21/08/2026
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🌹 *21.08.26* 🌹
💠 *सुबह संध्या सत्संग* 💠
🏵️ *पूज्यश्री के अनमोल वचन* 🏵️
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💥*ब्रह्मज्ञान और जीवन के गूढ़ रहस्यों पर एक अटपटी चर्चा।*🪔
✨️कपट से व्यवहार करते हैं तो बुद्धि में ब्रह्मज्ञान नहीं ठहर सकता। आहे गाल अलबिलड़ी अटपटी बात है। है बात अटपटी झटपट समझ में ना आए। सतगुरु कृपा से समझ आए तो सारी खटपट मिट जाए। हां बेटा। आहे गाल अलबिलड़ी। सियाणा समझ ना की न की थोड़े मजला सकन मिली। स्वामी साहब ने कहा। सिंधी जगत के ब्रह्मवेता संत के कवित्व में उनके उपदेश। आहे गाल अलबिलड़ी अटपटी। स्वामी शुद्ध स्वरूप जी अपना जो शुद्ध स्वरूप। ये शरीर अंतःकरण अपना शुद्ध स्वरूप नहीं है मिथ्या है, मायिक है। आहे गाल अलबिलड़ी स्वामी शुद्ध स्वरूप जी। सियाणा समझ न की न की थोड़े मजला सकन मिली।
✨️बड़े-बड़े चतुर, बड़े-बड़े विद्वान, बड़े-बड़े बाल की खाल चार वेद रट लिए। छह दर्शन, छह शास्त्र, 18 पुराण सारे चाट गए एक दूसरे के साथ। फलाने श्लोक से फलाने ऋचा का नंबर ये फलाना है, फलाना मंडल है। ये फलाना अध्याय है, फलाना श्लोक है और फलाने ऋषि है इसके मंत्र दृष्टा। ऐसा बयान करने वाले लोग भी होंगे। घटी शतक एक घड़ी भर में शतक 100 श्लोक बनाकर नए शास्त्रार्थ करते थे। एक राजा के पास ऐसा विद्वान था कि किसी का भी कैसा भी श्लोक हो। एक बार वो बोले तो सामने वाला वो व्यक्ति विद्वान उसी श्लोक को वैसे का वैसा धड़ाक से बोल देता था। राजा ने घोषणा की कि मेरे पास कोई शास्त्र की बात ऐसी ले आवे जो मेरा विद्वान ना जानता हो तो उसको हां एक ने 100 मोहर मिलेंगे। तो कोई कैसे-कैसे गुप्त शास्त्रों से कुछ ना कुछ ले आवे। तो विद्वान बोले ये तो हम जानते हैं। ये तो हम जानते हैं। तो सारे विद्वानों को सारे लोगों को काम मिल गया खोजने का। इस बहाने पब्लिक का विद्वानों का थोड़ा मनोरंजन भी हो जाता और ज्ञान का भी विस्तार होता था।
✨️तो एक बड़ा सियाणा था। विश्रांति पाने में गुरुजी से पूछा कि गुरुजी ये विद्वान कैसा है? घटी शतक तो हमने देखे घड़ी भर में शतक श्लोक बनाता है। लेकिन सब श्रोतव्य सारा उसने सुन रखा है। सब ज्ञातव्य। धरती में ऐसा भी आदमी होता है सब ज्ञातव्य। सारे शास्त्र जानता है। ऐसे-ऐसे-ऐसे श्लोक लोग ले जाते हैं ऐसे-ऐसे तो गुरु बोलता है हम जानते हैं। बता देता है उनका। गुरुजी ने कहा नहीं उसकी स्मृति शक्ति मेधावी बनने के लिए उसने उपासना किया होगा या तो निर्गुंडी खा के दूध पिया होगा और स्मृति शक्ति बढ़ाने के लिए कुछ उपासना मंत्र क्या होगा गुरु की कृपा से। तो सुनते ही उसको वैसे का वैसा बोल देता होगा। तो बोले गुरुजी बस हो गया काम। मैं इनाम जीत के आऊंगा। हां