श्री महाप्रभुजी की बैठक संख्या 1 ठकुरानी गोविन्द घाट गोकुल

  • Home
  • India
  • Mathura
  • श्री महाप्रभुजी की बैठक संख्या 1 ठकुरानी गोविन्द घाट गोकुल

श्री महाप्रभुजी की बैठक संख्या 1 ठकुरानी गोविन्द घाट गोकुल Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from श्री महाप्रभुजी की बैठक संख्या 1 ठकुरानी गोविन्द घाट गोकुल, Hindu temple, thakurani ghat gokul, Mathura.

श्रीमद प्रभुचरण श्री विट्ठलनाथजी (श्री गुसांईजी)            संक्षिप्त जीवन परिचयजगद्गुरु श्रीमद वल्लभाचार्य जी के द्विती...
17/12/2022

श्रीमद प्रभुचरण श्री विट्ठलनाथजी (श्री गुसांईजी)

संक्षिप्त जीवन परिचय

जगद्गुरु श्रीमद वल्लभाचार्य जी के द्वितीय पुत्र श्री विट्ठलनाथजी (श्री गुसांईजी) का प्राकट्य विक्रम संवत 1572 में पौष कृष्ण नवमी के दिन चरणाट में हुआ था. जिस दिन आपका प्राकट्य हुआ उसी दिन एक ब्राह्मण प्रभु श्री विट्ठलनाथजी का स्वरुप लेकर श्री महाप्रभुजी के पास आये, तब आपने आज्ञा की “आज प्रभु एवं पुत्र दोनों पधारे हैं इस कारण इसका नाम हम विट्ठलनाथ रखेंगे. विट्ठल का अर्थ अज्ञानियों को ज्ञानरुपी प्रकाश बताने वाला होता है अतः यह बालक पुष्टिमार्ग का पूर्ण विकास करेगा.

आप बाल्यावस्था से ही श्री बालकृष्णजी की सेवा करते थे एवं उनके साथ खेलते थे. श्री ठाकुरजी आपको साक्षात दर्शन देते थे एवं भोग में धरे ठोड़ की दोनों मित्रभाव से खींचतान करते थे यह प्रसंग मैं पहले भी बता चुका हूँ.

विक्रम संवत 1580 में आठ वर्ष की आयु में आपका उपनयन संस्कार काशी में हुआ. तत्पश्चात श्री महाप्रभु जी ने स्वयं आपको चारों वेदों एवं ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन कराया एवं अन्य शास्त्रों के अभ्यास हेतु काशी में श्री माधव-सरस्वती के आश्रम में भेजा.
सभी विद्यार्थी जब अपना पाठ तैयार करते तब आप खेलते थे परन्तु समय पर गुरु के सभी प्रश्नों के सटीक उत्तर देते थे. यह देखकर गुरु एवं अन्य मित्रों को भी आश्चर्य होता था. दस वर्ष की आयु तक आपने सभी शास्त्रों का अभ्यास पूर्ण कर लिया था.
श्रीवल्लभ ने आपके लिए दशम स्कंध के साररूप श्रीकृष्ण के नामों की ‘त्रिविध नामावली’ की रचना की थी जिसका आप नित्य पाठ करते थे. आपको मल्ल (कुश्ती), घुड़सवारी, चित्रकारी, संगीत आदि में बहुत रूचि थी.

श्री गुसांईजी ने पुष्टिमार्ग के प्रचार-प्रसार के लिए देश के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवास किया. गुजरात और सौराष्ट्र की तो आपने छह बार व्यापक यात्राएँ की. गुजरात में पुष्टिमार्ग का जो व्यापक प्रसार है, उसका बहुत कुछ श्रेय भी श्री गुसांईजी को है. श्री गुसांईजी का सम्मान बादशाह अकबर भी करता था. बादशाह ने आपको न्यायाधीश के अधिकार दिये थे और वह समय-समय पर श्री गुसांईजी की दुआ माँगने भी आता था.
मुगल राजवंश पर आपका प्रभाव तीन पीढ़ियों तक रहा. बादशाह जहाँगीर और शाहजहाँ ने भी समय-समय पर आपको अनेक सुविधाएँ प्रदान की थी.

श्री गुसांईजी प्रतिदिन कम से कम एक प्राणी को दीक्षा दिया करते थे. आपने अनेक योग्य सेवकों को पुष्टिमार्ग के प्रचार-प्रसार का दायित्व सौप रखा था.

श्री गुसांईजी के संबंध विभिन्न राजा-महाराजाओं से थे, किन्तु वे प्रभु सेवा के लिये वे राजकीय धन स्वीकार नहीं करते थे. यदि आग्रहपूर्वक कोई राजपुरूष आपको धन दे देता तो उसे गौ-सेवा में लगा देते थे. गरीबों की पवित्र भेंट को आप बहुत महत्व देते थे और उनसे प्राप्त भेंट को श्रीजी की सेवा में सहर्ष लगाते थे.
गरीबों और दीन-दुखियों तथा पतितजनों के प्रति उनमें विशेष करूणा भाव था. आप अपने सेवकों को भी यह समझाते थे कि वैष्णव धर्म मानवता का भूषण है. वैष्णव में मानवीय संवेदना होना नितांत आवश्यक है.

श्री गुसांईजी उच्चकोटि के दार्शनिक और विचारक थे. आपने अनेक ग्रंथों की रचना की एवं गीताजी के विषय में चार ग्रंथ संस्कृत में लिखे हैं. तदुपरांत आपने श्री यमुनाष्टपदी एवं संस्कृत में व व्रजभाषा में अनेक कीर्तनों की रचना की.

सुन्दर विज्ञप्ति स्त्रोत, विभिन्न आचार्यों, श्री महाप्रभुजी विषयक श्री सर्वोत्तम स्त्रोत, श्रीवल्लभाष्टक एवं श्री स्फुरत कृष्णप्रेमामृत (सप्तश्लोकी) आप द्वारा रचित हैं.
अणुभाष्य का अंतिम डेढ़ अध्याय, गायत्री कारिका, विद्वन्मंडन, भक्तिहंस, भक्तिहेतु निर्णय आदि तत्वज्ञान विषयक ग्रंथों की रचना भी आपने की है.
आपने महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी के अपूर्ण रह गये अणुभाष्य की पूर्ति की.

