17/09/2021
कामना :--
हे राधे, ऐसे जो आपके चरणकमल है, जो गोविन्द के लीला-काल का धन है; उन चरणों को हम अपने मस्तक पर धारण कर रहे है अथवा आश्रय ले रहें है!
प्रेम कई प्रकार का होता है!
सत प्रेम है तो असत प्रेम भी होता होगा! सत माने सच्चा और असत माने झूठा! झूठा
प्रेम कहाँ है? - संसार में, जिसको काम कहतें है! कोई भी वास्तु गन्दी होती है, कामना के मिश्रण से! चाहे वो भक्ति है!
कामना जहां भी आती है, वो कितना भी पवित्र हो उसे गंदा कर देती है! कितना भी उंचा यज्ञ हो रहा है, कितना उंचा शुभ कर्म है, कितना उंचा तप है; लेकिन कामना आते ही वो गन्दा हो जाता है!
जैसे बहुत बड़ा यज्ञ हो रहा है, करोडो रूपये लग जातें है! १०८ वेदियाँ, १००८ वेदियाँ, १०००८ वेदियाँ, यहाँ तक की लाख-लाख तक प्रयत्न किया लोगों ने, अपार द्रव्य, सहस्त्रों पंडित, परन्तु वो सब राजस्व हो जाता है कामना के योग से!
हल्ला दुनिया में होता है, प्रसिद्धि के लिए किया जाता है! जनता समझती है बहुत बड़ा यज्ञ था किन्तु सब राजस्व था!
भगवान् ने येही बात सत्रवें अध्याय में बारहवें श्लोक में कही - फल की इच्छा आ गई, राजस्व हो गया! फल माने ये सेब, पपीता, आम नहीं! इसके बदले में जो हम सांसारिक चीज चाहते है; धन, प्रतिष्ठा; ये सब फल है! वो फल पेड़ वाला फल नहीं! फल जो आपके, हमारे भीतर मन जिसकी इच्छा कर रहा है!
और दिखावा, पहले से शुरू हो जाता है और ऐसे प्रचार का लक्ष्य अपनी कीर्ति होता है!
और निष्काम भाव से प्रचार हो यज्ञ का वो अलग है, उसको शास्त्र आज्ञा देता है! आपको भागवत करना है, खूब निमंत्रण भेजिए ताकि लोग इकट्ठे हो, वो प्रचार नहीं!
जिस प्रचार में अपने यश का भाव है, वो प्रचार सारा का सारा राजस्व कर देगा! दिखावा है की हम इतने बड़े उद्धारक हैं, इतना बड़ा कार्य कर रहे हा, वो सब राजस्व हो गया! करोड़ों अरबों रूपये लग गए लेकिन सब राजस्व हो गया!
तो साधारण जनता इस बात को नहीं समझ सकती है! लेकिन जो तत्वज्ञ लोग हैं, वो एक क्षण में समझ जातें है! इसी तरह से कोई भी शुभ कर्म है, आप दस करोड़ रूपये दान दे रहें है या जितने भी शुभ कर्म है (इष्टापूर्ति) धर्मशाला बनाना, मंदिर बनवाना, यज्ञ करवाना, कुआँ, बावड़ी, सरोवर आपूर्त कामना से करते ही राजस्व हो गया!
अठारंवे अध्याय में इक्कीसवें श्लोक में ये बात भगवान् ने कही है - बहुत प्रयत्न है, बहुत पैसा लग रहा है; लेकिन कामना ने जाकर उसको राजस्व कर दिया, क्योंकि उसमे अहंकार भी था!
किसी भी प्रकार का अहंकार; हम विद्वान है, हम यें है, हम वो है! कितना भी शुभ कर्म था सब राजस्व हो गया! कामना ने उसको राजस्व बना दिया!
इसी तरह से कितना उंचा विद्वान है और बहुत बड़ा नामी व्यक्ति है; वो यदि राग से काम कर रहा है तो राजस्व-कर्ता हो गया! राग आ गया, फल की इच्छा आ गई, लोभ आ गया, हिंसा आदि से अपवित्रता आ गई और हर्ष-शोक से युक्त हो गया तो राजस्व हो गया!
