Divya Darshan

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भुवनेश्वर, ओडिशा में सूका-साड़ी मंदिर परिसर के पास हाल ही में उजागर मंदिरएएसआई ने भुवनेश्वर, ओडिशा में लिंगराज मंदिर के ...
09/04/2022

भुवनेश्वर, ओडिशा में सूका-साड़ी मंदिर परिसर के पास हाल ही में उजागर मंदिर
एएसआई ने भुवनेश्वर, ओडिशा में लिंगराज मंदिर के पास एक मंदिर के फर्श के हिस्से का खुलासा किया, जबकि एकमरा क्षेत्र परियोजना के लिए वैज्ञानिक सफाई करते हुए।
अधिकारियों के अनुसार यह ढांचा 10 वीं शताब्दी के मंदिर का माना जाता है।
भुवनेश्वर, ओडिशा में सूका-साड़ी मंदिर परिसर के पास हाल ही में उजागर मंदिर
भुवनेश्वर में सुका-साड़ी मंदिर परिसर के पास एक प्राचीन हिंदू मंदिर के फर्श के अवशेष।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने लिंगराज मंदिर के सौंदर्यीकरण और उसकी परिधि के लिए एकमरा क्षेत्र परियोजना के लिए 2 एकड़ भूमि की वैज्ञानिक सफाई करते हुए एक प्राचीन मंदिर का ढांचा पाया है।
एएसआई को एक प्राचीन ढांचा मिला है, माना जाता है कि यह एक मंदिर का फर्श है, जबकि भुवनेश्वर के एकमरा क्षेत्र में अलंकृत साड़ी मंदिर के बगल की भूमि की वैज्ञानिक सफाई कर रहा है।
चिंता का कारण यह है कि एएसआई की अनुमति के बिना राज्य सरकार द्वारा संरक्षित साइट पर किए गए एकमरा क्षेत्र परियोजना विध्वंस अभियान के दौरान खोजे गए ढांचे का शेष हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया है।
अलंकृत साड़ी मंदिर (10 वीं-11 वीं शताब्दी) का एक हिस्सा जिस पर एक संस्कृत कॉलेज द्वारा अतिक्रमण किया गया था (हाल ही में ध्वस्त किया गया), एएसआई द्वारा साइट की वैज्ञानिक सफाई के दौरान भी आंशिक रूप से उजागर किया गया है।

Remnants of a glorious past....Sree Ganesh Murti and a ShivLing from Angkor Thom, Cambodia..
02/12/2021

Remnants of a glorious past....

Sree Ganesh Murti and a ShivLing from Angkor Thom, Cambodia..

गंगा में विसर्जित अस्थियां आखिर जाती कहां हैं ??? बहुत ही ज्ञानवर्धक लेख जरूर पढ़े..!!!--------हर हर गंगे!!!!पतितपावनी ग...
28/11/2021

गंगा में विसर्जित अस्थियां आखिर जाती कहां हैं ??? बहुत ही ज्ञानवर्धक लेख जरूर पढ़े..!!!
--------हर हर गंगे!!!!

पतितपावनी गंगा को देव नदी कहा जाता है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार गंगा स्वर्ग से धरती पर आई है। मान्यता है कि गंगा श्री हरि विष्णु के चरणों से निकली है और भगवान शिव की जटाओं में आकर बसी है।
श्री हरि और भगवान शिव से घनिष्ठ संबंध होने पर गंगा को पतित पाविनी कहा जाता है। मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सभी पापों का नाश हो जाता है।
एक दिन देवी गंगा श्री हरि से मिलने बैकुण्ठ धाम गई और उन्हें जाकर बोली," प्रभु ! मेरे जल में स्नान करने से सभी के पाप नष्ट हो जाते हैं लेकिन मैं इतने पापों का बोझ कैसे उठाऊंगी? मेरे में जो पाप समाएंगे उन्हें कैसे समाप्त करूंगी?"
इस पर श्री हरि बोले,"गंगा! जब साधु, संत, वैष्णव आ कर आप में स्नान करेंगे तो आप के सभी पाप घुल जाएंगे।"
गंगा नदी इतनी पवित्र है की प्रत्येक हिंदू की अंतिम इच्छा होती है उसकी अस्थियों का विसर्जन गंगा में ही किया जाए लेकिन यह अस्थियां जाती कहां हैं?
इसका उत्तर तो वैज्ञानिक भी नहीं दे पाए क्योंकि असंख्य मात्रा में अस्थियों का विसर्जन करने के बाद भी गंगा जल पवित्र एवं पावन है। गंगा सागर तक खोज करने के बाद भी इस प्रश्न का पार नहीं पाया जा सका।
सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए मृत व्यक्ति की अस्थि को गंगा में विसर्जन करना उत्तम माना गया है। यह अस्थियांं सीधे श्री हरि के चरणों में बैकुण्ठ जाती हैं।
जिस व्यक्ति का अंत समय गंगा के समीप आता है उसे मरणोपरांत मुक्ति मिलती है। इन बातों से गंगा के प्रति हिन्दूओं की आस्था तो स्वभाविक है।
वैज्ञानिक दृष्टि से गंगा जल में पारा अर्थात (मर्करी) विद्यमान होता है जिससे हड्डियों में कैल्सियम और फोस्फोरस पानी में घुल जाता है। जो जलजन्तुओं के लिए एक पौष्टिक आहार है। हड्डियों में गंधक (सल्फर) विद्यमान होता है जो पारे के साथ मिलकर पारद का निर्माण होता है।

इसके साथ-साथ यह दोनों मिलकर मरकरी सल्फाइड साल्ट का निर्माण करते हैं। हड्डियों में बचा शेष कैल्शियम, पानी को स्वच्छ रखने का काम करता है। धार्मिक दृष्टि से पारद शिव का प्रतीक है और गंधक शक्ति का प्रतीक है। सभी जीव अंततःशिव और शक्ति में ही विलीन हो जाते हैं।

28/11/2021

250 YEARS OLD DIVINE AND MAGICAL BOWL - DO WATCH THIS, YOU WILL BE STUNNED!!

अढ़ाई दिन का झोपड़ा - कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे मात्र ढाई दिन में बनाया था, ऐसा हमने  सरकार द्वारा उपलब्ध करवाई गई पुस्तक में...
28/11/2021

अढ़ाई दिन का झोपड़ा - कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे मात्र ढाई दिन में बनाया था, ऐसा हमने सरकार द्वारा उपलब्ध करवाई गई पुस्तक में पढ़ा। सोचिये २.५ दिन में बन सकता है क्या ?

स्वास्त्विक और मूर्ति होने के बाद भी लोग इसे मस्जिद कहते है!इस अढ़ाई दिन के झोंपड़े पर आप खुद देख सकते है, खिड़की पर स्वस्त्विक का निशान भी है, और आगे फिर मूर्तिया भी,

दरअसल कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे ढाई दिन में बनाया नही था, बल्कि तौड़ा था!इस मंदिर में पुराना शिलालेख और श्लोक आदि आज भी है, जिससे इस मंदिर के विग्रहराज चौहान द्वारा बनाये जाने के पुख्ता प्रमाण है, वह शिलालेख आज भी इस मंदिर में है, लेकिन हिन्दू पता नही, कौन सा नशा करके सोए है ...!!