गुसाँई विट्ठलनाथजी ने श्री महाप्रभुजी के चार शिष्यों कुंभनदास, सूरदास, कृष्णदास और परमानंददास तथा अपने चार शिष्यों गोविन्दस्वामी, छीतस्वामी, चतुर्भुजदास और नंददास को सम्मिलित कर 'अष्टछाप' की स्थापना की तथा इन्हे ठाकुरजी के सम्मुख अलग-अलग दर्शनों के समय कीर्तन करने का दायित्त्व सौंपा.

श्री गुसांईजी ने भगवत सेवा में काफी विस्तार और विविधता प्रदान की. भगवदसेवा में थोडी सी भी असावधानी को वे अक्षम्य अपराध मानते थे. भगवदसेवा में कलात्मक साधना का समावेश किया. आपने तत्कालीन समाज के दृष्टिकोण मे व्यापक परिवर्तन किया तथा भगवान के प्रति गहरी आस्था और समर्पण भाव जगाया.

आपने पुष्टिमार्ग के प्रतीक (राग, भोग एवं श्रृंगार) का वास्तविक विकास किया. विक्रम संवत 1588 में 16 वर्ष की आयु में आपका विवाह श्री रुक्मणी बहूजी के साथ हुआ जिनसे आपको छः पुत्र एवं चार पुत्रियाँ हुई.
श्री रुक्मणी बहूजी के लीलाप्रवेश के पश्चात गढ़ा की रानी दुर्गावती जी के अति आग्रह के कारण श्री पद्मावती जी के साथ आपका द्वितीय विवाह हुआ जिनसे आपको एक पुत्र हुए.
इस प्रकार आपको कुल सात पुत्र एवं चार पुत्रियाँ हुई. आपका गृहस्थाश्रम अत्यंत सुखपूर्वक बीता.
सभी पुत्र विद्वान्, प्रतिभाशाली एवं सेवापरायण थे. पुत्रियाँ भी चित्रकारी, संगीत-कला आदि में निपुण एवं सेवापरायण थी. आपने लीलाप्रवेश के पूर्व अपने सातों पुत्रों को बुलाकर निधि का विभाजन किया.

यहाँ निधि का अर्थ धन-दौलत न होकर भगवान के सेव्यस्वरूप की सेवा का दायित्व है. सातों पुत्रों को जो सात सेव्यस्वरूप प्रदान किये गये, उसके आधार पर पुष्टिमार्ग में सात गृह या पीठ माने जाते है और प्रधान पीठ नाथद्वारा की है.

सत्तर वर्ष की आयु में विक्रम संवत 1642 में माघ कृष्ण सप्तमी के दिवस श्री गिरधर जी को अग्निसंस्कार हेतु अपना उपरना देकर आप सदेह श्री गिरिराज जी की कन्दरा के मार्ग से नित्यलीला में प्रवेश कर गये.

आपने ने पुष्टिमार्ग तथा भारतीय धर्म और संस्कृति की अपूर्व सेवा की. वास्तव में श्री गुसांई जी महामहिमाशाली दिव्य पुरूष थे, जिन्होंने वैष्णव भक्ति में अभिनव चेतना जगाई.

श्री गुसाँईजी ने अपने सेवकों को यह प्रेरणा दी की धन-वैभव और कला आदि गुणों की सार्थकता इसी मे है कि उनका विनियोग भगवत्सेवा में किया जाए.

सभी वैष्णवों को प्रभुचरण श्री गुसांईजी के प्राकट्योत्सव की ख़ूबख़ूब बधाई

Mo 9897330142 पवन भाई
Mo 9045305051 गोपाल भाई

श्री महाप्रभुजी की बैठक संख्या 1
ठकुरानी गोविन्द घाट
गोकुल

व्रज - कार्तिक शुक्ल एकादशी, देव प्रबोधनी,एकादशी व्रत.. जागे जगजीवन जगनायक।कियो प्रबोध देवगन जब हीउठे जगत सुखदायक॥आज एका...
04/11/2022

व्रज - कार्तिक शुक्ल एकादशी, देव प्रबोधनी,एकादशी व्रत..

जागे जगजीवन जगनायक।
कियो प्रबोध देवगन जब ही
उठे जगत सुखदायक॥
आज एकादशी देवदिवारी
तजो निद्रा उठो गिरिधारी।
सकल विश्व को प्रबोध कीजै
जागो परम चतुर बनवारी॥
नंद को लाल उठ्यो जब सोय।
देखि मुखारविंद की शोभा
कहो काके मन धीरज होय॥
देव-प्रबोधिनी मंडप

डोलतिबारी के प्रथम भाग में सफेद खड़ी से मंडप बनाया जाता है एवं इसमें अनेक सुन्दर रंग भरे जाते हैं. मंडप मांडने की सेवा श्री तिलकायत परिवार के बहूजी, बेटीजी (यदि उपस्थित हों) एवं भीतर के सेवकों के परिवार की महिलाऐं करती हैं. पहले सफेद खड़ी से सीमांकन किया जाता है एवं उनमें विविध सुन्दर रंग भरे जाते हैं.
मंडप की चारों दिशाओं में चार आयुध (शंख, चक्र, गदा एवं पद्म) एवं चारों ओर पुष्प लताएँ, तोरण आदि बनाए जाते हैं. मंडप के मध्य एक चौक एवं इसके चारों ओर आठ चौक बनाये जाते हैं. यह नौ चौक का मंडप चार रेखाओं से चित्रित किया जाता है. इसके पश्चात सभी नौ चौकों में स्वास्तिक बनाये जाते हैं. इस सुन्दर सुसज्जित मंडप के ऊपर सोलह हरे पत्ते वाले बड़े गन्नों के 4 स्तंभों से मंडप बनाया जाता है अर्थात इस मंडप को बनाने में कुल चौंसठ बड़े गन्नों का उपयोग किया जाता है.
चार-चार बड़े गन्नों को इकठ्ठा कर तीन जगहों से लाल डोरी बाँध ऐसे चार गट्ठरों से एक स्तम्भ बनता है. इन चारों स्तंभों को डोलतिबारी में इस प्रकार आपस में बाँधा जाता है कि उनके मध्य से प्रभु के दर्शन हों.
मंडप की चारों ओर आठ दीप (प्रत्येक कौने में एक-एक व चार दीपक पीछे) प्रज्जवलित किये जाते हैं. इस उपरांत कई दीपकों दीपमाला बनाई जाती है.
मंडप के चारों ओर बांस की चार टोकरियों में गन्ने के टुकड़े, शकरकंद, बेर, सिंघाड़ा, बैंगन, भाजी आदि भरकर रखे जाते हैं. तत्पश्चात झालर, घंटा व शंखनाद के साथ श्री बालकृष्णलालजी (श्रीजी के संग विराजित स्वरुप) चरणचौकी की गादी पर विराजित किये जाते हैं.
तीन बार निम्नलिखित श्लोक का उच्चारण कर देवोत्थापन की विधि की जाती है.

