रामपुर कांधी देवलास , ज़िला- मऊ , उत्तर उत्तर प्रदेश

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22/08/2021

---बुलंद आवाज विशेष---- -प्राइमरी पाठशाला देवलास के छात्र ने भारतीय स्तर पर गद्य को दी नयी दृष्टि -नव नालंदा महाविहार स....

भोजपुरी कला -शैली को बिल्कुल नयी रंग-भाषा  देने वाली  चित्रकार श्रीमती  वंदना श्रीवास्तव से बातचीत ---------------------...
13/06/2021

भोजपुरी कला -शैली को बिल्कुल नयी रंग-भाषा देने वाली चित्रकार श्रीमती वंदना श्रीवास्तव से बातचीत
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"लोक की रंग -भाषा एवं समकालीन दृष्टि से भोजपुरी कला को नई ऊँचाई व सम्मान दिलाने का मेरा प्रयास"
- वंदना श्रीवास्तव

वंदना श्रीवास्तव ऐसी चित्रकार हैं , जिन्होंने भोजपुरी लोककला की भीत पर आधुनिक चित्रकला को समकालीन दृष्टि के साथ प्रतिष्ठित किया . उनकी कला में परंपरा और आज के समय का अद्भुत मेल है . वे पूरब की कला को नया प्रयोग देने में सिद्धहस्त माने जाती हैं. विलुप्त होती कला को बचाते हुए तथा नए ट्रेंड को जोड़ कर नयी गति देना उनकी कला की विशेषता है.

एक नयी धारा में नई दृष्टि- प्रवर्तन की विनम्र कोशिश उनकी रही है , जो भोजपुरी धरती से आकर आज के समय का नया ट्रेंड सेट करे. राष्ट्रीय स्तर पर इन की चित्रकला की प्रदर्शनियाँ लग चुकी हैं तथा अपनी विशेषता को स्थापित कर चुकी हैं . मैथिली भोजपुरी अकादमी दिल्ली की कला की भारतीय स्तर की प्रदर्शनी " रंग पूर्वी " ( 2010) में उनकी कला शामिल थी। इसमें भारत के पूर्वी क्षेत्र के विभिन्न कलाकारों की कला की प्रदर्शनी दिल्ली में लगाई गई थी। फिर वहीं उसी संस्था के तत्त्वावधान में 2013 में लगाई गई । वे साहित्य कला परिषद , दिल्ली सरकार की। कार्यकारिणी समिति की सदस्य रह चुकी हैं.

उनकी कई पेंटिंग समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। इनके निर्मित चित्रों को (केन्द्रीय) साहित्य अकादमी की पुस्तक, अक्षर पर्व पत्रिका, भोजपुरी साहित्य सरिता पत्रिका आदि के कवर पेज के रूप में भी प्रकाशित किया गया है।


सवाल --
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आप का भोजपुरी भाषा एवं संस्कृति से क्या सम्बन्ध है ?

श्रीमती वंदना श्रीवास्तव --
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भोजपुरी भाषा और संस्कृति हमारे खून में है. मेरे माँ -पिता , दादी, दादा तथा पूर्वजों की भाषा भोजपुरी ही है. मायका उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के रिठिया गाँव ( बूढ़न पुर कस्बा के पास ) के होने के नाते भोजपुरी हमारी सहज स्वाभाविक भाषा है. ससुराल गाँव- रामपुर काँधी, देवलास , मोहम्मदाबाद गोहना , मऊ ( उत्तर प्रदेश ) में भी भोजपुरी भाषा संस्कृति ही है. मेरा जन्म , पालन- पोषण तथा पढ़ाई लिखाई राजस्थान में हुई है. जोधपुर में जन्म हुआ. राजस्थान के विभिन्न अञ्चलों, जैसे सुजानगढ़ , बाड़मेर , डीडवाना आदि में पढ़ाई हुई. राजस्थान से ही इतिहास में एम्.ए. किया. कक्षा ५ से ९ तक के पढ़ाई राजकीय बालिका इंटर कालेज , आजमगढ़ से हुई है. इन्हीं ५ सालों में भोजपुरी का गंभीर रचाव -बसाव मेरे अंतर्मन में हुआ. पुन : राजस्थान जाने के बाद भी बार -बार अपने ददिहाल -ननिहाल आने से यह और भी प्रगाढ़ हुआ. इस वजह से जितनी सहजता मुझे भोजपुरी में अपने पारिवारिक वातावरण के कारण है उतनी ही मारवाड़ी राजस्थानी कला व भाषा में भी है. मेरे पास भोजपुरी एवं राजस्थानी कला व भाषा का मेल है .

सवाल --
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चित्रकला के क्षेत्र में आप की अभिरुचि कैसे हुई ?

श्रीमती वंदना श्रीवास्तव --
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लोक कला में ही नहीं बल्कि कला मात्र में रुचि है. आज की कला में भी मेरा कार्य है. किसी भी कला का मूल लोक ही होता है , बाद में स्टैण्डर्ड होकर वह शास्त्रीय हो जाता है. गाँव की कला में सहज रुचि गाँव के लोगों तथा माँ , दादी से मिली. वे लोग कलाकारों को परिवार ही समझते रहे. बचपन से उन कलाकारों के बीच उठने- बैठने एवं कलामय वातावरण के कारण कला में अभिरुचि हुई.

