श्री ब्रह्मर्षि पराशर

  • Home
  • India
  • Mandi
  • श्री ब्रह्मर्षि पराशर

श्री ब्रह्मर्षि पराशर ॥ पराशृणाति पापानीति पराशरः॥
(1)

■ श्रीपराशराचार्याष्टकम् (श्री पराशर अष्टकम्)● वेदव्यास के पिता, विष्णु पुराण के रचयिता, महर्षि वशिष्ठ के कुल में उत्पन्...
19/06/2026

■ श्रीपराशराचार्याष्टकम् (श्री पराशर अष्टकम्)

● वेदव्यास के पिता, विष्णु पुराण के रचयिता, महर्षि वशिष्ठ के कुल में उत्पन्न और शक्ति मुनि के पुत्र — महर्षि पराशर भगवान विष्णु के परम भक्त, तपस्वी, ब्रह्मनिष्ठ और लोककल्याणकारी महान ऋषि थे। उनकी कृपा और ज्ञान से आज भी हम वेद-पुराणों का अमृत प्राप्त कर रहे हैं।

● इसी दिव्य महर्षि की स्तुति में रचित यह श्रीपराशराचार्याष्टकम् अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली है। इसमें महर्षि पराशर के तप, तेज, ज्ञान, भक्ति और वैराग्य के दिव्य गुणों का सुंदर वर्णन किया गया है।

● जो भक्त श्रद्धा और प्रेम से इसका नियमित पाठ करता है, उसे भगवान विष्णु की अटूट भक्ति प्राप्त होती है।

👉 आइए, हम सभी इस पावन अष्टकम के माध्यम से महर्षि पराशर ऋषि के चरणों में अपना शीश नवाते हैं।

■ श्रीपराशराचार्याष्टकम्...✍️

वशिष्ठकुलसम्भूतं शक्तेः पुत्रं महात्मनः ।
व्यासतातं मुनीन्द्रं तं पराशरमहं भजे ॥१॥

श्रीसेवितपादाम्भोजं सर्वदिक्षु प्रथितं परम् ।
विष्णुपुराणवक्तारं प्रियंवदं पराशरमहं भजे ॥२॥

तपोराशिं महातेजं ब्रह्मनिष्ठं जितेन्द्रियम् ।
तरुणादित्यसन्निभं पराशरमहं भजे ॥३॥

वेदान्तविदां वरिष्ठानां वन्दितं महामते ।
मुनिश्रेष्ठं दयासिन्धुं पराशरमहं भजे ॥४॥

सर्वशाखार्थसम्पन्नं शुभदं लोकपावनम् ।
शाश्वतधर्मगोप्तारं पराशरमहं भजे ॥५॥

लोकानुग्रहकर्तारं सागरधीरचेतसं ।
भवबन्धविमोचकं तं पराशरमहं भजे ॥६॥

ज्ञानभक्तिविरागार्णवपूर्णचन्द्रोपमं विभुम् ।
वैष्णवाग्र्यं पराशराचार्यं भजाम्यहं भक्तितः ॥७॥

इत्यष्टकमिदं पुण्यं पराशरमुनेः शुभम् ।
यः पठेच्छ्रद्धया युक्तो विष्णुभक्तिं स विन्दति ॥८॥

- वैदिक संग्रह

#अर्थात - जो वशिष्ठ ऋषि के कुल में उत्पन्न हुए हैं, जो महात्मा शक्ति के पुत्र हैं और जो वेदव्यास के पिता हैं — ऐसे मुनीन्द्र (मुनियों में श्रेष्ठ) पराशर को मैं भक्ति सहित प्रणाम करता हूँ। ॥१॥

जिनके चरणकमल लक्ष्मी जी द्वारा सेवित हैं, जो सभी दिशाओं में विख्यात हैं, विष्णु पुराण के प्रवक्ता और प्रिय वचन बोलने वाले हैं — ऐसे पराशर मुनि को मैं भक्ति सहित प्रणाम करता हूँ। ॥२॥

जो तपस्या के महान भंडार हैं, अत्यन्त तेजस्वी हैं, ब्रह्म में निष्ठा रखने वाले, इन्द्रियों को जीतने वाले और तरुण सूर्य के समान तेज वाले हैं — ऐसे पराशर मुनि को मैं भक्ति सहित प्रणाम करता हूँ। ॥३॥

जो वेदान्त के श्रेष्ठ विद्वानों द्वारा वन्दित हैं, महान बुद्धि वाले और दया के सागर हैं — ऐसे मुनिश्रेष्ठ पराशर को मैं भक्ति सहित प्रणाम करता हूँ। ॥४॥

जो सभी शाखाओं (वेदों) के अर्थों में सम्पन्न हैं, शुभ देने वाले, लोक को पवित्र करने वाले और शाश्वत धर्म के रक्षक हैं — ऐसे पराशर मुनि को मैं भक्ति सहित प्रणाम करता हूँ। ॥५॥

जो लोकों पर अनुग्रह करने वाले हैं, जिनका चित्त समुद्र के समान गम्भीर और धीर है, तथा संसार-बन्धन से मुक्त करने वाले हैं — ऐसे पराशर मुनि को मैं भक्ति सहित प्रणाम करता हूँ। ॥६॥

जो ज्ञान, भक्ति और वैराग्य रूपी महासागर के समान पूर्णचन्द्रमा जैसे तेजस्वी और सर्वव्यापी हैं, तथा वैष्णवों में श्रेष्ठ आचार्य हैं — ऐसे आचार्य पराशर को मैं भक्ति सहित प्रणाम करता हूँ। ॥७॥

यह पवित्र और शुभ पराशर मुनि का अष्टक है। जो श्रद्धा युक्त होकर इसका पाठ करता है, वह विष्णु भक्ति प्राप्त करता है। ॥८॥

■ समापन

● यह पवित्र अष्टकम महर्षि पराशर ऋषि की महिमा का सुंदर दर्पण है। इसमें वर्णित प्रत्येक श्लोक उनके दिव्य स्वरूप को हमारे हृदय में स्थापित करता है।

● जो कोई भी श्रद्धापूर्वक, एकाग्रचित्त होकर इसका पाठ करेगा, उसे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होगी, ज्ञान-भक्ति-वैराग्य की वृद्धि होगी और संसार के बंधनों से मुक्ति का मार्ग सुगम होगा।

👉 पराशर ऋषि की कृपा सर्वदा हमारे ऊपर बनी रहे।

🌻जय पराशर ऋषि🌻

With श्री शुकदेव ऋषि - शुक महर्षि – I just got recognised as one of their top fans! 🎉
19/06/2026

With श्री शुकदेव ऋषि - शुक महर्षि – I just got recognised as one of their top fans! 🎉

13/06/2026

■ #श्री_शुकदेव_ऋषि_षट्कम् (ष्टश्लोकि), #श्री_शुकदेव_ऋषि_अष्टकम् (अष्टश्लोकि), #श्री_शुकदेव_ऋषि_मङ्गलम् (ष्टश्लोकि)

★ परिचय-

◆ सनातन वैदिक परम्परा में परम वैराग्य, ब्रह्मज्ञान और भगवद्भक्ति के अद्वितीय प्रतीक महर्षि श्री शुकदेव जी का स्थान अत्यन्त गौरवपूर्ण है। वे भगवान् वेदव्यास के दिव्य पुत्र, श्रीमद्भागवत महापुराण के महान् प्रवक्ता तथा राजा परीक्षित के परम हितैषी एवं उद्धारक माने जाते हैं। उनका जीवन संसार के समस्त साधकों के लिए ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का अनुपम आदर्श प्रस्तुत करता है।

◆ प्रस्तुत “ #श्रीशुकाचार्यषट्कम्”, “ #श्रीशुकाचार्याष्टकम्” तथा “ #श्रीशुकाचार्यमङ्गलम्” में जगद्गुरु श्री शुकदेव ऋषि - शुक महर्षि के दिव्य गुणों, आध्यात्मिक महिमा, भगवद्भक्ति, ब्रह्मविद्या में उनकी प्रखर निपुणता तथा लोककल्याणकारी स्वरूप का भावपूर्ण वर्णन किया गया है। इन स्तुतियों का श्रद्धापूर्वक पाठ एवं मनन साधक के अन्तःकरण में ज्ञान, वैराग्य, भक्ति और शान्ति का संचार करता है तथा उसे परम सत्य की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा प्रदान करता है।