ऊतिष्ठोष्ठ गोविन्द त्याज निन्द्राम जगत्पते l
त्वय्युत्थिते जगन्नाथ ह्युत्थितं भुवन त्रयम् ll 1 ll
त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम l
ऊत्थिते चेष्टते सर्वमुतिष्ठोतिष्ठ माधव ll 2 ll

इसके पश्चात श्री बालकृष्णलालजी को तिलक कर, संकल्प कर और तुलसी समर्पित कर दूध, दही, मिश्री के बूरे, शहद, एवं घी से पहले पंचामृत स्नान कराया जाता है एवं तब शुद्ध जल से स्नान कराया जाता है. तत्पश्चात चन्दन, आवंला, एवं फुलेल (सुगन्धित तेल) से अभ्यंग (स्नान) कराया जाता है एवं दग्गल धरायी जाती है.
उपस्थित सेवक मंडप की चार परिक्रमा करते हैं और श्री बालकृष्णलालजी को भीतर पधराकर मंडप बड़ा कर लिया जाता है.
ठाकुरजी को भीतर पधराकर थाली में आरती की जाती है और श्रीजी के दर्शन होते हैं.
दर्शन उपरांत उत्सव भोग धरे जाते हैं जिसमें प्रभु को मीठी बूंदी, खस्ता शक्करपारा, दूधघर में सिद्ध मावे के पेड़ा-बरफी, दूधपूड़ी, बासोंदी, जीरा मिश्रित दही, तले हुए नमकीन बीज-चालनी के सूखे मेवा, विविध प्रकार के संदाना (आचार) के बटेरा, विविध प्रकार के फल आदि अरोगाये जाते हैं.

*गोपाष्टमी की मंगल बधाई*🙏🏻🙏🏻🙏🏻😊                                                       *गोपाष्टमी पूजन विधि -*🙏🏻*प्रात: क...
01/11/2022

*गोपाष्टमी की मंगल बधाई*🙏🏻🙏🏻🙏🏻😊
*गोपाष्टमी पूजन विधि -*🙏🏻

*प्रात: काल में ही गौओं को भी स्नान आदि कराया जाता है. और गौ माता के अंग में मेंहदी, हल्दी, रोली के थापे लगाये जाते है. इस दिन बछडे़ सहित गाय की पूजा करने का विधान है. प्रात:काल में ही धूप-दीप, गंध, पुष्प, अक्षत, रोली, गुड़, जलेबी, वस्त्र तथा जल से गाय का पूजन किया जाता है और आरती उतारी जाती है. इस दिन कई व्यक्ति ग्वालों को भी उपहार आदि देकर उनका भी पूजन करते हैं. इस दिन गायों को सजाया जाता है. इसके बाद गाय को गो ग्रास देते हैं और गाय की परिक्रमा करते हैं. परिक्रमा करने के बाद गायों के साथ कुछ दूरी तक चलना चाहिए.*

*श्री कृष्ण की गौ चारण लीला*👌🏻👌🏻

*भगवान अब ‘पौगंण्ड-अवस्था’ में अर्थात छठे वर्ष में प्रवेश किया.एक दिन भगवान मैया से बोले – ‘मैया! अब हम बड़े हो गये है.*

*मैया ने कहा- अच्छा लाला! तुम बड़े हो गये तो बताओ क्या करे?*

*भगवान ने कहा - मैया अब हम बछड़े नहीं चरायेगे, अब हम गाये चरायेगे.*

*मैया ने कहा - ठीक है! बाबा से पूँछ लेना. झट से भगवान बाबा से पूंछने गये.*

*बाबा ने कहा – लाला!, तुम अभी बहुत छोटे हो, अभी बछड़े ही चराओ . भगवान बोले - बाबा मै तो गाये ही चराऊँगा.जब लाला नहीं माने तो बाबा ने कहा - ठीक है लाला!, जाओ पंडित जी को बुला लाओ, वे गौ-चारण का मुहूर्त देखकर बता देगे.*

*भगवान झट से पंडितजी के पास गए बोले- पंडितजी! बाबा ने बुलाया है गौचारण का मुहूर्त देखना है आप आज ही का मुहूर्त निकल दीजियेगा, यदि आप ऐसा करोगे तो मै आप को बहुत सारा माखन दूँगा .पंडितजी घर आ गए पंचाग खोलकर बार-बार अंगुलियों पर गिनते.*

*बाबा ने पूँछा -पंडित जी क्या बात है?आप बार-बार क्या गिन रहे है .*

*पंडित जी ने कहा – क्या बताये, नंदबाबाजी, केवल आज ही का मुहूर्त निकल रहा है इसके बाद तो एक वर्ष तक कोई मुहूर्त है ही नहीं. बाबा ने गौ चारण की स्वीकृति दे दी .*

*भगवान जिस समय, जो काम करे, वही मुहूर्त बन जाता है उसी दिन भगवान ने गौ चारण शुरू किया वह शुभ दिन कार्तिक-माह का “गोपा-अष्टमी” का दिन था. माता यशोदा जी ने लाला का श्रृंगार कर दिया और जैसे ही पैरों में जूतियाँ पहनाने लगी तो बाल कृष्ण ने मना कर दिया और कहने लगे - मैया ! यदि मेरी गौ जुते नही पहनती तो मै कैसे पहन सकता हूँ यदि पहना सकती हो तो सारी गौओ को जूतियाँ पहना दो.और भगवान जब तक वृंदावन में रहे कभी भगवान ने पैरों में जूतियाँ नाही पहनी.*