इसीलिए जिस भक्ति में कामना आ गई वो भक्ति राजस्व हो गई!
उसी तरह से जिस प्रेम में कामना आ गई वो प्रेम भी राजस्व हो जाएगा!
संसार में तो काम है, काम से ऊपर जाओ!
कामना की गन्दगी शुद्ध, परम चिन्मय वस्तुओं को भी गन्दा कर देती है, प्रभावित कर देती है! इसलिए वो प्रेम सत नहीं रहता है, असत हो जाता है!
ब्रज गोपियों का प्रेम इसीलिए सत था क्योंकि उसमे किसी प्रकार की कामना नहीं थी! जैसे इर्ष्या का भाव हुआ, सत्यभामा जी ने पारिजात पुष्प पर मान कर लिया; "तुमने रुक्मणि जी को पारिजात का पुष्प क्यों दे दिया!"
एक छोटे से फूल पर!
जबकि स्वयं श्री कृष्ण उनके साथ रहते भी थे ब्रज छोड़ कर! सारा ऐश्र्वर्य भी वहाँ प्रकट किया, द्वारका की रानियों के लिए!
लेकिन गोपियों के ह्रदय में ईर्ष्यामान नहीं आया! ए
क ईर्ष्यामान होता है, एक प्रणय मान होता है, दोनों में बड़ा फर्क है!
सत्यभामा जी में ईर्ष्यामान था और ब्रज में ईर्ष्यामान नहीं है, प्रणय मान है! ये अंतर है!
बहुत सी बातें ऐसी होती समझना कठिन हो जाता है! एक ब्रज वासी हमारे पास आये सवेरे, बोले - भगवान् का अवतार तो तपस्या के लिए, शुभाचरणों के लिए होता है, फिर राम जी ने शुभ-तपस्वी का वध क्यों कर दिया?
हमने उनसे कहा - देखो, जो तामस तत्व है, उससे सृष्टि का कल्याण नहीं होता! जाने कितने कितने राक्षसों का भगवान् ने वध किया, वो बड़े बड़े तपस्वी थें! उन्होंने लाखों, करोड़ों वर्ष तपस्या किया; लेकिन उनको मारना ही पड़ा! तो वो तप से पहले सोचना पड़ता है - शास्त्र-संवत तप है या असंवत-तप है! अपने अधिकार का तप है या अधिकार से बाहर का तप है!
भगवान् ने सत्रहंवे अध्याय में कहा है- तपस्या असुर लोग भी करते है लेकिन वो आसुरी-तप हो जाता है! चाहे वो कितना भी कष्ट सह रहे हों!
अभी कुछ दिन पहले हमसे एक महात्मा बोले - "यहाँ से हम जा रहें है!"
हमने कहा - क्यों? क्या कष्ट है, कष्ट बताइये, हम दूर करेंगे!
महात्मा बोले - ये क्षेत्र हमारी साधना के अनुकूल नहीं है!
हमने पूछा - आप क्या साधन करेंगे?
वे बोले - हम खड़े रहेंगे; खड़ेश्री री बनेंगे!
हमने कहा - तो आप चले जाओ! क्योंकि यहाँ जितने लोग है, वे सब निर्गुणा-भक्ति के प्रयास में लग रहें है; निष्काम-कीर्तन करना, निष्काम-गुणगान करना और निष्काम-भाव से सेवा करना! अब सब लोग हँसेंगे की आप खड़े हो! ऐसा तो किसी शास्त्र में नहीं लिखा है; ना भगवतजी में और ना ही गीताजी में पड़ा! उल्टा इसका विरोध किया है! भगवान् ने सत्रहंवे अध्याय में कहा है- जितने इस शरीर में पञ्चभूत-तत्व है इनको कष्ट नहीं देना चाहिए! शास्त्र से विरुद्ध नहीं करना चाहिए! इससे तो भगवान् को भी कष्ट होता है! बड़ी कृपा है, आप जल्दी चले जाओ! क्योंकि जो देखेगा वो येही कहेगा - ये अपने आप को कष्ट दे रहें है, भगवान् को कष्ट दे रहें है! वास्तव में ये क्षेत्र आपका नहीं है!