■ #श्रीशुकाचार्यषट्कम् (श्री शुकदेव ऋषि षट्कम्)

★ व्यासपुत्रमहं वन्दे शुकाचार्य जगदगरुम् ...✍️

भूपं परमहंसानां ज्ञानवैराग्यशालिनाम् ।
व्यासपुत्रमहं वन्दे शुकाचार्य जगदगरुम् ॥१॥

व्यासशिष्यं च बोधाब्धेर्बोधायनस्य सद्गुरुम्
व्यासपुत्रमहं वन्दे शुकाचार्य जगद्‌गुरुम् ॥२॥

श्रीरामस्तावकं श्रीमद्रामभक्तशिरोमणिम् ।
व्यासपुत्रमहं वन्दे शुकाचार्य जगद्‌गुरुम् ॥३॥

भागवतप्रवक्तारं ब्रह्मविद्याविशारदम् ।
व्यासपुत्रमहं वन्दे शुकाचार्य जगद्‌गुरुम् ॥४॥

परीक्षिद्भूपतेश्चाथ तारकं शोकवारिधेः ।
व्यासपुत्रमहं वन्दे शुकाचार्य जगद्‌गुरुम् ॥५॥

विशिष्टाद्वैतसिद्धान्तपोषकं शांतिभूषितम् ।
व्यासपुत्रमहं वन्दे शुकाचार्य जगद्‌गुरुम् ॥६॥

#अर्थात — जो ज्ञान और वैराग्य से सम्पन्न परमहंसों में श्रेष्ठ (राजा के समान) हैं, ऐसे व्यासपुत्र तथा समस्त जगत् के गुरु श्रीशुकाचार्य
(श्री शुकदेव ऋषि) को मैं वन्दन करता हूँ। ॥१॥

जो भगवान वेदव्यास के शिष्य हैं तथा ज्ञान-सागर समान बोधायन के सद्गुरु हैं, ऐसे व्यासपुत्र एवं जगद्गुरु श्रीशुकाचार्य (श्री शुकदेव ऋषि) को मैं वन्दन करता हूँ। ॥२॥

जो भगवान श्रीराम की स्तुति करने वाले तथा श्रीरामभक्तों में शिरोमणि (सर्वश्रेष्ठ) हैं, ऐसे व्यासपुत्र और सम्पूर्ण जगत् के गुरु श्रीशुकाचार्य (श्री शुकदेव ऋषि) को मैं वन्दन करता हूँ। ॥३॥

जो श्रीमद्भागवत के महान् प्रवक्ता तथा ब्रह्मविद्या के प्रकाण्ड विद्वान हैं, ऐसे व्यासपुत्र एवं विश्वगुरु श्रीशुकाचार्य (श्री शुकदेव ऋषि) को मैं वन्दन करता हूँ। ॥४॥

जिन्होंने राजा परीक्षित को शोकरूपी महासागर से पार उतारा (उनका उद्धार किया), ऐसे व्यासपुत्र तथा समस्त संसार के गुरु श्रीशुकाचार्य (श्री शुकदेव ऋषि) को मैं वन्दन करता हूँ। ॥५॥

जो विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त का पोषण करने वाले तथा शान्ति रूपी गुण से विभूषित हैं, ऐसे व्यासपुत्र एवं जगद्गुरु श्रीशुकाचार्य (श्री शुकदेव ऋषि) को मैं वन्दन करता हूँ। ॥६॥

■ #श्रीशुकाचार्याष्टकम् ( श्री शुकदेव ऋषि अष्टकम्)

★ श्रीमत्परमहंसेन्द्र शुकाचार्य नमामि तम्...✍️

महाभागवतो यश्च व्यासपुत्रो जितेन्द्रियः ।
श्रीमत्परमहंसेन्द्र शुकाचार्य नमामि तम् ॥१॥

जगद्‌गुरुर्गुरुर्यस्य महर्षिर्बादरायणः ।
श्रीमत्परमहंसेन्द्र शुक्राचार्यं नमामि तम् ॥२॥

शिष्यो बोधायनो यस्य वृत्तिकृत् पुरुषोत्तमः ।
श्रीमत्परमहंसेन्द्र शुक्राचार्यं नमामि तम् ॥३॥

विरक्तं यन्मनो रम्भा चालयितुं शशांक न ।
श्रीमत्परमहंसेन्द्र शुकाचार्य नमामि तम् ॥४וו

श्रीरामतारकं दत्त्वा संसारार्णवतारकः ।
श्रीमत्परमहंसेन्द्र शुकाचार्य नमामि तम् ॥५וו

श्रीपरीक्षिन्नृपो येन शोकसिन्धोर्हि तारितः ।
श्रीमत्परमहंसेन्द्र शुकाचार्य नमामि तम् ॥६וו

भागवत्याः कथाया यो महावक्ता मुनीश्वरः।
श्रीमत्परमहंसेन्द्र शुकाचार्य नमामि तम् ॥७וו

यश्च रामपदासक्तो विशिष्टाद्वैततत्त्ववित्।
श्रीमत्परमहंसेन्द्र शुकाचार्य नमामि तम् ॥८וו

#अर्थात — जो महान् भागवत (भगवान के परम भक्त) हैं, जो महर्षि वेदव्यास के पुत्र हैं तथा जिन्होंने अपनी इन्द्रियों को पूर्णतः वश में कर लिया है, ऐसे परमहंसों में श्रेष्ठ श्रीशुकाचार्य (श्री शुकदेव ऋषि) को मैं नमस्कार करता हूँ। ॥१॥

जिनके गुरु स्वयं जगद्विख्यात महर्षि बादरायण (वेदव्यास) हैं, ऐसे परमहंसश्रेष्ठ श्रीशुकाचार्य (श्री शुकदेव ऋषि) को मैं नमस्कार करता हूँ। ॥२॥

जिनके शिष्य महापुरुष बोधायन हैं, जिन्होंने (वेदान्त पर) वृत्ति (भाष्यात्मक व्याख्या) की रचना की, ऐसे परमहंसश्रेष्ठ श्रीशुकाचार्य
(श्री शुकदेव ऋषि) को मैं नमस्कार करता हूँ। ॥३॥

जिनका मन इतना विरक्त था कि अप्सरा रम्भा भी उसे विचलित करने में समर्थ नहीं हो सकी, ऐसे परमहंसों में श्रेष्ठ श्रीशुकाचार्य
(श्री शुकदेव ऋषि) को मैं नमस्कार करता हूँ। ॥४॥

जिन्होंने श्रीराम-तारक मन्त्र (रां रामाय नमः) का उपदेश देकर जीवों को संसाररूपी महासागर से पार उतारने का मार्ग दिखाया, ऐसे परमहंसश्रेष्ठ श्रीशुकाचार्य (श्री शुकदेव ऋषि) को मैं नमस्कार करता हूँ। ॥५॥

जिनके द्वारा राजा परीक्षित को शोक रूपी समुद्र से पार कराया गया, ऐसे परमहंसश्रेष्ठ श्रीशुकाचार्य (श्री शुकदेव ऋषि) को मैं नमस्कार करता हूँ। ॥६॥

जो श्रीमद्भागवत कथा के महान् वक्ता तथा मुनियों में श्रेष्ठ हैं, ऐसे परमहंसश्रेष्ठ श्रीशुकाचार्य (श्री शुकदेव ऋषि) को मैं नमस्कार करता हूँ। ॥७॥

जो भगवान श्रीराम के चरणों में अनन्य अनुराग रखने वाले तथा विशिष्टाद्वैत तत्त्व के ज्ञाता हैं, ऐसे परमहंसों में श्रेष्ठ श्रीशुकाचार्य
(श्री शुकदेव ऋषि) को मैं नमस्कार करता हूँ। ॥८॥

