आर्य सुमित शास्त्री

आर्य सुमित शास्त्री धर्मो रक्षति रक्षितः
(2)

जय श्री राम 🚩
08/04/2026

जय श्री राम 🚩

🚩‼️ओ३म्‼️🚩🕉️🙏नमस्ते जीदिनांक  - १० फरवरी २०२६ ईस्वीदिन  - - मंगलवार     🌗 तिथि -- अष्टमी ( ७:२७ तक तत्पश्चात नवमी ) 🪐 नक...
10/02/2026

🚩‼️ओ३म्‼️🚩

🕉️🙏नमस्ते जी

दिनांक - १० फरवरी २०२६ ईस्वी

दिन - - मंगलवार

🌗 तिथि -- अष्टमी ( ७:२७ तक तत्पश्चात नवमी )

🪐 नक्षत्र - - विशाखा ( ७:५५ तक तत्पश्चात अनुराधा )

पक्ष - - कृष्ण
मास - - फाल्गुन
ऋतु - - शिशिर
सूर्य - - उत्तरायण )

🌞 सूर्योदय - - प्रातः ७:०४ पर दिल्ली में
🌞 सूर्यास्त - - सायं १८:०७ पर
🌗 चन्द्रोदय -- २६:१६ पर
🌗 चन्द्रास्त - - ११:४५ पर

सृष्टि संवत् - - १,९६,०८,५३,१२६
कलयुगाब्द - - ५१२६
विक्रम संवत् - -२०८२
शक संवत् - - १९४७
दयानंदाब्द - - २०१

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🚩‼️ओ३म्‼️🚩

🔥ईश्वर_कौन_और_परिचय
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यह सृष्टि अपने आप में ईश्वर-परिचय है। सूर्य, चाँद, पृथ्वी, लोक-लोकांतर और इनका संचालन किसी शक्ति का परिचय दे रहा है। जगत् का सत्ता में आना ही अपने आप में ईश्वर-परिचय है। वह महामहिम है। उसकी महिमा के सममुख जगत् की हर सत्ता तुच्छ है। वह ‘पर’ है, ‘परम’ है सर्वोत्कृष्ट है, इसीलिए परमात्मा, परमेश्वर, परमदेव आदि नामों से स्मरण किया जाता है। वह इन्द्र है, उसके बल, विस्तार और यश का वर्णन नहीं हो सकता। कोई भी सांसारिक वस्तु उसका उपमान नहीं बन सकती। वह बेमिसाल है। ईश्वर वज्रधर है, पापी आत्माओं को दंड देने वाला है। जड़-चेतन सबका आश्रयदाता है।

वैदिक संस्कृति के अनुसार ईश्वर निराकार, अजन्मा, अगोचर, अमर, अनंत, निर्विकार, सीमा से परे है। यह जगत् जो दृश्यमान् है, वह केवल उसका एक चरण है। शेष तीन चरण तो पहुँच से, शायद कल्पना से भी परे हैं। पौराणिक विचारधारा के अनुसार व अपनी-अपनी कल्पना के अनुसार ईश्वर को कितने रूप दे दिए गये हैं और दिए जा रहे हैं। वे उसे एक मूर्ति में बाँधकर रख देना चाहते हैं। वे सत्य से दूर भागते हैं। ईश्वर बंधन रहित है। सर्वत्र एवं सर्व-व्यपाक है। वह एकदेशीय नहीं। वह कण-कण में विद्यमान है। वह उस काल्पनिक मूर्ति में भी है, परन्तु उसकी सारी शक्तियों तथा गुणों से मूर्ति परिपूर्ण नहीं। उसकी चेतन-शक्ति, उसका आनन्द-रस मूर्त्ति में विद्यमान नहीं। वह सब तो उसकी अपनी बनाई हुई मूर्तियों में ही है। आनन्द-रस तो वह स्वयं ही है। हर आत्मा को उसके उस आनन्द-रस की तलाश है।

