25/05/2026
गुरु प्यारी साध संगत जी डेरा ब्यास में बाबा जी के 23 मई शाम 4 बजे के प्रश्नोत्तर ने संगत को कभी भावुक किया, कभी हंसाया और जीवन की गहरी सच्चाइयों से भी रूबरू करवाया। सवाल-जवाब में बाबा जी ने बेहद सहज और प्रेम भरे अंदाज़ में संगत को समझाया।
एक प्रेमी ने कहा— “बाबा जी, हमेशा हमारे साथ रहना…”
इस पर बाबा जी ने बहुत भावुक शब्दों में कहा— “बेटा, यहाँ कोई हमेशा नहीं रहा… मैं भी एक दिन चला जाना है…”
यह सुनकर पूरा पंडाल भावुक हो गया। कई संगत प्रेमियों की आंखें नम हो गईं। लेकिन बाबा जी ने तुरंत समझाया— “गुरु मुहताज बनाने नहीं आता… गुरु आज़ाद करने आता है।”
उन्होंने कहा कि सच्चा गुरु इंसान को अपने ऊपर निर्भर नहीं बनाता, बल्कि मालिक से जोड़ता है।
एक प्रेमी ने कहा— “बाबा जी, मैं हीर नहीं… रांझा बनना चाहता हूँ।”
बाबा जी मुस्कुराए और बोले— “बेटा, वही दे सकता है जो उसके पास है। अगर जेब में 100 रुपये हैं तो 90 दे सकता हूँ… लेकिन जो है ही नहीं, वो कैसे दूँ?”
फिर उन्होंने समझाया— “सबसे पहले अपने मन को काबू करना है। मन बागी बना हुआ है।”
जब एक प्रेमी ने कहा— “बाबा जी, वो आंख भी तो आप ही देंगे…”
तो बाबा जी हंसते हुए बोले— “तुम्हारा गलत बाबा से पंगा पड़ गया… वो कुछ भी नहीं करेगा!”
यह सुनकर पूरा पंडाल ठहाकों से गूंज उठा।
एक बहन जी ने निवेदन किया— “बाबा जी, मेरे घर वाले सत्संग नहीं आते… और मेरी गरीबी भी दूर कर दो।”
इस पर बाबा जी ने बहुत सुंदर जवाब दिया— “बेटा, गरीबी भी दात है। अमीरी में इंसान मालिक को भूल जाता है।”
उन्होंने आगे कहा— “जिसके पास खाने को रोटी और पहनने को कपड़े हैं… उसे मालिक का शुक्र करना चाहिए।”
एक प्रेमी ने कहा— “बाबा जी, 12 साल से भजन-सिमरन कर रहा हूँ, कुछ दिखाई नहीं दिया।”
बाबा जी ने जवाब दिया— “हुक्म मान कर बैठना है… मन लगे या ना लगे।”
फिर उन्होंने गहरी बात समझाई— “बरतन साफ रखना हमारी जिम्मेदारी है… भरना मालिक की जिम्मेदारी है।”
एक बहन जी ने दुखी मन से कहा— “मैं अकेली हूँ… मेरा तलाक हो गया…”
बाबा जी ने प्यार से कहा— “जो तिस भावै नानका… सारी गल चंगी।”
उन्होंने समझाया कि मालिक की रज़ा में रहना सीखना चाहिए।
जब किसी ने कहा— “बाबा जी, हर सेंटर पर हज़ूर जी को साथ लाया करो…”
तो बाबा जी मुस्कुराकर बोले— “मैं और हज़ूर… मियाँ-बीवी हैं क्या?”
पूरा पंडाल हंसी से गूंज उठा। फिर बाबा जी ने कहा— “कुछ सेंटर वो चले जाते हैं, कुछ मैं चला जाता हूँ… सबका भला हो जाता है।”
एक और सवाल पर बाबा जी ने कहा— “बेटियाँ अच्छी होती हैं…”
फिर सामने बैठे दो लड़कों की ओर देखकर मुस्कुराते हुए बोले— “मैं देख रहा हूँ, तुम दोनों बहुत देर से हंसे जा रहे हो…”
पूरा माहौल फिर हंसी से भर गया।
प्रश्नोत्तर के दौरान बाबा जी ने बार-बार यही संदेश दिया—
भजन-सिमरन करते रहो। मन लगे या ना लगे, बैठना जरूर है। मालिक की रज़ा में रहो। माता-पिता की कद्र करो। किसी का सहारा बनने की कोशिश करो। अच्छे इंसान बनो।
और सबसे सुंदर बात उन्होंने यह कही— “अच्छा इंसान बनने के लिए किसी सहारे की जरूरत नहीं… सबको पता है कि अच्छा इंसान कैसे बनना है।”
आज के प्रश्नोत्तर का सार यही रहा—
“मांगना छोड़ो… शुक्राना सीखो।” “गुरु से प्रेम करो… लेकिन मालिक से जुड़ो।” “जो मिला है, वही दात है।” “मन लगे या ना लगे… बैठना जरूर है।” “गुरु मुहताज नहीं बनाता… आज़ाद करता है।”
राधास्वामी जी