Braj ke Rasik

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Braj ke Rasik बृज रज जाकू मिल गई बाकी चाह न सेष

दिव्य महापुरुष संत रमेश बाबा महाराज को कोटि-कोटि नमन👏👏आज ब्रजभूमि ही नहीं, संपूर्ण भारतवर्ष और विश्वभर में श्रीराधा-कृष्...
06/10/2026

दिव्य महापुरुष संत रमेश बाबा महाराज को कोटि-कोटि नमन👏👏

आज ब्रजभूमि ही नहीं, संपूर्ण भारतवर्ष और विश्वभर में श्रीराधा-कृष्ण के करोड़ों भक्तों के लिए अत्यंत दुःख और विरह का क्षण है।

मान मंदिर, बरसाना के महंत, ब्रजनिष्ठ संत, परम गौसेवी, ब्रज विभूति, ब्रजवासियों के लाड़ले और ठाकुरजी - श्रीजी के अनन्य भक्त पद्मश्री संत रमेश बाबा महाराज ने पितृपक्ष की पावन इंदिरा एकादशी के दिन मंगलवार को मध्याह्न में श्रीराधा नाम का स्मरण करते हुए ब्रज की परम पावन भूमि गहवर वन में अपनी नित्य लीला में प्रवेश किया।

जिस संत का जीवन स्वयं ब्रजभक्ति, गौसेवा, साधना, त्याग और श्रीराधा नाम के प्रति अखंड समर्पण की जीवंत गाथा रहा, उनके गोलोक गमन से ब्रजभूमि ने अपने एक ऐसे संत को खो दिया है, जिनके जीवन की प्रत्येक सांस श्रीजी की सेवा ब्रज की सेवा, गौमाता की सेवा और ब्रज की महिमा को समर्पित रही।

संगम नगरी प्रयागराज की पावन धरा पर जन्मे 88 वर्षीय संत रमेश बाबा महाराज केवल एक संत नहीं थे, वे ब्रज की आत्मा, गौसेवा के महान प्रहरी और श्रीराधा-कृष्ण भक्ति की साक्षात साधना थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन ब्रज, ब्रजवासियों, गौमाता और ठाकुरजी श्रीजी की सेवा में अर्पित कर दिया। उनके श्रीमुख से निकला श्रीराधा नाम और उनके जीवन से प्रकट हुई ब्रजभक्ति आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा बनी रहेगी।

आज गहवर वन की पवित्र धरा, जिसे बाबा ने 70 वर्ष पूर्व अपनी साधना के लिए चुना, वहीं भूमि बाबा की उस दिव्य आत्मा को अपने आंचल में समेटने जा रही है, जिसने जीवनभर इसी पावन भूमि को अपनी तपस्थली बनाया। उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार कल बुधवार को प्रात : लगभग 10 बजे उनकी तपस्थली गहवर वन में होगा।

यह किसी संत का अंत नहीं, बल्कि एक दिव्य यात्रा का अगला चरण है।

ब्रज की धूल में जिनके चरण पड़े,
श्रीजी के नाम में जिनकी सांसें बसीं,
गौमाता की सेवा में जिनका जीवन बीता,
और गहवर वन जिनकी तपस्थली बना—
ऐसे दिव्य महापुरुष को मृत्यु कैसे छू सकती है?

संत रमेश बाबा महाराज अपने शरीर से भले ही हमारे बीच न हों, लेकिन उनकी साधना, उनका श्रीराधा नाम, उनकी गौसेवा और उनका ब्रजप्रेम युगों-युगों तक जीवित रहेगा।

हम प्रार्थना करते हैं कि नन्दलाल श्रीकृष्ण, श्रीकिशोरी जी और गौमाता की कृपा उनके ऊपर सदैव बनी रहे।

हे ब्रजराज!
हे श्रीराधे!
अपने इस अनन्य सेवक को अपने चरणों में स्थान देना।

दिव्य महापुरुष संत रमेश बाबा महाराज के पावन चरणों में कोटिशः प्रणाम।

श्रीराधे राधे। 🙏
शत-शत नमन।
कोटि-कोटि प्रणाम। 🙏

आश्विन बदी इंदिरा एकादशी
6 अक्टूबर 2026,मंगलवार

श्रृंगार केवल ठाकुरजी को सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनाने का नाम नहीं, यह तो अपने लालन को सुख देने की वात्सल्यमयी भावना है। ...
23/09/2026

