Bharat ki Sanskriti

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.                    पुरुषोत्तम मास माहात्म्य                            अध्याय–02          सूतजी बोले–‘राजा परीक्षित् क...
17/07/2023

. पुरुषोत्तम मास माहात्म्य
अध्याय–02

सूतजी बोले–‘राजा परीक्षित् के पूछने पर भगवान् शुक द्वारा कथित परम पुण्यप्रद श्रीमद्भागवत शुकदेवजी के प्रसाद से सुनकर और अनन्तर राजा का मोक्ष भी देख कर अब यहाँ यज्ञ करने को उद्यत ब्राह्मणों को देखने के लिये मैं आया हूँ और यहाँ यज्ञ में दीक्षा लिये हुए ब्राह्मणों का दर्शन कर मैं कृतार्थ हुआ।’
ऋषि बोले–‘हे साधो! अन्य विषय की बातों को त्यागकर भगवान् कृष्णद्वैपायन के प्रसाद से उनके मुख से जो आपने सुना है वही अपूर्व विषय, हे सूत! आप हम लोगों से कहिये। हे महाभाग! संसार में जिससे परे कोई सार नहीं है, ऐसी मन को प्रसन्न करने वाली और जो सुधा से भी अधिकतर हितकर है ऐसी पुण्य कथा, हम लोगों को सुनाइये।’
सूतजी बोले–‘विलोम (ब्राह्मण के चरु में क्षत्रिय का चरु मिल जाने) से उत्पन्न होने पर भी मैं धन्य हूँ जो श्रेष्ठ पुरुष भी आप लोग मुझसे पूछ रहे हैं। भगवान् व्यास के मुख से जो मैंने सुना है वह यथाज्ञान मैं कहता हूँ।
एक समय नारदमुनि नरनारायण के आश्रम में गये। जो आश्रम बहुत से तपस्वियों, सिद्धों तथा देवताओं से भी युक्त है, और बैर, बहेड़ा, आँवला, बेल, आम, अमड़ा, कैथ, जामुन, कदम्बादि और भी अनेक वृक्षों से सुशोभित है। भगवान् विष्णु के चरणों से निकली हुई पवित्र गंगा और अलकनन्दा भी जहाँ बह रही हैं। ऐसे नर नारायण के स्थान में श्री नारद मुनि ने जाकर उन परब्रह्म नारायण को जिनका मन सदा चिन्तन में लगा रहता है, जिसके जितेन्द्रिय, काम क्रोधादि छओ शत्रुओं को जीते हुए हैं, अत्यन्त प्रभा जिनके शरीर से चमक रही है। ऐसे देवताओं के भी देव तपस्वी नारायण को साष्टांग दण्डवत् प्रणाम कर और हाथ जोड़कर नारद उस मुनि व्यापक प्रभु की स्तुति करने लगे।
नारदजी बोले, हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे कृपासागर सत्पते! आप सत्यव्रत हो, त्रिसत्य हो, सत्य आत्मा हो, और सत्यसम्भव हो। हे सत्ययोने! आप को नमस्कार है। मैं आपकी शरण में आया हूँ। आपका जो तप है वह सम्पूर्ण प्राणियों की शिक्षा के लिये और मर्यादा की स्थापना के लिये है। यदि आप तपस्या न करें तो, जैसे कलियुग में एक के पाप करने से सारी पृथ्वी डूबती है वैसे ही एक के पुण्य करने से सारी पृथ्वी तरती है इसमें तनिक भी संशय नहीं है।
‘पहले सत्ययुग आदि में जैसे एक पाप करता था तो सभी पापी हो जाते थे’ ऐसी स्थिति हटाकर कलियुग में केवल कर्ता ही पापों से लिप्त होता है यह आप के तप की स्थिति है। हे भगवन्! कलि में जितने प्राणी हैं सब विषयों में आसक्त हैं।
स्त्री, पुत्र गृह में लगा है चित्त जिनका, ऐसे प्राणियों का हित करने वाला जो हो और मेरा भी थोड़ा कल्याण हो ऐसा विषय विचार कर केवल आप ही कहने के योग्य हैं। वही आपके मुख से सुनने की इच्छा से मैं ब्रह्मलोक से यहाँ आया हूँ। आप ही उपकारप्रिय विष्णु हैं ऐसा वेदों में निश्रित है। इसलिये लोकोपकार के लिये कथा का सार इस समय आप सुनाइये। जिसके श्रवणमात्र से निर्भय मोक्षपद को प्राप्त करते हैं।’
इस प्रकार नारदजी का वचन सुन भगवान्‌ ऋषि आनन्द से खिलखिला उठे और भुवन को पवित्र करने वाली पुण्यकथा आरम्भ की।
श्रीनारायण बोले–‘हे नारद! गोपों की स्त्रियों के मुखकमल के भ्रमर, रास के ईश्वर, रसिकों के आभरण, वृन्दावनबिहारी, व्रज के पति आदिपुरुष भगवान् की पुण्य कथा को कहता हूँ। जो निमेषमात्र समय में जगत्‌ को उत्पन्न करने वाले हैं उनके कर्मों को हे वत्स! इस पृथ्वी पर कौन वर्णन कर सकता है ? हे नारदमुने! आप भी भगवान्‌ के चरित्र का सरस सार जानते हैं। और यह भी जानते हैं कि भगवच्चरित्र वाणी द्वारा नहीं कहा जा सकता। तथापि अद्भुत पुरुषोत्तम माहात्म्य आदर से कहते हैं। यह पुरुषोत्तम माहात्म्य दरिद्रता और वैधव्य को नाश करने वाला, यश का दाता एवं सत्पुत्र और मोक्ष को देने वाला है अतः शीघ्र ही इसका प्रयोग करना चाहिये।’
नारद बोले–‘हे मुने! पुरुषोत्तम नामक कौन देवता हैं ? उनका माहात्म्य क्या है ? यह अद्‌भुत-सा प्रतीत होता है, अतः आप मुझसे विस्तारपूर्वक कहिये।’
सूतजी बोले, श्रीनारद का वचन सुन नारायण क्षणमात्र पुरुषोत्तम में अच्छी तरह मन लगाकर बोले।’
श्रीनारायण बोले, ‘पुरुषोत्तम’ यह मास का नाम जो पड़ा है वह भी कारण से युक्त। पुरुषोत्तम मास के स्वामी दयासागर पुरुषोत्तम ही हैं, इसीलिये ऋषिगण इसको पुरुषोत्तमास कहते हैं। पुरुषोत्तम मास के व्रत करने से भगवान् पुरुषोत्तम प्रसन्न होते हैं।’
नारदजी बोले–‘चैत्रादि मास जो हैं वे अपने-अपने स्वामी देवताओं से युक्त हैं ऐसा मैंने सुना है परन्तु उनके बीच में पुरुषोत्तम नाम का मास नहीं सुना है। पुरुषोत्तम मास कौन हैं ? और पुरुषोत्तम मास के स्वामी कृपा के निधि पुरुषोत्तम कैसे हुए ? हे कृपानिधे! यह आप मुझसे कहिये। इस मास का स्वरूप विधान के सहित हे प्रभो! कहिये। हे सत्पते! इस मास में क्या करना ? कैसे स्नान करना ? क्या दान करना ? इस मास का जप पूजा उपवास आदि क्या साधन है ? कहिये। इस मास के विधान से कौन देवता प्रसन्न होते हैं ? और क्या फल देते हैं ? इसके अतिरिक्त और जो कुछ भी तथ्य हो वह हे तपोधन! कहिये। साधु दीनों के ऊपर कृपा करने वाले होते हैं वे बिना पूछे कृपा करके सदुपदेश दिया करते हैं।
इस पृथ्वी पर जो मनुष्य दूसरों के भाग्य के अनुवर्ती, दरिद्रता से पीड़ित, नित्य रोगी रहने वाले, पुत्र चाहने वाले, जड़, गूँगे, ऊपर से अपने को बड़े धार्मिक दरसाने वाले, विद्या विहीन, मलिन वस्त्रों को धारण करने वाले, नास्तिक, परस्त्रीगामी, नीच, जर्जर, दासवृत्ति करने वाले, आशा जिनकी नष्ट हो गयी है, संकल्प जिनके भग्न हो गये हैं, तत्त्व जिनके क्षीण हो गये हैं, कुरुपी, रोगी, कुष्ठी, टेढ़े-मेढ़े अंग वाले, अन्धे, इष्टवियोग, मित्रवियोग, स्त्रीवियोग, आप्तपुरुषवियोग, मातापिताविहीन, शोक दुःख आदि से सूख गये हैं अंग जिनके, अपनी इष्ट वस्तु से रहित उत्पन्न हुआ करते हैं।
किस अनुष्ठान के करने और सुनने से, पुनः उत्पन्न न हों, हे प्रभो! ऐसा प्रयोग हमको सुनाइये। वैधव्य, वन्ध्यादोष, अंगहीनता, दुष्ट व्याधियाँ, रक्तपित्त आदि, मिर्गी राजयक्ष्मादि जो दोष हैं, इन दोषों से दु:खित मनुष्यों को देखकर हे जगन्नाथ! मैं दुःखी हूँ। अतः मेरे ऊपर दया करके, हे ब्रह्मन्! मेरे मन को प्रसन्न करने वाले विषय को विस्तार से कहिये। हे प्रभो! आप सर्वज्ञ हैं, समस्त तत्त्वों के आयतन हैं।’
सूतजी बोले, इस प्रकार नारद के परोपकारी मधुर वचनों को सुन कर देवदेव नारायण, चन्द्रमा की तरह शान्त महामुनि नारद से नये मेघ के समान गम्भीर वचन बोले।