हम तो पहले रोकना चाहते थे, लेकिन जब ये सुना कि वो खड़े रहेंगे तो हमने कहा - आप चले जाओ, क्योंकि ये तामस-तप है! और भगवान् के नाम रूप, गुण लीला से इसका क्या सम्बन्ध?
काफी साल पहले हम डबारे गए थे, वहां कोई महात्मा पधारे थे और अखण्ड-कीर्तन हो रहा था! तो नियम था कि कोई बैठेगा नहीं! अब खड़े खड़े कीर्तन हो रहा था वहाँ!
अब सीधे साधे ब्रजवासी होतें हैं सब! उनसे महात्मा ने कह दिया कि बैठना नहीं, नहीं तो यज्ञ नष्ट हो जाएगा! अब हमें भी बुलाया गया था, हम पहुंचे!
तो हमें क्या मालूम कि आदेश है कि मत बैठो!
हमने देखा कि सब खड़े है, जितने भी गुजर-गुजरी ब्रजवासी बेचारें!
हम बैठे तो झट से बोले - महाराज खड़े हो जाओ!
तो हमने पूछा - अरे खड़े हो जाओ, ये कौनसा नियम है?
तो बोले - वो महाराज जी बोले है!
हमने कहा - हम तो बैठ कर कीर्तन करेंगे, तू करा तो करा, नहीं तो हम चले जायेंगे!
अब यदि ब्रजवासियों से कहेंगे तो वें सब नहीं बैठेंगे क्योंकि महात्मा जी का रंग सब पे है! इसलिए पहले हम ही नियम तोड़ें!
तो वे बोले - अच्छा, महाराज आप बैठ कर कीर्तन करलो!
क्योंकि वे हम पर भी श्रद्धा रखते थे! हमारे साथ गए थे कुछ साधू, वो भी बैठ गए! अब नियम तो उनका टूट ही गया!
बैठने के बाद हमने कहा - देखो, कीर्तन जम नहीं रहा है, जब हम चलें जाए तो आप लोग इनका नियम पालन कर लेना-खड़े वाला! अभी हमारा नियम पालन करो- बैठ जाओ क्योंकि नियम तो तुम्हारा टूट ही गया!
तो सभी लोग बैठ गए!
जब हम वहाँ से वापिस चले, तो हमने कहा - तुम सब लोग बैठे रहना, ये खड़े होने के चक्कर में मत रहना! ऐसा कहीं नहीं लिखा है! भगवान् कि खूब प्रेम से लौ लगा कर कीर्तन करो!
तो बात ये है कि जो मुख्य वस्तु है- भाव, प्रेम! उस पर दृष्टि नहीं जाती लोगों की, बाहरी चीजों में जाती है! बाहरी चीजें उसको राजस और तामस बना देती है!
दिखावा आ गया, क्लेश आ गया! इसलिए शरीर को बिना बात कष्ट दे रहें है! अब भगवान् के प्रेम से उसका क्या सम्बन्ध? अगर खड़े होने से भगवान् का प्रेम आ जाय तो हम उलटे टांट के बल टंग जायेंगे! और ऐसे लोग समझते भी नहीं है, क्योंकि उनमे कामना होती है! जल्दी जनता चेतती है! आश्रम बनने लग जाता है, पैसा-ढेला चड़ने लग जाता है! अपनी प्रसिद्धि का जनता पे रंग जमाने की हरकत-बाज़ी है! अब सीधे-सीधे कीर्तन करो, जनता कहाँ खुश होगी! और कुछ उसमे अखण्ड लगा दो तो लोग लोग खीचते है, रंग जम जाता है, चड़ोतरी आने लग जाती है; ये सब तरकीबें है!
यें सब चीजें प्रेम को असत बना देती हैं!
सत प्रेम और असत प्रेम!
