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DhiraGyaan Exploring Bharat's Glorious Past

The Ayyappa Seva Sangh conducted an inspection, revealing that the food stall, managed by Abdul Shehim, who also serves ...
14/12/2023

The Ayyappa Seva Sangh conducted an inspection, revealing that the food stall, managed by Abdul Shehim, who also serves as the DYFI Erumeli Regional Secretary, had been utilising toilet water for cooking for approximately two weeks. This revelation has raised concerns about the safety of the food served to devotees.

It's time for Hindus of   to unite and fight against the   regime by electing a Hindu party.
13/12/2023

It's time for Hindus of to unite and fight against the regime by electing a Hindu party.

राम बाम दिसि जानकी, लखन दाहिनी ओर।ध्यान सकल कल्यानमय, सुरतरु तुलसी तोर॥
09/12/2023

राम बाम दिसि जानकी, लखन दाहिनी ओर।
ध्यान सकल कल्यानमय, सुरतरु तुलसी तोर॥

  temple in   the 8th wonder of the worldDid you know? The original name of Angkor Wat temple was Vrah Visnuloka or Para...
02/12/2023

temple in the 8th wonder of the world

Did you know?
The original name of Angkor Wat temple was Vrah Visnuloka or Parama Visnuloka meaning "the sacred dwelling of Bhagwan Vishnu". Angkor Wat is a miniature replica of the universe.
It represents an earthly model of the cosmic world. The central tower rises from the center of the monument symbolizing the mountain , situated at the center of the universe. Its five towers correspond to the peaks of Meru.

During the 12th century, it was gradually transformed into a Buddhist temple towards the end of the century; as such, it is also described as a "Hindu-Buddhist" temple.

मेरे प्रभु की अयोध्या!! 🚩
23/10/2022

मेरे प्रभु की अयोध्या!!
🚩

  आखिर क्यों शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है जल और बेलपत्र, जानें पौराणिक कथा!!आपने देवताओं और दानवों के सागर मंथन की कथा तो स...
18/10/2022


आखिर क्यों शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है जल और बेलपत्र, जानें पौराणिक कथा!!
आपने देवताओं और दानवों के सागर मंथन की कथा तो सुनी ही होगी। जब ये मंथन हुआ तो उसमें से अच्छी और बुरी दोनों तरह की चीज़े निकली थीं। इसी मंथन के दौरान हलाहल नाम का विष भी निकला जिसका प्रभाव इतना था कि समस्त विश्व विनाश की और बढ़ने लगा। किसी में इतनी शक्ति भी नहीं थी कि उस विष के जानलेवा प्रभाव को रोक सके। तब भगवान शिव ने पूरी सृष्टि को बचाने के लिए ही इस विष को अपने कंठ में धारण किया था। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला हो गया और इसीलिए शिव नीलकंठ भी कहलाए जाते हैं। भगवान ने विष को कंठ में धारण तो कर लिया लेकिन इससे उनका पूरा शरीर अत्यधिक गरम हो गया। जिसकी वजह से आसपास का वातावरण भी जलने लगा। चूंकि बेलपत्र विष के प्रभाव को कम करता है लिहाज़ा तब सभी देवी देवताओं ने बेल पत्र शिवजी को खिलाना शुरू कर दिया।
बेलपत्र के साथ साथ भगवान शिव को शीतल रखने के लिए उन पर जल भी अर्पित किया गया। बेलपत्र और जल के प्रभाव से भोलेनाथ के शरीर में उत्पन्न गर्मी शांत होने लगी। और तभी से शिव पर जल और बेलपत्र चढ़ाने की प्रथा चल पड़ी। इसलिए जब इंसान क्रोधित होते हैं तो उन्हें भी जल (पानी) पीने के लिए कहा जाता है।
इसी प्रकार अपने धर्म, संस्कृति के बारे में जानने के लिए हमारे पेज को और करे तथा अपने परिवार जनों के साथ इन बातों को शेयर /साझा करें। भगवान शिव आप सभी को आशीर्वाद प्रदान करें।

  ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव अपने परिवार के साथ कैलाश पर्वत पर रहते हैं। वहां उनके साथ माता पार्वती, कार्तिकेय एवं भग...
15/10/2022


ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव अपने परिवार के साथ कैलाश पर्वत पर रहते हैं। वहां उनके साथ माता पार्वती, कार्तिकेय एवं भगवान गणेश भी रहते हैं। वे सपरिवार कैलाश पर्वत पर आज भी विराजमान हैं। लेकिन एक और ऐसी मान्यता है जिसके अनुसार भगवान शिव कैलाश पर्वत पर नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर की एक गुफा में रहते हैं। यह गुफा भारतीय और सभी हिंदुओं में काफी प्रसिद्ध है और स्थानीय लोगों के अनुसार यह गुफा भगवान शिव का निवास स्थान है। इस गुफा को शिवखोड़ी के नाम से जाना जाता है।
ऐसा माना जाता है की दरअसल यह गुफा नहीं, एक प्रकार की सुरंग लगती है, जिसके बारे में कहा गया है कि यह दूसरे छोर पर सीधा अमरनाथ की गुफा में जाकर खुलती है। जम्मू से लगभग 140 कि.मी. की दूरी पर ऊधमपुर नामक जगह पर भगवान शिव की यह चमत्कारी गुफा स्थित है। शिवखोड़ी नाम की इस गुफा के भीतर जाने की कोई भी हिम्मत नहीं करता, लेकिन इसके दर्शन करने के लिए रोजाना बड़ी तादाद में श्रद्धालु आते हैं। ऐसा कहा जाता है कि जो भी व्यक्ति इस गुफा के अंदर गया है, वह आज तक वापस लौटकर नहीं आया। अगर आप अमरनाथ की यात्रा पर जा रहे किसी भी श्रद्धालु से इस गुफा के बारे में पूछेंगे, तो वह इसके बारे में जरूर जानता होगा। क्योंकि अमरनाथ धाम की यात्रा करने वाले इस गुफा के दर्शन अवश्य करके जाते हैं। इसके पीछे मान्यता है इस गुफा का अमरनाथ गुफा से ही संबंधित होना। कहा गया है कि गुफा का दूसरा छोर बाबा अमरनाथ जी की गुफा में जाकर ही खुलता है। लेकिन यह कितना सच है इसका पता लगाने के लिए इसके भीतर कोई नहीं जाता।
इस गुफा की एक और खास बात है, जो इसे भी बाबा अमरनाथ गुफा की तरह चमत्कारी बनाती है। दरअसल जिस प्रकार से बाबा अमरनाथ जी की गुफा का शिवलिंग प्राकृतिक है, उसी प्रकार से इस गुफा का शिवलिंग भी अपने-आप ही बना है। इसे किसी ने भी बनाया नहीं है, किंतु अंतर इतना है कि यह शिवलिंग बर्फ से नहीं बना है। यह शिवलिंग चट्टान द्वारा लिए गए आकार की वजह से बना है, जिसे स्वयं भगवान शिव का आशीर्वाद मानकर लोग इसकी पूजा-अर्चना करते हैं।
इस पवित्र गुफा से जुड़ी एक पौराणिक कथा भी यहां के स्थानीय लोगों के बीच काफी प्रचलित है। जिसके अनुसार इस गुफा को स्वयं भगवान शंकर ने बनाया था। कथा के अनुसार जब भोलेनाथ भस्मासुर से बचने के लिए इस गुफा में छुपे तब भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लेकर भस्मासुर का अंत किया था।
क्या आपने कभी इस पावन स्थल के दर्शन किए हैं? कॉमेंट करके आपका अनुभव लोगों के साथ साझा करें। हर हर महादेव!!
🙏

12/10/2022

उसने आक्रांताओं को देखा, फिर भी शांत रहा!!
उसके मंदिरों को तोड़ा गया, फिर भी वो शांत रहा!!
उसके भक्तों को मारा गया, फिर भी वो शांत रहा!!
उसको दुत्कारा गया, फिर भी वो शांत रहा!!
उसको शमशान निवासी पुकारा गया, फिर भी वो शांत रहा!!
उसकी मूर्तियों को दफनाया गया, फिर भी वो शांत रहा!!
परंतु कभी सोचा है की जो स्वयं महाकाल है, और समस्त ब्रह्मांड जिसके आधीन है, जिसे संपूर्ण सृष्टि का सृजन और विनाश का अधिकार है वो शांत क्यों थे?
क्योंकि सत्य को कभी छुपाया नहीं जा सकता!! सत्य स्वयं अपना मार्ग खोज ही लेता है!!
नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥८॥ (वे ही पूरे संसार का भार उठाते हैं, जिनकी शोभा चंद्रमा है,
जिनके पास अलौकिक गंगा नदी है, जिनकी गर्दन गला बादलों की पर्तों से ढंकी अमावस्या की अर्धरात्रि की तरह काली है।)
सदयं ह्रदयं यस्य भाषितं सत्यभूषितम्।
कायः परहिते यस्य कलिस्तस्य करोति किम्।। (जिसका हृदय दयालु है, जिसकी वाणी सत्य से भरी है, और जिसका शरीर दूसरों के हित के लिए है, कलि क्या कर सकता है?)
#काशीविश्वनाथ

Thousands of people at Cultural Navratri garba ground in State capital Gandhinagar, Gujarat create figure of Bhagwan Shi...
04/10/2022

Thousands of people at Cultural Navratri garba ground in State capital Gandhinagar, Gujarat create figure of Bhagwan Shiv, Ardhanarishwar roop of Mahadev and Mahashakti by using oil lamps this evening on . Drone View!!
Isn't this ?? How did you celebrated Mahanavami in your city??


