Braj Madhuri

Braj Madhuri वही तन, मन, धन धन्य है जो हरि-गुरु की सेव?

अपने हरि को हम ढूंढ लियो,जिन लाल अमोलक लाखन में।हरि अंग में नरमी है जितनी,नरमी नाहीं वैसी माखन में॥छवि देखत ही मैं तो झा...
15/08/2026

अपने हरि को हम ढूंढ लियो,
जिन लाल अमोलक लाखन में।

हरि अंग में नरमी है जितनी,
नरमी नाहीं वैसी माखन में॥

छवि देखत ही मैं तो झांकी रही,
मेरो चित चुरा लियो झांकन में॥

हियरा में बसो, जियरा में बसो,
प्यारी-प्यारे बसो दोऊ आखन में॥

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करू मन, नंदनँदन को ध्यान।यहि अवसर तोहिं फिर न मिलैगौ, मेरौ कह्यौ अब मान॥घूँघरवारी अलकैं मुखपै, कुंडल झलकत कान।नारायन अलस...
14/08/2026

करू मन, नंदनँदन को ध्यान।
यहि अवसर तोहिं फिर न मिलैगौ, मेरौ कह्यौ अब मान॥
घूँघरवारी अलकैं मुखपै, कुंडल झलकत कान।
नारायन अलसाने नैना, झूमत रूप निधान॥

- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (333)

अरे मन, नन्दनन्दन श्री कृष्ण का स्मरण कर। हे मन, मुझे ध्यान से सुन, यह महान अवसर तुझको फिर से प्राप्त नहीं होगा। श्री कृष्ण के मुख पर उनके घुंघराले काले केश हैं और कानों में स्वर्ण कुण्डल झिलमिला रहे हैं। उनकी तिरछी चितवन मन को पंगु करने वाली है, और उनकी गजनायक चाल अति अद्भुत है।

श्री राधे राधे

भगवद्गीता 9.22 — भक्त की सम्पूर्ण रक्षा“अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम...
11/08/2026

भगवद्गीता 9.22 — भक्त की सम्पूर्ण रक्षा

“अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥”

श्रीकृष्ण कहते हैं —
जो भक्त अनन्य चित्त से,
किसी अन्य सहारे की आकांक्षा किए बिना,
निरंतर मेरा स्मरण करता हुआ
मेरी भक्ति में लगा रहता है—
उस भक्त के जीवन में
योग अर्थात् जो उसके पास नहीं है,
उसे प्राप्त कराना
और
क्षेम अर्थात् जो प्राप्त हो चुका है,
उसकी रक्षा करना —यह दोनों दायित्व
मैं स्वयं अपने ऊपर ले लेता हूँ।
यह भक्ति का अत्यंत गूढ़ और आश्वस्त करने वाला रहस्य है।

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🌸 हे श्रीकृष्ण!आप नित्य वृन्दावन-विहारी हैं —मधुर वंशीवादन से भक्तों कोनिरन्तर अपनी ओर खींच लेने वाले।आप वेदों, पृथ्वी औ...
07/08/2026

🌸 हे श्रीकृष्ण!
आप नित्य वृन्दावन-विहारी हैं —
मधुर वंशीवादन से भक्तों को
निरन्तर अपनी ओर खींच लेने वाले।

आप वेदों, पृथ्वी और गौमाताओं की रक्षा करते हुए
गोपाल-स्वरूप से समस्त ब्रज का पालन करते हैं।

कालिय, अघ, वक जैसे असुरों का संहार कर
आपने गो-गोप-गोपियों को जीवनदान दिया —
इसलिए आप ही ब्रज-रक्षक, ब्रज-नाथ हैं।

हे यमुनातट-विहारी!
हे चञ्चल कुण्डलधारी गोविन्द!
मेरे बारम्बार प्रणाम स्वीकार करें।
🙏

यह मनुष्य का शरीर बार बार नहीं मिलता । दयामय भगवान चौरासी लाख योनियों में भटकने के पश्चात् दया करके कभी मानव देह प्रदान ...
06/08/2026

यह मनुष्य का शरीर बार बार नहीं मिलता । दयामय भगवान चौरासी लाख योनियों में भटकने के पश्चात् दया करके कभी मानव देह प्रदान करते हैं । मानव देह देने के पूर्व ही संसार के वास्तविक स्वरुप का परिचय कराने के लिए गर्भ में उल्टा टांग कर मुख तक बाँध देते हैं । जब गर्भ में बालक के लिए कष्ट असह्य हो जाता है तब उसे ज्ञान देते हैं और वह (जीव) प्रतिज्ञा करता है कि मुझे गर्भ से बाहर निकाल दीजिये, मैं केवल आपका ही भजन करूँगा । जन्म के पश्चात जो श्यामसुंदर को भूल जाता है, उसकी वर्तमान जीवन में भी गर्भस्थ अवस्था के समान ही दयनीय दशा हो जाती है । 'श्री कृपालु जी' कहते हैं कि यह मानव देह देवताओं के लिए भी दुर्लभ है, इसलिए सावधान हो कर श्यामसुंदर का स्मरण करो।
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज.