श्रृंगार केवल ठाकुरजी को सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनाने का नाम नहीं, यह तो अपने लालन को सुख देने की वात्सल्यमयी भावना है। मंगला के पश्चात माता यशोदा अपने बालगोपाल का श्रृंगार करती हैं और इसी सेवा-भाव को यह मधुर पद अत्यंत सुंदरता से व्यक्त करता है।
आवो गोपाल श्रृंगार बनाऊँ।
विविध सुगंधन करूं उबटनों पाछे उष्णजल सों न्हवाऊँ।।
अंग अंगोछ गुहूं तेरी बेनी फूलन रचरच भाल बनाऊँ।
सुरंग पाग जरतारी चीरा रत्नखचित सिरपेच बंधाऊँ।।
बागो लाल सुन्हेरी छापो हरि इजार चरणन विरचाऊँ।
पटुका सरस बैंगनी रंग को हंसुली हार हमेल धराऊँ।।
गजमोतिन के हार मनोहर वनमाला ले उर पहेराऊँ।
ले दर्पण देखो मेरे प्यारे निरख निरख उर नयन सिराऊँ।।
मधुमेवा पकवान मिठाई अपने कर ले तुम्हें जिमाऊँ।
विष्णुदास को यही कृपाफल बाललीला निशिदिन गाऊँ।।

मैया यशोदा अपने लालन के सामने बैठी हैं और बड़े प्रेम से उनके श्रृंगार की सेवा कर रही हैं। सामने खड़े नन्हे श्यामसुंदर के मुख पर बालसुलभ सरलता है और मैया की दृष्टि में वही वात्सल्य, जिसमें संसार का सारा सुख समाया हुआ है। मैया के हाथों में मोतियों की माला है। ऐसा लगता है मानो अभी अपने लाल के श्रीकंठ में पहराने वाली हैं। पास ही श्रृंगार की थाली सजी है। स्वर्णिम पात्र, पुष्प और विविध श्रृंगार-सामग्री इस सेवा की सुंदरता को और बढ़ा रहे हैं। श्यामसुंदर के सिर पर मोरपंख सुशोभित है, केशों में पुष्प और रत्नजड़ित आभूषण हैं। पीताभ वस्त्र और लाल-स्वर्ण आभा वाला पटुका उनके श्यामल स्वरूप को और निखार रहा है। चरणों तक सजा हुआ बालस्वरूप ऐसा लगता है जैसे अभी-अभी मैया ने अपने हाथों से लाला को सजाकर दर्पण दिखाया हो।
और इस पूरे दृश्य में सबसे सुंदर वस्तु कोई आभूषण नहीं ; सबसे सुंदर है मैया की दृष्टि। वह दृष्टि जो अपने लाला को निहारते-निहारते तृप्त ही नहीं होती। इसीलिए पद में आता है ;
ले दर्पण देखो मेरे प्यारे, निरख निरख उर नयन सिराऊँ।
मैया के लिए श्रृंगार पूर्ण तभी होता है जब अपने लालन को निहारकर उनके नयन तृप्त हो जाएँ। जिस प्रभु के स्वरूप का ध्यान योगी करते हैं, वही प्रभु यहाँ मैया के सामने नन्हे गोपाल बनकर खड़े हैं। जहाँ प्रभु को प्रसन्न करने के लिए कोई वैभव आवश्यक नहीं, वहाँ प्रेम से किया गया एक-एक श्रृंगार स्वयं सेवा बन जाता है।
उबटन से लेकर वस्त्र तक, मुकुट से लेकर हार तक, पुष्प से लेकर दर्पण तक, और अंत में अपने हाथों से मधुमेवा और पकवान आरोगाने तक हर क्रिया में एक ही भावना है , मेरे लाला को सुख पहोंचे , मेरो लाला प्रसन्न रहें, मेरे लाला को कोई कष्ट न हो। यही वात्सल्य है। यही सेवा है। यही व्रज की मधुरता है।
और विष्णुदासजी अंत में इसी को अपना कृपाफल मानते हैं कि बाललीला का गान नित्य होता रहे। हमारे लिए भी यही तो सबसे बड़ा सौभाग्य है कि श्रीठाकुरजी की इन बाल लीलाओं का स्मरण करते हुए मन बार-बार उसी व्रज में पहुँच जाए, जहाँ मैया अपने कन्हैया को सजाती हैं और प्रेम से निहारते हुए कहती हैं आवो गोपाल श्रृंगार बनाऊँ। 🙏