बोले जा करके आ जरा खेल। गया। तो उसने श्लोक रचा। अपना नया। कि आपका परपितामह और हमारा परपितामह मित्र थे। और 1 लाख सोना मोहर। हमारे परपितामह ने आपके परपितामह को दी थी। राजा साहब का नाम उनका नाम परपितामह का नाम और अपने अपने परदादा का नाम और उसके परदादा का नाम जोड़ के बोला 1 लाख मुद्रा दे दो। उसने बोला ये तो हमने सुना है। ये तो हम जानते हैं। बोले ठीक है हम हार गए आपके राजा साहब लाखों धन्य हो। राजा को राम से बना दिया। बब्लू बना दिया।
✨️एक होटल पे हमने बोर्ड लगा दिया कि आइए खाइए भोगिए लीजिए बिल आपके पोतों से ही लिया जाएगा आपको पैसा देने की कोई चिंता नहीं करना। आदमी गए खाए पिए। बिल पकड़ा दिया बोले ये क्या बात है बिल तो हमारे पोते देंगे। बोले कोई बात नहीं ये आपके दादा खा के गए उनका है। इस बात में कैसा मजा आ गया जल्दी? क्योंकि हम असत में जीते हैं। जय राम जी की। असत शरीर असत मन में जीते तो तुरंत मजा आ गया। सत में वो मजा नहीं आता। हकीकत में असत में जीते तो असत में मजा आया। लेकिन सत्ता सत की थी लेकिन सत्ता को नहीं देखा। असत में जी रहे हैं असत में आ गया मजा बड़ा मजा आया तो बापू प्रसन्न थे विनोद में सत्संग हो गया। यहां हम मार खा जाते हैं। देखा कैसे मार खा लिया आपने। अच्छा लग गया बढ़िया मजा आ गया। आज तो बापू विनोद में थे। अभी ये याद रह जाएगा बाकी वो अपने मैं को हम छोड़ नहीं सकते पर को रख नहीं सकते। ये बात इतनी याद नहीं रहेगी। सत्संग में जो हल्की-फुल्की बात होती है वो याद रह जाती है। क्यों सार समझाने के लिए जो हल्की-फुल्की बात के लिए थोड़ा ताजगी लानी पड़ती है मजबूरी है। हल्की-फुल्के जीवन में जीते हैं इसीलिए हल्की-फुल्की बातें हमको बोलनी पड़ती है नहीं तो कुछ बोलने की जरूरत ही नहीं है।
✨️गुरु मौन व्याख्यानम शिष्यस्य छिन्न संशय। ऊंची बात बोल के चुप मौन। कभी-कभी तो ऊंची बात बोले नहीं केवल मन से ही ऊंची बात का संकल्प डाल देते हैं। लेकिन सब पकड़ नहीं पाते। एंटीना ही नहीं है लोगों के पास आध्यात्मिक ब्रह्मवेताओं को झेलने के एंटीना ही मरे हुए हैं, काट चढ़ गया। कपट से व्यवहार करते हैं तो बुद्धि में ब्रह्मज्ञान नहीं ठहर सकता। छल छिद्र कपट मोहे स्वप्न ना भावा। छल कपट और दूसरे का छिद्र अन्वेषण। ऐसी बुद्धि जिसकी है उसको ब्रह्मज्ञान नहीं हो सकता। उसको अंतरात्मा की शांति नहीं मिल सकती। शराबी है उसकी रुचि भगवान के तरफ नहीं हो सकती। शराब पीने से चार जो महापाप हैं वो ईश्वर प्राप्ति की योग्यता नाश कर देते हैं। शराब महापापों में पांच गिनाए गए। शराब महापापों में गिनाया गया है। भ्रूण हत्या गर्भस्थ शिशु की हत्या ये महापापों में है। ओम ओम नारायण नारायण।