इति श्रीबृहन्नारदीये पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
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‘जय जय श्री राधे’
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.                     “पुरुषोत्तम–मास माहात्म्य”         पुराणों में अधिकमास यानी मलमास के पुरुषोत्तम मास बनने की बड़ी ह...
16/07/2023

. “पुरुषोत्तम–मास माहात्म्य”

पुराणों में अधिकमास यानी मलमास के पुरुषोत्तम मास बनने की बड़ी ही रोचक कथा है। उस कथा के अनुसार, स्वामीविहीन होने के कारण अधिकमास को ‘मलमास’ कहने से उसकी बड़ी निन्दा होने लगी। इस बात से दु:खी होकर मलमास श्रीहरि विष्णु के पास गया और उनसे दुखड़ा रोया।
भक्तवत्सल श्रीहरि उसे लेकर गोलोक पहुँचे। वहाँ श्रीकृष्ण विराजमान थे। करुणासिन्धु भगवान श्रीकृष्ण ने मलमास की व्यथा जानकर उसे वरदान दिया–‘अब से मैं तुम्हारा स्वामी हूँ। इससे मेरे सभी दिव्य गुण तुम में समाविष्ट हो जायेंगे। मैं पुरुषोत्तम के नाम से विख्यात हूँ और मैं तुम्हें अपना यही नाम दे रहा हूँ। आज से तुम मलमास के बजाय पुरुषोत्तम मास के नाम से जाने जाओगे।’
शास्त्रों के अनुसार हर तीसरे साल सर्वोत्तम यानी पुरुषोत्तम मास की उत्पत्ति होती है। इस मास के दौरान जप, तप, दान से अनंत पुण्यों की प्राप्ति होती है। इस मास में श्रीकृष्ण, श्रीमद्भगवतगीता, श्रीराम कथा वाचन और विष्णु भगवान की उपासना की जाती है। इस माह उपासना करने का अपना अलग ही महत्व है।
पुरुषोत्तम मास में कथा पढ़ने, सुनने से भी बहुत लाभ प्राप्त होता है। इस मास में जमीन पर शयन, एक ही समय भोजन करने से अनंत फल प्राप्त होते हैं। सूर्य की बारह संक्रांति के आधार पर ही वर्ष में 12 माह होते हैं। प्रत्येक तीन वर्ष के बाद पुरुषोत्तम माह आता है।
पंचांग के अनुसार सारे तिथि-वार, योग-करण, नक्षत्र के अलावा सभी मास के कोई न कोई देवता स्वामी है, किन्तु पुरुषोत्तम मास का कोई स्वामी न होने के कारण सभी मंगल कार्य, शुभ और पितृ कार्य वर्जित माने जाते हैं।

(दान, धर्म, पूजन का महत्व)

पुराणे शास्त्रों में बताया गया है कि यह माह व्रत-उपवास, दान-पूजा, यज्ञ-हवन और ध्यान करने से मनुष्य के सारे पाप कर्मों का क्षय होकर उन्हें कई गुना पुण्य फल प्राप्त होता है। इस माह आपके द्वारा दान दिया गया एक रुपया भी आपको सौ गुना फल देता है। इसलिए अधिक मास के महत्व को ध्यान में रखकर इस माह दान-पुण्य देने का बहुत महत्व है। इस माह भागवत कथा, श्रीराम कथा श्रवण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। धार्मिक तीर्थ स्थलों पर स्नान करने से आपको मोक्ष की प्राप्ति और अनंत पुण्यों की प्राप्ति मिलती है।
पुरुषोत्तम मास का अर्थ जिस माह में सूर्य संक्रांति नहीं होती वह अधिक मास कहलाता होता है। इनमें खास तौर पर सर्व मांगलिक कार्य वर्जित माने गए है, लेकिन यह माह धर्म-कर्म के कार्य करने में बहुत फलदायी है। इस मास में किए गए धार्मिक आयोजन पुण्य फलदायी होने के साथ ही ये आपको दूसरे माहों की अपेक्षा करोड़ गुना अधिक फल देने वाले माने गए हैं।
पुरुषोत्तम मास में दीपदान, वस्त्र एवं श्रीमद् भागवत कथा ग्रंथ दान का विशेष महत्व है। इस मास में दीपदान करने से धन-वैभव में वृद्घि होने के साथ आपको पुण्य लाभ भी प्राप्त होता है।
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इस वर्ष पुरुषोत्तम मास मंगलवार 18.07.23 से आरम्भ होकर बुधवार 16.08.2023 तक रहेगा।
"जय जय श्री हरि

.                             "कांवड़ यात्रा"           आपने शिवजी के परम प्रिय मास श्रावण में भक्तो को अपने कंधे पर कांव...
15/07/2023

