भवं भवानी सहितं नमामि

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भवं भवानी सहितं नमामि भोलेनाथ जी हो जिसकी बिगड़ी बनाने वाले,
फिर क्या बिगाड़ सकते उसका जमाने वाले।।

जय मां भवानी।

16/01/2024

Raghunath siya ka bharat h by Dharam Rishivanshi

15/10/2023
शारदीय नवरात्र की आपको एवं आपके परिवार को हार्दिक बधाई ।माँ दुर्गा आपका आपका भौतिक और आध्यात्मिक अभ्युदय करें । माता भगव...
15/10/2023

शारदीय नवरात्र की आपको एवं आपके परिवार को हार्दिक बधाई ।
माँ दुर्गा आपका आपका भौतिक और आध्यात्मिक अभ्युदय करें । माता भगवती से आपके नित्य शुभोदर्क की कामना करता हूँ ।
ओम् नमश्चण्डिकायै।
अशेष मंगलाशा ।

19/08/2023

शंकर नाथ महादेव
निरंजनी अखाड़ा महाराष्ट्र

हे भारत के राम जगो, मैं तुम्हे जगाने आया हूँ,सौ धर्मों का धर्म एक, बलिदान बताने आया हूँ ।सुनो हिमालय कैद हुआ है, दुश्मन ...
15/08/2023

हे भारत के राम जगो, मैं तुम्हे जगाने आया हूँ,
सौ धर्मों का धर्म एक, बलिदान बताने आया हूँ ।
सुनो हिमालय कैद हुआ है, दुश्मन की जंजीरों में
आज बता दो कितना पानी, है भारत के वीरो में,
खड़ी शत्रु की फौज द्वार पर, आज तुम्हे ललकार रही,
सोये सिंह जगो भारत के, माता तुम्हे पुकार रही ।
रण की भेरी बज रही, उठो मोह निद्रा त्यागो,
पहला शीष चढाने वाले, माँ के वीर पुत्र जागो।
बलिदानों के वज्रदंड पर, देशभक्त की ध्वजा जगे,
और रण के कंकण पहने है, वो राष्ट्रभक्त की भुजा जगे ।।
अग्नि पंथ के पंथी जागो, शीष हथेली पर धरकर,
जागो रक्त के भक्त लाडले, जागो सिर के सौदागर,
खप्पर वाली काली जागे, जागे दुर्गा बर्बंडा,
और रक्त बीज का रक्त चाटने, वाली जागे चामुंडा ।
नर मुंडो की माला वाला, जगे कपाली कैलाशी,
रण की चंडी घर घर नाचे, मौत कहे प्यासी प्यासी,
रावण का वध स्वयं करूँगा, कहने वाला राम जगे,
और कौरव शेष न एक बचेगा, कहने वाला श्याम जगे ।।
परशुराम का परशु जगे, रघुनन्दन का बाण जगे ,
यदुनंदन का चक्र जगे, अर्जुन का धनुष महान जगे,
चोटी वाला चाणक्य जगे, पौरुष का पुरष महान जगे
और सेल्यूकस को कसने वाला, चन्द्रगुप्त बलवान जगे ।
हठी हमीर जगे जिसने, झुकना कभी नहीं जाना,
जगे पद्मिनी का जौहर, जागे केसरिया बाना,
देशभक्ति का जीवित झण्डा, आजादी का दीवाना,
और वह प्रताप का सिंह जगे, वो हल्दी घाटी का राणा
दक्खिन वाला जगे शिवाजी, खून शाहजी का ताजा,
मरने की हठ ठाना करते, विकट मराठो के राजा,
छत्रसाल बुंदेला जागे, पंजाबी कृपाण जगे,
दो दिन जिया शेर के माफिक, वो टीपू सुल्तान जगे ।
कनवाहे का जगे मोर्चा, जगे झाँसी की रानी,
अहमदशाह जगे लखनऊ का, जगे कुंवर सिंह बलिदानी,
कलवाहे का जगे मोर्चा, पानीपत मैदान जगे,
जगे भगत सिंह की फांसी, राजगुरु के प्राण जगे
जिसकी छोटी सी लकुटी से (बापू ), संगीने भी हार गयी,
हिटलर को जीता वे फौजेे, सात समुन्दर पार गयी,
मानवता का प्राण जगे, और भारत का अभिमान जगे,
उस लकुटि और लंगोटी वाले, बापू का बलिदान जगे।
आजादी की दुल्हन को जो, सबसे पहले चूम गया,
स्वयं कफ़न की गाँठ बाँधकर, सातों भावर घूम गया,
उस सुभाष की शान जगे, उस सुभाष की आन जगे,
ये भारत देश महान जगे, ये भारत की संतान जगे ।
क्या कहते हो मेरे भारत से चीनी टकराएंगे ?
अरे चीनी को तो हम पानी में घोल घोल पी जाएंगे,
वह बर्बर था वह अशुद्ध था, हमने उनको शुद्ध किया,
वह बर्बर था वह अशुद्ध था, हमने उनको शुद्ध किया,
हमने उनको बुद्ध दिया था, उसने हमको युद्ध दिया ।
आज बँधा है कफ़न शीष पर, जिसको आना है आ जाओ,
चाओ-माओ चीनी-मीनी, जिसमें दम हो टकराओ
जिसके रण से बनता है, रण का केसरिया बाना,
ओ कश्मीर हड़पने वाले, कान खोल सुनते जाना ।।
भारत के केसर की कीमत तो केवल सर है
कोहिनूर की कीमत जूते पांच अजर अमर हैं
रण के खेतो में जब छायेगा, अमर मृत्यु का सन्नाटा,
रण के खेतो में जब छायेगा, अमर मृत्यु का सन्नाटा,
लाशो की जब रोटी होंगी, और बारूदों का आटा,
सन सन करते वीर चलेंगे, जो बामी से फन वाला,
फिर चाहे रावलपिंडी वाले हो, या हो पेकिंग वाला ।
जो हमसे टकराएगा, वो चूर चूर हो जायेगा,
इस मिटटी को छूने वाला, मिटटी में मिल जायेगा,
मैं घर घर में इन्कलाब की, आग लगाने आया हूँ,
हे भारत के राम जगो, मैं तुम्हे जगाने आया हूं ।।
आशुतोष राणा

