता ये बहुत ऊंची स्थिति है और ये बिना स्मृति के आएगी नहीं*

✨️शास्त्र तो कहता है स्मृति ब्रह्म में रखो उसका मतलब ब्रह्म को स्मरण सुमरण करो ऐसी बात नहीं कि विजातीय व्यवहार विजातीय चिंतन से आदमी बहिर्मुख हो जाता है वृत्ति जाड़ी हो जाती है आदमी तुच्छ हो जाता है इसलिए ब्रह्म का चिंतन करने से विजातीय चिंतन स्मरण छूट जाता है ब्रह्म का स्मरण हकीकत में होता नहीं दूसरे का स्मरण छोड़ने के लिए ब्रह्म के स्मरण का एक अवलंबन मात्र लेना पड़ता है ब्रह्म तो अपना स्वभाव है
वह आदमी निसंशय हो जाता है। जब भय आने लगे, शोक आने लगे, चिंता घेरने लगे या जवाबदारियां घेरने लगे या किसी ने बेवफाई की, अगर आप अपने शरीर को मैं मानेंगे और संसार को सच्चा मानेंगे, आपके पास जो कुछ भी है, उससे आप सुखी नहीं रहेंगे। जय जय। शरीर को मैं मानेंगे, संसार को सच्चा मानेंगे, तो आप सदा सुखी नहीं रह सकते। क्योंकि शरीर को जो मैं माना और संसार को सच्चा माना, तो सब तो तुम्हारे चित्त के अनुसार होगा नहीं और सब एक जैसा रहेगा नहीं।

✨️*हम जो चाहते हैं, वह सब होता नहीं।
जो होता है, वह भाता नहीं और जो भाता है, वह टिकता नहीं। जय जय। हम जो चाहेंगे, वह सब होगा नहीं। और जो होगा, वह सब भाएगा नहीं।* हमारा अंतःकरण है तो दूसरे का भी अंतःकरण अपने ढंग का है, तीसरे का अपने ढंग का, चौथे का अपने ढंग का है। अब हम दुखी क्यों होते हैं कि हमारा आग्रह होता है कि आऊ एने करू दे। छोरे को ऐसा चलना चाहिए, बाप को ऐसा चलना चाहिए, फलाने को ऐसा चलना चाहिए। पत्नी सोचती है कि पति को ऐसा नहीं करना चाहिए, ऐसा करना चाहिए। पति सोचता है कि पत्नी को ऐसा करना चाहिए, पुत्र सोचता है कि पिता को ऐसा करना चाहिए, पड़ोसी बोलता है पड़ोसी को ऐसा करना चाहिए। तो क्या कि हम लोग पर चिंतन में चले जाते हैं। और पर चिंतन होते ही, स्व की शक्ति क्षीण होने लगती है। स्व की शक्ति क्षीण होने लगती है। पर चिंतन छोड़ते ही, स्व की शक्ति जागृत होती है, आकर्षण होता है और प्रीति प्रगट होती है। तो स्व की प्रीति अगर मिल गई, जो अपने आप में तृप्त है, फिर बाहर चाहे कुछ हो, चाहे को नृप हो, हमें क्या हानि। आप अपने आप में तृप्त हैं, तो बाहर की बात आपकी किसी ने मानी तो क्या और नहीं मानी तो क्या।

✨️इसीलिए श्री कृष्ण कहते हैं... संतुष्टः सततम योगी। बाहर की परिस्थितियों से जो संतुष्ट होना चाहते हैं, वह भोगी है। जो अपनी समझ या अपनी स्मृति का सदुपयोग करके संतुष्ट रहते हैं, वह योगी हैं।

*संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः ।*
*मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥*

✨️उन्होंने मन और बुद्धि मुझ में अर्पित कर दिया। हम लोग क्या करते हैं, मन और बुद्धि हमारी मान्यताओं में अर्पित कर देते हैं। मन और बुद्धि दूसरों की मान्यताओं में अर्पित कर देते हैं। लोगों की नजर में हम भले दिखें। हजार-हजार बुद्धि वालों या हजार-हजार विचार वाले, हजार मुखी संसार को आप सबको संतुष्ट नहीं कर सकते। आप कैसा भी आचरण बनाएं, कैसा भी शरीर बनाएं, कैसा भी व्यवहार बनाएं, लेकिन सब आपसे संतुष्ट नहीं हो सकते। अगर हो गए हैं तो कृपा करके दर्शन दीजिए, उठ जाए कि आपसे सब संतुष्ट है, आप खड़े हो जाए। जय जय। क्योंकि सब अपने-अपने ढंग की मान्यता से जीते हैं। और उनकी जिस वक्त जैसी मान्यता होती है, ऐसा आपके प्रति उनका श्रद्धा, अश्रद्धा, राग, द्वेष, अपना परायापन भाव आ जाता है उन विचारों का। तो उन पर विशेष कृपा करो। बच्चे का भाव आपके प्रति नाराजगी का आ गया तो उस वक्त उसका विचार ऐसा हो गया। उसका भाव आपके प्रति धन्यवाद का आ गया तो उसका भाव उस वक्त ऐसा है। वह आप में श्रद्धा करता है, इसलिए आप बड़े हो जाते हैं तो आप गलती करते हैं। और वह आप में नफरत करते हैं और आप छोटे हो जाते हैं तो नारायण आप गलती करते हैं। जय जय।