. "कांवड़ यात्रा"

आपने शिवजी के परम प्रिय मास श्रावण में भक्तो को अपने कंधे पर कांवड़ में जल लाते देखा होगा। यह पैदल कोसों चल कर पवित्र जल लाते हैं और फिर इस जल से शिवजी का अभिषेक करते हैं।
विष्णु अवतार भगवान परशुरामजी ने अपनी अनन्य शिव भक्ति में कांवड़ परम्परा की शुरुआत की थी। वे गंगा का जल अपनी कांवड़ में भर के रोज शिव अभिषेक किया करते थे। रामायण में भी रावण और श्री राम दोनों को परम शिवभक्त बताया गया है और दोनों ने कांवड़िया बनकर शिव अभिषेक किया था। कहते हैं इस यात्रा से मनुष्य एक तप से होकर गुजरता है जिससे आत्मविश्वास और मन में संतोष मिलता है। यात्रा पूर्ण करने पर व्यक्तित्व में निखार आता है। कांवड़ यात्रा पूर्ण करने से मनुष्य में संकल्प शक्ति बढती है।
कांवड़ को "कांवर" भी पुकारते हैं जिसका अर्थ है कंधे। इस कांवड़ में कंधे का विशेष भूमिका है, इसी कंधे के सहारे पवित्र जल की कांवड़ लाई जाती है। कंधे कांवड़ में संतुलन का कार्य करते हैं। शिव भक्त अपने कंधे पर पवित्र जल का कलश लेकर पैदल यात्रा करते हुए अपने इष्ट शिवलिंगों तक पहुँचते हैं। धार्मिक मान्यताओं के लिये पूरे विश्व में अलग पहचान रखने वाले भारतवर्ष में कांवड़ यात्रा के दौरान भोले के भक्तों में अद्भुत आस्था, उत्साह और अगाध भक्ति के दर्शन होते हैं। कांवडियों के सैलाब में रंग-बिरंगी कांवड़े देखते ही बनती हैं।
कांवड़ लाने के दौरान नियमों में चूक होने पर कांवड़ यात्रा खंडित हो सकती है, इसलिए शिव भक्तों को कंधे पर कांवड़ रखने के बाद धार्मिक मान्यताओं का पालन करना अनिवार्य होता है। यात्रा के दौरान कोई चूक होने पर संगत के गुरु द्वारा दिए गए दंड को स्वीकार करना कांवड़ियों का धर्म माना जाता है। नियमों में जरा सी चूक होने पर सैकड़ों मील लंबी पदयात्रा कर लाई गई कांवड़ खंडित हो जाती है।
कंधे पर कांवड़ धारण करने के बाद से ही शिवभक्त पर ये नियम लागू हो जाते हैं। इनका पालन हर हाल में करना अनिवार्य होता है। नियमों का पालन करने के दौरान मुख्य रूप से पानी को जल, कुत्ते को भैरो, महिला को भोली, आदमी को भोला, बैल को नादिया, खाने को भोजन कहना चाहिए। कांवड़ लाने के दौरान किसी से द्वेष भावना रखना, गाली-गलौच करना, पशु को डंडा मारना पूरी तरह से वर्जित होता है। खड़ी कांवड़ लाने वालों के लिए अनिवार्य होता है कि वे विश्राम के दौरान कांवड़ को अपने साथी अथवा किसी अन्य व्यक्ति के कंधे पर धारण करा दें। शौच और सोने के बाद पुन: कांवड़ को अपने कंधे पर धारण करने से पूर्व स्नान करना आवश्यक होता है। कांवड़ ले जाने के दौरान धूमपान या अन्य कोई भी नशा करना पूरी तरह प्रतिबंधित होता है। अगर किसी शिवभक्त से कांवड़ यात्रा के दौरान किसी नियम की अनदेखी हो जाती है, तो फिर उसके लिए संगत के गुरु द्वारा दिए गए दंड को स्वीकार कर उसके अनुसार आचरण करना उसका धर्म बन जाता है।
एक मान्यता यह भी है कि कुत्ते का स्पर्श होते ही कांवड़ में रखा जल अशुद्घ हो जाता है जो भोले बाबा पर नहीं चढ़ाया जा सकता है। ऐसी स्थिति आने पर कांवड़िये को वापस लौटना पड़ता है और फिर से कांवड़ में जल भरकर यात्रा शुरू करनी पड़ती है। शास्त्रों में कुत्ते को काल भैरव का वाहन कहा गया है। कुत्ते का स्पर्श होने पर माना जाता है कि भैरो ने गंगा जल का स्पर्श कर लिया है इसलिए गंगा जल अशुद्घ हो गया। अशुद्घ जल शिव को नहीं चढ़ता है इसलिए कांवड़ियों को पुनः कांवड़ में जल भरना पड़ता है।
कांवड़ियों के परिजन को भी इस अवधि के दौरान घर में सब्जी छौंकना और भूनना नहीं चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से कांवड़िये को कष्ट झेलना पड़ता है। उनके पैरों में छाले पड़ जाते हैं। परिवार में बनने वाली पहली रोटी को तवे से कच्चा ही उतार लेने की परंपरा भी प्रचलित है।

"बम-बम भोले"

(((( भगवान की शरणागति ))))जो प्राणी एक बार सर्वभाव से अपने को परमात्मा के चरणों में अर्पण कर देता है, वह सदा के लिए निर्...
14/07/2023