■ #श्रीशुकाचार्यमङ्गलम् (श्री शुकदेव ऋषि मङ्गलम्)

★ जगतो गुरवे श्रीमच्छुकाचार्याय मङ्गलम्...✍️

परमहंसराजाय ज्ञानवैराग्यशालिने।
जगतो गुरवे श्रीमच्छुकाचार्याय मङ्गलम् ॥१॥

स्तावकाय हि रामस्य रामभक्तिमते तथा ।
जगतो गुरवे श्रीमच्छुकाचार्याय मङ्गलम् ॥२॥

श्रीमद्व्यासमहर्षेश्च शिष्याय सूनवे तथा ।
जगतो गुरवे श्रीमच्छुकाचार्याय मङ्गलम् ॥३॥

भागवतप्रवक्त्रे च ब्रह्मविद्याध्यये तथा ।
जगतो पुरवे श्रीमच्छुकाचार्याय मङ्गलम् ॥४॥

विशिष्टाद्वैतसिद्धान्तसाधकाय महर्षये ।
जगतो गुरवे श्रीमच्छुकाचार्याय मङ्गलम् ॥५॥

सिद्धपूजितसिद्धाय रामतारकदायिने ।
जगतो गुरवे श्रीमच्छुकाचार्याय मङ्गलम् ॥६॥

#अर्थात - जो परमहंसों के राजा, ज्ञान और वैराग्य से सम्पन्न हैं — वे जगद्गुरु श्रीमान् शुकाचार्य (श्री शुकदेव ऋषि) सबका मंगल करें। ॥१॥

जो भगवान् श्रीराम के स्तुतिकर्ता तथा महान् रामभक्त हैं — वे जगद्गुरु श्रीमान् शुकाचार्य (श्री शुकदेव ऋषि) सबका मंगल करें। ॥२॥

जो श्रीमद्व्यास महर्षि के शिष्य तथा पुत्र हैं — वे जगद्गुरु श्रीमान् शुकाचार्य (श्री शुकदेव ऋषि) सबका मंगल करें। ॥३॥

जो श्रीमद्भागवत के महान् प्रवक्ता तथा ब्रह्मविद्या के अध्येता और ज्ञाता हैं — वे जगद्गुरु श्रीमान् शुकाचार्य (श्री शुकदेव ऋषि) सबका मंगल करें। ॥४॥

जो विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त के साधक एवं महान् महर्षि हैं — वे जगद्गुरु श्रीमान् शुकाचार्य (श्री शुकदेव ऋषि) सबका मंगल करें। ॥५॥

जो सिद्धपुरुषों द्वारा पूजित, स्वयं सिद्ध तथा श्रीराम-तारक मन्त्र का उपदेश देने वाले हैं — वे जगद्गुरु श्रीमान् शुकाचार्य (श्री शुकदेव ऋषि) सबका मंगल करें। ॥६॥

- #स्तोत्रकुसुमांजलिः

🌺 समापन 🌺

■ परमहंसश्रेष्ठ, ब्रह्मनिष्ठ, भगवत्प्रेमी एवं जगद्गुरु श्री शुकदेव ऋषि की महिमा अनन्त और अवर्णनीय है। उन्होंने श्रीमद्भागवत की अमृतमयी कथा द्वारा असंख्य जीवों का कल्याण किया तथा भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के समन्वित मार्ग का आलोक सम्पूर्ण जगत् में फैलाया। उनका पावन चरित्र आज भी साधकों को आध्यात्मिक जीवन की उच्चतम साधना के लिए प्रेरित करता है।

■ इन स्तोत्रों के माध्यम से हम श्री शुकदेव ऋषि जी के श्रीचरणों में अपनी श्रद्धा और कृतज्ञता अर्पित करते हैं तथा प्रार्थना करते हैं कि वे हम सबके हृदय में भगवद्भक्ति, आत्मज्ञान, सदाचार और शान्ति का दिव्य प्रकाश सदैव प्रज्वलित रखें।

🌻 जय श्री शुकदेव ऋषि🌻

13/06/2026
11/06/2026

■ #श्रीशुकाचार्यषट्कम् (श्री शुकदेव ऋषि षट्कम्)

◆ भगवान #श्री_शुकदेव_ऋषि - #शुक_महर्षि (श्रीशुकाचार्य) भारतीय सनातन परम्परा के उन विलक्षण महापुरुषों में हैं, जिनका जीवन ज्ञान, वैराग्य, भक्ति और करुणा का अद्भुत संगम है। वे भगवान वेदव्यास के परम तेजस्वी पुत्र, श्रीमद्भागवत महापुराण के दिव्य वक्ता तथा असंख्य साधकों के आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शक हैं। उनके श्रीमुख से प्रवाहित भगवद्भक्ति और ब्रह्मविद्या की अमृतधारा ने राजा परीक्षित सहित अनगिनत जीवों का कल्याण किया है।

◆ प्रस्तुत श्रीशुकाचार्यषट्कम् में भगवान श्री शुकदेव ऋषि जी की महिमा का संक्षिप्त किन्तु अत्यन्त भावपूर्ण वर्णन किया गया है। इसमें उनके ज्ञान-वैराग्य, श्रीरामभक्ति, भागवत-प्रवचन, जगद्गुरुत्व तथा विशिष्टाद्वैत-सिद्धान्त के पोषणकर्ता स्वरूप का सुन्दर स्तवन किया गया है। श्रद्धापूर्वक इसका पाठ एवं मनन साधक के हृदय में भगवद्भक्ति, गुरु-निष्ठा तथा आत्मकल्याण की भावना को पुष्ट करता है।

★ श्रीशुकाचार्यषट्कम्

भूपं परमहंसानां ज्ञानवैराग्यशालिनाम् ।
व्यासपुत्रमहं वन्दे शुकाचार्य जगदगरुम् ॥१॥

व्यासशिष्यं च बोधाब्धेर्बोधायनस्य सद्गुरुम्
व्यासपुत्रमहं वन्दे शुकाचार्य जगद्‌गुरुम् ॥२॥

श्रीरामस्तावकं श्रीमद्रामभक्तशिरोमणिम् ।
व्यासपुत्रमहं वन्दे शुकाचार्य जगद्‌गुरुम् ॥३॥

भागवतप्रवक्तारं ब्रह्मविद्याविशारदम् ।
व्यासपुत्रमहं वन्दे शुकाचार्य जगद्‌गुरुम् ॥४॥

परीक्षिद्भूपतेश्चाथ तारकं शोकवारिधेः ।
व्यासपुत्रमहं वन्दे शुकाचार्य जगद्‌गुरुम् ॥५॥

विशिष्टाद्वैतसिद्धान्तपोषकं शांतिभूषितम् ।
व्यासपुत्रमहं वन्दे शुकाचार्य जगद्‌गुरुम् ॥६॥

#अर्थात — जो ज्ञान और वैराग्य से सम्पन्न परमहंसों में श्रेष्ठ (राजा के समान) हैं, ऐसे व्यासपुत्र तथा समस्त जगत् के गुरु 'श्रीशुकाचार्य' को मैं वन्दन करता हूँ। ॥१॥

जो भगवान वेदव्यास के शिष्य हैं तथा ज्ञान-सागर समान बोधायन के सद्गुरु हैं, ऐसे व्यासपुत्र एवं जगद्गुरु 'श्रीशुकाचार्य' को मैं वन्दन करता हूँ। ॥२॥

जो भगवान श्रीराम की स्तुति करने वाले तथा श्रीरामभक्तों में शिरोमणि (सर्वश्रेष्ठ) हैं, ऐसे व्यासपुत्र और सम्पूर्ण जगत् के गुरु 'श्रीशुकाचार्य' को मैं वन्दन करता हूँ। ॥३॥

जो श्रीमद्भागवत के महान् प्रवक्ता तथा ब्रह्मविद्या के प्रकाण्ड विद्वान हैं, ऐसे व्यासपुत्र एवं विश्वगुरु 'श्रीशुकाचार्य' को मैं वन्दन करता हूँ। ॥४॥