असत प्रेम ये ही सब उपरोक्त चीजें हैं! कामनाओं का योगदान हुआ, दिखावा हुआ!
जो विद्वान् लोग है, वो समझ लेते हैं कि ये नया अखण्ड निकाल दिया है! इसका कोई सम्बन्ध नहीं है- भक्ति से, भाव से, प्रेम से!
सम्बन्ध तो उसका है जो वास्तु भाव उत्पन्न करें! जिस क्रिया से भाव, भक्ति, प्रेम उत्पन्न हो वोही क्रिया सबसे उंचा धर्म है!
और जिस क्रिया से भक्ति, भाव, प्रेम उत्पन्न नहीं हुआ वो सबसे ऊँचा धर्म होते हुए भी बेकार का परिश्रम है, उसका कोई फायदा नहीं! इसका पहले ही भागवत के पहले ही स्कन्ध के पहले ही अध्यायों में निर्णय कर दिया गया! कि जिस धर्म से, चाहे सुनिश्चित आपने उसका अनुष्ठान किया, शास्त्र-दृष्टि कि सभी विधियों से भी किया (जबकि अशास्त्री-तप का तो कोई महत्त्व ही नहीं है) लेकिन अंत में भगवान् की कथाओं में, लीलाओं में प्रेम नहीं हुआ तो केवल बेकार की कसरत थी, धर्म नहीं था!
वो जीरो बटे सौ रहा!
इसी सब को समझना भागवत धर्म है! इसको नहीं समझ पाते लोग! उपरी आडम्बरों में ज्यादा फस जातें हैं! और धीरे धीरे कृपा होती श्री जी कि तो समझ में आता है!
एक महात्मा थे, खूब कर्म-काण्डी थे, धीरे-धीरे कृपा किया भगवत जी ने उनका सब कुछ छूट गया!
इसीलिए सत-प्रेम से तात्पर्य है - एक ऐसा प्रेम, जिसमे कोई कामना नहीं हो, किसी प्रकार का दिखावा ना हो और किसी प्रकार का अहंकार भी ना हो!
कोई भी कर्म हो, चाहे साधन, भजन - अहंकार से भी राजस्व जो जाता है! इसलिए ये याद रखना चाहिए कि किस धर्म का भावना और प्रेम से सम्बन्ध है! नहीं तो सब व्यर्थ का श्रम और परिश्रम है! जिस कारण भगवत कथा में कोई रूचि नहीं आई!
और येही होता है, प्राय येही होता है!
इसलिए जो शुद्ध प्रेम है उस प्रेम का सार श्री राधा रानी के चरण हैं!
नामदेव जी थे! बड़े ऊँचे भक्त थे!
एक मंदिर में दर्शन करने गए! (आज भी है वहाँ मंदिर)
गरीब भक्त थे, अकिंचन थे! संत तो गरीब ही होतें है, और व्यर्थ का तप करते नहीं है!
नामदेव जी के पास एक जोड़ी चप्पल थीं! उस समय भी होते थे जूता चोर, कलजुग की ही बात है, आज से लगभग ४००-५०० वर्ष पूर्व!
तो नामदेव जी सोचने लग गए कि यदि बाहर चप्पल छोड़ेंगे तो चोरी हो जायेंगे! तो उन्होंने अपनी पन्हैया को (चप्पलों को) कपडे में लपेट के बगलों में छुपा लिया!
अब देखा जाय तो लोग कहेंगे कि इतने बड़े भक्त होकर के अपनी पनहियाँ को ऐसे क्यों ले गए, मंदिर भी भ्रष्ट हो जाता है; अनेक शंकाएं आतीं हैं!
लेकिन कोई भी क्रिया बुरी नहीं है! क्रिया के पीछे भाव देखा जाता है!
अभी आपने किसी को गोली से मार दिया अपने बैर से, तो आपको फांसी हो जायेगी! और युद्ध क्षेत्र में शत्रु को जाकर गोली मारोगे तो आपको महावीर चक्र मिल जाता है! क्रिया तो वही है!