🌺. देवी गंगा और शांतनु की कथा  🌺हिन्दू धर्म में गंगा को सबसे पवित्र व पूजनीय नदी माना गया है। गंगा के संबंध में अनेक धर्...
27/11/2021

🌺. देवी गंगा और शांतनु की कथा 🌺

हिन्दू धर्म में गंगा को सबसे पवित्र व पूजनीय नदी माना गया है। गंगा के संबंध में अनेक धर्म ग्रंथों में कई कथाएं पढ़ने को मिलती है। महाभारत के सबसे प्रमुख पात्र भीष्म भी गंगा के ही पुत्र थे। तो आइये जानते हैं गंगा और शांतनु से जुड़ी कथा के बारे में।

प्राचीन समय में इक्ष्वाकु वंश में राजा महाभिष थे। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ करके स्वर्ग लोक प्राप्त किया था। एक दिन बहुत से देवता और राजर्षि, जिनमें महाभिष भी थे, ब्रह्माजी की सेवा में आए। वहां गंगा भी उपस्थित थीं। तभी हवा के वेग से गंगा के वस्त्र शरीर पर से खिसक गए। वहां उपस्थित सभी लोगों ने अपनी आंखें नीची कर ली, मगर राजा महाभिष गंगा को देखते रहे। जब परमपिता ब्रह्मा ने ये देखा तो उन्होंने महाभिष को मृत्युलोक पर जन्म लेने का श्राप दिया और कहा कि गंगा के कारण ही तुम्हारा अप्रिय होगा और जब तुम उस पर क्रोध करोगे तब इस श्राप से मुक्त हो जाओगे।

ब्रह्मा के श्राप के कारण राजा महाभिष ने पूरूवंश में राजा प्रतीप के पुत्र शांतनु के रूप में जन्म लिया। एक बार राजा शांतनु शिकार खेलते-खेलते गंगा नदी के तट पर आए। यहां उन्होंने एक परम सुदंर स्त्री (वह स्त्री देवी गंगा ही थीं) को देखा। उसे देखते ही शांतनु उस पर मोहित हो गए। शांतनु ने उससे प्रणय निवेदन किया। उस स्त्री ने कहा कि मुझे आपकी रानी बनना स्वीकार है, लेकिन मैं तब तक ही आपके साथ रहूंगी, जब तक आप मुझे किसी बात के लिए रोकेंगे नहीं, न ही मुझसे कोई प्रश्न पूछेंगे। ऐसा होने पर मैं तुरंत आपको छोड़कर चली जाऊंगी। राजा शांतनु ने उस सुंदर स्त्री का बात मान ली और उससे विवाह कर लिया।

विवाह के बाद राजा शांतनु उस सुंदर स्त्री के साथ सुखपूर्वक रहने लगे। समय बीतने पर शांतनु के यहां सात पुत्रों ने जन्म लिया, लेकिन सभी पुत्रों को उस स्त्री ने गंगा नदी में डाल दिया। शांतनु यह देखकर भी कुछ नहीं कर पाएं क्योंकि उन्हें डर था कि यदि मैंने इससे इसका कारण पूछा तो यह मुझे छोड़कर चली जाएगी। आठवां पुत्र होने पर जब वह स्त्री उसे भी गंगा में डालने लगी तो शांतनु ने उसे रोका और पूछा कि वह यह क्यों कर रही है?
उस स्त्री ने बताया कि मैं देवनदी गंगा हूं तथा जिन पुत्रों को मैंने नदी में डाला था वे सभी वसु थे जिन्हें वसिष्ठ ऋषि ने श्राप दिया था। उन्हें मुक्त करने लिए ही मैंने उन्हें नदी में प्रवाहित किया। आपने शर्त न मानते हुए मुझे रोका। इसलिए मैं अब जा रही हूं। ऐसा कहकर गंगा शांतनु के आठवें पुत्र को लेकर अपने साथ चली गई।

(‘आपने वशिष्ठ ऋषि के बारे में सुना होगा। वशिष्ठ अपने आश्रम में रहते थे और उनके पास नंदिनी नाम की एक गाय थी, जिसमें दैवी गुण थे। एक दिन, आठों वसु अपनी पत्नियों के साथ विमानों में बैठकर पृथ्वी पर छुट्टियां मनाने गए। वे वशिष्ठ के आश्रम से गुजरे और उन्होंने अविश्वसनीय दैवी गुणों वाली नंदिनी गाय को देखा। एक वसु प्रभास की पत्नी ने कहा, ‘मुझे वह गाय चाहिए।’ प्रभास ने बिना सोचे-समझे कहा, ‘चलो, वह गाय लेकर आते हैं।’

एक-दो वसुओं ने कहा, ‘मगर यह हमारी गाय नहीं है। यह एक ऋषि की गाय है। हमें इसे नहीं लेना चाहिए।’ प्रभास की पत्नी ने जवाब दिया, ‘कायर ही बहाने खोजते हैं। तुम गाय नहीं ला सकते इसलिए धर्म को बीच में ला रहे हो।’ प्रभास को अपनी मर्दानगी याद आ गई और उसने अपने साथियों की मदद से गाय को चुराने की कोशिश की। जैसे ही वशिष्ठ को पता चला कि उनकी प्रिय गाय को चुराया जा रहा है, उन्होंने वसुओं को पकड़ लिया और बोले, ‘ऐसा काम करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई। तुम लोग अतिथि बन कर आए। हमने तुम्हारी इतनी खातिरदारी की और तुम मेरी ही गाय को चुराना चाहते हो।’

उन्होंने वसुओं को श्राप दे दिया - ‘तुम लोग इंसानों के रूप में जन्म लोगे और उसके साथ आने वाली सभी सीमाओं में बंध कर रहोगे। तुम्हारे पंख कतर दिए जाएंगे, जिससे तुम उड़ नहीं सकोगे। तुम्हें इस धरती पर जीवन बिताना होगा। तुम्हें बाकी इंसानों की तरह पैदा होना और मरना होगा।’ जब वसुओं को पता चला कि मैं (गंगा) देवलोक में हूं और मुझे इंसान के रूप में धरती पर जाने का श्राप मिला है, तो आठों वसुओं ने मुझसे प्रार्थना की - ‘कुछ ऐसा कीजिए कि हम आपके गर्भ से पैदा हों। और इस धरती पर हमारा जीवन जितना हो सके, उतना छोटा हो।’)

गंगा जब शांतनु के आठवे पुत्र को साथ लेकर चली गई तो वे बहुत उदास रहने लगे। इस तरह थोड़ा और समय बीता। शांतनु एक दिन गंगा नदी के तट पर घूम रहे थे। वहां उन्होंने देखा कि गंगा में बहुत थोड़ा जल रह गया है और वह भी प्रवाहित नहीं हो रहा है। इस रहस्य का पता लगाने जब शांतनु आगे गए तो उन्होंने देखा कि एक सुंदर व दिव्य युवक अस्त्रों का अभ्यास कर रहा है और उसने अपने बाणों के प्रभाव से गंगा की धारा रोक दी है।