जिन्होंने राजा परीक्षित को शोकरूपी महासागर से पार उतारा (उनका उद्धार किया), ऐसे व्यासपुत्र तथा समस्त संसार के गुरु 'श्रीशुकाचार्य' को मैं वन्दन करता हूँ। ॥५॥

जो विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त का पोषण करने वाले तथा शान्ति रूपी गुण से विभूषित हैं, ऐसे व्यासपुत्र एवं जगद्गुरु 'श्रीशुकाचार्य' को मैं वन्दन करता हूँ। ॥६॥

■ समापन

● ऐसे ज्ञान, वैराग्य और भगवद्भक्ति के मूर्तिमान स्वरूप, श्रीव्यासनन्दन, श्रीमद्भागवताचार्य, जगद्गुरु श्री शुकदेव ऋषि - शुक महर्षि (श्रीशुकाचार्य) भगवान की कृपा हम सब पर बनी रहे। वे हमारे हृदय में भगवान् के प्रति अचल प्रेम, सद्गुरु के प्रति अखण्ड श्रद्धा तथा शास्त्रों के प्रति निर्मल अनुराग का संचार करें।

● उनके श्रीचरणों में बारम्बार प्रणाम करते हुए यही प्रार्थना है कि वे हमें भी संसाररूपी शोक-सागर से पार कर भगवद्भक्ति के परम मंगलमय पथ पर अग्रसर करें। 🙏

🌻जय श्री शुकदेव ऋषि 🌻

11/06/2026

■ #श्रीशुकाचार्याष्टकम् ( श्री शुकदेव ऋषि अष्टकम्)

◆ सनातन वैदिक परम्परा में भगवान #श्री_शुकदेव_ऋषि - #शुक_महर्षि (श्रीशुकाचार्य) का नाम ज्ञान, वैराग्य और भगवद्भक्ति की परम ज्योति के रूप में आदरपूर्वक स्मरण किया जाता है। वे भगवान् वेदव्यास के दिव्य पुत्र, श्रीमद्भागवत महापुराण के अमर वक्ता तथा परमहंसों में श्रेष्ठ आचार्य हैं। जन्म से ही संसार के समस्त आकर्षणों से विरक्त होकर उन्होंने आत्मज्ञान और भगवद्भक्ति की सर्वोच्च मर्यादा स्थापित की।

◆ प्रस्तुत 'श्रीशुकाचार्याष्टकम्' में उनके दिव्य व्यक्तित्व के विविध आयामों का अत्यन्त सरस एवं भक्तिपूर्ण वर्णन किया गया है। इसमें उनके जितेन्द्रिय स्वरूप, वेदव्यास के शिष्यत्व, बोधायनाचार्य के गुरुत्व, अद्वितीय वैराग्य, श्रीरामतारक मन्त्र के उपदेश, राजा परीक्षित के उद्धार, श्रीमद्भागवत के महान् प्रवक्तृत्व तथा विशिष्टाद्वैत तत्त्व के ज्ञान का सुन्दर स्तवन किया गया है। यह अष्टक श्रद्धालु भक्तों के हृदय में गुरु-भक्ति, भगवद्भक्ति और वैराग्य की भावना को जागृत एवं पुष्ट करने वाला है।

★ श्रीशुकाचार्याष्टकम्

महाभागवतो यश्च व्यासपुत्रो जितेन्द्रियः ।
श्रीमत्परमहंसेन्द्र शुकाचार्य नमामि तम् ॥१॥

जगद्‌गुरुर्गुरुर्यस्य महर्षिर्बादरायणः ।
श्रीमत्परमहंसेन्द्र शुक्राचार्यं नमामि तम् ॥२॥

शिष्यो बोधायनो यस्य वृत्तिकृत् पुरुषोत्तमः ।
श्रीमत्परमहंसेन्द्र शुक्राचार्यं नमामि तम् ॥३॥

विरक्तं यन्मनो रम्भा चालयितुं शशांक न ।
श्रीमत्परमहंसेन्द्र शुकाचार्य नमामि तम् ॥४וו

श्रीरामतारकं दत्त्वा संसारार्णवतारकः ।
श्रीमत्परमहंसेन्द्र शुकाचार्य नमामि तम् ॥५וו

श्रीपरीक्षिन्नृपो येन शोकसिन्धोर्हि तारितः ।
श्रीमत्परमहंसेन्द्र शुकाचार्य नमामि तम् ॥६וו

भागवत्याः कथाया यो महावक्ता मुनीश्वरः।
श्रीमत्परमहंसेन्द्र शुकाचार्य नमामि तम् ॥७וו

यश्च रामपदासक्तो विशिष्टाद्वैततत्त्ववित्।
श्रीमत्परमहंसेन्द्र शुकाचार्य नमामि तम् ॥८וו

#अर्थात — जो महान् भागवत (भगवान के परम भक्त) हैं, जो महर्षि वेदव्यास के पुत्र हैं तथा जिन्होंने अपनी इन्द्रियों को पूर्णतः वश में कर लिया है, ऐसे परमहंसों में श्रेष्ठ 'श्रीशुकाचार्य' को मैं नमस्कार करता हूँ। ॥१॥

जिनके गुरु स्वयं जगद्विख्यात महर्षि बादरायण (वेदव्यास) हैं, ऐसे परमहंसश्रेष्ठ 'श्रीशुकाचार्य' को मैं नमस्कार करता हूँ। ॥२॥

जिनके शिष्य महापुरुष बोधायन हैं, जिन्होंने (वेदान्त पर) वृत्ति (भाष्यात्मक व्याख्या) की रचना की, ऐसे परमहंसश्रेष्ठ 'श्रीशुकाचार्य' को मैं नमस्कार करता हूँ। ॥३॥

जिनका मन इतना विरक्त था कि अप्सरा रम्भा भी उसे विचलित करने में समर्थ नहीं हो सकी, ऐसे परमहंसों में श्रेष्ठ 'श्रीशुकाचार्य' को मैं नमस्कार करता हूँ। ॥४॥

जिन्होंने श्रीराम-तारक मन्त्र का उपदेश देकर जीवों को संसाररूपी महासागर से पार उतारने का मार्ग दिखाया, ऐसे परमहंसश्रेष्ठ 'श्रीशुकाचार्य' को मैं नमस्कार करता हूँ। ॥५॥

जिनके द्वारा राजा परीक्षित को शोक रूपी समुद्र से पार कराया गया, ऐसे परमहंसश्रेष्ठ 'श्रीशुकाचार्य' को मैं नमस्कार करता हूँ। ॥६॥

जो श्रीमद्भागवत कथा के महान् वक्ता तथा मुनियों में श्रेष्ठ हैं, ऐसे परमहंसश्रेष्ठ 'श्रीशुकाचार्य' को मैं नमस्कार करता हूँ। ॥७॥

जो भगवान श्रीराम के चरणों में अनन्य अनुराग रखने वाले तथा विशिष्टाद्वैत तत्त्व के ज्ञाता हैं, ऐसे परमहंसों में श्रेष्ठ 'श्रीशुकाचार्य' को मैं नमस्कार करता हूँ। ॥८॥

■ समापन

● ऐसे परमहंसश्रेष्ठ, ज्ञान-वैराग्य-भक्ति के साकार स्वरूप, श्रीमद्भागवताचार्य, जगद्वन्द्य श्री शुकदेव ऋषि - शुक महर्षि भगवान के श्रीचरणों में हमारा कोटिशः प्रणाम है।

● वे हमारे अन्तःकरण को सांसारिक आसक्तियों से मुक्त कर भगवान् के चरणों में दृढ़ अनुराग प्रदान करें; हमारे जीवन में शास्त्रसम्मत ज्ञान, निर्मल भक्ति और अखण्ड गुरु-निष्ठा का प्रकाश फैलाएँ। जिस प्रकार उन्होंने राजा परीक्षित को शोक-सागर से पार कर भगवद्प्राप्ति का मार्ग दिखाया, उसी प्रकार वे हम सबको भी भवबन्धन से मुक्त कर श्रीभगवान् की प्रेममयी सेवा का अधिकारी बनायें।