अति दुर्लभ श्रीकृष्ण-लीला 🙏🏻एक बार नंदनंदन श्रीकृष्ण माखन-चोरी की लीला कर रहे थे। उसी समय उनकी धोती ढीली हो गई। लीला की ...
05/08/2026

अति दुर्लभ श्रीकृष्ण-लीला 🙏🏻

एक बार नंदनंदन श्रीकृष्ण माखन-चोरी की लीला कर रहे थे। उसी समय उनकी धोती ढीली हो गई। लीला की मर्यादा की रक्षा हेतु भगवान के दो अतिरिक्त दिव्य भुजाएँ प्रकट हुईं और उन्होंने स्वयं अपनी धोती संभाल ली। उस क्षण भगवान ने अपने प्रिय भक्त को क्षणभर के लिए चतुर्भुज स्वरूप का दर्शन कराया।

इन दुर्लभ दिव्य दर्शनों का सौभाग्य केवल श्री कुम्भनदास जी को प्राप्त हुआ।

कहा जाता है कि बाद में जब श्री कुम्भनदास जी के यहाँ पुत्र का जन्म हुआ, तब उन्होंने उस दिव्य लीला की स्मृति में उसका नाम श्री चतुर्भुजदास जी रखा।

संदर्भ: चौरासी वैष्णवों की वार्ता (श्री वल्लभ सम्प्रदाय की वार्ता-परंपरा)

श्रीकृष्ण की लीलाएँ बुद्धि से नहीं, कृपा से प्रकट होती हैं।

जय श्रीकृष्ण। जय श्रीनाथजी। 🙏🏻

भक्ति में भगवान को पाना नहीं, स्वयं को खो देना होता हैमनुष्य सामान्यतः यह सोचता है कि भक्ति का उद्देश्य भगवान को प्राप्त...
03/08/2026

भक्ति में भगवान को पाना नहीं, स्वयं को खो देना होता है

मनुष्य सामान्यतः यह सोचता है कि भक्ति का उद्देश्य भगवान को प्राप्त करना है। परन्तु जब शास्त्रों और संतों की वाणी को ध्यान से पढ़ा जाता है, तब ज्ञात होता है कि भगवान कहीं दूर नहीं हैं जिन्हें जाकर प्राप्त करना पड़े। वे तो प्रत्येक जीव के हृदय में साक्षी रूप से सदैव विद्यमान हैं। बदलने की आवश्यकता भगवान को नहीं, हमारे अन्तःकरण को है।

समस्या यह नहीं कि भगवान हमसे दूर हैं; समस्या यह है कि हमारा मन अपने ही अहंकार, इच्छाओं और अपेक्षाओं के शोर में इतना उलझा हुआ है कि भगवान की मौन उपस्थिति को अनुभव नहीं कर पाता।

इसी कारण भक्ति का वास्तविक प्रयत्न भगवान को बुलाना नहीं, बल्कि अपने भीतर की उन परतों को हटाना है जो उनके अनुभव में बाधा बनती हैं। जैसे धूल से ढका दर्पण चेहरा नहीं दिखा पाता, वैसे ही कामना, क्रोध, लोभ और अहंकार से ढका हृदय भगवान के सान्निध्य का अनुभव नहीं कर पाता।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं—

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो... (गीता 15.15)

अर्थात् "मैं सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ।"

यदि भगवान पहले से ही हृदय में स्थित हैं, तो फिर भक्ति किसलिए?