ईश्वर ही हमारा मनभावन है। क्योंकि वही चेतन शक्ति है, ज्ञान स्वरूप है, प्रकाशमय है, ज्योतिपुञ्ज है। उसी के प्रकाश से यह जगत् प्रकाशमय है। हर कार्यशक्ति उसी की शक्ति से प्रेरित और गतिशील है। वह है तो हमारी सत्ता है। उसका नियंत्रण हट जाए तो यह जीवन निराधार होकर ढह जाए, क्योंकि वह ही सारे जगत् का आधार है। ईश्वर ‘‘सत्पति’’ है। विलक्षण रक्षक है। वह विश्व की रक्षा अकेला ही करता है। उसे इस कार्य के लिए किसी से सहायता की आवश्यकता नहीं। वह सर्वशक्तिमान् एवं भयहीन है। प्रभु ‘अग्नि’ है। अग्नि-स्वरूप है। बाह्य जगत् में आदित्य रूप में प्रकाश प्रदान करता है। सबके हृदय अन्तरिक्ष में भी प्रकाश उत्पन्न करता है। मार्ग-दर्शन करता है। वह ‘जातवेदा’ है। सब कुछ जानता है, क्योंकि वह सर्वज्ञ एवं सर्वव्यापक है।

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🕉️🚩आज का वेद मंत्र🚩🕉️

🌷ओ३म् अद्भय़: क्षीरं व्यपिबत् क्रुङ्ङाङ्गिरसो धिया।
ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानˆशुक्रमन्धसऽइन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु॥ (यजुर्वेद १९-७३)

💐 अर्थ :- एक हंस जल मिश्रित दूध में से दूध को पी लेता है। इसी प्रकार एक विद्वान व्यक्ति अपनी अतंर करने की क्षमता को ज्ञान, योग, आंतरिक शुद्धि, मधुरवाणी, शुद्ध भोजन आदि द्वारा विकसित कर सकता है। और सत्य और असत्य के भेद को जान सकता है। और केवल सत्य को अपना सकता है।

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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार👇
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🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏

(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮

ओ३म् तत्सत् श्री ब्रह्मणो दिवसे द्वितीये प्रहरार्धे श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वते मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे
कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- षड्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२६ ) सृष्ट्यब्दे】【 द्वयशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८२) वैक्रमाब्दे 】 【 एकाधिकद्विशतीतमे ( २०१) दयानन्दाब्दे, सिद्धार्थ -संवत्सरे, रवि- उत्तरायणे , शिशिर -ऋतौ, फाल्गुन - मासे, कृष्ण - पक्षे , अष्टम्यां
तिथौ, विशाखा - नक्षत्रे, मंगलवासरे
, शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे भरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ, आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे

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महर्षि दयानन्द और वेदों का अनसुना सच | ऐतिहासिक खुलासा । वेदों के उस गूढ़ रहस्य के बारे में, जिसे महाभारत के बाद बहुत कम...
10/02/2026

महर्षि दयानन्द और वेदों का अनसुना सच | ऐतिहासिक खुलासा । वेदों के उस गूढ़ रहस्य के बारे में, जिसे महाभारत के बाद बहुत कम लोग समझ पाए। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने वेदों के वास्तविक अर्थ और संदेश को समाज के सामने रखा।
#दयानंदसरस्वती #वेद #वेदों_की_ओर_लौटो

चार वेद और उनके मंत्र....   #ऋग्वेद  #यजुर्वेद  #सामवेद  #अथर्ववेद  #सनातन
09/02/2026

चार वेद और उनके मंत्र....
#ऋग्वेद #यजुर्वेद #सामवेद #अथर्ववेद #सनातन

🚩‼️ओ३म्‼️🚩🕉️🙏नमस्ते जीदिनांक  - ०९ फरवरी २०२६ ईस्वीदिन  - - सोमवार     🌗 तिथि -- अष्टमी (पूर्ण रात्री तक ) 🪐 नक्षत्र - -...
09/02/2026

🚩‼️ओ३म्‼️🚩

🕉️🙏नमस्ते जी

दिनांक - ०९ फरवरी २०२६ ईस्वी

दिन - - सोमवार

🌗 तिथि -- अष्टमी (पूर्ण रात्री तक )

