Radha Gahavarvan, Barsana

Radha Gahavarvan, Barsana "मेरो राधा नाम सहारो जैसे प्यासे को पा?

03/05/2022

सरसम्मत योग अथवा तिथि अक्षय तृतीया पर अपने अच्छे आचरण और सद्गुणों से दूसरों का आशीर्वाद लेना अक्षय रहता है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है। इस दिन किया गया आचरण और सत्कर्म अक्षय रहता है।भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है, सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है। भगवान विष्णु ने नर-नारायण, हयग्रीव और परशुराम जी का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था। ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव भी इसी दिन हुआ था। इस दिन श्री बद्रीनाथ जी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है और श्री लक्ष्मी नारायण के दर्शन किए जाते हैं। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही पुनः खुलते हैं। वृन्दावन स्थित श्री बाँके बिहारी जी मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं। पद्म पुराण के अनुसार इस तृतीया को अपराह्न व्यापिनी मानना चाहिए। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था।
आप सभी भक्तों को अक्षय तृतीय व् भगवान् श्री परशुराम, नर-नारायण व् हयग्रीव जी के अवतरण दिवस की हार्दिक बधाई हो!

राधे राधे DELHI
28/04/2022

राधे राधे DELHI

03/03/2022

रामायण में लिखा है...........
कामदेव ने जब महादेव जी पर उनकी समाधि भंग करने के लिए पुष्पमय बाण मारा था तो महादेव जी ने तीसरा नेत्र खोला था तो कामदेव जल गया था!
लेकिन जिस समय वो बाण मारने चला था, उस समय सारा संसार काम-मय हो गया था!
जोगी, जपि, तपी, सन्यासी सब!
लताएं वृक्षों से काम पूर्वक लिपटने लगीं, ऐसा काम संसार में कभी नहीं चला!

अब्लाबिलोकहीं पुरुषमय सब जगत अबलामयं!
द्विदण्ड भर ब्रह्मंड भीतर काम कृत कौतुक अयं!!

स्त्रियां काम में पागल होकर पुरुषों को देखने लगीं और पुरुष पागल हो गए स्त्रियों के लिए!
वहाँ पर लिखा है........
धरी ना काहुँ धीर ते उबरे!
जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहिं कालमय!!

किसी ने धीर धारण नहीं किया! महादेव जी भी गिर गए!
अरे, समाधि तो टूट ही गई उसके बाण से!
लेकिन जिनको भगवान् ने रखा, वो रह गए,........... जिसको भगवान् ने बचाया!
हम जैसे पशुओं की तरह रहने वाले, कहाँ बच सकतें हैं!
भगवान बचाता है!
उस समय भी जब सारा ब्रह्माण्ड काम-मय हो गया, देवता, जपि, तपी, यहाँ तक की महादेव जी पे भी असर हो गया!
लेकिन वहाँ पर भी वो ही बचे जिनको भगवान् ने बचाया! इसीलिए तो दैन्य का पद गाया जाता है कि वो शक्ति दे भगवान्!
कौन बच सकता है माया से!

शिव चतुरानन देख डरहिं!
अपर जेहु जीव केहि लेखे माहि!!

ब्रह्मा, शंकर भी डरतें हैं माया से तो हम जैसे मक्खी-मच्छर कैसे बच सकतें हैं!
कबीर जी का पद है........
रमैया तेरी दुल्हनिया ने लूटा बाज़ार!
लूटा बाज़ार अरे लूटा बाज़ार! रमैया तेरी दुल्हनिया ने लूटा बाज़ार!
भगवान् की माया शक्ति से कौन टक्कर ले सकता है?
कोई नहीं! और जो कहता है कि हम बच गएँ हैं, वो मूर्ख है! जो अहंकार करता है, वो मूर्ख है, जरूर मरेगा! अपनी प्रशंसा करने वाला जरूर मरता है! जो अपने को समझता है कि हम हैं कुछ, सदाचारी के बाप! वो जरूर धक्के खाता है!

सुरपुर लूटा, नागपुर लूटा, तीनो लोक मचा हाहाकार!
रमैया तेरी दुल्हनिया ने लूटा बाज़ार!!
सुरपुर माने कोई देवता नहीं बचा! अरे छोटे-मोटे देवता ही नहीं- ब्रह्मा-शंकर तक लुट गए! ब्रह्मा जी लुटे, अपनी लड़की सरस्वती के पीछे दौड़े! महादेव जी लूटे मोहिनी-रूप के पीछे!

ब्रह्मा लूटे, महादेव लूटे, नारद मुनि के पड़ी पछाड़!
रमैया तेरी दुल्हनिया ने लूटा बाज़ार!!
विश्व मोहिनी के पीछे नारद जी लुटे गए, बन्दर की शकल दे दिया भगवान् ने! ऐसा पटका, धोबी-पाट मारा नारद जी को!

श्रृंगी की मिंगी कर डाली, पारासर के उदर बिदार!
रमैया तेरी दुल्हनिया ने लूटा बाज़ार!!
श्रृंगी ऋषि को ये ही नहीं पता था कि कौन स्त्री है-कौन पुरुष! जंगल में बाप ने पाला-पौसा! स्त्री का मुख ही नहीं देखने दिया!
राजा रोमपाद के राज्य में अकाल पड़ा था! ऋषियों ने बताया कि कोई ऐसा पुरुष आवे जिसको लिंग-भेद का मालूम ना होवे तो वर्षा हो जाएगी!
लोगों ने बताया कि एक श्रृंगी ऋषि हैं! इनके पिता का वीर्य गिर गया था पानी में अप्सरा को देखकर के! हिरणी ने निगल लिया था! हिरणी के पेट से पैदा भये थे, इनके सर पे सींग थे और शरीर मनुष्य का!
अब ये बात हुई कि इनको लाएगा कौन क्योंकि पिता तो किसी से मिलने ही नहीं देते! पिता ने कहा था कि हमारा लड़का ऐसा होगा जो आजीवन स्त्री-पुरुष में भेद ही नहीं जानेगा, माया क्या कर लेगी!
गर्व किया कि हमारा बेटा ऐसा!
गर्व किया और माया रगड़ देती है! यूँ ही मसल देती है!
वैश्याओं ने जिम्मा लिया कि हम लाएंगी!
एक बझेरा बनाया! बझेरा मतलब नाव पर मकान बनता है!
उस जंगल में नदी पार कर के आश्रम से दूर पहुँची!
क्योंकि सब स्त्रियां सुन्दर थीं, ऋषि लोग देखेंगे तो श्राप दे देंगे, कहेंगे कि तुम कैसे आईं यहाँ पर! इसलिए जाके पता लगाया कि श्रृंगी जी के पिताजी कंद-मूल लेने कब बाहर जातें हैं! पिताजी के बाहर जाते ही झट सब पहुँच गई!
बड़ी अकल होती है स्त्रियों में!
श्रृंगी जी ने कभी स्त्रियां देखी नहीं थी! बाबाजी देखे थे बड़ी-बड़ी जटाओं वाले!
वैश्याओं को देखकर सोचा - ओह, बड़े सुन्दर ऋषि पधारें हैं! सुन्दर वस्त्र, गहने और श्रृंगार देखकर आकर्षित हो गए और बोले - अरे, आप तो बड़े तेजस्वी हैं!
उन वैश्याओं में श्रद्धा आ गई और श्रद्धा में मारे गए!
जो बुराई जब बुराई बनकर आती है उसको तो हम पहचान लेतें हैं लेकिन जो बुराई अच्छाई का रूप लेकर आती है उसको हम नहीं पहचान पाते!
श्रृंगी जी उनको तेजस्वी समझे और बोले - आइये, चरण धोएं आपके हम!
वेश्याएं बोली - हमारे यहाँ चरण धुवाने का संस्कार नहीं है, हमारा सम्मान इस तरह से नहीं होता है!
श्रृंगी जी ने पूछा - कैसे होता है?
वें बोलीं - हमसे आलिंगन करो, इस तरह से हमें प्रणाम करो!
बेचारे श्रृंगी जी मारे गए, आलिंगन करने लग गए!
वैश्याओं ने भेंट में फल व् मिठाई दिया तो देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि जंगल में तो एक ही तरह के कंद-मूल पाया करतें थें! स्वादिष्ट फल-मिठाई पाकर बड़े आनंदित हुए!
वेश्याएं बोली - ये दिव्य फल हैं, हम लोग दिव्य धाम से आएं हैं! आप भी हमारे यहाँ चलो, हमारा आश्रम देखो!
श्रृंगी जी ने कहा - हमारे पिताजी आने वाले है, उनकी आज्ञा लें लें!
वेश्याएं बोली - आपके पिताजी को मालूम है! हम बड़े ही उचें कुल के ऋषि हैं! वो समाधि लगाकर जान जाएंगे, बड़े प्रसन्न होंगे!
श्रृंगी जी तो उनको महात्मा समझे बैठे थे, बोले - जो आज्ञा!
आगे-आगे वेश्याएं चलने लगी और पीछे-पीछे श्रृंगी जी भी चलने लगे और जाकर बझेरे पे बैठ गए! चल पड़े, पिताजी को भी छोड़ दिया, गलत जगह श्रद्धा हुई और मारा गया!
राजा रोमपाद के राज्य की सीमा में पाँव रखते मान ही वर्षा हो गई क्योंकि कभी भोग भोगा ही नहीं था उन्होंने! वो तो ऋषि के भाव में आए थे! उधर जंगल में पिताजी पहुँचे, देखा की श्रृंगी नहीं है! समाधि लगाया तो जाना कि हमारे लड़के को तो भ्रमित कर के ले गएं हैं! अभी हम शाप देकर पूरे राज्य को भस्म कर देते हैं! उधर राजा रोमपाद ने पिताजी के शाप के डर के कारण अपनी पुत्री शान्ति जो की अयोध्या के राजा दशरथ जी की पुत्री थी और राजा दशरथ जी ने अपने मित्र राजा रोमपाद जी को निःसंतान होने के कारण वचन स्वरुप देवी कौशल्या से जन्मीं अपनी प्रथम संतान (कन्या) "शान्ति" दान कर दी थी, "शान्ति" का विवाह ऋषि श्रृंगी से करा दिया! और राज्य की सीमा पे लिखवा दिया 'राज्य ऋषि श्रृंगी का'! वो जानते थे कि पिताजी राज्य को भस्म कर सकते हैं! श्रृंगी जी के पिताजी जब पहुँचे तो सीमा पर देखा लिखा हुआ 'राज्य ऋषि श्रृंगी का' तो देखते मान समझ गए कि हमारे लड़के को राजा बना दिया इन्होने! राज्य में गए तो देखा दुल्हा उनका लड़का और दुल्हन राजा दशरथ की लड़की शान्ति! अब किसको शाप दें! भगवान् की इच्छा जान वापिस चले गए!
जिसको स्त्री-पुरुष लिंग का ज्ञान नहीं, ऐसे ऋषि श्रृंगी को भी माया ने मसल दिया! धन्य है माया!