इसलिए किसी क्रिया के पीछे भावना क्या है ये देखना चाहिए!
भक्त लोग अकिंचन होतें हैं! वो किसी से ज्यादा लेना देना नहीं चाहते! अपने जो टूटे-फूटे साधन; कपडे, चप्पलें उनसे ही गुजर-बसर कर लेतें हैं!
हम एक बार पूछड़ी कि ओर टहलने जा रहे थे तो हमने वहाँ स्नान के बाद अपना कोपीन (लंगोट) भूल से वहीँ छोड़ आये!
काफी समय बाद याद आया तो हमारे बाबा ने कहा - अरे तू इतना बड़ा प्रमादी निकला!
हमने कहा - कोई बात नहीं, कोपीन एक ओर है हमारे पास!
तो बाबा बोले - अपने प्रमाद को ढकने के लिए इस तरह कहते हो; हम जब जाने तुम कोपीन पहनना ही छोड़ दो! तो किसी से कपडा लेना ही पड़ेगा तुमको ओर किसी से लोगे तो ये परिग्रह हुआ!
हम किसी से कोई वस्तु लेते है तो भजन देना पड़ता है उसको!
मनुष्य को थोड़े में गुजर कर लेना चाहिए! जो हम सोचते है कि एक कोपीन खो गई तो क्या हुआ, दूसरी ओर है हमारे पास!
अच्छे कामों में ना लगना भी प्रमाद है!
प्रमाद भी दो प्रकार का होता है; सत में नहीं जुड़े, ये भी और असत में जुड़ गए ये भी!
तो अपने दोष को तो देखा नहीं कि हम भूल गए; उस दोष को ढकने के लिए कह दिया कि दूसरी कोपीन है हमारे पास! जीव कितना अँधा होता है, अपने दोष को नहीं समझता है!
हम ने तो कह दिया कि जरा सी गलती हो गई और जरा सी गलती ही आपको अनंत काल के लिए भटका देगी! जरा सी गलती से ही गहरे पतन में चले जाओगे!
अब अजामिल जो था, वो बहुत बड़ा भक्त था, जरा सी गलती पर ही महापापी बना! वो बड़ा ही माता-पिता की सेवा करने वाला, सती-स्त्री थी उसकी और वो भी पत्नीव्रत था और दिन-रात भजन करता था!
रास्ते से जा रहा था तो देखा कि एक शुद्र शुद्रा के साथ भोग भोग रहा था!
अब शराब में आदमी जब पागल हो जाता है तो भोग भी बड़े उद्दंड और शिङ्खल से होता है!
तो उनको देख कर ही अजामिल का पतन हो गया और शुद्रा में आसक्त हो गया!
तो गलती तो जरा सी थी! और जरा सा कह कर जो हम अपने आप को ढका करते हैं तो समझलो आज नहीं तो कल हमारा विनाश अवश्य होगा!
यानी जो विवेकी साधक होता है वो प्रमाद को पकड़ता है!
प्रमादी को काल कभी नहीं छोड़ेगा!
भागवत में भी आता है - जिसके अन्दर प्रमाद है, उसका आज नहीं तो कल पतन अवश्य होगा!
संसारी कामों कि चिंता है, ये भी प्रमाद है! उससे लोभ पैदा होगा, विषयों में लालसा पैदा हो जायेगी!
फिर भगवान् काल रूप होकर के खा जातें है, जैसे सर्प चूहे को निगल जाता है!
चूहा खेतों में बिल के अन्दर कई दरवाजें बनाता है कि यदि इधर से सर्प घुसे तो उधर से निकल जाएगा! लेकिन जिस समय वो असावधान रहतें है, उसी समय भूखा सर्प चूहे को खा जाता है!
इसी तरह जिस जीव के भीतर प्रमाद है तो माया उसको अवश्य निगल जायेगी!
तो जो प्रमादी होता है, उसका एक दिन अवश्य विनाश होता है! इसलिए भग्वद-भक्तों को प्रमादी नहीं होना चाहिए!
