प्राचीन तीर्थ इतिहास

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प्राचीन तीर्थ इतिहास प्राचीन तीर्थो की यात्रा के घर बैठे दर्शन करवाने ,आपके मन को तीर्थमय बनाने के लिए

प्रणाम 🙏जय गिरनार जी🐚जय नेमिनाथ दादा 🐚                ⛰️🤩2 story🤩⛰️*वर्तमान श्री नेमिनाथ परमात्मा की प्रतिमा का पुनः प्र...
15/10/2021

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जय गिरनार जी🐚
जय नेमिनाथ दादा 🐚

⛰️🤩2 story🤩⛰️
*वर्तमान श्री नेमिनाथ परमात्मा की प्रतिमा का पुनः प्रकटीकरण और रत्नसार श्रावक*

परन्तु वह मेरुसम निश्चल रहा । तब गर्जना करते हुए सिंहवाहन के ऊपर बैठकर चारों दिशाओं को प्रकाशित करती हुई अंबिकादेवी पुनः प्रत्यक्ष होकर कहती है , "हे वत्स ! तेरे दृढ सत्व से में प्रसन्न हुंँ , तुम मुझसे वरदान माँगो ।" देवी के इन वचनों को सुनकर रत्नश्रावक कहता है , "हे माँ ! इस महातीर्थ के उद्धार के सिवाय मेरा अन्य कोई मनोरथ नहीं है , आप मुझे श्री नेमिनाथ प्रभु की ऐसी वज्रमय मूर्ति की जो शाश्वत रहे , और जिसकी पूजा से मेरा जन्म कृतार्थ बने एवं पूजा करनेवाले अन्य जीव भी हर्षोल्लास को प्राप्त करें ।" अंबिका देवी कहते है, "सर्वज्ञ भगवंत ने तेरे द्वारा तीर्थ का उद्धार होगा ऐसा कहा है इसीलिए तुम मेरे साथ चलो ! मेरे पीछे-पीछे इधर-उधर देखे बिना चले आओ"। रत्नश्रावक देवी के पीछे-पीछे चलने लगा । बायीं तरफ के अन्य शिखरों को छोडती हुई देवी पूर्व दिशा की तरफ , हिमाद्रि पर्वत के कंचन शिखर पर गयी , जहाँ सुवर्ण नामक , गुफा के पास आकर देवी सिद्धविनायक देव को विंनती करती है-

To be continued.

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*वर्तमान श्री नेमिनाथ परमात्मा की प्रतिमा का पुनः प्रकटीकरण और रत्नसार श्रावक* story इस ग्रुप में आयेगी.... आगे गिरनार जी की बहुत सी stories आयेगी! आप सभी गिरनारमय रहो , गिरनार के बारे में जानो , गिरनार की यादों में जिंदगी के सफर को सुहाना करो , यही प्रभु से हमारी प्रार्थना है!

*दीवाने दादा के* 🐚
*एक नजर गिरनार की ओर* 🐚
*हर कदम गिरनार की ओर* 🐚

*पोस्ट के साथ कोई छेडछाड ना करे अदतादान के महापाप से बचे* 🙏🏻🙏🏻

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26/09/2021

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⛰️🤩2 story🤩⛰️
*वर्तमान श्री नेमिनाथ परमात्मा की प्रतिमा का पुनः प्रकटीकरण और रत्नसार श्रावक*

"हे वत्स ! तु धन्य है , तु खेद क्यों करता है ? स्वयं तीर्थयात्रा करने के साथ अनेक भव्य जीवों को संघ के साथ इस महातीर्थ की यात्रा करवाकर तुमने अपने मनुष्य जन्म को सफल किया है । इस प्रतिमा का पुराना लेप नाश होने पर नया लेप होता ही रहता है । जिस तरह जीर्णवस्त्र निकालकर नये वस्त्र ग्रहण किये जाते हैं , उसी तरह तुम भी इस प्रतिमा का नया लेप करवाकर पुनः प्रतिष्ठा करवाओ ।" अंबिकादेवी के वचन सुनकर विषादग्रस्त बना रतन कहता है , माँ ! आप ऐसे वचन न उच्चारो ! पूर्वबिंब का नाश करके में भारी कर्मी बना हुँ , और आपकी आज्ञा से मूर्ति का लेप करवाकर पुनः स्थापना करूं तो भविष्य में पुनः मेरी तरह कोई अज्ञानी इस बिंब का नाश करनेवाला बनेगा । इसलिए ओ मैया ! यदि आप मेरे तप से प्रसन्न हों ,तो मुझे ऐसी कोई अभंग मूर्ति दीजिए जिससे भविष्य में किसी के द्वारा इसका नाश न हो और भक्तजन भाव से जलाभिषेक करके अपनी इच्छाओं को पूर्ण कर सके ।

