24/09/2022
. श्रीगरुड़ पुराण (सारोद्धार)
अध्याय - 017
(गरुड़ पुराण-श्रवण (सुनने का) का फल)
श्रीभगवान ने कहा, 'हे तार्क्ष्य ! इस प्रकार मैंने और्ध्वदैहिक कृत्यों के विषय में सब कुछ कह दिया। मरणाशौच में दस दिन के अंदर इसे सुनकर व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो जाता है। यह परलोक संबंदधी कर्म पितरों को मुक्ति प्रदान करने वाला है और परलोक में तथा इस लोक में भी पुत्र को वांछित फल देकर सुख प्रदान करने वाला है। जो नास्तिक अधम व्यक्ति प्रेत का यह और्ध्वदैहिक कर्म नहीं करते, उनका जल सुरा के समान अपेय है, इसमें कोई संशय नहीं। देवता और पितृगण उसके घर की ओर नहीं देखते अर्थात दोनों की ही कृपादृष्टि उन पर नहीं होती और उनके पितरों के कोप से पुत्र-पुत्रादि की भी दुर्गति होती है। प्रेतक्रिया के बिना ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और इतरजनों को भी चाण्डाल के समान जानना चाहिए।
जो इस पुण्यप्रद प्रेतकल्प को सुनता और सुनाता है, 'वे दोनों ही पाप से मुक्त होकर दुर्गति को नहीं प्राप्त होते हैं। माता और पिता के मरण में जो पुत्र गरुड़ पुराण सुनता है, उसके माता-पिता की मुक्ति होती है और पुत्र को संतति की प्राप्ति होती है। जिस पुत्र ने माता-पिता की मृत्यु होने के अनन्तर गरुड़ पुराण का श्रवण नहीं किया, गया श्राद्ध नहीं किया, वृषोत्सर्ग नहीं किया, मासिक तथा वार्षिक श्राद्ध नहीं किया, वह कैसे पुत्र कहा जा सकता है और ऋणत्रय से उसे कैसे मुक्ति प्राप्त हो सकती है और वह पुत्र माता-पिता को तारने में कैसे समर्थ हो सकता है? इसलिए सभी प्रकार के प्रयत्नों को करके धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष रूप पुरुषार्थचतुष्टय को देने वाले तथा सर्वविध दु:ख का विनाश करने वाले गरुड़ पुराण को अवश्य सुनना चाहिए।
यह गरुड़ पुराण पुण्यप्रद, पवित्र तथा पापनाशक है, सुनने वालों की कामनाओं को पूर्ण करने वाला है, अत: सदा ही इसे सुनना चाहिए। इस पुराण को सुनकर ब्राह्मण विद्या प्राप्त करता है, क्षत्रिय पृथिवी प्राप्त करता है, वैश्य धनाढ्य होता है और शूद्र पातकों से शुद्ध हो जाता है।
इस गरुड़पुराण को सुनकर सुनाने वाले आचार्य को पूर्वोक्त शय्याददानादि संपूर्ण दान देने चाहिए अन्यथा इसका श्रवण फलदायक नहीं होता। पहले पुराण की पूजा करनी चाहिए तदनन्तर वस्त्र, अलंकार, गोदान और दक्षिणा आदि देकर आदरपूर्वक वाचक की पूजा करनी चाहिए। प्रचुर पुण्यफल की प्राप्ति के लिए प्रभूत अन्न, स्वर्ण और भूमि दान के द्वारा श्रद्धा भक्तिपूर्वक वाचक की पूजा करनी चाहिए। वाचक की पूजा से ही मेरी पूजा हो जाती है, इसमें संशय नहीं और वाचक के संतुष्ट होने पर मैं भी संतुष्ट हो जाता हूँ, इसमें भी कोई संशय नहीं।
(इस प्रकार गरुड़पुराण के श्रवण का फल सम्पूर्ण हुआ)
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गरुड़पुराण सारोद्धार सम्पूर्ण
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"जय जय श्रीहरि"
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