और पारासर जी का पेट फाड़ दिया!
पारासर ने मस्योदरी से संपर्क किया!
मना कर रही थी कि दिन है तो कोहरा पैदा कर दिया!
पानी है, पानी के ऊपर यह कार्य नहीं तो पानी के ऊपर काई पैदा कर दिया!
मस्योदरी बोली - हमारा कन्या-तत्व नष्ट हो जाएगा तो पारासर बोले - नहीं होगा!
मस्योदरी बोली - संतान उत्पन्न हो जाएगी तो पारासर बोले - तुरंत चली जाएगी, किसी को नहीं पता पडेगा!
मस्योदरी बोली - मेरे में दुर्गन्ध आ रही है तो पारासर बोले - सुगन्धि आ जाएगी तेरे में से!

तो कबीर दास जी कह रहें हैं कि वासना में अपना पेट ही फाड़ रहें हैं!

कन्फूकां चिद काशी लूटें, योगेश्वर वें करत विचार!
रमैया तेरी दुल्हनिया ने लूटा बाज़ार!!
बड़े-बड़े गुरु हैं, कानों में मन्त्र देतें हैं! ये सब भी लूट लिए!
बड़े-वादे योगेश्वर विचार कर रहें हैं! मर गए हम तो, माया ने लूट लिया! सब योग नष्ट हो गया!

अब अपने बारे में लिखतें हैं........
हम तो बच गए साहिब दया से, शब्द डोर नहीं उतरें पार!
रमैया तेरी दुल्हनिया ने लूटा बाज़ार!!
कबीर दास जी ने अपने जीवन में कभी स्त्री संग नहीं किया था!

कहत कबीर सुनो भाई साधो, इस ठगनी से राहों होशियार!
रमैया तेरी दुल्हनिया ने लूटा बाज़ार!!
राधे राधे

04/01/2022

हे प्रेम पिपासु जीवात्माओं........ तुम कहाँ भटक रहे हो?
जिस प्रेम को पाने के लिये तुम अनादिकाल से द्वार-द्वार भिक्षा माँग रहे हो, वह तो केवल "राधारानी" ही तुम्हे दे सकती हैं!
वें ही दिव्य-प्रेम की अधिष्ठात्री हैं, दात्री हैं!
स्वयं ब्रह्म श्रीकृष्ण भी उनसे प्रेम दान चाहते हैं!
सुनो... ध्यान से सुनो!
श्रीराधा स्वयं प्रेम-तत्व की सार हैं!
महाभाव-स्वरूपिणी हैं!
आनन्द-ब्रह्म की सार-भूत शक्ति हैं!
क्योंकि वें श्रीकृष्ण के आनन्द की दात्री हैं, आह्लाद-प्रदायनी हैं! अतः वह श्रीकृष्ण की आह्लादिनी-शक्ति कहलाती हैं!
आह्लादिनी-शक्ति के सार को ही प्रेम कहा जाता है!
इसी प्रेम-तत्व का सार - महाभाव है और हमारी "राधारानी" महाभाव की साकार-स्वरूपा हैं!
अतः आओ! हमारी महाभाव-स्वरूपिणी "श्रीराधारानी" की शरण ग्रहण करें!
प्रेम-तत्व की सार "श्रीराधारानी"!
निगमागम के अगम सुगम अति-दीनन हित सुकुमारी "श्रीराधारानी"!
हे जीवों! "श्रीराधारानी" को वेद-शास्त्रों से नहीं जाना जा सकता!
वेद-शास्त्र भी उन्हें अगम्य बताते हैं!
किन्तु दीन-जनों के लिये वे अति सुगम हैं!
कोई भी जीव उन्हें अपनी दीन-पुकार से रिझा सकता है!
प्रेम-तत्व की सार "श्रीराधारानी"!
विधि हरी-हर की कौन बात जब - ब्रह्म ना पायो पार "श्रीराधारानी"!!
जीवों, अब तुम्ही विचार करो!
जब साक्षात पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ही उनकी महिमा का पार ना पा सके तो ब्रह्मा, विष्णु व् शंकर आदि को "राधा-तत्व" जानने की शक्ति कहाँ है?
प्रेम-तत्व की सार "श्रीराधारानी"!
कन्दन-करुण सुनावत धावति - निज सुधि-देह बिसार "श्रीराधारानी"!!
किन्तु हमें निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं!
क्योंकि "श्रीराधारानी" दीन-जनों के लिये अति सरल है, अति सहज है!
जब भी कोई दीन आरत-भाव से, करुण-कन्दन करते हुए "राधे" कह कर पुकारता है तो "श्रीराधारानी" से रहा नहीं जाता!
वो उस जीव के लिये अत्यन्त व्याकुल होकर अश्रु बहाने लगाती हैं और अपने धाम को छोड़ कर भागी चली आती हैं!
उन्हें अपनी देह की भी कोई सुध-बुध नहीं रहती!
प्रेम-तत्व की सार "श्रीराधारानी"!
"राधे-नाम" पुकारत राधे - बरसावती जल-धार "श्रीराधेरानी"!!
मोहि कृपालु अब भय ना को-जग!
कृपालु जी कहते हैं - जब ऐसी सरल-सुकुमार हमारी अलबेली-सरकार, हमारी रखवार "श्रीराधेरानी" है तब हमें डर किस बात का!
हम घबरायें क्यों?
जब लाडली "श्रीराधेरानी" ही हमारी रखवार हैं!