✨️तो लोग कुछ 5, 25, 100, 200, 50, 25 अच्छे-बुरे आदमी आपकी वाहवाही करें तो आप बड़े हो जाए और कोई आपकी निंदा करें तो आप छोटे हो गए तो आप अपने में नहीं आए। श्री राम। आप निसंशय नहीं हुए। आप जितात्मा नहीं हुए। आप प्रशांत आत्मा नहीं हुए। आप ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित नहीं हुए। जैसे ब्रह्मचारी एकांकी रहता है, अकेले में रहता है। एकांकी और अकेले में रहने से ब्रह्मचर्य व्रत की रक्षा होती है। अधिक संपर्क में ब्रह्मचर्य व्रत का नाश होता है। ब्रह्मचर्य एक तो स्पर्श का है, आंखों का, कान का, इंद्रियों का संयम, ब्रह्म में विचरण करे हमारा मन, वह ब्रह्मचर्य है। तो जैसे ब्रह्मचारी व्रते स्थिता, ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित होता है योगी, वह संतुष्ट होता है। निष्पाप हो जाता है। एक बार उस परमात्मा को जान लिया और निसंशय रह गया। फिर अगर व्यवहार में आया तो व्यवहार में तो जो होगा होगा। तो फिर व्यवहार में वह ज्ञानी अपने को कोई विशेष मानकर अंदर से नहीं रहता। ज्ञानी का अज्ञानी का खान-पान, शयन, उठ-बैठ, हेल-चाल सब ऐसे का ऐसा दिखेगा। लेकिन अज्ञानी की अंदर की समझ और ज्ञानी की समझ में फेर हो जाएगा। अज्ञानी तो समझेगा वह ज्ञानी है। अब महान है। लेकिन ज्ञानी अंदर से यह नहीं समझेगा कि मैं इतना सा ही महान हूं। जय जय।

*लभते ब्रह्म निर्वाणम् ऋषयः क्षीणकल्मषा।*

✨️जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गए। जो संपूर्ण प्राणियों के हित में रत है। अब होता क्या है, कि ज्ञान होने में सांख्य के मार्ग से तत्व ज्ञान होने में अड़चन यह आती है कि देह में प्रीति होती है। अपने देह में प्रीति होती है प्राणी मात्र की। इसीलिए तत्व ज्ञान नहीं होता जल्दी। और तत्व ज्ञान हुए बिना सब संशय दूर नहीं होते। दृष्टा-दृश्य का विवेक करके, साक्षित्व का विवेक करके, बिना वेदांत के भी इतना विवेक तो आदमी कर सकता है। विविध तत्व बोध के लिए साक्ष्य और साक्षी से भी आगे, साक्ष्य और साक्षी, दृष्टा और दृश्य, दृष्टा भी दृश्य की अपेक्षा है। सत्य तो एक कदम और आगे जाओ, उसके लिए वेदांत चाहिए। वेदांत का ज्ञान चाहिए। वेदांत निष्ठ महापुरुषों का थोड़ा प्रसाद चाहिए।

✨️अकेले में रहकर कितनी भी समाधि करो, जितेंद्रिय हो गया, ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित हो गया। लेकिन एक अंतःकरण में अहम प्रत्यय रहेगा। मैं इसको छोड़ दूं, उसको छोड़ दूं, नर्मदा किनारे जाऊं, तपस्या करूं, एकांत में रहूं, भगवान का ध्यान करूं। मैं बड़ा खुश रहा नर्मदा किनारे। तपस्या की, भगवान का ध्यान किया, एकांत में रहा। लेकिन वहां भी मच्छी मार आ जाएगा क्या, आ बलानु क्या दर्शन थे। अब मछुआरन आ जाएगी, मच्छी मार आ जाएंगे। साधक उठा, बिखरे थे केसा राग द्वेष ना किंचित लेसा। सरल लोगों ने साधु जाना, हत्यारों ने काल ही माना। भैरव जान दुष्ट घबराए, पहलवान जो मल ही पाए। अब नर्मदा किनारे झाड़ी जंगल में एकांत में रहने पर भी यह सब हो सकता है। उस वक्त तो यह रोना आएगा कि भगवान हम तो तेरी बंदगी करते हैं और ऐसा कर दिया, हाय रे हाय। फिर हम दुखी हो सकते हैं। क्योंकि समझ नहीं है ना। तत्व ज्ञान जब तक नहीं है, तो दुनिया के किसी कोने में चले जाओ। कैसी भी अवस्था में डाल दो अपने को। लेकिन देह की परिच्छिन्नता तो बनी रहेगी लाला। देह की परिच्छिन्नता जब तक बनी रहेगी, चाहे कितना धन रख ले, चाहे कितनी सत्ता रख ले, चाहे कितना परिचय रख ले, चाहे कितने पदार्थ रख ले, चाहे कितनी एकाग्रता रख ले। लेकिन देह एक देह में मैं है, तब तक द्वैत जिंदा रहेगा। अद्वितीया द्वैत भयं भवति। जब तक दूसरा दिखता रहेगा ना, तब तक भय रहेगा।

