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कुण्डली में बनने वाले योग ही बताते है कि व्यक्ति की आजीविका का क्षेत्र क्या रहेगा. प्रशासनिक सेवाओं में प्रवेश की लालसा ...
09/07/2015

कुण्डली में बनने वाले योग ही बताते है कि व्यक्ति की आजीविका का क्षेत्र क्या रहेगा. प्रशासनिक सेवाओं में प्रवेश की लालसा अधिकांश लोगों में रहती है. आईये देखें कि कौन से योग प्रशासनिक अधिकारी के कैरियर में आपको सफलता दिला सकते हैं.
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1. उच्च शिक्षा के योग (Astrology Yoga for Higher Studies)
आई. ए. एस. जैसे उच्च पद की प्राप्ति के लिये व्यक्ति की कुण्डली में शिक्षा का स्तर अच्छा होना चाहिए. शिक्षा के लिये शिक्षा के भाव दूसरा, चतुर्थ भाव, पंचम भाव व नवम भाव को देखा जाता है. इन भाव/भावेशों के बली होने पर व्यक्ति की शिक्षा उतम मानी जाती है. शिक्षा से जुडे ग्रह है बुध, गुरु व मंगल इसके अतिरिक्त शिक्षा को विशिष्ट बनाने वाले योग भी व्यक्ति की सफलता का मार्ग खोलते है. शिक्षा के अच्छे होने से व्यक्ति नौकरी की परीक्षा में बैठने के लिये योग्यता आती है.

2. आवश्यक भाव: छठा, पहला व दशम घर (Importance of Bhava - 1st, 6th and 10th house)
किसी भी प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षा में सफलता के लिये लग्न, षष्टम, तथा दशम भावो/ भावेशों का शक्तिशाली होना तथा इनमे पारस्परिक संबन्ध होना आवश्यक है. ये भाव/ भावेश जितने समर्थ होगें और उनमें पारस्परिक सम्बन्ध जितने गहरे होगें उतनी ही उंचाई तक व्यक्ति अपनी नौकरी में जा सकेगा.

इसके अतिरिक्त सफलता के लिये पूरी तौर से समर्पण तथा एकाग्र मेहनत की आवश्यकता होती है. इन सब गुणौ का बोध तीसरा घर कराता है. जिससे पराक्रम के घर के नाम से जाना जाता है. तीसरा भाव इसलिये भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योकी यह दशम घर से छठा घर है. इस घर से व्यवसाय के शत्रु देखे जाते है.

इसके बली होने से व्यक्ति में व्यवसाय के शत्रुओं से लडने की क्षमता आती है. यह घर उर्जा देता है. जिससे सफलता की उंचाईयों को छूना संभव हो पाता है.

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3. आवश्यक ग्रह (Graha in your Horoscope)
कुण्डली के सभी ग्रहों में सूर्य को राजा की उपाधि दी गई है. तथा गुरु को ज्ञान का कारक कहा गया है. ये दो ग्रह मुख्य रुप से प्रशासनिक प्रतियोगिताओं में सफलता और उच्च पद प्राप्ति मे सहायक ग्रह माना जाता है. एसे अधिकारियों के लिये जिनका कार्य मुख्य रुप से जनता की सेवा करना है.

उनके लिये शनि का महत्व अधिक हो जाता है. क्योकि शनि जनता व प्रशासनिक अधिकारियों के बीच के सेतू है. कई प्रशासनिक अधिकारी नौकरी करते समय भी लेखन को अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने में सफल हुए है. यह मंगल व बुध की कृपा के बिना संभव नहीं है. मंगल को स्याही व बुध को कलम कहा जाता है.

प्रशासनिक अधिकारी मे चयन के लिये सूर्य, गुरु, मंगल, राहु व चन्द्र आदि ग्रह बलिष्ठ (Guru, Surya, Mangal, Rahu and Chandra should be powerful) होने चाहिए. मंगल से व्यक्ति में साहस, पराक्रम व जोश आता है. जो प्रतियोगीताओं में सफलता की प्राप्ति के लिये अत्यन्त आवश्यक है.

4. अमात्यकारक ग्रह की भूमिका (Role of Amatyakarak Graha)
प्रशासनिक अधिकारी के पद की प्राप्ति के लिये अमात्यकारक ग्रह बडी भूमिका निभाता है. अगर किसी कुण्डली में अमात्यकारक बली है. (स्वग्रही, उच्च के, वर्गोतम) आदि स्थिति में हों. तथा केन्द्र में है. इसके अतिरिक्त बलशाली अमात्यकारक (Powerful Amatyakarak Graha) तीसरे व एकादश घरों में होने पर व्यक्ति को अपने जीवन काल में काफी उंचाई तक जाने का मौका मिलता है.

इस स्थिति में व्यक्ति को एसे काम करने के अवसर मिलते है. जिनमें वह आनन्द का अनुभव कर पाता है. अमात्यकारक नवाशं में आत्मकारक से केन्द्र अथवा तीसरे या एकादश भाव में हो तो व्यक्ति को सुन्दर व बाधा रहित नौकरी मिलती है. इसलिये अमात्यकारक की नवाशं में स्थिति भी देखी जाती है.