● भगवान श्री शुकदेव ऋषि की कृपा ही साधक के जीवन का परम धन है; उन्हीं की अनुकम्पा से ज्ञान सार्थक होता है, भक्ति पुष्ट होती है और जीवन कृतार्थ बनता है।

🌻जय श्री शुकदेव ऋषि 🌻

11/06/2026

■ #परम्पराचार्य_मङ्गलम्

◆ सनातन वैदिक परम्परा में गुरु-शिष्य परम्परा को धर्म, ज्ञान और भगवद्भक्ति की अखण्ड जीवनधारा माना गया है। भगवान् से प्राप्त दिव्य ज्ञान जब आचार्यों की परम्परा से प्रवाहित होता हुआ साधकों तक पहुँचता है, तभी उसका वास्तविक संरक्षण और प्रसार सम्भव होता है। प्रस्तुत 'परम्पराचार्य मङ्गलम्' इसी पावन आचार्य-परम्परा का मंगलमय स्मरण है।

◆ इस स्तोत्र में भगवान् श्रीसीताराम से आरम्भ होकर श्रीहनुमानजी, ब्रह्माजी, महर्षि वशिष्ठ, 👉 #महर्षि_पराशर, भगवान् वेदव्यास, 👉 #श्री_शुकदेव_ऋषि तथा महर्षि बोधायन आदि परम्पराचार्यों का श्रद्धापूर्वक वन्दन एवं मङ्गलकामना की गयी है। यह केवल महापुरुषों का स्तवन नहीं, अपितु उस दिव्य ज्ञान-परम्परा के प्रति कृतज्ञता का भाव है जिसके माध्यम से भगवद्भक्ति, ब्रह्मविद्या और विशिष्टाद्वैत तत्त्व का प्रकाश युगों से संसार में आलोकित होता रहा है।

◆ इस मङ्गलस्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ साधक के हृदय में गुरु-भक्ति, शास्त्र-निष्ठा तथा भगवान् के प्रति समर्पण की भावना को दृढ़ करता है और उसे आचार्य-परम्परा की कृपा का पात्र बनाता है।

■ परम्पराचार्य मङ्गलम्

सिन्धवे सद्गुणानां च ब्रह्मणे दीनबन्धवे ।
सच्चरित्रेण युक्ताय श्रीरामायास्तु मङ्गलम् ॥१॥

जनन्यै जगतश्चास्य प्रियायै जगदीशितुः ।
जगद्रक्षाविधायिन्यै श्रीसीतायै च मङ्गलम् ॥२॥

तारकाय हि ळोकानां रामतारकदानतः ।
आञ्जनेयाय रामस्य भक्तिदायास्तु मङ्गलम् ॥३॥

मन्त्रदाय वशिष्ठस्य विशिष्टाद्वैतवादिने ।
ब्रह्माराधनसक्ताय ब्रह्मणे चास्तु मङ्गलम् ॥४॥

दानिने राममन्त्रस्य विशिष्टब्रह्मवादिने ।
महर्षये वशिष्ठाय ब्रह्मपुत्राय मङ्गलम् ॥५॥

शिष्याय श्रीवशिष्ठस्य विशिष्टाद्वैतवादिनः।
पराशराभिधानाय मुनिवर्याय मङ्गलम् ॥६॥

शुकस्य गुरवे श्रीमद्राममन्त्रप्रदायिने ।
ब्रह्मसूत्रादिकर्त्रे च वेदव्यासाय मङ्गलम् ॥७॥

बोधायनमहर्षेश्च गुरवे ब्रह्मवादिने ।
श्रीमते शुकदेवाय व्यासपुत्राय मङ्गलम् ॥८॥

श्रीपुरुषोत्तमार्याय बोधायनमहर्षये ।
श्रीशुकदेवशिष्याय वृत्तिकाराय मङ्गलम् ॥९॥

#अर्थात - जो समस्त सद्गुणों के समुद्र हैं, जो परब्रह्म हैं, जो दीन-दुःखियों के सच्चे बन्धु हैं तथा उत्तम चरित्र से युक्त हैं — उन भगवान श्रीराम का मङ्गल हो। ॥१॥

जो समस्त जगत की माता हैं, जो जगदीश्वर भगवान श्रीराम की परम प्रिया हैं तथा संसार की रक्षा और कल्याण करने वाली हैं — उन माता श्रीसीता का मङ्गल हो। ॥२॥

जो श्रीराम-तारक मन्त्र का उपदेश देकर लोकों का उद्धार करने वाले हैं तथा भगवान श्रीराम की भक्ति प्रदान करने वाले हैं — उन श्री आञ्जनेय (हनुमानजी) का मङ्गल हो। ॥३॥

जिन्होंने महर्षि वशिष्ठ को मन्त्र का उपदेश दिया, जो विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त के प्रतिपादक हैं तथा ब्रह्म-आराधना में निरन्तर संलग्न रहते हैं — उन ब्रह्माजी का मङ्गल हो। ॥४॥

जो राममन्त्र के उपदेशक हैं, जो विशिष्ट ब्रह्मतत्त्व का प्रतिपादन करने वाले हैं तथा ब्रह्माजी के मानसपुत्र महर्षि हैं — उन महर्षि वशिष्ठ का मङ्गल हो। ॥५॥

👉 जो विशिष्टाद्वैत के आचार्य महर्षि वशिष्ठ के शिष्य हैं तथा मुनियों में श्रेष्ठ पराशर नाम से विख्यात हैं — उन महर्षि पराशर का मङ्गल हो। ॥६॥

👉 जो श्री शुकदेव के गुरु हैं, जिन्होंने श्रीराममन्त्र का उपदेश दिया तथा जो ब्रह्मसूत्र आदि ग्रन्थों के रचयिता हैं — उन भगवान वेदव्यास का मङ्गल हो। ॥७॥

जो महर्षि बोधायन के गुरु हैं, जो ब्रह्मतत्त्व का प्रतिपादन करने वाले हैं तथा वेदव्यास के पुत्र हैं — उन श्रीशुकदेव जी का मङ्गल हो। ॥८॥

जो श्रीशुकदेव के शिष्य हैं, जो महर्षि बोधायन तथा श्रीपुरुषोत्तमाचार्य के रूप में प्रसिद्ध हैं और जिन्होंने महान् वृत्ति (व्याख्या-ग्रन्थ) की रचना की है — उन महर्षि बोधायन का मङ्गल हो। ॥९॥

■ समापन

● ऐसी दिव्य, पवित्र और कल्याणमयी आचार्य-परम्परा को हमारा बारम्बार प्रणाम है, जिसके माध्यम से भगवान् की कृपा, शास्त्रों का सत्य और भक्ति का अमृत आज भी जगत् में प्रवाहित हो रहा है।

● भगवान् श्रीसीताराम, श्रीहनुमानजी तथा समस्त परम्पराचार्यों की कृपा से हमारे हृदय में सदैव धर्म, ज्ञान, वैराग्य और भगवद्भक्ति का प्रकाश बना रहे। हम आचार्यों के उपदेशों का अनुसरण करते हुए अपने जीवन को पवित्र, सार्थक और भगवत्सेवा के योग्य बना सकें — यही विनम्र प्रार्थना है।

● गुरु-परम्परा ही साधक के लिए भगवान् तक पहुँचने का सेतु है; अतः जिन महापुरुषों ने इस दिव्य परम्परा को अक्षुण्ण रखा, उनके श्रीचरणों में अनन्त कोटि प्रणाम।

🌻जय पराशर ऋषि 🌻
🌻जय शुकदेव ऋषि 🌻

■ अमृत सरोवर की दिव्य उत्पत्ति: महर्षि पराशर का तप और स्वर्ग से लाया अमृत[श्रीपराशरक्षेत्र माहात्म्य, भविष्योत्तर पुराण,...
08/01/2026

■ अमृत सरोवर की दिव्य उत्पत्ति: महर्षि पराशर का तप और स्वर्ग से लाया अमृत

[श्रीपराशरक्षेत्र माहात्म्य, भविष्योत्तर पुराण, अध्याय - ४४, कुल श्लोक - १२+]