✨️बोले बापूजी भगवान ब्रह्मज्ञान में और भगवान के दर्शन में क्या फर्क है? भगवान का दर्शन अंतःकरण की रसमय प्रेममय भावमय अंतःकरण की वृत्तियों की प्रगाढ़ता से आपका भगवान प्रकट होंगे। और रस आएगा। और तत्वज्ञान ये ब्रह्मज्ञान ये है कि जिससे अंतःकरण आपकी भावना बनाता है रसमय बनता है और जिससे भगवान आते हैं और आप देखते हैं इन दोनों का आधार का ज्ञान तत्वज्ञान है। जैसे जगत की चीजें पाकर थोड़ा रस आ जाता है इससे तो भगवान का दर्शन-दर्शन पाकर रस तो आएगा। लेकिन रस आएगा भगवान आए तो भगवान गए तो रस गया। मन के अनुरूप भगवान ने कर दिया तो रस आ गया। भगवान ने कहा नहीं तुम जरा ये करो। ऐसा उचित नहीं तुम्हारे लिए। तो उचित क्या है ऐसा फिर समझेंगे तब काम होगा। भगवान अपनी तरफ से आग्रह नहीं करते कि यही करो। जहां तुम्हारी रुचि हो कर-कर के थको तब आओ। उचित को समझो। क्या चाहिए क्या चाहिए? आपकी इच्छा के अनुसार इतना तो भजन किया इतना त्याग किया इतना तप किया जिस इच्छा के लिए किया वही चलो पूरा करो। जैसे कोई पेमेंट देते हैं दुकान वाले को तो जो चीज के लिए दिया वही माल उसको अच्छा नहीं लगता। इसलिए अपनी सूझ बढ़े तो भगवान से भगवान को ही पाएं। भगवान से भगवान को ही जाने अपनी ऐसी ऊंची सूझ बने तब ऊंचा ज्ञान की भूख लगती है। नहीं तो कोई काहू में मगन कोई काहू में मगन। गुरुजी बस इतना बदली हो जाए और ऐसी जगह पर रहूं एकांत हो। वो जगह मिल गई। फिर वहां फिर दूसरी इच्छा पैदा हो जाएगी। ऐसी जगह हो गया ऐसा कुछ हुआ ऐसा कुछ हुआ ऐसा हुआ।
*एक भूला दूजा भूला भूला सब संसार।*
*फिर भूला एक गोरखा जिसको गुरु का आधार।*
गुरु के ब्रह्मज्ञान का आधार जिसको है वो सीधा चल निकल जाएगा बाकी तो सब भूलों में ही भटक रहे हैं।
✨️लहरी महाशय बड़े उच्च कोटि के योगी। उनका जीवन चरित्र में आता है कि वो ऑफिस में काम करते थे। उनके बॉस को उनके मुखिया को वो आके अपना नैनीताल रानीखेत में एक चौकी करनी है एक ऑफिस में। लहरी महाशय तुमको वहां जाना है। उनकी बदली वहां हो गई। उस इलाके में पहुंचे देखा कि यार हां कितना ठंडा मीठा पहाड़ी इलाका सुंदर वातावरण। आवाज आई कि लहरी महाशय देखा कि मेरे को यहां कौन पुकारा? तो आवाज की तरफ चलते-चलते-चलते ऊपर दूर तक कहीं पहुंचे। तो एक आदमी एक संत पुरुष हाथ पसारे हुए स्नेह से मैंने ही आवाज दी थी आओ आओ आओ। संध्या हो गई पहुंचते-पहुंचते तो पहाड़ पे चढ़ते अब बाहर बोले देखो कैसा वातावरण ये सुंदर गुफा दिख रही है कैसा है हां ये बड़ा सुंदर है बड़ा वातावरण। तो बोले तुम्हारी गुफा है। मेरे को तो समझ में नहीं आया लहरी महाशय का वचन। फिर उन्होंने बताया कि देखो जाओ तुम उसमें जरा आराम करो चलो मैं दिखाता हूं। कितनी साफ-सुथरी कंबल पड़े हैं एक कोने में कंबल पड़ा था। बोले पहचाना ये कंबल तुम्हारा ही कंबल है। तो लहरी महाशय दंग रह गए कि मेरा कंबल?