शिव कथाभील पर शिवजी की कृपा ••••••••••••••••••••••••••••किसी वन में एक भील रहता था।जिसका नाम गुरुद्रुह् था।उसका परिवार ब...
17/02/2023

शिव कथा
भील पर शिवजी की कृपा
••••••••••••••••••••••••••••
किसी वन में एक भील रहता था।
जिसका नाम गुरुद्रुह् था।
उसका परिवार बड़ा था।
वह प्रति दिन जाकर वन में मृगों को मारा करता और चोरी किया करता था।
बचपन से उसने शुभकर्म भी नही किया।
इस प्रकार वन में रहते बहुत समय बीत गया था।
तदन्तर एक दिन शुभकारक शिवरात्रि आई।
परन्तु वह व्रत के विषय मे कुछ नही जानता था।
एक दिन उसके परिवार वालो ने याचना की कि हमे भूख लगी है।
वह तुरन्त धनुष लेकर शिकार पर चल दिया।
वह एक पेड़ पर चढ़ गया।
वही जल साथ लेकर बैठ गया।
सूर्य अस्त हो गया।
उसको माता-पिता बच्चों की चिंता सताने लगी कि वह भूख से व्याकुल होंगे।
वह शिकार के चिन्ता में बैठा रहा।
इसी प्रतीक्षा में वह भी भूख से पीड़ित हो बैठा रहा था।
उस रात पहले पहर में एक हरिणी वहाँ आयी
जो जोर जोर से चौकड़ी भर रही थी।
उस मृगी को देखकर व्याध की बड़ा हर्ष हुआ और तुरन्त अपने धनुष पर एक बाण चढ़ा लिया।
ऐसा करते समय उसके हाथ के धक्के से थोड़ा जल और बिल्वपत्र नीचे गिर पड़े।
उस पेड़ के नीचे शिवलिंग पूजा के महात्म्य से उस व्याध का बहुत सा पातक तत्काल नष्ट हो गया।
वहाँ होने वाली खड़खड़ाहट की आवाज को सुनकर हरिणी भय से ऊपर की ओर देखा।
व्याघ को देखते ही व्याकुल हो गई।
और बोली व्याध
तुम क्या करना चाहते हो।
व्याध ने कहा मेरे कुटुम्ब लोग भूखे है अतः तुमको मारकर उनकी भूख मिटाऊंगा।
और उन्हें तृप्त करूँगा।
उस दुष्ट को बाण ताने देखकर मृगी देखकर मैं कोई उपाय रखती हूँ।
मृगी बोली भील !
मुझको मारने से कुछ होगा इससे अधिक महान पुण्य का कार्य क्या होगा ?
मगर मेरे अपने बच्चे मेरे आश्रम में है।
मैं अपने स्वमी अथवा बहन को सौप फिर लौट आऊँगी।
मैं सत्य से बोलती हूँ।
सत्य से ही समुद्र अपनी मर्यादा स्थित है।
सत्य में ही सब कुछ स्थित है।
व्याध ने उसकी बात नही मानी।
मृगी बोली व्याध !
मैं तुमहारे सामने ऐसी शपथ खाती हूँ।
जिससे घर जाने पर मैं अवश्य लौट आऊँगी । पति को आज्ञा का उल्घन करके स्त्रियो को जिस पाप प्राप्ति होती है।
भगवान शंकर से विमुख वाले लोगो को जो पाप लगता है उसी में लिप्त हो जाऊं।
इस पर व्याध ने विवस करके कहा अच्छा
अब तुम अपने घर आओ।
