17/12/2022
श्रीमद प्रभुचरण श्री विट्ठलनाथजी (श्री गुसांईजी)
संक्षिप्त जीवन परिचय
जगद्गुरु श्रीमद वल्लभाचार्य जी के द्वितीय पुत्र श्री विट्ठलनाथजी (श्री गुसांईजी) का प्राकट्य विक्रम संवत 1572 में पौष कृष्ण नवमी के दिन चरणाट में हुआ था. जिस दिन आपका प्राकट्य हुआ उसी दिन एक ब्राह्मण प्रभु श्री विट्ठलनाथजी का स्वरुप लेकर श्री महाप्रभुजी के पास आये, तब आपने आज्ञा की “आज प्रभु एवं पुत्र दोनों पधारे हैं इस कारण इसका नाम हम विट्ठलनाथ रखेंगे. विट्ठल का अर्थ अज्ञानियों को ज्ञानरुपी प्रकाश बताने वाला होता है अतः यह बालक पुष्टिमार्ग का पूर्ण विकास करेगा.
आप बाल्यावस्था से ही श्री बालकृष्णजी की सेवा करते थे एवं उनके साथ खेलते थे. श्री ठाकुरजी आपको साक्षात दर्शन देते थे एवं भोग में धरे ठोड़ की दोनों मित्रभाव से खींचतान करते थे यह प्रसंग मैं पहले भी बता चुका हूँ.
विक्रम संवत 1580 में आठ वर्ष की आयु में आपका उपनयन संस्कार काशी में हुआ. तत्पश्चात श्री महाप्रभु जी ने स्वयं आपको चारों वेदों एवं ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन कराया एवं अन्य शास्त्रों के अभ्यास हेतु काशी में श्री माधव-सरस्वती के आश्रम में भेजा.
सभी विद्यार्थी जब अपना पाठ तैयार करते तब आप खेलते थे परन्तु समय पर गुरु के सभी प्रश्नों के सटीक उत्तर देते थे. यह देखकर गुरु एवं अन्य मित्रों को भी आश्चर्य होता था. दस वर्ष की आयु तक आपने सभी शास्त्रों का अभ्यास पूर्ण कर लिया था.
श्रीवल्लभ ने आपके लिए दशम स्कंध के साररूप श्रीकृष्ण के नामों की ‘त्रिविध नामावली’ की रचना की थी जिसका आप नित्य पाठ करते थे. आपको मल्ल (कुश्ती), घुड़सवारी, चित्रकारी, संगीत आदि में बहुत रूचि थी.
श्री गुसांईजी ने पुष्टिमार्ग के प्रचार-प्रसार के लिए देश के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवास किया. गुजरात और सौराष्ट्र की तो आपने छह बार व्यापक यात्राएँ की. गुजरात में पुष्टिमार्ग का जो व्यापक प्रसार है, उसका बहुत कुछ श्रेय भी श्री गुसांईजी को है. श्री गुसांईजी का सम्मान बादशाह अकबर भी करता था. बादशाह ने आपको न्यायाधीश के अधिकार दिये थे और वह समय-समय पर श्री गुसांईजी की दुआ माँगने भी आता था.
मुगल राजवंश पर आपका प्रभाव तीन पीढ़ियों तक रहा. बादशाह जहाँगीर और शाहजहाँ ने भी समय-समय पर आपको अनेक सुविधाएँ प्रदान की थी.
श्री गुसांईजी प्रतिदिन कम से कम एक प्राणी को दीक्षा दिया करते थे. आपने अनेक योग्य सेवकों को पुष्टिमार्ग के प्रचार-प्रसार का दायित्व सौप रखा था.
श्री गुसांईजी के संबंध विभिन्न राजा-महाराजाओं से थे, किन्तु वे प्रभु सेवा के लिये वे राजकीय धन स्वीकार नहीं करते थे. यदि आग्रहपूर्वक कोई राजपुरूष आपको धन दे देता तो उसे गौ-सेवा में लगा देते थे. गरीबों की पवित्र भेंट को आप बहुत महत्व देते थे और उनसे प्राप्त भेंट को श्रीजी की सेवा में सहर्ष लगाते थे.
गरीबों और दीन-दुखियों तथा पतितजनों के प्रति उनमें विशेष करूणा भाव था. आप अपने सेवकों को भी यह समझाते थे कि वैष्णव धर्म मानवता का भूषण है. वैष्णव में मानवीय संवेदना होना नितांत आवश्यक है.