अंबिकादेवी रत्नश्रावक के इन वचनों को अनसुना कर अदृश्य हो गयी । अंबिका देवी को अदृश्य होते देखकर रत्नश्रावक पल-दो-पल अस्वस्थ बन गया । परन्तु अनुपम सत्व का स्वामी रत्न स्वस्थ बनकर पुनः अंबिकादेवी के ध्यान में बैठ गया । रतन के महासत्व की कसौटी करने के लिए देवी ने अनेक उपसर्गों के द्वारा उसे ध्यान से चलायमान करने की बहुत कोशिश की ,-

To be continued.

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26/09/2021

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जय नेमिनाथ दादा 🐚

⛰️🤩2 story🤩⛰️
*वर्तमान श्री नेमिनाथ परमात्मा की प्रतिमा का पुनः प्रकटीकरण और रत्नसार श्रावक*

"इस महातीर्थ का नाश करनेवाला में महापाप ! मुझे धिक्कार हो ! अज्ञानी ऐसे मेरा अनुकरण करनेवाले सभी यात्रिकों को भी धिक्कार हो ! अरे ! क्या हो गया ? मैं उछलते ह्रदय के भावों के साथ इस महातीर्थ के दर्शन करने आया और तीर्थ के उद्धार के बदले तीर्थनाश में निमित बन गया। अब में कोन-से दान-शील-तप-भाव से धर्म के का कार्य करुं ? जिसके प्रभाव से मेरा यह पापकर्म नाश हो जाए ! नहीं ! नहीं ! अब तो अनेक सुकृत करने पर भी मेरा यह दुष्कृत्य नाश नहीं होगा । ऐसा लगता है ! अब व्यर्थ चिंता करने से क्या फायदा ?अब तो नेमिनाथ परमात्मा ही मुझे शरणाभूत हैं। ऐसे दृढ संकल्प के साथ रत्नश्रावक चार आहार का त्याग कर वहीं प्रभु के चरणों में आसन लगाकर बैठ गया ।

समय बीतता गया । रत्नश्रावक के सत्व की परिक्षा प्रारंभ होने लगी । अनेक विघ्न आने पर भी रत्न अपने संकल्प में मजबूत रहा । रत्न के सत्व और निश्चलता के प्रभाव से प्रसन्न हुई शासन अधिष्ठयिका अंबिकादेवी एक महीने के अन्त में प्रगट हुई । उनके दर्शन होते ही तपधर्म का प्रभाव जानकर हर्षातुर बना रतन अंबिकादेवी को नमस्कार करता है । अंबिका देवी कहती है ,-

To be continued.

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*एक नजर गिरनार की ओर* 🐚
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26/09/2021

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जय नेमिनाथ दादा 🐚

⛰️🤩2 story🤩⛰️
*वर्तमान श्री नेमिनाथ परमात्मा की प्रतिमा का पुनः प्रकटीकरण और रत्नसार श्रावक*

