06/07/2023
जयगुरूदेव प्रेमियों।
आज संगत की हालात पर कुछ बात करने आया हूं।
इस दिल के टसन का जज़्बात रखने आया हूं।
ये उदासी का आलम क्या तेरी तरफ नहीं है मेरे दोस्त
बिखरने पर तुमसे कुछ सवालात करने आया हूं।।
परम पूज्य बाबा जयगुरूदेव जी महाराज ने एक कहानी सुनाई है; शिकार की तलाश मे एक राजा जंगल की ओर जा रहा था , साथ मे उसका प्रिय सलाहकार मंत्री भी मौजूद था ! जंगल के एक ओर घास-फूस की एक झोपड़ी बनी थी, जहाँ एक महात्मा जी संसारी वैभव को त्याग कर, राम-नाम की लौ मे ध्यान-मग्न थे ! उनके चेहरे का तेज अनायास ही राजा को अपनी ओर खींच रहा था ! राजा उनकी ओर चल पड़ा ! पहुँचकर दंड-वत प्रणाम किया! महात्मा जी की मुद्रा भंग हुई, और बड़े प्यार से पूछा, राजन..,इतने सुनसान और वीरान जंगल में तुम यहाँ कैसे..? राजा ने कहा, शिकार की तलाश मे इधर से गुजर रहा था, तभी...!! सुनो राजन.., महात्मा जी उसकी बात बीच में ही काटते हुए बोल पड़े, जीव-हत्या पाप है,इस घिनौने कृत की सज़ा भगवान कभी माफ़ नही करता ! राजा अपराध मुद्रा में हाथ जोड़कर खड़ा हो गया, और प्रार्थना किया कि आप तो भूत-भविष्य और वर्तमान सबकी खबर रखते हैं, कृपा कर मेरे जीवन में होने वाली घटनाओं के बारे मे मुझे अवगत करा दीजिए, जिससे मैं सावधान रहूं..! ध्यान से सुनो राजन.., मैं सबका हित चाहता हूँ,मैं यह अच्छी तरह से जानता हूँ कि तुम आने वाले कल में मेरी बात को नज़र अंदाज कर दोगे, पर मैं तुझे बताऊँगा ज़रूर..., ताकि तुम भविष्य में यह नही कह सकते कि मुझे किसी ने बतलाया नही था !
हे राजन, तुम अब कभी शिकार करने इस जंगल में मत आना,लेकिन तुम आओगे ज़रूर..! अगर जंगल में आ भी गये तो एक बहुत ही खुशनुमा घोड़ा मिलेगा, उसे अपने राज्य मे मत ले जाना, लेकिन तुम ले जाओगे ज़रूर..! अगर अपने राज्य में ले भी गये तो उसकी सवारी मत करना, लेकिन तुम करोगे ज़रूर..! अगर उस खुशनुमा घोड़े की सवारी भी कर लिया तो किसी अन्य राज्य के सीमा मे मत जाना, लेकिन तुम जाओगे ज़रूर.., अगर तुम दूसरे राज्य मे चले भी गये तो किसी राजकुमारी से विवाह मत करना, लेकिन तुम करोगे ज़रूर.., और राजन वही आपकी मौत लिखी है, यह महात्मा जी का उत्तर था ! राजा महात्मा जी का शुक्रिया कर वापस अपने महल में आ गया !