यह दृश्य देखकर शांतनु को बड़ा आश्चर्य हुआ। तभी वहां शांतनु की पत्नी गंगा प्रकट हुई और उन्होंने बताया कि यह युवक आपका आठवां पुत्र है। इसका नाम देवव्रत है। इसने वसिष्ठ ऋषि से वेदों का अध्ययन किया है तथा परशुरामजी से इसने समस्त प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को चलाने की कला सीखी है। यह श्रेष्ठ धनुर्धर है तथा इंद्र के समान इसका तेज है। देवव्रत ही आगे जाकर भीष्म कहलाए।

जय मां गंगे! हर हर गंगे!!
जय श्री कृष्ण आप सभी धर्मानुरागी मित्रों को।
🙏🙏🙏🙏

भगवान_श्री_राम_कैसे_इस_भूलोक_को_छोड़कर_पुनः_विष्णुलोक_को_प्रस्थान_किएभगवान_श्री_राम के मृत्यु वरण में सबसे बड़ी बाधा उनके ...
26/11/2021

भगवान_श्री_राम_कैसे_इस_भूलोक_को_छोड़कर_पुनः_विष्णुलोक_को_प्रस्थान_किए

भगवान_श्री_राम के मृत्यु वरण में सबसे बड़ी बाधा उनके प्रिय भक्त_हनुमान थे। क्योंकि हनुमान के होते हुए यम की इतनी हिम्मत नहीं थी की वो प्रभु श्री राम के पास पहुँच चुके। पर स्वयं श्री राम से इसका हल निकाला। आइये जानते है कैसे श्री राम ने इस समस्या का हल निकाला।

एक दिन, श्रीराम जान गए कि उनकी मृत्यु का समय हो गया था। वह जानते थे कि जो जन्म लेता है उसे मरना पड़ता है। “यम को मुझ तक आने दो। मेरे लिए वैकुंठ, मेरे स्वर्गिक धाम जाने का समय आ गया है”, उन्होंने कहा। लेकिन मृत्यु के देवता यम अयोध्या में घुसने से डरते थे क्योंकि उनको राम के परम भक्त और उनके महल के मुख्य प्रहरी हनुमान से भय लगता था।

यम के प्रवेश के लिए हनुमान को हटाना जरुरी था। इसलिए राम ने अपनी अंगूठी को महल के फर्श के एक छेद में से गिरा दिया और हनुमान से इसे खोजकर लाने के लिए कहा। हनुमान ने स्वंय का स्वरुप छोटा करते हुए बिलकुल भंवरे जैसा आकार बना लिया और केवल उस अंगूठी को ढूढंने के लिए छेद में प्रवेश कर गए, वह छेद केवल छेद नहीं था बल्कि एक सुरंग का रास्ता था जो सांपों के नगर नाग लोक तक जाता था। हनुमान नागों के राजा वासुकी से मिले और अपने आने का कारण बताया।
वासुकी हनुमान को नाग लोक के मध्य में ले गए जहां अंगूठियों का पहाड़ जैसा ढेर लगा हुआ था! “यहां आपको राम की अंगूठी अवश्य ही मिल जाएगी” वासुकी ने कहा। हनुमान सोच में पड़ गए कि वो कैसे उसे ढूंढ पाएंगे क्योंकि ये तो भूसे में सुई ढूंढने जैसा था। लेकिन सौभाग्य से, जो पहली अंगूठी उन्होंने उठाई वो राम की अंगूठी थी। आश्चर्यजनक रुप से, दूसरी भी अंगूठी जो उन्होंने उठाई वो भी राम की ही अंगूठी थी। वास्तव में वो सारी अंगूठी जो उस ढेर में थीं, सब एक ही जैसी थी। “इसका क्या मतलब है?” वह सोच में पड़ गए।
वासुकी मुस्कुराए और बाले, “जिस संसार में हम रहते है, वो सृष्टि व विनाश के चक्र से गुजरती है। इस संसार के प्रत्येक सृष्टि चक्र को एक कल्प कहा जाता है। हर कल्प के चार युग या चार भाग होते हैं। दूसरे भाग या त्रेता युग में, राम अयोध्या में जन्म लेते हैं। एक वानर इस अंगूठी का पीछा करता है और पृथ्वी पर राम मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इसलिए यह सैकड़ो हजारों कल्पों से चली आ रही अंगूठियों का ढेर है। सभी अंगूठियां वास्तविक हैं। अंगूठियां गिरती रहीं और इनका ढेर बड़ा होता रहा। भविष्य के रामों की अंगूठियों के लिए भी यहां काफी जगह है”।

हनुमान जी जान गए कि उनका नाग_लोक में प्रवेश और अंगूठियों के पर्वत से साक्षात, कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। यह राम का उनको समझाने का मार्ग था कि मृत्यु को आने से रोका नहीं जा सकेगा। राम मृत्यु को प्राप्त होंगे। संसार समाप्त होगा। लेकिन हमेशा की तरह, संसार पुनः बनता है और राम भी पुनः जन्म लेंगे।

Article :- Suraj Dhanariya

"पुराणों से आधुनिक ज्ञान" "पुराणों को विद्यालयों में लागू करना क्यों अनिवार्य हो"            अट्ठारह पुराणों का संक्षिप्...
26/11/2021

"पुराणों से आधुनिक ज्ञान"
"पुराणों को विद्यालयों में लागू करना क्यों अनिवार्य हो"
अट्ठारह पुराणों का संक्षिप्त परिचय

पुराण शब्द का अर्थ ही है प्राचीन कथा, पुराण विश्व साहित्य के सबसे प्राचीन ग्रँथ हैं, उन में लिखित ज्ञान और नैतिकता की बातें आज भी प्रासंगिक, अमूल्य तथा मानव सभ्यता की आधारशिला हैं
वेदों की भाषा तथा शैली कठिन है, पुराण उसी ज्ञान के सहज तथा रोचक संस्करण हैं। उन में जटिल तथ्यों को कथाओं के माध्यम से समझाया गया है, पुराणों का विषय नैतिकता, विचार, भूगोल, खगोल, राजनीति, संस्कृति, सामाजिक परम्परायें, विज्ञान तथा अन्य बहुत से विषय हैं
विशेष तथ्य यह है कि पुराणों में देवी-देवताओं, राजाओं, और ऋषि-मुनियों के साथ साथ जन साधारण की कथाओं का भी उल्लेख किया गया हैं, जिस से पौराणिक काल के सभी पहलूओं का चित्रण मिलता है।
महृर्षि वेदव्यासजी ने अट्ठारह पुराणों का संस्कृत भाषा में संकलन किया है, ब्रह्मदेव, श्री हरि विष्णु भगवान् तथा भगवान् महेश्वर उन पुराणों के मुख्य देव हैं, त्रिमूर्ति के प्रत्येक भगवान स्वरूप को छः पुराण समर्पित किये गये हैं, इन अट्ठारह पुराणों के अतिरिक्त सोलह उप-पुराण भी हैं।

पुराणों का संक्षिप्त परिचय:

1. ब्रह्म पुराण

ब्रह्मपुराण सब से प्राचीन है, इस पुराण में दो सौ छियालीस अध्याय तथा चौदह हजार श्र्लोक हैं, इस ग्रंथ में ब्रह्माजी की महानता के अतिरिक्त सृष्टि की उत्पत्ति, गंगा अवतरण तथा रामायण और कृष्णावतार की कथायें भी संकलित हैं इस ग्रंथ से सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर सिन्धु घाटी सभ्यता तक की कुछ ना कुछ जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

2.पद्म पुराण

दूसरा हैं पद्मपुराण, जिसमें हैं पचपन हजार श्र्लोक और यह ग्रन्थ पाँच खण्डों में विभाजित किया गया है, जिनके नाम सृष्टिखण्ड, स्वर्गखण्ड, उत्तरखण्ड, भूमिखण्ड तथा पातालखण्ड हैं, इस ग्रंथ में पृथ्वी आकाश, तथा नक्षत्रों की उत्पति के बारे में विस्तार से उल्लेख किया गया है, चार प्रकार से जीवों की उत्पत्ति होती है जिन्हें उदिभज, स्वेदज,अणडज तथा जरायुज की श्रेणी में रखा गया है, यह वर्गीकरण पूर्णतया वैज्ञानिक आधार पर है। भारत के सभी पर्वतों तथा नदियों के बारे में भी विस्तार से वर्णन है, इस पुराण में शकुन्तला दुष्यन्त से ले कर भगवान राम तक के कई पूर्वजों का इतिहास है, शकुन्तला दुष्यन्त के पुत्र भरत के नाम से हमारे देश का नाम जम्बूदीप से भरतखण्ड और उस के बाद भारत पडा था यह पद्म पुराण हम सभी भाई-बहनों को पढ़ना चाहियें, क्योंकि इस पुराण में हमारे भूगौलिक और आध्यात्मिक वातावरण का विस्तृत वर्णन मिलता है।

3.विष्णु पुराण

तीसरा पुराण हैं विष्णुपुराण, जिसमें छः अँश तथा तेइस हजार श्र्लोक हैं, इस ग्रंथ में भगवान् श्री विष्णुजी, बालक ध्रुवजी तथा कृष्णावतार की कथायें संकलित हैं, इस के अतिरिक्त सम्राट पृथुजी की कथा भी शामिल है, जिसके कारण हमारी धरती का नाम पृथ्वी पडा था, इस पुराण में सू्र्यवँशीयों तथा चन्द्रवँशीयों राजाओं का सम्पूर्ण इतिहास है।

उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।।

भारत की राष्ट्रीय पहचान सदियों पुरानी है, जिसका प्रमाण विष्णु पुराण के इस श्लोक में मिलता है, साधारण शब्दों में इस का अर्थ होता है कि वह भूगौलिक क्षेत्र जो उत्तर में हिमालय तथा दक्षिण में सागर से जो घिरा हुआ है, यही भारत देश है तथा उस में निवास करने वाले हम सभी जन भारत देश की ही संतान हैं, भारत देश और भारत वासियों की इस से स्पष्ट पहचान और क्या हो सकती है? विष्णु पुराण वास्तव में ऐक ऐतिहासिक ग्रंथ है।

4. शिव पुराण

चौथा पुराण हैं शिवपुराण जिसे आदर से शिव महापुराण भी कहते हैं, इस महापुराण में चौबीस हजार श्र्लोक हैं, तथा यह सात संहिताओं में विभाजित है, इस ग्रंथ में भगवान् शिवजी की महानता तथा उन से सम्बन्धित घटनाओं को दर्शाया गया है इस ग्रंथ को वायु पुराण भी कहते हैं, इसमें कैलास पर्वत, शिवलिंग तथा रुद्राक्ष का वर्णन और महत्व विस्तार से दर्शाया गया है। सप्ताह के सातों दिनों के नामों की रचना, प्रजापतियों का वर्णन तथा काम पर विजय पाने के सम्बन्ध में विस्तार से वर्णन किया गया है
सप्ताह के दिनों के नाम हमारे सौर मण्डल के ग्रहों पर आधारित हैं, और आज भी लगभग समस्त विश्व में प्रयोग किये जाते हैं, भगवान् शिवजी के भक्तों को श्रद्धा और भक्ति से शिवमहापुराण का नियमित पाठ करना चाहिये भगवान् शंकरजी बहुत दयालु और भोले है, जो भी इस शीव पुराण को भाव से पढ़ता है उसका कल्याण निश्चित हैं।

5. भागवत पुराण

पाँचवा है भागवतपुराण, जिसमें अट्ठारह हजार श्र्लोक हैं, तथा बारह स्कंध हैं, इस ग्रंथ में अध्यात्मिक विषयों पर वार्तालाप है भागवत् पुराण में भक्ति, ज्ञान तथा वैराग्य की महानता को दर्शाया गया है, भगवान् विष्णुजी और भगवान् गोविन्द के अवतार की कथाओं को विसतार से दर्शाया गया हैं, इसके अतिरिक्त महाभारत काल से पूर्व के कई राजाओं, ऋषि मुनियों तथा असुरों की कथायें भी संकलित हैं।
इस ग्रंथ में महाभारत युद्ध के पश्चात श्रीकृष्ण का देहत्याग, दूारिका नगरी के जलमग्न होने और यादव वँशियों के नाश तक का विवर्ण भी दिया गया है।

6. नारद पुराण

नारदपुराण छठा पुराण हैं जो पच्चीस हजार श्र्लोकों से अलंकृत है, तथा इस के भी भी दो भाग हैं दोनों भागो में सभी अट्ठारह पुराणों का सार दिया गया है, प्रथम भाग में मन्त्र तथा मृत्यु पश्चात के क्रम और विधान हैं, गंगा अवतरण की कथा भी विस्तार पूर्वक बतायी गयी है, दूसरे भाग में संगीत के सातों स्वरों, सप्तक के मन्द्र मध्य तथा तार स्थानों, मूर्छनाओं, शुद्ध एवम् कूट तानो और स्वरमण्डल का ज्ञान लिखित है। संगीत पद्धति का यह ज्ञान आज भी भारतीय संगीत का आधार है, जो पाश्चात्य संगीत की चकाचौंध से चकित हो जाते हैं, उनके लिये उल्लेखनीय तथ्य यह है कि नारद पुराण के कई शताब्दी पश्चात तक भी पाश्चात्य संगीत में केवल पाँच स्वर होते थे, तथा संगीत की थ्योरी का विकास शून्य के बराबर था, मूर्छनाओं के आधार पर ही पाश्चात्य संगीत के स्केल बने हैं, सभी संगीत के प्रेमी जो संगीत को ही अपना केरियर समझ लिया हो, या संगीत और अध्यात्म को साथ में देखने वाले ब्रह्म पुरूष को नारद पुराण को जरूर पढ़ना चाहियें।

