विवेकानंद विचार केंद्र

विवेकानंद विचार केंद्र कुमार अक्षय भारद्वाज द्वारा संचालित

�स्वामी विवेकानंद �
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�कभी-कभी समय की दीर्घावधि के बाद एक ऐसा मनुष्य हमारे इस ग्रह में आ पहुंचता है, जो असंदिग्ध रूप से किसी दूसरे मंडल से आया हुआ एक पर्यटक होता है, जो उस अति दूरवर्ती क्षेत्र की, जहां से वह आया हुआ है, महिमा शक्ति और दीप्ति का कुछ अंश इस दुखपूर्ण संसार में लाता है।

�वह मनुष्यों के बीच भी चलता है लेकिन वह इस मृत्यभूमि का नहीं है। वह है एक तीर्थयात्री, एक अजनबी वह केवल एक रात के लिए ही यहां ठहरता है।

�वह अपने चारों ओर के मनुष्य के जीवन से अपने को संबद्ध पाता है।उनके हर्ष विषाद का साथी बनता है, उनके साथ सुखी होता है उनके साथ दुखी भी होता है लेकिन इन सबके बीच वह यह कभी नहीं भूलता कि वह कौन है, कहां से आया है, उसके यहां आने का क्या उद्देश्य है, वह कभी अपने दिव्यत्व को नहीं भूलता। वह सदैव यह याद रखता है कि मैं महान तेजस्वी और महामहिमान्वित आत्मा हूं।

�वह जानता है कि वह उस वर्णनातीत स्वर्गीय क्षेत्र से आया हुआ है जहां सूर्य और चंद्र की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह क्षेत्र आलोकों के आलोक से आलोकित है। वह जानता है कि जब ईश्वर की सभी संताने एक साथ आनंद के लिए गान कर रही थी उस समय से बहुत पूर्व ही उसका अस्तित्व था।

�ऐसे एक मनुष्य को मैंने देखा उसकी वाणी सुनी और उसके प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित की और उसी के चरणों में मैंने अपनी आत्मा की अनुरक्ति निवेदित की।

�इस प्रकार का मनुष्य सभी तुलना के परे हैं क्योंकि वह समस्त साधारण मापदंडों और आदर्शों के अतीत है अन्य लोग तेजस्वी हो सकते हैं लेकिन उनका मन प्रकाशमय है, क्योंकि वह समस्त ज्ञान के स्रोत के साथ अपना संयोग स्थापित करने में समर्थ है। साधारण मनुष्य की भांति वह ज्ञानार्जन की मंथर परिक्रियाओं द्वारा सीमित नहीं है।

� अन्य लोग शायद महान हो सकते है, लेकिन यह महत्व उनके अपने वर्ग के दूसरे लोगों की तुलना में ही संभव है। अन्य मनुष्य अपने साथियों की तुलना में साधु, तेजस्वी, प्रतिभावान हो सकते हैं, पर यह सब केवल तुलना की बात है। एक संत साधारण मनुष्य से अधिक पवित्र अधिक पुण्यवान अधिक एकनिष्ठ हो सकते हैं, परंतु स्वामी विवेकानंद के संबंध में कोई तुलना नहीं हो सकती। वे स्वयं ही अपने वर्ग के हैं। वे एक दूसरे स्तर के हैं न कि इस सांसारिक स्तर के।वे एक भास्वर सत्ता है। जो एक सुनिर्दिष्ट प्रयोजन के लिए दूसरे एक उच्चतर मंडल से इस मृत्यभूमि पर अवतरित हुए हैं।
कोई शायद जान सकता था कि वे यहां दीर्घकाल तक नहीं ठहरेंगे।
इसमें क्या आश्चर्य है कि प्रकृति स्वयं ऐसे मनुष्य के जन्म पर आनंद मनाती है,स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं और देवदूत कीर्ति–गान करते हैं।

�धन्य है वह देश, जिनने उनको जन्म दिया; धन्य है वह मनुष्य जो उस समय इस पृथ्वी पर जीवित थे; और धन्य है वह कुछ लोग–– धन्य,धन्य,धन्य, जिन्हें उनके पद चापों में बैठने का सौभाग्य मिला था।��
___भगिनी क्रिस्टीन
( स्वामी विवेकानंद की शिष्या)

कृष्ण का यही महान कार्य था_ हमारी आँखों को स्वच्छ करना और मानवता की ऊर्ध्वगामी तथा अग्रगामी प्रगति को विशालतर दृष्टि से ...
19/08/2026

कृष्ण का यही महान कार्य था_ हमारी आँखों को स्वच्छ करना और मानवता की ऊर्ध्वगामी तथा अग्रगामी प्रगति को विशालतर दृष्टि से दिखाना। उनका ही पहला हृदय था, जिसमें सबमें विद्यमान सत्य को देख सकने की विशालता थी, और उनकी ही प्रथम वाणी थी, जिससे प्रत्येक और सभी के निमित्त सुन्दर शब्द उच्चरित हुए। ...

गरिमान्वित हों वे महान आत्माएं, जिनकी जीवनियों का अनुशीलन हम अभी कर चुके हैं। वे संसार के जीवंत देवता हैं। वे वह व्यक्ति हैं, जिनकी हमें पूजा करनी चाहिए। यदि वह मेरे पास आये, तो मैं उन्हें केवल तभी पहचान पाऊंगा, जब वह मनुष्य का रूप धारण कर लें। वह है तो सर्वत्र, किंतु क्या हम उन्हें देख पाते हैं?
हम उन्हें केवल तभी देख सकते हैं,जब वह मानव की सीमा अंगीकार करें।... यदि मनुष्य और पशु ईश्वर की अभिव्यक्ति हैं, मानव जाति के ये शिक्षक, नेता हैं, गुरु हैं। अतएव, उन तुमको अभिनंदन, जिनके पादपीठ की उपासना देवदूत करतें हैं!
अभिवंदन तुम मानव जाति के नेताओं का! अभिवंदन तुम महान शास्ताओं का! तुम नेताओं, सदा सदा के लिए हमारा अभिवंदन ग्रहण करो!
कृष्ण (केलिफोर्निया में दिया हुआ भाषण,अप्रैल १,१९००)

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