(((( भगवान की शरणागति ))))
जो प्राणी एक बार सर्वभाव से अपने को परमात्मा के चरणों में अर्पण कर देता है, वह सदा के लिए निर्भय, निश्चिन्त और परम सुखी हो जाता है।
उसके योगक्षेम का समस्त भार भगवान स्वयं वहन करते हैं और केवट बन कर उसकी नैया को भीषण संसार-सागर से पार करा कर सुरक्षित अपने धाम में पहुंचा देते हैं।
उसे किसी प्रकार की चिन्ता करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती है। प्रभु के हाथों में अपने को सौंप देने के बाद भय, चिन्ता और चाह कैसी ?
शरणागत- वत्सल श्रीराम का विभीषण प्रेम...
ब्रह्माजी के मानस पुत्र महर्षि पुलस्त्य हुए, पुलस्त्य के विश्रवा मुनि हुए।
विश्रवा मुनि की एक पत्नी से कुबेर और दूसरी पत्नी कैकसी से रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण हुए।
रावण और कुम्भकर्ण की तरह विभीषण भी कठोर तप करने लगे। ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर विभीषण से वरदान मांगने को कहा तो विभीषण ने कहा.. ‘मुझे तो भगवान की अविचल भक्ति ही चाहिए।’
इसके बाद विभीषण लंका में रह कर भजन-पूजन करते रहते थे।
सीताहरण के बाद जब रावण ने विभीषण को लात मारकर लंका से निकाल दिया तो विभीषण श्रीराम की शरण में आए और चरण पकड़ कर कहा..
श्रवन सुजस सुनि आयहुँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।।
समुद्र तट पर राजधर्म और युद्ध धर्म की बात कह कर किसी ने भी विभीषण को शरण देने की सम्मति नहीं दी, परन्तु श्रीराम ने शत्रु का भ्राता होने पर भी विभीषण को उठाकर हृदय से लगा लिया।
सागर के जल से विभीषण का राजतिलक कर लंका का राज्य दे दिया और इस तरह संसार को अपनी शरणागत-वत्सलता की पराकाष्ठा बतला दी।
श्रीराम विभीषण से कहते हैं...
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें।
धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।
(राचमा ५।४८।८)
अर्थात्.. विभीषण तुम जैसे संत मुझे अतिशय प्रिय हैं, और मैं उनके लिए ही देह धारण करता हूँ।
वाल्मीकीय रामायण में प्रभु श्रीराम ने कहा है.. ‘जो एक बार भी शरणागत होकर कहता है.. ‘प्रभो ! मैं तुम्हारा हूँ, उसे मैं सम्पूर्ण प्राणियों से अभय कर देता हूँ। यह मेरा व्रत है।’
लंका युद्ध के दौरान प्रभु श्रीराम ने अपने वचन को सिद्ध भी कर दिया। विभीषण के ऊपर आने वाली अमोघ शक्ति के प्रहार को अपनी छाती पर झेल कर उन्होंने शरण में आए विभीषण की रक्षा की थी।
प्रभु श्रीराम को विभीषण की चिन्ता और उनकी पुन: लंका यात्रा..
लंका विजय के बहुत दिनों बाद एक बार भगवान श्रीराम को विभीषण की याद आई।
उन्होंने सोचा.. ‘मैं विभीषण को लंका का राज्य दे आया हूँ, वह धर्मपूर्वक शासन कर भी रहा है या नहीं। राज्य के मद में कहीं वह कोई अधर्म का आचरण तो नहीं कर रहा है।
मैं स्वयं लंका जाकर उसे देखूंगा और उपदेश करुंगा, जिससे उसका राज्य अनन्तकाल तक स्थायी रहे।’
श्रीराम जब लंका के लिए चलने लगे तो उनके साथ भरतजी भी चल दिए; क्योंकि उन्होंने लंका कभी देखी नहीं थी।
दोनों भाई पुष्पक विमान पर सवार होकर किष्किन्धापुरी पहुंचे। वहां से सुग्रीव भी उनके साथ लंका को चल दिए।
श्रीराम, भरत और सुग्रीव के लंका पहुंचने पर विभीषण ने साष्टांग प्रणाम करते हुए कहा..
‘प्रभो ! आज मेरा जन्म सफल हो गया, क्योंकि आज मैं जगत् के द्वारा वंदनीय आप दोनों के दर्शन कर रहा हूँ। आज मैं अपने-आप को इन्द्र से भी श्रेष्ठ समझ रहा हूँ।’
विभीषण ने अपना समूचा राज्य, सारा परिवार, और स्वयं को प्रभु श्रीराम के चरणों में अर्पित कर दिया।
विभीषण ने अपनी प्रजा को श्रीराम-भरत का दर्शन कराने के लिए अपने राजदरबार के दरवाजे खुलवा दिए। ऐसे ही तीन दिन बीत गए।
चौथे दिन माता कैकसी ने विभीषण से कहा.. ‘श्रीराम साक्षात् महाविष्णु हैं, सीताजी लक्ष्मी हैं। तेरे भाई रावण ने यह रहस्य नहीं जाना। मैं भी राजा राम के दर्शन करुंगी।’
विभीषण ने माता कैकसी को नए वस्त्र पहनाकर हाथ में सोने के थाल में चंदन, मधु, अक्षत, दधि, दूर्वा का अर्घ्य सजाकर पत्नी सरमा के साथ श्रीराम के दर्शन के लिए भेजा।
उन्होंने श्रीराम से प्रार्थना की कि मेरी मां आपके चरणकमलों के दर्शन के लिए आ रही हैं।
श्रीराम ने कहा.. ‘तुम्हारी मां तो मेरी मां ही हैं। मैं ही उनके पास चलता हूँ।’
ऐसा कह कर श्रीराम कैकसी के पास जाकर बोले.. ‘आप मेरी धर्म-माता हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ।’
बदले में कैकसी ने भी प्रभु को मातृभाव से आशीर्वाद दिया और सरमा के साथ श्रीराम की स्तुति की। लंका प्रवास में सरमा सीताजी की प्रिय सखी थी।
श्रीराम ने विभीषण को उपदेश दिया.. ‘राज्यलक्ष्मी मनुष्य के मन में मदिरा की तरह मद उत्पन्न कर देती है। तुम्हें सदैव सभी देवताओं का प्रिय कार्य करना चाहिए, कभी उनका अपराध नहीं करना, जिससे तुम्हारा राज्य सुस्थिर रहे।
लंका में कभी कोई मनुष्य आ जाए तो उनका कोई राक्षस वध न करने पाए। साथ ही मेरे सेतु का उल्लंघन करके राक्षस भारतभूमि में न जाएं।’
श्रीराम द्वारा सेतु को भंग करना..
विभीषण ने कहा—‘प्रभो ! यदि लंका का पुल ज्यों-का-त्यों बना रहेगा तो इस सेतुमार्ग से श्रद्धावश बहुत से मनुष्य यहां आवेंगे...
राक्षसों की जाति अत्यंत क्रूर मानी गई है, यदि कभी उनके मन में मनुष्य को खा जाने की इच्छा पैदा हो जाती है और वह किसी मनुष्य को खा लेता है, तो मेरे द्वारा आपकी आज्ञा का उल्लंघन हो जाएगा।
इसलिए आप कोई ऐसा उपाय सोचें, जिससे मुझे आपकी आज्ञा-भंग होने का दोष न लगे।’
भगवान ने विभीषण की बात सुनकर पुल को बीच से तोड़ दिया और फिर दस योजन के बीच के टुकड़े के फिर तीन टुकड़े कर दिए।
इसके बाद उनको छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ डाला, जिससे वह सेतु पूरी तरह भंग हो गया और भारत और लंका के बीच का मार्ग समाप्त हो गया।
इस कथा से भगवान श्रीराम का विभीषण और उनके परिवार से कितना स्नेह था स्पष्ट हो जाता है।
जानत प्रीति-रीति रघुराई।
नाते सब हाते करि राखत,
राम सनेह-सगाई।।
(विनय पत्रिका १६४)
करुणानिधान भगवान श्रीराम प्रीति की रीति को अच्छी तरह से जानते हैं। वे सब सम्बन्धों को छोड़कर केवल प्रेम और भक्ति का ही सम्बन्ध मानते हैं।
इस कथा से यह भी स्पष्ट है कि भगवान की शरणागति जिसने ले ली है, वह निर्विघ्न और आननंदयुक्त होकर संसार में निवास करता है जैसे अगाध जल में मछली सुखपूर्वक रहती है।
((((((( जय जय श्री राधे )))))))

"कामिका एकादशी"           कामिका एकादशी श्रावण माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन मनाई जाती है। कामिका एकादशी विष्णु भगव...
13/07/2023

"कामिका एकादशी"