*अब भगवान अपने सखाओ के साथ गौए चराते हुए वृन्दावन में जाते और अपने चरणों से वृन्दावन को अत्यंत पावन करते. यह वन गौओ के लिए हरी-हरी घास से युक्त एवं रंग-बिरंगे पुष्पों की खान हो रहा था, आगे-आगे गौएँ उनके पीछे-पीछे बाँसुरी बजाते हुए श्यामसुन्दर तदन्तर बलराम और फिर श्रीकृष्ण के यश का गान करते हुए ग्वालबाल,इस प्रकार विहार करने के लिए उन्होंने उस वन में प्रवेश किया.और तब से गौ चारण लीला करने लगे.*

*भगवान कृष्ण का "गोविन्द" नाम भी गायों की रक्षा करने के कारण पडा़ था. क्योंकि भगवान कृष्ण ने गायों तथा ग्वालों की रक्षा के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी अंगुली पर उठाकर रखा था. आठवें दिन इन्द्र अपना अहं त्यागकर भगवान कृष्ण की शरण में आया था. उसके बाद कामधेनु ने भगवान कृष्ण का अभिषेक किया.और इंद्र ने भगवान को गोविंद कहकर संबोधित किया . और उसी दिन से इन्हें गोविन्द के नाम से पुकारा जाने लगा. इसी दिन से अष्टमी के दिन गोपाष्टमी का पर्व मनाया जाने लगा.*

*सार-*👌🏻👌🏻

*गौ ही सबकी माता है, भगवान भी गौ की पूजा करते है, सारे देवी-देवो का वास गौ में होता है, जो गौ की सेवा करता है गौ उसकी सारी इच्छाएँ पूरी कर देती है.तीर्थों में स्नान-दान करने से, ब्राह्मणों को भोजन कराने से, व्रत-उपवास और जप-तप और हवन-यज्ञ करने से जो पुण्य मिलता है, वही पुण्य गौ को चारा या हरी घास खिलाने से प्राप्त हो जाता है।🙏🏻*

भाई दूज (यम द्वितीया) पौराणिक महत्व.. शास्त्रों के अनुसार भाई को यम द्वितीया भी कहते हैं इस दिन बहनें भाई को तिलक लगाकर ...
27/10/2022

भाई दूज (यम द्वितीया) पौराणिक महत्व..

शास्त्रों के अनुसार भाई को यम द्वितीया भी कहते हैं इस दिन बहनें भाई को तिलक लगाकर उन्हें लंबी उम्र का आशीष देती हैं और इस दिन मृत्यु के देवता यमराज का पूजन किया जाता है ब्रजमंडल में इस दिन बहनें यमुना नदी में खड़े होकर भाईयों को तिलक लगाती हैं।
भाई दूज को भ्रातृ द्वितीया भी कहते हैं। इस पर्व का प्रमुख लक्ष्य भाई तथा बहन के पावन संबंध व प्रेमभाव की स्थापना करना है। इस दिन बहनें बेरी पूजन भी करती हैं। इस दिन बहनें भाइयों के स्वस्थ तथा दीर्घायु होने की मंगल कामना करके तिलक लगाती हैं। इस दिन बहनें भाइयों को तेल मलकर गंगा यमुना में स्नान भी कराती हैं। यदि गंगा यमुना में नहीं नहाया जा सके तो भाई को बहन के घर नहाना चाहिए।
यदि बहन अपने हाथ से भाई को भोजन कराये तो भाई की उम्र बढ़ती है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं। इस दिन बहनें अपने भाइयों को चावल खिलाएं। इस दिन बहन के घर भोजन करने का विशेष महत्व है। बहन चचेरी अथवा ममेरी कोई भी हो सकती है। यदि कोई बहन न हो तो गाय, नदी आदि स्त्रीत्व पदार्थ का ध्यान करके अथवा उसके समीप बैठ कर भोजन कर लेना भी शुभ माना जाता है।
इस पूजा में भाई की हथेली पर बहनें चावल का घोल भी लगाती हैं उसके ऊपर सिन्दूर लगाकर कद्दू के फूल, पान, सुपारी मुद्रा आदि हाथों पर रखकर धीरे धीरे पानी हाथों पर छोड़ते हुए निम्न मंत्र बोलती हैं

"गंगा पूजे यमुना को यमी पूजे यमराज को, सुभद्रा पूजा कृष्ण को, गंगा यमुना नीर बहे मेरे भाई की आयु बढ़े"

इसी प्रकार इस मंत्र के साथ हथेली की पूजा की जाती है
" सांप काटे, बाघ काटे, बिच्छू काटे जो काटे सो आज काटे"
इस तरह के शब्द इसलिए कहे जाते हैं क्योंकि ऐसी मान्यता है कि आज के दिन अगर भयंकर पशु काट भी ले तो यमराज के दूत भाई के प्राण नहीं ले जाएंगे। कहीं कहीं इस दिन बहनें भाई के सिर पर तिलक लगाकर उनकी आरती उतारती हैं और फिर हथेली में कलावा बांधती हैं। भाई का मुंह मीठा करने के लिए उन्हें माखन मिस्री खिलाती हैं। संध्या के समय बहनें यमराज के नाम से चौमुख दीया जलाकर घर के बाहर रखती हैं। इस समय ऊपर आसमान में चील उड़ता दिखाई दे तो बहुत ही शुभ माना जाता है। इस सन्दर्भ में मान्यता यह है कि बहनें भाई की आयु के लिए जो दुआ मांग रही हैं उसे यमराज ने कुबूल कर लिया है या चील जाकर यमराज को बहनों का संदेश सुनाएगा।
भैया दूज की कथा
भगवान सूर्य नारायण की पत्नी का नाम छाया था। उनकी कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ था। यमुना यमराज से बड़ा स्नेह करती थी। वह उससे बराबर निवेदन करती कि इष्ट मित्रों सहित उसके घर आकर भोजन करो। अपने कार्य में व्यस्त यमराज बात को टालता रहा। कार्तिक शुक्ला का दिन आया। यमुना ने उस दिन फिर यमराज को भोजन के लिए निमंत्रण देकर, उसे अपने घर आने के लिए वचनबद्ध कर लिया।
यमराज ने सोचा कि मैं तो प्राणों को हरने वाला हूं। मुझे कोई भी अपने घर नहीं बुलाना चाहता। बहन जिस सद्भावना से मुझे बुला रही है, उसका पालन करना मेरा धर्म है। बहन के घर आते समय यमराज ने नरक निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर दिया। यमराज को अपने घर आया देखकर यमुना की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने स्नान कर पूजन करके व्यंजन परोसकर भोजन कराया। यमुना द्वारा किए गए आतिथ्य से यमराज ने प्रसन्न होकर बहन को वर मांगने का आदेश दिया।
यमुना ने कहा कि भद्र! आप प्रति वर्ष इसी दिन मेरे घर आया करो। मेरी तरह जो बहन इस दिन अपने भाई को आदर सत्कार करके टीका करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने तथास्तु कहकर यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण देकर यमलोक की राह की। इसी दिन से पर्व की परम्परा बनी। ऐसी मान्यता है कि जो आतिथ्य स्वीकार करते हैं, उन्हें यम का भय नहीं रहता। इसीलिए भैयादूज को यमराज तथा यमुना जी का पूजन किया जाता है।