उत्तर यह है कि भक्ति भगवान को हमारे पास नहीं लाती; भक्ति हमें भगवान के निकट ले आती है। दूरी स्थान की नहीं, चेतना की होती है।

गौड़ीय वैष्णव आचार्य कहते हैं कि शुद्ध भक्ति का अर्थ है—भगवान से कुछ लेने की इच्छा नहीं, बल्कि स्वयं को उनके चरणों में समर्पित कर देना। जब "मैं" और "मेरा" का आग्रह कम होने लगता है, तब "तुम" और "तुम्हारा" का अनुभव प्रकट होने लगता है। यही आत्मसमर्पण भक्ति का हृदय है।

जिस प्रकार नदी समुद्र तक पहुँचकर अपना अलग अस्तित्व बनाए रखने का प्रयास नहीं करती, बल्कि उसी में मिलकर अपनी पूर्णता पाती है, उसी प्रकार जीव भी भगवान में अपने प्रेमपूर्ण समर्पण द्वारा वास्तविक शान्ति प्राप्त करता है। यह नष्ट होना नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करना है।

भक्ति का चरम यही है कि जहाँ अहंकार समाप्त होता है, वहीं प्रेम प्रारम्भ होता है। और जहाँ प्रेम अपने शुद्ध स्वरूप में प्रकट होता है, वहीं भगवान का अनुभव सहज, स्वाभाविक और शाश्वत बन जाता है।

जब साधक बार-बार श्रीकृष्ण के वेणु-वादन, कमल-नयन, मोरपंख, श्यामसुन्दर रूप और उनकी वृन्दावन-लीलाओं का श्रद्धापूर्वक श्रवण,...
01/08/2026

जब साधक बार-बार श्रीकृष्ण के वेणु-वादन, कमल-नयन, मोरपंख, श्यामसुन्दर रूप और उनकी वृन्दावन-लीलाओं का श्रद्धापूर्वक श्रवण, कीर्तन और स्मरण करता है, तब उसके हृदय में एक सूक्ष्म आध्यात्मिक परिवर्तन प्रारम्भ होता है।

प्रारम्भ में मन चंचल रहता है और बार-बार संसार की ओर भागता है, क्योंकि उसने अनादि काल से विषयों का ही अभ्यास किया है। परन्तु भगवान के दिव्य नाम, रूप, गुण और लीला का निरन्तर चिन्तन मन को एक नया, अधिक उच्च और शुद्ध आस्वाद प्रदान करता है। तब वही मन, जो पहले इन्द्रिय-विषयों में सुख खोजता था, धीरे-धीरे भगवान के माधुर्य में आनन्द अनुभव करने लगता है।

भगवान कहते हैं—

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥

अर्थात् केवल बाहरी त्याग से विषयासक्ति समाप्त नहीं होती; जब जीव को उससे श्रेष्ठ दिव्य रस का अनुभव होता है, तब विषयों का आकर्षण अपने-आप क्षीण होने लगता है।

इसी सत्य को गौड़ीय वैष्णव आचार्य "उच्चतर रस द्वारा निम्नतर रस का परित्याग" कहते हैं। श्रीकृष्ण की बाँसुरी केवल एक वाद्य नहीं है; वह जीवात्मा के लिए भगवान का प्रेमपूर्ण आह्वान है। उनका मोरपंख केवल अलंकार नहीं, बल्कि उनके सहज, मधुर और निकटस्थ स्वरूप का प्रतीक है। उनके कमल-नयन केवल सौन्दर्य का वर्णन नहीं, बल्कि उनकी असीम करुणा का प्रकाश हैं। उनका श्यामसुन्दर रूप केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि आत्मा के प्रेम का शाश्वत आश्रय है।

जब यह स्मरण शुद्ध भक्ति के साथ किया जाता है, तब मन को संसार से जबरन हटाना नहीं पड़ता। जैसे सूर्योदय होते ही अन्धकार स्वयं हट जाता है, वैसे ही भगवान के रूप-माधुर्य का प्रकाश हृदय में उदित होने पर संसार के क्षणभंगुर आकर्षण स्वतः फीके पड़ने लगते हैं।

इसलिए भक्ति का उद्देश्य केवल संसार का त्याग करना नहीं है, बल्कि श्रीकृष्ण के प्रति ऐसा प्रेम जागृत करना है कि संसार की आसक्ति स्वाभाविक रूप से समाप्त हो जाए। भगवान का दिव्य माधुर्य ही जीव के चंचल मन को अपने शाश्वत आश्रय की ओर आकर्षित करता है।

🌕  #गुरु_पूर्णिमा का पावन संदेश 🌕गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि गुरु-तत्त्व के प्रति श्रद्धा, समर्पण और कृतज्ञता...
29/07/2026

🌕 #गुरु_पूर्णिमा का पावन संदेश 🌕

गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि गुरु-तत्त्व के प्रति श्रद्धा, समर्पण और कृतज्ञता का उत्सव है।

सनातन धर्म में गुरु को अज्ञानरूपी अंधकार से ज्ञानरूपी प्रकाश की ओर ले जाने वाला माना गया है। वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत, रामचरितमानस तथा अनेक संत-महात्माओं ने गुरु की महिमा का गुणगान किया है।

