Shri Digamber Jain Mandir, Chandsen

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27/04/2020

भक्तामर स्त्रोत : संस्कृत

भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा-

मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम्।

सम्यक्-प्रणम्य जिन-पाद-युगं युगादा-

वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम्।। 1॥



य: संस्तुत: सकल-वाङ् मय-तत्त्व-बोधा-

दुद्भूत-बुद्धि-पटुभि: सुर-लोक-नाथै:।

स्तोत्रैर्जगत्- त्रितय-चित्त-हरैरुदारै:,

स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम्॥ 2॥



बुद्ध्या विनापि विबुधार्चित-पाद-पीठ!

स्तोतुं समुद्यत-मतिर्विगत-त्रपोऽहम्।

बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब-

मन्य: क इच्छति जन: सहसा ग्रहीतुम् ॥ 3॥



वक्तुं गुणान्गुण -समुद्र ! शशाङ्क-कान्तान्,

कस्ते क्षम: सुर-गुरु-प्रतिमोऽपि बुद्ध्या ।

कल्पान्त -काल-पवनोद्धत- नक्र- चक्रं ,

को वा तरीतुमलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम्॥ 4॥



सोऽहं तथापि तव भक्ति-वशान्मुनीश!

कर्तुं स्तवं विगत-शक्ति-रपि प्रवृत्त:।

प्रीत्यात्म-वीर्य-मविचार्य मृगी मृगेन्द्रम्

नाभ्येति किं निज-शिशो: परिपालनार्थम्॥ 5॥



अल्प- श्रुतं श्रुतवतां परिहास-धाम,

त्वद्-भक्तिरेव मुखरी-कुरुते बलान्माम् ।

यत्कोकिल: किल मधौ मधुरं विरौति,

तच्चाम्र -चारु -कलिका-निकरैक -हेतु:॥ 6॥



त्वत्संस्तवेन भव-सन्तति-सन्निबद्धं,

पापं क्षणात्क्षयमुपैति शरीरभाजाम् ।

आक्रान्त-लोक-मलि -नील-मशेष-माशु,

सूर्यांशु- भिन्न-मिव शार्वर-मन्धकारम्॥ 7॥



मत्वेति नाथ! तव संस्तवनं मयेद, -

मारभ्यते तनु- धियापि तव प्रभावात् ।

चेतो हरिष्यति सतां नलिनी-दलेषु,

मुक्ता-फल-द्युति-मुपैति ननूद-बिन्दु:॥ 8॥



आस्तां तव स्तवन- मस्त-समस्त-दोषं,

त्वत्सङ्कथाऽपि जगतां दुरितानि हन्ति ।

दूरे सहस्रकिरण: कुरुते प्रभैव,

पद्माकरेषु जलजानि विकासभाञ्जि ॥ 9॥



नात्यद्-भुतं भुवन-भूषण ! भूत-नाथ!

भूतैर्गुणैर्भुवि भवन्त-मभिष्टुवन्त:।

तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन किं वा

भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति ॥ 10॥



दृष्ट्वा भवन्त मनिमेष-विलोकनीयं,

नान्यत्र-तोष- मुपयाति जनस्य चक्षु:।

पीत्वा पय: शशिकर-द्युति-दुग्ध-सिन्धो:,

क्षारं जलं जलनिधेरसितुं क इच्छेत्?॥ 11॥



यै: शान्त-राग-रुचिभि: परमाणुभिस्-त्वं,

निर्मापितस्- त्रि-भुवनैक-ललाम-भूत !