इस मनोहर श्रृंगार-दर्शन को निहारते हुए आपके हृदय में कौन-सा भाव जागता है? क्या आपको इस चित्र में मैया का वात्सल्य अधिक दिखाई देता है, लालन का बालस्वरूप या ठाकुरजी की श्रृंगार सेवा की मधुरता? अपने भाव और अनुभूति अवश्य साझा कीजिए।

ऐसे ही श्रीठाकुरजी के दर्शन, पुष्टिमार्गीय पद और व्रजभाव की इस भाव-यात्रा में साथ बने रहिए।

भक्तन के बस में भगवान महाभारत कौ वह पावन समय है, जब महाभागवत भीष्म पितामह शर-शय्या पै विराजमान हैं। देह त्यागन कौ समय सम...
05/09/2026

भक्तन के बस में भगवान

महाभारत कौ वह पावन समय है, जब महाभागवत भीष्म पितामह शर-शय्या पै विराजमान हैं। देह त्यागन कौ समय समीप आयौ है। पाण्डव सब उनके समीप खड़े हैं, अरु भीष्म पितामह की दृष्टि बार-बार जाकी ओर उठि रही है, वे हैं—श्रीकृष्ण, साक्षात् परमब्रह्म।

भीष्म पितामह श्रीकृष्ण की ओर निहारि कै कहैं—

यं मन्यसे मातुलेयं प्रियं मित्रं सुहृत्तमम् ।
अकरोः सचिवं दूतं सौहृदादथ सारथिम् ॥

अर्थात्—हे युधिष्ठिर! जाकूँ तैं अपनो मामा कौ बेटौ, परम प्रिय सखा अरु परम हितैषी मानत है, वे साधारण पुरुष नाहिं हैं। वे तो साक्षात् परमब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण हैं। अपने प्रेम अरु स्नेह के कारण तैं उन्हैं कबहूँ मंत्री बनायौ, कबहूँ दूत बनायौ अरु कबहूँ सारथी बनायौ।

अब हृदय सौं विचारि कै देखौ—जिनकी आज्ञा सौं अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड चलत हैं, वेई भगवान अपनै भक्तन के हित खातिर दूत बनिकै हस्तिनापुर की राजसभा में आयौ!

जिनके चरण-कमलन की सेवा पावन करै, जिनके दर्शन की अभिलाषा देवता अरु मुनिजन धरैं, वेई श्रीकृष्ण अर्जुन के रथ की बाग अपनै कर-कमलन में धरि कै सारथी बनि गए।

यह कैसी भक्तवत्सलता है!

जगत के स्वामी भक्तन के सारथी बनि गए।
सर्वशक्तिमान भक्तन के दूत बनि गए।
जिनके संकेत पै तीनों लोक चलैं, वे अपनै भक्त की रथ की बाग अपनै हाथन में धरि कै चलावैं।

कौरवन की सभा में जब पाण्डवन की ओर सौं शान्ति कौ संदेश लैकै श्रीकृष्ण पहुँचे, तौ वे चाहतैं तो अपनी एक दृष्टि सौं सभा कौ घमण्ड चूर करि देतैं। पर पाण्डवन के हित खातिर वे दूत बनिकै गए।

अर्जुन नै जब रणभूमि में अपनौ रथ श्रीकृष्ण के हाथन सौंप दियौ, तौ द्वारिकाधीश नै बिना कछु संकोच किए सारथी कौ रूप धरि लियौ।

कहाँ वे जगत के स्वामी, अरु कहाँ अपनै भक्त की सेवा!