5. दशायें (Dashas)
व्यक्ति की कुण्डली में नौकरी में सफलता मिलने की संभावनाएं अधिक है. और दशा भी उन्ही ग्रहों से संबन्धित मिल जाये तो सफलता अवश्य मिलती है. व्यक्ति को आई.ए.एस. बनने के लिये दशम, छठे, तीसरे व लग्न भाव/भावेशों की दशा मिलनी अच्छी होगी.

6 अन्य योग (Other astrology Yoga)
क) भाव एकादश का स्वामी नवम घर में हो या दशम भाव के स्वामी से युति या दृ्ष्ट हो तो व्यक्ति के प्रशासनिक अधिकारी बनने की संभावना बनती है.

ख) पंचम भाव में उच्च का गुरु या शुक्र होने पर उसपर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तथा सूर्य भी अच्छी स्थिति में हो तो व्यक्ति इन्ही ग्रहों की दशाओं में उच्च प्रशासनिक अधिकारी बनता है.

ग) लग्नेश और दशमेश स्वग्रही या उच्च के होकर केन्द्र या त्रिकोण में हो और गुरु उच्च का या स्वग्रही हो तो भी व्यक्ति की प्रशासनिक अधिकारी बनने की प्रबल संभावना होती है.

घ) कुण्डली के केन्द्र में विशेषकर लग्न में सूर्य, और बुध हों और गुरु की शुभ दृ्ष्टि इन पर हो तो जातक प्रशासनिक सेवा में उच्च पद प्राप्त करने में सफल रहता है
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तलाक और पुनर्विवाह योग (M) : +91-9876676993 अधिक जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट देखें !http://www.worldsbestastrologer.com...
08/07/2015

तलाक और पुनर्विवाह योग
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तलाक : सप्तम स्थान, शुक्र व सप्तमेश पाप प्रभाव में हो, सप्तम स्थान में मंगल, शनि, राहु, केतु, हर्षल, नेपच्यून जैसे ग्रहों की दृष्टि हो या ये ग्रह सप्तम स्थान से रहित हो तो वैवाहिक जीवन तनावपूर्ण होकर तलाक तक की नौबत आती है।
विशेष कर राहु-केतु, मंगल, नेपच्यून तलाक व संबंध विच्छेद कराते हैं।
अकेला शनि (निर्बल) तलाक तो नहीं कराता मगर वैवाहिक जीवन को नारकीय बना देता है।
पुनर्विवाह योग : पुनर्विवाह देखने के लिए नवम स्थान का विचार किया जाता है।
सप्तम स्थान व शुक्र पाप प्रभाव में हो, मगर नवम स्थान शुभ हो, प्रबल हो तो पुनर्विवाह योग बन जाता है।
विशेषकर यदि शुक्र राहु-केतु-नेपच्यून के साथ हो तो वैवाहिक जीवन में दरार-संशय निर्माण हो, पुनर्विवाह योग बनाता है।
विशेष : यह ध्यान रखना चाहिए कि मंगल, राहु, केतु, नेपच्यून तीव्र गति से कार्य करते हैं अर्थात शीघ्र बुरा-अच्छा फल देते हैं मगर शनि देर से प्रभाव दिखाता है। यदि शुक्र व बुध नवम भाव के स्वामी हो तो पुनर्विवाह योग जल्दी.बनता है।
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पति-पत्नी के बीच अनबन को दूर करने के मंत्र :(M) : +91-9876676993 अधिक जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट देखें !http://www.wor...
08/07/2015

पति-पत्नी के बीच अनबन को दूर करने के मंत्र :
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पति-पत्नी का रिश्ता बहुत ही पवित्र और अटूट होता है, लेकिन यह एक ऐसा रिश्ता भी है जहां कलह-क्लेश की सबसे ज्यादा गुंजाइश होती है। कभी-कभी यह क्लेश काफी बढ़ जाता है, जो जिंदगी को तबाह करने पर भी तुल जाता है। इस आपसी सामंजस्य को बेहतर बनाने के लिए कुछ ऐसे मंत्र भी हैं, जिनका जाप आपके इस कलह-क्लेश को आपसे दूर कर सकता है। आइए, जानें वैवाहिक जीवन को बेहतर बनाने और आपसी अनबन को दूर भगाने के लिए किन मंत्रों का जाप करना उचित है।
कुछ जोड़े कुत्ते-बिल्लियों की तरह लड़ते-झगड़ते रहते हैं, जिनके कारण उनका वैवाहिक जीवन एकदम खराब हो जाता है। इसे दूर करने के लिए आप सूर्योदय से पहले स्नान आदि के बाद किसी मंदिर में जाकर शिवलिंग पर जल चढ़ाएं और इस मंत्र का जाप करें।
ओम् नम: संभवाय च मयो भवाय च नम:
शंकराय च मयस्कराय च नम: शिवाय च शिवतराय च।।
पति-पत्नी के मतभेद को दूर करने के लिए कुछ लोग मंत्र जाप का भी सहारा लेते हैं। कहते हैं यदि यह जप विधि-विधान से किया जाए तो पति-पत्नी के बीच कभी अनबन नहीं होती साथ ही प्रेम भी बढ़ता है।
अक्ष्यौ नौ मधुसंकाशे अनीकं नौ समंजनम्।
अंत: कृणुष्व मां ह्रदि मन इन्नौ सहासति।।
कब करें जप:
सुबह उठकर स्नान के बाद किसी एकांत जगह आसन बिछा लें और पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बैठें। सामने मां पार्वती की प्रतिमा या चित्र रखें और श्रद्धापूर्वक उनकी स्तुति करते हुए 21 बार ऊपर लिखे मंत्र का जाप करें।
वैवाहिक सुख की प्राप्ति और अनबन के निवारण के लिए सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर भगवती दुर्गा की प्रतिमा के सामने दीया और अगरबत्ती जलाकर पुष्प अर्पित करें। अब नीचे लिखे मंत्र का 108 बार जाप करें। ज्योतिषी औऱ पंडितों का मानना है कि ऐसा करने से कुल 21 दिनों में ही सुख-शांति का वातारण व्याप्त हो जाएगा-
मंत्र
धां धीं धूं धूर्जटे! पत्नी वां वीं वूं वाग्धीश्वरि।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि! शांत शीं शूं शुभं कुरू।।
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07/07/2015