तावन्त एव खलु तेऽप्यणव: पृथिव्यां,

यत्ते समान- मपरं न हि रूप-मस्ति॥ 12॥



वक्त्रं क्व ते सुर-नरोरग-नेत्र-हारि,

नि:शेष- निर्जित-जगत्त्रितयोपमानम् ।

बिम्बं कलङ्क-मलिनं क्व निशाकरस्य,

यद्वासरे भवति पाण्डुपलाश-कल्पम्॥13॥



सम्पूर्ण- मण्डल-शशाङ्क-कला-कलाप-

शुभ्रा गुणास्-त्रि-भुवनं तव लङ्घयन्ति।

ये संश्रितास्-त्रि-जगदीश्वरनाथ-मेकं,

कस्तान् निवारयति सञ्चरतो यथेष्टम्॥ 14॥



चित्रं-किमत्र यदि ते त्रिदशाङ्ग-नाभिर्-

नीतं मनागपि मनो न विकार-मार्गम् ।

कल्पान्त-काल-मरुता चलिताचलेन,

किं मन्दराद्रिशिखरं चलितं कदाचित्॥ 15॥



निर्धूम-वर्ति-रपवर्जित-तैल-पूर:,

कृत्स्नं जगत्त्रय-मिदं प्रकटीकरोषि।

गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानां,

दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ ! जगत्प्रकाश:॥ 16॥



नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्य:,

स्पष्टीकरोषि सहसा युगपज्- जगन्ति।

नाम्भोधरोदर-निरुद्ध-महा- प्रभाव:,

सूर्यातिशायि-महिमासि मुनीन्द्र! लोके॥ 17॥



नित्योदयं दलित-मोह-महान्धकारं,

गम्यं न राहु-वदनस्य न वारिदानाम्।

विभ्राजते तव मुखाब्ज-मनल्पकान्ति,

विद्योतयज्-जगदपूर्व-शशाङ्क-बिम्बम्॥ 18॥



किं शर्वरीषु शशिनाह्नि विवस्वता वा,

युष्मन्मुखेन्दु- दलितेषु तम:सु नाथ!

निष्पन्न-शालि-वन-शालिनी जीव-लोके,

कार्यं कियज्जल-धरै-र्जल-भार-नमै्र:॥ 19॥



ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं,

नैवं तथा हरि -हरादिषु नायकेषु।

तेजो स्फ़ुरन् मणिषु याति यथा महत्त्वं,

नैवं तु काच -शकले किरणाकुलेऽपि॥ 20॥



मन्ये वरं हरि- हरादय एव दृष्टा,

दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति।

किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्य:,

कश्चिन्मनो हरति नाथ ! भवान्तरेऽपि॥ 21॥



स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्,

नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता।

सर्वा दिशो दधति भानि सहस्र-रश्मिं,

प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदंशु-जालम् ॥ 22॥



त्वामामनन्ति मुनय: परमं पुमांस-

मादित्य-वर्ण-ममलं तमस: पुरस्तात्।

त्वामेव सम्य-गुपलभ्य जयन्ति मृत्युं,

नान्य: शिव: शिवपदस्य मुनीन्द्र! पन्था:॥ 23॥



त्वा-मव्ययं विभु-मचिन्त्य-मसंख्य-माद्यं,

ब्रह्माणमीश्वर-मनन्त-मनङ्ग-केतुम्।

योगीश्वरं विदित-योग-मनेक-मेकं,

ज्ञान-स्वरूप-ममलं प्रवदन्ति सन्त: ॥ 24॥



बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चित-बुद्धि-बोधात्,

त्वं शङ्करोऽसि भुवन-त्रय- शङ्करत्वात् ।

धातासि धीर! शिव-मार्ग विधेर्विधानाद्,

व्यक्तं त्वमेव भगवन् पुरुषोत्तमोऽसि॥ 25॥



तुभ्यं नमस्-त्रिभुवनार्ति-हराय नाथ!

तुभ्यं नम: क्षिति-तलामल -भूषणाय।

तुभ्यं नमस्-त्रिजगत: परमेश्वराय,

तुभ्यं नमो जिन! भवोदधि-शोषणाय॥ 26॥



को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणै-रशेषैस्-

त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश !

दोषै-रुपात्त-विविधाश्रय-जात-गर्वै:,

स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि॥ 27॥



उच्चै-रशोक- तरु-संश्रितमुन्मयूख -

माभाति रूपममलं भवतो नितान्तम्।

स्पष्टोल्लसत्-किरण-मस्त-तमो-वितानं,

बिम्बं रवेरिव पयोधर-पाश्र्ववर्ति॥ 28॥



सिंहासने मणि-मयूख-शिखा-विचित्रे,

विभ्राजते तव वपु: कनकावदातम्।

बिम्बं वियद्-विलस-दंशुलता-वितानं

तुङ्गोदयाद्रि-शिरसीव सहस्र-रश्मे: ॥ 29॥



कुन्दावदात-चल-चामर-चारु-शोभं,

विभ्राजते तव वपु: कलधौत -कान्तम्।

उद्यच्छशाङ्क- शुचिनिर्झर-वारि -धार-

मुच्चैस्तटं सुरगिरेरिव शातकौम्भम् ॥ 30॥



छत्र-त्रयं तव विभाति शशाङ्क- कान्त-

मुच्चै: स्थितं स्थगित-भानु-कर-प्रतापम्।

मुक्ता-फल-प्रकर-जाल-विवृद्ध-शोभं,

प्रख्यापयत्-त्रिजगत: परमेश्वरत्वम्॥ 31॥



गम्भीर-तार-रव-पूरित-दिग्विभागस्-

त्रैलोक्य-लोक -शुभ-सङ्गम -भूति-दक्ष:।

सद्धर्म -राज-जय-घोषण-घोषक: सन्,

खे दुन्दुभि-ध्र्वनति ते यशस: प्रवादी॥ 32॥



मन्दार-सुन्दर-नमेरु-सुपारिजात-

सन्तानकादि-कुसुमोत्कर-वृष्टि-रुद्घा।

गन्धोद-बिन्दु- शुभ-मन्द-मरुत्प्रपाता,

दिव्या दिव: पतति ते वचसां ततिर्वा॥ 33॥



शुम्भत्-प्रभा- वलय-भूरि-विभा-विभोस्ते,

लोक-त्रये-द्युतिमतां द्युति-माक्षिपन्ती।

प्रोद्यद्- दिवाकर-निरन्तर-भूरि -संख्या,

दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोमसौम्याम्॥34॥



स्वर्गापवर्ग-गम-मार्ग-विमार्गणेष्ट:,

सद्धर्म- तत्त्व-कथनैक-पटुस्-त्रिलोक्या:।

दिव्य-ध्वनि-र्भवति ते विशदार्थ-सर्व-

भाषास्वभाव-परिणाम-गुणै: प्रयोज्य:॥ 35॥



उन्निद्र-हेम-नव-पङ्कज-पुञ्ज-कान्ती,

पर्युल्-लसन्-नख-मयूख-शिखाभिरामौ।

पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र ! धत्त:,

पद्मानि तत्र विबुधा: परिकल्पयन्ति॥ 36॥



इत्थं यथा तव विभूति- रभूज्-जिनेन्द्र !