अपने प्रभु के जन्म के समाचार सुनकर महादेव जोगी का वेष बना के दर्शन को पहुंचे ...प्रभु के जन्म के कुछ दिनों बाद, एक साधु ...
27/08/2022

अपने प्रभु के जन्म के समाचार सुनकर महादेव जोगी का वेष बना के दर्शन को पहुंचे ...

प्रभु के जन्म के कुछ दिनों बाद, एक साधु नंदभवन आए। वह दरवाजे पर खड़े थे और अंदर झाँकने की कोशिश कर रहे थे। तभी जशोदा मैया ने उन्हें देख लिया। उनकी उपस्थिति ने ही मैया को संकट में डाल दिया। लंबे बाल, उग्र चेहरा, कपड़े की झालरें ... उसने तुरंत अपने बच्चे के बेटे को छिपा दिया और साधु को दूर भगा दिया।
जैसे ही साधु वहां से निकला, प्रभु रोने लग गए। मैया ने गोरस, खिलौने से लेकर झूले तक सब कुछ आजमाया ... कुछ भी काम नहीं आया। प्रभु लगातार रोते रहे।
"जाओ और उस साधु को ढूंढो, उसने अपनी बुरी नज़र मेरे बेटे पर डाल दी होगी ... केवल वह अब इसे ठीक कर पाएगा," जसोदा मैया ने आदेश दिया। सभी ने गोकुलवासी उस साधु को खोजने निकल पड़े। जब वे अंततः उसे मिल गए, तो वे उसे नंदभवन में वापस ले गए और उसे यशोदा मैया के सामने पेश किया। मैया अपने रोते हुए बच्चे को बाहर ले आई और साधु को अपनी बुरी नजरें उठाने का आदेश दिया। साधु ने प्रभु की ओर देखा जैसे एक परछाई भूमि मेघ को देखती है, फिर अपनी बलैया ली। उन्होंने प्रभु की राय और लुन के साथ नज़र उतारी और तुरन्त प्रभु ने रोना बंद कर दिया।
प्रसन्न होकर, यशोदा मैया ने साधु को धन्यवाद दिया, न जानते हुए कि यह महादेव भगवान शिव हैं जो अपने बच्चे - पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान के दर्शन के लिए उनके घर (नंदालय) आए थे।
मैया ने अपने पुत्र को ठीक करने के लिए कैलाश के इस निवासी को व्रज में रहने के लिए आमंत्रित किया, ताकि जब भी बुरी नजर प्रभु पर पड़े शिवजी उनकी नज़र उतार सकें। अब पुष्टि के शिखर को देखें, कि एक माँ ने महादेव को किसी और चीज़ के लिए नहीं बल्कि अपने बच्चे से बुरी नज़रें हटाने के लिए आमंत्रित किया!
आज, पुष्टिमार्ग में, जोगी-लीला के कीर्तन गाए जाते हैं। वे इस उपाख्यान का वर्णन करते हैं, जब महादेव को भी प्रभु को देखने के लिए खुद को प्रच्छन्न करना पड़ा था।

लौकिक से अलौकिक दामोदर लीला के प्रारंभ से कथा प्रसंगमें परिवर्तन दिखाई देता है-लौकिक प्रसंग,यमलार्जुन मोक्षसे अलौकिक हो ...
25/08/2022

लौकिक से अलौकिक

दामोदर लीला के प्रारंभ से कथा प्रसंगमें परिवर्तन दिखाई देता है-लौकिक प्रसंग,यमलार्जुन मोक्षसे अलौकिक हो जाता है।
एक दिन का प्रसंग है मा यशोदा दघि मंथन कर रही थी 'कर्मान्तर तियुक्तासु'। निर्ममन्थ स्वयं दधि' प्रभु की सेवा का काम स्वयं को ही करना पडता है।अन्य कार्य किसी से भी करवावे लेकिन प्रभु के लिए सामग्री स्वयं ही बननी पडती है, स्वयं ही भोग घराना पडता है। मां मंथन करते यह सोच रही थी कि कब माखन निकालेगा कब मेरे कन्हैया को खिलांउंगी। दघि मंथन के समय उसे कन्हैया की बाल लीलाएं स्मरण हो आ रही है और वह उन्ही को गुन-गुना रही है, 'दघि मंथने काले स्मरन्ती तान्य गायतु' दघि मंथ के समय पुत्र स्नेह के कारण दूघ स्त्रवित होने लगा शरीर रोमांचित हो गया,श्रमकी बुंदे मुख पर झलकने लगी।मैया के कंगन आपस में टकरा रहे थे, उनसे स्वर निकल रहा था।श्रीमहाप्रभुजी बताते है, यशोदा गागर मे दही मथ रही हे और मक्खन तैरने लगा है।यशोदा का स्तन का दुग्ध तथा मंथनी का मक्खन दोनों ही प्रभु की भोज्य सामग्री है।प्रभु भोक्ता है।यशोदा के स्तनों से दूघ स्त्रवित होने लगा, मां की कंचुकी भींग गइ। यशोदाजी को ताप हो गया।प्रभु से मां का ताप देखा न गया।प्रभु दोडकर मां के गले लिपट गया और गोदी चढकर दुग्ध पान करने लगे।मैया ने दूघ पिलाना प्रारंभ किया।

*गोकुल में भगवान शिव**एक बार भगवान शंकर के मन में भी विष्णु के बालस्वरूप के दर्शन करने की इच्छा हुई. भादौ शुक्ल द्वादशी ...
25/08/2022