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19/05/2026

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🌹 *19.05.26* 🌹
💠 *सुबह संध्या सत्संग* 💠
🏵️ *पूज्यश्री के अनमोल वचन*🏵️

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✨️मन में डूबते जाएंगे वही ज्ञान वही सच्चिदानंद इस सत्ता से मन का स्फुरणा होता है। मन के स्फुरणा और संस्कारों के अनुसार शरीर बनते हैं। प्रारब्ध बनता है। जिसका जैसा प्रारब्ध ऐसा अन्न जल लेकर जीव फिर विदा होता है, शरीर छोड़ता है। फिर पैदा होता है, फिर संसार में विचरण करता है। फिर चलता जाता है। ऐसे इस जीव के बेचारे के शरीरों का अंत नहीं। मन के स्फुरणे के कारण अनंत-अनंत योनियों में भटकता है, घूमता है। मनुष्य जन्म मिलता है। मन के स्फुरणे को स्फुरणा समझकर स्फुरणा जहां से उत्पन्न होता है उस आत्म आत्मा में विश्रांति पा ले। अपूर्व आत्मा जो ज्ञान स्वरूप है उसको मैं रूप में जान ले। तो मनुष्य का जन्म-मरण चक्र समाप्त हो जाता है। मन में स्फुरण होता है ये अच्छा है तो अच्छा दिखता है। ये खाना है, ये पीना है, ये भोगना है सब स्फुरणा है। रात को मन सो जाता है तो सब शांत। ऐसे ही ध्यान भजन से मन अगर परमात्मा में चला जाए तो भी परम शांति और अंदर का रस आने लगता है।

*सौभाग्य मनुष्य कृतार्थानृप निश्चया।*
*स्मरंति स्मारयंति हरे नामियो कलयुगे।*

✨️वे सचमुच में भाग्यशाली हैं। जो हरि हर जो पाप ताप को स्फुरणे के प्रभाव को हर ले। ऐसे भगवान हरि का स्मरण करते करवाते हैं। अथवा जो उस रास्ते चलते हैं तो इस मन की चाल ढाल को जान लेते हैं। दुःख कब होता है जब मन में वासना बनती है, आग्रह बनता है। ऐसा ही हो। ये मिले और ये ना मिले, ये पाएं, ये खाएं, ये भोगें। नहीं तो तेरी मर्जी पूर्ण हो। बंगला मिला तो वाह-वाह, झोपड़ा मिला तो वाह-वाह, शरीर मिला तो वाह-वाह, शरीर छूटा तो वाह-वाह, नया शरीर मिला तो वाह-वाह। वाह-वाह, वाह-वाह, गुरु वाह गुरु करते वाह गुरु जो शब्द चल पड़ा। गु माना अंधकार, रु माना प्रकाश। अविद्या अंधकार को मिटाकर आत्म प्रकाश दे। कि शरीर के पैदा होने और मिटने से मेरा कुछ भी नहीं बदलता मिटता। शरीर मोटा हो चाहे पतला हो, शरीर तो शरीर अक्ष्यतेति शरीरः। जो जीवनशील ना होने के रास्ते चलता जाए। कोई आज गया, कोई कल गया, कोई जावन को तैयार खड़ा तो ये शरीर तो पैदा हो-हो के जैसे बुलबुले पानी में पैदा हो-हो के लीन हो जाते हैं। ऐसे ही शरीर पैदा हो-हो के लीन हो जाते हैं। लीन होने का निमित्त चाहे कुछ भी बन जाए। हार्ट अटैक बन जाए, एक्सीडेंट बन जाए, बुखार बन जाए, बीमारी बन जाए। शरीर पैदा हुए हो मरने के लिए ही पैदा हुए हैं। कबीर जी ने कहा, "ये तन काचा कुंभ है, फूटत ना लागे बार। फट का लागे फूटी पड़े, गर्व करे वे गवार।" तुम्हारे हमारे शरीर को एक फटका लग जाता है हार्ट अटैक का या कोई दरार का, कोई किसी का। शरीर चल बसता है। ये शरीर काचा कुंभ है। लेकिन इस काचे कुंभ में अमर आत्मा है, चैतन्य स्वरूप परमात्मा है, ज्ञान स्वरूप है। साक्षी स्वरूप है, आनंद स्वरूप है, शुद्ध है, बुद्ध है, निरंजन है। अजन्मा है, अकाल पुरुष है और वही अपना आपा है। उसी चैतन्य की सत्ता से श्वासो-श्वास चलता है। श्वास भीतर जाए तो सो, बाहर आए तो हम। अजापा जाप चलता रहता है। सो वो मैं हूं, ज्ञान स्वरूप अमर आत्मा। लेकिन मन के फुरणे से शरीर में आसक्ति रखने से ये वास्तविक ज्ञान में टिकता नहीं। वास्तविक ज्ञान में ना टिकने के कारण जीव को संसार के बंधन बांध देते हैं। फिर वो वासना-वासना से मरता है। अगर सात्विक वासना है तो ऊर्ध्वम गच्छंति सत्वा। मैं ध्यान करूं, मैं भजन करूं, मैं भगवान को पाऊं। इस वासना से अगर कहीं रहता जीता है और शरीर छूट जाता है तो उसको फिर ऊर्ध्वम गच्छंति सत्वा, सत्वस्था। गीता में आया है। वो ऊर्ध्व लोक में जाते हैं। मध्यस्तिष्ठंति राजसा जिनका रजोगुणी स्वभाव है धन का, सत्ता का, भोग का। उनको फिर मध्य लोक को, फिर मनुष्य लोक को चंद्रमा के किरणों के द्वारा अन्न फल आदि में स्थित पाकर मनुष्य या पशु-पक्षियों के जैसा प्रारब्ध होता है उनके शरीर से फिर गर्भ धारण करते हैं।

