Jaigurudev Dharm Pracharak Trust

Jaigurudev Dharm Pracharak Trust JAI GURU DEV IS THE NAME OF GOD .The trust is founded by honorable Baba jai guru dev ji maharaj to spread the the name of god among the childs of god

07/07/2016
20/07/2012

Bura Jo Dekhan Main Chala, Bura Naa Milya Koye
Jo Munn Khoja Apnaa, To Mujhse Bura Naa Koye

Translation
I went on the search for the Bad Guy, Bad Guy I couldn't find
When I searched my mind, Non one is Nastier then Me

Meaning

This Doha is about observing ones own mind. Kabir says that he searched the world for the bad guy, the real evil person but he couldn't find the evil person no matter where he looked. Then he looked within at his own thinking process, his own mind. The he found the real evil person who lived in his mind, unchecked. When we accuse, condemn another, it is our mind that is doing the finger pointing, the other person is probably innocent or the victim of his circumstances. Were we to inhabit the condemned persons body, live his life, have his conditioning, then we too would behave and act the same.

20/07/2012

Dheere Dheere Re Mana, Dheere Sub Kutch Hoye
Mali Seenche So Ghara, Ritu Aaye Phal Hoye

Translation
Slowly slowly stay my mind, Slowly everything happens
Gardner may water garden a hundred times, When the Season comes, there is fruit

Meaning

Kabir tells his mind to slow down, everything in life happens slowly, in its own time. The fruit only comes when the season comes, so will the fruit of life come in its own time.

Kabir sahab ke anmol vachan
20/07/2012

Kabir sahab ke anmol vachan

चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह ।जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।एक दिन ऐसा आएग...
20/07/2012

चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह ।
जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥

माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय ॥

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥

तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय ।
कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय ॥

गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥

सुख मे सुमिरन ना किया, दु:ख में करते याद ।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥

साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥

कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥

दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥

बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर ॥

साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय॥

साँई इतना दीजिए जामें कुटुंब समाय ।
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भुखा जाय॥

जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥

उठा बगुला प्रेम का तिनका चढ़ा अकास।
तिनका तिनके से मिला तिन का तिन के पास॥

सात समंदर की मसि करौं लेखनि सब बनराइ।
धरती सब कागद करौं हरि गुण लिखा न जाइ॥

साधू गाँठ न बाँधई उदर समाता लेय।
आगे पाछे हरी खड़े जब माँगे तब देय॥

20/07/2012

ज्ञानी से कहिये काह, कहत कबीर लजाये
अंधे आगे नाचते, कला अकारथ जाय

Gyani Se Kahiye Kaha
Kahat Kabir Lajaye
Andhe Aage Nachate
Kala Akarat Jaaye

When Kabir is asked to teach an intellectual then he feels shy. What is the use of showing dancing skills to one who is blind.

शीतल शब्द उचारिये, अहम मानिये नाही
तेरा प्रीतम तुझ में है, दुश्मन भी तुझ माही
Sheetal Shabad Uchchariye
Aham Maniye Nahi
Tera Pritam Tujh Me Hai
Dushman Bhi Tujh Mahi

You should speak sweet honeyed words. You should not have ego. Your beloved is in your mind and your enemy is also there.

tiwari gut ka maha mantri chatar singh rajawat ka stiffa
14/07/2012

tiwari gut ka maha mantri chatar singh rajawat ka stiffa

उस परमात्मा का बोध लेकर जो शक्तियां ऊपर से आती हैं संतों, फकीरों, महापुरूषों के रूप में वे यहां जीवों को मालिक का बोध कर...
11/07/2012

उस परमात्मा का बोध लेकर जो शक्तियां ऊपर से आती हैं संतों, फकीरों, महापुरूषों के रूप में वे यहां जीवों को मालिक का बोध कराती हैं। उन संतों की आज्ञा का पालन करना ही भक्ति है। वह मालिक गुरू भक्ति से ही राजी होता है। गुरू भक्त जो हो जाता है यानी जो गुरू की आज्ञा का पालन करता है वह काल और कर्म को बाजी में हरा देता है। कहा भी है किः-

गुरू की आज्ञा में ही रहिऐ,
हानि होय तो होने दीजे।।

फिर कहा है किः-
गुरू की आज्ञा उल्लंघ कर, जो हँसा कहुं जाय।
जहं जाय तहं काल है, कहें कबीर समुझाए।।
बाबा जयगुरूदेव जी ने कहा कि हनुमान के लिए कहीं यह नहीं लिखा है कि उन्होंने तपस्या की, साधना की। उन्होंने तो राम की आज्ञा का पालन किया, उनके आदेशों पर अपने जीवन की बाजी लगा दी। इसलिए हनुमान की आज पूजा होती है। जो जीव महापूरूषों की, गुरू की बात को मान लेते हैं उन पर काल और माया का कोई दांव नहीं चल पाता। जो चूक जाते हैं उन्हें बहुत पछताना पड़ता है। ऐसे लोगों के लिए यही कहा गया है किः-

आछे दिन पाछे गऐ, किया न गुरू से हेत।
अब पछताय क्या होत है, जब चिड़िया चुग गई खेत।।