रत्नश्रावक ने तुरंत ही अवधिज्ञानी गुरु आनंदसूरि जी को इस छत्रशिला के कंपन का कारण पूछा तो , अवधिज्ञान के सामर्थ्य से पूज्य गुरुभगवंत आदरपूर्वक कहते हैं कि *"हे रत्नसार! तेरे द्वारा इस रैवतगिरि तीर्थ का नाश होगा और तेरे ही द्वारा इस तीर्थ का उद्धार भी होगा"* ।
जिनेश्वर परमात्मा का शासन जिसके रोम-रोम में बसा था, ऐसा रत्नश्रावक इस महातीर्थ के नाश में निमित्त बनने के लिए कैसे तैयार हो ? हृदय के उछलते भावों के साथ नेमिप्रभु को वन्दन के लिए आया हुआ रत्नश्रावक अत्यन्त खेद के साथ दूर रहकर ही वन्दन कर वापस जा रहा था। *गुरु आनंदसूरी कहते है, "रतन! इस तीर्थ का नाश तेरे द्वारा होगा, इसका अर्थ तेरा अनुसरण करनेवाले श्रावकों के द्वारा होगा। तेरे द्वारा तो इस महान तीर्थ का अधिक उद्धार होगा। इसलिए खेद मत कर!"* गुरुभगवन्त के उत्साहपूर्ण वचन सुनकर रत्नश्रावक संघ के साथ रैवतगिरि के मुख्य शिखर पर प्रवेश करता है। हर्ष से भरे यात्रीगण गजेन्द्रपद कुंड (हाथी पगला) से शुद्ध जल निकालकर स्नान करने लगे। रत्नश्रावक ने भी इस दिव्य जल से स्नान करके उत्तम वस्त्रों को धारण कर, गजपदकुंड के जल को कुंभ में ग्रहण कर, जैन धर्म में दृढ ऐसे विमलराजा के द्वारा रैवतगिरि पर स्थापित लेपमयी श्री नेमिनाथ प्रभु के काष्ठमय प्रासाद में प्रवेश किया।
*सभी यात्रीगण हर्षविभोर बनकर गजपदकुंड के शुद्धजल से कुंभ भर-भर कर प्रक्षालन कर रहे थे। इस अवसर पर अनेक बार देवताओं और पुजारी के द्वारा निषेध करने पर भी उनकी बात की अवगणना कर, हर्ष के आवेश में ज्यादा पानी के द्वारा प्रक्षालन करने से जल की एकधारा के प्रवाह के प्रहार से लेप्यमयी प्रतिमा का लेप गलने लगा और थोडी ही देर में वह प्रतिमा गिली मिट्टी के पिंड स्वरुप बन रही थी।* इस दृश्य को देखकर रत्नश्रावक अत्यंत आघात के साथ शोकातुर बना और मूर्छित हुआ। इससे सकलसंघ शोक के सागर में डूब गया। चारों तरफ हाहाकार मच गया। संघपति रत्नश्रावक पर शीतल जल के उपचार किये गये। थोडी ही देर में संघपति रत्नश्रावक स्वस्थ बन गया। *प्रभुजी की प्रतिमा गलने से टूटे हुए हृदयवाला रत्नश्रावक आकुल-व्याकुल होकर विलाप करने लगा कि........*

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26/09/2021

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⛰️🤩2 story🤩⛰️
*वर्तमान श्री नेमिनाथ परमात्मा की प्रतिमा का पुनः प्रकटीकरण और रत्नसार श्रावक*