✨️अधो गच्छंति तामसा जिनकी तामस वृत्ति है, वे अधो लोक में नीच योनियों में जाते हैं नरक आदि में जाकर फिर शूकर, कुकर, सियार, भालू आदि ऐसे-ऐसे छोटी-मोटी योनियों में जाते हैं कीट, पतंग, कुत्ते, गधे आदि में। फिर वहां का प्रारब्ध का उनका चक्कर पूरा होते ही फिर मर जाता है। गधा भी मरता है तो कुत्ता भी मरता है, हाथी भी मरता है तो कीड़ी भी मरती है। जो भी पैदा होते हैं सब मरने वाले पैदा होते हैं। फिर उनकी यात्रा आगे चलती है।

✨️ऐसे घटी यंत्र की नाई जैसे अरट में डिब्बे भरते खाली होते, डिब्बे भरते खाली होते जैसे दिन और रात सुबह और शाम। गर्मी, सर्दी और बारिश, फिर गर्मी, सर्दी, बारिश। ऐसे ही जैसे चक्कर चल रहा है ऐसे ही जीव बेचारे पैदा होते हैं मां के गर्भ में, गर्भ मिला ना मिला, फिर बह गए, फिर उठे, फिर गए। ऐसे गर्भ मिला, फिर मेरा तेरा करके अपना दुनिया बसाई। फिर सब छोड़-छाड़ के कब चला जाए कोई पता नहीं। तो ये आत्मा परमात्मा की सत्ता से जो मन का स्फुरणा है उस स्फुरणा के पीछे-पीछे अपन चलते तो ऐसे चक्कर काटने पड़ते हैं। जब स्फुरणा को स्फुरणा समझ ले, स्फुरणा का उद्गम स्थान जो आत्मा परमात्मा है उसमें विश्रांति पा ले। ये मन का स्फुरणा है। जो शास्त्र संत और आप्त जन जो कहते हैं उसके अनुसार मन के स्फुरणा की चेष्टा करें और बाकी को उसको ब्रेक लगाए। तो स्फुरण निस्फुर पद में पहुंचने में बड़ा मदद करेगा। जो पानी नीचे को बहता है अगर पंपिंग करो तो वो ऊपर को भी तो चढ़ता है। ऐसे ही जो मन जन्म-मरण के चक्कर में नीचे को बहता है। अगर जप, ध्यान आदि करके सत्संग का विचार करें तो वो मन ऊर्ध्वगामी भी होता है। बड़ा अनुकूल भी हो जाता है, बड़ा सहयोग देता है। समय बड़ा कीमती है, वक्त बीतता जा रहा है। मन के स्फुरणे की धारा में बहते गए वे जीव साधारण जीव हैं। लेकिन जो स्फुरणों की धारा से बचते हैं, किनारे लगने की कोशिश करते हैं उनको सरल साधक कहा जाता है।

✨️साधंते परम कार्यमिति साधु। जो परम कार्य साध ले, परमात्मा को पा ले, अपना आत्मा परमात्मा अपने साथ अपने पास है। वो ज्ञान स्वरूप है। दुःख आया उसका भी उसको ज्ञान है, सुख आया उसका भी ज्ञान है। जवानी आई उसका भी ज्ञान है, जवानी चली गई बुढ़ापा आया उसका भी ज्ञान है। और मृत्यु के समय शरीर की मौत है वो भी ज्ञान जानता है। वो ज्ञान स्वरूप आत्मा है लेकिन उसको आत्मा को मैं नहीं जानते, शरीर को मैं जानते मानते हैं। इसलिए फिर शरीर लेने की वासना होती है, जीव भटकता है बेचारा। तो कोशिश करके जल्दी से जल्दी आत्मज्ञान पा ले। वो आत्मा ज्ञान स्वरूप है। और अपना आपा है, अपने साथ है, अपने पास है, अरे अपन ही है। लेकिन अपन अपने आत्मा को नहीं जानते हैं, शरीर को मैं मानते हैं। मन के स्फुरणे के साथ जुड़ जाते हैं। स्फुरणे जैसे आते हैं अपने को ऐसा मानते हैं। किसी ने कह दिया तुम बुरे हो, बुरे हो तो मैं बुरा कैसे? नहीं सब। भलाई की बात आई तो भले लगे। चिंता की बात आई तो चिंतित हुए। मन में चिंता का स्फुरणा हुआ तो चिंतित हुए। लोभ का स्फुरणा हुआ तो लोभी हुए। भय का स्फुरणा हुआ तो भयभीत हुए। अहंकार का स्फुरणा हुआ तो अहंकारी हुए। जैसा-जैसा उस सच्चिदानंद से स्फुरणा पैदा होता है ऐसा-ऐसा ये जीव हो जाता लगता है।