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रत्न भी बदल देते हैं मनुष्य की तकदीरकहते हैं कि घूरे के दिन भी बदलते हैं तो इंसान के क्यों‍ नहीं। कहावत सच तो है लेकिन ल...
06/07/2015

रत्न भी बदल देते हैं मनुष्य की तकदीर

कहते हैं कि घूरे के दिन भी बदलते हैं तो इंसान के क्यों‍ नहीं। कहावत सच तो है लेकिन लंबा इंतजार करने से अच्छा है यदि आपकी कुंडली सही है तो रत्न धारण करने से अच्छी सफलता मिल सकती है। लेकिन रत्न धारण करने से पहले किसी पारंगत ज्योतिषी से सलाह लेना आवश्यक है।
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आजकल कई ज्योतिषी राशि के अनुसार रत्न पहना देते हैं जो कभी-कभी नुकसानदायक भी हो सकता है। आप इस राशि के हैं तो यह रत्न पहन लीजिए। ऐसा कहकर वे रत्न पहना देते हैं। जबकि राशि के साथ ही राशि स्वामी ‍की स्थिति उसके बैठने का स्थान आदि भी बहुत महत्व रखते हैं। जातक को क्या आवश्यकता है, इस बात का ध्यान नहीं रखते।

रत्न पहनाने के ‍पहले उस ग्रह की नवांश व अन्य वर्गों में क्या स्थिति है, उसकी डिग्री क्या है? यह देखना जरूरी है। तभी जाकर सही रत्न पहनकर भरपूर लाभ उठाया जा सकता है। कहते हैं कि घूरे के दिन भी बदलते हैं तो इंसान के क्यों‍ नहीं। कहावत सच तो है लेकिन लंबा इंतजार करने से अच्छा है यदि आपकी कुंडली सही है तो रत्न धारण करने से अच्छी सफलता मिल सकती है।

आपकी जन्म पत्रिका में लग्नेश मित्र राशि में हो या भाग्य में मित्र का होकर बैठा हो या पंचम में स्वराशि का हो या मित्र राशि का हो। चतुर्थ भाव में मित्र का हो या उच्च का हो तब उससे संबंधित रत्न धारण करने से अच्छे परिणाम मिलते हैं।

भाग्य नवम भाव का स्वामी नवम में हो या स्वराशि का होकर बैठा हो या मित्र राशि का होकर लग्न, चतुर्थ, पंचम, तृतीय, दशम या एकादश में हो या उच्च का होकर द्वादश में हो तो उससे संबंधित रत्न पहनकर अच्छा लाभ उठाया जा सकता है। विद्या, संतान भाव को प्रबल करना हो तो उस भाव का स्वामी नवम में होकर मित्र राशि का हो तो उस भाव के स्वामी का रत्न व पंचम भाव का रत्न नवम भाव से संबंधित रत्न जिस उँगली में पहनते हों तो उसमें पहनने से संतान का भाग्य, विद्या दोनों बढ़ते हैं और मनोरंजन के साधनों में वृद्धि होती है।

मान-प्रतिष्ठा बढ़ती है। चतुर्थ भाव का रत्न भी पहनकर माता, भूमि, भवन, जनता से संबंधित कार्यों में लाभ उठाया जा सकता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि नवांश में नीच का न हो, नहीं तो लाभ के बजाए नुकसान ही होता है। इसी प्रकार पंचमेश विद्या विचार शुभ हो तो उस रत्न से अच्छा लाभ मिल सकता है। यदि जो रत्न पहना जाए उसकी महादशा का या अंतर्दशा चर ही हो तो अच्छे परिणाम मिलते हैं।