🪐 नक्षत्र - - विशाखा (पूर्ण रात्री तक )

पक्ष - - कृष्ण
मास - - फाल्गुन
ऋतु - - शिशिर
सूर्य - - उत्तरायण )

🌞 सूर्योदय - - प्रातः ७:०४ पर दिल्ली में
🌞 सूर्यास्त - - सायं १८:०७ पर
🌗 चन्द्रोदय -- २५:१९ पर
🌗 चन्द्रास्त - - ११:०७ पर

सृष्टि संवत् - - १,९६,०८,५३,१२६
कलयुगाब्द - - ५१२६
विक्रम संवत् - -२०८२
शक संवत् - - १९४७
दयानंदाब्द - - २०१

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🚩‼️ओ३म्‼️🚩

🔥 ईशवर तक पहुँचने के लिए किसी दलाल, वकील, पीर, पैगम्ब अवतार या गुरु की आवश्यकता नही है। ईशवर सभी प्राणियों के अन्दर बसा हुआ है। वह सभी के उतना ही समीप है । आत्मा के द्वारा ही ईशवर को जाना जा सकता है क्योंकि ईशवर आत्मा में विद्यमान है। आत्मा और परमात्मा के बीच में और कुछ नही है। मनुष्य अपने ज्ञान तथा मन की पवित्रता से ही ईशवर को जानता है। ईशवर किसी की सिफारिश नही मानता । ईशवर किसी एक को अपना दूत बनाके भेजे तो वह पक्षपाती बनता है। वह तो सभी के लिए एक समान है ।

आजकल जो सैकड़ों गुरु बने हुए है वे तो केवल धन दौलत लूटने के लिए अपनी ऐसो इशरत के लिए तथा मान सम्मान के लिए चेला चेली बनाते है। ये गुरु ज्ञान की बजाए अज्ञान फैलाते है। ईशवर के स्थान पर अपनी पूजा करवाते है।

वेद आदि उत्तम ग्रन्थो की बजाए अपनी स्वार्थ पूर्ण घटिया पुस्तके पढ़ने को देते है ।अपने चेले चेलियों को अन्धविश्वासी बनाते है। यें चेले चेलियां गुरु के पीछे ऐसे लगते है कि अपनी ज्ञान की आँखें बन्द कर लेते है। यह स्थिति दुःखों से छूटने की नही है। अपितु घोर अन्धकार, अज्ञान तथा दुःखों में गिराने की है। समझदार लोगों को धूर्त बने गुरूओं के चक्कर में नही पड़ना चाहिए ।

आओ लौट चलें वेदों की ओर।

वेद सृष्टि के आदि में परमात्मा का दिया गया ज्ञान है।

" वेदोंखिलो धर्ममूलम"

वेद ही अखिल विश्व के आदि मूल है।
वेद ही एकमात्र ऐसा ग्रन्थ है जो किसी जाति, वर्ग और सम्प्रदाय या किसी मुल्क वालों के लिए नहीं है। यह विश्व के सभी प्राणी मात्र और मानव मात्र के लिए परमात्मा का दिया ज्ञान है। ( यथेमाम वाचं कल्याणी आवदानी) अर्थात यह कल्याणकारी वाणी मानव मात्र के कल्याण के लिए ही है।

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🚩‼️आज का वेद मंत्र ‼️🚩

🌷 ओ३म् स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:। स्वस्ति नस्तार्क्ष्योऽअरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु (यजुर्वेद २५|१९)

💐अर्थ:- बहुत सुनने वाला वा बहुत कीर्ति वाला परमैश्वर्यवान् प्रभु हमें कल्याण प्रदान करें। पुष्टिकर्त्ता- सर्वज्ञाता ईश्वर हमारे लिए कल्याण की वर्षा करें। तेजस्वी दुःखहर्त्ता परमेश्वर हमें आनन्द देवें। बड़े बड़े महान् पदार्थों का पति परमेश्वर हमारे लिए कल्याणकारी हो।