कामिका एकादशी श्रावण माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन मनाई जाती है। कामिका एकादशी विष्णु भगवान की आराधना एवं पूजा का सर्वश्रेष्ठ समय होता है। इस व्रत के पुण्य से जीवात्मा को पाप से मुक्ति मिलती है। यह एकादशी कष्टों का निवारण करने वाली और मनोवांछित फल प्रदान करने वाली होती है। कामिका एकादशी को श्री विष्णु का उत्तम व्रत कहा गया है कहा जाता है कि इस एकादशी की कथा श्री कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई थी। इससे पूर्व राजा दिलीप को वशिष्ठ मुनि ने सुनायी थी जिसे सुनकर उन्हें पापों से मुक्ति एवं मोक्ष प्राप्त हुआ।

"कथा"

प्राचीन काल में किसी गांव में एक ठाकुर जी थे। क्रोधी ठाकुर का एक ब्राह्मण से झगडा हो गया और क्रोध में आकर ठाकुर से ब्राह्मण का खून हो जाता है। अत: अपने अपराध की क्षमा याचना हेतु ब्राह्मण की क्रिया उसने करनी चाही, परन्तु पंडितों ने उसे क्रिया में शामिल होने से मना कर दिया और वह ब्रह्म हत्या का दोषी बन गया परिणाम स्वरूप ब्राह्मणों ने भोजन करने से इंकार कर दिया। तब उन्होने एक मुनि से निवेदन किया कि ‘हे भगवान, मेरा पाप कैसे दूर हो सकता है।’ इस पर मुनि ने उसे कामिका एकाद्शी व्रत करने की प्रेरणा दी। ठाकुर ने वैसा ही किया जैसा मुनि ने उसे करने को कहा था। जब रात्रि में भगवान की मूर्ति के पास जब वह शयन कर रहा था। तभी उसे स्वपन में प्रभु दर्शन देते हैं और उसके पापों को दूर करके उसे क्षमा दान देते हैं।

"पूजा-विधि"

एकादशी के दिन स्नानादि से पवित्र होने के पश्चात संकल्प करके श्री विष्णु के विग्रह की पूजन करना चाहिये। भगवान विष्णु को फूल, फल, तिल, दूध, पंचामृत आदि नाना पदार्थ निवेदित करके, आठों प्रहर निर्जल रहकर विष्णु जी के नाम का स्मरण एवं कीर्तन करना चाहिए। एकादशी व्रत में ब्राह्मण भोजन एवं दक्षिणा का बड़ा ही महत्व है अत: ब्राह्मण को भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करने के पश्चात ही भोजनादि ग्रहण करें। इस प्रकार जो कामिका एकादशी का व्रत रखता है उसकी कामनाएं पूर्ण होती हैं।

"महत्व"

कामिका एकादशी उत्तम फलों को प्रदान करने वाली होती है। इस एकादशी के दिन भगवान श्री कृष्ण की पूजा करने से अमोघ फलों की प्राप्ति होती है। इस दिन तीर्थ स्थलों में विशिष स्नान दान करने की प्रथा भी रही है इस एकादशी का फल अश्वमेघ यज्ञ के समान होता है। इस एकादशी का व्रत करने के लिये प्रात: स्नान करके भगवान श्री विष्णु को भोग लगाना चाहिये। आचमन के पश्चात धूप, दीप, चन्दन आदि पदार्थों से आरती करनी चाहिये।
कामिका एकादशी व्रत के दिन श्री हरि का पूजन करने से व्यक्ति के पितरों के भी कष्ट दूर होते है। व्यक्ति पाप रूपी संसार से उभर कर, मोक्ष की प्राप्ति करने में समर्थ हो पाता है। इस एकादशी के विषय में यह मान्यता है, कि जो मनुष्य़ सावन माह में भगवान विष्णु की पूजा करता है, उसके द्वारा गंधर्वों और नागों की सभी की पूजा हो जाती है। लालमणी मोती, दूर्वा आदि से पूजा होने के बाद भी भगवान श्री विष्णु उतने संतुष्ट नहीं होते, जितने की तुलसी पत्र से पूजा होने के बाद होते है। जो व्यक्ति तुलसी पत्र से श्री केशव का पूजन करता है। उसके जन्म भर का पाप नष्ट होते है।
इस एकादशी की कथा सुनने मात्र से ही यज्ञ करने समान फल प्राप्त होते है। कामिका एकादशी के व्रत में शंख, चक्र, गदाधारी श्री विष्णु जी की पूजा होती है। जो मनुष्य इस एकादशी को धूप, दीप, नैवेद्ध आदि से भगवान श्री विष्णुजी की पूजा करता है उसे शुभ फलों की प्राप्ति होती है।
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!!! भगवान गणेश के आठ अवतारों की कथा !!! पुराणों के अनुसार हर युग में असुरी शक्ति को खत्म करने के लिए उन्होंने 8 अवतार लि...
12/07/2023

!!! भगवान गणेश के आठ अवतारों की कथा !!!

पुराणों के अनुसार हर युग में असुरी शक्ति को खत्म करने के लिए उन्होंने 8 अवतार लिए थे।

गणेश जी ने अधर्म का नाश करने के लिए हर युग में समय-समय पर अवतार लिए। इन्हीं अवतारों के अनुसार उनकी पूजा होती है। पुराणों के अनुसार हर युग में असुरी शक्ति को खत्म करने के लिए उन्होंने विकट, महोदर, विघ्नेश्वर जैसे आठ अलग-अलग नामों के अवतार लिए हैं। ये आठ अवतार मनुष्य के आठ तरह के दोष दूर करते हैं। इन आठ दोषों का नाम काम, क्रोध, मद, लोभ, ईर्ष्या, मोह, अहंकार और अज्ञान है। गणपति जी का कौन सा अवतार किस दोष को खत्म करता है ये उनकी कथाओं में बताया गया है।

1. वक्रतुंड - श्रीगणेश ने इस रुप में राक्षस मत्सरासुर के पुत्रों को मारा था। ये राक्षस शिव भक्त था और उसने शिवजी की तपस्या करके वरदान पा लिया था कि उसे किसी से भय नहीं रहेगा। मत्सरासुर ने देवगुरु शुक्राचार्य की आज्ञा से देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र भी थे सुंदरप्रिय और विषयप्रिय, ये दोनों भी बहुत अत्याचारी थे।

सारे देवता शिव की शरण में पहुंच गए। शिव ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे गणेश का आह्वान करें, गणपति वक्रतुंड अवतार लेकर आएंगे। देवताओं ने आराधना की और गणपति ने वक्रतुंड के रुप में मत्सरासुर के दोनों पुत्रों का संहार किया और मत्सरासुर को भी पराजित कर दिया। वही मत्सरासुर बाद में गणपति का भक्त हो गया।

2. एकदंत : - महर्षि च्यवन ने अपने तपोबल से मद नाम के राक्षस की रचना की। वह च्यवन का पुत्र कहलाया। मद ने दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य से दीक्षा ली। शुक्राचार्य ने उसे हर तरह की विद्या में निपुण बनाया। शिक्षा होने पर उसने देवताओं का विरोध शुरू कर दिया। सारे देवता उससे प्रताडि़त रहने लगे।