धर्मोपदेशन-विधौ न तथा परस्य।

यादृक्-प्र्रभा दिनकृत: प्रहतान्धकारा,

तादृक्-कुतो ग्रहगणस्य विकासिनोऽपि॥ 37॥



श्च्यो-तन्-मदाविल-विलोल-कपोल-मूल,

मत्त- भ्रमद्- भ्रमर-नाद-विवृद्ध-कोपम्।

ऐरावताभमिभ-मुद्धत-मापतन्तं

दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम्॥ 38॥



भिन्नेभ-कुम्भ- गल-दुज्ज्वल-शोणिताक्त,

मुक्ता-फल- प्रकरभूषित-भूमि-भाग:।

बद्ध-क्रम: क्रम-गतं हरिणाधिपोऽपि,

नाक्रामति क्रम-युगाचल-संश्रितं ते॥ 39॥



कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-वह्नि -कल्पं,

दावानलं ज्वलित-मुज्ज्वल-मुत्स्फुलिङ्गम्।

विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुख-मापतन्तं,

त्वन्नाम-कीर्तन-जलं शमयत्यशेषम्॥ 40॥



रक्तेक्षणं समद-कोकिल-कण्ठ-नीलम्,

क्रोधोद्धतं फणिन-मुत्फण-मापतन्तम्।

आक्रामति क्रम-युगेण निरस्त-शङ्कस्-

त्वन्नाम- नागदमनी हृदि यस्य पुंस:॥ 41॥



वल्गत्-तुरङ्ग-गज-गर्जित-भीमनाद-

माजौ बलं बलवता-मपि-भूपतीनाम्।

उद्यद्-दिवाकर-मयूख-शिखापविद्धं

त्वत्कीर्तनात्तम इवाशु भिदामुपैति॥ 42॥



कुन्ताग्र-भिन्न-गज-शोणित-वारिवाह,

वेगावतार-तरणातुर-योध-भीमे।

युद्धे जयं विजित-दुर्जय-जेय-पक्षास्-

त्वत्पाद-पङ्कज-वनाश्रयिणो लभन्ते॥ 43॥



अम्भोनिधौ क्षुभित-भीषण-नक्र-चक्र-

पाठीन-पीठ-भय-दोल्वण-वाडवाग्नौ।

रङ्गत्तरङ्ग -शिखर- स्थित- यान-पात्रास्-

त्रासं विहाय भवत: स्मरणाद्-व्रजन्ति ॥ 44॥



उद्भूत-भीषण-जलोदर-भार- भुग्ना:,

शोच्यां दशा-मुपगताश्-च्युत-जीविताशा:।

त्वत्पाद-पङ्कज-रजो-मृत-दिग्ध-देहा:,

मर्त्या भवन्ति मकर-ध्वज-तुल्यरूपा:॥ 45॥



आपाद-कण्ठमुरु-शृङ्खल-वेष्टिताङ्गा,

गाढं-बृहन्-निगड-कोटि निघृष्ट-जङ्घा:।

त्वन्-नाम-मन्त्र- मनिशं मनुजा: स्मरन्त:,

सद्य: स्वयं विगत-बन्ध-भया भवन्ति॥ 46॥



मत्त-द्विपेन्द्र- मृग- राज-दवानलाहि-

संग्राम-वारिधि-महोदर-बन्ध -नोत्थम्।

तस्याशु नाश-मुपयाति भयं भियेव,

यस्तावकं स्तव-मिमं मतिमानधीते॥ 47॥



स्तोत्र-स्रजं तव जिनेन्द्र गुणैर्निबद्धाम्,

भक्त्या मया रुचिर-वर्ण-विचित्र-पुष्पाम्।

धत्ते जनो य इह कण्ठ-गता-मजस्रं,

तं मानतुङ्ग-मवशा-समुपैति लक्ष्मी:॥ 48॥

Shri Parasnath Digamber Jain Mandir "Heera Path"
Shubham Agarwal Garg

27/04/2020

चालीसा : भगवान् आदिनाथ (चाँदखेड़ी)

(छंद: दोहा)
शीश नवा अरिहंत को, सिद्धन करूँ प्रणाम ।
उपाध्याय आचार्य का ले सुखकारी नाम ।।
सर्व साधु और सरस्वती जिनमंदिर सुखकार ।
आदिनाथ भगवान् को मन-मंदिर में धार ।।

(चौपार्इ छन्द)
जै जै आदिनाथ जिन स्वामी, तीन-काल तिहुँ-जग में नामी ।
वेष-दिगम्बर धार रहे हो, कर्मों को तुम मार रहे हो ।।१।।

हो सर्वज्ञ बात सब जानो; सारी दुनियाँ को पहचानो ।
नगर अयोध्या जो कहलाये, राजा नाभिराज बतलाये ।।२।।

मरुदेवी माता के उदर से, चैत-वदी-नवमी को जन्मे ।
तुमने जग को ज्ञान सिखाया, कर्मभूमि का बीज उपाया ।।३।।

कल्पवृक्ष जब लगे बिछरने, जनता आर्इ दु:खड़ा कहने ।
सब का संशय तभी भगाया, सूर्य-चंद्र का ज्ञान कराया ।।४।।

खेती करना भी सिखलाया, न्याय-दंड आदिक समझाया ।
तुमने राज किया नीति का, सबक आपसे जग ने सीखा ।।५।।

पुत्र आपका भरत बताया, चक्रवर्ती जग में कहलाया ।
बाहुबलि जो पुत्र तुम्हारे, भरत से पहले मोक्ष सिधारे ।।६।।