और प्रमाद से ही अपराध होगा, जैसे किसी का अपमान कर दिया, किसी का तिरस्कार कर दिया, किसी कि निंदा करने लग गए, किसी की निंदा सुनने लग गए! ये सब प्रमाद है!
जितना भी बिगाड़ होता है प्रमाद से होता है!
हमने भी बाबा से कहा था - जरा सी तो गलती है, हमारे पास दूसरी कोपीन है!
तो उन्होंने बड़ी डांट लगाईं! बोले - तुमने जो ये कहा-जरा सी गलती! ये अवश्य समझो, एक दिन तुम्हारा अवश्य विनाश होगा! ये जरा सी ही बात एक दिन मनुष्य को अवश्य नष्ट कर देगी!
इसीलिए कोई भी जरा सी कामना है वो प्रेम को भी गन्दा कर देगी! फिर उस प्रेम में शक्ति नहीं रह जाती!
लेकिन उसके पीछे क्रिया क्या है?
जैसे नामदेव जी अपनी चप्पलों को छुपा कर मंदिर में घुसे तो चप्पलों में उनकी आसक्ति नहीं थी!
भक्त कभी नहीं सोचता है की एक जोड़ी हो तो चार जोड़ी ओर ले लिया जाय! ये गलत है!
नामदेव जी किसी से लेना नहीं चाहते थे!
लोगों के पास कई जोड़ी चप्पल-जूते होतें है!
हमारे यहाँ धनीराम जी आतें है; वो एक मित्र के यहाँ गए! तो दरवाजे से जैसे घुसे तो एक कमरा अलग था चप्पलों का!
धनीराम जी ने अपने मित्र से पूछा - पूरा कमरा चप्पलों से भरा हुआ है, कोई चप्पलों की दूकान खोली है?
तो मित्र बोला - नहीं, ये सब तो तुम्हारी भाभी के लिए है; हरी साडी के संग हरी चप्पल, लाल साडी के संग लाल, जोगिया साडी के संग जोगिया रंग की चप्पल; वैसा ही बिंदी, घडी का पट्टा!
अब ये क्या है, यानी जीव का कितना पतन हुआ! अब इनको भक्ति क्या मिलेगी?
भक्त का तो एक कच्ची कोडी भी अपना नहीं!
भगवान् ने स्वंव एकादशं स्कन्द में कहा है - पैसा है तो मेरे लिए, उसका नाम भक्त है!
ये नहीं की पैसा हमारे बाप का, हम अपने काम में लेले, ऐश करें, भोग करें; वो भक्त नहीं वो तो भट्ट है!
भक्त तो वो जिसका तन, मन, धन केवल कृष्ण के लिए; अपने लिए तो कुछ है ही नहीं! मानलो दस रुपया किसी ने हमको दिया दक्षिणा में, पंगत में; उसको लोग समझते है की हमारा है!
अरे तुम पतित हो गए! जैसे एक लाख वाला कहता है की एक लाख हमारा है, वैसे ही तुम कहते हो कि दस रुपया हमारा है!
तुम्हारे और उसमे फर्क क्या रहा?
ये जो हमारा हमारा की बात है वो भगवान् से अलग कर देती है!
भगवान् ने कहा है - भक्त बनना है तो मेरे लिए अर्थ का त्याग करो, भोगों का त्याग करों, सुखों का त्याग करों!
नामदेवजी ने इसीलिए चप्पलों को बगल में छुपा के रखा कि हमको किसी से लेना नहीं पड़े!
अब कोई ये कहे कि चप्पल पहनते ही क्यों थे?
हो सकता है लोग आग्रह से पहना देते होंगे! पांवों में नहीं देखेंग तो लोग आग्रह से चप्पल पहनाएंगे!
फिर लेने का देना पड़ेगा, इस झगडे से बचने के लिए!
तो महापुरुषों की बातें अलग होती है, उनका मन अलग होता है और हम जैसे लोगों का मन अलग होता है!
अपने हिसाब से उनको नहीं तोलना चाहिए!