श्यामा श्याम की राह में, आँखें बिछा दे "बरसाने" में! इन नैनन की बदरी से, बरसात हो "बरसाने" में!!प्रिया-प्रीतम की एक झलक,...
12/12/2021

श्यामा श्याम की राह में, आँखें बिछा दे "बरसाने" में!
इन नैनन की बदरी से, बरसात हो "बरसाने" में!!
प्रिया-प्रीतम की एक झलक, मिल जाए कहीं "बरसाने" में!
फिर मेरे जीवन की हो जाए, शाम यहीं "बरसाने" में!!

मोहे तो प्यारी लागे "बरसाने" की गलियाँ!
जग सो न्यारी लागे "बरसाने" की गलियाँ!!

रसिकों की प्राण है ये, जीवन आधार है ये!
"राधा-जु की कृपा का, श्यामा-जु की कृपा का द्वार है ये गलियाँ!!
मोहे तो प्यारी लागे "बरसाने" की गलियाँ!
जग सो न्यारी लागे "बरसाने" की गलियाँ!!

"बरसाने" जो भी आवे, चरणों की प्रीत पावे!
"राधे-जु" के पायल की, श्यामा-जु के पायल की झंकार है ये गलियाँ!!
मोहे तो प्यारी लागे "बरसाने" की गलियाँ!
जग सो न्यारी लागे "बरसाने" की गलियाँ!!

दधि-कानों की और केसर की कीच मचे!
प्रेम-रस धारा की, बौछार हैं ये गलियाँ!!
मोहे तो प्यारी लागे "बरसाने" की गलियाँ!
जग सो न्यारी लागे "बरसाने" की गलियाँ!!

"राधे" को नाम गावे, वंशी की तान गावे!
मीठी-मीठी वीणा की झंकार है ये गलियाँ!!
मोहे तो प्यारी लागे "बरसाने" की गलियाँ!
जग सो न्यारी लागे "बरसाने" की गलियाँ!!

10/11/2021

मनमोहन से है प्यार जिसे, उसे गाली की परवाह नहीं!
जब युद्ध क्षेत्र में वीर खड़ा, उसे मरने की परवाह नहीं!!
जब सत पे सती चली अपने, उसे जलने की परवाह नहीं!
जो विरह बाण से मर ही चुके, उसे मरने की परवाह नहीं!!

सुख-भोगों की आशा छोडो, कंकड़-पत्थर पर चलना है!
नहीं दर्शन सुन्दर फूलों का, काँटो की शैया सोना है!!
नहीं चाह शीतल छाया की, विरहा अग्नि-शिखा में जलना है!
विषयों के भोगी भागो रे, नहीं तुमको इस पथ आना है!!

नहीं गाया गीत विरह का जो, वो प्रेम पथ को क्या जानेगा!
तारों की झंकार ना झूला, वो हृदय तार को क्या जानेगा!!
पत्थर सा दिल जिसका, फूलों की कोमलता क्या जानेगा!
जो इन्द्रिय-सुख का भोगी है, हरी प्रेम-पथ को क्या जानेगा!!

04/11/2021

चौदह वर्ष के वनवास पश्र्चात श्रीरामचन्द्र, जानकी व लक्ष्मण वापिस अयोध्या पधारे थे। अयोध्या निवासियों ने उनका सत्कार दीपमाला प्रज्वलित कर व आतिशबाजी दिखाकर किया था। आपको सपरिवार दीपमाला प्रज्वलित दिवस दीपावली की हार्दिक बधाई हो।