✨️तुम पूर्व काल में साधना करते थे। तो तुम्हारे को आगे ऐसा करो वैसा तो वो वृत्ति नीचे आ गई। तो उसी करने-धरने में मरे और फिर कहीं जन्मे और अब अभी बाबूजी नौकर होकर काम कर रहे हो। ये देखो कटोरी हमने साफ-सुथरी रखी है कि हमारे लहरी आएंगे फिर इसमें प्रसाद पाएंगे और ये खप्पर देखो तुम्हारा। मुझे समझ में नहीं आ रहा। बोले अच्छा लो ये थोड़ा तेल पी लो। अब तेल क्या पता कौन सी वनस्पति का कैसा था उन्होंने पिलाया। बोले जाओ लेट जाओ तुम। और थोड़े लेट के क्या-क्या अंदर शुद्धिकरण हुआ। अब फिर पूर्व काल का सारा दिखा कि मैं तो यहां था। कैसे भटका कि ये करूं वैसा मिले ऐसा कौन से इतने साल भटक गए। बोले इतने साल क्या कई युग ऐसे ही तो भटकते हैं पाने की इच्छा में करने की वासना में। पाना है करना है पकड़ना है और छोड़ना है। ये छोड़ना है ये पकड़ना है। नया ठेका लेना है और पुराना झंझट छोड़ना है। पुराने से पैसे वसूल करके उससे काम बंद करना है। लेकिन आयुषा तो अपना खत्म हो रहा है इसमें फिर आखिर तो ये शरीर भी छोड़ना है। क्या पकड़ोगे क्या छोड़ोगे?
*क्या करिए क्या जोड़िए थोड़े जीवन काज।* *छोड़ी-छोड़ी सब जात है देह, गेह, धन, राज।*
✨️जरा ये ठीक कर लूं वो सेट कर लूं वो सेट कर लूं। अपने को देह मानते हैं और देह के नाम को सच्चा मानते हैं। बस उसी में लगते हैं और उसी का नाम रहे कोई ऐसा ना कहे कि ऐसा नहीं किया ऐसी जिम्मेदारी ना निभाई। इसलिए रगड़े जा रहे हैं। तो जिम्मेदारियां दो प्रकार की होती हैं। फिर तो उन्होंने साधन किए और लहरी महाशय बड़े उच्च कोटि के संत साबित हुए। विवेकानंद भी गए थे उनके दर्शन करने। नहीं दूसरे कोई संत गए ऊंचे-ऊंचे। परमहंस जी के साथ उनका संबंध था। उनके गुरु थे क्या ऐसा अगले जन्म के जैसे भी अब लेखकों के लेख के अनुसार लेकिन ये संभव है। कि ये तुम्हारी ऑफिस मैंने यहां करवाई तुम्हारे मुखिया को मैंने प्रेरणा की यहां चौकी हो। और इस बहाने तुम तुम्हारी बदली करने की उनको मैंने प्रेरणा की। तो तुम मिल सको आ सको और अपना यात्रा तुम्हारी चालू रहे। ये तो होता है। ये सामर्थ्य तो होता है सब होता है महापुरुषों में। ये तो हमने अनुभव किए करके देखे हैं। उनका अपने अपने तो ऐसी स्थिति होती है उनके संकल्प में। ये सब खेल हो जाते हैं। लेकिन आखिर क्या ईश्वर में शांत और समता राग द्वेष का उतना ऊंचा। जितना कपट जितनी खुन्नस गहरी उतना आदमी हलकट। खुन्नस ये हलकटपने के निशान है। बैर लेना बदला लेना। ये अंतःकरण हलकट हलकट अंतःकरण की निशानी है। राग द्वेष ये अंतःकरण हलकट। तो हलकट अंतःकरण की हलकटपन निकालने में बहादुरी है। ऐसा नहीं कि हलकट की आदत पूरी हो। मैं इससे बदला लूं और उसको बदला दिला दूं। अच्छा अब खुश हुआ बोले हां खुश हुआ। लेकिन वो बदला लेने का हलकटपन तो बढ़ गया। क्षमा सीखो। खुन्नस मिटाने के लिए क्षमा सीखो।