*गोकुल में भगवान शिव*

*एक बार भगवान शंकर के मन में भी विष्णु के बालस्वरूप के दर्शन करने की इच्छा हुई. भादौ शुक्ल द्वादशी के दिन भगवान शंकर अलख जगाते हुए गोकुल में आए. शिव जी द्वार पर आकर खड़े हो गए. तभी नन्द भवन से एक दासी शिवजी के पास आई और कहने लगी कि यशोदाजी ने ये भिक्षा भेजी है इसे स्वीकार कर लें. और लाला को आशीर्वाद दे दें. शिव बोले मैं भिक्षा नहीं लूंगा, मुझे किसी भी वस्तु की अपेक्षा नहीं है, मुझे तो बालकृष्ण के दर्शन करना है. दासी ने यह समाचार यशोदाजी को पहुंचा दिया.*

*"अरी मईया! देखा दे मुख लाल का, तेरे पलने में, पालनहार देखा दे मुख लाल का "*

*यशोदाजी ने खिड़की में से बाहर देखकर कह दिया कि लाला को बाहर नहीं लाऊंगी, तुम्हारे गले में सर्प है जिसे देखकर मेरा लाला डर जाएगा. शिवजी बोले कि माता तेरा कन्हैया तो काल का काल है, ब्रह्म का ब्रह्म है. वह किसी से नहीं डर सकता, उसे किसी की भी कुदृष्टि नहीं लग सकती और वह तो मुझे पहचानता है.*

*यशोदाजी बोलीं- कैसी बातें कर रहे हो आप? मेरा लाला तो नन्हा सा है आप हठ न करें. शिवजी ने कहा- तेरे लाला के दर्शन किए बिना मैं यहां से नहीं हटूंगा. मै यही समाधी लगा लूगा जब इधर बाल कन्हैया ने जाना कि शिवजी पधारे हैं. और माता वहां ले नहीं जाएंगी,और वे दर्शन न मिलने पर समाधी लगा लेगे क्योकि कन्हैया जानते थे कि भोले बाबा कि समाधी लग गई तो हजारों वर्ष के बाद ही खुलेगी तो उन्होंने जोर से रोना शुरु किया.*

*जब कन्हैया किसी भी प्रकार चुप नहीं हुए तो माता को लगा कि सचमुच वे योगी परम तपस्वी है, यशोदाजी बालकृष्ण को बाहर लेकर आई. शिवजी ने सोचा कि अब कन्हैया मेरे पास आएंगे, शिवजी ने दर्शन करके प्रणाम किया किन्तु इतने से तृप्ति नहीं हुई. वे अपनी गोद में लेना चाहते थे. शिवजी यशोदाजी से बोले कि तुम बालक के भविष्य के बारे में पूछती हो, यदि इसे मेरी गोद में दिया जाए तो मैं इसकी हाथों की रेखा अच्छी तरह से देख लूंगा. यशोदा ने बालकृष्ण को शिवजी की गोद में रख दिया. जब हरि और हर एक हो गए तो वहां कौन क्या बोलेगा.🙏🏻*

व्रज - भाद्रपद कृष्ण द्वादशी (द्वितीय) / वत्स द्वादशी (बच्छ बारस).. श्रीजी में सेवाक्रम - आज श्रीजी को नियम की गौ पूजन क...
24/08/2022

व्रज - भाद्रपद कृष्ण द्वादशी (द्वितीय) / वत्स द्वादशी (बच्छ बारस)..

श्रीजी में सेवाक्रम - आज श्रीजी को नियम की गौ पूजन की पिछवाई, लाल चौफूली चूंदड़ी की लाल गोल-काछनी, सूथन और श्रीमस्तक पर हीरा की तिलक वाली टोपी धरायी जाती है.

बालभाव के कीर्तन गाये जाते हैं जिसमें गौ-पूजन को जाते बालक श्री श्यामसुंदर के श्रृंगार, सुन्दर वस्त्रों, आभूषणों एवं यशोदाजी के बड़े भाग्य का अद्भुत वर्णन किया गया है.
नीचे वर्णित कीर्तन को भावपूर्वक पढ़ें और सुन्दर शब्दों को समझने का प्रयास कर उनका आनंद लें.

राजभोग दर्शन – कीर्तन – (राग : सारंग)

ठाडी लिये खिलावत कनियां l
प्रेममुदित मन गावत यशोदा हरि लीला मोहनियां ll 1 ll
काजर तिलक पीत तन झगुली कणित पाई पैजनिया l
हंसुली हेम हमेल बिराजत झर झटकन मनि मनिया ll 2 ll
हुलरावति हसि कंठ लगावत प्रीति रीति अति धनियां l
चुंबत मुख ‘रघुनाथदास’ बलि बड़ भागिन नंद रनियां ll 3 ll

साज – नन्दभवन की तिबारी में बछड़े सहित गाय का तिलक कर पूजन करती श्री यशोदा माँ, रोहिणी माँ तथा दूसरी ओर गायों के साथ ग्वाल-बालों के सुन्दर चित्रांकन से सुशोभित पिछवाई आज श्रीजी में धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरण चौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल रंग की चौफूली चुन्दडी के रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन एवं गोल काछनी (मोर काछनी) धरायी जाती है. ठाड़े वस्त्र मेघश्याम रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – श्रीजी को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. हीरे के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
कली, कस्तूरी एवं कमल माला आती है.
श्रीमस्तक हीरा की टोपी तिलक व फूंदा वाली पर जाली(net) की तीन तुर्री और बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
श्रीकर्ण में मयुराकृति कुंडल धराये जाते हैं एवं स्वरुप की बायीं ओर मीना की चोटी धरायी जाती है.
पीले एवं श्वेत पुष्पों की कलात्मक थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में कमलछड़ी लहरिया के वेणुजी एवं दो वेत्रजी (लहरिया व एक सोना के) धराये जाते हैं.
पट लाल, गोटी मोर की व आरसी बावा साहब द्वारा पधराई कांच के कलात्मक काम की आती है.