✨️वो परमात्मा इतना शुद्ध है कि जैसी उसमें से भावना करो ऐसा ही दिखता है। अगर उस शुद्ध स्वरूप का ज्ञान पाकर उसी परमात्मा का वास्तविक ज्ञान पाकर उसी का अभ्यास और चिंतन करे तो जीव इस लोक में परलोक में सदा के लिए निश्चिंत तत्व का अनुभव कर लेता है। मंत्र जपने में बड़ी शक्ति है। एक बाई भारतीय वैदिक मंत्रों का उच्चारण और उनका तालबद्ध गीत गाना सीखी। उसने विश्व के प्रसिद्ध लोगों को एकत्रित किया। और अपनी वीणा पर उसने गीत आलाप गीत गाते-गाते वो तन्मय हो गई। फिर लोगों ने क्या देखा कि एक छाया जैसा कुछ दिख रहा है। गौर से देखा तो वीणा पुस्तक धारिणी सरस्वती का चित्र पर्दे पर दिखाई दिया। उस बाई ने फिर दूसरा गीत छेड़ा। वीणा पुस्तक धारिणी तो अदृश्य हो गई। फिर दूसरे कोई आकृति दिखने लग गई। फिर तीसरा गीत छेड़ा तो तारे दिखने लग गए पर्दे पर। फिर शंभु सदाशिव की आकृति दिखने लग गई। बड़े-बड़े विज्ञानवेत्ताओं ने उस बाई की बड़ी प्रशंसा की कि शब्द और उसका इष्टदेव, शब्द और उसकी आकृति जो भारत ने पहले कहे थी भई शब्द के पीछे उसका देवता या उसकी आकृति उसकी छाया। जैसा शब्द उच्चारण करो ताल से तो उसकी छाया उसकी आकृति बनती है। ये हजारों वर्ष पहले जो भारतवासी करते थे बाद में अंग्रेजों ने दूसरे लोगों ने उसको कपोल कल्पित समझकर मजाक उड़ाकर अवहेलना कर दी और फायदा लेने से वंचित हो गया ये समाज। फिर अभी इसी बात को पाश्चात्य जगत के लोग अनुभव करके प्रशंसा कर रहे हैं। तो मंत्र में बड़ी शक्ति है। जैसा मंत्र होता है ऐसी अपनी छाया में आकृति बनती है शरीर में, वातावरण में भी।

✨️मंत्र को कील लगा होता है सिद्ध करने के लिए उसको कील हटाना पड़ता है। तो मंत्र सिद्धि जो है हो जाए तो फिर वो उत्तम जापक बन जाता है। चार प्रकार के जापक होते हैं ना उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ, कनिष्ठतर। कभी जपा ना जपा, ये कनिष्ठतर है। कनिष्ठ जपेगा लेकिन हां जप पूरा हुआ। मध्यम अपना नियम भी करेगा दो माला ज्यादा भी घुमाएगा। उत्तम जापक ऐसा होता है कि उसके सानिध्य मात्र से दूसरे को जप करने की इच्छा होने लगे, दूसरे का भगवत नाम शुरू हो जाए उसे उत्तम जापक कहते हैं। तो भगवन नाम जो गुरु मंत्र मिला है उसको जितना दृढ़ता से जपता है उतना ही उस मंत्र की अंतःकरण में छाया बनती है। अंतःकरण में आकृति बनती है अपने चित्त के आगे आकृति बनती है। कभी-कभी भृकुटी में मंत्र जपते-जपते ध्यान करना चाहिए। मानो राम मंत्र है तो श्री राम का शब्द भृकुटी में दिखता जाए। अथवा और कोई मंत्र है तो उसको उनके अक्षरों को देखते-देखते भृकुटी में जप करें तो तीसरा नेत्र खोलने में बड़ी मदद मिलती है। उसको बोलते हैं ज्ञान नेत्र। वो आदमी त्रिलोचन बन जाता है। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत केंद्र इन चार केंद्रों के ध्यान से जो फायदा मिलता है वो सब का सब आज्ञा चक्र में ध्यान करने से फायदा होता है। ध्यान के साथ ज्ञान का भी विचार करें कि ये मन का स्फुरणा है कि ये पा लूं, ये भोग लूं, ये कर लूं। आखिर कब तक?