7. मार्कंडेय पुराण

साँतवा है मार्कण्डेयपुराण, जो अन्य पुराणों की अपेक्षा सबसे छोटा पुराण है, मार्कण्डेय पुराण में नौ हजार श्र्लोक हैं तथा एक सो सडतीस अध्याय हैं, इस ग्रंथ में सामाजिक न्याय और योग के विषय में ऋषिमार्कण्डेयजी तथा ऋषि जैमिनिजी के मध्य वार्तालाप है इस के अतिरिक्त भगवती दुर्गाजी तथा भगवान् श्रीक़ृष्ण से जुड़ी हुयी कथायें भी संकलित हैं, सभी ब्रह्म समाज को यह पुराण पढ़नी चाहिये, कम से कम मार्कण्डेयजी ऋषि के वंशज इस पुराण को थोड़ा-थोड़ा करके पढ़ने की कोशिश करनी चाहिये मार्कण्डेय पुराण के अध्ययन से आध्यात्मिक अक्षय सुख की प्राप्ति होती है।

8. अग्नि पुराण

आठवाँ है अग्निपुराण, अग्नि पुराण में तीन सौ तैयासी अध्याय तथा पन्द्रह हजार श्र्लोक हैं, इस पुराण को भारतीय संस्कृति का ज्ञानकोष या आज की भाषा में विकीपीडिया कह सकते है। इस ग्रंथ में भगवान् मत्स्यावतार का वर्णन है, रामायण तथा महाभारत काल की संक्षिप्त कथायें भी संकलित हैं, इसके अतिरिक्त कई विषयों पर वार्तालाप है जिन में धनुर्वेद, गान्धर्व वेद तथा आयुर्वेद मुख्य हैं, धनुर्वेद, गान्धर्व वेद तथा आयुर्वेद को उप-वेद भी कहा जाता है।

9. भविष्य पुराण

नवमा है भविष्यपुराण, भविष्य पुराण में एक सौ उनतीस अध्याय तथा अट्ठाईस श्र्लोक हैं, इस ग्रंथ में सूर्य देवता का महत्व, वर्ष के बारह महीनों का निर्माण, भारत के सामाजिक, धार्मिक तथा शैक्षिक विधानों और भी कई विषयों पर वार्तालाप है इस पुराण में साँपों की पहचान, विष तथा विषदंश सम्बन्धी महत्वपूर्ण जानकारी भी दी गयी है, इस भविष्य पुराण की कई कथायें बाईबल की कथाओं से भी मेल खाती हैं, भविष्य पुराण में पुराने राजवँशों के अतिरिक्त भविष्य में आने वाले नन्द वँश, मौर्य वँशों का भी वर्णन है। इस के अतिरिक्त विक्रम बेताल तथा बेताल पच्चीसी की कथाओं का विवरण भी है, भगवान् श्रीसत्य नारायण की कथा भी इसी पुराण से ली गयी है, यह भविष्य पुराण भारतीय इतिहास का महत्वशाली स्त्रोत्र है, जिस पर शोध कार्य करना चाहिये और इसके उपदेश हर आज के क्षात्र-क्षात्राओं को पढ़ाना चाहिये और प्रथम क्लास से ही, शिक्षा से जुड़े समस्त अध्यापक एवम् अध्यापिका को इस भविष्य पुराण नामक पुराण को अवश्य पढ़ना चाहियें, ताकि आपकी समझ बढे, और समाज में अध्यात्म जागृति लायें।

10. ब्रह्मवैवर्त पुराण

दसवाँ पुराण है ब्रह्मावैवर्तपुराण, जो अट्ठारह हजार श्र्लोकों से अलंकृत है, तथा दो सौ अट्ठारह अध्याय हैं, इस ग्रंथ में ब्रह्माजी, गणेशजी, तुलसी माता, सावित्री माता, लक्ष्मी माता, सरस्वती माता तथा भगवान् श्रीकृष्ण की महानता को दर्शाया गया है तथा उन से जुड़ी हुई कथायें संकलित हैं, इस पुराण में आयुर्वेद सम्बन्धी ज्ञान भी संकलित है, जो आयुर्वेद और भारतीय परम्परा में निरोगी काया के विषय पर गंभीर है, उसे यह ब्रह्मावैवर्त पुराण आपका पथ प्रदर्शक बनेगा।

11. लिंग पुराण

ग्यारहवा है लिंगपुराण, इस पावन लिंग पुराण में ग्यारह हजार श्र्लोक और एक सौ तरसठ अध्याय हैं, सृष्टि की उत्पत्ति तथा खगौलिक काल में युग, कल्प की तालिका का वर्णन है, भगवान् सूर्यदेव के सूर्य के वंशजों में राजा अम्बरीषजी हुयें रामजी इन्हीं राजा अम्बरीषजी के कूल में अवतार हुआ था, राजा अम्बरीषजी की कथा भी इसी पुराण में लिखित है, इस ग्रंथ में अघोर मंत्रों तथा अघोर विद्या के सम्बन्ध में भी उल्लेख किया गया है।

12. वराह पुराण

बाहरवां पुराण हैं वराहपुराण, वराह पुराण में दो सौ सत्रह स्कन्ध तथा दस हजार श्र्लोक हैं, इस ग्रंथ में भगवान् श्री हरि के वराह अवतार की कथा, तथा इसके अतिरिक्त भागवत् गीता महात्म्य का भी विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है इस पुराण में सृष्टि के विकास, स्वर्ग, पाताल तथा अन्य लोकों का वर्णन भी दिया गया है, श्राद्ध पद्धति, सूर्य के उत्तरायण तथा दक्षिणायन विचरने, अमावस और पूर्णमासी के कारणों का वर्णन है। महत्व की बात यह है कि जो भूगौलिक और खगौलिक तथ्य इस पुराण में संकलित हैं। वही तथ्य पाश्चात्य जगत के वैज्ञिानिकों को पंद्रहवी शताब्दी के बाद ही पता चले थे, सभी सनातन धर्म को मानने वाले भाई-बहनों को यह वराह पुराण को अवश्य पढ़ना चाहियें, जो भक्त अपने जीवन में जीते जी स्वर्ग की कल्पना करता है, उसके लिये वराह पुराण अतुल्य है इसमें स्वर्ग-नरक का भगवान् श्री वेदव्यासजी ने बखूबी वर्णन किया है।

13. स्कंद पुराण

तेहरवां पुराण हैं सकन्दपुराण, सकन्द पुराण सब से विशाल पुराण है, तथा इस पुराण में अक्यासी हजार श्र्लोक और छः खण्ड हैं, सकन्द पुराण में प्राचीन भारत का भूगौलिक वर्णन है जिस में सत्ताईस नक्षत्रों, अट्ठारह नदियों, अरुणाचल प्रदेश का सौंदर्य, भारत में स्थित भगवान् भोलेनाथ के बारह ज्योतिर्लिंगों, तथा गंगा अवतरण के आख्यान शामिल हैं, इसी पुराण में स्याहाद्री पर्वत श्रंखला तथा कन्या कुमारी मन्दिर का उल्लेख भी किया गया है इसी पुराण में सोमदेव, तारा तथा उन के पुत्र बुद्ध ग्रह की उत्पत्ति की अलंकारमयी कथा भी है।