सारे देवताओं ने मिलकर गणपति की आराधना की। तब भगवान गणेश एकदंत रूप में प्रकट हुए। उनकी चार भुजाएं, एक दांत, बड़ा पेट और उनका सिर हाथी के समान था। उनके हाथ में पाश, परशु, अंकुश और एक खिला हुआ कमल था। एकदंत ने देवताओं को अभय वरदान दिया और मदासुर को युद्ध में पराजित किया।

3. महोदर - जब कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को देवताओं के खिलाफ खड़ा किया। मोहासुर से मुक्ति के लिए देवताओं ने गणेश की उपासना की। तब गणेश ने महोदर अवतार लिया। महोदर यानी बड़े पेट वाले। वे मूषक पर सवार होकर मोहासुर के नगर में पहुंचे तो मोहासुर ने बिना युद्ध किये ही गणपति को अपना इष्ट बना लिया।

4. विकट - भगवान विष्णु ने जलंधर नाम के राक्षस के विनाश के लिए उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया। उससे एक दैत्य उत्पन्न हुआ, उसका नाम था कामासुर। कामासुर ने शिव की आराधना करके त्रिलोक विजय का वरदान पा लिया। इसके बाद उसने अन्य दैत्यों की तरह ही देवताओं पर अत्याचार करने शुरू कर दिए।

तब सारे देवताओं ने भगवान गणेश का ध्यान किया। तब भगवान गणपति ने विकट रूप में अवतार लिया। विकट रूप में भगवान मोर पर विराजित होकर अवतरित हुए। उन्होंने देवताओं को अभय वरदान देकर कामासुर को पराजित किया।

5. गजानन - धनराज कुबेर से लोभासुर का जन्म हुआ। वह शुक्राचार्य की शरण में गया और उसने शुक्राचार्य के आदेश पर शिवजी की उपासना शुरू की। शिव लोभासुर से प्रसन्न हो गए। उन्होंने उसे निर्भय होने का वरदान दिया।

इसके बाद लोभासुर ने सारे लोकों पर कब्जा कर लिया। तब देवगुरु ने सारे देवताओं को गणेश की उपासना करने की सलाह दी। गणेश ने गजानन रूप में दर्शन दिए और देवताओं को वरदान दिया कि मैं लोभासुर को पराजित करूंगा। गणेशजी ने लोभासुर को युद्ध के लिए संदेश भेजा। शुक्राचार्य की सलाह पर लोभासुर ने बिना युद्ध किए ही अपनी पराजय स्वीकार कर ली।

6. लंबोदर - क्रोधासुर नाम के दैत्य ने ने सूर्यदेव की उपासना करके उनसे ब्रह्माण्ड विजय का वरदान ले लिया। क्रोधासुर के इस वरदान के कारण सारे देवता भयभीत हो गए।

वो युद्ध करने निकल पड़ा। तब गणपति ने लंबोदर रूप धरकर उसे रोक लिया। क्रोधासुर को समझाया और उसे ये आभास दिलाया कि वो संसार में कभी अजेय योद्धा नहीं हो सकता। क्रोधासुर ने अपना विजयी अभियान रोक दिया और सब छोड़कर पाताल लोक में चला गया।

7. विघ्नराज - एक बार पार्वती अपनी सखियों के साथ बातचीत के दौरान जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। पार्वती ने उसका नाम मम (ममता) रख दिया। वह माता पार्वती से मिलने के बाद वन में तप के लिए चला गया। वहीं वो शंबरासुर से मिला। शम्बरासुर ने उसे कई आसुरी शक्तियां सीखा दीं। उसने मम को गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर ब्रह्माण्ड का राज मांग लिया।

शम्बर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। ममासुर ने भी अत्याचार शुरू कर दिए और सारे देवताओं को बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया। तब देवताओं ने गणेश की उपासना की। गणेश विघ्नेश्वर के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर का मान मर्दन कर देवताओं को छुड़वाया।

8. धूम्रवर्ण - एक बार सूर्यदेव को छींक आ गई और उनकी छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उसका नाम था अहम। वो शुक्राचार्य के समीप गया और उन्हें गुरु बना लिया। वह अहम से अहंतासुर हो गया। उसने खुद का एक राज्य बसा लिया और भगवान गणेश को तप से प्रसन्न करके वरदान प्राप्त कर लिए।

उसने भी बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब गणेश ने धूम्रवर्ण के रूप में अवतार लिया। उनका रंग धुंए जैसा था। वे विकराल थे। उनके हाथ में भीषण पाश था जिससे बहुत ज्वालाएं निकलती थीं। धूम्रवर्ण के रुप में गणेश जी ने अहंतासुर को हरा दिया। उसे युद्ध में हराकर अपनी भक्ति प्रदान की।

*हनुमान जी का कर्ज़ा*  ‼️🕉️✒️ राम जी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो कुछ दिन पश्चात राम जी ने विभीषण, जामवंत, सुग्रीव और ...
11/07/2023

*हनुमान जी का कर्ज़ा* ‼️🕉️

✒️ राम जी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो कुछ दिन पश्चात राम जी ने विभीषण, जामवंत, सुग्रीव और अंगद आदि को अयोध्या से विदा कर दिया /,

👉 तो सब ने सोचा हनुमान जी को प्रभु बाद में विदा करेंगे ,

☀️ लेकिन राम जी ने हनुमान जी को विदा ही नहीं किया //,

अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात है कि सब गए परन्तु अयोध्या से हनुमान जी नहीं गये ,

🎯 अब दरबार में कानाफूसी शुरू हुई कि हनुमान जी से कौन कहे जाने के लिए, तो सबसे पहले माता सीता जी की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमान जी चले जायें /,

✒️ माता सीता बोलीं मै तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक-एक दिन एक-एक कल्प के समान बीत रहा था /,

☝️ वो तो हनुमान जी थे, जो प्रभु मुद्रिका ले के गये, और धीरज बंधवाया कि...!

✒️ *कछुक दिवस जननी धरु धीरा /,*
✨ *कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा //,*

☝️ *निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं /,*
✨ *तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहि• //,*

🌹 मैं तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जाने के लिए, आप किसी और से बुलावा लो /,

✒️ अब बारी आई लखन जी की। तो लक्ष्मण जी ने कहा, मै तो लंका के रणभूमि में वैसे ही मरणासन्न अवस्था में पड़ा था ! पूरा राम दल विलाप कर रहा था //,

☝️ *प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर /,*
✨ *आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस //,*

ये तो जो खड़ा है, वो हनुमान जी का लक्ष्मण है ! मैं कैसे बोलूं, किस मुंह से बोलूं कि हनुमान जी अयोध्या से चले जाएं //,

✒️ अब बारी आयी भरत जी की। अरे! भरत जी तो इतना रोये, कि राम जी को अयोध्या से निकलवाने का कलंक तो वैसे ही लगा है मुझ पे, हनुमान जी का सब मिलके और लगवा दो /,

और दूसरी बात ये कि...!

☝️ *बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना /,*
✨ *अधम कवन जग मोहि समाना //,*

मैंने तो नंदीग्राम में ही अपनी चिता लगा ली थी, वो तो हनुमान जी थे जिन्होंने आकर ये खबर दी कि...!