11/07/2012

अक्सर यह विचार मन में आता है कि जब दुनियां छोड़कर जाना ही है तो यह पसारा किस लिए? यह मन मृग की तरह दुनियां में भागता है और सोचता है कि रेत की आंधी उसकी प्यास बुझा देगी क्योंकि उसे लगता है वह पानी का रेला है। इसी तरह से हम दुनियां में भागते-दौड़ते हैं, सोचते हैं कि पढ़लिखकर विद्वान बन जाऐंगे तो प्रसन्नता होगी, जमीन जायदाद घर मकान बना लेंगे तो शान्ति मिलेगी, देश-विदेश घूम आऐंगे तो बड़ा सुख मिलेगा लेकिन देखने में
यह आता है कि सुख किसी को नहीं मिलता, निराश ही हर व्यक्ति मरता है। वह चाहे महलों और हवेलियों में रहने वाला हो या झुग्गी-झोंपड़ियों वाला हो। जिनके पास कुछ नहीं है उन्हें चिन्ता है कुछ पाने की, जिनके पास सबकुछ है वो भी परेशान हैं कि और मिल जाऐ और फिर उसके रख-रखाव की चिन्ता। अगर बेइमानी से कमाई की तो मन में डर पकड़े जाने की और अगर घर में संपत्ति है तो डर कि कोई लूट न ले। इसीलिए सहजोबाई ने कहा किः
धनवन्ते दुखिया सभी, निर्धन दुख का रूप।
साध सुखी सहजो कहे, पाया भक्ति अनूप।।
महापुरूषों ने कहा कि अपनी इच्छाओं को लगाम दो क्योंकि इच्छाऐं जितनी ही बढ़ेंगी, बेचैनी उतनी ही बढ़ेगी। एक महात्मा ने कहा किः
सिपाही मन दूर खेलन मत जाव।
दूर खेलन से मनुवा दुखित होय, गगन मण्डल मठ छाव।।
सबके समझाने का अपना-अपना तरीका है। सहजो बाई ने कह दिया कि साध सुखी है क्योंकि वो भक्ति में लीन है। इसी तरह से अपने मन को समझाते हुऐ महापुरूष कहते हैं कि मृग मरीचिका में मत भाग। अपने अन्दर में तू देख, वहां अपना मठ बना।
स्वामीजी महाराज कहते हैं कि थोड़ी इच्छाओं को कम करो, मन को रोको, जो तुम्हारे प्रारब्ध में हैं और मिल रहा है उसमें संतोष करो। और अपना लक्ष्य परमात्मा को बनाओ। एक बात सदा याद रखो कि जाना है सब कुछ छोड़कर।
ये याद रहेगा तो तुम फंसोगे नहीं। कर्म करते हुऐ अपनी आत्मा को जागाओगे। स्वामीजी महाराज ये भी कहते हैं कि दुनियां में दुख-सुख असुविधा कर्मानुसार ही मिलता है लेकिन ये कर्म भूमि है, कर्म तो करना ही पड़ेगा। ऋषि-मुनि महात्मा आऐ, राम और कृष्ण आऐ, कबीर आऐ गोस्वामी जी आऐ। कर्म सबने किया। इसलिए तो आज उनके इतिहास बन गऐ। तो कर्म तो करना ही पड़ेगा। इसी कर्म में कितने पुराने लेन-देन अदा होते हैं और कितने नए कर्म बन जाते हैं जिससे आगे का प्रारब्ध बनता है।
एक कहावत है कहते हैं कि मनुष्य अपनी क़िस्मत स्वयं बनाता है। बात बिलकुल सही है लेकिन उसका ये अर्थ नहीं है हम लूटमार करें और कहें कि अपनी किस्मत बना रहे हैं। हिंसा करें और कहें कि हम अपनी किस्मत बना रहे हैं, चोरी-डकैती करें और कहें कि हम अपनी किस्मत बना रहे हैं। ये बात सच है कि आप अपनी किस्मत लिख रहे हैं लेकिन अभी जो मनुष्य शरीर पाने का अनमोल मौका मिला है उसे भ्रम और भूल में गवां रहे हैं तो आगे तो एक एक कर्म का हिसाब-किताब वह चुकाऐगा। लेकिन वर्तमान आपका बीत रहा है एक-एक करके अनमोल स्वांसें निकलती चली जा रही हैं। जिस दिन स्वांसें खत्म हुई यह शरीर गिर जाऐगा, कर्मों का हिसाब ऊपर वाला करेगा।
हमारे संतों-महात्माओं ने उस विधाता के कानून को समझाया है और लिखकर छोड़ा है। गोस्वामी जी ने लिखा है किः-
कर्मप्रधान विश्व करि राखा,
जो जस करिहैं सो तस फल चाखा।

11/07/2012

सत्‍य जब भी अवतरित होता है,

तब व्‍यक्ति के प्राणों पर अवतरित होता है।

सत्‍य भीड़ के ऊपर अवतरित नहीं होता।

सत्‍य को पकड़ने के लिए व्‍यक्ति का प्राण ही बीणा बनता है।

वही से झंकृत होता है सत्‍य।

भीड़ के पास उधार बातें होती है, जो कि असत्‍य हो गई है।

भीड़ के पास किताबें है, जो कि मर चुकी है।

भीड़ के पास महात्‍माओं, तीर्थंकरों, अवतारों के नाम है।

जो सिर्फ नाम है, जिनके पीछे अब कुछ भी नहीं बचा,

सब राख हो गया है।

भीड़ के पास परंपराएं है, भीड़ के पास याददाश्‍तें है।

भीड़ के पास हजारों-लाखों साल की आदतें है।

लेकिन भीड़ के पास वह चित नहीं है।

जो मुक्‍त होकर सत्‍य को जान सकता है,

जो भी काई उस चित को उपलब्‍ध करता है, तो अकेले में,

व्‍यक्ति की तरह उस चित को उपलब्‍ध करना पड़ता है।

swami ji maharaj darshan dete samay
09/07/2012

swami ji maharaj darshan dete samay

Jai guru dev gaushala
07/07/2012

Jai guru dev gaushala

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