■ कथा-परिचय

● भविष्योत्तर पुराण का यह अध्याय महर्षि पराशर के तप, करुणा और लोककल्याणकारी संकल्प का अत्यन्त पवित्र आख्यान है। इसमें पराशर ऋषि को एक ऐसे महामुनि के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिनका तप केवल आत्मसाधना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सम्पूर्ण क्षेत्र और वहाँ निवास करने वाले जीवों के कल्याण का कारण बनता है।

● यह कथा बताती है कि तीर्थ कैसे ऋषि के संकल्प से जन्म लेते हैं और साधना कैसे अमृतस्वरूप हो जाती है।

■ कथा सारांश

● पूर्वकाल में महर्षि पराशर अत्यन्त धर्मात्मा और तपोनिष्ठ ऋषि थे। वे तपस्या के लिए किसी महान् वन और पुण्यभूमि की खोज में निकले। तीर्थयात्रा के क्रम में वे कावेरी नदी के दक्षिण तट पर स्थित मणिमुक्ता नदी के किनारे पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक अत्यन्त रमणीय सरोवर देखा, जो कल्हार और कमलों से सुशोभित था तथा मल्लिका, मालती, जूही और तुलसी के उपवनों से घिरा हुआ था। कदलीवन, पुण्यवृक्षों की छाया और रेतले तट उस स्थान को अनुपम पवित्रता प्रदान कर रहे थे।

● इस दिव्य वातावरण को देखकर महर्षि पराशर ने वहीं तप करने का निश्चय किया। उन्होंने मणिमुक्ता नदी और सरोवर के बीच एक पर्णकुटी का निर्माण कराया और वहीं निवास करने लगे। तपस्या में उन्होंने कठोर संयम अपनाया—कभी अन्न का पूर्ण त्याग कर वायुभक्षण किया और कभी गिरे हुए पत्तों का आहार लिया। अनेक वर्षों तक वे अन्य श्रेष्ठ ऋषियों के साथ वहाँ गहन तप करते रहे।

● अपने तपोबल से एक समय महर्षि पराशर देवलोक को पहुँचे। वहाँ भगवान हरि की कृपा से उन्हें अमृत प्राप्त हुआ। पराशर ऋषि ने यह अमृत अपने लिए नहीं रखा, बल्कि यह निश्चय किया कि इसे अपने तपोभूमि-क्षेत्र के निवासियों के कल्याण के लिए पृथ्वी पर ले जाएँगे। इसी संकल्प से उन्होंने अमृत को कलश में सुरक्षित रखा।

● पृथ्वी पर लौटकर उन्होंने उस अमृतयुक्त जल से भरे कलश को मणिमुक्ता नदी के तटवर्ती उसी सरोवर के समीप अपने आश्रम में स्थापित कर दिया। अमृत के प्रभाव से उस सरोवर का जल स्वयं अमृततुल्य हो गया। इसी कारण वह सरोवर आगे चलकर ‘अमृतसरोवर’ के नाम से लोकविख्यात हुआ और पराशरक्षेत्र के महातीतर्थ के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।

■ कथा की प्रमुख घटनाएँ

1. पराशर ऋषि का तप-खोज यात्रा — परम धर्मात्मा पराशर महान पुण्य क्षेत्र और वन की तलाश में निकले।

2. कावेरी तट पर पहुँचना — तीर्थयात्रा के दौरान कावेरी नदी के तट पर आगमन।

3. मणिमुक्ता नदी तट का सुंदर सरोवर दर्शन — कावेरी के दक्षिणी तट पर मणिमुक्ता नदी के किनारे कल्हार-कमल-तुलसी आदि से युक्त रमणीय सरोवर का दर्शन।

4. तप का निश्चय और आश्रम निर्माण — सरोवर की शोभा देखकर तप करने का संकल्प; नदी-सरोवर के मध्य पर्णकुटी (उटज) बनाना।

5. कठोर तप का आरंभ — मणिमुक्ता नदी तट पर वास; अन्न-त्याग, वायु-भक्षण, शीर्ण पर्णाहार आदि।

6. बहु-वर्षीय तप — कई वर्षों तक अन्य ऋषियों के साथ गहन तप; धर्मात्मा पराशर का महातप।

7. स्वर्गलोक प्राप्ति — तप-प्रभाव से देवलोक जाना।
भगवान हरि से अमृत प्राप्ति — स्वर्ग में विप्र (पराशर) को हरि से अमृत मिलना।

8. अमृत लाने का संकल्प — अमृत को अपने क्षेत्र के निवासियों के लिए पृथ्वी पर लाना; सबको जीवित
(कल्याणकारी) बनाने और सरोवर में डालने का निश्चय।

9. अमृत कलश में सुरक्षित रखना — अमृत से युक्त जल-पूर्ण कलश को स्वयं के कुम्भ में रखना।

10. अमृत का सरोवर में विसर्जन — मणिमुक्ता नदी तट के सरोवर (आश्रम के पास) में कलश छोड़ना।

11. अमृत सरोवर की प्रसिद्धि — अमृत के कारण सरोवर का जल अमृतोपम हो जाना; लोक में अमृताख्य सरोवर नाम से विख्यात होना।

👉 यह अध्याय पराशर क्षेत्र (संभवतः कावेरी-मणिमुक्ता नदी क्षेत्र, दक्षिण भारत में) की महिमा बताता है, जहाँ महर्षि पराशर का तप और अमृत-प्राप्ति से सरोवर अमृत-तुल्य बना। स्नान करने से पाप-नाश और अमृत-प्राप्ति सदृश फल मिलता है।

■ कथा का विस्तृत विवरण...✍️

श्रीव्यासः उवाच -
पुरा पराशरो नाम ऋषिः परमधार्मिकः ।
तपः कर्तु महारण्यं पुण्यक्षेत्रं विचारयन् ॥१॥

तीर्थयात्राप्रसङ्गेन कावेरीतीरमाप्तवान् ।
कावेर्या दक्षिणेतीरे मणिमुक्तानदीतटे ।
सरोवरं महारम्यं कल्हारकमलैर्युतम् ॥२॥

मल्लिका मालती जाजी तुलसीकाननान्वितम् ।
एकान्ते विद्यमानं तत्सरोवरमनुत्तमम् ॥३॥

मणिमुक्तां नदीपुण्यां कदलीवनमण्डिताम् ।
रम्यां पुण्यतरुच्छायां सैकतस्थलमण्डिताम् ॥४॥

दृष्ट्वा पराशरऋषिः तपस्तप्तुं मनोदधे ।
नदीतटाकयोर्मध्ये उटजं समकारयत् ॥५॥

वासं चकार तत्रैव मणिमुक्तानदीतटे ।
अभक्षो वायुभक्षोथ शीर्णपर्णाशनोऽभवत् ॥६॥

एवं स बहुवर्षाणि कैश्चिद्रिषिवरैसह ॥७॥

तपस्चकार धर्मात्मा पराशरमहामुनिः ।
एकदा देवलोकं तु जगाम स महातपः ॥८॥

स्वर्गलोके तदा विप्रो ह्यमृतं प्राप्तवान् हरेः।
प्रयत्नेनामृतं नीत्वा मम क्षेत्रनिवासिनाम् ॥९॥

जीवयामास सर्वेषां क्षिपामि च सरोवरे।
एवं स निश्चयं कृत्वा करीरे स्वस्य चाक्षिपत् ॥१०॥

अमृतेन समायुक्तं कलशं जलपूरितम्।
मणिमुक्तानदीतीरतटाके स्वाश्रमे त्यजत् ॥११॥

अमृतं निहितं यस्मात् जलं तदमृतोपमम् ।
अमृताख्यसरो नाम ह्यभूल्लोकेषु विश्रुतम् ॥१२॥

- भविष्योत्तर पुराण, पराशर क्षेत्र माहात्म्य, अध्याय - ४४

#अर्थात - श्री व्यास बोले—पूर्वकाल में पराशर नाम के एक अत्यन्त धर्मात्मा ऋषि थे। वे तप करने के लिए किसी महान् वन और पुण्यभूमि का विचार करते हुए चले। ॥१॥