पर यही तौ प्रेम की महिमा है।

भगवान अपनै भक्तन के प्रेम के आगे बँधि जात हैं।

वैकुण्ठ के स्वामी हैं, पर ब्रज में मैया यशोदा के हाथन सौं बँधि जात हैं।
समस्त जगत के नाथ हैं, पर अर्जुन के सारथी बनि जात हैं।
राजाधिराज हैं, पर भक्तन की लाज राखन खातिर दूत बनिकै राजसभा में जाय खड़े होत हैं।

भीष्म पितामह की आँखिन के आगे श्रीकृष्ण कौ वही मनोहर स्वरूप रहि गयौ—माथे पै मुकुट, करन में कुण्डल, हाथन में रथ की बाग, मुख पै मंद मुसकान अरु अपनै प्रिय भक्त अर्जुन के रथ कूँ हाँकत श्यामसुन्दर।

भीष्मदेव भली-भाँति जानत हैं—
ई कोई साधारण सखा नाहिं, ई तो साक्षात् परमात्मा हैं।

पर भक्त के प्रेम नै परमात्मा कूँ भी ऐसा बाँधि लियौ कि परब्रह्म अपनै भक्त कौ सारथी बनि गयौ।

यही श्रीकृष्ण की अद्भुत महिमा है—

वे भक्तन के बस में हैं।

धन-दौलत सौं नाहिं, वैभव सौं नाहिं, केवल तप सौं नाहिं—
वे तौ निर्मल प्रेम सौं रीझत हैं।

जाकै हृदय में साँचौ प्रेम बसै, ताहि हृदय में श्यामसुन्दर स्वयं बिराजैं।

इसीलै तौ ब्रज की धरा पै आजौ प्रेम सौं पुकार उठत है—

“राधे-राधे!”

अरु जहाँ राधा नाम कौ उच्चारण होत है, वहाँ श्यामसुन्दर आवैं बिनु कैसे रहि सकत हैं?

जय जय श्रीराधे!

🪷 श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 🪷“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥”धर्म की रक्षा और...
04/09/2026

🪷 श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 🪷

“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥”

धर्म की रक्षा और भक्तों के कल्याण हेतु
जब स्वयं परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण ने धरा पर अवतार लिया,
तब कारागार की अंधकारमयी रात्रि भी दिव्य प्रकाश से आलोकित हो उठी।
उस नंदनंदन की कृपा से हमारे हृदय में भक्ति, प्रेम और धर्म का दीप सदा प्रज्वलित रहे।

🙏 आप सभी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक मंगलकामनाएँ।
जय श्रीकृष्ण! राधे राधे!

एक नाम त्रैलोकहि तारै ।जो न लेहि सो जनमहिं हारै ।।भावार्थ: श्री हरि नाम अमित कल्याणकारी है, इसकी शक्ति असीम है। एक बार क...
09/08/2026

एक नाम त्रैलोकहि तारै ।
जो न लेहि सो जनमहिं हारै ।।

भावार्थ: श्री हरि नाम अमित कल्याणकारी है, इसकी शक्ति असीम है। एक बार के उच्चारण मात्र से यह अनन्त लाभ प्रदान करने वाला है। श्री हरि का केवल एक नाम त्रिलोकी के सभी जीवों को तारने में समर्थ है; फिर भी यदि कोई दुर्भाग्यवश इस नाम के उच्चारण और गान से वञ्चित है, तो निश्चय ही वह अपने जीवन को व्यर्थ खो रहा है।

— श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला (जीव दशा–१६)

#नाममहिमा #श्रीहरिनाम #भक्तिरस #श्रीराधे #हरिकृपा #भजनरस

🍃 वृन्दावन-रज की महिमा 🍃श्री वृन्दावन-शतलीला सेरचयिता : श्री रसिक संत ध्रुवदास जी महाराजशिव विधि उद्धव सबनि कैं, यह आसा ...
04/08/2026

🍃 वृन्दावन-रज की महिमा 🍃

श्री वृन्दावन-शतलीला से
रचयिता : श्री रसिक संत ध्रुवदास जी महाराज

शिव विधि उद्धव सबनि कैं, यह आसा रहे चित्।
गुल्म लता हौं सिर धरौं, वृन्दावन रज नित॥