वर्तमान अवसर्पिणी के भरतक्षेत्र की भव्यभूमी पर बाइसवें तीर्थंकर श्री नेमिनाथ परमात्मा के निर्वाण के 2000 वर्ष व्यतीत हो चुके थे। उसी काल में *सोरठ देश की धन्यधरा पर कांपिल्य नामक नगर में रत्नसार नामक धनिक श्रावक रहता था।* अचानक 12 वर्ष तक दुष्काल का समय आया। पशु तो क्या मानव भी पानी के अभाव से मरने लगे। *उस समय आजीविका की तकलीफ होने से धनोपार्जन करने के लिए रत्नश्रावक देशान्तर में घूमते घुमते काश्मीर देश के नगर में जाकर रहने लगा।* पूर्वभवों में बाँधे हुए कोई पुण्यानुबंधी पुण्य के उदय से प्राप्त लक्ष्मी को लिए , कदम-कदम पर सन्मार्ग में व्यय करने की भावना रत्नश्रावक के मन में उत्पन्न होने लगी। *संपत्ति का संग्रह न करते हुए , संपत्ति का सदुपयोग कर सद्गति की तरफ प्रयाण हेतु अरिहंत परमात्मा की विशिष्ट पूजा-भक्ति करने के लिए श्री आनंदसुरिश्वर जी महाराज साहेब कि पुनित निश्रा में सिद्धाचल जी ,गिरनार जी आदि महातीर्थों की स्पर्शना करने के लिए पैदल संघ यात्रा का प्रयाण किया।।*
ग्रामानुग्राम देव-गुरु और साधर्मिक भक्ति तथा नये-नये जिनालयों का निर्माण करवाते हुए श्री आनन्दसूरिजी गुरु की अपार भक्ति करते हुए संघ आगे बढ़ रहा था। *पूर्वकृत अशुभ कर्मोदय से संघमार्ग में अंतरायभूत बननेवाले , व्यंतर , वैताल , राक्षस और यक्षों के द्वारा होनेवाले उपसर्गों और विघ्नों का नाश करने के लिए श्री नेमिनिरंजन के शासन की अधिष्ठायिका अंबिकादेवी का ध्यान कर , रत्नश्रावक ने संघयात्रा को आगे बढ़ाया।* स्ववतन कांपिल्यनगर में स्वामिवात्सल्य सहित भक्ति से वहाँ के संघ को निमंत्रित कर , श्री आनन्दसूरिगुरु की निश्रा में श्री संघ आनंदसभर तीर्थाधिराज श्री सिद्धगिरि के शीतल सान्निध्य में आया। आनंदोल्लास पूर्वक शाश्वत तीर्थ की भक्ति करके श्री संघ रैवतगिरि महातीर्थ के रमणीय वातावरण में भूतकाल में हुए अनंत तीर्थंकरों की सिद्धभूमि की सुवास लेने लगा। वर्तमान चौवीसी के बाइसवें तीर्थंकर बालब्रह्मचारी श्री नेमिनाथ प्रभु की केवलज्ञान भूमि पर श्री नेमिजिन की पावन प्रतिमा की पूजा करके रत्नश्रावक के साथ संघ मुख्य शिखर की तरफ आगे बढ रहा था। *उस समय रास्ते में जाते हुए सभी ने छत्रशिला को नीचे से कंपायमान होते हुए देखा।* रत्नश्रावक ने तुरंत ही........

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*प्रभु प्रतिमाजी का इतिहास* story आज पुर्ण हुई , कल से
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प्रणाम 🙏जय गिरनार जी🐚जय नेमिनाथ दादा 🐚*श्री नेमिनाथ प्रभु की प्रतिमाजी की प्राचीनता का काल*अतीत उत्सर्पिणी के प्रथम आरे ...
26/09/2021

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*श्री नेमिनाथ प्रभु की प्रतिमाजी की प्राचीनता का काल*
अतीत उत्सर्पिणी के प्रथम आरे के 21000 वर्ष + दुसरे आरे के 21000 वर्ष + *तीसरे आरे के 84250 वर्ष के बाद श्री सागर तीर्थंकर हुए* इसलिए 21000 + 21000 + 84250 = *1,26,250 वर्ष व्यतीत होने के कुछ वर्षों के बाद ब्रह्मेन्द्र द्वारा प्रतिमाजी भरवायी हुई होगी।* इस कारण से हैं अतीत उत्सर्पिणी के 10 कोडाकोडीसागरोपम में 1,26,250 से कुछ अधिक वर्ष न्यून काल का अतीत उत्सर्पिणी का हुआ।
1,26,250 वर्ष न्यून 10 कोडाकोडी सागरोपम में वर्तमान अवसर्पिणी काल के 10 कोडाकोडी सागरोपम काल में से छट्ठे आरे के 21000 वर्ष तथा पाँचवें आरे के शेष 18484 वर्ष कम करने पर 39485 वर्ष न्यून इस अवसर्पिणी काल की प्राचीनता का होता है। इसलिए -
1,26,250 वर्ष न्यून 10 कोडाकोडी सागरोपम
+ 39485 वर्ष न्यून 10 कोडाकोडी सागरोपम
-----------------------------------------------------
1,65,735 वर्ष न्यून 20 कोडाकोडी सागरोपम.