04/11/2021
05/10/2021

पांडे लीला (ब्रज होरी) :--
होरी का प्रारम्भ बरसाने से होता है संसार में!
नौमीं से अनेक होरियां शुरू हो जातीं हैं ब्रज में!
दशमी को नन्दगाँव में होती है!
फिर एकादशी से वृन्दावन में चलने लग जाती है!
सारे संसार में होली का प्रारम्भ बरसाने से ही होता है और अष्टमी के दिन पांडे जी आतें है, नन्दगाँव से बरसाने सुचना देने के लिए कि कल श्यामसुन्दर आ रहें हैं!
तो पांडे जी भानु-भवन में आतें हैं और उनका होरी की परम्परा के अनुसार स्वागत होता है! होरी की परम्परा का स्वागत अलग ढंग का होता है! समाज में ये पद के रूप में गया जाता है!
नन्दगाँव को पांडे ब्रज-बरसाने आयो!
धर होरी के बीच सजन सम्ध्याने आयो!!
सम्ध्याने, यानी नन्दबाबा और वृषभानु जी समधी भये! कीर्ति और यशोदा जी समधन भयीं! ये परम्परा आज तक चली आ रही है! ब्रज की परम्परा साक़िया-भाव की है! प्रकिया-भाव की नहीं है!
दुल्हन राधिकारानी और कृष्ण दूल्हा! ये सबसे बड़ा प्रमाण है कि ब्रज में साक़िया ही चल रही है! नन्दगाँव-बरसाना इसके प्रमाण हैं!
पांडे जी आतें हैं होरी के बीच में! होरी के अठवारी यानी आठ दिन बीत गए और बाकी सात-आठ दिन फाल्गुन के है! ये दिन बीच में आया, अष्टमी के दिन!
पांडे जी के पायन को हसी शीश नवायो!
अति उदार वृषभान राय सम्मान करायो!!
पहले चरण धोकर उनको भोजन कराया!
पाय धुवाय अनहवाय प्रथम भोजन करवायो!
भानु भवन भयो भीर फाल्ग को खेल मचायो!!
अब होरी का सम्मान!
सम्ध्याने की गारी सुनत श्रवण सुख पायो!
धाइ आई और सखी जिन सौन्धौ नायो!!
होरी में गाली स्तुति मानी जाती है! पांडे जी को बुरी-बुरी गाली सब देने लगी! उसके बाद ब्रज, बरसाने की गोपी दौड़ी, पांडे जी का सम्मान करने के लिए!
शीशी सिर ते होरी फुलेल अंग छलकायो!
हनुमान की प्रतिमा मानो तेल चडायो!!
इत्र के घड़े पांडे जी पे छोड़े गए! फुलेल लाया गया! तेल और फुलेल में फर्क होता है! उसी तेल को जब फूलों से सुगन्धित किया जाता है तो फुलेल बन जाता है! जैसे हनुमान जी को चमेली का फुलेल और सिन्दूर चडाया जाता है! तो पांडे जी को फुलेल लगाया गया और फुलेल भी लाल-लाल लाया गया! पांडे जी को हनुमान बनाया जा रहा है! ये ब्रज से होली चली है सारे संसार में और अष्टमी से ही चली है आतें है लाखों लोग हैं पर लीला का ज्ञान सब लोगों को नहीं होता है!
काजल सो मुख मड्यो बदन बिन्दु लगायो!
कारे कर सही चुवत मानो चपरा चपगायो!!
उसके बाद पांडे जी को काजल लेकर सारे मुह पर लेप किया गया! ये श्रृंगार हो रहा है पांडे जी का! सभी गोपियों ने पकड़ रखा है! सारे मुख पे काजल और बीच में अनेक बिन्दियाँ, जो की अलग-अलग चमके! और ऐसा काजल लेप लगाया गया कि मुह के सभी ओर से चु रहा है!
गजगामिनी गौछन में तकि तुपमा लपटायो!
देह धरे मानो फाल्गुन ब्रज में खेलन आयो!!
फिर पुष्ट गोपियाँ आई ताकि पांडे जी बिदक ना जाय! गजगामिनी मोटी-मोटी गोपियों ने आकर पांडे जी की मूछों में तूपमा लगाया! काले मुह पे ये तुपमा चमकेगा सफ़ेद-सफ़ेद! श्रृंगार जचेगा! अब ऐसा लगता है कि फाल्गुन का महिना अवतार लेकर पांडे जी के रूप में आ गया है! ऐसा श्रृंगार किया है, अवतारी पुरुष आ गए हैं!
हो-हो होरी कई हँसी नैनन सैन हँसायो!
झुमत चित्र विचित्र सबनि सुन्दर सुर गायो!!
और ऐसा सुन्दर श्रृंगार करके सब हँस रहीं हैं, हँसा रही हैं! आ-हां, पांडे जी कि क्या मूछें हैं; चमक रहीं हैं देखो; अरे ये तो चंडी की किरणों की तरह निकल रही हैं! पण्डे जी जवान हो गए! फिर सब गीत गाने लग गई फाल्गुन के!
माथे ते मोहिनी मठा को माट ढुलायो!
मानो काचे दूध श्याम गिरिवर ही नवायो!!
फिर पांडे जी का अभिषेक हो रहा है! स्नान! स्नान पानी से नहीं हो रहा है! कई दिन की छाछ-मट्ठा, जो माट में रखा था खट्टा, वो माट भर-भर के लाकर के अभिषेक स्नान हो रहा है पांडे जी का! मानो गिरिराज जी की शिला पे श्याम सुन्दर दूध चड़ा रहें हो! क्योंकि शिला जैसा मुह बना दिया काला और ऊपर से मट्ठा श्वेत! मालूम पड़ रहा है-गिरिराज जी पर दूध चढ़ रहा हो!
काहू चन्दन-वन्दन अरु चौवा चरचायो!
ऋतु बसन्त जान केशु को द्रुम फूलन छायो!!
स्नान के बाद श्रृंगार होता है! पांडे जी का श्रृंगार चन्दन, चौव; अनेक रंगों के लाकर के; कोई नीला, कोई पीला, सारे शरीर में श्रृंगार कर रहीं हैं! ऐसा श्रृंगार किया पांडे जी का, मानो बसन्त-ऋतु में टेसू के फूल सारे शरीर में खिल गएँ हैं!
गुगुलाय कहीं गुलचन सो एकनि गुलचायो!
होरी को हुरयारो काहो पुन्यन को पायो!!
अब पांडे जी के साथ विशेष सम्मान - गुलगुली छुडाना! तो सब गोपियाँ गुलगुली छुडा रहीं हैं पांडे जी को! कहीं कमर में, कही पेट में, कही गले में! और गुलगुली में जब हिलते हैं तो गुलचा लगा देतीं हैं! बोली - चुप बैठे रहो पांडे जी, ये होरी है! अरे ये बड़े पुन्य से ब्रज कि होरी मिलती है! ये गुलचा बड़े भाग से खा रहे हो, पांडे जी!
रंग रह्यो चुहटीयन अंग रातो व् आयो!
गुञ्जन जन को गहनों मानो पुरोहित को पहनायो!!
फिर हाथों से चुटिन करके नोच रही हैं; बड़ा माल खाया पांडे जी ने! सारा शरीर लाल कर दिया धीरे-धीरे! चुप बैठे रहो, नहीं तो गुलचा पड़ेगा! मानो सारे शरीर में गुञ्जा-माला पहनाया है लाल-लाल!
काहू गुलरी माला काहू छलंगा गरनायो!
गज घंटा हिन् बीच मनहु गज गाह बनायो!!
फिर किसी ने गुलरी की माला पांडे जी को पहनाई! गोबर के गोल-गोल छोटे-छोटे थाप के बनाई जाती है गुलरी! उसके बाद बड़ा लंबा छलंगा पहनाया गया और जैसे हाथी के गले में घंटी लटकाते है, पांडे जी के गले में भी घंटियाँ लटकाई गई और गजग्राह का नमूना बना दिया गया!
भोरी-भोरी घनसार नीर पांडे परनायो!
मानो सावन मास झमक झरना झरनायो!!
अब घनसार! घनसार कहते है - कपूर! शीतल पानी में खूब कपूर डाला, जिससे पानी ठंडा हो गया! अब पांडे जी को स्नान कराया जा रहा है! मानो सावन में झरना बह रहा हो! ऐसा स्नान कराया, झर-झर, झर-झर! सैंकड़ों घड़ें!
मलयागिरी मथि मेद मृग मत बरसायो!
झोरी-बोरी भाई फोर लागते जल दर आयो!!
मलयागिरी चन्दन, धडाधड ठंडा कपूर मिला हुआ इतना पानी छोड़ा जैसे दरिया और नदी!
मानो साज कठ्तार सुधर संगीत सुनायो!
लगत दन्त सो दन्त डिगडिगा अंग लगायो!!
ऐसी ठण्ड लगी पांडे जी को, किट-किट, किट-किट दांत बजने लगे! जैसे कठ्तार बज रहा है! कठ्तार होता है लकड़ी का! जलतरंग होता है वैसे कठतरंग होता है, किट-किट, किट-किट बजता है! अब क्या करें पांडे जी! गोपियों ने तो पकड़ रखा है! किट-किट, किट-किट; पांडे जी के दांत बज रहें हैं! और डिग-डिगा माने शरीर काँप रहा है- जाड़े के मारे! अब करें भी तो क्या - होरी है!
गयो जनेऊ टूट छूट पायन लपटायो!
मनहु चक्र चाँदनी राहु पग फंदा लायो!!
काले रंग से पोत रखा है मुख, मानो राहु बना रखा है! और खेंचा-तानी में मोटा सा जनेउ टूट गया! जैसे राहु के चक्र ने फंदा दाल तो जनेउ नीचे आ गया! ये उपमा है!
लियो लुगाइन घेर नरे नाना के आयो!
तब श्री राधा-राधा कही अपनों बोल सुनायो!!
अब परेशान हो गए पांडे जी, भाग सकते नहीं हैं! गोपियों ने पकड़ रखा है चारों तरफ से! घबडा गए और बोले - अरी राधा, अरी राधा! ओ राधा! बचा! पांडे जी जानते हैं - इस गोपियों कि मुसीबत से राधारानी ही बचा सकती है! नहीं तो ये गोपियाँ किसी की मानने वाली नहीं हैं, चाहे कोई इनका घर का मन करें या बाहर का! अब तो केवल राधा ही बचा सकती है!
चंचल चन्द्र्मुखिन चहुतां ते जूं दबायो!
कोमल बानी सुनत गरो राधा भर आयो!!
बड़े जोर से राधा जी को बुला रहें हैं! अरी राधा, ओ राधा! ये चन्द्रमुखी बरसाने की! इन्होने हमको घेर लियो है; ये कहाँ ते आ गई; ये तो बड़ी चंचल है! कोई मुछ्यन में तुपमा लगा रहीं हैं, कोई गुलगुली छुडा रहीं है तो कोई चुंटी काट रहीं है! राधारानी ने सुना! करुना के मारे राधारानी का गला भर आया! राधारानी कहना चाहती थी - मै आ रहीं हूँ, पांडे जी मत घबराइयो, अरे पांडे जी मै आई! लेकिन राधा रानी में इतनी करुणा आई कि गला भर आया और बोल नहीं पाई! राधा रानी इतनी करुणामयी हैं कि बोल ही नहीं पाई! राधा रानी बोलना चाह रही थी, मै आई पांडे जी; घबराओ मत! लेकिन गला राधा रानी का करुणा से भर गया! नहीं बोल पाई! क्या सुन्दर राधारानी का स्वभाव है - गला करुणा से भर गया! बोल नहीं पाई! ऐसी करुणा! इसीलिए उनको करुणामयी कहा जाता है!
बाबा जूं को दगल लली जूं ली पहनायो!
कीर्त पायन ले-लाग ताको पायन पायो!!
राधारानी दौड़ी! दौड़ के अपने बाबा का दगला लेकर आई कि पांडे जी को जाड़ा लग रहा है! दगला माने मोटा कोट, रुई से भरा, हीरे-मोती जडित! बोली - अरी मैया, कीर्ति दौड़! पांडे जी होरी में फस गए है! ये बरसाने की होरी है! या में पांडे जी फस गए है! पांडे जी को निकाल मैया! तो सबसे पहले राधारानी दौड़ी, दगला लेकर चीरती हुई भीड़ को ! राधारानी को तो सभी जगह देंगे! हटो-हटो राधारानी आ गई! और दौड़ के दगला दियो पांडे जी को पहना दियो! राधा रानी दगला पहना कर लिपट गई! दगले से पांडे जी गर्म हो गए! जाड़े के मारे किट-किट, किट-किट हो रही थी! दगला पहनते ही बन्द हो गई! पांडे जी राधारानी को देखने लगे और बोले - अरी बेटी राधा, तेरी जय हो! अरी बेटी राधा, तेने बचा लियो! नहीं तो ये चन्द्रमुखी गोपियाँ हमें मार ही डालती! तब कीर्ति मैया गर्म-गर्म दूध ले आई और बोली - लो पांडे जी गर्म दूध पीयो, अभी तुम्हारो जाड़ो छूट जाएगो! उसके बाद मन वांछित ऋद्धि-सिद्धि भेंट दिया पांडे जी को! तुम आये हो नंदगाँव से होरी की सुचना लेकर ! ऋद्धि-सिद्धि पाकर पांडे जी प्रसन्न हो गए! पांडे जी बोले - होरी में दुर्गत तो बहुत भयी, लेकिन माल भी बहुत पायो! ये ब्रज लीला में ऋद्धि-सिद्धि आगें पीछे घुमा करें! ये पांडे लीला वृषभानु भवन में अष्टमी के दिन हुई थी और आज भी यही लीला का नाट्य इसी भाव से होता है!
राधे राधे