तीर्थयात्रा के प्रसंग से वे कावेरी नदी के तट पर पहुँचे।
कावेरी के दक्षिणी तट पर ‘मणिमुक्ता नदी’ के किनारे उन्हें एक अत्यन्त सुन्दर सरोवर दिखाई दिया, जो विविध रंगों के कल्हार और कमलों से सुशोभित था। ॥२॥

वह (सरोवर) मल्लिका, मालती, जूही, तुलसी आदि के उपवनों से घिरा हुआ था। एकान्त में स्थित वह सरोवर अनुपम (अद्वितीय) सौन्दर्य वाला था। ॥३॥

मणिमुक्ता नदी स्वयं अत्यन्त पवित्र थी, उसके तट कदली (केले) के वन से सुशोभित थे। चारों ओर पुण्य-तरुओं की छाया और रेतले तट की शोभा उस स्थान को अत्यन्त रमणीय बना रही थी। ॥४॥

इस दृश्य को देखकर पराशर ऋषि ने वहीं तप करने का निश्चय किया। नदी और सरोवर के बीच में उन्होंने एक पर्ण-कुटी (उटज) का निर्माण किया। ॥५॥

वे उसी मणिमुक्ता नदी के तट पर रहने लगे। धीरे-धीरे उन्होंने अन्न का त्याग कर दिया—कभी वायु-भक्षण (केवल प्राण पर जीवित), कभी गिरे हुए पत्तों का आहार किया। ॥६॥

इस प्रकार वे कई वर्षों तक वहाँ महान् ऋषियों के साथ (तप करते) रहे। ॥७॥

धर्मात्मा पराशर महामुनि ने वहाँ गहन तप किया।
एक समय, उस महान् तप के प्रभाव से वे देवलोक को प्रस्थान कर गए। ॥८॥

स्वर्गलोक में उस ब्रह्मर्षि को भगवान हरि के द्वारा अमृत प्राप्त हुआ। उन्होंने निश्चय किया कि इस अमृत को मेरे इस क्षेत्र के निवासियों के लिए पृथ्वी पर ले जाऊँ। ॥९॥

उन्होंने सोचा—'इस अमृत से मैं सब लोगों का जीवन कल्याणकारी बनाऊँगा और इसे सरोवर में डाल दूँगा।'
यह निर्णय कर उन्होंने उस अमृत को अपने कुम्भ (कलश) में सुरक्षित रखा। ॥१०॥

अमृत से युक्त, जल से भरे उस कलश को वे मणिमुक्ता नदी के तटवर्ती सरोवर के पास अपने आश्रम में रखकर चले गए। ॥११॥

क्योंकि उस सरोवर में अमृत रखा गया था, उसका जल भी अमृत तुल्य हो गया। इसीलिए वह ‘अमृत-सरोवर’ नाम से संसार में प्रसिद्ध हो गया। ॥१२॥

- भविष्योत्तर पुराण, श्रीपराशरक्षेत्र माहात्म्य, अध्याय - ४४

■ समापन

● यह आख्यान महर्षि पराशर को एक ऐसे ऋषि के रूप में स्थापित करता है जिनका तप केवल व्यक्तिगत मोक्ष के लिए नहीं, बल्कि लोकमंगल के लिए होता है। मणिमुक्ता नदी के तट पर स्थित अमृतसरोवर इस बात का साक्ष्य है कि जब साधना करुणा से युक्त होती है, तब वह भूमि को तीर्थ और जल को अमृत बना देती है।

● महर्षि पराशर का यह चरित्र सिखाता है कि सच्चा तप वही है, जो दूसरों के जीवन में भी जीवनरस भर दे।

🌻जय पराशर ऋषि🌻

■ अमृत सरोवर की दिव्य उत्पत्ति: महर्षि पराशर का तप और स्वर्ग से लाया अमृत[श्रीपराशरक्षेत्र माहात्म्य, भविष्योत्तर पुराण,...
08/01/2026

■ अमृत सरोवर की दिव्य उत्पत्ति: महर्षि पराशर का तप और स्वर्ग से लाया अमृत

[श्रीपराशरक्षेत्र माहात्म्य, भविष्योत्तर पुराण, अध्याय - ४४, कुल श्लोक - १२+]

■ कथा-परिचय

● भविष्योत्तर पुराण का यह अध्याय महर्षि पराशर के तप, करुणा और लोककल्याणकारी संकल्प का अत्यन्त पवित्र आख्यान है। इसमें पराशर ऋषि को एक ऐसे महामुनि के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिनका तप केवल आत्मसाधना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सम्पूर्ण क्षेत्र और वहाँ निवास करने वाले जीवों के कल्याण का कारण बनता है।

● यह कथा बताती है कि तीर्थ कैसे ऋषि के संकल्प से जन्म लेते हैं और साधना कैसे अमृतस्वरूप हो जाती है।

■ कथा सारांश

● पूर्वकाल में महर्षि पराशर अत्यन्त धर्मात्मा और तपोनिष्ठ ऋषि थे। वे तपस्या के लिए किसी महान् वन और पुण्यभूमि की खोज में निकले। तीर्थयात्रा के क्रम में वे कावेरी नदी के दक्षिण तट पर स्थित मणिमुक्ता नदी के किनारे पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक अत्यन्त रमणीय सरोवर देखा, जो कल्हार और कमलों से सुशोभित था तथा मल्लिका, मालती, जूही और तुलसी के उपवनों से घिरा हुआ था। कदलीवन, पुण्यवृक्षों की छाया और रेतले तट उस स्थान को अनुपम पवित्रता प्रदान कर रहे थे।

● इस दिव्य वातावरण को देखकर महर्षि पराशर ने वहीं तप करने का निश्चय किया। उन्होंने मणिमुक्ता नदी और सरोवर के बीच एक पर्णकुटी का निर्माण कराया और वहीं निवास करने लगे। तपस्या में उन्होंने कठोर संयम अपनाया—कभी अन्न का पूर्ण त्याग कर वायुभक्षण किया और कभी गिरे हुए पत्तों का आहार लिया। अनेक वर्षों तक वे अन्य श्रेष्ठ ऋषियों के साथ वहाँ गहन तप करते रहे।

● अपने तपोबल से एक समय महर्षि पराशर देवलोक को पहुँचे। वहाँ भगवान हरि की कृपा से उन्हें अमृत प्राप्त हुआ। पराशर ऋषि ने यह अमृत अपने लिए नहीं रखा, बल्कि यह निश्चय किया कि इसे अपने तपोभूमि-क्षेत्र के निवासियों के कल्याण के लिए पृथ्वी पर ले जाएँगे। इसी संकल्प से उन्होंने अमृत को कलश में सुरक्षित रखा।

● पृथ्वी पर लौटकर उन्होंने उस अमृतयुक्त जल से भरे कलश को मणिमुक्ता नदी के तटवर्ती उसी सरोवर के समीप अपने आश्रम में स्थापित कर दिया। अमृत के प्रभाव से उस सरोवर का जल स्वयं अमृततुल्य हो गया। इसी कारण वह सरोवर आगे चलकर ‘अमृतसरोवर’ के नाम से लोकविख्यात हुआ और पराशरक्षेत्र के महातीतर्थ के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।

■ कथा की प्रमुख घटनाएँ

1. पराशर ऋषि का तप-खोज यात्रा — परम धर्मात्मा पराशर महान पुण्य क्षेत्र और वन की तलाश में निकले।

2. कावेरी तट पर पहुँचना — तीर्थयात्रा के दौरान कावेरी नदी के तट पर आगमन।

3. मणिमुक्ता नदी तट का सुंदर सरोवर दर्शन — कावेरी के दक्षिणी तट पर मणिमुक्ता नदी के किनारे कल्हार-कमल-तुलसी आदि से युक्त रमणीय सरोवर का दर्शन।

4. तप का निश्चय और आश्रम निर्माण — सरोवर की शोभा देखकर तप करने का संकल्प; नदी-सरोवर के मध्य पर्णकुटी (उटज) बनाना।