सवाल -
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आप के चित्रों को देखने का अवसर मिला. अपनी ही तरह के हैं. भोजपुरी भित्ति चित्रकला -शैली से इनका क्या सम्बन्ध है ?


श्रीमती वंदना श्रीवास्तव --
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दीवारों के चित्र तथा पत्थरों पर बनाए चित्रों के पुरानी परम्परा है. मिर्ज़ापुर के बहुत पुराने पत्थर देखिए। एक से एक चित्र जेम्मे अपन मन व समाज का हर भाव दिख जाता है . कोहबर निर्मिति अपना शुभ चित्र है. वह आज भी जीवंत जैसा है. अब वह विशेष अवसर पर खाली कागज तथा दीवारों पर प्रतीकात्मक रह गया है . पहले वह जीवन का हिस्सा था. उसकी वजह से भी वह अवसर विशेष भी त्योहार हो जाता था किन्तु आज ढिठौना की रह गया है. कोहबर की परपरा बिहार , उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ , झारखण्ड आदि जहां भी है, वहां से अपना स्रोत लेना चाहिए.

सवाल --
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भोजपुरी चित्रकला शैली में नई उद्भावना तथा अन्य लोक चित्रकला शैलियों की प्रयोगात्मक मिश्रित नवीन कला-शैली विकसित करने के पीछे आप का उद्देश्य क्या है?


श्रीमती वंदना श्रीवास्तव --
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मैंने मूलत: भोजपुरी कला को समकाल से रचा है. किन्तु भोजपुरी के साथ - साथ मैथिली चित्रकला शैली ही ना बल्कि , कई बार प्रयोगात्मक तौर पर ब्रज, मालवी, राजस्थानी , अवधी , मगही आदि का भी आंचलिक आधार लेकर उसको आज के समय की नई दृष्टि के साथ मैंने प्रस्तुत किया है . एक ओर लोक का आधार , दूसरी ओर अपने समय की चेतना. समकाल अपना आता है उसमें . वह जरूरी है. अपनी शैलीगत निजता किसी कलाकार को विशिष्ट बनाती है .

सवाल --
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माना जाता है कि भोजपुरी भित्ति- कला शैली प्राचीन व आकर्षक है . इसमें भोजपुरी संस्कृति का सकारात्मक सन्देश है . किसी चित्रकला शैली के साथ मिलाने से मूलस्वरूप खंडित तो नहीं होगा ?

श्रीमती वंदना श्रीवास्तव --
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भोजपुरी भित्ति चित्रों में एक गहन दृष्टि बा. उसमें गृहस्थी, शुभत्व, शांति, तपस्या, खेत- बारी , अनुष्ठान , अच्छाई , कठिनाई , रीति-प्रीति सभी कुछ है. वहां खंडित नहीं बल्कि समग्र सोच है. समस्त समुच्चय है, जोड़ है. अनेक में एक है. हमारी कोशिश रही है कि भोजपुरी कला की मूल आत्मा को सुरक्षित रखते हुए उसमें आज के समय का मॉडर्न ट्रेंड ले आया जाय.

सवाल --
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मैथिली कला शैली जो
'मधुबनी पेंटिंग ' के नाम से भी जानी जाती है , समान्तर रूप से भोजपुरी कला शैली को उसके परिप्रेक्ष्य में कहाँ देखती हैं ?

श्रीमती वंदना श्रीवास्तव --
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आपका यह सवाल बहुत सार्थक है. मधुबनी या मिथिला शैली तो एक विशिष्ट प्रचलित नाम हो गया है . किन्तु 'भोजपुरी कला ' की हमारी सुंदर निर्मिति , विशिष्टता एवं सुदीर्घ परम्परा को देखते हुए उसको भी समान्तर केन्द्रीय महत्त्व मिलना चाहिए. मेरी कोशिश इस नाम ( " भोजपुरी कला '' ) के स्थापत्य का रहा है . इसको मैंने 'भोजपुरी कला' का ही सम्बोधन दिया। हम लोगों को इस कला को हर मंच पर, हर जगह पर ले जाना चाहिए , इसका कारण यह है कि भोजपुरी की अपनी कलात्मक , साहित्यिक एवं सांस्कृतिक ज़मीन है. जैसे भोजपुरी साहित्य को 'भारतीय साहित्य' में उचित स्थापना चाहिए , वैसे ही भोजपुरी कला को आज के समय के रूप में भारतीय व विश्व परिदृश्य चाहिए . हमारे पास तो दुनिया के कई देश हैं जहां हम लोगों की माई , आजी कितने साल से हैं , जैसे - मारीशस, गुयाना, त्रिनिदाद, फिजी, नेपाल , सूरीनाम आदि. वहाँ भी इसके नाम व अस्मिता का उल्लेख होना चाहिए.

सवाल --
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आज भोजपुरी भित्ति चित्रकला शैली विलुप्त हो रही है , जो भोजपुरियों की पहचान है, उसको बचाने के लिए आप के सुझाव क्या हैं ?