रत्न पहनने से पहले शुभ मुहूर्त में ही रत्न बनवाना चाहिए और प्राण-प्रतिष्ठा कर पहनना चाहिए। फिर देखिए कैसे नहीं रत्न तकदीर बदलने में कामयाब होता है।

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अनचाहे संकटों का साया मंडराता रहता है ऐसे घर पर।अपने खूबसूरत घर का सपना हर कोई देखता है। जिसमें वह खुशी-खुशी अपने घर- पर...
06/07/2015

अनचाहे संकटों का साया मंडराता रहता है ऐसे घर पर।
अपने खूबसूरत घर का सपना हर कोई देखता है। जिसमें वह खुशी-खुशी अपने घर- परिवार के साथ जीवन निर्वाह कर सके। घर चाहे जितना भी आलीशान, शानदार, बेजोड़ और अकल्पनीय सुख-सुविधाओं से संपन्न हो अगर वह शास्त्रों के अनुसार सही स्थान पर न बना हो तो घर पर अनचाहे संकटों का साया मंडराता रहता है। परिवार के सदस्य जितने भी प्रयत्न कर लें सुख नहीं भोग सकते। भविष्य पुराण के अनुसार कुछ ऐसे स्थान बताए गए हैं जहां घर नहीं बनाना चाहिए-
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1. नगर के द्वार पर घर न बनाएं। यह वह स्थान होता है जहां से शहर की सीमा समाप्त होती है या आरंभ होती है। शहर के बाहर बसे घर में चोर, डाकू की संभावना तो बनी ही रहती है साथ में कोई भी संकट आने पर मदद प्राप्त करने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
2. वास्तु के अनुसार चौक-चौराहे पर घर बनाना अप्रकृतिक अपादाओं को खुला न्यौता देना है। घर पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। भविष्य पुराण के मतानुसार चौक या चौराहे पर हमेशा हलचल बनी रहती है। जिससे की घर में अशांति का माहौल बना रहता है।
3. जिस स्थान पर यज्ञ किए जाते हैं। उसके पास घर न बनाएं क्योंकि नियम है कि यज्ञशाला में अथवा उसके समीप भी सोना नहीं चाहिए। ये स्थान बहुत ही शुद्ध एवं पवित्र माने जाते हैं।
4. जिस स्थान पर शिल्पकार रहते हों उस स्थान पर अधिक मात्रा में ध्वनी प्रदूषण फैलता है। जिससे नकारात्मर ऊर्जा का प्रभाव बढ़ता है। ऐसे स्थान के पास भी घर नहीं बनाना चाहिए।
5. जिन स्थानों पर जुआ खेला जाता है या मांस-मदिरा बेचे एवं खाए पीए जाते हैं ऐसे स्थानों पर घर बनाना तो दूर वहां से निकलना भी भविष्य को अंधकार में ले जाता है। इन स्थानों पर अनैतिक कार्य होते हैं। जिसका दुष्प्रभाव घर-परिवार पर पड़ता है।
6. जिस स्थान पर ढोंगी अथवा किसी ऊंचे औहदे पर काम करने वालों के नौकर रहते हों ऐसे स्थान पर रहने से आपको जान-माल की हानि कभी भी हो सकती है।
7. मंदिर के मार्ग में घर लेने से वहां हमेशा लोगों का आना-जाना लगा रहता है। जिस वजह से घर में शांति का वातावरण स्थापित नहीं हो पाता हमेशा शोर मचा रहता है। बीमार लोग स्वस्थ होने की इच्छा से मंदिर जाते हैं उनके बैक्टीरिया-वायरस का प्रभाव घर पर भी हो सकता है।
8. किसी भी ऊंचे पद वाले अधिकारी के घर के समीप अपना घर न बनाएं। उन पर आई आपत्ति का प्रभाव आपके घर परिवार पर भी पड़ेगा।
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आजकल लड़के-लड़कियाँ उच्च शिक्षा या अच्छा करियर बनाने के चक्कर में बड़ी उम्र के हो जाने पर विवाह में काफी विलंब हो जाता है। ...
04/07/2015

आजकल लड़के-लड़कियाँ उच्च शिक्षा या अच्छा करियर बनाने के चक्कर में बड़ी उम्र के हो जाने पर विवाह में काफी विलंब हो जाता है। उनके माता-पिता भी असुरक्षा की भावनावश बच्चों के अच्छे खाने-कमाने और आत्मनिर्भर होने तक विवाह न करने पर सहमत हो जाने से भी विवाह में विलंब निश्चित होता है।
अच्छा होगा किसी विद्वान ज्योतिषी को अपनी जन्म कुंडली दिखाकर विवाह में बाधक ग्रह या दोष को ज्ञात कर उसका निवारण करें।
ज्योतिषीय दृष्टि से जब विवाह योग बनते हैं, तब विवाह टलने से विवाह में बहुत देरी हो जाती है। वे विवाह को लेकर अत्यंत चिंतित हो जाते हैं। वैसे विवाह में देरी होने का एक कारण बच्चों का मांगलिक होना भी होता है।
इनके विवाह के योग 27, 29, 31, 33, 35 व 37वें वर्ष में बनते हैं। जिन युवक-युवतियों के विवाह में विलंब हो जाता है, तो उनके ग्रहों की दशा ज्ञात कर, विवाह के योग कब बनते हैं, जान सकते हैं।
जिस वर्ष शनि और गुरु दोनों सप्तम भाव या लग्न को देखते हों, तब विवाह के योग बनते हैं। सप्तमेश की महादशा-अंतर्दशा या शुक्र-गुरु की महादशा-अंतर्दशा में विवाह का प्रबल योग बनता है। सप्तम भाव में स्थित ग्रह या सप्तमेश के साथ बैठे ग्रह की महादशा-अंतर्दशा में विवाह संभव है।
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गुण-मिलान ही काफी नहीं सफल विवाह के लियेविवाह मानव जीवन का एक पड़ाव है जिसके बाद इंसान अपनी पूर्व की जीवन शैली को छोड़कर...
04/07/2015