17/09/2021

कामना :--
हे राधे, ऐसे जो आपके चरणकमल है, जो गोविन्द के लीला-काल का धन है; उन चरणों को हम अपने मस्तक पर धारण कर रहे है अथवा आश्रय ले रहें है!
प्रेम कई प्रकार का होता है!
सत प्रेम है तो असत प्रेम भी होता होगा! सत माने सच्चा और असत माने झूठा! झूठा
प्रेम कहाँ है? - संसार में, जिसको काम कहतें है! कोई भी वास्तु गन्दी होती है, कामना के मिश्रण से! चाहे वो भक्ति है!
कामना जहां भी आती है, वो कितना भी पवित्र हो उसे गंदा कर देती है! कितना भी उंचा यज्ञ हो रहा है, कितना उंचा शुभ कर्म है, कितना उंचा तप है; लेकिन कामना आते ही वो गन्दा हो जाता है!
जैसे बहुत बड़ा यज्ञ हो रहा है, करोडो रूपये लग जातें है! १०८ वेदियाँ, १००८ वेदियाँ, १०००८ वेदियाँ, यहाँ तक की लाख-लाख तक प्रयत्न किया लोगों ने, अपार द्रव्य, सहस्त्रों पंडित, परन्तु वो सब राजस्व हो जाता है कामना के योग से!
हल्ला दुनिया में होता है, प्रसिद्धि के लिए किया जाता है! जनता समझती है बहुत बड़ा यज्ञ था किन्तु सब राजस्व था!
भगवान् ने येही बात सत्रवें अध्याय में बारहवें श्लोक में कही - फल की इच्छा आ गई, राजस्व हो गया! फल माने ये सेब, पपीता, आम नहीं! इसके बदले में जो हम सांसारिक चीज चाहते है; धन, प्रतिष्ठा; ये सब फल है! वो फल पेड़ वाला फल नहीं! फल जो आपके, हमारे भीतर मन जिसकी इच्छा कर रहा है!
और दिखावा, पहले से शुरू हो जाता है और ऐसे प्रचार का लक्ष्य अपनी कीर्ति होता है!
और निष्काम भाव से प्रचार हो यज्ञ का वो अलग है, उसको शास्त्र आज्ञा देता है! आपको भागवत करना है, खूब निमंत्रण भेजिए ताकि लोग इकट्ठे हो, वो प्रचार नहीं!
जिस प्रचार में अपने यश का भाव है, वो प्रचार सारा का सारा राजस्व कर देगा! दिखावा है की हम इतने बड़े उद्धारक हैं, इतना बड़ा कार्य कर रहे हा, वो सब राजस्व हो गया! करोड़ों अरबों रूपये लग गए लेकिन सब राजस्व हो गया!
तो साधारण जनता इस बात को नहीं समझ सकती है! लेकिन जो तत्वज्ञ लोग हैं, वो एक क्षण में समझ जातें है! इसी तरह से कोई भी शुभ कर्म है, आप दस करोड़ रूपये दान दे रहें है या जितने भी शुभ कर्म है (इष्टापूर्ति) धर्मशाला बनाना, मंदिर बनवाना, यज्ञ करवाना, कुआँ, बावड़ी, सरोवर आपूर्त कामना से करते ही राजस्व हो गया!
अठारंवे अध्याय में इक्कीसवें श्लोक में ये बात भगवान् ने कही है - बहुत प्रयत्न है, बहुत पैसा लग रहा है; लेकिन कामना ने जाकर उसको राजस्व कर दिया, क्योंकि उसमे अहंकार भी था!
किसी भी प्रकार का अहंकार; हम विद्वान है, हम यें है, हम वो है! कितना भी शुभ कर्म था सब राजस्व हो गया! कामना ने उसको राजस्व बना दिया!
इसी तरह से कितना उंचा विद्वान है और बहुत बड़ा नामी व्यक्ति है; वो यदि राग से काम कर रहा है तो राजस्व-कर्ता हो गया! राग आ गया, फल की इच्छा आ गई, लोभ आ गया, हिंसा आदि से अपवित्रता आ गई और हर्ष-शोक से युक्त हो गया तो राजस्व हो गया!

इसीलिए जिस भक्ति में कामना आ गई वो भक्ति राजस्व हो गई!
उसी तरह से जिस प्रेम में कामना आ गई वो प्रेम भी राजस्व हो जाएगा!
संसार में तो काम है, काम से ऊपर जाओ!
कामना की गन्दगी शुद्ध, परम चिन्मय वस्तुओं को भी गन्दा कर देती है, प्रभावित कर देती है! इसलिए वो प्रेम सत नहीं रहता है, असत हो जाता है!
ब्रज गोपियों का प्रेम इसीलिए सत था क्योंकि उसमे किसी प्रकार की कामना नहीं थी! जैसे इर्ष्या का भाव हुआ, सत्यभामा जी ने पारिजात पुष्प पर मान कर लिया; "तुमने रुक्मणि जी को पारिजात का पुष्प क्यों दे दिया!"
एक छोटे से फूल पर!
जबकि स्वयं श्री कृष्ण उनके साथ रहते भी थे ब्रज छोड़ कर! सारा ऐश्र्वर्य भी वहाँ प्रकट किया, द्वारका की रानियों के लिए!
लेकिन गोपियों के ह्रदय में ईर्ष्यामान नहीं आया! ए
क ईर्ष्यामान होता है, एक प्रणय मान होता है, दोनों में बड़ा फर्क है!
सत्यभामा जी में ईर्ष्यामान था और ब्रज में ईर्ष्यामान नहीं है, प्रणय मान है! ये अंतर है!

