02/10/2025
राम राम जी !!!
वीरवार , 2 अक्टूबर 2025
प्रात: काल की सभा मे पूज्य श्री कृष्ण जी महाराज (पिता जी) और पूज्य श्री रेखा जी महाराज (माँ जी) के सानिध्य मे ऋषि नगर लुधियाना, में दस दिन से चल रहे रामायण ज्ञान यज्ञ, सेवा यज्ञ और जप यज्ञ की पूर्णाहुति श्री रामायण जी में भरत-मिलाप-काण्ड में चौपाइयों से की गई।
जिस मे हजारों की संख्या में साधकों ने शामिल होकर गुरुजनों का आशीर्वाद लिया।
पूज्य श्री रेखा जी महाराज (माँ जी) द्वारा श्री रामायण जी का गायन अद्धभुत था।
सभी साधक माँ जी द्वारा गाए भजन "सभी मिल मंगल गाओ रे अवध में राम आये हैं" भावविभोर होउठे।
पूज्य श्री पिता जी महाराज ने रामायणसार में भरत-मिलाप-काण्ड में से चौपाईयों का वर्णन करते हुए कहा कि:
जब माँ सीता जी को रावण की कैद से मुक्त कराया गया तो राम जी ने कहा सीता पालकी से चलकर आए क्योंकि:
विपत समर विवाह यज्ञ में जो, पति सह नारी जब भी है सो । उचित नही उस पर हो घेरा, चरित्र आदर है बहुतेरा॥
पतिव्रता शुभशीला नारी, धर्मरता जो गुण गण-क्यारी।
उन पर बन्धन नही सुहाते, उनके घेरे चरित कहाते ॥
पत्नी जो होती है वह धर्मपरायणता होती है यदि वो किसी समर में जाए, विवाह में जाए, कहीं भी जाए उसका चरित्र ही उसकी साख होती है वहां कोई पर्दों और दीवारों की ज़रूरत नही हुआ करती।
[ अपने अपनों पै जब आते, भेद-भाव नही रक्खे जाते ]
पूज्य पिता जी ने कहा:, कि जब अपनों पर बात आती है
तब भेद-भाव नही नही रखने चाहिए।
राम जी कहते हैं कि सीते जो मेरा कर्तव्य था जो एक
पत्नी का पति होने के नाते जो मेरा फर्ज़ था वो मैने निभाया।
शत्रु-हनन कर तुझे छुड़ाया, मैंने पतित्व ठीक निभाया ।
पुरुषार्थ से होता जो भी, किया गया मुझ से तो सो भी॥
सफल हुआ पुरुषार्थ मेरा, सर्व बन्धन कट गया तेरा॥
अब जहाँ तुम चाहो वहां तुम जा सकती हो ।
राम जी के ऐसे वचन सुनकर माँ सीता आवेश में आ जाती हैं ओर कहती हैं:
करो विश्वास न हूँ मैं वैसी, कही गई हूँ तुझ से जैसी ।
लख कर कोई चरित-विहीना, सबको कहना कुलटा हीना ॥
स्त्रीमात्र को दोष लगाना, कर्म निपट यह है अनजाना ।
मेरे मन के हो कर भेदी, फिर क्यों होते हो यों खेदी ॥
यदि तव संशय मैं लख लेती, तो तन वहीं भस्म कर देती।
ओछे नरवत् हो कर कोपी, अनहोनी मुझ पर आरोपी ॥
जनक-सुता मैं भी कहलाऊँ, दोष का संशय सह न पाऊँ ।
पास खड़े लक्ष्मण को बोली, मेरी तो अति दुर्गति हो ली ॥
अपवाद मिथ्या सहा न जाता, जीना जग में मूल न भाता ।
अच्छा यही है मैं जल जाऊँ, तन अपने को भस्म बनाऊँ ॥
राम जी की आज्ञा पा कर लकड़ी चीनी जाती है
जब माँ सीता जी ने उस अग्नि में प्रवेश किया:,
मंत्र-मुग्ध समा वह ज्वाला, शान्त हुई सह ज्वाला माला ।
सिया प्रकट हुई तब त्यों ही, सोना कुन्दन होता ज्यों ही ॥
जनता ने सो देखी सीता, पतित पावनी परम पुनीता ।
भाव भरी भगवती भवानी, जगन्मात जगदम्बा जानी ॥
पूज्य श्री पिता जी महाराज जी ने सभी सेवकों का धन्यवाद करते हुए कहा कि:
सेवक कहे नाम के भूखे , लगते दाम उन्हें रूखे सूखे
[जो जन मन से सेवा साधे , स्वार्थ तज कार्य आराधे
सुर-सम्पत भी कभी ना चाहे , तन मन धन दे धर्म कमाये
महावीर कर्मी महा त्यागी , भक्तराज वह है बड़भागी
ऐसे सेवक सुजन सहारे , होते कार्य जग मे सारे
जाती देश की सब बन आती , धर्म कर्म खेती फल लाती
कठिन कर्म है सेवक होना, सत्य धर्म हित तन तक खोना
होना कभी न स्वामी द्रोही, स्वार्थी लम्पट क्रोधी मोही]
पूज्य श्री रेखा जी महाराज (माँ जी) ने रामायण-परिषट में
श्री स्वामी जी महाराज जी के दोहे:
रामायण कली कमल में,
है सुगन्ध मकरन्द।
हो नहीं कभी मन्द यह,
याचे सत्यानन्द ।।