छठी के दूध  के बारे में सुना है?????छठिहार क्यूँ होता है,,,????ये बात हर कोई जानना चाहेगा,,क्यूंकि यदा कदा लोग ये सवाल उ...
23/08/2022

छठी के दूध के बारे में सुना है?????छठिहार क्यूँ होता है,,,????
ये बात हर कोई जानना चाहेगा,,क्यूंकि यदा कदा लोग ये सवाल उठाते रहते हैं,,,,
बात कन्हैया की जन्म पश्चात की है,,बडा ही मनोरम समय था हर तरफ संगीत और बधाई के गीत बज रहे थे,,सारा नन्द ग्राम फूलों से सजा हुआ था,,हो भी क्यों न ,,आज कान्हा का छठा दिन जो था,,परन्तु ये क्या ,कनहा तो जोर जोर से रोये जा रहा था,,,हर कोई लल्ला को चुप करने का प्रयास कर रहा था,,मगर सब विफल... देव गण भी प्रभू की ये लीला देख अचंभित थे,,देवों ने ब्रह्मा जी से निराकरण के लिए कहा तो ब्रह्मा जी ने,,शक्ति स्वरूपणी महामाया को भेज दिया ,,,कान्हा को चुप करने के लिए,,ये सुनके
महामाया आनंदित हो गई इस कार्य को पाकर ,,,,और भांति भांति के रूप बदल कर लल्ला को चुप करने की प्रयास करने लगी ,,,कभी फूल बनती तो कभी पक्षी ,,,,कभी इधर जाती तो कभी उधर जाती,,,,लल्ला चुप ,,सबको शांति मिली,,,लेकिन लल्ला अपनी सर को कभी इधर तो कभी उधर क्यों कर रहा है,,,फिर खुद ही मुस्कुरा रहा है,,,दरअसल माया की माया सिर्फ प्रभू देख रहे थे और कोई नहीं,,,और फिर लल्ला रोने लगे,,,तो माया ने कहा की हे ब्रह्मा जी प्रभू को भूख लगी है,,,और मैया को दूध नहीं आ रहा,, यही है प्रभु की रोने का कारन,। फिर ब्रह्मा जी के आशीर्वाद से यसोदा को छाती में दर्द महसूस हुआ,,,देखा तो दूध टपक रहा है,,,मैया ने झट से कान्हा को गोद में उठाई और छाती से लगा ली ,,दूध मुह में जाते ही लल्ला चुप हो गए,,,देव मानव सब हर्षित हो गए,,,परन्तु माया गुमसुम हो गई..ब्रह्मा जी से ये छुपा ना रहा ,,,पूछा की क्या बात है?,,महामाया ने कहा की मुझे इसमें बड़ा आनंद आ रहा था,,ब्रह्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा ये बात है,,,आज से तुम छठी के रूप में हर बच्चे के छठे दिन पूजी जाओगी,,,साज सजावट और गीत संगीत से तुम्हारा स्वागत होगा,,और बिना किसी को दिखाई दिए हर बच्चे के साथ तुम आनंद कर पाओगी ,,,माया ने कहा की आपका बहुत बहुत धन्वाद प्रभु ,,चुकी आपके आशीर्वाद से यशोदा को दूध आया ,,,इसीलिए,,,छठी के दिन माँ के दूध पिने से बच्चे को वो दूध अमृत के सामान उपकारी हो और हर तरह के कष्ट को दूर करने वाली हो,ऐसा वर दें ,,,,तथास्तु ,,कह के ब्रह्मा जी अलक्षित हो गए,,,और तब से छठी पूजन (छठिहार)का प्रचलन है,,,और छठी के दूध का एक अलग महत्व है,द्वारा...,,,,......,,,,,......आओ सखी आओ रे गीत छठी के गाओ रे.........,,,,......,,,,..... नन्द के लाला की छठी धूम धाम से मनाओ रे .........,,,,,.......,,,,,......माखन मिश्री का भोग लगाया .............,,,,.......,,,,,.....अब कढ़ी चावल बनाओ रे आओ सही आओ रे.........,,,,,......,,,,,....जशोदा माई प्रेम करे हम सब भी स्नेह करे प्रेम से ले ले बलिया कामना लल्ला की दीर्घायु की करे..........आओ सखी आओ रे गीत छठी के गाओ रे........कृष्ण छठी की हार्दिक शुभ कामनाये.......$uप्रभात.....
जय श्री राम जय श्री श्याम....
*जय श्री राधे कृष्णा*

23/08/2022

व्रज - भाद्रपद कृष्ण एकादशी
Monday, 22 August 2022

*आज एकादशी व्रत है मंगलवार, 23 अगस्त 2022 को होगा.*



आज अजा एकादशी हैं. महापापी अजामिल के प्रसंग में प्रभु के जीव पर अनुग्रह को आत्मसात करे.

अजा एकादशी

विशेष – महापापी अजामिल जिसने अपने अंतिम समय में अपने स्वयं के पुत्र ‘नारायण’ के नामोच्चारण के निमित प्रभु का नाम उच्चारण किया था. प्रभु की दयालुता देखें कि केवल अंत समय में ‘नारायण’ के नाम के उच्चारण मात्र से उन्होंने आज के दिन अपने देवदूत भेज अजामिल पर अनुग्रह कर उसका उद्धार किया था. प्रभु ने यह अपना अनुग्रह प्रकट करने के लिए किया इसी लिए कहते हे की प्रभु कर्तुम अकर्तुम अन्यथाकर्तुम सर्वसमर्थ है।आज की एकादशी उसी अजामिल के नाम से अजा एकादशी कहलाती है.
ये अध्याय से यह सीख मिलती है कि हम सब पुष्टि वैष्णवो को ठाकुरजी की सेवा और नाम किर्तन सतत अंतिम श्र्वास तक करना है , कितनी भी विषम परिस्थिति हमारे जीवन में क्यों न आए ?
ठाकुरजी की सेवा और ठाकुरजी से स्नेह यही पुष्टि जीव का लक्ष्य होना चाहिए ।
मनुष्य चाहे जितना बड़ा पापी हो , चाहे जितना नि:साधन हो ; यदि सच्चे ह्रदय से एकबार भी प्रभु की शरण स्वीकार ले तो प्रभु उसको " स्वजन " मान लते हैं . इसीलिए महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्यजी ने "कृष्णाश्रयस्तोत्र" में कहा हैं :-

"पापसक्तस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिर्मम"