*वर्तमान श्री नेमिनाथ परमात्मा की प्रतिमाजी 1,65,735 वर्ष न्यून 20 कोडाकोडी सागरोपम वर्ष प्राचीन है।*

(गिरनारमन्डन बालब्रह्मचारी श्री नेमिनाथ भगवान की जय)

*इस प्रतिमाजी का वर्तमान स्थान (गिरनार) पर प्रतिष्ठित होने का काल*
श्री नेमिनाथ प्रभु के निर्वाण के 2000 वर्ष के बाद प्रतिष्ठित होने से उनके शासन के शेष 82000 वर्ष + श्री पार्श्वनाथ प्रभु के शासन के 250 वर्ष + श्री महावीर स्वामी दादा के शासन के 2535 वर्ष से यह प्रतिमाजी प्रतिष्ठित है।

*82000 + 250 + 2535 = 84785 वर्ष से यह प्रतिमाजी इस स्थान पर बिराजमान है।*

👆👆👆👆👆👆
यह पुरा calculation नेमिनाथ दादा की इस प्रतिमा जी की प्राचीनता का बताया हुआ है। हम कितने पुण्यशालि है , जो हमे इतनी प्राचीन प्रतिमा जी के दर्शन-पूजन का अद्भुत लाभ मिलता है। आप सभी जब भी गिरनार महातीर्थ यात्रा पर जाये तो प्रभु पुजा अवश्य करके आइयेगा।

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*वर्तमान श्री नेमिनाथ परमात्मा की प्रतिमा का पुनः प्रकटीकरण और रत्नसार श्रावक* इस पर ग्रुप में आयेगा.... आगे गिरनार जी की बहुत सी stories आयेगी! आप सभी गिरनारमय रहो , गिरनार के बारे में जानो , गिरनार की यादों में जिंदगी के सफर को सुहाना करो , यही प्रभु से हमारी प्रार्थना है!

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26/09/2021

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प्रभु कहते हैं , "जब तक द्वारिकापुरी रहेगी तब तक यह प्रतिमा तुम्हारे प्रासाद में पूजीं जाएगी। उसके बाद कांचनगिरि पर देवताओं के द्वारा इसकी पूजा होगी। *मेरे (नेमिनाथ दादा) निर्वाण के 2000 वर्ष के बाद अंबिका देवी की आज्ञा से उत्तम भावनावाला रत्नसार नामक वणिक* एक गुफा में से प्रतिमाजी को रैवतगिरि के प्रासाद में बिराजमान कर , पूजा करेगा। *बाद में 1,03,250 वर्ष तक यह प्रतिमाजी वहाँ रहकर फिर वहाँ से अदृश्य होगी।* उस समय दुषम-दुषम काल का छठ्ठा आरा प्रारंभ होते ही अधिष्ठायिका अंबिकादेवी उस जिनबिंब को पाताललोक में पूजेगी। अन्य देवता भी उसकी पूजा करेंगे।
वर्तमान काल में बिराजमान गिरनार मंडन श्री नेमिनाथ भगवान के अद्भुत इतिहास को जानकर सार यह निकलता है कि *यह प्रतिमा अतीत चौवीशी के तीसरे श्री सागर तीर्थंकर परमात्मा के काल में पाँचवें ब्रह्मलोक देवलोक के ब्रह्मेन्द्र द्वारा भरवायी गयी है।* इस कारण से भरतक्षेत्र में वर्तमान में सबसे प्राचीनतम प्रतिमा मानी जाती है।

*श्री नेमिनाथ प्रभु की प्रतिमा का प्राचीनता का काल*
(to be continued)

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26/09/2021

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*प्रभु कहते हैं की - यह रैवताचलगिरि पुंडरिक गिरिराज का सुवर्णमय पांचवा शिखर है ,* जो मन्दार और कल्पवृक्ष आदि उतम वृक्षों से लिपटा हुआ है। *यह महातीर्थ हमेशा झरते हुए झरनों से भव्य जीवों के पापों का प्रक्षालन करता है।* इसके स्पर्श मात्र से हिंसा के पाप दूर हो जाते हैं।

*️⃣ सभी *तीर्थ की यात्रा के फल को देनेवाले इस गिरनार के दर्शन और स्पर्शन मात्र से सर्व पाप नाश* होते हैं।

*️⃣ इस *गिरनार तीर्थ पर आकर जो न्यायोपर्जित धन का सद्व्यय करते हैं , उन्हें जन्मोंजन्म संपात की प्राप्ति* होती है।

*️⃣ जो यहाँ आकर *भाव से जिनप्रतिमा की पूजा करतें हैं , वे मोक्ष सुख प्राप्त करतें हैं , तो मानवसुख की तो बात ही क्या करनी ?*