बहुत सी बातें ऐसी होती समझना कठिन हो जाता है! एक ब्रज वासी हमारे पास आये सवेरे, बोले - भगवान् का अवतार तो तपस्या के लिए, शुभाचरणों के लिए होता है, फिर राम जी ने शुभ-तपस्वी का वध क्यों कर दिया?
हमने उनसे कहा - देखो, जो तामस तत्व है, उससे सृष्टि का कल्याण नहीं होता! जाने कितने कितने राक्षसों का भगवान् ने वध किया, वो बड़े बड़े तपस्वी थें! उन्होंने लाखों, करोड़ों वर्ष तपस्या किया; लेकिन उनको मारना ही पड़ा! तो वो तप से पहले सोचना पड़ता है - शास्त्र-संवत तप है या असंवत-तप है! अपने अधिकार का तप है या अधिकार से बाहर का तप है!
भगवान् ने सत्रहंवे अध्याय में कहा है- तपस्या असुर लोग भी करते है लेकिन वो आसुरी-तप हो जाता है! चाहे वो कितना भी कष्ट सह रहे हों!
अभी कुछ दिन पहले हमसे एक महात्मा बोले - "यहाँ से हम जा रहें है!"
हमने कहा - क्यों? क्या कष्ट है, कष्ट बताइये, हम दूर करेंगे!
महात्मा बोले - ये क्षेत्र हमारी साधना के अनुकूल नहीं है!
हमने पूछा - आप क्या साधन करेंगे?
वे बोले - हम खड़े रहेंगे; खड़ेश्री री बनेंगे!
हमने कहा - तो आप चले जाओ! क्योंकि यहाँ जितने लोग है, वे सब निर्गुणा-भक्ति के प्रयास में लग रहें है; निष्काम-कीर्तन करना, निष्काम-गुणगान करना और निष्काम-भाव से सेवा करना! अब सब लोग हँसेंगे की आप खड़े हो! ऐसा तो किसी शास्त्र में नहीं लिखा है; ना भगवतजी में और ना ही गीताजी में पड़ा! उल्टा इसका विरोध किया है! भगवान् ने सत्रहंवे अध्याय में कहा है- जितने इस शरीर में पञ्चभूत-तत्व है इनको कष्ट नहीं देना चाहिए! शास्त्र से विरुद्ध नहीं करना चाहिए! इससे तो भगवान् को भी कष्ट होता है! बड़ी कृपा है, आप जल्दी चले जाओ! क्योंकि जो देखेगा वो येही कहेगा - ये अपने आप को कष्ट दे रहें है, भगवान् को कष्ट दे रहें है! वास्तव में ये क्षेत्र आपका नहीं है!
हम तो पहले रोकना चाहते थे, लेकिन जब ये सुना कि वो खड़े रहेंगे तो हमने कहा - आप चले जाओ, क्योंकि ये तामस-तप है! और भगवान् के नाम रूप, गुण लीला से इसका क्या सम्बन्ध?
काफी साल पहले हम डबारे गए थे, वहां कोई महात्मा पधारे थे और अखण्ड-कीर्तन हो रहा था! तो नियम था कि कोई बैठेगा नहीं! अब खड़े खड़े कीर्तन हो रहा था वहाँ!
अब सीधे साधे ब्रजवासी होतें हैं सब! उनसे महात्मा ने कह दिया कि बैठना नहीं, नहीं तो यज्ञ नष्ट हो जाएगा! अब हमें भी बुलाया गया था, हम पहुंचे!
तो हमें क्या मालूम कि आदेश है कि मत बैठो!
हमने देखा कि सब खड़े है, जितने भी गुजर-गुजरी ब्रजवासी बेचारें!
हम बैठे तो झट से बोले - महाराज खड़े हो जाओ!
तो हमने पूछा - अरे खड़े हो जाओ, ये कौनसा नियम है?
तो बोले - वो महाराज जी बोले है!
हमने कहा - हम तो बैठ कर कीर्तन करेंगे, तू करा तो करा, नहीं तो हम चले जायेंगे!
अब यदि ब्रजवासियों से कहेंगे तो वें सब नहीं बैठेंगे क्योंकि महात्मा जी का रंग सब पे है! इसलिए पहले हम ही नियम तोड़ें!
तो वे बोले - अच्छा, महाराज आप बैठ कर कीर्तन करलो!
क्योंकि वे हम पर भी श्रद्धा रखते थे! हमारे साथ गए थे कुछ साधू, वो भी बैठ गए! अब नियम तो उनका टूट ही गया!
बैठने के बाद हमने कहा - देखो, कीर्तन जम नहीं रहा है, जब हम चलें जाए तो आप लोग इनका नियम पालन कर लेना-खड़े वाला! अभी हमारा नियम पालन करो- बैठ जाओ क्योंकि नियम तो तुम्हारा टूट ही गया!
तो सभी लोग बैठ गए!
जब हम वहाँ से वापिस चले, तो हमने कहा - तुम सब लोग बैठे रहना, ये खड़े होने के चक्कर में मत रहना! ऐसा कहीं नहीं लिखा है! भगवान् कि खूब प्रेम से लौ लगा कर कीर्तन करो!
तो बात ये है कि जो मुख्य वस्तु है- भाव, प्रेम! उस पर दृष्टि नहीं जाती लोगों की, बाहरी चीजों में जाती है! बाहरी चीजें उसको राजस और तामस बना देती है!
दिखावा आ गया, क्लेश आ गया! इसलिए शरीर को बिना बात कष्ट दे रहें है! अब भगवान् के प्रेम से उसका क्या सम्बन्ध? अगर खड़े होने से भगवान् का प्रेम आ जाय तो हम उलटे टांट के बल टंग जायेंगे! और ऐसे लोग समझते भी नहीं है, क्योंकि उनमे कामना होती है! जल्दी जनता चेतती है! आश्रम बनने लग जाता है, पैसा-ढेला चड़ने लग जाता है! अपनी प्रसिद्धि का जनता पे रंग जमाने की हरकत-बाज़ी है! अब सीधे-सीधे कीर्तन करो, जनता कहाँ खुश होगी! और कुछ उसमे अखण्ड लगा दो तो लोग लोग खीचते है, रंग जम जाता है, चड़ोतरी आने लग जाती है; ये सब तरकीबें है!

यें सब चीजें प्रेम को असत बना देती हैं!
सत प्रेम और असत प्रेम!
असत प्रेम ये ही सब उपरोक्त चीजें हैं! कामनाओं का योगदान हुआ, दिखावा हुआ!
जो विद्वान् लोग है, वो समझ लेते हैं कि ये नया अखण्ड निकाल दिया है! इसका कोई सम्बन्ध नहीं है- भक्ति से, भाव से, प्रेम से!
सम्बन्ध तो उसका है जो वास्तु भाव उत्पन्न करें! जिस क्रिया से भाव, भक्ति, प्रेम उत्पन्न हो वोही क्रिया सबसे उंचा धर्म है!
और जिस क्रिया से भक्ति, भाव, प्रेम उत्पन्न नहीं हुआ वो सबसे ऊँचा धर्म होते हुए भी बेकार का परिश्रम है, उसका कोई फायदा नहीं! इसका पहले ही भागवत के पहले ही स्कन्ध के पहले ही अध्यायों में निर्णय कर दिया गया! कि जिस धर्म से, चाहे सुनिश्चित आपने उसका अनुष्ठान किया, शास्त्र-दृष्टि कि सभी विधियों से भी किया (जबकि अशास्त्री-तप का तो कोई महत्त्व ही नहीं है) लेकिन अंत में भगवान् की कथाओं में, लीलाओं में प्रेम नहीं हुआ तो केवल बेकार की कसरत थी, धर्म नहीं था!
वो जीरो बटे सौ रहा!
इसी सब को समझना भागवत धर्म है! इसको नहीं समझ पाते लोग! उपरी आडम्बरों में ज्यादा फस जातें हैं! और धीरे धीरे कृपा होती श्री जी कि तो समझ में आता है!
एक महात्मा थे, खूब कर्म-काण्डी थे, धीरे-धीरे कृपा किया भगवत जी ने उनका सब कुछ छूट गया!
इसीलिए सत-प्रेम से तात्पर्य है - एक ऐसा प्रेम, जिसमे कोई कामना नहीं हो, किसी प्रकार का दिखावा ना हो और किसी प्रकार का अहंकार भी ना हो!
कोई भी कर्म हो, चाहे साधन, भजन - अहंकार से भी राजस्व जो जाता है! इसलिए ये याद रखना चाहिए कि किस धर्म का भावना और प्रेम से सम्बन्ध है! नहीं तो सब व्यर्थ का श्रम और परिश्रम है! जिस कारण भगवत कथा में कोई रूचि नहीं आई!
और येही होता है, प्राय येही होता है!
इसलिए जो शुद्ध प्रेम है उस प्रेम का सार श्री राधा रानी के चरण हैं!