तो नामदेव जी चप्पलों को छुपाकर मंदिर में लेकर गए, तो भगवान् को देखते ही कीर्तन का भाव आगया!
और नाचने लगे दोनों हाथों को उठाकर!
तो बगल में दबी चप्पलें इधर-उधर गिर पड़ीं फट-फट!
अरे ये चप्पल लाया मंदिर में - ये चप्पल लाया मंदिर में और पुजारियों को बताया गया! और पुजारी लगें उनकी पिटाई करने!
ये मंदिर भ्रष्ट कर दिया इसने!
अब देखिये, मंदिर भ्रष्ट कर दिया नामदेव जी ने; हर आदमी येही समझ रहा है!
लेकिन मंदिर भ्रष्ट नहीं हुआ; मदिर तो पवित्र हो जाता है, भगवान् के भक्तों की चरण-पादुका से!
और भगवान् ने दिखाया!
बहुत पिटाई किया! नामदेव जी मंदिर से उठकर बाहर आगये!
अब सोचने लग गए- मै कभी मंदिर में नहीं जाऊँगा, मंदिर अशुद्ध हो जाता है!
तो मंदिर के पीछे जाकर के बैठ गए (गुस्से के कारण नहीं)!
मंदिर में भगवान् थोड़े ही है, भगवान् तो तुम्हारी भावना में है! अगर हमारे जाने से कष्ट हो रहा है पुजारी को, इसलिए!
तो मंदिर नहीं जायेंगे आज से!
हे, बदरीनाथ, मै आज से तेरे मंदिर में नहीं आऊंगा!
मंदिर के एकदम पीछे, वहाँ कोई नहीं था!
वहाँ मोरी के पास बैठ कर ठाकुर जी को उल्हाने देते हुए गाने लग गए!
* हीन है जात मेरी जानो नाय!
(पुजारियों ने पीटा था, कहा था- ये नीच जात का छेती है! इसलिए ओर पीटा! बड़ा ढोंगी है; कीर्तन करता है; भक्त बनता है, अच्छा है इसकी पोल खुली है!)
* हीन है जात मेरी जानो नाय!
(आपने हमको यहाँ क्यों जनम दिया?)
* कल के नमहि यहाँ काहे को पठाय!
* हीन है जात मेरी जानो नाय!
(बड़े बड़े सेठ साहूकार ऊँची जात वाले, देखो ये अपने को उंचा कहते है! इनके यहाँ वेश्याएं नाचती है, महफ़िलें होती है! जैसे आजकल लोग टेलीविजन देखतें है, गन्दा गन्दा नाच, भक्त कहाँ से बन जायेंगे!)
* ताल पखावज बाजे पातरि नाचे!
(ताल पखावज पे वेश्याएं नाचती है, पैसा वालों के यहाँ ओर ये मंदिर में आते है ऊँचे बोले जातें हैं! १००-२०० रुपया चड़ाया, देख पुजारी आहा, भक्त-राज आ गए!
* ताल पखावज बाजे पातरि नाचे!
* हमारी भक्ति विट्ठल काहे को ना जाचे!
(विट्ठल नाथ जी को कह रहें है - हमारी भक्ति आपको क्यों अच्छी लगेगी, सेठ साहूकारों को प्रसाद मिल रहा है! हमको तो मार बाहर निकल दिया गया! महाराज, हमारी भक्ति आपको क्यों अच्छी लगेगी! आपको तो इन्ही सेठों की लगेगी जिन्होंने १००-२०० रुपया चड़ाया, प्रसाद पाया मुख्य अतिथियों की तरह ओर घर जाकर गड़बड़ करने लग गए, स्त्रियों को नचातें है!)
* ताल पखावज बाजे पातरि नाचे!
* हमारी भक्ति विट्ठल काहे को ना जाचे!
* हीन है जात मेरी जानो नाय!
* पंडर प्रभुजी वचन सुनी हो!
(महाराज, मै मंदिर में तो आऊंगा नहीं अब, यहीं से हमारी सुन लो)
* पंडर प्रभुजी वचन सुनी हो!
* नामदेव यहाँ दर्शन दीजो!