14. वामन पुराण

चौदहवां पुराण है वामनपुराण, वामन पुराण में निन्यानवें अध्याय तथा दस हजार श्र्लोक हैं, एवम् दो खण्ड हैं, इस पुराण का केवल प्रथम खण्ड ही उप्लब्द्ध है इस पुराण में भगवान् के वामन अवतार की कथा विस्तार से कही गयी हैं, जो भरूचकच्छ (गुजरात) में हुआ था, इस के अतिरिक्त इस ग्रंथ में भी सृष्टि, जम्बूदूीप तथा अन्य सात दूीपों की उत्पत्ति, पृथ्वी की भूगौलिक स्थिति, महत्वशाली पर्वतों, नदियों तथा भारत के खण्डों का जिक्र है।

15. कूर्म पुराण

पन्द्रहवां पुराण है कुर्मपुराण, कुर्म पुराण में अट्ठारह हजार श्र्लोक तथा चार खण्ड हैं, इस पुराण में चारों वेदों का सार संक्षिप्त रूप में दिया गया है, कुर्म पुराण में कुर्म अवतार से सम्बन्धित सागर मंथन की कथा विस्तार पूर्वक लिखी गयी है इस में ब्रह्माजी, शिवजी, विष्णुजी, पृथ्वी माता, गंगा मैया की उत्पत्ति, चारों युगों के बारे में सटीक जानकारी, मानव जीवन के चार आश्रम धर्मों, तथा चन्द्रवँशी राजाओं के बारे में भी विस्तार से वर्णन है।

16. मत्स्य पुराण

सोलहवां पुराण है मतस्यपुराण, मतस्य पुराण में दो सौ नब्बे अध्याय तथा चौदह हजार श्र्लोक हैं, इस ग्रंथ में मतस्य अवतार की कथा का विस्तरित उल्लेख किया गया है, सृष्टि की उत्पत्ति और हमारे सौर मण्डल के सभी ग्रहों चारों युगों तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास वर्णित है, कच, देवयानी, शर्मिष्ठा तथा राजा ययाति की रोचक कथा भी इसी मतस्य पुराण में है, सामाजिक विषयों के जानकारी के इच्छुक भाई-बहनों को मतस्य पुराण को जरूर पढ़ना चाहियें।

17. गरुड़ पुराण

सत्रहवां पुराण है गरुड़पुराण, गरुड़ पुराण में दो सौ उनअस्सी अध्याय तथा अट्ठारह हजार श्र्लोक हैं; इस ग्रंथ में मृत्यु पश्चात की घटनाओं, प्रेत लोक, यम लोक, नरक तथा चौरासी लाख योनियों के नरक स्वरुपी जीवन के बारे में विस्तार से बताया गया है
इस पुराण में कई सूर्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का वर्णन भी है, साधारण लोग इस ग्रंथ को पढ़ने से हिचकिचाते हैं, क्योंकि? इस ग्रंथ को किसी सम्वन्धी या परिचित की मृत्यु होने के पश्चात ही पढ़वाया जाता है। वास्तव में इस पुराण में मृत्यु पश्चात पुनर्जन्म होने पर गर्भ में स्थित भ्रूण की वैज्ञानिक अवस्था सांकेतिक रूप से बखान की गयी है, जिसे वैतरणी नदी की संज्ञा दी गयी है, उस समय तक भ्रूण के विकास के बारे में कोई भी वैज्ञानिक जानकारी नहीं थी, तब हमारे इसी गरूड पुराण ने विज्ञान और वैज्ञानिकों को दिशा दी इस पुराण को पढ़ कर कोई भी मानव नरक में जाने से बच सकता है।

18. ब्रह्मांड पुराण

अट्ठारहवां और अंतिम पुराण हैं ब्रह्माण्डपुराण, ब्रह्माण्ड पुराण में बारह हजार श्र्लोक तथा पू्र्व, मध्य और उत्तर तीन भाग हैं, मान्यता है कि अध्यात्म रामायण पहले ब्रह्माण्ड पुराण का ही एक अंश थी जो अभी एक प्रथक ग्रंथ है, इस पुराण में ब्रह्माण्ड में स्थित ग्रहों के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है,कई सूर्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास भी संकलित है,सृष्टि की उत्पत्ति के समय से ले कर अभी तक सात मनोवन्तर बीत चुके हैं जिन का विस्तरित वर्णन इस ग्रंथ में किया गया है।
भगवान् श्री परशुरामजी की कथा भी इस पुराण में दी गयी है, इस ग्रँथ को विश्व का प्रथम खगोल शास्त्र कह सकते है, भारत के ऋषि इस पुराण के ज्ञान को पूरे ब्रह्माण्ड तक ले कर गये थे, जिसके प्रमाण हमें मिलते रहे है, हिन्दू पौराणिक इतिहास की तरह अन्य देशों में भी महामानवों, दैत्यों, देवों, राजाओं तथा साधारण नागरिकों की कथायें प्रचिलित हैं, कईयों के नाम उच्चारण तथा भाषाओं की विभिन्नता के कारण बिगड़ भी चुके हैं जैसे कि हरिकुल ईश से हरकुलिस, कश्यप सागर से केस्पियन सी, तथा शम्भूसिहं से शिन बू सिन आदि बन गये।
वंशों से जोडा है, इस कारण पौराणिक कथायें इतिहास, साहित्य तथा दंत कथाओं का मिश्रण हैं। रामायण, महाभारत तथा पुराण हमारे प्राचीन इतिहास के बहुमूल्य स्त्रोत्र हैं, जिनको केवल साहित्य समझ कर अछूता छोड़ दिया गया है,इतिहास की विक्षप्त श्रंखलाओं को पुनः जोड़ने के लिये हमें पुराणों तथा महाकाव्यों पर शोध करना होगा, पढ़े-लिखे आज की युवा पीढ़ी को यह आव्हान है, जो छुट गया उसे जाने दो, जो अध्यात्म विरासत बची है, उसे समझने की कोशिश करों, पुराणों में अंकीत उपदेशों को अपने जीवन में आत्मसात करें।
जय सनातन धर्म।
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🚩 #रामायण_श्रीराम_के_पदचिह्न 🚩🚩 #किष्किंधा🚩तुंगभद्रा और कावेरी नदी को पार करते हुए राम और लक्ष्‍मण चले सीता की खोज में। ...
24/11/2021

🚩 #रामायण_श्रीराम_के_पदचिह्न 🚩

🚩 #किष्किंधा🚩
तुंगभद्रा और कावेरी नदी को पार करते हुए राम और लक्ष्‍मण चले सीता की खोज में। जटायु और कबंध से मिलने के पश्‍चात वे ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे। रास्ते में वे पम्पा नदी के पास शबरी आश्रम भी गए, जो आजकल केरल में स्थित है। शबरी जाति से भीलनी थीं और उनका नाम था श्रमणा। 'पम्पा' तुंगभद्रा नदी का पुराना नाम है। इसी नदी के किनारे पर हम्पी बसा हुआ है। पौराणिक ग्रंथ 'रामायण' में हम्पी का उल्लेख वानर राज्य किष्किंधा की राजधानी के तौर पर किया गया है। केरल का प्रसिद्ध 'सबरिमलय मंदिर' तीर्थ इसी नदी के तट पर स्थित है।

