05/11/2025
गुरु नानक देव जी और आर्य समाज : वैचारिक समानता की एक आध्यात्मिक कड़ी
डॉ अमित शर्मा, सहायकाचार्य, संस्कृत विभाग, दी जा वी शताब्दी महाविद्यालय, फरीदाबाद।
१.वैदिक मूल्यों से प्रेरित एकेश्वरवाद
गुरु नानक देव जी की वाणी का मूल स्वर है - “एक ओंकार सतनाम।” अर्थात्- ईश्वर एक है, जो सत्यस्वरूप, सर्वव्यापक और निराकार है।
ठीक इसी प्रकार स्वामी दयानंद सरस्वती ने वेदों के आधार पर घोषणा की -“ओ३म् एकमेवाद्वितीयम्।” (ऋग्वेद १०.१२९.२) अर्थात्- एक ही परमेश्वर है, जो सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक और अद्वितीय है।
दोनों महापुरुषों ने मूर्ति-पूजा, बहुदेववाद और अंधविश्वास का खंडन किया और निराकार ईश्वर की उपासना का संदेश दिया।
अतः गुरु नानक की ‘एक ओंकार’ की भावना और स्वामी दयानंद का ‘ओ३म्’ सिद्धान्त एक ही वेदप्रेरित दिव्य विचारधारा के प्रतीक हैं।
२.कर्मप्रधान जीवन और सत्य की आराधना
गुरु नानक देव जी ने कहा - “किरत करो, नाम जपो, वंड छको।” (कर्म करो, प्रभु का स्मरण करो और बाँटकर खाओ।)
यह सिद्धांत पूर्णतः वेदांत और आर्य समाज की भावना से मेल खाता है।
स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी कहा - “कर्म करने से ही मुक्ति संभव है, आलस्य अधर्म है।” दोनों ने मनुष्य को कर्मयोगी बनने का उपदेश दिया, और सच्चे जीवन को ही ईश्वर की उपासना माना।
३.सामाजिक सुधार की भावना
गुरु नानक देव जी ने उस समय के समाज में फैले छुआछूत, जातिवाद, पाखंड और धार्मिक ठेकेदारी का तीव्र विरोध किया। उन्होंने कहा - “मनुष्य की जाति नहीं, कर्म उसकी पहचान है।”
आर्य समाज ने भी इसी सिद्धांत को पुनर्जीवित किया। स्वामी दयानंद ने अपने ग्रंथ सत्यार्थप्रकाश में कहा -“जाति जन्म से नहीं, गुण और कर्म से होती है।”
दोनों के प्रयत्नों का उद्देश्य था - मानव में मानवता का बोध, और धर्म में समानता का आधार।
४.वेद और सत्य का पुनरुत्थान
गुरु नानक देव जी ने अपने ग्रंथों और प्रवचनों में बार-बार वेदों का आदर किया।
गुरु ग्रंथ साहिब में कई स्थलों पर वेदों को ‘ज्ञान का स्रोत’ कहा गया है -“बेद कतेब कहहु मत झूठे, झूठा जो न बिचारे।” (वेदों और धर्मग्रंथों को झूठा मत कहो, झूठा वह है जो उन्हें समझता नहीं।)
स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी यही कहा - “वेद ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान के स्रोत हैं।”
अतः दोनों ने वेद-आधारित धर्म और *सत्य के ज्ञान को ही आध्यात्मिक उन्नति का साधन माना।
५.मानवता और सेवा की भावना
गुरु नानक देव जी ने कहा -“सेवा करनि से ठाकुर पाइए।”- (सेवा के द्वारा ही ईश्वर की प्राप्ति होती है।)
आर्य समाज का प्रमुख सिद्धांत भी है -“परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीड़नम्।”(मनुस्मृति ४.२३२) अर्थात् — परोपकार पुण्य है, और दूसरों को कष्ट देना पाप।
गुरु नानक की ‘लंगर-प्रथा’ और आर्य समाज का ‘सेवा-यज्ञ’ — दोनों मानव-सेवा को ईश्वर-सेवा मानते हैं।
६.स्त्री सम्मान और समानता का सिद्धांत
गुरु नानक देव जी ने स्त्रियों को समान सम्मान दिया -“सो क्यों मंदा आखिए, जित जन्मे राजान।” (जिस स्त्री के गर्भ से राजा जन्म लेते हैं, उसे नीचा क्यों कहा जाए?)
स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी नारी-शिक्षा और स्वतंत्रता का प्रचार किया। उन्होंने कहा -“स्त्री और पुरुष समान हैं, दोनों ही विद्या और धर्म के अधिकारी हैं।”
इस प्रकार दोनों ने समतावादी समाज की परिकल्पना की।
७.धार्मिक सहिष्णुता और सत्य-एकता का भाव
गुरु नानक देव जी ने कहा -“ना कोई हिंदू, ना कोई मुसलमान।” अर्थात् — मनुष्य का सच्चा धर्म मानवता है।
स्वामी दयानंद ने भी कहा —
“सत्य एक है, उसे ज्ञानी पुरुष विभिन्न नामों से पुकारते हैं।”(ऋग्वेद १.१६४.४६)
दोनों ने धर्म को विभाजन का नहीं, बल्कि एकता और सत्य के बंधन का माध्यम माना।
८.सत्संग, शिक्षा और नवजागरण
गुरु नानक देव जी ने संगत और पंगत की परम्परा दी- जहाँ बिना भेदभाव सब साथ बैठते थे, शिक्षा और भक्ति में समानता थी।
आर्य समाज ने इसी विचार को आधुनिक रूप में आगे बढ़ाया - आर्य समाज मंदिरों और गुरुकुलों के माध्यम से शिक्षा, नैतिकता और सामाजिक सुधार को जोड़ा।
९.दोनों का लक्ष्य : सत्य और समाज-कल्याण
गुरु नानक देव जी का जीवन-संदेश था —
“सचु साहिब, सचु नाइ, भाख्या भाऊ अपार।” (सत्य ही ईश्वर है और प्रेम ही उसकी आराधना।)
स्वामी दयानंद का जीवन-सूत्र भी था -“सत्यं वद, धर्मं चर।”
इस प्रकार दोनों महापुरुषों का परम उद्देश्य था - सत्य की प्रतिष्ठा, धर्म का पुनरुद्धार, और मानवता का उत्थान।
निष्कर्ष : एक वैदिक चेतना की दो ज्योतियाँ
गुरु नानक देव जी और आर्य समाज, समय और रूप से भिन्न होते हुए भी, एक ही दिव्य धारा- वैदिक चेतना से प्रेरित हैं।
दोनों का लक्ष्य था -“ईश्वर एक है, मानव एक है, और धर्म का मर्म सत्य, सेवा और समरसता में है।”
इस दृष्टि से कहा जा सकता है — गुरु नानक देव जी ने सत्य के बीज बोए, और स्वामी दयानंद सरस्वती ने उन बीजों को वैदिक प्रकाश में पुष्पित किया।
दोनों के विचार भारतीय संस्कृति के दो ऐसे स्तंभ हैं, जो आज भी विश्व को यह सिखाते हैं कि - “धर्म का सार मानवता है, और मानवता का मूल वेदों का सत्य।”