*️⃣ जो यहाँ *सुसाधु को शुद्ध अन्न , वस्त्र और पात्र वहोराते है , वे मुक्ति रुपी स्त्री को आनंदित करते हैं।*

*️⃣ इस *रैवतगिरि पर स्थित वृक्ष और पक्षी भी धन्य और पुण्यशाली हैं , तो मनुष्यों की तो बात ही क्या करनी ?*

*️⃣ *देवता , ऋषि , सिद्धपुरुष , गंधर्व और किन्नरादि हमेशा इस तीर्थ की सेवा* करने आते हैं।

*️⃣ *गिरनार पर रहे हुए गजपद कुंड आदि अन्य कुंडों का अलग अलग प्रभाव है , जिसमें मात्र 6 महीने स्नान करने से प्राणियों के कुष्ठादी रोग नाश होते हैं।*

इस प्रकार बालब्रह्मचारी श्री नेमिनिरंजन के मुखकमल से गिरनार तीर्थ की महिमा सुनकर पुण्यशाली सुर-असुर नरेश्वर आनंदित होते हैं । इस अवसर पर श्री कृष्ण वासुदेव प्रश्न करते हैं, हे परम करुणासागर ! यह प्रतिमा जो मेरे प्रासाद में स्थापित करवानी है , वह वहाँ कितने समय तक रहेगी ? इसके बाद कहाँ कहाँ पूजा होगी ?

प्रभु कहते हैं कि.......
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26/09/2021

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यह पुण्यसार राजा पूर्वभवों में स्वयं भरायी हुई देवाधिदेव की प्रतिमाजी की 👉 *दस-दस सागरोपम काल तक* की हुई भक्ति के प्रभाव से *गणधरपद* प्राप्त करके नेमिनाथ भगवान के *वरदत्त नामक प्रथम गणधर बनेंगे* और शिवरमणी के संग में शाश्वत सुख का उपभोग करेंगे।
(🐚बोलो बोलो श्री नेमिनाथ भगवान की जय🐚)
समवसरण में देशना दरम्यान श्री नेमिनाथ प्रभु के इन मधुरवचनों को सुनकर *उस समय के ब्रह्मेन्द्र उठकर परमात्मा को नमस्कार करके कहते हैं* कि "हे भगवंत! आपकी उस प्रतिमाजी को मैं आज भी पूजता हूँ ,और मेरे पूर्वज इन्द्रों ने भी भक्ति से उसकी उपासना की है। पांचवे देवलोक में उत्पन्न होनेवाले सभी ब्रह्मेन्द्र आपकी उस प्रतिमा जी की पूजा भक्ति करते थे। *आज आपके बताने पर ही इस प्रतिमा जी की अशाश्वतता का पता चला है। हम तो इसे शाश्वत ही मानते थे।*
उस समय प्रभु कहते हैं कि *"हे इंद्र तिर्च्छालोक की तरह देवलोक में अशाश्वती प्रतिमा नहीं होती इसलिए आप उस प्रतिमा को यहाँ लाओ।"* प्रभु की आज्ञा से इंद्र शीघ्र ही वह प्रतिमा जी को लेकर आए। कृष्ण महाराजा ने हर्ष से पूजा करने के लिए वह प्रतिमा जी प्रभु से ली। *सुर - असुर और नरेन्द्र श्री नेमिनाथ प्रभु को वन्दन करके उनके मुख से रैवताचलगिरि का माहात्म्य सुनने लगे।*

प्रभु कहते हैं कि.......
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प्रणाम🙏जय गीरनार जी🐚जय नेमिनाथ जी 🐚नरवाहन राजा का जीव ,प्रभु को पुछते है कि 👉 "हे स्वामी!  मेरे इस भवसागर का परिभ्रमण कभ...
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जय गीरनार जी🐚
जय नेमिनाथ जी 🐚