श्री गुसांईजी उच्चकोटि के दार्शनिक और विचारक थे. आपने अनेक ग्रंथों की रचना की एवं गीताजी के विषय में चार ग्रंथ संस्कृत में लिखे हैं. तदुपरांत आपने श्री यमुनाष्टपदी एवं संस्कृत में व व्रजभाषा में अनेक कीर्तनों की रचना की.
सुन्दर विज्ञप्ति स्त्रोत, विभिन्न आचार्यों, श्री महाप्रभुजी विषयक श्री सर्वोत्तम स्त्रोत, श्रीवल्लभाष्टक एवं श्री स्फुरत कृष्णप्रेमामृत (सप्तश्लोकी) आप द्वारा रचित हैं.
अणुभाष्य का अंतिम डेढ़ अध्याय, गायत्री कारिका, विद्वन्मंडन, भक्तिहंस, भक्तिहेतु निर्णय आदि तत्वज्ञान विषयक ग्रंथों की रचना भी आपने की है.
आपने महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी के अपूर्ण रह गये अणुभाष्य की पूर्ति की.
गुसाँई विट्ठलनाथजी ने श्री महाप्रभुजी के चार शिष्यों कुंभनदास, सूरदास, कृष्णदास और परमानंददास तथा अपने चार शिष्यों गोविन्दस्वामी, छीतस्वामी, चतुर्भुजदास और नंददास को सम्मिलित कर 'अष्टछाप' की स्थापना की तथा इन्हे ठाकुरजी के सम्मुख अलग-अलग दर्शनों के समय कीर्तन करने का दायित्त्व सौंपा.
श्री गुसांईजी ने भगवत सेवा में काफी विस्तार और विविधता प्रदान की. भगवदसेवा में थोडी सी भी असावधानी को वे अक्षम्य अपराध मानते थे. भगवदसेवा में कलात्मक साधना का समावेश किया. आपने तत्कालीन समाज के दृष्टिकोण मे व्यापक परिवर्तन किया तथा भगवान के प्रति गहरी आस्था और समर्पण भाव जगाया.
आपने पुष्टिमार्ग के प्रतीक (राग, भोग एवं श्रृंगार) का वास्तविक विकास किया. विक्रम संवत 1588 में 16 वर्ष की आयु में आपका विवाह श्री रुक्मणी बहूजी के साथ हुआ जिनसे आपको छः पुत्र एवं चार पुत्रियाँ हुई.
श्री रुक्मणी बहूजी के लीलाप्रवेश के पश्चात गढ़ा की रानी दुर्गावती जी के अति आग्रह के कारण श्री पद्मावती जी के साथ आपका द्वितीय विवाह हुआ जिनसे आपको एक पुत्र हुए.
इस प्रकार आपको कुल सात पुत्र एवं चार पुत्रियाँ हुई. आपका गृहस्थाश्रम अत्यंत सुखपूर्वक बीता.
सभी पुत्र विद्वान्, प्रतिभाशाली एवं सेवापरायण थे. पुत्रियाँ भी चित्रकारी, संगीत-कला आदि में निपुण एवं सेवापरायण थी. आपने लीलाप्रवेश के पूर्व अपने सातों पुत्रों को बुलाकर निधि का विभाजन किया.
यहाँ निधि का अर्थ धन-दौलत न होकर भगवान के सेव्यस्वरूप की सेवा का दायित्व है. सातों पुत्रों को जो सात सेव्यस्वरूप प्रदान किये गये, उसके आधार पर पुष्टिमार्ग में सात गृह या पीठ माने जाते है और प्रधान पीठ नाथद्वारा की है.
सत्तर वर्ष की आयु में विक्रम संवत 1642 में माघ कृष्ण सप्तमी के दिवस श्री गिरधर जी को अग्निसंस्कार हेतु अपना उपरना देकर आप सदेह श्री गिरिराज जी की कन्दरा के मार्ग से नित्यलीला में प्रवेश कर गये.
आपने ने पुष्टिमार्ग तथा भारतीय धर्म और संस्कृति की अपूर्व सेवा की. वास्तव में श्री गुसांई जी महामहिमाशाली दिव्य पुरूष थे, जिन्होंने वैष्णव भक्ति में अभिनव चेतना जगाई.
श्री गुसाँईजी ने अपने सेवकों को यह प्रेरणा दी की धन-वैभव और कला आदि गुणों की सार्थकता इसी मे है कि उनका विनियोग भगवत्सेवा में किया जाए.
सभी वैष्णवों को प्रभुचरण श्री गुसांईजी के प्राकट्योत्सव की ख़ूबख़ूब बधाई
Mo 9897330142 पवन भाई
Mo 9045305051 गोपाल भाई
श्री महाप्रभुजी की बैठक संख्या 1
ठकुरानी गोविन्द घाट
गोकुल