श्रीमती वंदना श्रीवास्तव --
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इसकी जिम्मेदारी हर आदमी को उठानी चाहिए तथा अपने घर में इसको भी महत्त्वपूर्ण पेंटिंग या किसी न किसी रूप में अवश्य प्रवेश देना चाहिए . जैसे अपनी ही कला को ओझल कर दिया गया है उसको फिर से देखने तथा अनुभव करने का विषय व आदत बन जाय , विशेष रूप से नयी पीढ़ी में इसका प्रवेश कराना है . भोजपुरी भीत्ति- कला को बचाने के लिए गाँव की खांटी महिलाओं को इज़्ज़त देना हमारा कर्तव्य है . शहरीपन के दबाव में उनको गँवार न ट्रीट करें। वे विज़नवाली , दूरदर्शी तथा प्रतिभाशाली रही हैं . उन्हें समुचित मान देना होगा । जो महिलाएँ इतना अच्छा चित्रण करती हैं उनको सम्मान से देखना चाहिए । जैसे गाने वाले / वाली को, नृत्य वाले / वाली को।सम्मान देना चाहिए . उन्हें 'नचनियाँ -बजनियाँ' नहीं बोलना चाहिए. उन्हें पूरी गरिमा दें. भीत पर रेखा उकेरने वाली गाँव की सामान्य महिला के प्रति श्रेष्ठ भाव होना चाहिए. दूसरी यह बात है कि उनका सम्भव हो तो कुछ सामयिक प्रशिक्षण भी चाहिए. तीसरी बात यह कि लोक में आधुनिक दृष्टि भी अपेक्षित है. लोक की अलग प्युरिटी है किन्तु समय के समझते हुए नई रंग -भाषा चाहिए, जिसका आधार भीत व लोकरंग हो. मैं तो लगभग 30 साल से वही कर रही हूँ .

सवाल --
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भोजपुरी चित्रकला शैली किस- किस कला-शैली के साथ अपनी पहचान बना कर रखने में सक्षम है ?

श्रीमती वंदना श्रीवास्तव --
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भोजपुरी चित्रकला शैली के अंदर सभी शैलियों के समेटने तथा खुद विलुप्त न होने की क्षमता है. उसको सभी शैलियों का समाहार होना चाहिये , अपनी निजता एवं विशेषता बचाते हुए. जो कला अपना मूल छोड़ देगी , वह नष्ट हो जाएगी. इस कारण अपने मूल को सुरक्षित रखना भी जरूरी है.

सवाल --
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आप साहित्य कला परिषद् , दिल्ली सरकार की माननीया सदस्य रह चुकी हैं . वहाँ कला का अनुभव?

श्रीमती वंदना श्रीवास्तव --
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साहित्य- कला परिषद्, दिल्ली सरकार की सदस्य के रूप में मैं कुछ समय रही. भोजपुरी कला को लोगों में रचाने-बसाने की जरूरत है, जागरूक करने की जरुरत है. वहाँ अभी और भी गुंजाइश है, भित्ति कला व लोक की नवीनता की . लोक तथा अपने समय की कला का संतुलन चाहिए .

सवाल --
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भोजपुरी-मैथिली चित्रकला शैली को मिला कर आधुनिकता व समकालीनता को चित्रकला में प्रतिष्ठित करने के प्रयास में आप अपने को कितना सक्षम पाती हैं ?

श्रीमती वंदना श्रीवास्तव --
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आधुनिकता एक दृष्टि है. समकालीनता उसका समय- परिप्रेक्ष्य । उसको भाषा , साहित्य , कला, संगीत एवं थियेटर आदि में अनुप्रयोग करना चाहिए. हम लोग समय से पिछड़ी सोच रख कर क्या कर पाएँगे ? परम्परा एक विकसनशील स्थिति है. जड़ता को पोषित नहीं करना चाहिए . मैथिली , भोजपुरी या अन्य किसी भी शैली को आधुनिकता से रूबरू होना ही चाहिए , परंपरा बचाते हुए. हमारी वही कोशिश है. मैं अपनी भाषा , जन , संस्कृति , भूमि को अपनी नई समझ के साथ आगे बढ़ाना चाहती हूं. मैं काम करना चाहती हूँ . वही बचेगा.

सवाल --
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भोजपुरी चित्रकला शैली को बचाकर, उसे नया ट्रेंड देते हुए उसकी रक्षा का प्रयास करने के लिए आप का साधुवाद.

श्रीमती वंदना श्रीवास्तव --
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धन्यवाद एवं आभार . मैंने 'भोजपुरी कला' को बिल्कुल नई दृष्टि देने का जतन किया , यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं जितना यह है कि यह लहर आगे चलती चले. गाँव -गाँव में एक नयी चेतना आवे . अपनी भोजपुरी कला की पहचान का विस्तार हो.

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' विराट वैभव' समाचार पत्र, 13 जून, 2021

साहित्य व भाषा के पक्ष में /परिचय दास
29/08/2020

साहित्य व भाषा के पक्ष में /
परिचय दास

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