धीरे-धीरे समय बीतता चला गया ! एक दिन मंत्री ने राजा से कहा, महाराज जंगल की सैर को बहुत दिन हो गये, दिन भर राजमहल में आपका दम नही घुटता..? राजा ने कहा , तुम्हे याद नहीं उस महात्मा ने क्या कहा था ! मंत्री ने कहा, महाराज उन्होने तो कहा था की शिकार करने मत जाना, ऐसा थोड़े न कहा था की जंगल मे मत जाना ! राजा सोच मे पड़ गया.., मंत्री ठीक ही तो कह रहा है..! वह मंत्री के साथ जंगल की ओर निकल पड़ा ! जंगल मे उसे एक बहुत ही खुशनुमा घोड़ा दिखाई दिया ! मंत्री ने कहा, महाराज देखो यह कितना सुंदर, कितना खुशनुमा घोड़ा है, इसे अपने राज्य मे ले चलो, यह अपने राज्य की शोभा को चार चाँद लगा देगा ! राजा ने कहा, अरे नही, नहीं.., तुम्हे याद नही उस महात्मा जी ने क्या कहा था..? मंत्री ने कहा, महाराज उन्होने यह कहा था कि अगर अपने राज्य में लेकर इसे चले भी गये तो इसकी सवारी मत करना ! राजा ने कहा, बात तो तुम सही ही कह रहे हो ! राजा उस घोड़े को पकड़ कर अपने राज्य के अस्तबल में बाँध दिया ! कुछ दिनों बाद, पड़ोसी मुल्क ने इस पर आक्रमण कर दिया ! राजा के सारे सिपाही युद्ध मे मारे जा चुके थे ! जीतने भी हाथी-घोड़े थे पड़ोसी मुल्क के राजा युद्ध में जीतता जा रहा था ! एक वही खुशनुमा घोड़ा शेष रह गया था ! मंत्री ने कहा, देखते क्या हो राजन, सिर पे मौत मंडरा रही है, जल्दी से इस घोड़े पे बैठकर निकल पड़ो ! राजा हरेक बार की तरह इस बार भी बोल पड़ा क्या तुम्हे यह पता नही कि महात्मा जी ने कहा था की इसकी सवारी मत करना..? मंत्री ने समझाया , महाराज उन्होने तो यह कहा था कि किसी दूसरे राज्य की सीमा में मत जाना ! राजा जैसे ही उस घोड़े पे बैठा, वह खुशनुमा घोड़ा दुश्मनों को चीरता हुआ, दो-दो राजाओं की सीमा को लाँघता हुआ एक अन्य राज्य की सीमा में जा घुसा ! वहाँ का राजा उसे सम्मान सहित अपने राज्य महल में ले गया ! उस राजा की इकलौती औलाद एक राजकुमारी थी, जिसका दिल इस राजा पर आ गया और इसने शादी का प्रस्ताव रखा ! काम मे वशीभूत राजा ने उस राजकुमारी से विवाह कर लिया, वह काम के इतना वशीभूत हो चुका था की उसे ध्यान ही नही रहा कि महात्मा जी ने क्या कहा था..? जिस राजाओं की सीमा को लाँघता हुआ यह इस राज्य की सीमा मे आया था, उन दोनो ने इस पर आक्रमण कर दिया और वहीं पर उसकी मृत्यु हो जाती है...!
अब इस कहानी के तथ्यों पर हम प्रकाश डालना चाहेंगे..! वर्तमान स्थिति में उस राजा का किरदार हम और आप निभा रहे हैं, और मंत्री की भूमिका में, ये गद्दी पर बैठे महाराज लोग हैं। बाबा जी ने कहा कि "बच्चों यह सूरज जो पूरब में उगता है, कोई कहे कि पश्चिम मे निकलने लगा है, तो इसे मान लेना, लेकिन मेरी एक भी बात इधर से उधर नही होने वाली ! मैं परिवर्तन करने आया हूँ और इसे पूरा करके ही जाऊँगा, चाहे मुझे चार सौ साल तक क्यों न रहना पड़े..!" अब उपर्युक्त कहानी के पात्र में जो मंत्री था और आज जो महाराज बने घूम रहे हैं, हमें आपको भ्रमित करने में लगे हैं। कुछ महाराजोें ने कह दिया कि अरे बाबा जी ने ऐसा थोड़े ही कहा था कि मैं इसी शरीर में चार सौ वर्ष रहूंगा। यह देखो