नामदेव जी थे! बड़े ऊँचे भक्त थे!
एक मंदिर में दर्शन करने गए! (आज भी है वहाँ मंदिर)
गरीब भक्त थे, अकिंचन थे! संत तो गरीब ही होतें है, और व्यर्थ का तप करते नहीं है!
नामदेव जी के पास एक जोड़ी चप्पल थीं! उस समय भी होते थे जूता चोर, कलजुग की ही बात है, आज से लगभग ४००-५०० वर्ष पूर्व!
तो नामदेव जी सोचने लग गए कि यदि बाहर चप्पल छोड़ेंगे तो चोरी हो जायेंगे! तो उन्होंने अपनी पन्हैया को (चप्पलों को) कपडे में लपेट के बगलों में छुपा लिया!
अब देखा जाय तो लोग कहेंगे कि इतने बड़े भक्त होकर के अपनी पनहियाँ को ऐसे क्यों ले गए, मंदिर भी भ्रष्ट हो जाता है; अनेक शंकाएं आतीं हैं!
लेकिन कोई भी क्रिया बुरी नहीं है! क्रिया के पीछे भाव देखा जाता है!
अभी आपने किसी को गोली से मार दिया अपने बैर से, तो आपको फांसी हो जायेगी! और युद्ध क्षेत्र में शत्रु को जाकर गोली मारोगे तो आपको महावीर चक्र मिल जाता है! क्रिया तो वही है!
इसलिए किसी क्रिया के पीछे भावना क्या है ये देखना चाहिए!
भक्त लोग अकिंचन होतें हैं! वो किसी से ज्यादा लेना देना नहीं चाहते! अपने जो टूटे-फूटे साधन; कपडे, चप्पलें उनसे ही गुजर-बसर कर लेतें हैं!
हम एक बार पूछड़ी कि ओर टहलने जा रहे थे तो हमने वहाँ स्नान के बाद अपना कोपीन (लंगोट) भूल से वहीँ छोड़ आये!
काफी समय बाद याद आया तो हमारे बाबा ने कहा - अरे तू इतना बड़ा प्रमादी निकला!
हमने कहा - कोई बात नहीं, कोपीन एक ओर है हमारे पास!
तो बाबा बोले - अपने प्रमाद को ढकने के लिए इस तरह कहते हो; हम जब जाने तुम कोपीन पहनना ही छोड़ दो! तो किसी से कपडा लेना ही पड़ेगा तुमको ओर किसी से लोगे तो ये परिग्रह हुआ!
हम किसी से कोई वस्तु लेते है तो भजन देना पड़ता है उसको!
मनुष्य को थोड़े में गुजर कर लेना चाहिए! जो हम सोचते है कि एक कोपीन खो गई तो क्या हुआ, दूसरी ओर है हमारे पास!
अच्छे कामों में ना लगना भी प्रमाद है!
प्रमाद भी दो प्रकार का होता है; सत में नहीं जुड़े, ये भी और असत में जुड़ गए ये भी!
तो अपने दोष को तो देखा नहीं कि हम भूल गए; उस दोष को ढकने के लिए कह दिया कि दूसरी कोपीन है हमारे पास! जीव कितना अँधा होता है, अपने दोष को नहीं समझता है!
हम ने तो कह दिया कि जरा सी गलती हो गई और जरा सी गलती ही आपको अनंत काल के लिए भटका देगी! जरा सी गलती से ही गहरे पतन में चले जाओगे!

अब अजामिल जो था, वो बहुत बड़ा भक्त था, जरा सी गलती पर ही महापापी बना! वो बड़ा ही माता-पिता की सेवा करने वाला, सती-स्त्री थी उसकी और वो भी पत्नीव्रत था और दिन-रात भजन करता था!
रास्ते से जा रहा था तो देखा कि एक शुद्र शुद्रा के साथ भोग भोग रहा था!
अब शराब में आदमी जब पागल हो जाता है तो भोग भी बड़े उद्दंड और शिङ्खल से होता है!
तो उनको देख कर ही अजामिल का पतन हो गया और शुद्रा में आसक्त हो गया!
तो गलती तो जरा सी थी! और जरा सा कह कर जो हम अपने आप को ढका करते हैं तो समझलो आज नहीं तो कल हमारा विनाश अवश्य होगा!
यानी जो विवेकी साधक होता है वो प्रमाद को पकड़ता है!
प्रमादी को काल कभी नहीं छोड़ेगा!
भागवत में भी आता है - जिसके अन्दर प्रमाद है, उसका आज नहीं तो कल पतन अवश्य होगा!
संसारी कामों कि चिंता है, ये भी प्रमाद है! उससे लोभ पैदा होगा, विषयों में लालसा पैदा हो जायेगी!
फिर भगवान् काल रूप होकर के खा जातें है, जैसे सर्प चूहे को निगल जाता है!
चूहा खेतों में बिल के अन्दर कई दरवाजें बनाता है कि यदि इधर से सर्प घुसे तो उधर से निकल जाएगा! लेकिन जिस समय वो असावधान रहतें है, उसी समय भूखा सर्प चूहे को खा जाता है!
इसी तरह जिस जीव के भीतर प्रमाद है तो माया उसको अवश्य निगल जायेगी!
तो जो प्रमादी होता है, उसका एक दिन अवश्य विनाश होता है! इसलिए भग्वद-भक्तों को प्रमादी नहीं होना चाहिए!
और प्रमाद से ही अपराध होगा, जैसे किसी का अपमान कर दिया, किसी का तिरस्कार कर दिया, किसी कि निंदा करने लग गए, किसी की निंदा सुनने लग गए! ये सब प्रमाद है!
जितना भी बिगाड़ होता है प्रमाद से होता है!
हमने भी बाबा से कहा था - जरा सी तो गलती है, हमारे पास दूसरी कोपीन है!
तो उन्होंने बड़ी डांट लगाईं! बोले - तुमने जो ये कहा-जरा सी गलती! ये अवश्य समझो, एक दिन तुम्हारा अवश्य विनाश होगा! ये जरा सी ही बात एक दिन मनुष्य को अवश्य नष्ट कर देगी!
इसीलिए कोई भी जरा सी कामना है वो प्रेम को भी गन्दा कर देगी! फिर उस प्रेम में शक्ति नहीं रह जाती!
लेकिन उसके पीछे क्रिया क्या है?

जैसे नामदेव जी अपनी चप्पलों को छुपा कर मंदिर में घुसे तो चप्पलों में उनकी आसक्ति नहीं थी!
भक्त कभी नहीं सोचता है की एक जोड़ी हो तो चार जोड़ी ओर ले लिया जाय! ये गलत है!
नामदेव जी किसी से लेना नहीं चाहते थे!
लोगों के पास कई जोड़ी चप्पल-जूते होतें है!
हमारे यहाँ धनीराम जी आतें है; वो एक मित्र के यहाँ गए! तो दरवाजे से जैसे घुसे तो एक कमरा अलग था चप्पलों का!
धनीराम जी ने अपने मित्र से पूछा - पूरा कमरा चप्पलों से भरा हुआ है, कोई चप्पलों की दूकान खोली है?
तो मित्र बोला - नहीं, ये सब तो तुम्हारी भाभी के लिए है; हरी साडी के संग हरी चप्पल, लाल साडी के संग लाल, जोगिया साडी के संग जोगिया रंग की चप्पल; वैसा ही बिंदी, घडी का पट्टा!
अब ये क्या है, यानी जीव का कितना पतन हुआ! अब इनको भक्ति क्या मिलेगी?
भक्त का तो एक कच्ची कोडी भी अपना नहीं!
भगवान् ने स्वंव एकादशं स्कन्द में कहा है - पैसा है तो मेरे लिए, उसका नाम भक्त है!
ये नहीं की पैसा हमारे बाप का, हम अपने काम में लेले, ऐश करें, भोग करें; वो भक्त नहीं वो तो भट्ट है!
भक्त तो वो जिसका तन, मन, धन केवल कृष्ण के लिए; अपने लिए तो कुछ है ही नहीं! मानलो दस रुपया किसी ने हमको दिया दक्षिणा में, पंगत में; उसको लोग समझते है की हमारा है!
अरे तुम पतित हो गए! जैसे एक लाख वाला कहता है की एक लाख हमारा है, वैसे ही तुम कहते हो कि दस रुपया हमारा है!
तुम्हारे और उसमे फर्क क्या रहा?
ये जो हमारा हमारा की बात है वो भगवान् से अलग कर देती है!
भगवान् ने कहा है - भक्त बनना है तो मेरे लिए अर्थ का त्याग करो, भोगों का त्याग करों, सुखों का त्याग करों!
नामदेवजी ने इसीलिए चप्पलों को बगल में छुपा के रखा कि हमको किसी से लेना नहीं पड़े!
अब कोई ये कहे कि चप्पल पहनते ही क्यों थे?
हो सकता है लोग आग्रह से पहना देते होंगे! पांवों में नहीं देखेंग तो लोग आग्रह से चप्पल पहनाएंगे!
फिर लेने का देना पड़ेगा, इस झगडे से बचने के लिए!
तो महापुरुषों की बातें अलग होती है, उनका मन अलग होता है और हम जैसे लोगों का मन अलग होता है!
अपने हिसाब से उनको नहीं तोलना चाहिए!

