04/08/2026
🍃 वृन्दावन-रज की महिमा 🍃
श्री वृन्दावन-शतलीला से
रचयिता : श्री रसिक संत ध्रुवदास जी महाराज
शिव विधि उद्धव सबनि कैं, यह आसा रहे चित्।
गुल्म लता हौं सिर धरौं, वृन्दावन रज नित॥
शिव, ब्रह्मा, उद्धव आदि सबके मन में यह अभिलाषा रहती है कि हम भी वृन्दावन के गुल्म-लता बनकर वहाँ की रज को नित्य अपने सिर पर धारण करें॥"
🌿 भावार्थ : श्री रसिक संत ध्रुवदास जी बताते हैं कि भगवान शिव, ब्रह्मा और उद्धव जैसे महान भक्तों की भी यही परम अभिलाषा है कि उन्हें वृन्दावन में किसी ऊँचे पद की नहीं, बल्कि एक साधारण झाड़ी (गुल्म) या लता बनने का सौभाग्य प्राप्त हो। ताकि श्रीधाम वृन्दावन की पावन रज निरंतर उनके ऊपर गिरती रहे और वे उस दिव्य धूलि का स्पर्श पाते रहें।
यह भाव दर्शाता है कि वृन्दावन की रज स्वयं भगवान श्रीराधा-कृष्ण की चरण-रज है, जिसका स्पर्श देवताओं और महापुरुषों के लिए भी दुर्लभ एवं परम वांछनीय है।
जिस रज को अपने मस्तक पर धारण करने की कामना स्वयं महादेव, ब्रह्माजी और उद्धव जी करते हैं, उस श्रीधाम वृन्दावन के प्रति हमारे हृदय में कितना सम्मान, श्रद्धा और प्रेम होना चाहिए।
वृन्दावन केवल एक स्थान नहीं, बल्कि श्रीराधा-कृष्ण के नित्य प्रेम-विलास का दिव्य धाम है। वहाँ की प्रत्येक धूलि, प्रत्येक लता, प्रत्येक वृक्ष और प्रत्येक कण भगवान की प्रेममयी लीलाओं का साक्षी है।
॥ जय जय श्री राधे ॥
॥ श्रीवृन्दावन धाम की जय ॥