इतने में रात का दूसरा प्रहर व्याध के जागते ही जागते बीत गया।
तब उस हिरनी की बहिन दुसरी मृगी जिसका फहली ने स्मरण किया था।
उसी तरह जल पीने को वहाँ आयी।
पुनः पहले की भाँति भगवान शिव के ऊपर जल और विल्वपत्र गिरे।
उसके द्वारा
शंकर जी की पूजा दूसरे प्रहर की पूजा भी सम्पन्न हो गयी।
मृगी उसे बाण खींचते देझ पूछा वनेचर !
यह तुम क्या कर रहे हो ?
व्याध ने पूर्ववत उतर दिया मैं अपने कुटिम्ब लिए तुझे मारूँगा।
यह सुनकर वह मृगी बोली व्याध !
मेरे छोटे-छोटे बच्चे घर मे है अतः एक बार जाकर उन्हें स्वामी को सौप दूँ फिर तुम्हारे पास लौट आऊँगी।
व्याध बोला तुम्हारी बात पर मुझे विश्वास नही है।
यह सुनकर वह हिरनी भगवान विष्णु शपथ खाती हुई बोली यदि में लौटकर न आऊँगी तो अपना सारा पुण्य हार जाऊँगी।
भगवान विष्णु का भक्त होकर शिव की निन्दा करता है तथा मन मे सन्ताप का अनुभव करके अपने पूरा करता है वह भी मुझे लगे।
यदि मैं लौट कर न आऊँगी
ऐसा कहने पर व्याध ने मृगी कहा जाओ
मृगी जल पीकर हर्षपूर्वक अपने आश्रम गयी।
इसी समय तीसरा प्रहर आरम्भ हो गया।
इतने जल के मार्ग पर एक हिरन को देखा
वह बड़ा हष्ट-पुष्ट था
वनेचर धनुष बाण लेकर उसे मार डालने को उद्यत हुआ।
ऐसा करते समय
कुछ जल और विल्वपत्र शिवलिंग पर फिर गिरे।
सौभाग्य से
भगवान भगवान शिवकी तीसरे प्रहर की पूजा भी सम्पन्न हो गयी।
पत्तो के गिरने का शब्द सुनकर मृगने वनेचर को देखा उसने व्याध से पूछा क्या करते हो।
व्याघ् ने कहा मैं अपने कुटुम्ब के लिए तम्हारा वध करूँगा।
व्याध की बात सुनकर परन्तु एक बार मुझको जाने दो।
मैं अपने बालको को उनकी माता को सौप कर उसको धीरज बंधा कर यहाँ लौट आऊँगा।
व्याध ने कहा जो जो यहाँ आये वे सब तुम्हारी तरह बाते करके चले गए।
इसलिए झूठ बोल कर चले जाओगे।
आज मेरा निवरह कैसे होगा।
मृग बोला भील !
तुम मेरी सच्ची प्रतिज्ञा सुनो।
सन्ध्या काल में मैथुन
तथा शिवरात्रि के दिन भोजन करने से
जो पाप लगता
झुठी गवाही देने धरोहर को हड़फ लेने संध्या न करने से द्विज को पाप होता है।
वही पाप मुझको लगे।
यदि मैं लौट कर न आऊ तो।
व्याधने कहा जाओ
शीघ्र लौटना
व्याध के कहने पर मृग पानी पीकर चला गया।
वे सब आश्रम में मिले।
तीनो प्रतिज्ञाबद्ध हो चले थे।
आपस मे बात करके सबने यही निश्चय किया कि वहाँ अवश्य जाना चाहिये।
बच्चों को पड़ोसियों के यहाँ छोड़कर चारो पहली मृगी और पति और दूसरी मृगी और उसका पति शीघ्र ही उस स्थान पर गये जहाँ व्याध उनकी पतिक्षा बैठा था।