नरवाहन राजा का जीव ,प्रभु को पुछते है कि 👉 "हे स्वामी! मेरे इस भवसागर का परिभ्रमण कभी रुकेगा या नहीं? आपके द्वारा वर्णन किए हुए मुक्ति रूप मेवा का आस्वाद करने का अवसर मुझे मिलेगा या नहीं? उसकी शंका का निवारण करते हुए धर्मसार्थवाह प्रभु कहते हैं , " *हे ब्रह्मदेव! आप आनेवाली अवसर्पिणी में श्री अरिष्टनेमि नामक बाईसवें तीर्थंकर होनेवाले है, उनके वरदत्त नामक प्रथम गणधरपद को प्राप्त करके , भव्यजीवों को बोध कराके , सर्वकर्मों का क्षय करके , रैवतगिरि के आभूषण बनके परमपद को प्राप्त करेंगे।* यह निःसंशय बात है।" प्रभु के इन अमृतवचनों को सुनकर आनंदविभोर हुए ब्रह्मेंद्र सागर प्रभु को अत्यंत आदरपूर्वक अभिवंदन करके अपने देवलोक में जाते है।

*"अहो! मेरे अज्ञानरूपी अंधकार का छेदन करनेवाले , मेरे भवसंसार के तारणहार श्री नेमिनिरंजन की उत्कृष्ट रत्नों की प्रतिमा बनाकर उनकी भक्ति द्वारा मेरे कर्मों का क्षय करूँ।"* इस भाव के साथ *बारह-बारह योजन* तक जिनकी कांति फैले ऐसे *अंजन स्वरूपी प्रभु की वज्रमय प्रतिमाजी बनाकर दस सागरोपम तक निशदिन शाश्वत प्रतिमा की तरह संगीत-नृत्य-नाटकादि द्वारा त्रिकाल उपासना करते हैं।* इस तरह श्री नेमिनाथ प्रभु की भक्ति में उत्तरोत्तर उत्तमभाव लाकर *स्व आयुष्य की अल्पता को जानकर उस प्रतिमाजी के साथ सुवर्णमय , रत्नमय ऐसी अन्य प्रतिमाओं को भी रैवताचल पर्वत की गुफा में कंचनबलानक नामक चैत्य का निर्माण करके स्थापना की। स्व आयुष्य पूर्ण करके , वहाँ से च्यवन करके अनेक बड़े-बड़े भवों को प्राप्त करके वह नेमिनाथ प्रभु के समय में पुण्यसार नामक राजा बने।"*
यह पुण्यसार नामक राजा पूर्वभवों में......

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दीवाने दादा के 🐚
एक नजर गिरनार की ओर 🐚
हर कदम गिरनार की ओर 🐚

प्रणाम🙏जय गिरनार जी 🐚जय नेमिनाथ जी 🐚*वर्तमान श्री नेमिनाथ परमात्मा की प्रतिमाजी का इतिहास*               (जानिये गिरनार ...
26/09/2021

प्रणाम🙏
जय गिरनार जी 🐚
जय नेमिनाथ जी 🐚

*वर्तमान श्री नेमिनाथ परमात्मा की प्रतिमाजी का इतिहास*
(जानिये गिरनार को)