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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार👇
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🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏

(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮

ओ३म् तत्सत् श्री ब्रह्मणो दिवसे द्वितीये प्रहरार्धे श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वते मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे
कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- षड्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२६ ) सृष्ट्यब्दे】【 द्वयशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८२) वैक्रमाब्दे 】 【 एकाधिकद्विशतीतमे ( २०१) दयानन्दाब्दे, सिद्धार्थ -संवत्सरे, रवि- उत्तरायणे , शिशिर -ऋतौ, फाल्गुन - मासे, कृष्ण - पक्षे , अष्टम्यां
तिथौ, विशाखा - नक्षत्रे, सोमवासरे
, शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे भरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ, आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे

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चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥    #न्याय
08/02/2026

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥

#न्याय

🚩‼️ओ३म्‼️🚩🕉️🙏नमस्ते जीदिनांक  - ०८ फरवरी २०२६ ईस्वीदिन  - - रविवार     🌗 तिथि -- सप्तमी (२९:०१ तक तत्पश्चात अष्टमी ) 🪐 न...
08/02/2026

🚩‼️ओ३म्‼️🚩

🕉️🙏नमस्ते जी

दिनांक - ०८ फरवरी २०२६ ईस्वी

दिन - - रविवार

🌗 तिथि -- सप्तमी (२९:०१ तक तत्पश्चात अष्टमी )

🪐 नक्षत्र - - स्वाति (२९:०२ तक तत्पश्चात विशाखा )

पक्ष - - कृष्ण
मास - - फाल्गुन
ऋतु - - शिशिर
सूर्य - - उत्तरायण )

🌞 सूर्योदय - - प्रातः ७:०६ पर दिल्ली में
🌞 सूर्यास्त - - सायं १८:०७ पर
🌗 चन्द्रोदय -- २४:२३ पर
🌗 चन्द्रास्त - - १०:३३ पर

सृष्टि संवत् - - १,९६,०८,५३,१२६
कलयुगाब्द - - ५१२६
विक्रम संवत् - -२०८२
शक संवत् - - १९४७
दयानंदाब्द - - २०१

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🚩‼️ओ३म्‼️🚩

🔥जो मनुष्य अन्न धन सम्पत्ति का स्वामी बनकर उससे किसी ज्ञान देने वाले विद्वान् का पोषण नहीं करता न किसी वंशीय सम्बन्धी का पोषण करता है, उसका अन्नधन सम्पत्ति पाना व्यर्थ है-घातक है, वह केवल अकेले खाकर पापी बनकर संसार से चला जाता है।

वेद में, परिवार में सुख से रहने और अन्य सदस्यों को सुखी रखने का उपाय बताया है।
जो मनुष्य अपने आप अकेला खाता है, वह पाप ही खाता है। वेद के अनुसार ऐसे व्यक्ति पाप ही पकाते हैं और पाप ही खाते हैं। वैदिक संस्कृति में भोजन के सबन्ध में बहुत सारे निर्देश मिलते हैं। एक गृहस्थ को भी भोजन अपने लिए नहीं, यज्ञ के लिये बनाने का विधान है। दूसरों के उपकार के लिए बनाने की भावना है। जब मनुष्य के मन में खुद खाने से पहले दूसरों को खिलाने की भावना आ जाती है तो फिर उसके अन्दर से पक्षपात या चोरी का भाव निकल जाता है।

मनुष्य जब अकेला खाता है तब लोगों से छिप कर खाता है परन्तु जब खिलाने की इच्छा रखता है तो उसे सबके साथ खाने में आनन्द आता है। जब मनुष्य के मन में दूसरों को खिला कर खाने की भावना आ जाती है तो फिर उसके अन्दर से पक्षपात या चोरी का भाव निकल जाता है तथा एक असीम आनन्द की अनुभूति होती है। भोजन सबके साथ बांटकर खाना परस्पर प्रीति का कारण होता है किन्तु याद रहे भोजन स्वस्थ होना चाहिए। मुस्लिमों की तरह एक ही जूठे पात्र में खाना स्वास्थ्य के लिए हितकर नहीं होता।