मलय पर्वत और चंदन वनों को पार करते हुए वे ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़े। यहां उन्होंने हनुमान और सुग्रीव से भेंट की, सीता के आभूषणों को देखा और श्रीराम ने बाली का वध किया। ऋष्यमूक पर्वत वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानरों की राजधानी किष्किंधा के निकट स्थित था। ऋष्यमूक पर्वत तथा किष्किंधा नगर कर्नाटक के हम्पी, जिला बेल्लारी में स्थित है।
पास की पहाड़ी को 'मतंग पर्वत' माना जाता है। इसी पर्वत पर मतंग ऋषि का आश्रम था जो हनुमानजी के गुरु थे

किष्किन्धा जो कि आज हम्पी है, वाल्मीकि रामायण में पहले वालि का तथा उसके पश्चात् सुग्रीव का राज्य बताया गया है।
आज के संदर्भ में यह राज्य तुंगभद्रा नदी के किनारे वाले कर्नाटक के हम्पी शहर के आस-पास के इलाके में माना गया है। रामायण के काल में विन्ध्याचल पर्वत माला से लेकर पूरे भारतीय प्रायद्वीप में एक घना वन फैला हुआ था जिसका नाम था दण्डक वन। उसी वन में यह राज्य था। अतः यहाँ के निवासियों को वानर कहा जाता था, जिसका अर्थ होता है वन में रहने वाले लोग। रामायण में किष्किन्धा के पास जिस ऋष्यमूक पर्वत की बात कही गयी है वह आज भी उसी नाम से तुंगभद्रा नदी के किनारे स्थित है।

किष्किंधा नगर वानरों का साम्राज्य था जिस पर सुग्रीव के भाई बाली का राज था। श्रीराम ने बाली को मार कर सु्ग्रीव को राजा बनाया। हनुमानजी और श्रीराम की पहली मुलाकात भी इसी नगर के पास जंगलों में हुई थी। इस क्षेत्र में आज भी उस काल की यादों बसी हुई हैं। यह नगर पर्यटन का प्रमुख केंद्र भी है।

उस काल का किष्किंधा नगर आज भी कर्नाटक राज्य में है। राज्य के दो जिले कोप्पल और बेल्लारी में रामायण काल के प्रसिद्ध किष्किंधा क्षेत्र के अस्तित्व के अवशेष आज भी पाए जाते हैं।

🚩 #ऋष्यमूक_पर्वत🚩
हम बात कर रहे हैं रामायण काल के एक प्रसिद्ध पर्वत की। बता दें कि इस पर्वत का रामायण में कई बार जिक्र किया गया है। इसका नाम ऋष्यमूक पर्वत है। कहे हैं कि पर्वत के इस नाम से संबंधित एख रोचन कथा का वर्णन मिलता है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब रावण का अत्याचार बहुत बढ़ गया था बहुत से ऋषि उससे डरकर एक साथ एक पर्वत पर जाकर रहने लगे। कहते हैं ये भी ऋषि यहां मौन होकर रावण का विरोध कर रहे थे। बता दें कि रामायण में किष्किंधा के पास जिस ऋष्यमूक पर्वत की बात कही गई है वह आज भी उसी नाम से तुंगभद्रा नदी के किनारे स्थित है। जब रावण विश्व विजय प्राप्त करने के लिए इस पर्वत के समीप से गुज़रा तो उसने बहुत से ऋषियों को एक साथ देखा तो उसने उनके इक्टठे होने का कारण पूछा तो राक्षसों ने उसे बताया महाराज आपके द्वारा सताए हुए ऋषि मूक यानि मौन होकर यहां आपका विरोध कर रहे हैं।

ये सुनकर रावण को क्रोध आ गया और उसने एक-एक करके सारे ऋषियों को मार डाला। कहा जाता है कि उन्हीं के अस्थि अवशेषों से यहां पहाड़ बन गया, तभी से इस पर्वत को ऋष्यमूक पर्वत के नाम से जाना जाने लगा। बता दें पौराणिक ग्रंथों में इससे जुड़ी एक जानकारी मिलती है। रामायण के अनुसार ऋष्यमूक पर्वत में ऋषि मतंग का आश्रम था। बालि ने दुंदुभि असुर का वध करके दोनों हाथों से उनका मृत शरीर एक ही झटके में एक योजन दूर फेंक दिया था। हवा में उड़ते हुए मृत दुंदुभि के मुंह से रक्तस्राव हो रहा था जिसकी कुछ बूंदें मतंग ऋषि के आश्रम पर भी पड़ गई थी। मतंग यह जानने के लिए कि यह किस ने किया है, अपने आश्रम से बाहर निकले। उन्होंने अपने दिव्य तप से सारा हाल जान लिया और जब उन्हें पता चला कि ये बालि ने किया है तो उन्होंने उसे शाप दे डाला कि अगर वह कभी भी ऋष्यमूक पर्वत के एक योजन के पास भी आएगा तो अपने प्राणों खो बैठेगा। कहते हैं इस बात के बारे में बालि के छोटे भाई सुग्रीव को पता था। इसी कारण से जब बालि ने सुग्रीव को देश-निकाला दिया तो उसने बालि से बचने के लिए अपने अनुयायियों के साथ ऋष्यमूक पर्वत में जाकर शरण ली।

🚩 #सुग्रीव_गुफा🚩

सुग्रीव अपने भाई बाली से डरकर जिस कंदरा में रहता था, उसे सुग्रीव गुफा के नाम से जाना जाता है। यह ऋष्यमूक पर्वत पर स्थित थी। ऐसी मान्यता है कि दक्षिण भारत में प्राचीन विजयनगर साम्राज्य के विरुपाक्ष मंदिर से कुछ ही दूर पर स्थित एक पर्वत को ऋष्यमूक कहा जाता था और यही रामायण काल का ऋष्यमूक है। मंदिर के निकट सूर्य और सुग्रीव आदि की मूर्तियां स्थापित हैं।

रामायण की एक कहानी के अनुसार वानरराज बाली ने दुंदुभि नामक राक्षस को मारकर उसका शरीर एक योजन दूर फेंक दिया था। हवा में उड़ते हुए दुंदुभि के रक्त की कुछ बूंदें मातंग ऋषि के आश्रम में गिर गईं। ऋषि ने अपने तपोबल से जान लिया कि यह करतूत किसकी है।

क्रुद्ध ऋषि ने बाली को शाप दिया कि यदि वह कभी भी ऋष्यमूक पर्वत के एक योजन क्षेत्र में आएगा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी। यह बात उसके छोटे भाई सुग्रीव को ज्ञात थी और इसी कारण से जब बाली ने उसे प्रताड़ित कर अपने राज्य से निष्कासित किया तो वह इसी पर्वत पर एक कंदरा में अपने मंत्रियों समेत रहने लगा। यहीं उसकी राम और लक्ष्मण से भेंट हुई और बाद में राम ने बाली का वध किया और सुग्रीव को किष्किंधा का राज्य मिला।

