Braj ke Rasik

Braj ke Rasik बृज रज जाकू मिल गई बाकी चाह न सेष

एक नाम त्रैलोकहि तारै ।जो न लेहि सो जनमहिं हारै ।।भावार्थ: श्री हरि नाम अमित कल्याणकारी है, इसकी शक्ति असीम है। एक बार क...
09/08/2026

एक नाम त्रैलोकहि तारै ।
जो न लेहि सो जनमहिं हारै ।।

भावार्थ: श्री हरि नाम अमित कल्याणकारी है, इसकी शक्ति असीम है। एक बार के उच्चारण मात्र से यह अनन्त लाभ प्रदान करने वाला है। श्री हरि का केवल एक नाम त्रिलोकी के सभी जीवों को तारने में समर्थ है; फिर भी यदि कोई दुर्भाग्यवश इस नाम के उच्चारण और गान से वञ्चित है, तो निश्चय ही वह अपने जीवन को व्यर्थ खो रहा है।

— श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला (जीव दशा–१६)

#नाममहिमा #श्रीहरिनाम #भक्तिरस #श्रीराधे #हरिकृपा #भजनरस

🍃 वृन्दावन-रज की महिमा 🍃श्री वृन्दावन-शतलीला सेरचयिता : श्री रसिक संत ध्रुवदास जी महाराजशिव विधि उद्धव सबनि कैं, यह आसा ...
04/08/2026

🍃 वृन्दावन-रज की महिमा 🍃

श्री वृन्दावन-शतलीला से
रचयिता : श्री रसिक संत ध्रुवदास जी महाराज

शिव विधि उद्धव सबनि कैं, यह आसा रहे चित्।
गुल्म लता हौं सिर धरौं, वृन्दावन रज नित॥

शिव, ब्रह्मा, उद्धव आदि सबके मन में यह अभिलाषा रहती है कि हम भी वृन्दावन के गुल्म-लता बनकर वहाँ की रज को नित्य अपने सिर पर धारण करें॥"

🌿 भावार्थ : श्री रसिक संत ध्रुवदास जी बताते हैं कि भगवान शिव, ब्रह्मा और उद्धव जैसे महान भक्तों की भी यही परम अभिलाषा है कि उन्हें वृन्दावन में किसी ऊँचे पद की नहीं, बल्कि एक साधारण झाड़ी (गुल्म) या लता बनने का सौभाग्य प्राप्त हो। ताकि श्रीधाम वृन्दावन की पावन रज निरंतर उनके ऊपर गिरती रहे और वे उस दिव्य धूलि का स्पर्श पाते रहें।

यह भाव दर्शाता है कि वृन्दावन की रज स्वयं भगवान श्रीराधा-कृष्ण की चरण-रज है, जिसका स्पर्श देवताओं और महापुरुषों के लिए भी दुर्लभ एवं परम वांछनीय है।

जिस रज को अपने मस्तक पर धारण करने की कामना स्वयं महादेव, ब्रह्माजी और उद्धव जी करते हैं, उस श्रीधाम वृन्दावन के प्रति हमारे हृदय में कितना सम्मान, श्रद्धा और प्रेम होना चाहिए।
वृन्दावन केवल एक स्थान नहीं, बल्कि श्रीराधा-कृष्ण के नित्य प्रेम-विलास का दिव्य धाम है। वहाँ की प्रत्येक धूलि, प्रत्येक लता, प्रत्येक वृक्ष और प्रत्येक कण भगवान की प्रेममयी लीलाओं का साक्षी है।

॥ जय जय श्री राधे ॥
॥ श्रीवृन्दावन धाम की जय ॥

भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु कौन हैं?"अन्य कोई नहीं वरन् श्री राधा और कृष्ण के संयुक्त रूप हैं।"— चैतन्य भागवत🔸 जब राधा का...
23/07/2026

भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु कौन हैं?

"अन्य कोई नहीं वरन् श्री राधा और कृष्ण के संयुक्त रूप हैं।"
— चैतन्य भागवत

🔸 जब राधा का प्रेम और कृष्ण की माधुरी एक देह में प्रकट हो जाए, जब करुणा, भक्ति और रसानुभूति स्वयं चलकर संसार को आलोकित करें, तब वह रूप है — श्री चैतन्य महाप्रभु।

वे स्वयं श्रीकृष्ण हैं, पर राधा भाव में निमग्न होकर 'कृष्ण को पाने की तृष्णा' को अनुभव करने आए।

#चैतन्यमहाप्रभु #गौरांग #राधाकृष्णएकहीहैं #नामभक्ति #गौरप्रेम

🌸 श्री दामोदराष्टकम् — श्लोक ८ 🌸नमस्‍तेऽस्‍तु दाम्‍ने स्फुरद्-दीप्‍ति-धाम्ने ।त्वदीयोदरायाथ विष्‍वस्‍य धाम्ने ॥नमो राधिक...
19/07/2026