गुण-मिलान ही काफी नहीं सफल विवाह के लिये
विवाह मानव जीवन का एक पड़ाव है जिसके बाद इंसान अपनी पूर्व की जीवन शैली को छोड़कर एक नये जीवन के सफर पर चलता है। हर स्त्री पुरुष विवाह के समय अपना जीवन एक अन्जान व्यक्ति के साथ सिर्फ यह सोचकर जोड़ता है कि मेरा हम सफर जीवन में सदैव मेरा साथ निभायेगा। मेरे हर सुख-दुख को अपना सुख-दुख समझेगा और जिन्दगी में आने वाली सभी कठिनाइयों का मिलकर मुकाबला करेगा। विवाह को पड़ाव इसलिए कहा गया है क्योंकि विवाह से पूर्व व्यक्ति सिर्फ अपने लिये सोचता है, स्वयं के लिये जीता है किन्तु विवाह के पश्चात वह अपने परिवार के लिये अपनी आने वाली संतानों के लिये जीता है। पर आज विवाह का मतलब ही बदल गया है। रोज हम हमारे समाज में कई मामलों में देखतें हैं कि व्यक्ति ग्रस्त वैवाहिक जीवन के फलस्वरूप हत्या और आत्महत्या जैसा अपराध भी कर देते हैं।
तलाक, अलगाव, दूसरा विवाह, झगड़ा आये दिन हम देखते हैं। तमाम ऐसी परिस्थितियों के लिये जिम्मेदार हैं हमारी आधुनिक शैली जो समाज को पथभ्रष्ट करती है। टीवी संस्कृति ऐसे धारावाहिक जिनका कोई अर्थ नहीं है, जिनकी तरफ इंसान खिचता चला जा रहा है और आधे से ज्यादा समय वही टीवी देखने में ही गुजारता है। इसका पूरा प्रभाव हमारे समाज, संस्कृति, बच्चों आदि पर पड़ता है। धारावाहिकों की उल्टी-सीधी कहानियों का कोई तत्व नहीं होता पर व्यक्ति अपनी रीयल जिन्दगी में इसको उतार लेता है।
हमारे देश में 80 प्रतिशत शादियां सिर्फ गुण-मिलान के आधार पर कर दी जाती हैं जो कि किसी भी गली-मुहल्ले में किसी मंदिर में बैठे पूजारी से मिलवा लिये जाते हैं, क्योंकि प्राय: सभी मंदिरों में पूजारी के पास पंचांग होता है और सभी पंचांगों में गुण-मिलान की सारणी होती है, मात्र वो सारणी देखकर जो कि एक आम आदमी भी देख सकता है, पूजारी जी कह देते हैं कि लड़के-लड़की के 28 गुण मिल रहे हैं कोई दोष नहीं हैं आप विवाह कर सकते हैं और मात्र इतने से गुण मिलान मानकर किसी के भाग्य का निर्णय हो जाता है और विवाह हो जाता है। बाद में परिणाम चाहे जो हों यहां मैं यह कहना चाहुंगा कि मेरे उक्त कथन का तात्पर्य यह कतई नहीं हैं कि मैं गुण-मिलान को आवश्यक नहीं मानता या गुण-मिलान का कोई औचित्य नहीं है, बल्कि मेरा भी यह कहना है कि एक सफल विवाह के लिये गुण मिलना भी अत्यन्त आवश्यक हैं किन्तु इसके साथ यह भी कहना है कि सिर्फ गुण-मिलान ही काफी नहीं है बल्कि पूर्ण कुंडली मिलान उससे भी ज्यादा आवश्यक है।
यहां मैं पाठकों का ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहुंगा कि प्राय: एक दिन या चौबीस घंटों में एक ही नक्षत्र होता है। मात्र एक यो दो घंटे ही चौबीस घंटों में दूसरा नक्षत्र होता है और गुण-मिलान सिर्फ किस नक्षत्र के किस चरण में जातक का जन्म हुआ है, उसके आधार पर होता है। किन्तु उन चौबीस घंटों में बारह लग्नों की बारह कुंडलियां बनती है। कहने का तात्पर्य यह कि उन चौबीस घंटों में जन्में सभी जातकों की जन्म नक्षत्र और जन्म राशि तो समान होंगी किन्तु उन सभी की कुंडलियां अलग-अलग होगी किसी के लिये गुरु, सूर्य, चंद्रमा, मंगल कारक ग्रह होगें तो किसी के लिये शुक्र, शनि या बुध कोई मांगलिक होगा। किसी की कुंडली में राजयोग तो किसी की कुंडली में दरिद्र योग होगा।
कोई अल्पायु होगा, कोई मध्यायु होगा, तो कोई दीर्घायु तो किसी कुंडली में उसका वैवाहिक जीवन बहुत अच्छा होगा तो किसी की कुंडली में बहुत खराब होगा। किसी के द्वि-विवाह, त्रि-विवाह योग होता है तो कोई अविवाहित रहता है। कहने का तात्पर्य यह है कि उन चौबीस घंटों में जन्में सभी जातकों को जन्म नक्षत्र तो एक ही होगा किन्तु सभी की कुंडलियां और उनका भाग्य अलग-अलग होगा। यहां पुन: ध्यान देने योग्य यह बात है कि गुण-मिलान सिर्फ जन्म नक्षत्रों के आधार पर ही होता है ऐसे में यदि किन्ही दो लड़के-लड़की के गुण मिलायेंगे और उनके गुण मिल भी गये किन्तु उनकी कुंडलियों में कोई दोष है तो वह विवाह कतई सफल नहीं हो सकता।
मेरे व्यक्तिगत ज्योतिषीय अनुभवों में मैंने सैकड़ों ऐसी कुंडलियां देखी हैं जिनके गुण तो 28-28, 30-30 मिल जाते हैं किन्तु उनका वैवाहिक जीवन अतियन्त कष्टप्रद है। उनके तलाक के मुकदमें चल रहे हैं या तलाक हो चुके हैं या उनका जीवन ही खत्म हो चुका है और सैकड़ों ऐसी कुंडलियां देखी गयी हैं। जिसके मात्र 8-8, 10-10 गुण ही मिलते हैं किन्तु फिर भी उनका पारिवारिक वैवाहिक जीवन सुखद उन्नतिपूर्ण चल रहा है।
अत: यहां मैं पुन: लिखना और कहना चाहुंगा कि मैं गुण मिलान के खिलाफ नहीं हूं गुण मिलान भी आवश्यक है किन्तु मेरा पाठकों से सिर्फ यह निवेदन है कि मात्र गुण मिलान पर ही पूर्ण भरोसा नहीं करें किसी योग्य ज्योतिषी से बालक-बालिका की कुंडलियां मिलवाकर ही उसके विवाह का निर्णय लें क्योंकि गुण-मिलान से ज्यादा आवश्यक है कुंडलियों का मिलना और दोनों की कुंडलियों में उनके वैवाहिक जीवन की स्थिति।
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प्रत्येक व्यक्ति के मन में ये इच्छा होती है की वह अपने सपनों का घर बना सके। वह अपनी हैसियत और वरियताओं के अनुसार अपने खु...
03/07/2015

