04/06/2022
*"सेवा का मंत्र"*
वृन्दावन में बिहारीजी का एक परम् भक्त था, पेशे से वह दुकानदार था ।
रोज प्रातः बिहारीजी के मंदिर जाता, फिर गो सेवा में समय देता, गरीब, बीमार और असहाय लोगों के उपचार-भोजन और दवा का प्रबन्ध करता ।
वह बिहारीजी के मंदिर नित्य प्रातः जाता और न तो कोई दीपक जलाता, न कोई माला, न फूल, न कोई प्रसाद उसे अपने पिता की कही,एक बात जो उसने बचपन से अपने पिता से ग्रहण की थी और जीवन मन्त्र बना लिया था ।
*"सेवा का मंत्र"*
उसके पिता ने कहा था- बिहारीजी की सेवा तो भाव से होती है बिहारीजी तो उसकी सेवा स्वीकार करते हैं, जो उनकी हर सन्तान की ।
जो किसी न किसी कारण दुखी है उसकी सेवा करता है जो पशु पक्षियों की सेवा करता है देखो भगवान ने स्वयं गोसेवा की थी।
अपने पिता की इसी बात को गांठ में बांधे वह सेवामंत्र की साधना कर रहा था।
उसके साथ एक विचित्र बात होती थी। जब वह मंदिर में बिहारीजी के दर्शन को जाता तो वहां उसे प्रभु की छवि के स्थान पर एक ज्योति दिखाई देती थी। जबकि मंदिर में उसके अगल-बगल खड़े बाकी के सभी भक्त कहते- वाह!
आज बिहारीजी का श्रृंगार कितना अच्छा है बिहारी जी का मुकुट ऐसा, पोशाक ऐसी है वह सोचता बिहारीजी सबको दर्शन देते हैं, पर मुझे क्यों केवल एक ज्योति दिखायी देती है।
हर दिन ऐसा होता। एक दिन बिहारी जी से बोला ऐसी क्या बात है कि आप सबको तो दर्शन देते हैं, पर मुझे दिखायी नहीं देते। कल आप को मुझे दर्शन देना ही पड़ेगा। अगले दिन मंदिर गया फिर बिहारी जी उसे ज्योत रूप में दिखे।
वह बोला- बिहारीजी, अगर कल मुझे आपने दर्शन नहीं दिये तो मैं यमुनाजी में डूबकर मर जाऊंगा । उसी रात में बिहारीजी एक कोढ़ी के सपने में आये जो मंदिर के रास्ते में बैठा रहता था।
बिहारीजी कोढ़ी से बोले- तुम्हें अपना कोढ़ ठीक करना है, कोढ़ी बोला- हाँ प्रभु मेरा तो जीवन ही बदल जाएगा..
भगवान बोले-तो सुनो सुबह मंदिर के रास्ते से एक भक्त निकलेगा तुम उसके चरण पकड़ लेना और उसे तब तक मत छोड़ना जब तक वह यह तुमसे न कह दे कि बिहारीजी तुम्हारा कोढ़ ठीक करें ।
कोढी बोला- पर प्रभु वहां तो रोज बहुत से भक्त आते हैं मैं उन्हें पहचानूंगा कैसे?
भगवान ने कहा- जिसके पैरों से तुम्हें प्रकाश निकलता दिखायी दे, वही मेरा वह भक्त है जिसके पैर तुम्हें पकडना है ।
बिहारीजी के आदेश पर अगले दिन वह कोढ़ी रास्ते में बैठ गया। जैसे ही वह भक्त निकला उसने चरण पकड़ लिए।
कोढ़ी बोला- पहले आप बिहारीजी से कहो कि मेरा कोढ़ ठीक हो जाये फिर छोड़ूंगा आपको।
भक्त बोला- मेरे कहने से क्या होगा आप मेरे पैर छोड़ दीजिये।
कोढ़ी बोला- जब तक आप ये नहीं कह देते कि बिहारीजी तुम्हारा कोढ़ ठीक करें। तक मैं आपके चरण नहीं छोडूंगा ।
भक्त वैसे ही चिंता में था कि बिहारी जी दर्शन नहीं दे रहे, ऊपर से ये कोढ़ी पीछे पड़ गया तो।
वह झुँझलाकर बोला- बिहारीजी इसका कोढ़ ठीक कर दीजिये और मंदिर चला गया। मंदिर जाकर क्या देखता है बिहारीजी के दर्शन हो रहे हैं।
बिहारीजी से पूछने लगा- अब तक आप मुझे दर्शन क्यों नहीं दे रहे थे ?
बिहारीजी बोले- तुम मेरे निष्काम भक्त हो, आज तक तुमने मुझसे कभी कुछ नहीं माँगा। इसलिए में क्या मुँह लेकर तुम्हें दर्शन देता ।
यहां सभी भक्त कुछ न कुछ मांगते रहते हैं। इसलिए मैं उनसे नज़रें मिला सकता हूं, पर आज तुमने रास्ते में
उस कोढ़ी से कहा कि बिहारी जी तुम्हारा कोढ़ ठीक कर दे इसलिए मैं तुम्हें दर्शन देने आ गया।
जैसे माता पिता अपनी संतान को पालने के लिए कोई कामना नहीं करते, न पुण्य की,न स्वर्ग की,न सुख की वैसे ही भगवान को निस्वार्थ भाव भक्त प्रिय है ।
फिर भी अगर कुछ भगवान से मांगना चाहते है। तोह केवल अनन्त भक्ति का दान मांगिये।
जय जय श्री राधे
*।।श्रीजी कृपा वृंदावन।।*