*पानी केरा बुदबुदा ये मानव की जात।*
*देखत ही छुप जात है ज्यों तारा प्रभात।*

✨️जैसे प्रभात का तारा देखते-देखते छुप जाता है ऐसे ही मानव शरीर कब कहां छुप जाए कोई पता नहीं। तो इसलिए जगत की वस्तुओं के, जगत के भोग के, जगत की वासना और सुविधाओं की चिंता ना करके जगदीशवर स्वरूप जो ज्ञान स्वरूप है। उसमें मन की वृत्ति लगानी चाहिए। उसको वृत्ति भी बोलते हैं, उसको कल्पना भी बोलते हैं, स्फुरणा भी बोलते हैं। मन की कोई आकृति नहीं है। मन कहीं गया और फिर वापस आया। हम यहां बैठे हैं और मन गया कनाडा, फिर कनाडा जा के आ गया। नहीं-नहीं। ना कनाडा इधर आता है ना कनाडा में मन जाता है। लेकिन मन में भाव बन जाता है, स्फुरणा हो जाता है। मैं जगदीश हूं ये भी भाव बन जाता है और मैं गुजराती सिंधी हूं ये भी भाव बन जाता है। तो भाव जहां से बनता है वो चैतन्य ज्ञान स्वरूप आत्मा से स्फुरता है। मन का कोई रूप नहीं है, कोई आकृति नहीं है। स्फुरणा-स्फुरणा-स्फुरणा उसको मन बोलते हैं। सात्विक स्फुरणा, राजस स्फुरणा, तामस स्फुरणा होता है। जब स्फुरणा में निश्चय होता है तो उसी को बुद्धि बोलते हैं। स्फुरणा में चिंतन होता है तो उसी को चित्त बोलते हैं। स्फुरणा में अहम होता है तो उसको अहंकार बोलते हैं। बाकी मन कोई ऐसी चीज नहीं है कि इसका वजन 10 ग्राम, 50 ग्राम हो या मन निकल जाता हो। बोले महाराज मेरा तो मन भाग जाता है। भाग जाता है तो भाग जाता है उसको देखने वाला तो वहां भी है क्या? जब मोह हो जाता है शरीर में, मन में तो फिर आदमी बंदर की नाई। बंदरी को बड़ा मोह होता है अपने शरीर से। और अपने बच्चे से भी बड़ा मोह होता है। बंदरी का बच्चा जब मर जाता है तो बंदरी उसको साथ ले के घूमती है, छोड़ती नहीं उसको। लेकिन जब खाना कोई दे तो जिंदा बच्चा है तो वो अगर खाने को छुएगा तो उसको ऐसा कूड़ेगी, ऐसा डांटेगी तो वो बेचारा चीखता हुआ भाग जाएगा। तो उसको शरीर से लिपटा के ले चलती है लेकिन कहीं खाना किसी ने सींव चने कुछ फेंक दिए और खाने में हाथ डाला बच्चे ने तो ऐसे कूड़ेगी कि वो बस।

✨️तो ये अज्ञानता से ऐसे बंदरी अपने बच्चे को साथ ले घूमती है और खाने-पीने की बात आई तो आंख दिखाती है। ऐसे ही ये जीव अपने मन को अपने तन को साथ ले के घूमता है। ऐसा साथ ले के घूमता है कि अपने को भूल जाता है। हकीकत में अपनी सत्ता से मन है। जैसे पानी है तो उसके ऊपर तरंग चलता है। पानी को छोड़कर तरंग नहीं चलता ऐसे ही अपने ज्ञान स्वरूप आत्मा परमेश्वर को छोड़कर मन का स्फुरणा नहीं हो सकता। तो मन का स्फुरणा जब परमेश्वर में आ जाए, परमेश्वर ज्ञान स्वरूप है। श्वासो-श्वास में अजापा जाप करते व्यापक वृत्ति हो जाए। शांत मन हो जाए। अथवा तो ज्ञानमय मन हो जाए। तो बड़ा लाभ होता है, बड़ा आनंद होता है, बड़ी निष्ठा होती है। तो कभी मरण बनता है तो कभी जीवन बनता है, कभी सुख बनता है, कभी दुःख बनता है, कभी अपना भाव आता है, कभी पराया आता है, कभी ये कर दूं तो कभी वो कर दूं। ये सारा मन के स्फुरणों का खेल है। इस स्फुरणे को खेल को खेल समझे तो आनंद ले। उठो भी सही, बैठो भी सही, खाओ भी सही, सोओ भी सही लेकिन समझो ये स्फुरणा है। ज्ञान स्वरूप मेरा एक चैतन्य आत्मा है शांत आनंद स्वरूप। फिर मन इधर-उधर भाग जाएगा। फिर देखो कि भाग गया। उसको देखने वाला ज्ञान स्वरूप मेरा परमेश्वर मेरा साथ पास है। ओम शांति, ओम माधुर्य। वक्त बीता जा रहा है, समय बड़ा कीमती है। शरीर का कोई भरोसा नहीं और काम उत्तम से उत्तम करना बाकी है इसलिए उस काम में लग जाए।

✨️उत्तम में उत्तम काम है कि अपने मन के स्फुरण का आधार जो है परमात्मा उस जगत आधार में विश्रांति मिल जाए। बाकी तो कभी मित्र हां बोलेंगे, कभी कोई धोखा करेगा, कभी कोई खुशामद करेगा, कभी कोई कुछ देगा, कभी कोई कुछ लेगा। लेकिन समय तो अपना खराब हो रहा है। समय का सदुपयोग करना है, समय को सार्थक करना है तो खूब सावधानी से दो-दो मिनट का भी हिसाब रखेंगे कहीं। हा हा हू हू में तो मन नहीं बह गया? अगर बह गया तो उसको देखने वाले में फिर फिर से आओ। हंसो, हा हा हू हू करो, खाओ पियो लेकिन स्फुरण के गुलाम मत बनो। मन के गुलाम मत बनो। अपने भाव को उत्तम बनाओ।