प्रत्येक व्यक्ति के मन में ये इच्छा होती है की वह अपने सपनों का घर बना सके। वह अपनी हैसियत और वरियताओं के अनुसार अपने खुद के बनाए घर में रहना चाहता है। कुछ लोग पूरे जीवन में ऐसा करने में विफल रहते हैं, जबकि कुछ लोग अपने घर के सपनों को साकार करने में सफल रहते हैं। ऐसा अक्सर देखा जाता है के कुछ व्यक्तियों को संपत्ति प्राप्ति करने में कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और कुछ को पैत्रिक संपत्ति होते हुए भी वो उसका सुख नहीं भोग पाते। कुछ लोगों को किराए का मकान ही नसीब होता है, जबकि कुछ लोगों के पास आपार भूमि और संपत्ति होती है।

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ज्योतिष शस्त्र में व्यक्ति की कुण्डली के चौथे भाव से माता, मातृभूमि, चल-अचल संपत्ति, मकान, वाहन आदि संदर्भों को महत्वपूर्ण माना गया है। वास्तव में चौथे भाव से किसी व्यक्ति की स्थायित्व की स्थिति बताई जा सकती है, जो जातक के लिए सुखद अथवा दुखद हो सकती है। व्यक्ति को संपत्ति से कितना सुख मिलेगा अथवा व्यक्ति अपने जीवन काल में कितनी संपत्ति प्राप्त कर पाएगा अथवा व्यक्ति की संपत्ति उसकी जरुरत की पूर्ति करने वाली होगी या नहीं।
ज्योतिष विद्या से यह भी जाना जा सकता है कि किस प्रकार की संपत्ति के कारण समाज में जातक का क्या स्तर होगा अथवा किस समयांतराल में संपत्ति से संबंधित मामले सुखद और किस समयांतराल में दुखद बनें रहेंगे ? संपत्ति के लिए कुण्डली में मौजूद धन योग काफी महत्वपूर्ण होते हैं।
ज्योतिष सिद्धांत के अनुसार व्यक्ति की कुण्डली का चौथा भाव उसकी संपत्ति का ब्यौरा देता है, काल पुरुष सिद्धांत के अनुसार चौथे भाव का नैसर्गिक स्वामी चंद्रमा कहलाया जाता है, अगर किसी व्यक्ति की कुण्डली में चंद्रमा नीच राशि में विद्धमान है अथवा त्रिक भाव (6ठे, 8वे, अथवा 12वे) में स्थित है तो व्यक्ति की जीवन में संपत्ति को लेकर जटिल समस्याएं आती है। शास्त्रों में मंगल ग्रह को भूमि का अधिपति माना है तहत व्यक्ति की कुण्डली में मंगल की स्थिति भूमि से जुड़े कार्य संबोधित करती है। व्यक्ति की कुण्डली में मंगल का नीच होना अथवा लग्नेश का कमज़ोर होना पैतृक संपत्ति की प्राप्ति में व्यवधान डालता है। शनि को निर्माण और पितृ संबंधित ग्रह माना गया है। व्यक्ति की कुण्डली में शनि का नीच होना अथवा दसवें भाव का कमज़ोर होना संपत्ति के निर्माण में समस्याएं उत्पन्न करता है।
संपत्ति में उन्नत्ति के लिए उपाय
1. प्रत्येक सोमवार मिट्टी पर कच्चा दूध गिराएं।
2. सोमवार के दिन वृद्ध महिलाओं को सफ़ेद कपड़े दान करें।
3. घर की उत्तर-पश्चिम दिशा में गंगाजल का कलश स्थापित करें।
4. पारद शिवलिंग घर के पूजा घर में स्थापित करें।
5. किसी कुएं में 16 सोमवार दूध गिराएं।
पैतृक संपत्ति प्राप्ति के सरल उपाय
1. घर की दक्षिण दिशा में शहद का बर्तन स्थापित करें।
2. विधावा स्त्री की सेवा करें।
3. गाय को गुड़ खिलाएं।
4. हनुमान जी के चित्र पर सिंदूर का चोला चढ़ाएं।
5. गरीब व्यक्तिओं में इमरती/जलेबी बाटें।
संपत्ति विवाद से मुक्ति के उपाय
1. बरगद के पेड़ पर दही की लस्सी चढ़ाएं।
2. शनिवार के दिन सरसों का तेल मिट्टी में बहाएं।
3. काली गाय को पालक खिलाएं।
4. चार बादाम काले कपड़े में बांधकर घर की पश्चिम दिशा में स्थापित करें।
5. मजदूरों को काले जूते भेंट करें।
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यदि आपके घर का वातावरण सकारात्मक और शुभ होगा तो आपको समस्याओं से अपने आप मुक्ति मिल सकती है पर यदि घर में नकारात्मक ऊर्ज...
03/07/2015