उन सबको एक साथ देख कर व्याघ्र को बड़ा हर्ष हुआ।
उसने धनुष पर बाण रखा उसी समय पुनः जल एवं विल्वपत्र शिव के ऊपर फिर गिरे।
उससे उसकी चौथे प्रहर की शूभ पूजा भी सम्पन्न हो गयी।
इतने में मृग और मृगीया बोल ऊठे व्याध शिरोमणि !
शीघ्र कृपा करके हमारे शरीर को सार्थक करो।
उनकी बात सुनकर व्याध को बड़ा विस्मय हुआ।
शिवपूजा के प्रभाव से उसको दुर्लभ ज्ञान प्राप्त हो गया।
उसने सोचा ये मृग ज्ञानहीन पशु होने भी धन्य है।
सर्वथा आदरणीय है।
क्योकि अपने शरीर से ही परोपकार में लगे हुए है।
मैंने इस समय मनुष्य जन्म पाकर भी किस पुरुषार्थ साधन किया ?
दूसरे के शरीर को पीड़ा देकर अपने शरीर को पोसा है।
पति दिन अनेक प्रकार के पाप करके सपने कुटुम्बका पालन किया है।
हाय !
ऐसे पाप करके मेरी क्या गति होगी ?
अथवा किस गति को प्राप्त होऊँगा।
इस प्रकार ज्ञानसम्पन्न होकर उस व्याध ने कहा मृगों ! तुम जाओ।
तूम्हारा जीवन धन्य है।
व्याध के ऐसा कहने पर भगवान शंकर तत्काल प्रसन्न हो गये।
और व्याध को पूजित स्वरूप का दर्शन कराया।
कृपा पूर्वक उसके शरीर को स्पर्श करके उससे प्रेम से कहा भील !
मैं तुमसे प्रसन्न हूँ।
वर माँगो
व्याध भी भगवान शिवा के उस रूप को देखकर तत्काल जीवन्मुक्त हो गया।
और "मैंने सब कुछ पा लिया" यो कहता हुआ उनके चरणों में गिर पड़ा।
उसके इस भाव को देखकर भगवान शिव मन ही मन बड़े प्रसन्न बड़े प्रसन्न हुए।
और उसे "गुह" देकर कृपा दृष्टि से देखते हुए उन्होंने उसे दिव्य वर दिये।
शिव बोले - व्याध !
सुनो आज से तुम श्रंगवेशरपुर में उत्तम राजधानी का आश्रय ले दिव्य भोगों का उपभोग करो।
तुम्हारे वेश की वृद्धि निर्विधन रूप से होती रहेगी।
व्याध ! मेरे भक्तो पर स्नेह रखने वाले भगवान श्रीरामजी एक दिन तुम्हारे घर पधारेगे और साथ मित्रता करेगे।
तुम मेरी सेवा में मन लगाकर दुर्लभ मोक्ष पा जाओगे।
इसी समय वे सब मृग भगवान शंकरका दर्शन करके मृग योनि से मुक्त हो गये तथा दिव्य देहधारी हो विमान पर बैठकर दिव्यधाम को चले।
तब से अर्बुद पर्वत पर भगवान शिव व्यधेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुये।
इसलिये अपना हित चाहने वाले मनुष्यों को शुभ शिव महारात्रि व्रत की समानता पालन का पालन करना चाहिये।
ॐ नमः शिवायः।
•••••••••••••••••••••••••••••••••जय भोलेनाथ जय मां भवानी।