गोस्वामी तुलसीदास जी श्रीरामचरितमानस (बालकाण्ड) में कहते हैं—

गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई।
जौं बिरंचि संकर सम होई॥

भावार्थ: चाहे कोई ब्रह्मा या भगवान शंकर के समान महान क्यों न हो, गुरु के बिना संसार-सागर से पार होना अत्यंत कठिन है।

तुलसीदास जी आगे गुरु को भगवान के स्वरूप के रूप में प्रणाम करते हुए लिखते हैं—

बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रविकर निकर॥

भावार्थ: मैं उन गुरु के चरणकमलों की वंदना करता हूँ, जो कृपा के सागर हैं और मनुष्य रूप में भगवान के प्रतिनिधि हैं। उनके वचन सूर्य की किरणों के समान अज्ञानरूपी अंधकार का नाश कर देते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता (10.25) में कहते हैं—

यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि।

अर्थात् समस्त यज्ञों में जपयज्ञ मेरा स्वरूप है।

श्रीमद्भागवत (11.17.27) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

आचार्यं मां विजानीयान् नावमन्येत कर्हिचित्।
न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरुः॥

भावार्थ: आचार्य (सद्गुरु) को मेरा स्वरूप समझना चाहिए। उन्हें साधारण मनुष्य नहीं मानना चाहिए, क्योंकि गुरु समस्त देवताओं का स्वरूप हैं।

संत कबीरदास जी कहते हैं—

तीरथ गए तो एक फल, संत मिले फल चार।
सद्गुरु मिले तो अनन्त फल, कहे कबीर विचार॥

गुरु केवल ज्ञान देने वाले नहीं, बल्कि जीवन को धर्म, भक्ति, विवेक और आत्मबोध की दिशा देने वाले पथप्रदर्शक हैं। केवल गुरु का सम्मान करना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उनके उपदेशों को जीवन में उतारना ही सच्ची गुरु-भक्ति है।

भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता (18.66) में अर्जुन से कहते हैं—

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

भावार्थ: सभी प्रकार के आश्रयों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा; शोक मत करो।

आइए, इस गुरु पूर्णिमा पर हम अपने गुरुजनों के प्रति श्रद्धा, सेवा और समर्पण का संकल्प लें तथा उनके बताए हुए मार्ग पर चलकर अपने जीवन को सार्थक बनाएँ।

॥ श्री गुरुभ्यो नमः ॥
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
🌼 आप सभी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ। 🌼

युगलवर, झूलें कुंज मझार।श्री वृषभानुदुलारी प्यारी, प्रियतम नंदकुमार।बह्यो जात रस–सुधा–माधुरी, छवि-निधि–सिंधु अपार।मृदु म...
27/07/2026

युगलवर, झूलें कुंज मझार।
श्री वृषभानुदुलारी प्यारी, प्रियतम नंदकुमार।
बह्यो जात रस–सुधा–माधुरी, छवि-निधि–सिंधु अपार।
मृदु मुसकात, झूमि झुकि झूलत, जनु दोउ रूप सिँगार।
बिनु वानी बतरात परस्पर, दुहुँन दृगन दृग डार।
कहि न जात बड़भाग विटप को, बड़भागिनि वह डार।
जो निज गल बंधन दै झुलवति, युगल–नवल–सरकार।
होत मगन दोउ यमुना जल बिच, निज प्रतिबिंब निहार।
लली लाल के या झूलन पर, हम ‘कृपाल’ बलिहार।।

भावार्थ:- लाड़िली–लाल युगल–सरकार झूला झूल रहे हैं। श्री वृषभानु की बेटी एवं नंद के लाल दोनों ही दिव्य प्रेमरस के अमृत को बरसा रहे हैं। दोनों मधुर मुस्कान के साथ झूमते हुए झुक– झुककर झूल रहे हैं, मानो रूप और श्रृंगार साक्षात् स्वरूप धारण करके आये हों। बिना वाणी के ही आँखों–में–आँखें डालकर संकेत से ही परस्पर बातें करते हैं। उस वृक्ष एवं उस डाली के भाग्य की सराहना भला कौन कर सकता है जो अपने गले में फाँसी डालकर प्रिया–प्रियतम को झुला रही हैं। दोनों ही झूलते हुए यमुना के जल में परस्पर अपनी–अपनी परछाई देखकर अत्यन्त ही आनन्द–विभोर हो रहे हैं। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि लाड़िली लाल की इस मधुर झूला–लीला की मैं बार–बार बलैया लेता हूँ।

#श्री_कृपालुजी_महाराज

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