5. कठोर तप का आरंभ — मणिमुक्ता नदी तट पर वास; अन्न-त्याग, वायु-भक्षण, शीर्ण पर्णाहार आदि।

6. बहु-वर्षीय तप — कई वर्षों तक अन्य ऋषियों के साथ गहन तप; धर्मात्मा पराशर का महातप।

7. स्वर्गलोक प्राप्ति — तप-प्रभाव से देवलोक जाना।
भगवान हरि से अमृत प्राप्ति — स्वर्ग में विप्र (पराशर) को हरि से अमृत मिलना।

8. अमृत लाने का संकल्प — अमृत को अपने क्षेत्र के निवासियों के लिए पृथ्वी पर लाना; सबको जीवित
(कल्याणकारी) बनाने और सरोवर में डालने का निश्चय।

9. अमृत कलश में सुरक्षित रखना — अमृत से युक्त जल-पूर्ण कलश को स्वयं के कुम्भ में रखना।

10. अमृत का सरोवर में विसर्जन — मणिमुक्ता नदी तट के सरोवर (आश्रम के पास) में कलश छोड़ना।

11. अमृत सरोवर की प्रसिद्धि — अमृत के कारण सरोवर का जल अमृतोपम हो जाना; लोक में अमृताख्य सरोवर नाम से विख्यात होना।

👉 यह अध्याय पराशर क्षेत्र (कावेरी-मणिमुक्ता नदी क्षेत्र, दक्षिण भारत में) की महिमा बताता है, जहाँ महर्षि पराशर का तप और अमृत-प्राप्ति से सरोवर अमृत-तुल्य बना। स्नान करने से पाप-नाश और अमृत-प्राप्ति सदृश फल मिलता है।

■ कथा का विस्तृत विवरण...✍️

श्रीव्यासः उवाच -
पुरा पराशरो नाम ऋषिः परमधार्मिकः ।
तपः कर्तु महारण्यं पुण्यक्षेत्रं विचारयन् ॥१॥

तीर्थयात्राप्रसङ्गेन कावेरीतीरमाप्तवान् ।
कावेर्या दक्षिणेतीरे मणिमुक्तानदीतटे ।
सरोवरं महारम्यं कल्हारकमलैर्युतम् ॥२॥

मल्लिका मालती जाजी तुलसीकाननान्वितम् ।
एकान्ते विद्यमानं तत्सरोवरमनुत्तमम् ॥३॥

मणिमुक्तां नदीपुण्यां कदलीवनमण्डिताम् ।
रम्यां पुण्यतरुच्छायां सैकतस्थलमण्डिताम् ॥४॥

दृष्ट्वा पराशरऋषिः तपस्तप्तुं मनोदधे ।
नदीतटाकयोर्मध्ये उटजं समकारयत् ॥५॥

वासं चकार तत्रैव मणिमुक्तानदीतटे ।
अभक्षो वायुभक्षोथ शीर्णपर्णाशनोऽभवत् ॥६॥

एवं स बहुवर्षाणि कैश्चिद्रिषिवरैसह ॥७॥

तपस्चकार धर्मात्मा पराशरमहामुनिः ।
एकदा देवलोकं तु जगाम स महातपः ॥८॥

स्वर्गलोके तदा विप्रो ह्यमृतं प्राप्तवान् हरेः।
प्रयत्नेनामृतं नीत्वा मम क्षेत्रनिवासिनाम् ॥९॥

जीवयामास सर्वेषां क्षिपामि च सरोवरे।
एवं स निश्चयं कृत्वा करीरे स्वस्य चाक्षिपत् ॥१०॥

अमृतेन समायुक्तं कलशं जलपूरितम्।
मणिमुक्तानदीतीरतटाके स्वाश्रमे त्यजत् ॥११॥

अमृतं निहितं यस्मात् जलं तदमृतोपमम् ।
अमृताख्यसरो नाम ह्यभूल्लोकेषु विश्रुतम् ॥१२॥

- भविष्योत्तर पुराण, पराशर क्षेत्र माहात्म्य, अध्याय - ४४

#अर्थात - श्री व्यास बोले—पूर्वकाल में पराशर नाम के एक अत्यन्त धर्मात्मा ऋषि थे। वे तप करने के लिए किसी महान् वन और पुण्यभूमि का विचार करते हुए चले। ॥१॥

तीर्थयात्रा के प्रसंग से वे कावेरी नदी के तट पर पहुँचे।
कावेरी के दक्षिणी तट पर ‘मणिमुक्ता नदी’ के किनारे उन्हें एक अत्यन्त सुन्दर सरोवर दिखाई दिया, जो विविध रंगों के कल्हार और कमलों से सुशोभित था। ॥२॥

वह (सरोवर) मल्लिका, मालती, जूही, तुलसी आदि के उपवनों से घिरा हुआ था। एकान्त में स्थित वह सरोवर अनुपम (अद्वितीय) सौन्दर्य वाला था। ॥३॥

मणिमुक्ता नदी स्वयं अत्यन्त पवित्र थी, उसके तट कदली (केले) के वन से सुशोभित थे। चारों ओर पुण्य-तरुओं की छाया और रेतले तट की शोभा उस स्थान को अत्यन्त रमणीय बना रही थी। ॥४॥

इस दृश्य को देखकर पराशर ऋषि ने वहीं तप करने का निश्चय किया। नदी और सरोवर के बीच में उन्होंने एक पर्ण-कुटी (उटज) का निर्माण किया। ॥५॥

वे उसी मणिमुक्ता नदी के तट पर रहने लगे। धीरे-धीरे उन्होंने अन्न का त्याग कर दिया—कभी वायु-भक्षण (केवल प्राण पर जीवित), कभी गिरे हुए पत्तों का आहार किया। ॥६॥

इस प्रकार वे कई वर्षों तक वहाँ महान् ऋषियों के साथ (तप करते) रहे। ॥७॥

धर्मात्मा पराशर महामुनि ने वहाँ गहन तप किया।
एक समय, उस महान् तप के प्रभाव से वे देवलोक को प्रस्थान कर गए। ॥८॥

स्वर्गलोक में उस ब्रह्मर्षि को भगवान हरि के द्वारा अमृत प्राप्त हुआ। उन्होंने निश्चय किया कि इस अमृत को मेरे इस क्षेत्र के निवासियों के लिए पृथ्वी पर ले जाऊँ। ॥९॥

उन्होंने सोचा—'इस अमृत से मैं सब लोगों का जीवन कल्याणकारी बनाऊँगा और इसे सरोवर में डाल दूँगा।'
यह निर्णय कर उन्होंने उस अमृत को अपने कुम्भ (कलश) में सुरक्षित रखा। ॥१०॥

अमृत से युक्त, जल से भरे उस कलश को वे मणिमुक्ता नदी के तटवर्ती सरोवर के पास अपने आश्रम में रखकर चले गए। ॥११॥

क्योंकि उस सरोवर में अमृत रखा गया था, उसका जल भी अमृत तुल्य हो गया। इसीलिए वह ‘अमृत-सरोवर’ नाम से संसार में प्रसिद्ध हो गया। ॥१२॥

- भविष्योत्तर पुराण, श्रीपराशरक्षेत्र माहात्म्य, अध्याय - ४४

■ समापन

● यह आख्यान महर्षि पराशर को एक ऐसे ऋषि के रूप में स्थापित करता है जिनका तप केवल व्यक्तिगत मोक्ष के लिए नहीं, बल्कि लोकमंगल के लिए होता है। मणिमुक्ता नदी के तट पर स्थित अमृतसरोवर इस बात का साक्ष्य है कि जब साधना करुणा से युक्त होती है, तब वह भूमि को तीर्थ और जल को अमृत बना देती है।

● महर्षि पराशर का यह चरित्र सिखाता है कि सच्चा तप वही है, जो दूसरों के जीवन में भी जीवनरस भर दे।

🌻जय पराशर ऋषि🌻

Address

Bonse Village
Mandi
175004

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when श्री ब्रह्मर्षि पराशर posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share

Category