👏 *रिपु रन जीति सुजस सुर गावत /,*
✨ *सीता सहित अनुज प्रभु आवत //,*

मैं तो बिल्कुल न बोलूं हनुमान जी से अयोध्या छोड़कर चले जाओ, आप किसी और से बुलवा लो /,

🐚 अब बचा कौन..? सिर्फ शत्रुघ्न भैया, जैसे ही सब ने उनकी तरफ देखा, तो शत्रुघ्न भैया बोल पड़े...!

✒️ मैंने तो पूरी रामायण में कहीं नहीं बोला, तो आज ही क्यों बुलवा रहे हो, और वो भी हनुमान जी को अयोध्या से निकलने के लिए ,?,

जिन्होंने ने माता सीता, लखन भैया, भरत भैया सब के प्राणों को संकट से उबारा हो, किसी अच्छे काम के लिए कहते बोल भी देता ! मै तो बिल्कुल भी न बोलूं //,

☀️ *अब बचे तो मेरे राघवेन्द्र सरकार ,* ☀️

👏 माता सीता ने कहा प्रभु ! आप तो तीनों लोकों के स्वामी हो, और देखती हूं आप हनुमान जी से सकुचाते हैं, और आप खुद भी कहते हो कि...!

☝️ *प्रति उपकार करौं का तोरा /,*
✨ *सनमुख होइ न सकत मन मोरा //,*

🙏 आखिर आप के लिए क्या अदेय है प्रभु !

✒️ राघव जी ने कहा, देवी क़र्ज़दार जो हूं, हनुमान जी का, इसीलिए तो ...?

👉 *सनमुख होइ न सकत मन मोरा ,*

☝️ *देवी ! हनुमान जी का कर्ज़ा उतारना आसान नहीं है, इतनी सामर्थ राम में नहीं है, जो "राम नाम" में है //,* ✨

🎯 " क्योंकि " कर्ज़ा उतारना भी तो बराबरी का ही पड़ेगा न...! यदि सुनना चाहती हो तो सुनो - हनुमान जी का कर्ज़ा कैसे उतारा जा सकता है ...?, 〽️

☝️ *पहले हनुमान विवाह करें,*
*लंकेश हरें इनकी जब नारी /,*

✨ *मुंदरी लै रघुनाथ चले,*
*निज पौरुष लांघि अगम्य जे वारी //,*

👉 *आयि कहें, सुधि सोच हरें,*
*तन से, मन से होई जाएं उपकारी /,*

👏 *तब रघुनाथ चुकायि सकें,*
*ऐसी हनुमान की दिव्य उधारी //,*

☝️ देवी ! इतना आसान नहीं है, हनुमान जी का कर्ज़ा चुकाना। मैंने ऐसे ही नहीं कहा था कि...!

🐚 *"सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं "* 〽️

✒️ मैंने बहुत सोच विचार कर कहा था ! लेकिन यदि आप कहती हो तो कल राज्य सभा में बोलूंगा कि हनुमान जी भी कुछ मांग लें /,

दूसरे दिन राज्य सभा में सब एकत्र हुए, सब बड़े उत्सुक थे कि हनुमान जी क्या मांगेंगे, और राम जी क्या देंगे //,

राघव जी ने कहा ! हनुमान सब लोगों ने मेरी बहुत सहायता की और मैंने, सब को कोई न कोई पद दे दिया /,

विभीषण और सुग्रीव को क्रमशः लंका और किष्कन्धा का राजपद, अंगद को युवराज पद। तो तुम भी अपनी इच्छा बताओ...?

✒️ हनुमान जी बोले ! प्रभु आप ने जितने नाम गिनाए, उन सब को एक एक पद मिला है, और आप कहते हो...!

👏 *तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना*

👉 तो फिर यदि मैं दो पद मांगू तो..?

🎯 सब लोग सोचने लगे बात तो हनुमान जी भी ठीक ही कह रहे हैं //,

☝️ राम जी ने कहा ! ठीक है, मांग लो /,

सब लोग बहुत खुश हुए कि आज हनुमान जी का कर्ज़ा चुकता हो जायेगा /,

👉 हनुमान जी ने कहा ! प्रभु जो पद आप ने सबको दिए हैं, उनके पद में राजमद हो सकता है, तो मुझे उस तरह के पद नहीं चाहिए, जिसमें राजमद की शंका हो //,

☀️ तो फिर...! आप को कौन सा पद चाहिए ?

👉 हनुमान जी ने राम जी के दोनों चरण पकड़ लिए, प्रभु ..! हनुमान को तो बस यही दो पद चाहिए //,

👏 *हनुमत सम नहीं कोउ बड़भागी /,*
✨ *नहीं कोउ रामचरण अनुरागी //,*

🐚 यह प्रेरक प्रसंग किसी ने भेजा है, रामायण की कथा से !

🕉️🐚‼️ *जय श्री राम* ‼️🐚🕉️

.          नन्दग्राम के एक महात्मा और पुजारी का भूत          बहुत दिन हुए नन्दीश्वर के निकट यशोदाकुण्ड के पास एक गुफा मे...
10/07/2023