तो नामदेव जी चप्पलों को छुपाकर मंदिर में लेकर गए, तो भगवान् को देखते ही कीर्तन का भाव आगया!
और नाचने लगे दोनों हाथों को उठाकर!
तो बगल में दबी चप्पलें इधर-उधर गिर पड़ीं फट-फट!
अरे ये चप्पल लाया मंदिर में - ये चप्पल लाया मंदिर में और पुजारियों को बताया गया! और पुजारी लगें उनकी पिटाई करने!
ये मंदिर भ्रष्ट कर दिया इसने!
अब देखिये, मंदिर भ्रष्ट कर दिया नामदेव जी ने; हर आदमी येही समझ रहा है!
लेकिन मंदिर भ्रष्ट नहीं हुआ; मदिर तो पवित्र हो जाता है, भगवान् के भक्तों की चरण-पादुका से!
और भगवान् ने दिखाया!
बहुत पिटाई किया! नामदेव जी मंदिर से उठकर बाहर आगये!
अब सोचने लग गए- मै कभी मंदिर में नहीं जाऊँगा, मंदिर अशुद्ध हो जाता है!
तो मंदिर के पीछे जाकर के बैठ गए (गुस्से के कारण नहीं)!
मंदिर में भगवान् थोड़े ही है, भगवान् तो तुम्हारी भावना में है! अगर हमारे जाने से कष्ट हो रहा है पुजारी को, इसलिए!
तो मंदिर नहीं जायेंगे आज से!
हे, बदरीनाथ, मै आज से तेरे मंदिर में नहीं आऊंगा!
मंदिर के एकदम पीछे, वहाँ कोई नहीं था!
वहाँ मोरी के पास बैठ कर ठाकुर जी को उल्हाने देते हुए गाने लग गए!

* हीन है जात मेरी जानो नाय!
(पुजारियों ने पीटा था, कहा था- ये नीच जात का छेती है! इसलिए ओर पीटा! बड़ा ढोंगी है; कीर्तन करता है; भक्त बनता है, अच्छा है इसकी पोल खुली है!)
* हीन है जात मेरी जानो नाय!
(आपने हमको यहाँ क्यों जनम दिया?)
* कल के नमहि यहाँ काहे को पठाय!
* हीन है जात मेरी जानो नाय!
(बड़े बड़े सेठ साहूकार ऊँची जात वाले, देखो ये अपने को उंचा कहते है! इनके यहाँ वेश्याएं नाचती है, महफ़िलें होती है! जैसे आजकल लोग टेलीविजन देखतें है, गन्दा गन्दा नाच, भक्त कहाँ से बन जायेंगे!)
* ताल पखावज बाजे पातरि नाचे!
(ताल पखावज पे वेश्याएं नाचती है, पैसा वालों के यहाँ ओर ये मंदिर में आते है ऊँचे बोले जातें हैं! १००-२०० रुपया चड़ाया, देख पुजारी आहा, भक्त-राज आ गए!
* ताल पखावज बाजे पातरि नाचे!
* हमारी भक्ति विट्ठल काहे को ना जाचे!
(विट्ठल नाथ जी को कह रहें है - हमारी भक्ति आपको क्यों अच्छी लगेगी, सेठ साहूकारों को प्रसाद मिल रहा है! हमको तो मार बाहर निकल दिया गया! महाराज, हमारी भक्ति आपको क्यों अच्छी लगेगी! आपको तो इन्ही सेठों की लगेगी जिन्होंने १००-२०० रुपया चड़ाया, प्रसाद पाया मुख्य अतिथियों की तरह ओर घर जाकर गड़बड़ करने लग गए, स्त्रियों को नचातें है!)
* ताल पखावज बाजे पातरि नाचे!
* हमारी भक्ति विट्ठल काहे को ना जाचे!
* हीन है जात मेरी जानो नाय!
* पंडर प्रभुजी वचन सुनी हो!
(महाराज, मै मंदिर में तो आऊंगा नहीं अब, यहीं से हमारी सुन लो)
* पंडर प्रभुजी वचन सुनी हो!
* नामदेव यहाँ दर्शन दीजो!
(महाराज, अब मै दर्शन करने नहीं आऊंगा, आप को दर्शन देना है तो यहीं देदो! अब मै मंदिर में नहीं आऊंगा! अब लगता है कि नामदेव जी बड़े गुस्से में है क्योंकि मंदिर से उनका भाव हट गया! नहीं! जहां शांति है, भगवान् की आराधना है, सुख है; मंदिर तो वहाँ है! जब मंदिर में इस तरह से लड़ाई झगडा; क्या फायदा? वहीँ बैठे कीर्तन करते रहे! उतने में कबीरदास जी आगये! कबीर जी ने कहा - नामदेवजी, आप मंदिर के पीछे क्यों बैठे हो? नामदेव जी बोले - कबीरदास, बहुत पीटें है आज मंदिर में! कष्ट हो लोगों को यहीं अपनी खडताल बजाओ! कबीरदास समझ गए,"ये मुर्ख लोग है, भक्त तो कुछ भी करें, सब ठीक है! भागवतम में वर्णन है-भक्तों की पन्हैयाओं को कृष्ण अपने शीर्ष पर रखतें है! कबीरदास जी बोले- हम भी तुम्हारे साथ है! दर्शन होगा तो यहीं होगा! हम भी नहीं जायेंगे! भक्त-भक्त एक हो गए!)
कबीरदास जी बोले -
* उठो भाई नामदेव परें है जाय!
(नामदेव बोले - नहीं भाई, मंदिर में तो बड़े बड़े दुबे, तिवारी, चौबे जायेंगे! हम तो नीच जात के है!)
* यहाँ दुबे तिवारी बैठे आय!
(बोले- बामन जायेंगे या बनिया जिनके पास पैसा है! हमारा क्या काम है मंदिर में)
ब्राह्मण बनिया उत्तम लोग!
* यहाँ नहीं नामदेव तुमरो संजोग!
(ठाकुर जी के मंदिर में वो ही पूछा जाएगा जो पैसा देता है, हमको कौन पूछता है!
* यहाँ नहीं नामदेव तुमरो संजोग!
* नामदेव काम्बली लेय उठाय!
* मंदिर पाछे बैठे जाय!
(मंदिर के पीछे अकेले नाचने लग गए; यहाँ कैसे नाचो-कोई नहीं बोलने वाला है!
*पायन घुंघरू हाथन ताल!
* नामदेव गुण गांवे गोपाल!
(वहीँ अपने गोपाल को बुला रहे हैं! की दर्शन देने है तो यहीं दे!)
* नामदेव गुण गांवे गोपाल!
(इतने में मंदिर के ऊपर की ध्वजा हिली)
* मदिर ऊपर ध्वजा हर्हरे!
(धवजा हिली ओर ठाकुर जी ने सारा का सारा मंदिर घुमा दिया! ओर नामदेव जहां बैठे थे मंदिर का दरवाजा उनके सामने ला दिया! कि तेरे बिना मंदिर क्या? भक्त बिना मंदिर क्या?)
* उलट द्वार ना मातम करे!
(ठाकुर जी सामने आ गए!)
* नामदेव जी दर्शन पायें!
* बांह पकड़ हिन्ग्लें बैठाय!
(बांह पकड़ कर नामदेव जी को बैठा लिया!)
* दोनों हिल-मिल एक है भये!
(दोनों भक्त-भगवान् एक हो गए! डॉन गल-बैयाँ ले लिए!)
* दोनों हिल-मिल एक है भये!
* दास कबीर अचम्भे रहे!
ये सत प्रेम का उदाहरण था! ऐसा प्रेम हो तो मंदिर ही घूम जाएगा! भगवान् वहीँ आ जायेंगे! और मंदिर के बामन, बनिया, पुजारी सब देखते रह जायेंगे!
इसलिए ऐसा शुद्ध प्रेम ही एक मात्र श्री राधिका रानी के चरणों से मिलता है!
राधे राधे

वक्ता : श्रद्धेय विरक्त संत श्री रमेश बाबा जी महाराज!

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