कुछ लोगों का यह मानना कि एक-दूसरे का जूठा भोजन करने से आपस में प्रेम बढ़ता है, यह बात सरासर गलत है। हमारे शास्त्र कहते हैं कि किसी का जूठा भोजन करने से प्रेम तो नहीं बढ़ता लेकिन आप जिस व्यक्ति का जूठा भोजन करते हैं, उसका दुर्भाग्य भी आपके साथ लग जाता है। उसके सारे रोग भी आपके रोग बन जाते हैं। वैज्ञानिक तथ्य है कि जूठा भोजन करने से संक्रामक रोग फैलने की आशंका रहती है, क्योंकि सभी लोगों के भोजन करने का तरीका अलग-अलग होता है। बहुतों व्यक्ति हैं जो बिना हाथ-पैर धोए ही भोजन करने बैठ जाते हैं, जिससे विभिन्न रोग फैलते हैं। शास्त्र कहते हैं भोजन सौहार्द और प्रीति का प्रतीक होता है इसलिए भोजन में कोई भी दूषित पदार्थ, मांसाहार ना हो। यहां तक कि भोजन बनाने से लेकर परोसने और खाने तक के लिए नियम बनाए गए हैं। जिनका पालन करना जरूरी होता है।

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🕉️🚩आज का वेद मन्त्र,🚩🕉️

🔥विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्।
सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देवऽएक:॥ यजुर्वेद १७-१९॥

💐एकमात्र ईश्वर ही पूर्णरूप से स्वयं प्रकाशित और सर्वव्यापक है। और वो ही जगत का स्वामी है। उसी में मूल प्रकृति ( सत, रज, तम) से जगत का सर्जन करने का सामर्थ्य है। वही इस जगत को चला रहा है। उसकी दृष्टि संपूर्ण ब्रह्मांड के कण-कण पर सदैव रहती है।

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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार👇
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🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏

(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮

ओ३म् तत्सत् श्री ब्रह्मणो दिवसे द्वितीये प्रहरार्धे श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वते मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे
कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- षड्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२६ ) सृष्ट्यब्दे】【 द्वयशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८२) वैक्रमाब्दे 】 【 एकाधिकद्विशतीतमे ( २०१) दयानन्दाब्दे, सिद्धार्थ -संवत्सरे, रवि- उत्तरायणे , शिशिर -ऋतौ, फाल्गुन - मासे, कृष्ण - पक्षे , सप्तम्यां
तिथौ, स्वाति - नक्षत्रे, रविवासरे
, शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे भरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ, आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे

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नींद की मर्यादा क्या होती है। #नींद
07/02/2026

नींद की मर्यादा क्या होती है।
#नींद

🚩‼️ओ३म्‼️🚩🕉️🙏नमस्ते जीदिनांक  - ०७ फरवरी २०२६ ईस्वीदिन  - - शनिवार     🌖 तिथि -- षष्ठी (२६:५४ तक पर सप्तमी ) 🪐 नक्षत्र -...
07/02/2026

🚩‼️ओ३म्‼️🚩

🕉️🙏नमस्ते जी

दिनांक - ०७ फरवरी २०२६ ईस्वी

दिन - - शनिवार

🌖 तिथि -- षष्ठी (२६:५४ तक पर सप्तमी )

🪐 नक्षत्र - - चित्रा ( २६:२८ तक तत्पश्चात स्वाति )

पक्ष - - कृष्ण
मास - - फाल्गुन
ऋतु - - शिशिर
सूर्य - - उत्तरायण )

🌞 सूर्योदय - - प्रातः ७:०६ पर दिल्ली में
🌞 सूर्यास्त - - सायं १८:०५ पर
🌖 चन्द्रोदय -- २३:२७ पर
🌖 चन्द्रास्त - - १०:०३ पर

सृष्टि संवत् - - १,९६,०८,५३,१२६
कलयुगाब्द - - ५१२६
विक्रम संवत् - -२०८२
शक संवत् - - १९४७
दयानंदाब्द - - २०१