✨️इसीलिए राजे-महाराजे राजपाट छोड़ के भिक्षा लेने जाते और भिक्षा में अपमान हो जावे तो सह ले। देह का होता है। ऐसा थोड़ी रोटी नहीं है इसलिए भिक्षा मंगवाते थे राजाओं से। जो राग है पुजवाने की आदत है वाहवाही की वो मिटे। द्वेष है बदला लेने की आदत मिटे। उंगली मार बुद्ध के शिष्य हो गए। अब भिक्षा लेने गए तो लोगों ने देखा कि इसने तो मेरे चाचा की उंगली काट के गले में पहनी थी। ये तो मेरे भतीजे का हत्या करने वाला है। ये तो मेरे फलाने का है तो लोगों ने मिलकर उनको तो पत्थर-वत्थर मारे। भिक्षा क्या दे? साधु बन गए तो सिर फोड़ दिया। कुछ बोला नहीं बुद्ध ने कहा कि करुणा सब का भला गुरु की बात मान के भिक्षा के बदले में सिर फुड़वा के आ गए। बड़ा शांत। बुद्ध ने पूछा, "क्या हुआ?" बोले, "वो सब जो मेरे प्रति उंगली माल डाकू था ना कईयों की उंगलियां काट के माला बना के घूमता था फिरता था।" तो वो सारे भिक्षा लेने गया तो सारे अपना वैर निकालने के लिए उन पर पत्थर मारा करते थे, लग गए। तो शांत। बुद्ध ने देखा खुन्नस नहीं है वैर लेने का। बोले, "तूने तो कई जन्मों का काम अभी निपटा लिया।" वाह! बोले, "बनते आपकी कृपा है।" मेरी तो कृपा तो कईयों पे है। तुमने पहचान ली। अब खुन्नस वाले पहचान ले तो काम हो जाए। वैर निकालें, आलस से निकालें अपने हर की आदत आप ही निकालेगा तभी।
✨️जैसे जो देखने के शौकीन है तो देखने देखने का मजा लेते तो दूसरे जन्म में पतंगिया बनो। दिया देख-देख के फिर जा के जल मरो। मांस खाने की आदत है तो दूसरे जन्म में फिर मछली बनो। स्वाद लेते-लेते फिर मरो। मछली उसके अनुरूप और भी शरीर कई हैं प्रकृति के पास। संभोग करने की आदत है तो और वो वासना खूब है तो दूसरे जन्म में फिर बकरा बनो। दिन में 40 बकरियों के साथ संभोग करो। और फिर कसाई के यहां कटो। या तो बूढ़े हो के बकरियों के पीछे पड़ते रहो। करते रहो। या तो फिर सूअर बनो। मांस खाने की आदत है तो गिद्ध बनो। या तो हिंसक प्राणी बनो। जैसी आपकी आदत तीव्र होती है उसी आदत को पूर्ति के लिए प्रकृति आपको शरीर देगी। अगर परमात्मा को पाने की इच्छा तीव्र है और अपने मैं को जानने की आदत है तो फिर तू ऐसा वातावरण मिलेगा कि अपने असली मैं को जान ले तो फिर कोई मजदूरी करनी ना पड़े।
✨️*जिसको आप छोड़ नहीं सकते वो है परमात्मा। जिसको रख नहीं सकते वो है माया। इतना आसान है। छोड़ नहीं सकते। जिसको छोड़ नहीं सकते उसको जान लो और जिसको रख नहीं सकते उसको भी जान लो। तभी भी आपको भगवान मिल जाएगा।