Madhuvan-Maholi

Madhuvan-Maholi MADHUVAN teerth sthal-vraj bhumi

02/02/2023
जय हो भगवान शत्रुघ्न देव की जय भगवती श्रुतिकीर्ति माता की जय ।
10/09/2021

जय हो भगवान शत्रुघ्न देव की जय भगवती श्रुतिकीर्ति माता की जय ।

MADHUVAN teerth sthal-vraj bhumi

10/09/2021

एक और ग़ज़ल डॉकुँअर बेचैनकीश्रद्धांजलिके तौरपसंद आनी चाहिए सम्भवतः!

पांवजमतेही नहीं शीशे के जीनों में कुँअर।
खुरदरा पन भी जरूरी है जमीनों में कुँअर।
पास के भी हादसेजिनको नजर आते नहीं

।होन हो,

कुछ तो कमी है दूर
बीनों में कुँअर।

साँप तो डरकर कभी के बांबियों में जा छिपे।

आदमी ही रह रहे हैं आस्तीनों में कुँअर।

जिंदगी तेरे बिना, तेरे बिना तेरे बिना ।कितना सूखा है यहाँ, बारिस के महीनों में कुँअर।

03/11/2020

बोलिए भगवान शत्रुघ्न देव महाराज की जय हो

02/09/2019

मानस के अनुसार सज्जन और दुष्ट लोग चंदन और कुल्हाड़ी की तरह होते हैं ।कुल्हाड़ी का स्वभाव काटना होता है ,वह चन्दन को काट देती है। किंतु चन्दन कुल्हाड़ी से कटने पर भी अपने स्वभाव के कारण उसे सुवासित कर देता है ।इस गुण के कारण चन्दन देवों के माथे पर विराजमान होता है। और कुल्हाड़ी को उसके स्वभाव की बजह से, मुँह आग में तपा कर उसे घन से पीटा जाता है ।
सज्जन शीलवान होते हैं ,उन्हें पराया दुख देख कर ,दुख होता है और सुख देखकर सुख होता है ।उनके मन मे किसी के प्रति वैर भाव नहीं होता ।दीनों पर दया करने वाले ,मन वचन कर्म से निष्कपट ,सबको सम्मान देने वाले ,और स्वयं मान रहित होते हैं ।कामना रहित ,सरल सहज , भगवान के चरणों में प्रीति ।दुःख-सुख में समान भाव से स्थिर और किसी से भी कठोर वचन न बोलने वाले पुरूष सज्जन होते हैं ।

दुष्टों के हृदय में बहुत सन्ताप रहता है। दूसरे को सुखी देखकर सदा जलते रहते हैं ।निर्दयी ,कपटी ,कुटिल ,पापों की खान ,बिना कारण किसी से वैर रखना ,जो भलाई करे उसका बुरा करना दुष्टों का स्वभाव होता है ।जब किसी को विपत्ति में देखते हैं तो ऐसे सुखी होते हैं जैसे खजाना पा गए हों ।
माता पिता ,गुरु ब्राह्मण किसी को नहीं मानते ,दूसरों को दुख पहुंचाने के लिए खुद कष्ट उठाते हैं ।दुसरो को नष्ट करने के प्रयत्न में खुद भी नष्ट होजाते हैं।उनका हृदय दम्भ व कपट से भरा होता है ।वेदों और धर्म के निंदक ,ब्राह्मण द्रोही दुष्टों की यही पहचान है ।

परहित सरस् धरम नहीं भाई ।पर पीड़ा सम नहीं अधमाई ।।

07/02/2019

कबहुंक हौं यहि रहनि रहौंगो।

श्री रघुनाथ-कृपाल-कृपा तैं, संत सुभाव गहौंगो।

जथालाभ संतोष सदा, काहू सों कछु न चहौंगो।

परहित निरत निरंतर, मन क्रम बचन नेम निबहौंगो।

परुष बचन अति दुसह स्रवन, सुनि तेहि पावक न दहौंगो।

बिगत मान सम सीतल मन, पर-गुन, नहिं दोष कहौंगो।

परिहरि देहजनित चिंता दुख सुख समबुद्धि सहौंगो।

तुलसिदास प्रभु यहि पथ रहि अबिचल हरिभक्ति लहौंगो

24/12/2018

यीशु के जन्मदिन पर मैं मेरे प्रभु भगवान श्री शत्रुघ्न देव का सुमिरन करता हूँ ।मुझपर कृपा बनाए रखें ।

बोलिए भगवान शत्रुघ्न देव की जय हो ...!

09/02/2018

भज मन रामचरन सुखदाई॥ध्रु०॥
जिहि चरननसे निकसी सुरसरि संकर जटा समाई।
जटासंकरी नाम परयो है, त्रिभुवन तारन आई॥
जिन चरननकी चरनपादुका भरत रह्यो लव लाई।
सोइ चरन केवट धोइ लीने तब हरि नाव चलाई॥
सोइ चरन संत जन सेवत सदा रहत सुखदाई।
सोइ चरन गौतमऋषि-नारी परसि परमपद पाई॥
दंडकबन प्रभु पावन कीन्हो ऋषियन त्रास मिटाई।
सोई प्रभु त्रिलोकके स्वामी कनक मृगा सँग धाई॥
कपि सुग्रीव बंधु भय-ब्याकुल तिन जय छत्र फिराई।
रिपु को अनुज बिभीषन निसिचर परसत लंका पाई॥
सिव सनकादिक अरु ब्रह्मादिक सेष सहस मुख गाई।
तुलसीदास मारुत-सुतकी प्रभु निज मुख करत बड़ाई॥

19/10/2017

जयति जय शत्रु -केसरी शत्रुहन ,शत्रुतम तुहिनहर किरण केतु ,
देव-महिदेव-महि-धेनु- सेवक- सूजन,सिद्धि-मुनि-सकल कल्याण-हेतु ,

जयति सर्वांगसुन्दर सुमित्रा सुवन,भुवन विख्यात-भरतानुगामी ,
वर्म चर्मासि-धनु-बाण-तूणीर-धर, शत्रु-संकट-समय यतप्रणामी ,

जयति लवणाम्बुनिधि कुम्भसम्भव महा दनुज-दुर्वन दवन ,दुरतिहारी,
लक्षमणानुज ,भरत राम सीता चरण,रेणु-भूषित-भाल-तिलक धारी,

जयति श्रुतिकीर्ति वल्लभ सुदुर्लभ सुलभ, नमत नर्मद भुक्ति मुक्ति दाता ,
दास तुलसी चरण-शरण सीदति विभो ,पाहिदीनार्त संताप हाता ,

14/02/2017

मित्रो ! इस पेज को पढने वाले ,पसंद करने व टिप्पणी करने वालों का बहुत रुझान मिल रहा है , बहुत धन्यवाद सबका ।
गाँव के सभी दोस्तों से आग्रह है कि तत्सम्बन्धित जानकारी देने वाली समीचीन पोस्ट डालकर इसको और समृद्ध करें ।अथवा अन्य माध्यम से सामग्री मेरे पास भेजें ।

वर्तमान की सकारात्मक गतिविधियाँ .... हमारे गौरव को पुष्ट करने वाली ...हरे कृष्ण ..।

बोलिये मधुवन विहारी लाल की जय !

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