✨️बंबई में प्रेमपुरी महाराज हो गए, सन्यासी थे। एक बार कार में बैठे जा रहे थे तो पास में से कोई गाड़ी निकली। जोर से बरसात के लिए ये दिन थे, कहीं पानी भरा था। झूम करके गाड़ी पीछे वाली आगे निकल गई तो उसने छींटे उड़ाए। छींटे से कपड़े तो भीगे लेकिन मुंह में भी वो छींटे आ गए, चरणामृत। ड्राइवर बड़ा गुस्से में आ गया कि ये गाड़ी वाले को मैं तेज गाड़ी भगा के उसको पकडू। उसको जरा सबक सिखाऊंगा। प्रेमपुरी महाराज कहते हैं भाई सबक क्या सिखाना है? अपने मन को प्रसन्न रखने का सबक सीख ले। ठाकुर जी का चरणामृत तो बहुत दिन पीते थे। आज कार का चरणामृत पी लिया ऐसे करके आनंद क्यों नहीं लेते हो भाई? तो ये मन का भाव बनता है तो दुख को भी आदमी सुख बना देता है। प्रतिकूलता को भी अनुकूलता बना देता है और मन में अगर कुभाव है तो खाने को भी मिलता है, रहने को भी मिलता है, बैठने को भी मिलता है फिर भी अशांत हो जाते हैं। और सद्भाव है तो बेचारे कई खाने का ठिकाना नहीं, रहने का ठिकाना नहीं, बैठने का ठिकाना नहीं फिर भी खुश रहते, गा लेते। तो ये मन के जैसे भाव बनते आदमी ऐसा बन जाता है और भाव के आधार में आ जाए तो अच्छा। हल्के भाव से तो उत्तम भाव अच्छा है। उत्तम भाव से भी उत्तम तत्व का ज्ञान और उत्तम तत्व में प्रीति परमात्मा में हो जाए तो कल्याण हो जाए नहीं तो भाई इस संसार का तो कितना भी कुछ इकट्ठा करो, कितना भी पढ़ो, लिखो ये करो।

✨️किसी का भी शरीर शाश्वत नहीं। कब मृत्यु का झटका आए, चला जाए आदमी कोई पता नहीं। जब किसी की मृत्यु देखता है तो मन चौंकता है, अरे अपना भी ये दिन आएगा। क्या हां। फिर भूल जाता है, अरे रे इधर मेरे तेरे में लग जाता है। जब श्मशान में अथवा किसी की मृत्यु देखे उस समय जो विचार आता है, विवेक होता है, ऐसा विवेक अगर बनाए रखे तो कल्याण हो जाए। ये विवेक के ऊपर मोह का एक तरंग फिर घूम जाता है। विवेक भूल जाते हैं और मोह में पड़ जाते हैं। हार्ट अटैक आया, अरे घबरा गए, अब गए, अब गए। हे भगवान की दया से ठीक हो गए तो फिर लग गए उसी में। हा हा हू हू में समय बीत गया। नहीं तो ये तो एक प्रकार का नोटिस है। हार्ट अटैक आया तो मर जाते तो क्या होता? अब चलो भगवान की तरफ लगो। लेकिन मन के स्फुरण में संसार को सत्य मानने में बहिर्मुख होने में जो आदत है, आदत का सुख। जैसे पहलवान दंड बैठक लगाता है तो उसको बड़ा सुख होता है, आदत का सुख। कोई सिगरेट पीता है उसको मजा आता है, खाक मजा है। वो आदत का मजा है। कई लोग बैठेंगे और एक विजन हिलाएंगे उनको मजा आता है। ये आदत का मजा है। कोई व्यसनों का मजा है, कोई गपशप का मजा है। ये सारे मजा सजा देते हैं। वास्तव में स्व का मजा, आत्मा का मजा। आदत के अनुकूल हुआ तो भी ठीक है, प्रतिकूल हुआ तो भी ठीक है। मन के अनुकूल हुआ तो भी ठीक है, प्रतिकूल हुआ तो भी ठीक है।