भावार्थ :- सुखी हो या दु:खी , पापी हो या निष्पाप , धनवान हो या निर्धन , साधन-सम्पन्न हो या नि:साधन ; सभी को श्रीकृष्ण की शरण में ही जाना चाहिए .
सब देवें के देव , सर्वशक्तिमान , सर्वकारण ऐसे श्रीकृष्ण को छोड़ कर अन्य किसी की शरण में क्यों जाएँ ?
इसीलिए पुष्टिमार्ग श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति का मार्ग
दिखाता/सिखाता है .🙏🏻

*नामकरण – संस्कार*🙏🏻 *यदुवंशियो के कुलपुरोहित थे श्रीगर्गाचार्य जी, वे बड़े तपस्वी थे, वासुदेव जी कि प्रेरणा से वे एक दि...
21/08/2022

*नामकरण – संस्कार*🙏🏻

*यदुवंशियो के कुलपुरोहित थे श्रीगर्गाचार्य जी, वे बड़े तपस्वी थे, वासुदेव जी कि प्रेरणा से वे एक दिन नंदबाबा के गोकुल में आये .उन्हें देखकर नंदबाबा को बड़ी प्रसन्नता हुई. वे हाथ जोड़कर उठ खड़े हुए, उनके चरणों में प्रणाम किया .विधि पूर्वक आतिथ्य हो जाने पर नन्द बाबा ने बडी ही मधुर वाणी में कहा- ‘भगवन आप तो स्वयं पूर्णकाम है आप ब्रह्मवेत्ताओ में श्रेष्ठ है, इसलिए मेरे इन दोनों बालको के नामकरण आदि संस्कार आप ही कर दीजिए. नंदबाबा की बात सुनकर गर्गाचार्ये ने एकांत में दोनों बालको का नामकरण संस्कार कर दिया .*


*गर्गाचार्येजी ने बलरामजी की तरफ देखकर कहा - यह रोहिणी का पुत्र है इसलिए इसका नाम होगा ‘रौहिंणेय’, ये सबको आनंद देने वाला होगा, इसलिए इसका दूसरा नाम होगा ‘राम’ इसके बल की कोई सीमा नहीं है अतः इसका एक नाम ‘बल’ भी है.इनका एक नाम ‘संकर्षण’ भी है.*


*भगवान की ओर देखकर वे बोले – ये जो साँवला-साँवला है, यह प्रत्येक युग में शरीर ग्रहण करता है, पिछले युगो में इसने क्रमश: श्वेत, रक्त, और पीत, ये तीन विभिन्न रंग स्वीकार किये थे, अब की यह कृष्णवर्ण हुआ है, इसलिए इसका नाम ‘कृष्ण’ होगा यह तुम्हारा पुत्र पहले कभी वासुदेव के घर भी पैदा हुआ था इसलिए इस रहस्य को जानने वाले लोग इसे ‘श्रीमान् वासुदेव’ भी कहते है .*


*तुम्हारे पुत्र के ओर भी बहुत से नाम है, तथा रूप भी अनेक है, इसके जितने गुण है, और जितने कर्म है, उन सबके अनुसार अलग-अलग नाम पड़ जाते है, यह तुम लोगो का परम कल्याण करेगा, और समस्त गोप और गौओ को बहुत आनंदित करेगा, नन्दजी चाहे जिस द्रृष्टि से देखो गुण में, संपत्ति में, और सौंदर्य में, कीर्ति, और प्रभाव में तुम्हारा यह पुत्र साक्षात् भगवान नारायण के समान है.तुम बड़ी सावधानी से इसकी रक्षा करो. इस प्रकार आचार्य नंदबाबा को समझकर चले गये.*


*थोड़ी देर बाद दोनों माताये यशोदा और रोहिणीजी आपस में कहने लगी - बहिन आचार्य जी बडो टेढो-सो नाम रखकर गये, हमसे तो ये नाम लिए भी नहीं जायेगे इसलिए बहिन हम ने तो अपने लाला को नाम ‘बलुआ’ रख लिया है, तो यशोदा जी बोली- बहिन हमने भी अपने लाला को नाम ‘कनुआ’ रख लिया है और माता यशोदा कृष्णजी को हमेशा इसी नाम से पुकारा करती थी.ये भगवान के लाड़ के नाम थे.*

*सार-*👌🏻👌🏻
*भगवान से भी ज्यादा शक्ति भगवान के नाम में है भगवान से ज्यादा भगवान के नाम ने लोगो को तारा है इसलिए हर पल उनके मधुर नामो का उच्चारण करते रहो.🙏🏻*

*द्वापर युग में जब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया, ठीक उनके पहले मां दुर्गा ने योग माया के रूप में जन्म ...
20/08/2022

*द्वापर युग में जब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया, ठीक उनके पहले मां दुर्गा ने योग माया के रूप में जन्म लिया था। मां दुर्गा का यह दिव्य अवतार कुछ समय के लिए था।*

*गर्गपुराण के अनुसार भगवान कृष्ण की मां देवकी के सातवें गर्भ को योगमाया ने ही बदलकर कर रोहिणी के गर्भ में पहुंचाया था, जिससे बलराम का जन्म हुआ। योगमाया ने यशोदा के गर्भ से जन्म लिया था। इनके जन्म के समय यशोदा गहरी नींद में थीं और उन्होंने इस बालिका को देखा नहीं था।*

*वहीं कंस के कारागार में देवकी के आठवें पुत्र के जन्म लेने के बाद वसुदेव उस बालक को नंद के यहां यशोदा के पास लिटा दिया, जिससे बाद में आंख खुलने पर यशोदा ने बालिका के स्थान पर पुत्र को ही पाया।*

*और वसुदेव यशोदा के यहां जन्मी बालिका( योगमाया) को मथुरा वापस आ गये और जब कंस ने उस बालिका को मारना चाहा तो वह हाथ से छूट कर आकाशवाणी करती हुई चली गईं। देवी योगमाया के बारे में कहा जाता है कि वे भगवान श्रीकृष्ण की बहन थी, जो उनसे बड़ी थीं।🙏🏻*

Address

Thakurani Ghat Gokul
Mathura
281303

Telephone

+919897330142

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when श्री महाप्रभुजी की बैठक संख्या 1 ठकुरानी गोविन्द घाट गोकुल posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Place Of Worship

Send a message to श्री महाप्रभुजी की बैठक संख्या 1 ठकुरानी गोविन्द घाट गोकुल:

Share

Category