* तो फिर वो कह रहे हैं, "उनको जान ले फिर भगवान के भजन की जरूरत क्या है?" अरे ये जान लिया तभी ये भगवान है तो सजातीय चिंतन मदद करता है। आप डॉक्टर बन जाओ लेकिन डॉक्टर का संपर्क तो करना पड़ेगा ऐसे ही डॉक्टर बन जाएगा क्या? वकील बन जाओ, ये तो बन गए पढ़ लिख के फिर भी पुराने वकील का संपर्क तो करना ही पड़ता है। ऐसे भगवान अपने स्वभाव में जगे हैं ब्रह्म ज्ञानी। आत्म रामी संत भी भगवत स्वरूप है। भगवान नारायण भी भगवान है। भगवान शिव भी भगवान है। जिसने अपना भगवत पना नहीं भूले वो भगवान है। *जिसको छोड़ नहीं सकते वो है परमात्मा और जिसको रख नहीं सकते वो है शरीर। अब शरीर को कितना भी रखो बाबा। शरीर के नातों को कितना भी संभालो। क्या हो जाए? कुछ मिट जाए, हट जाए, खप जाए तो डरो नहीं कि ये तो ऐसे ही है। कोई मिल जाए तो उसमें फूल होने की अपना ये बढ़ गया। नौकरी चल गई तो उसके लिए रोओ नहीं। प्रमोशन हो गया तो उसके लिए टट्टू बनो नहीं। आखिर क्या?*
✨️अपने को तो मैंने जाना नहीं है। मिला और बिछड़ा, मिला बिछड़ा। जिसको मिला और बिछड़ा वो भी तो मरेगा। इतना ही पक्का करो तभी भी ब्रह्म ज्ञान की सीढ़ी तक तो पहुंच जाओगे। फिर चढ़ाना तो गुरु बोलेगा आ जाओ आ जाओ एक कदम कदम चढ़ते जाओ। इन बातों को जरा मजबूती से पकड़ो। बोले वो जो बात है वो कैसे याद रहेगी जल्दी?
ऐसी मजाक की विनोद की बातें। हल्की बातें जल्दी याद आ जाती है। जल्दी मजा आ जाता है हल्का-फुल्का। सस्ती प्रसिद्धि। आजकल सब नेता भी सस्ती प्रसिद्धि सस्ता। सेवा का थोड़ा ढोंग कर के वोट-वोट ले के फिर टैक्सों पे टैक्स बढ़ा दिए। पहले तक क्या था?
✨️कि सोसाइटी में मेंबर हुए मकान में। अब तो मेंबर बनने के बाद भी मकान का रजिस्ट्री खर्च और बढ़ा दिया। इतना शोषित हो रहा है समाज। टैक्स पे टैक्स बढ़ते जा रहे हैं। पब्लिक बिचारी निचोई जा रही है। दाम पे दाम बढ़ते जा रहे हैं। बस वासना बढ़ गई, आवश्यकता बढ़ गई शासकों की। अधर्म कर्म भगवान का डर नहीं है। कुछ ले नहीं जाएंगे ऐसा ज्ञान नहीं है। लो इधर भी जमा करो परदेश में भी जमा करो। तो ये नीच मति, नीच प्रवृत्ति से नीच मति होती है और नीच मति से नीच प्रवृत्ति होती है। मति नीच होने से प्रवृत्ति नीच होती है। प्रवृत्ति नीच से मति और नीच है। फिर उनको वो फिर वो पैसे रख-रख के प्रेत हो के भटकते रहते हैं। इटली का मुसोलिनी कितने अरबों खरबों रुपए इकट्ठा किया। अंत में अभी अभी तक प्रेत हो के भटकता है। 1942 में मरा। अभी तक वो प्रेत हो के भटक रहा है। 60 साल हो गए। कम्युनिस्टों ने दावा बोल दिया था। हार गया था फिर अपनी जान बचाने के लिए छुप गया। मौका पा के अपनी प्रेयसी के साथ इटली से स्विट्जरलैंड जा रहा था। रास्ते में सिपाहियों ने जान लिया यही है। धांय धांय। लाश फिर इटली वापस लाए। और उसको जूतों के हार बार पहना के दफनाया जो भी है। तो जो संपत्ति थी तो पूरी ट्रक भरी थी। विदेशी करेंसी डॉलर आदि। हीरे जवाहरात कीमती। पूरी ट्रक भरी थी बंद बॉडी। बड़ी गाड़ी होती है विदेशों में। 1942 की घटना है। आए तो वो संपत्ति कहां गई? गाड़ी का चालक उसकी लाश पड़ी है। तो कौन ले गए?