✨️क्योंकि मन भी तो एक स्फुरणा मात्र है। वास्तव में उसमें अपनी शक्ति नहीं, अपनी सत्ता नहीं, स्फुरणा मात्र है। लेकिन स्फुरणा को मैं मानते हैं कि मेरा विचार है। ऐसा होना चाहिए, ऐसा नहीं हुआ दुखी हो गए। बाकी तो जो हां में हां कर देता है भाई जो तेरी मर्जी वो मेरी मर्जी, जो प्रभु की मर्जी वो मेरी मर्जी। मन का जैसा स्फुरणा होता है, जैसा परिस्थितियां आती है। कुछ दुख होते हैं जो मन की बेवकूफी से बनते हैं और कुछ होते हैं जो प्रकृति से बनते हैं। तो प्रकृति में परिवर्तन होता रहता है। प्रकृति का परिवर्तन किसी ने नहीं रोका आज तक। श्री कृष्ण आए, राम आए और भी आए, कई गए। सतत परिवर्तन होता रहता है। शरीर के कण-कण में परिवर्तन होता रहता है। वातावरण में परिवर्तन होता है। कोई जन्मता रहता है। अभी भी कभी किसी का जन्म होता होगा। इस समय भी कोई मरता होगा। कोई श्मशान में जलता होगा तो कहीं खुशियां होती होगी। तो ये प्रकृति में है तो प्रकृति का परिवर्तन होता रहता है। तो सुख-दुख परिवर्तन से भी आते हैं और सुख-दुख अपने भाव से भी आते हैं और सुख-दुख प्रारब्ध से भी आते हैं और सुख-दुख बेवकूफी से भी बनाए जाते हैं। लेकिन ये टिकते नहीं है। ना मौत टिकती है ना जीवन टिकता है, ना सुख टिकता है ना दुख टिकता है। ना मित्र का मित्रता सदा टिकती है ना शत्रु की शत्रुता टिकती है। सब परिवर्तन होता रहता है। वो परिवर्तन होता है जिसके आधार पर उस आधार स्वरूप ज्ञान स्वरूप आत्मा में टिकने की कला आ जाए, उसमें टिकने की प्रीति हो जाए, टिकने का अभ्यास करेंगे तो प्रीति हो जाएगी। बार-बार जो चीज खाते, पीते, लेते, देते तो प्रीति हो जाती है। बीड़ी में तो आग है और क्या है? धुआं है, निकोटीन है फिर भी बार-बार पीते तो प्री प्यारे लगती है। चाय बार-बार पीते तो प्यारी हो जाती है ऐसे ही। जो गाली बार-बार बोलता है ना वो ना गाली भी बोलने लग जाते हैं। तो ऐसे जो बार-बार भगवान का चिंतन करे और ज्ञान का स्मरण करे तो बस ज्ञानी हो जाएगा। बीड़ी तो मिथ्या है, चाय तो मिथ्या है लेकिन भगवान तो सत्य है। तो सत्य का बार-बार चिंतन करे। सत्य को बार-बार प्रीति करे।

✨️हे सत्य स्वरूपी ईश्वर, हे ज्ञान स्वरूपी ईश्वर, हे चैतन्य स्वरूपी ईश्वर। ये मन का स्फुरणा है। उसको देखने वाला तू चैतन्य है, सो हम। ऐसा बार-बार चिंतन करे तो ये मन के जो परते हैं वो प्रभाव है वो कम हो जाएगा। मन ही नरक में ले जाता है, मन ही स्वर्ग में ले जाता है, मन ही जन्म मरण में ले जाता है, मन ही मुक्त कर देता है। युक्ति होनी चाहिए मन को चलाने की।

✨️एक बादशाह था, राज सिंहासन पर बैठा था। तो उस बादशाह के राज्य में एक बड़ा बादशाह पहुंच गया। नंगे पैर थे। बड़ा बादशाह था। खुला सिर। हाथ में करमंडलो। दंड। कंधे पे एक शाल। बड़ा बादशाह। उस बादशाह के राज दरबार में जा बैठा और ऊंचे सिंहासन पर बैठ गया। राजा के सामने टांग पे टांग चढ़ा के। राजा ने मंत्री को बोला कि महाराज को बोलो कि ये राज दरबार है। ये मेरा राज है, राज दरबार है। राज दरबार का आदर होना चाहिए और राजा की आज्ञा लेकर फिर बैठना चाहिए। महात्मा को बताओ जरा। मंत्री ने महात्मा को कहा कि ये राज दरबार है, राजा की आज्ञा लेकर बैठना है। बोले राजा से पूछो कि उसका नौकर उसकी आज्ञा में है कि वो खुद नौकर की आज्ञा में चलता है। राजा अपने गुलाम का कहना मानता है कि गुलाम उसका कहना मानता है? राजा राजा धर्मात्मा था, सच्चा था। राजा ने बोला कि मैं गुलाम के कहने में चलता हूं। बोले तो मन है गुलाम, तुम मन के कहने में चलते हो। तो मन है मेरा गुलाम और तुम मेरे गुलाम के भी गुलाम हुए। तो मैं तुम्हारी आज्ञा क्यों मानूंगा? तुम तो गुलाम के गुलाम हो।

✨️राजा सावधान हो गया कि मन गुलाम है। आज तक अपनी आज्ञा मनवाता था। तो मन ही बंधन का और मुक्ति का कारण है।

*मन एव मनुष्याणाम कारणं बंधमोक्षयो।*
इसलिए मन की वृत्ति को शुद्ध, स्वच्छ करे। मन मन के साथ जुड़ जाते तो जो मन में आया बोले वो मेरा विचार है। नहीं नहीं विचार बदल जाते, तू ज्यूं का त्यूं रहता है। तेरा विचार नहीं मन का विचार है। मेरे को दुख हुआ, तेरे को दुख नहीं हुआ, मन को दुख हुआ ये याद रख। मेरे को बड़ी चिंता हुई, मेरे को नहीं हुई मन को हुई। तो उसका प्रभाव कम पड़ेगा। तुम मन के साथ जुड़ जाते तो तुम्हारे पर प्रभाव पड़ जाता है।

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