PC: to respected owners

  नवरात्रि का सातवां दिन मां कालरात्रि (मां काली) को समर्पित है। कलकत्ता का कालीघाट मंदिर (काली माता मंदिर) देवी काली को...
02/10/2022


नवरात्रि का सातवां दिन मां कालरात्रि (मां काली) को समर्पित है। कलकत्ता का कालीघाट मंदिर (काली माता मंदिर) देवी काली को समर्पित एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है। मां काली का आशीर्वाद लेने के लिए देशभर से लोग मंदिर आते हैं। कालीघाट मंदिर कलकत्ता शहर में हुगली नदी पर एक पवित्र घाट है। समय के साथ नदी मंदिर से दूर चली गई। मंदिर अब आदि गंगा नामक एक छोटी नहर के किनारे है जो हुगली से जुड़ता है। कहा जाता है कि कलकत्ता शब्द कालीघाट शब्द से लिया गया है। कालीघाट को भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है, जहां शिव के रुद्र तांडव के दौरान सती के शरीर के विभिन्न अंग गिर गए थे और कालीघाट उस स्थल का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ दक्षिणायन या सती के दाहिने पैर के पंजे गिरे थे। वर्तमान मंदिर 19 वीं शताब्दी का है। हालांकि इसका 15 वीं और 17 वीं शताब्दी के बंगाल के कुछ भक्ति साहित्य में संदर्भ मिलता है। माना जाता है कि कालीघाट मंदिर चंद्रगुप्त द्वितीय के समय से अस्तित्व में है। मूल मंदिर एक छोटी झोपड़ी के आकार का ढांचा था, जिसे राजा मानसिंह ने 16वीं शताब्दी में बनवाया था। वर्तमान संरचना 1809 में सबरन रॉय चौधरी के मार्गदर्शन में पूरी हुई। मंदिर के मुख्य मंदिर में देवी काली की एक अनूठी प्रतिमा है।

मां काली की वर्तमान मूर्ति दो संतों – ब्रह्मानंद गिरि और आत्माराम गिरि द्वारा बनाई गई थी। मूर्ति की तीन विशाल आंखें और एक लंबी जीभ और चार हाथ हैं, जो सोने से बने हैं। मंदिर में पुष्प और मोर-आकृति की टाइलें हैं जो इसे विक्टोरियन रूप प्रदान करती हैं। इसके अलावा मंदिर में “कुंडूपुकर” नामक एक पवित्र तालाब है जो मंदिर परिसर के दक्षिण पूर्व कोने में स्थित है। इस तालाब के पानी को गंगा के समान पवित्र माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि पानी में बच्चे के वरदान को पूरा करने की शक्ति होती है। अगर आप भी कोलकाता के प्रसिद्ध कालीघाट मंदिर की यात्रा करना चाहते हैं तो हमारे इस आर्टिकल को जरूर पढ़ें, जिससे आपकी धार्मिक यात्रा सरल और सुखद बन सके।
अगर आप मां काली के इस शक्तिपीठ के दर्शन कर चुके हैं तो अपनी कहानी और अनुभव हमें मिसेज या ईमेल कर सकते हैं हम उसे पब्लिश करेंगे!

 नवरात्रि के छठे दिन देवी के छठे स्वरूप मां कात्यायिनी का पूजन किया जाता है। इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसान...
01/10/2022


नवरात्रि के छठे दिन देवी के छठे स्वरूप मां कात्यायिनी का पूजन किया जाता है। इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं।