✨️तो जिन्होंने दो जवानों ने जिन्होंने दो-चार राउंड छोड़े वो ले गए। तो बोले वो भी पागल हो के मर गए सिर फोड़ के। संपदा गायब। जांच कमीशन रखी। जांच कमीशन के वरिष्ठ ऑफिसर भी कोई बाथरूम में जा कर मर गया तो कोई पागल हो गया। कोई बदली का भाग गया वो। ऐसे करते-करते 72 आदमियों की हत्या हो गई। वो माल खोजते हुए। हां एक सोर्स मिला कि मुसोलिनी का रात्रि के समय एक मुसोलिनी जाता हुआ मिला। ये मुसोलिनी है। मुसोलिनी ने कहा, "मैं तो मर गया हूं लेकिन मेरी डिजायर मेरी इच्छा नहीं मरी।" तो फिर पता चला कि ये तो मुसोलिनी प्रेत हो के अपनी संपदा संभाल रहा है। कहां छुपा के रखा है?झील के किनारे। खोजने वालों को मार डाला। अब वो संपदा आखिर कब तक रखेगा?
✨️तो जो बाहर की संपदा में आसक्ति करते हो जीते जी तो शोषण करते हो मरने के बाद भी हानि करते हैं और अपना भी तो शोषण ही तो हो रहा है उनका। सुखी थोड़ी होते हैं प्रेत तो भटकते रहते हैं बेचारे। ऐसे मैंने सुना है अखबारों के द्वारा कि कभी-कभी मानवतावादी अमेरिका के राष्ट्रपति हैं अपने राष्ट्र भवन में लिंकन मिस्टर लिंकन कभी-कभी किसी दूसरे राष्ट्रपति को देखते हैं। तो शासन करने की वासना है। उनको गोली लग गई थी थिएटर में। तो प्रेत हो के बिचारे अब अपने राष्ट्रपति भवन में कभी-कभी दिखे हैं। ऐसे 1962 में चीन का वार हुआ था। तो अपनी बटालियन और रास्ता कहीं चौकी भूल गई थी, भटक गई थी। तो कैप्टन आया बोले, "चलो मैं दिखाता हूं।" तो आगे-आगे चला। अब्राहम लिंकन की बात में राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन मानवतावादी थे। लेकिन सराहनीय काम तो किए बेचारे ने लेकिन अपने मैं को तो नहीं जाना ना आत्मा को। तो जगत की सत्यता बनी रही।
✨️अब ये करना है वो करना है करना बाकी रह गया। तो प्रेत शरीर में भी अब भटकते हुए भी किसी को प्रेरणा करते होंगे कैसा करें। तो बटालियन जो थी भटक गई। उनको जाना था अपने हिंदुस्तान की चौकी पे। तो कैप्टन आया बोले, "चलो मैं ले जाता हूं।" तो बड़ा तेज से उसका जाना हुआ रास्ता था। तो देखा तो उसके पीछे गोली लगी हुई है और एक हॉल है। हॉल पड़ गया गोली। ये आदमी चल कैसे रहा है? तो वो बताया गया है, "बस यहां से चले।" बोले, "साहब आपको।" हां बोले, चार दिन पहले लड़ाई में हो गया था। इतना पीछे पीठ खाली हो गई। लड़ाई में चार दिन पहले लग गई गोली तो अभी तो बोले, "जाओ तुमको रास्ता दिखा दे।" फिर पता चला तो गायब हो गया था। अरे गोली लगी है तो जैसे गोली लगी शरीर की स्थिति हुई और तड़प के मरा तो वही शरीर की आकृति बनेगी। तो वो वास्तव में उसको जिसको गोली लगी वो स्थूल शरीर नहीं था लेकिन सूक्ष्म शरीर तो सारे शरीर में फैला