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🚩‼️ओ३म्‼️🚩

🔥अपने पुत्र और पुत्रियों को ब्रह्मचर्य, सदाचार व विद्या के द्वारा विद्वान, विदुषी, सुंदर और शीलयुक्त बनाने का पुनीत कर्तव्य प्रत्येक सद्गृहस्थ निभाए।
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परिवार की पाठशाला में व्यक्ति को सुसंस्कारों की शिक्षा मिलती है। समाज को गौरांवित करने वाले मणिमुक्तक भी इसी खदान में से निकलते हैं। व्यक्ति और समाज दो पहिए हैं जिनके सुसंचालन की धुरी परिवार संस्था को ही माना जाता है। धुरी में गडबडी होने पर प्रगति रथ का आगे बढ सकना कठिन है। इस तथ्य को समझा जा सके तो व्यक्ति को समर्थ और समाज को परिष्कृत बनाने की ही तरह परिवारों को भी सुसंस्कृत बनाने की आवश्यकता समझी जा सकेगी। सुसंस्कृत परिवारों का हर सदस्य उसी छोटे घरोंदे में स्वर्गीय सुख-शांति और प्रगति की चेतनात्मक संपदा प्राप्त करता है।

संतान के जन्म के पश्चात उसका समुचित पालन-पोषण, भोजन, वस्त्र, शिक्षा आदि की व्यवस्था करने का दायित्व भी सद्गृहस्थ पर ही है। केवल इतना ही नहीं, बच्चों का चरित्र निर्माण करना भी अभिभावकों का ही कर्तव्य है। इसे ठीक से न निभाया गया तो बच्चे अनेक दुर्गुणों से घिर जाते हैं और अपने लिए, परिवार के लिए तथा समाज के लिए अभिशाप सिद्ध होते हैं। उनको दुर्गुणों से बचाना और सदगुणों से अभ्यस्त करना भी उन्ही का कर्तव्य है। बच्चा जन्मजात कुछ भले बुरे संस्कार लेकर अवश्य आता है पर उनका विकसित अथवा नष्ट होना बहुत कुछ परिस्थितियों पर निर्भर करता है। बच्चों के मानसिक विकास का मुख्य आधार माता-पिता की मनोभूमि और घर का वातावरण ही होता है। यह भी एक रहस्यात्मक तथ्य है कि बालक गर्भ में आने के दिन से ही सीखना आरंभ करता है और पांच वर्ष की आयु तक अपनी मनोभूमि के निर्माण का लगभग तीन चौथाई कार्य पूर्ण कर लेता है। इस अवधि में बच्चा बहुत संवेदनशील रहता है। ज्ञान-विज्ञान, लोक व्यवहार आदि की शिक्षा तो बाद में मिलती है पर स्वभाव, अहंकार, चरित्र, आस्थाएं आदि जिस आयु में सीखी जाती है वह गर्भ में प्रवेश करने वाले दिन से लेकर पांच वर्ष तक ही हैं।

इसीलिए हमारे शास्त्रों ने गर्भाधान संस्कार को संस्कारों में पहला संस्कार माना है और गर्भ स्थापना की पूरी तैयारी का भी विधान किया है। पति-पत्नि दोनों को पहले से ही अपने दोष दुर्गुणों का परिष्कार करके आचरण, व्यवहार एवं संभाषण की समस्त गतिविधियां सुधार लेनी चाहिए। बाप का बीज और माता की जमीन दोनों का ही समान महत्व है संतान रूपी उपवन के निर्माण में। होनहार बच्चों की उत्पत्ति का मूल आधार यहीं से प्रारंभ होता है। अभिमन्यु का उदाहरण सर्वविदित ही है।

