10/02/2026
🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🕉️🙏नमस्ते जी
दिनांक - १० फरवरी २०२६ ईस्वी
दिन - - मंगलवार
🌗 तिथि -- अष्टमी ( ७:२७ तक तत्पश्चात नवमी )
🪐 नक्षत्र - - विशाखा ( ७:५५ तक तत्पश्चात अनुराधा )
पक्ष - - कृष्ण
मास - - फाल्गुन
ऋतु - - शिशिर
सूर्य - - उत्तरायण )
🌞 सूर्योदय - - प्रातः ७:०४ पर दिल्ली में
🌞 सूर्यास्त - - सायं १८:०७ पर
🌗 चन्द्रोदय -- २६:१६ पर
🌗 चन्द्रास्त - - ११:४५ पर
सृष्टि संवत् - - १,९६,०८,५३,१२६
कलयुगाब्द - - ५१२६
विक्रम संवत् - -२०८२
शक संवत् - - १९४७
दयानंदाब्द - - २०१
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🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🔥ईश्वर_कौन_और_परिचय
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यह सृष्टि अपने आप में ईश्वर-परिचय है। सूर्य, चाँद, पृथ्वी, लोक-लोकांतर और इनका संचालन किसी शक्ति का परिचय दे रहा है। जगत् का सत्ता में आना ही अपने आप में ईश्वर-परिचय है। वह महामहिम है। उसकी महिमा के सममुख जगत् की हर सत्ता तुच्छ है। वह ‘पर’ है, ‘परम’ है सर्वोत्कृष्ट है, इसीलिए परमात्मा, परमेश्वर, परमदेव आदि नामों से स्मरण किया जाता है। वह इन्द्र है, उसके बल, विस्तार और यश का वर्णन नहीं हो सकता। कोई भी सांसारिक वस्तु उसका उपमान नहीं बन सकती। वह बेमिसाल है। ईश्वर वज्रधर है, पापी आत्माओं को दंड देने वाला है। जड़-चेतन सबका आश्रयदाता है।
वैदिक संस्कृति के अनुसार ईश्वर निराकार, अजन्मा, अगोचर, अमर, अनंत, निर्विकार, सीमा से परे है। यह जगत् जो दृश्यमान् है, वह केवल उसका एक चरण है। शेष तीन चरण तो पहुँच से, शायद कल्पना से भी परे हैं। पौराणिक विचारधारा के अनुसार व अपनी-अपनी कल्पना के अनुसार ईश्वर को कितने रूप दे दिए गये हैं और दिए जा रहे हैं। वे उसे एक मूर्ति में बाँधकर रख देना चाहते हैं। वे सत्य से दूर भागते हैं। ईश्वर बंधन रहित है। सर्वत्र एवं सर्व-व्यपाक है। वह एकदेशीय नहीं। वह कण-कण में विद्यमान है। वह उस काल्पनिक मूर्ति में भी है, परन्तु उसकी सारी शक्तियों तथा गुणों से मूर्ति परिपूर्ण नहीं। उसकी चेतन-शक्ति, उसका आनन्द-रस मूर्त्ति में विद्यमान नहीं। वह सब तो उसकी अपनी बनाई हुई मूर्तियों में ही है। आनन्द-रस तो वह स्वयं ही है। हर आत्मा को उसके उस आनन्द-रस की तलाश है।
ईश्वर ही हमारा मनभावन है। क्योंकि वही चेतन शक्ति है, ज्ञान स्वरूप है, प्रकाशमय है, ज्योतिपुञ्ज है। उसी के प्रकाश से यह जगत् प्रकाशमय है। हर कार्यशक्ति उसी की शक्ति से प्रेरित और गतिशील है। वह है तो हमारी सत्ता है। उसका नियंत्रण हट जाए तो यह जीवन निराधार होकर ढह जाए, क्योंकि वह ही सारे जगत् का आधार है। ईश्वर ‘‘सत्पति’’ है। विलक्षण रक्षक है। वह विश्व की रक्षा अकेला ही करता है। उसे इस कार्य के लिए किसी से सहायता की आवश्यकता नहीं। वह सर्वशक्तिमान् एवं भयहीन है। प्रभु ‘अग्नि’ है। अग्नि-स्वरूप है। बाह्य जगत् में आदित्य रूप में प्रकाश प्रदान करता है। सबके हृदय अन्तरिक्ष में भी प्रकाश उत्पन्न करता है। मार्ग-दर्शन करता है। वह ‘जातवेदा’ है। सब कुछ जानता है, क्योंकि वह सर्वज्ञ एवं सर्वव्यापक है।
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🕉️🚩आज का वेद मंत्र🚩🕉️
🌷ओ३म् अद्भय़: क्षीरं व्यपिबत् क्रुङ्ङाङ्गिरसो धिया।
ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानˆशुक्रमन्धसऽइन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु॥ (यजुर्वेद १९-७३)
💐 अर्थ :- एक हंस जल मिश्रित दूध में से दूध को पी लेता है। इसी प्रकार एक विद्वान व्यक्ति अपनी अतंर करने की क्षमता को ज्ञान, योग, आंतरिक शुद्धि, मधुरवाणी, शुद्ध भोजन आदि द्वारा विकसित कर सकता है। और सत्य और असत्य के भेद को जान सकता है। और केवल सत्य को अपना सकता है।
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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार👇
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🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏
(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮
ओ३म् तत्सत् श्री ब्रह्मणो दिवसे द्वितीये प्रहरार्धे श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वते मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे
कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- षड्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२६ ) सृष्ट्यब्दे】【 द्वयशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८२) वैक्रमाब्दे 】 【 एकाधिकद्विशतीतमे ( २०१) दयानन्दाब्दे, सिद्धार्थ -संवत्सरे, रवि- उत्तरायणे , शिशिर -ऋतौ, फाल्गुन - मासे, कृष्ण - पक्षे , अष्टम्यां
तिथौ, विशाखा - नक्षत्रे, मंगलवासरे
, शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे भरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ, आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे
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