🚩 #बाली_की_गुफा🚩

बाली जिस गुफा में रहता था, वह गुफा भी आकर्षण का केंद्र है। यह अंधेरी, लेकिन काफी लंबी-चौड़ी गुफा है। जहां एक साथ कई अंदर जा सकते हैं। इसी गुफा से ललकार कर राम ने बाली को निकाला। जब उनके हाथों बाली की मृत्यु हो गई तो सुग्रीव को राजपाट सौंपा गया यानी यहां रामायण में उल्लेख हुई ढेरों बातें देखने को मिल जाएंगी। इससे पहले सुग्रीव अपने भाई बाली से डरकर ऋष्यमूक पर्वत पर रहता था, जो आज भी यहां मौजूद है। वहां वह बाली से इसलिए सुरक्षित था, क्योंकि बाली को एक ऋषि ने शाप दिया था कि वह अगर ऋष्यमूक पर्वत पर चढ़ेगा तो मारा जाएगा। इसी पर्वत पर हनुमान ने राम और सुग्रीव की दोस्ती कराई थी।

🚩 #त्रेतायुग_में_किष्किंधा #दण्डक_वन का एक भाग🚩

भगवान राम के युग यानी त्रेतायुग में किष्किंधा दण्डक वन का एक भाग होता था, जो विंध्याचल से आरंभ होता था और दक्षिण भारत के समुद्री क्षेत्रों तक पहुंचता था। भगवान श्रीराम को जब वनवास मिला तो लक्ष्मण और सीता के साथ उन्होंने इसी दण्डक वन में प्रवेश किया। यहां से रावण ने सीता का अपहरण कर लिया था। श्रीराम सीता को खोजते हुए किष्किंधा में आए। चूंकि राम यहां कई स्थानों पर रहे, लिहाजा यहां उनके कई मंदिर और स्मृति चिन्ह हैं। लगता है कि प्राचीन समय में किष्किंधा काफी ऐश्वर्यशाली नगरी थी, बाल्मीकि रामायण में इसका विस्तार से उल्लेख है। अंश इस प्रकार है- लक्ष्मण ने उस विशाल गुहा को देखा जो कि रत्नों से भरी थी और अलौकिक दीख पड़ती थी। उसके वनों में खूब फूल खिले हुए थे। ह‌र्म्य प्रासादों से सघन, विविध रत्नों से शोभित और सदाबहार वृक्षों से वह नगरी संपन्न थी। दिव्यमाला और वस्त्र धारण करने वाले सुंदर देवताओं, गंधर्व पुत्रों और इच्छानुसार रूप धारण करने वाले वानरों से वह नगरी बड़ी भली दीख पड़ती थी। चंदन, अगरु और कमल की गंध से वह गुहा सुवासित थी। मैरेय और मधु से वहां की चौड़ी सड़कें सुगंधित थीं। इस वर्णन से यह स्पष्ट है कि किष्किंधा पर्वत की एक विशाल गुहा के भीतर बसी हुई थी। इस नगरी में सुरक्षार्थ यंत्र आदि भी लगे थे।

कर्नाटक का बेल्लारी जिला और यहां का एक छोटा-सा शहर 'हम्पी' कभी मध्यकालीन हिंदू राज्य विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हुआ करता था। हम्पी तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित है। यह नगर प्राचीन काल में 'पंपा' के नाम से भी जाना जाता था। माना जाता है कि पंपा में ही भगवान श्रीराम जी की पहली भेंट भगवान श्री हनुमानजी से हुई थी।

🚩कैसे हुई भेंट🚩
पौराणिक कथाओं के अनुसार जब रावण, महाराष्ट्र में नासिक के पास, पंचवटी से माता सीता का अपहरण कर लंका ले गया था। तब सीता कहां गईं श्रीराम और लक्ष्मण को पता नहीं था। वह जंगल-जंगल भटके, लेकिन माता सीता का कुछ भी पता नहीं चल पाया। उस समय सीता की खोज करते हुए दोनों भाई किष्किंधा पहुंचे। इस क्षेत्र में ही अंजनी पर्वत पर बजरंगबली के पिता महाराज केसरी का राज था, जहां बजरंगबली रहते थे। वाल्मीकि रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम और लक्ष्मण की मुलाकात सुग्रीव से हुई। सुग्रीव के मित्र, बजरंगबली थे जब उन्हें पता चला कि दो राजकुमार उनके क्षेत्र में आए हैं। तब वह ब्रह्मण रूप में उनसे मिलने पहुंचे। उन्होंने विनम्रता से कहा, 'सांवले शरीर वाले आप कौन हैं, क्या आप ब्रह्मा, विष्णु, महेश इन तीन देवताओं में से कोई हैं या आप दोनों नर और नारायण हैं?'

🚩 #हंपी_ही_है_पंपा🚩

इस पर श्री रामचंद्रजी ने कहा, 'हम अयोध्या नरेश महाराज दशरथ के पुत्र हैं और पिता का वचन पूरा करने वनवास पर निकले हैं। हमारे राम-लक्ष्मण नाम हैं, हम दोनों भाई हैं। हमारे साथ सुंदर सुकुमारी स्त्री थी। यहां वन में राक्षस ने मेरी पत्नी जानकी को हर लिया।' 'हे ब्राह्मण! हम उसे ही खोजते फिरते हैं। हमने तो अपना चरित्र कह सुनाया। अब हे ब्राह्मण! आप अपनी बारे में सुनाइए, आप कौन हैं?' प्रभु को पहचानकर हनुमानजी उनके चरण पकड़कर पृथ्वी पर नतमस्तक हो गए। उन्होंने साष्टांग दंडवत प्रणाम कर स्तुति की। अपने आराध्य को समाने देख वो हर्ष से सराबोर थे। जहां हनुमानजी की भेंट भगवान श्रीराम से हुई यह ओर कोई नहीं हंपी ही थी जिसे प्राचीन काल में पंपा कहते थे।
कैसा अंजनी पर्वत

🚩 #अंजनी_पर्वत 🚩

अंजनी पर्वत एक ऊंचा पहाड़ है. यही हनुमान जी की जन्मस्थली है. पहाड़ के ऊपर हनुमान जी का एक मंदिर है, जहां अखंड पूजा चलती रहती है. लगातार हनुमान चालीसा पढ़ी जाती रहती है. ये मत सोचिए कि इस मंदिर तक पहुंचना आसान है. शायद ये मुश्किल ही इस मंदिर में आकर हनुमान जी के दर्शनों को और खास भी बनाती है

🚩500 से ज्यादा सीढ़ियां🚩

इसके लिए 500 से अधिक सीढियां चढनी होती हैं। ये आसान तो कतई नहीं. सीढियां चढने के दौरान आप पाते हैं कि कई जगहों पर ये सीढियां पहाड़ियों को काटकर बनाई गई हैं तो कई जगह ये पहाड़ की गुफाओं के बीच से गुजरती हैं. सीढियों के साथ ऊपर चढ़ने के दौरान कई बार ऐसी चट्टानें भी मिलती हैं कि उनके बीच से प्रकृति की खूबसूरती का कैनवस दिखता है. ऊपर पहुंचने पर हनुमान मंदिर में दर्शन के दौरान आप एक अलग आनंद से भर उठेंगे।

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Mumbai
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