01/08/2026
|| कर्म और भाग्य ||
मनुष्य के जीवन में कर्म और भाग्य, दोनों का अपना-अपना स्थान है।
भाग्य हमें परिस्थितियाँ देता है, पर कर्म उन परिस्थितियों का परिणाम निर्धारित करता है।
जो केवल भाग्य के भरोसे बैठ जाता है, वह अवसर खो देता है।
और जो केवल अपने अहंकार में कर्म करता है, वह ईश्वर की कृपा का महत्व भूल जाता है।
इसलिए जीवन का मार्ग है—पुरुषार्थ और परमात्मा, दोनों का संतुलन।
शास्त्रों में कहा गया है कि वर्तमान का कर्म ही भविष्य का भाग्य बनता है।
आज का परिश्रम, आज की साधना, आज का संयम और आज की सत्यनिष्ठा ही आने वाले समय का आधार बनते हैं।
यदि किसान बीज ही न बोए, तो केवल वर्षा होने से खेत नहीं लहलहाते।
यदि विद्यार्थी अध्ययन न करे, तो केवल शुभ मुहूर्त सफलता नहीं दिला सकता।
यदि मनुष्य अपने स्वभाव को न सुधारे, तो केवल उपायों से जीवन में स्थायी परिवर्तन नहीं आता।
इसी प्रकार केवल कर्म करते हुए ईश्वर को भूल जाना भी उचित नहीं।
जब कर्म में श्रद्धा जुड़ती है, तब वह साधना बन जाता है।
जब परिश्रम में प्रार्थना जुड़ती है, तब वह पुण्य बन जाता है।
और जब सफलता में विनम्रता जुड़ती है, तब वह ईश्वर की कृपा का अनुभव बन जाती है।
अतः भाग्य को दोष देने से पहले अपने कर्मों का निरीक्षण करना चाहिए।
अपने विचारों को शुद्ध करें।
अपनी वाणी को संयमित करें।
अपने कर्मों को धर्म के अनुसार रखें।
और प्रत्येक कार्य का आरंभ ईश्वर-स्मरण से करें।
समय अवश्य बदलता है।
परंतु समय से पहले मनुष्य को स्वयं बदलना पड़ता है।
यही परिवर्तन भविष्य के भाग्य का निर्माण करता है।
इसलिए भाग्य की प्रतीक्षा मत कीजिए।
श्रेष्ठ कर्म कीजिए, धर्म का पालन कीजिए, ईश्वर पर विश्वास रखिए और धैर्यपूर्वक आगे बढ़िए।
निश्चित ही उचित समय पर कर्म का शुभ फल प्राप्त होगा।
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॥ ज्ञान-वाणी ॥
आचार्य श्री मनुज देव भारद्वाज जी
जीवन-पुस्तक से
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