बच्चे पैदा करना व्यक्तिगत क्रीडा-विनोद का विषय नहीं है। एक नए व्यक्ति के जन्म एवं उसके व्यक्तित्व को निर्मित करने का यह महान उत्तरदायित्व है। यदि हम इस कर्तव्य को भूलते हैं तो स्वयं उद्विग्न रहने वाले, परिवार को दुखी करने वाले और समाज में दुष्प्रवृत्तियां बढाने वाले राक्षसों को ही उत्पन्न करे़गे और अपने पाप से अपने और सबके लिए नरक का सृजन करेंगें ।

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🕉️🚩 आज का वेद मंत्र 🚩🕉️

🌷 ओ३म् यो रेवान् यो अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्द्धनः । स नः सिषक्तु यस्तुरः।। ( यजुर्वेद ३\२९ )

💐अर्थ :- जो इस संसार में धन है सो सब जगदीश्वर का ही है । मनुष्य लोग जैसी परमेश्वर की प्रार्थना करें, वैसा ही उनको पुरुषार्थ भी करना चाहिए । जैसे विद्या आदि धनवाला परमेश्वर है ऐसा विशेषण ईश्वर का कह वा सुनकर मनुष्य कृतकृत्य अर्थात् विद्या आदि धनवाला नहीं हो सकता, किन्तु अपने पुरुषार्थ से विद्या आदि धन की वृद्धि वा रक्षा निरन्तर करनी चाहिए जैसे परमेश्वर अविद्या आदि रोगों को दूर करनेवाला है, वैसे मनुष्यों को भी उचित है कि आप भी अविद्या आदि रोगों को निरन्तर दूर करें । जैसे वह वस्तुओं को यथावत् जानता है, वैसे मनुष्यों को भी उचित है की अपने सामर्थ्य के अनुसार सब पदार्थ-विद्याओं को यथावत् जानें जैसे वह सबकी पुष्टि को बढ़ाता है, वैसे मनुष्य को भी सबके पुष्टि आदि गुणों को निरन्तर बढ़ावें । जैसे वह अच्छे-अच्छे कार्यों को बनाने में शीघ्रता करता है, वैसे मनुष्य भी उत्तम-उत्तम कार्यों को त्वरा से करें और जैसे हम लोग उस परमेश्वर की उत्तम कर्मों के लिए प्रार्थना निरन्तर करते हैं, वैसे परमेश्वर भी हम सब मनुष्यों को उत्तम पुरुषार्थ से उत्तम-उत्तम गुण वा कर्मों के आचरण के साथ निरन्तर संयुक्त करें ।

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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार👇
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🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏

(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮

ओ३म् तत्सत् श्री ब्रह्मणो दिवसे द्वितीये प्रहरार्धे श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वते मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे
कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- षड्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२६ ) सृष्ट्यब्दे】【 द्वयशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८२) वैक्रमाब्दे 】 【 एकाधिकद्विशतीतमे ( २०१) दयानन्दाब्दे, काल -संवत्सरे, रवि- उत्तरायणे , शिशिर -ऋतौ, फाल्गुन - मासे, कृष्ण - पक्षे , षष्ठम्यां
तिथौ, चित्रा - नक्षत्रे, शनिवासरे
, शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे भरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ, आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे

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#वैदिक_पंचांग

🚩‼️ओ३म्‼️🚩🕉️🙏नमस्ते जीदिनांक  - ०६ फरवरी २०२६ ईस्वीदिन  - - शुक्रवार     🌖 तिथि -- पञ्चमी (२५:१८ तक तत्पश्चात षष्ठी ) 🪐 ...
06/02/2026

🚩‼️ओ३म्‼️🚩

🕉️🙏नमस्ते जी

दिनांक - ०६ फरवरी २०२६ ईस्वी

दिन - - शुक्रवार

🌖 तिथि -- पञ्चमी (२५:१८ तक तत्पश्चात षष्ठी )

🪐 नक्षत्र - - हस्त ( २४:२३ तक तत्पश्चात चित्रा )

पक्ष - - कृष्ण
मास - - फाल्गुन
ऋतु - - शिशिर
सूर्य - - उत्तरायण )