शिव, ब्रह्मा, उद्धव आदि सबके मन में यह अभिलाषा रहती है कि हम भी वृन्दावन के गुल्म-लता बनकर वहाँ की रज को नित्य अपने सिर पर धारण करें॥"

🌿 भावार्थ : श्री रसिक संत ध्रुवदास जी बताते हैं कि भगवान शिव, ब्रह्मा और उद्धव जैसे महान भक्तों की भी यही परम अभिलाषा है कि उन्हें वृन्दावन में किसी ऊँचे पद की नहीं, बल्कि एक साधारण झाड़ी (गुल्म) या लता बनने का सौभाग्य प्राप्त हो। ताकि श्रीधाम वृन्दावन की पावन रज निरंतर उनके ऊपर गिरती रहे और वे उस दिव्य धूलि का स्पर्श पाते रहें।

यह भाव दर्शाता है कि वृन्दावन की रज स्वयं भगवान श्रीराधा-कृष्ण की चरण-रज है, जिसका स्पर्श देवताओं और महापुरुषों के लिए भी दुर्लभ एवं परम वांछनीय है।

जिस रज को अपने मस्तक पर धारण करने की कामना स्वयं महादेव, ब्रह्माजी और उद्धव जी करते हैं, उस श्रीधाम वृन्दावन के प्रति हमारे हृदय में कितना सम्मान, श्रद्धा और प्रेम होना चाहिए।
वृन्दावन केवल एक स्थान नहीं, बल्कि श्रीराधा-कृष्ण के नित्य प्रेम-विलास का दिव्य धाम है। वहाँ की प्रत्येक धूलि, प्रत्येक लता, प्रत्येक वृक्ष और प्रत्येक कण भगवान की प्रेममयी लीलाओं का साक्षी है।

॥ जय जय श्री राधे ॥
॥ श्रीवृन्दावन धाम की जय ॥

भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु कौन हैं?"अन्य कोई नहीं वरन् श्री राधा और कृष्ण के संयुक्त रूप हैं।"— चैतन्य भागवत🔸 जब राधा का...
23/07/2026

भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु कौन हैं?

"अन्य कोई नहीं वरन् श्री राधा और कृष्ण के संयुक्त रूप हैं।"
— चैतन्य भागवत

🔸 जब राधा का प्रेम और कृष्ण की माधुरी एक देह में प्रकट हो जाए, जब करुणा, भक्ति और रसानुभूति स्वयं चलकर संसार को आलोकित करें, तब वह रूप है — श्री चैतन्य महाप्रभु।

वे स्वयं श्रीकृष्ण हैं, पर राधा भाव में निमग्न होकर 'कृष्ण को पाने की तृष्णा' को अनुभव करने आए।

#चैतन्यमहाप्रभु #गौरांग #राधाकृष्णएकहीहैं #नामभक्ति #गौरप्रेम

🌸 श्री दामोदराष्टकम् — श्लोक ८ 🌸नमस्‍तेऽस्‍तु दाम्‍ने स्फुरद्-दीप्‍ति-धाम्ने ।त्वदीयोदरायाथ विष्‍वस्‍य धाम्ने ॥नमो राधिक...
19/07/2026

🌸 श्री दामोदराष्टकम् — श्लोक ८ 🌸

नमस्‍तेऽस्‍तु दाम्‍ने स्फुरद्-दीप्‍ति-धाम्ने ।
त्वदीयोदरायाथ विष्‍वस्‍य धाम्ने ॥
नमो राधिकायै त्वदीय प्रियेऽयै ।
नमोऽनन्त-लीलाय देवाय तुभ्यम् ॥

🪔 भावार्थ :
हे दामोदर! आपके उस उदर पर बंधी हुई रस्सी को नमस्कार है,
जो आपकी दिव्य तेजस्विता से आलोकित है।
आपका उदर समस्त ब्रह्माण्ड का आधार है —
उसे भी नमस्कार है।
आपकी परम प्रिया श्री राधा जी को नमस्कार,
और आपकी अनन्त लीलाओं को कोटि-कोटि प्रणाम। 🙏💛

🌿✨
|| जय श्री राधादामोदर ||
#श्रीदामोदराष्टकम #जयश्रीकृष्ण 💫🩵

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