(महाराज, अब मै दर्शन करने नहीं आऊंगा, आप को दर्शन देना है तो यहीं देदो! अब मै मंदिर में नहीं आऊंगा! अब लगता है कि नामदेव जी बड़े गुस्से में है क्योंकि मंदिर से उनका भाव हट गया! नहीं! जहां शांति है, भगवान् की आराधना है, सुख है; मंदिर तो वहाँ है! जब मंदिर में इस तरह से लड़ाई झगडा; क्या फायदा? वहीँ बैठे कीर्तन करते रहे! उतने में कबीरदास जी आगये! कबीर जी ने कहा - नामदेवजी, आप मंदिर के पीछे क्यों बैठे हो? नामदेव जी बोले - कबीरदास, बहुत पीटें है आज मंदिर में! कष्ट हो लोगों को यहीं अपनी खडताल बजाओ! कबीरदास समझ गए,"ये मुर्ख लोग है, भक्त तो कुछ भी करें, सब ठीक है! भागवतम में वर्णन है-भक्तों की पन्हैयाओं को कृष्ण अपने शीर्ष पर रखतें है! कबीरदास जी बोले- हम भी तुम्हारे साथ है! दर्शन होगा तो यहीं होगा! हम भी नहीं जायेंगे! भक्त-भक्त एक हो गए!)
कबीरदास जी बोले -
* उठो भाई नामदेव परें है जाय!
(नामदेव बोले - नहीं भाई, मंदिर में तो बड़े बड़े दुबे, तिवारी, चौबे जायेंगे! हम तो नीच जात के है!)
* यहाँ दुबे तिवारी बैठे आय!
(बोले- बामन जायेंगे या बनिया जिनके पास पैसा है! हमारा क्या काम है मंदिर में)
ब्राह्मण बनिया उत्तम लोग!
* यहाँ नहीं नामदेव तुमरो संजोग!
(ठाकुर जी के मंदिर में वो ही पूछा जाएगा जो पैसा देता है, हमको कौन पूछता है!
* यहाँ नहीं नामदेव तुमरो संजोग!
* नामदेव काम्बली लेय उठाय!
* मंदिर पाछे बैठे जाय!
(मंदिर के पीछे अकेले नाचने लग गए; यहाँ कैसे नाचो-कोई नहीं बोलने वाला है!
*पायन घुंघरू हाथन ताल!
* नामदेव गुण गांवे गोपाल!
(वहीँ अपने गोपाल को बुला रहे हैं! की दर्शन देने है तो यहीं दे!)
* नामदेव गुण गांवे गोपाल!
(इतने में मंदिर के ऊपर की ध्वजा हिली)
* मदिर ऊपर ध्वजा हर्हरे!
(धवजा हिली ओर ठाकुर जी ने सारा का सारा मंदिर घुमा दिया! ओर नामदेव जहां बैठे थे मंदिर का दरवाजा उनके सामने ला दिया! कि तेरे बिना मंदिर क्या? भक्त बिना मंदिर क्या?)
* उलट द्वार ना मातम करे!
(ठाकुर जी सामने आ गए!)
* नामदेव जी दर्शन पायें!
* बांह पकड़ हिन्ग्लें बैठाय!
(बांह पकड़ कर नामदेव जी को बैठा लिया!)
* दोनों हिल-मिल एक है भये!
(दोनों भक्त-भगवान् एक हो गए! डॉन गल-बैयाँ ले लिए!)
* दोनों हिल-मिल एक है भये!
* दास कबीर अचम्भे रहे!
ये सत प्रेम का उदाहरण था! ऐसा प्रेम हो तो मंदिर ही घूम जाएगा! भगवान् वहीँ आ जायेंगे! और मंदिर के बामन, बनिया, पुजारी सब देखते रह जायेंगे!
इसलिए ऐसा शुद्ध प्रेम ही एक मात्र श्री राधिका रानी के चरणों से मिलता है!
राधे राधे
वक्ता : श्रद्धेय विरक्त संत श्री रमेश बाबा जी महाराज!