यदि आपके घर का वातावरण सकारात्मक और शुभ होगा तो आपको समस्याओं से अपने आप मुक्ति मिल सकती है पर यदि घर में नकारात्मक ऊर्जा रहेगी तो वातावरण पर इसका बहुत बुरा असर दिखता है। आज हम आपको ये बताएंगे की आप अपने घर से नकारात्मक ऊर्जा को कैसे दूर कर सकते है,तो आइए जानें उन उपायों के बारे में ।
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घर के प्रवेश द्वार पर हमेशा पर्याप्त रोशनी होनी चाहिए और प्रवेश द्वार सदैव साफ रखना चाहिए। ऐसा करने पर घर में सदैव सकारात्मक ऊर्जा आती है।
यदि संभव हो तो प्रवेश द्वार पर लकड़ी की थोड़ी ऊंची दहलीज बनवाएं। जिससे बाहर का कचरा अंदर ना सके। कचरा भी वास्तु दोष बढ़ाता है।
प्रवेश द्वार पर गणेशजी की मूर्ति या तस्वीर या स्टीकर आदि लगाए जा सकते हैं। यदि आप चाहे तो दरवाजे पर ऊँ भी लिख सकते हैं। घर के प्रवेश द्वार पर ये शुभ चिह्न बनाने से देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है।
प्रवेश द्वार के सामने फूलों की सुंदर तस्वीर लगाएं। द्वार के सामने लगाने के लिए सूरजमुखी के फूलों की तस्वीर पवित्र और शुभ मानी गई है।
घर के सदस्य परस्पर सहयोग व शांति से रहें। लड़ने-झगड़ने अथवा चिल्लाकर बोलने से आभामंडल पर बुरा असर होता है।
घर के आसपास यदि कोई सूखा पेड़ या ठूंठ है तो उसे तुरंत हटा देना चाहिए। वास्तु के अनुसार सूखे पेड़ या ठूंठ से घर में नकारात्मक ऊर्जा में बढ़ोतरी हो सकती है। घर के आसपास सुंदर और हरे-भरे वृक्ष होना चाहिए।
घर में तुलसी का पौधा रहता है तो कई प्रकार के वास्तु दोष दूर रहते हैं। तुलसी के पौधे का पास रोज शाम को दीपक भी लगाना चाहिए।
इंटीरियर डेकोरेशन के लिए कुछ ऐसी कलाकृतियों का प्रयोग होता है जो सूखे ठूंठ या नकारात्मक आकृति के होते हैं। ये सभी मृतप्राय: सजावटी वस्तुएं वास्तु शास्त्र में अच्छे नहीं माने जाते हैं अत: इनके प्रयोग से भी बचें।
यदि ड्रॉइंगरूम में फूलों को सजाते हैं तो ध्यान दें कि उन्हें प्रतिदिन बदलते रहना जरुरी है। चूंकि जब ये फूल मुरझा जाते हैं तो इनसे नकारात्मक ऊर्जा निकलने लगती है।
कभी-कभी बेडरूम की खिड़की से नकारात्मक वस्तुएं दिखाई देती हैं जैसे- सूखा पेड़, फैक्ट्री की चिमनी से निकलता हुआ धुआं आदि। ऐसे दृश्यों से बचने के लिए खिड़कियों पर परदा डाल दें।
किसी भी भवन के मुख्य द्वार के पास या बिल्कुल सामने बिजली के ट्रांसफार्मर लगे होते हैं जिनसे चिंगारियां निकलती हैं । ऐसे दृश्य भी नकारात्मक ऊर्जा फैलाते हैं।
पुराने भवन के भीतर कमरों की दीवारों पर सीलन पैदा होने से बनी भद्दी आकृतियां भी नकारात्मक ऊर्जा का सूचक होती हैं। ऐसी दीवारों की तुरंत रिपेयरिंग करवा लें।