सुता आपकी दो बतलार्इ, ‘ब्राह्मी’ और ‘सुन्दरी’ कहलार्इ ।
उनको भी विद्या सिखलार्इ, अक्षर और गिनती बतलार्इ ।।७।।

एक दिन राजसभा के अंदर, एक अप्सरा नाच रही थी ।
आयु उसकी बची अल्प थी, इसीलिए आगे नहिं नाच सकी थी ।।८।।

विलय हो गया उसका सत्वर, झट आया वैराग्य उमड़कर ।
बेटों को झट पास बुलाया, राजपाट सब में बँटवाया ।।९।।

छोड़ सभी झंझट संसारी, वन जाने की करी तैयारी ।
राजा हजारों साथ सिधाए, राजपाट-तज वन को धाये ।।१०।।

लेकिन जब तुमने तप कीना, सबने अपना रस्ता लीना ।
वेष-दिगम्बर तजकर सबने, छाल आदि के कपड़े पहने ।।११।।

भूख-प्यास से जब घबराये, फल आदिक खा भूख मिटाये ।
तीन सौ त्रेसठ धर्म फैलाये, जो अब दुनियाँ में दिखलाये ।।१२।।

छै: महीने तक ध्यान लगाये, फिर भोजन करने को धाये ।
भोजन-विधि जाने नहिं कोय, कैसे प्रभु का भोजन होय ।।१३।।

इसी तरह बस चलते चलते, छै: महीने भोजन-बिन बीते ।
नगर हस्तिनापुर में आये, राजा सोम श्रेयांस बताए ।।१४।।

याद तभी पिछला-भव आया, तुमको फौरन ही पड़घाया ।
रस-गन्ने का तुमने पाया, दुनिया को उपदेश सुनाया ।।१५।।

तप कर केवलज्ञान उपाया, मोक्ष गए सब जग हर्षाया ।
अतिशययुक्त तुम्हारा मंदिर, चाँदखेड़ी भँवरे के अंदर ।।१६।।

उसका यह अतिशय बतलाया, कष्ट-क्लेश का होय सफाया ।
मानतुंग पर दया दिखार्इ, जंजीरें सब काट गिरार्इ ।।१७।।

राजसभा में मान बढ़ाया, जैनधर्म जग में फैलाया ।
मुझ पर भी महिमा दिखलाओ, कष्ट भक्त का दूर भगाओ ।।१८।।

(सोरठा)
पाठ करे चालीस दिन, नित चालीस ही बार ।
चाँदखेड़ी में आय के, खेवे धूप अपार ।।
जन्म दरिद्री होय जो, होय कुबेर-समान ।
नाम-वंश जग में चले, जिनके नहीं संतान ।।

Shubham Agarwal Garg
The_words_of_Shub

श्री आदिनाथाय नमः
13/11/2019

श्री आदिनाथाय नमः

Shri Digamber Jain Mandir, Chandsen..... Complete 1 Year for Panchkalyan....Picture courtesy :- Shubham Agarwal Garg
09/05/2017

Shri Digamber Jain Mandir, Chandsen..... Complete 1 Year for Panchkalyan....

Picture courtesy :- Shubham Agarwal Garg

14/01/2017

जय जिनेन्द्र

04/12/2016
09/09/2016

चांदसेन पंचकल्याण जो कि 07 मई 2016 से 09 मई 2016 तक़ आयोजित हुआ था , उसका का सिधा प्रसारण पारस चेंनल पर दिखाया जा रहा है
दिनांक 09 सितम्बर 2016 एव 10 सितम्बर 2016 को रात्रि 8:00 से 9:00 बजे धन्यवाद

भवदीय :- सकल जैन समाज चान्दसेन मालपुरा (टोक)

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई
15/08/2016

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई

20/05/2016

Muje koi farak nhi padta ki mere page pr like kam milte he smile emoticonjis attitude k sath mene ye page bnaya i sware ye page hit hoga bs wait n watch kiss emoticon
keep smiling ,stay connect

मोक्ष कल्याणक ( अग्नि कुमार देवो का आगमन )
11/05/2016

मोक्ष कल्याणक
( अग्नि कुमार देवो का आगमन )

कवि सम्मेलन
11/05/2016

कवि सम्मेलन

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