वसीयत, मेरे नाम गद्दी कर गए। यह देखो वसीरतगंज की वीडियो, मुझे नाम पॉवर दे गए। अब हम आप उस राजा की तरह दिमाग लगाते हैं कि अरे हां ! बात तो ये सही कह रहे हैं। फिर हममें से कुछ लोग गुरु महाराज की बात भूल कर इन महाराजों की बातों में आ जाते हैं। किसी ने कह दिया कि हमारे सपने में गुरु महाराज आए और बोले कि बच्चू अब टाट उतार दो। हम इनके सपनों की बात पर विश्वास तो कर लेते हैं , पर गुरु महाराज की कही बात कि "जो टाट उतार दे उस पर भूल कर भी कभी भरोसा मत करना" उस राजा की तरह इन मंत्रियों की बातों में आ कर भूल जाते हैं।
एक महाराज जी को मौका मिला तो वह जिंदा मुर्दा का खेल शुरू कर दिया, क्योंकि संगत का एक बहुत बड़ा तबका गुरु महाराज को हाजिर नाजिर समझने वाले थे। इस महाराज ने गुरु महाराज की ऐसी नकल करी, और कहा कि कौआ कौआ की बोली को पहचान लेता है तुम कैसे हो कि अपने गुरु की आवाज़ नहीं पहचान पा रहे हो? फिर क्या था? कुछ हाजिर नाजिर वालों का भटकाव इनके पास भी हो गया। हम गुरु महाराज के उन वचनों को भूल गए , जो हमें पढ़ाया गया था कि "बच्चों ! मै उसी रूप में मिलूंगा। यहां भी और वहां भी। यदि किसी और रूप में आ गया तो तुम हमें पहचानोगे कैसे..?
अब तक चौथा वाला महाराज भी जाल लेकर तैयार खड़ा था। जो मछलियां ऊपर के तीन लहरों को छलांग लगा चुकी थी, उसे भ्रम के जाल में उलझाने को आतुर था। यह महाराज अच्छी तरह जानता था कि गुरु बन कर मेरे बनाए भ्रम के जाल में फांसना इन्हें मुश्किल है। इसलिए इसने खुद को गुरु के चरणों की धूल कहा। और फिर धीरे से राधा स्वामी दयाल बन कर , प्रेमियों को, गुरु महाराज की दया और दुआ से दूर कर दिया। जब कभी इस महाराज के भाषणों पर नजर चल जाती है तो अब तो ये यहां तक कहने लगे हैं कि जब कोई तुम्हारा साथ न दे, तुम्हारे कंधे पर कोई हाथ न दे, मुझे पुकारना, मैं तुम्हारी मदद करूंगा। इनके कार्यक्रमों में बाबा जयगुरूदेव जी दयाल की दया हो के उद्घोषणा की जगह सदगुरु श्री दयाल की दया हो के नारे सुनने को मिलते हैं। जबकि गुरु महाराज ने कहा कि बच्चा जिसने तुम्हें नामदान दिया है, सिर्फ वही तुम्हारी संभाल कर सकता है। कोई दूसरा तुम्हारी कुछ भी मदद नहीं कर सकता । तुम हमको देखना, मैं तुमको देख रहा हूं, हम दोनों के बीच किसी तीसरे को खड़ा कर दिया तो धोखा हो जाएगा।
अब आप दिमाग लगाते रहो उस राजा की तरह। और भ्रमित होते रहिए उस मंत्री के द्वारा। उस महात्मा जी ने तो साफ साफ बता दिया कि, " 'देखो बच्चों, रहना तुम होशियार, ठगों ने आन बिछाया जाल'। तुम बहुत संभल कर रहना। आगे ये संगत सैलाब का रूप लेगी, फिर कटनी होगी फिर छटनी होगी ! यदि नहीं माने तो चटनी भी होगी। पहले हथौड़ा चलेगा, यदि नहीं संभले तो घन चलेगा, और फिर तुम्हारा कचूमर निकल जाएगा। तुम मेरे खेल को देख कर भ्रमित मत हो जाना, ऐसा चमत्कार होगा की विश्व के लोग नमस्कार करेंगे। जो मुठ्ठी भर लोग बचेंगे, परिवर्तन उन्ही लोगों के द्वारा करा दिया जाएगा,.., अब आप दिमाग़ लगाते रहो उस राजा की तरह..., और भ्रमित होते रहिए उन मंत्रियों के द्वारा। मर्जी आपकी है।
सादर जयगुरूदेव🙏