🌸 श्री दामोदराष्टकम् — श्लोक ८ 🌸

नमस्‍तेऽस्‍तु दाम्‍ने स्फुरद्-दीप्‍ति-धाम्ने ।
त्वदीयोदरायाथ विष्‍वस्‍य धाम्ने ॥
नमो राधिकायै त्वदीय प्रियेऽयै ।
नमोऽनन्त-लीलाय देवाय तुभ्यम् ॥

🪔 भावार्थ :
हे दामोदर! आपके उस उदर पर बंधी हुई रस्सी को नमस्कार है,
जो आपकी दिव्य तेजस्विता से आलोकित है।
आपका उदर समस्त ब्रह्माण्ड का आधार है —
उसे भी नमस्कार है।
आपकी परम प्रिया श्री राधा जी को नमस्कार,
और आपकी अनन्त लीलाओं को कोटि-कोटि प्रणाम। 🙏💛

🌿✨
|| जय श्री राधादामोदर ||
#श्रीदामोदराष्टकम #जयश्रीकृष्ण 💫🩵

"गुरु बनने का अर्थ अपने विचारों का प्रचार करना नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण के उपदेशों को यथावत् पहुँचाना है।"आज संसार में उपदे...
13/07/2026

"गुरु बनने का अर्थ अपने विचारों का प्रचार करना नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण के उपदेशों को यथावत् पहुँचाना है।"

आज संसार में उपदेशकों की कमी नहीं, कृष्ण के प्रतिनिधियों की कमी है।

जो अपने मत का प्रचार करता है, वह लोगों को अपने पीछे चलाता है;
जो श्रीकृष्ण का संदेश सुनाता है, वह लोगों को श्रीकृष्ण के चरणों तक पहुँचाता है।

इसीलिए श्री चैतन्य महाप्रभु का आदेश है—

"यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश।
आमार आज्ञाय गुरु हञा तार' एइ देश॥"
— श्री चैतन्य चरितामृत, मध्य-लीला 7.128

गुरु होने की योग्यता विद्वत्ता, वंश, पद या लोकप्रियता नहीं है। योग्यता केवल एक है—भगवान श्रीकृष्ण के संदेश को बिना मिलावट, बिना परिवर्तन और बिना व्यक्तिगत स्वार्थ के यथावत् प्रस्तुत करना।

यही गुरु है। यही परम्परा है। यही श्री चैतन्य महाप्रभु का मिशन है।

हरे कृष्ण। 🙏

"रासलीला पर प्रश्न उठाने वालों के लिए शुकदेवजी का उत्तर"रासपञ्चाध्यायी के अंत में शुकदेवजी महाराज स्वयं सावधान करते हैं—...
05/07/2026

"रासलीला पर प्रश्न उठाने वालों के लिए शुकदेवजी का उत्तर"

रासपञ्चाध्यायी के अंत में शुकदेवजी महाराज स्वयं सावधान करते हैं—

«नैतत्समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः।
विनश्यत्याचरन्मौढ्याद्यथारुद्रोऽब्धिजं विषम्॥
(श्रीमद्भागवत १०.३३.३०)»

अर्थ: जो ईश्वर नहीं है, वह भगवान के इस आचरण का मन में भी अनुकरण न करे। जो मूर्खतावश ऐसा करता है, उसका वही परिणाम होता है, जैसा भगवान शिव के अतिरिक्त कोई कालकूट विष पी ले।

सोचिए—

क्या भगवान शिव ने विष पिया था? हाँ।

तो क्या आज कोई यह कहे कि "शिवजी ने पिया था, इसलिए मैं भी विष पी लेता हूँ"?
क्या यह बुद्धिमानी होगी?

कदापि नहीं।

ठीक उसी प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला कोई सांसारिक आचरण नहीं, बल्कि परम दिव्य लीला है। उसका श्रवण, मनन और स्मरण करना साधक का धर्म है, अनुकरण करना नहीं।

इसीलिए अगले ही श्लोक में शुकदेवजी कहते हैं—

«ईश्वराणां वचः सत्यं तथैवाचरितं क्वचित्।
तेषां यत्स्ववचोयुक्तं बुद्धिमांस्तत्समाचरेत्॥
(श्रीमद्भागवत १०.३३.३१)»

अर्थात् बुद्धिमान मनुष्य भगवान और महापुरुषों के उपदेशों का पालन करे, उनके प्रत्येक विशेष आचरण का अनुकरण नहीं।

जो श्रीकृष्ण को केवल एक सामान्य मनुष्य मानकर उनकी लीलाओं को सांसारिक दृष्टि से तौलता है, वह पहले ही भागवत के मूल सिद्धान्त—"श्रीकृष्णस्तु भगवान् स्वयम्"—को अस्वीकार कर चुका होता है।

भगवान की लीला श्रद्धा से समझी जाती है, तर्क की सीमित कसौटी से नहीं।

॥ जय श्रीराधे ॥ 🌿

"कृष्ण का चिंतन सभी योग पद्धतियों का सार है।"- #श्रील_प्रभुपाद   🙏✨
01/07/2026

"कृष्ण का चिंतन सभी योग पद्धतियों का सार है।"

- #श्रील_प्रभुपाद


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