देवी कात्यायनी की कहानी: देवी कात्यायनी जी के संदर्भ में एक पौराणिक कथा प्रचलित है जिसके अनुसार एक समय कत नाम के प्रसिद्ध ॠषि हुए तथा उनके पुत्र ॠषि कात्य हुए, उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध कात्य गोत्र से, विश्वप्रसिद्ध ॠषि कात्यायन उत्पन्न हुए थे. देवी कात्यायनी जी देवताओं ,ऋषियों के संकटों कोदूर करने लिए महर्षि कात्यायन के आश्रम में उत्पन्न होती हैं. महर्षि कात्यायन जी ने देवी पालन पोषण किया था. जब महिषासुर नामक राक्षस का अत्याचार बहुत बढ़ गया था, तब उसका विनाश करने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अपने अपने तेज़ और प्रताप का अंश देकर देवी को उत्पन्न किया था और ॠषि कात्यायन ने भगवती जी कि कठिन तपस्या, पूजा की इसी कारण से यह देवी कात्यायनी कहलायीं. महर्षि कात्यायन जी की इच्छा थी कि भगवती उनके घर में पुत्री के रूप में जन्म लें. देवी ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार की तथा अश्विन कृष्णचतुर्दशी को जन्म लेने के पश्चात शुक्ल सप्तमी, अष्टमी और नवमी, तीन दिनोंतक कात्यायन ॠषि ने इनकी पूजा की, दशमी को देवी ने महिषासुर का वध किया ओर देवों को महिषासुर के अत्याचारों से मुक्त किया.माँ कात्यायिनी का स्वरूप अत्यंत दिव्य और स्वर्ण के समान चमकीला है. ये अपनी प्रिय सवारी सिंह पर आरूढ रहती हैं. इनकी चार भुजाएं भक्तों को वरदान देती हैं. इनका एक हाथ अभय मुद्रा में है. तो दूसरा वरदमुद्रा में है. अन्य हाथों में तलवार और कमल का फूल है.

इनका गुण शोध कार्य है। इसीलिए इस वैज्ञानिक युग में कात्यायिनी का महत्व सर्वाधिक हो जाता है। इनकी कृपा से ही सारे कार्य पूरे जो जाते हैं।
देवी कात्यायनी का सबसे पुराना मंदिर: श्री कात्यायनी बाणेश्वर मंदिर, एवरसा गांव, कर्नाटक!!

 नवरात्रि के पांचवें दिन नव दुर्गा के पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है। मां स्कंदमाता (Navratri Skandmata...
30/09/2022


नवरात्रि के पांचवें दिन नव दुर्गा के पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है। मां स्कंदमाता (Navratri Skandmata) की आराधना करने से मूर्ख व्यक्ति भी ज्ञानी हो जाता है। मां स्कंदमाता सांसारिक जीवो में नव चेतना का निर्माण करने वाली माता है। स्कंद कुमार कार्तिकेय की माता होने के कारण इनका नाम स्कंदमाता पड़ा। शास्त्रों में बताया गया है कि मां स्कंदमाता की आराधना करने से भक्तों की सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं। देवी स्कंदमाता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं इसी कारण जो साधक इनकी भक्ति करता है वह भी आलौकिक तेज और कांतिमय से पूर्ण हो जाता है। देवी की भक्ति करने से जीवन में आने वाली सभी कठिनाइयों का नाश हो जाता है और साधक भवसागर को पार कर जाता है।
स्कंदमाता का स्वरूप: स्कंदमाता दो शब्दों से मिलकर बना है स्कन्द और माता. स्कन्द का अर्थ भगवान कार्तिकेय से है जिनका एक नाम स्कन्द कुमार भी है और माता का अर्थ है माँ . स्कंदमाता माँ पार्वती का ही एक रूप है. देवी स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं, एक हाथ में यह स्कंद कुमार कार्तिकेय को गोद में पकड़े हुए हैं। दूसरी और तीसरी भुजा में में कमल का पुष्प धारण किये हुए हैं। और चौथी भुजा में माता वर मुद्रा में है. मां स्कंदमाता का वाहन शेर है और यह कमल के आसन पर भी विराजमान रहती हैं इसलिए इनका दूसरा नाम पद्मासना भी है। माता का यह रूप हमें सिखाता है कि जब हम भक्ति के मार्ग पर चलते हैं तो हमें अपने क्रोध को नियंत्रित रखना चाहिए। मां स्कंदमाता की भक्ति करने से और इनकी कथा सुनने या पढ़ने से संतान सुख और सुख-संपत्ति प्राप्त होती है। मां को नीला रंग बेहद पसंद है तो इस दिन मां का आसन भी नीले रंग का होना चाहिए और उन्हें वस्त्र भी नीले रंग का ही अर्पित करें। मां को प्रसाद के रूप में केसर की खीर का भोग लगाना अत्यंत शुभ होता है।
स्कंदमाता की कथा: पौराणिक कथा अनुसार मां सती के स्वयं को भस्म करने के बाद भगवान शिव ने सांसारिक बंधनों से खुद को अलग करके कठिन तपस्या में मग्न हो गए। उस समय देवता तारकासुर नामक दैत्य से परेशान हो चुके थे। क्योंकि उसे ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था की उसे सिर्फ भगवान शिव का पुत्र ही मार सकता था। जब मां पार्वती की हजारों साल की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनसे विवाह किया तब कार्तिकेय का जन्म हुआ। ब्रह्मा जी ने कार्तिकेय को तारकासुर से लड़ने के लिए उन्हें कई अस्त्र शस्त्र प्रदान किए। और भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर सभी देवताओं को अभय प्रदान किया।

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