घर की छत पर कबाड़ा अथवा फालतू सामान न रखें। यदि जरुरी हो तो एक कोने में रखें। कबाड़ा व फालतू सामान रखने से परिवार के सदस्यों के मन-मस्तिष्क पर दबाव पड़ता है। इससे पितृ दोष भी लगता है।
घर जितना प्राकृतिक लगेगा उतना ही उसका आभामंडल उन्नत होगा। घर का प्राकृतिक रूप देने के लिए आस-पास पेड़-पौधे, चारों ओर खुला हुआ स्थान, दूर से दिखने वाली दीवारों पर प्राकृतिक पत्थर, गमले आदि का उपयोग करें।
घर का प्लास्टर उखड़ा हुआ न हो। यदि कहीं से थोड़ा सा भी प्लास्टर उखड़ जाए तो तुरंत उसे दुरुस्त करवाएं।
घर को कलर करवाते समय इस बात का ध्यान रखें कि पेंट एक सा हो। शेड एक से अधिक हो सकते हैं लेकिन शेड्स का तालमेल ठीक होना चाहिए।
घर के आस-पास कोई गंदा नाला, गंदा तालाब, शमशान घाट या कब्रिस्तान नहीं होना चाहिए। इससे भी वातावरण में बहुत अधिक फर्क पड़ता है।
घर कितना ही पुराना हो, समय-समय पर उसकी मरम्मत, रंग-रोगन आदि कार्य करवाते रहना चाहिए ताकि नयापन व ताजगी बनी रहे।

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क्यो हो रही है संतान में देरी?(M) : +91-9876676993 अधिक जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट देखें !http://www.worldsbestastrolo...
02/07/2015

क्यो हो रही है संतान में देरी?
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मां बनना हर महिला का सपना होता है। परंतु कई प्रयासों एवं अधूरी जानकारी के कारण उनका यह स्वप्न देर से या कभी पूरा नहीं होता है। कभी-कभी गर्भ ठहरकर ही कुछ माह मे गर्भस्राव हो जाता है। बच्चा पैदा नहीं होता उसके दस कारण शास्त्रों में बताए गए हैं:उसमें यदि शुरु के नौ कारण न हो तो दसवां कारण ज्योतिष से संबंधित माना जाता है। पांचवा भाव यदि राहु, गुरु, शनि से ग्रस्त हो तथा इन पर किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि भी न हो तो संतान उत्पत्ति में परेशानी होती है, या गर्भस्राव होते हैं। ऐसे संबंधित ग्रहों के उपचार से संतान उत्पत्ति आसान हो सकती है। पंचम भाव में यदि गुरु स्थित हो तो संतान में देरी होती है, साथ ही यदि पति या पत्नी में से किसी को गुरु की महादशा भी हो तो संतान विवाह के सोलह वर्षों के बाद होने की संभावना होती है। पंचम भाव में यदि गुरु की दृष्टि हो तो संतान विवाह के 8-10 वर्षों के बाद उत्पन्न होती है। राहु या शनि से युक्त पंचम स्थान बार-बार गर्भस्राव या हिनता का कारक होता है।
क्या उपाय करें।
-संतान में देरी हो तो पुत्रदा एकादशी व्रत करें।
-हरिवंश पुराण का पाठ करें।
-कार्तिक चैत्र, माद्य माह में प्रतिपदा से नवमी (शुक्लपक्ष) रामायण का नवाह्नपरायण करें।
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