हुआ था ना। तो सूक्ष्म शरीर में जैसे भी जो प्रेत होते तो जिस ढंग से मरते समय जैसी आदा में मरते हैं तो जो प्रेत आते तो उस आदमी में भी इसी प्रकार की आदा होती है मरते समय की। छटपटा के कांपते हुए ये वो कुछ दुखद ढूंढते। फिर उसको बातों में लाओ प्रेतों को तो तब हंसते हैं ये वो करते हैं। लेकिन पहले जब आते हैं और जाते हैं तो जिस भाव से जिस संस्कार से मन निकला शरीर से वो मन शरीर रहता है बाद में प्रेत में। तो मन को ये पता चलना चाहिए कि ये शरीर नहीं होने के बाद भी सूक्ष्म शरीर भी तुम नहीं हो। कारण शरीर भी तुम नहीं हो। ऐसा नहीं कि मैं मर गया हूं मेरा शब्द दिख रहा है तो वो सूक्ष्म शरीर से शब्द को देखेगा। फिर उसमें घुसेगा वो नहीं मिला तो दूसरे में घुसेगा दूसरा जन्म लेगा। तो तू वो नहीं है सूक्ष्म शरीर भी। जिससे तू देखता है।
✨️जैसे ये आंखें देखती है। तो आंखें देखती कि नहीं देखती उसको मन देख रहा है। मन ठीक देखता है कि नहीं देखता उसको बुद्धि देख रही है। तो यहां तक तो सूक्ष्म शरीर। अब बुद्धि ठीक देखती कि नहीं देख रही। तो ये जीवात्मा देखता है। लेकिन मेरा जीव चैन में है, बेचैन है, सुखी है, दुखी है उसको कौन देख रहा है? अब मैं। तो ये मैं मैं हूं जहां से बोला जाता है वही मैं हूं। मैं हूं बोलने के साधन स्थूल साधन, सूक्ष्म साधन, कारण साधन। इनके सिवाय का जो मैं है तो अति सूक्ष्म है ना। इसीलिए जरा समय लगता है। जरा बुद्धि ऊंची चाहिए।
📍इसीलिए धर्म करो ताकि वासना नियंत्रित हो।
📍उपासना करो ताकि चित्त वृत्ति एकाग्र हो मन।
📍और तत्व ज्ञान सुनो ताकि असली मैं का पता चले। आपको गुरु का संकल्प सहायता करे।
✨️इसीलिए कहते हैं, "गुरु कृपा ही केवलम शिष्यस्य परम मंगलम।" रिद्धि सिद्धि तो आप अपने तप से, योग से, सामर्थ्य से कर लो। उसमें भी गुरु चाहिए नहीं तो रिद्धि सिद्धि के चक्कर में लोग पागल हो जाते हैं। जैसे प्राणायाम से सामर्थ्य आता है तो ठोकं-ठोक प्राणायाम किया तो खुश्की चढ़ जाएगी। एकाग्रता से दे एकाग्रता हुई तो झोंके आ रहे हैं कई सदियां गुमित जाएगी। तो यहां योग योग करना है तो योग के गुरु चाहिए। उसकी भी तो कृपा चाहिए। अच्छा जो रुपए पैसे दे के योगा कराते हैं वो योगा आसन आसन करा के श्वासों-श्वास दिला के थोड़ा आपको संकल्प विकल्प थोड़े कम हो जाए तो आपको रिलीफ मिलता है बस आप अब योगा करते हैं। आप कोई योगी नहीं हो गए हैं। ना कर्म योगी है ना ज्ञान योगी है ना भक्ति योगी है। *ईश्वर प्राप्ति अलग बात है। थोड़ी बहुत योग की कसरत करना करवाना अलग बात है। ईश्वरीय ज्ञान पाना अलग बात है। स्वास्थ्य पाना अलग बात है।*
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