12/02/2023

"जगत मिथ्या है जगत का सुख_संबंध सब मिथ्या है "

सत्यं शिवम् सुंदरम
•••••••••••••••••••••
यस्मिन् शिवत्वं नास्ति
तस्मिन सुन्दरं अपिनास्तिएव ||
हमारे मन को
सुख देने वाली चीज सुंदर है।
यह सुंदरता की बचकानी परिभाषा है।
सुख और दु:ख संस्कारगत होने के नाते व्यक्तिनिष्ठ हैं।
अनुकूल वेदना का नाम सुख है।
और प्रतिकूल वेदना का नाम दु:ख है।
एक ही चीज किसी को सुख देती है और किसी को दु:ख।
परंतु सुंदरता तो वस्तुनिष्ठ ही है।
हमारा शास्त्र कहते है कि
जो कल्याणकारी है वही सुंदर है।
पर यह जरूरी नहीं है कि सुखद चीज सुंदर भी हो।
गीता कहती है कि
भोग का सुख भ्रामक है और अंतत: दु:ख वर्धक है।
ये हि संस्पर्शजाभोगा दु:खयोनयएवते ||
ऐसा सुख भी होता है
जो शुरू में अमृत जैसा लगता है
किंतु उसका परिणाम विष तुल्य होता है।
यदि क्षणिक सौंदर्यबोध
आगे चलकर दीर्घकालीन दु:ख का कारण बने तो वह कतई सुंदर नहीं है।
कष्टकर होने के नाते वर्तमान में साधना भले ही असुंदर लगे।
किंतु प्रगति में सहायक होने के नाते अंतत:वही सुन्दर है।
गीता भी कहती है
यत्तदग्रे विषामिव परिणामेमृतोपमम् ||
यहाँ यह सवाल उठ सकता है कि
जो कष्ट देने वाला है
वह सुंदर कैसे हो सकता है ?
यदि कोई कष्टकर अभ्यास
दीर्घकालीन सौन्दर्य का बोध कराने में समर्थ है तो वह तप है।
इसलिये सुंदर है।
प्रमाद जनित सुख सुंदर हो ही नहीं सकता।
चूंकि तप विकास में हेतु है।
अत: सुन्दर है।
इस प्रकार सुन्दरं की परिभाषा निश्चित हुई
यत् शिवंतत् सुन्दरम् ||
शिव का अर्थ है मंगल
जिसका अर्थ है कल्याण।
इस प्रकार शिव में उत्कर्ष है
विकास यानी प्रगति है।
शास्त्र बाहरी प्रगति का तिरस्कार नहीं करता है अपितु सम्मान से उसे अभ्युदय कहता है।
अशिक्षा से शिक्षा की ओर
दरिद्रता से समृद्धि की ओर
अपयश से यश की ओर
निस्तेज से तेजस्विता की ओर बढना प्रगति है।
समृद्धि के पीछे कर्मकौशल होता है।
प्रतिष्ठा किसी को उपहार में नहीं मिल जाती।
विद्वान ही विद्वान के श्रम को जानता है
विद्वान जानातिविद्वज्जन परिश्रम: ||
श्रम तो स्वयं सुंदर है
क्योंकि वह तप है।
भीतरी प्रगति का भी प्रस्थान बिंदु जीवन मूल्य है।
जीवत्व से ब्रह्मत्व की ओर जाना ही आध्यात्मिक प्रगति है।
सत्व में स्थित होना प्रगति है।
विनम्रता में अवस्थित होना प्रगति है।
भक्ति में प्रतिष्ठित होना प्रगति है।
शिवत्व का अर्थ ही है प्रगति या कल्याण।
अत: यह मानकर चलों कि
जो शिव है वही सुंदर है
यह जीवन दर्शन की प्रमाणित मंगलमयी कसौटी है।
हर हर शम्भु जयसियाराम।
•••••••••••••••••

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