*"४५ लाख योजन के विस्तारवाली, उल्टे छत्र के आकारवाली,श्वेतवर्ण की सिद्धशिला है। वह चौदराजलोक के अग्रभाग पर बारह देवलोक, नवग्रेवैयक, सर्वार्थसिद्ध नामक अनुत्तरविमान से १२ योजन ऊपर स्थित है।* सिद्धशिला मध्य भाग में आठ योजन मोटी है और दोनों तरफ पतली होते होते मक्खी के पंख के जितनी अतिशय पतली हो जाती है। मोती, शंख, स्फटिकरत्न समान अतिनिर्मल , उज्जवल सिद्धशिला और अलोक के बीच का एक योजन अंतर होता है। 👇
👉 इस अंतर में उपर की सपाटी पर उत्कृष्ट से ३३३ धनुष्य और ३२ अंगुल के उत्कृष्ट देहप्रमाण वाले सिद्ध के जीव आठ कर्मों से मुक्त होकर अलोक की सपाटी को स्पर्श करके रहे हुए है , उस भाग को मोक्ष कहते हैं। *मोक्ष के मुक्ति, सिद्धि, परमपद, भवनिस्तार, अपुनर्भव, शिव, नि:श्रेयस, निर्वाण, अमृत, महोदय, ब्रह्म, महानंद आदि अनेक नाम हैं। उस मुक्तिपुरी में अनंत सिद्ध जीव अनंत सुख में वास करते हैं। वे अविकृत, अव्ययरुप, अनंत, अचल, शांत, शिव, असंख्य, अक्षय, अरुप और अव्यक्त हैं। उनका स्वरुप मात्र जिनेश्वर भगवंत अथवा केवली भगवंत ही जानते हैं।*
😍 सर्वार्थसिद्ध विमान में निर्मल अवधिज्ञान वाले महेन्द्रों को एक करवट बदलने में १६।। सागरोपम का काल पसार होता है। इस तरह ३३ सागरोपम के आयुष्य को अगाध सुख में सोते सोते ही पूर्ण करते हैं। इससे भी अनंतागुणा सुख मोक्ष में हैं। योग से पवित्र ऐसे पुरुष कर्म का नाश होने से स्वयं ही जान सकते है, किंतु वचन द्वारा वर्णन न हो सके ऐसा मुक्तिसुख सिद्ध के जीव प्राप्त करते हैं। 🐚
*इस देशना के समय पांचवे देवलोक में इन्द्र बने हुए नरवाहन राजा का जीव वीतराग की वाणी का सुधापान करके , स्वर्ग के सुखों की नि:स्पृहा करके , सर्वज्ञ भगवंत को नमन करके पूछते है* , -

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प्रणाम🙏जय गिरनार जी 🐚जय नेमिनाथ जी🐚*वर्तमान श्री नेमिनाथ परमात्मा की प्रतिमाजी का इतिहास*               (जानिये गिरनार क...
26/09/2021

प्रणाम🙏
जय गिरनार जी 🐚
जय नेमिनाथ जी🐚

*वर्तमान श्री नेमिनाथ परमात्मा की प्रतिमाजी का इतिहास*
(जानिये गिरनार को)

👀 इस जंबूद्वीप के भरतक्षेत्र की *गत चौबीसी के सागर नामक तीसरे तीर्थंकर को केवलज्ञान* प्राप्त हुआ था। उत्तम ज्ञान की प्राप्ति के पश्चात विभिन्न प्रदेशों में विचरण करते हुए वे अपने चरण कमल की रज द्वारा भरतखंड की धन्य धरा को पावन कर रहे थे। 👁 एक बार *उज्जैनी नगरी के बाहर उद्यान में* करोड़ों देवों द्वारा रचित समवशरण में परमात्मा की सुमधुर देशना का अमृतपान कर रहे *नरवाहन राजा* ने परमात्मा से प्रश्न किया कि " *हे प्रभु! मेरा मोक्ष कब होगा* ? परमात्मा ने कहा कि अगली चौबीसी के 22वें तीर्थंकर बालब्रह्मचारी श्री नेमिनाथ भगवान के शासन में तेरा मोक्ष होगा। 🐚
(बोलो बोलो श्री नेमिनाथ भगवान की जय😍)
अपने भाविवृतांत को जानकर *वैराग्यवासित बने नरवाहन राजा भगवान के पास दीक्षा लेकर* संयमधर्म की उत्कृष्ट आराधना करने लगे! कालक्रम से आयुष्य पूर्ण होते ही *वह जीव पांचवें देवलोक के दस सागरोपम के आयुष्यवाले इन्द्र बने!* 🐚
अष्टमहाप्रातिहार्ययुक्त विश्वविभु विचरण करते-करते चंपापुरी के महाउद्यान में समवसरे! उस समय वैराग्यसभर वाणी द्वारा बारह पर्षदा को प्रतिबोध करते हुए परमेश्वर चौदराजलोक में रहे हुए सिद्धजीव और सिद्धशिला के स्वरुप को सुरम्य वाणी द्वारा प्रकाशित कर रहे थे , कि- 🐚

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गिरनार जी के 55 points ग्रुप में Complete हो गये हैं! अब *प्रभु प्रतिमाजी का इतिहास* ग्रुप में आयेगा.... आगे गिरनार जी की बहुत सी stories आयेगी! आप सभी गिरनारमय रहो , गिरनार के बारे में जानो , गिरनार की यादों में जिंदगी के सफर को सुहाना करो , यही प्रभु से हमारी प्रार्थना है!🐚

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