🌞 सूर्योदय - - प्रातः ७:०६ पर दिल्ली में
🌞 सूर्यास्त - - सायं १८:०४ पर
🌖 चन्द्रोदय -- २२:३१ पर
🌖 चन्द्रास्त - - ९:३४ पर

सृष्टि संवत् - - १,९६,०८,५३,१२६
कलयुगाब्द - - ५१२६
विक्रम संवत् - -२०८२
शक संवत् - - १९४७
दयानंदाब्द - - २०१

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🚩‼️ओ३म्‼️🚩

🔥प्रश्न : क्या परमात्मा किसी की भी आत्मा को निकाल या डाल सकता है ?
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उत्तर : कारण के बिना कोई कार्य नहीं होता और कर्त्ता के बगैर भी कोई कार्य नहीं होता ।कर्त्ता दो है -- ईश्वर और जीवात्मा प्रकृति जड़ है ।

आत्मा का शरीर से निकलना या आत्मा का वियोग शरीर की मृत्यु का मुख्य कारण है ।पूर्ण आयु भोग कर जड़ शरीर में जड़ता आती है जो स्वाभाविक मृत्यु का कारण होता है ।जन्म- मरण की प्रक्रिया प्राकृतिक नियमों द्वारा होती हैं।

ईश्वर का कार्य जीवात्मा के पिछले किये कर्मों का जाति- आयु- भोग के द्वारा फल प्रदान करना है ।ईश्वर कभी किसी की जान नही लेता और बिना कारण कोई कार्य नहीं होता।मृत्यु के अनेक कारण हो सकते है।मरे हुए शरीर में आत्मा वापस लौटकर नहीं आती।ईश्वर भी मुर्दे में जान नही डाल सकता, क्योंकि ईश्वर अपने ही बनाये नियमों को न तो तोड़ सकता है, और न ही उनमें परिवर्तन कर सकता है। क्योंकि ईश्वर सर्वज्ञ है।ईश्वर जो भी नियम बनाता है वे अटल, अपरिवर्तनशील होते है, सत्य होते हैं।मुर्दे कभी जीया नहीं करते, और जिन्दा कभी बिना वजह मरा नहीं करते ।

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🚩‼️ आज का वेद मंत्र ‼️🚩

🌷 ओ३म् शं न: सत्यस्य पतयो भवन्तु शं नो अर्वन्त: शमु सन्तु गाव:।शं न ऋभव: सुकृत: सुहस्ता: शं नो भवन्तु पितरो हवेषु। ( ४|३५|१२ )

💐 अर्थ :- सत्य के पालन करने हारे हमें सुखदायक हो, उत्तम घोड़े व गोएँ हमें सुखदायी हों, श्रेष्ठ बुद्धि वाले, बड़े बड़े काम करने वाले शिल्प क्रिया में चतुर जन हमारे लिए सुख देने वाले हो, यज्ञादि उत्तमोत्तम कार्यों में रक्षक माता पिता आदि पितर हमें सुखकारी हों।

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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार👇
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🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏

(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮

ओ३म् तत्सत् श्री ब्रह्मणो दिवसे द्वितीये प्रहरार्धे श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वते मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे
कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- षड्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२६ ) सृष्ट्यब्दे】【 द्वयशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८२) वैक्रमाब्दे 】 【 एकाधिकद्विशतीतमे ( २०१) दयानन्दाब्दे, काल -संवत्सरे, रवि- उत्तरायणे , शिशिर -ऋतौ, फाल्गुन - मासे, कृष्ण - पक्षे , पञ्चम्यां
तिथौ, चित्रा - नक्षत्रे, शुक्रवासरे
, शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे भरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ, आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे

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स्वर कोकिला 'भारत रत्न' लता मंगेशकर जी की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटिशः नमन।भारतीय संगीत जगत को समृद्ध बनाने में लता मंगेशक...
06/02/2026

स्वर कोकिला 'भारत रत्न' लता मंगेशकर जी की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटिशः नमन।

भारतीय संगीत जगत को समृद्ध बनाने में लता मंगेशकर जी का योगदान अविस्मरणीय है।
#लता_मंगेशकर

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