. नन्दग्राम के एक महात्मा और पुजारी का भूत

बहुत दिन हुए नन्दीश्वर के निकट यशोदाकुण्ड के पास एक गुफा में एक महात्मा भजन करते थे। दिन डूबने से थोड़ी देर पहले गुफा से निकलते थे। शौचादिकर मधुकरी के लिए गाँव में जाते थे। जो कुछ मिल जाता था उससे उदरपूति कर फिर गुफा के भीतर भजन में बैठ जाते थे। किसी से बात नहीं करते थे।
वे कौन थे ? कहाँ से आये थे ? उनका नाम क्या था ?–किसी को कुछ पता नहीं। वृद्ध होने पर वे नन्दग्राम छोड़कर कहीं नहीं जाते थे।
एक बार गोवर्धन के एक बाबाजी अनुनय-विनयकर उन्हें चकलेश्वर ले गये, वहाँ नामयज्ञ में योगदान करने के लिए। दो दिन वहाँ रहकर वे तीसरे दिन नन्दग्राम लौट आये। सन्ध्या समय नियमानुसार मधुकरी के लिए गाँव में गये। मधुकरी लेकर गुफा में प्रवेश कर रहे थे, उसी समय किसी के करुणकण्ठ की आवाज आयी—'ओ बाबा ! मैं दो दिन से भूखा हूँ।'
बाबा आश्चर्यचकित से रुककर बोले–'आप कौन हैं ?'
'मैं वह कुत्ता हूँ, जिसे आप नित्य एक टुकड़ा मधुकरी दिया करते हैं।'
बाबा ने ब्रजधाम के कुत्ते के अद्भुत और अप्राकृत स्वरूप का अनुभव करते हुए कातर स्वर से कहा–'आप अपने स्वरूप का ठीक-ठीक परिचय देनेकी कृपा करें।'
कुत्ते ने कहा–'बाबा ! मैं एक दुर्भागा जीव हूँ। पूर्व जन्म में इसी नन्दीश्वर में मन्दिर का पुजारी था। एक दिन भोग के लिए एक बड़ा लड्डू मिला। मैंने बिना भोग दिये ही उसे खा लिया। उसी अपराध के कारण मैं भूत हो गया। आप निष्किचन वैष्णव हैं। आपकी दी मधुकरी खाने से मेरी ऊर्ध्वगति होगी–इस लोभ से बहुत दिनो से आपके पास आता हूँ !'
कुत्ते का वृतान्त सुन बाबा ने कौतूहलवश और विनय पूर्वक कहा–'जो भी हो, आप तो अप्राकृत धाम के भूत हैं। श्रीश्रीजुगलकिशोर और उनकी अप्राकृत लीला के दर्शन तो आप करते ही होंगे ?'
'हाँ बाबा, दर्शन तो करता हूँ पर आप लोग जिस प्रकार उनके रूप और लीलादि का आस्वादन कर सकते हैं, वैसा आस्वादन करने की मेरी योग्यता कहाँ ?'
'मुझे एक बार उनके दर्शन करा सकते हैं क्या ?' बाबा ने कातर स्वर में पूछा।
उत्तर मिला–'नहीं, मुझमें वह योग्यता नहीं।'
'तो किस प्रकार उनके दर्शन किये जा सकते हैं, यह बता सकते हैं ?' बाबा ने कातर हो विनयपूर्वक फिर पूछा।
'हाँ, यह बता सकता हूँ। देखिये आप कल गोधूलि के समय, जब श्रीकृष्ण गायें चराकर लौटते हैं, यशोदाकुण्ड के पास बैठे रहें। गउओं के पीछे जो ग्वारिये आते दीखें, उनमें जो सबसे पीछे हों, उन्हें ही समझ लीजिये कि वे गोपाल हैं।' इतना कह वह श्वानरूपी भूत अन्तर्धान हो गया।
बाबा को अब चैन कहाँ। रात जैसे-तैसे काटी। कभी गाते, कभी नाचते, कभी रो-रोकर अधीर होते। पौ फटते ही यशोदाकुण्ड के निकट एक झाड़ी में जा बैठे। बेचैनी बढ़ती गयी। मन में तरह-तरह के संकल्प-विकल्पों का संघर्ष चलता रहा।
'क्या सचमुच श्रीकृष्ण मुझे दर्शन देकर कृतार्थ करेंगे ?' क्या मैं उनके दर्शन के योग्य हूँ ? नहीं, मुझ जैसे कुटिल और पाखण्डी व्यक्ति को भला वे दर्शन क्यों देने लगे।'
यह सोचकर वे कभी रोते-रोते मूर्च्छित हो जाते, कभी सोचने लगते–'यदि वे मुझ पर कृपा करदें तो उनका बिगड़ता ही क्या है ? वे करुणा के समुद्र हैं, पतितपावन हैं। अवश्य कृपा करेंगे।'
यह सोचकर वे एक अनिवर्चनीय आनन्द समुद्र में डूबने और उतराने लगे। इसी उधेड़-बुन में दोपहर बीत गयी। तीसरा पहर बीत गया। सूर्य धीरे-धीरे अस्ताचल की ओर जाने लगा। गोधूलि की बेला आ पहुँची।
वृक्षों के झुरमुट के बीच गोधूलि-रंजित आकाश दृष्टिपथ पर उदय होने लगा। बाबा किसी प्रकार धैर्य धारण किये झाड़ी में बैठे रहे। गाय-बछड़ों के रंभाने का शब्द आकाश में गूंजने लगा। कुछ देर में उनके झुण्ड के झुण्ड सामने से निकलते दीखे। उनके पीछे एक-दो कर ग्वाल-बाल अपनी-अपनी गइयों को पृथक करते दीखे।
सबके पीछे दीखा एक ग्वाल-बालक, जिसका कृष्ण वर्ण था। हाथ में लकुटिया लिये, अपने गाय-बछड़ों को पृथक् कर वह खञ्ज-गति से नन्दग्राम की ओर जा रहा था। उसे देखते ही बाबा ने कूदते-फांदते जाकर उसे साष्टांग दण्डवत् किया। उसके दोनों चरणों को अपनी भुजाओं में जकड़ते हुए माथा उन पर टेक दिया।
भक्त और भगवान् दोनों एक-दूसरे के स्पर्श से पुलकित हो उठे ! पर भगवान् स्वभावगत कपटता धारण करते हुए बोले,–'बाबा ऐसा यूँ करे है ? बाबा है के ग्वारिया को प्रणाम करे है। छोड़, जान दे मोएँ।'
'दयामय ! दया करो, दया करो !' कह बाबा फूट-फूटकर रोने लगे। उनके अश्रुजल से भगवान् के चरण सिक्त हो गये। रुँधे हुए कण्ठ से, अस्पष्ट शब्दों में, और न जाने वे क्या कहते रहे।
भक्त की भाषा भगवान् को समझते देर नहीं लगती। वे समझ गये। पर समझते हुए भी अनसमझे जैसे बोले–'बाबा, वावरो है रह्यो है। देख जान दे, देर हय रही है। मइया मारेगी।'
बाबा ने चरण और कस के पकड़ लिये। भक्त की भुजाओं में इतना बल कहाँ, जो भगवान् को पकड़ रखें। पर उसके प्रेम के आगे वे विवश है। तो छुड़ाकर जाने के लिए इतना उतावले क्यों दीख रहे हैं ? यह तो उनका अभिनय है। भक्त के प्रेमरस का आस्वादन करने की उनकी अनोखी परिपाटी है। रुकना चाह रहे हैं, रुकने को विवश हैं; पर जाना चाहने का दिखावा कर रहे हैं।
'नहीं, नहीं प्रभु, छल न करो। इस दीन-हीन पर कृपा करो, कृपा करो। छल-चातुरी छोड़ अपने स्वरूप के दर्शन दो। दयामय ! दया करो।'
'बाबा तेरे पाँय पडूँ, छोड़ दे। मेरे घर चल। तोये मधुकरी दऊँगो। माखन-मिसरी दऊँगो। और जो कहेगो बाई दऊँगो।'
बहुत चेष्टा की भगवान् ने भोले भक्त को भुलाने-बहलाने की। पर वह भुलावे में आने वाला कब था ? उसके हृदय में ह्लादिनी का प्रकाश जो था। बहुत देर हो गयी भक्त और भगवान् के बीच प्रणय-युद्ध होते। आधी रात बीत गयी। आखिर भगवान् कघ हार हुई। वे बोले–'अच्छा ! ले, मेरे स्वरूप के दर्शन कर !'
बाबा उनके त्रिभंग-मुरलीधारी रूप के दर्शनकर चमत्कृत हुए। पर इससे उनकी तृप्ति न हुई।
वे बोले–'प्रभो मैं जुगल उपासक हूँ। एकाकी आपके स्वरूप के दर्शन कर मेरी विरह ज्वाला शांत नहीं होने की। एक बार सपरिवार दर्शन देकर मेरे तापित हृदय को शीतल करें।'
तब बाबा के भाग्य की चरम सीमा का अतिक्रमण कर उनके सामने उदित हुआ एक दिव्य प्रकाश ! उन्होंने देखा दिव्य वृन्दावन में ललिता विशाखादि सखियों सहित जुगलकिशोर का अपरूप रूप ! वे उस रूप-माधुरी में चिरकाल के लिए डूब गये ! उनका पार्थिव शरीर उसे धारण करने में असमर्थ होने के कारण कई दिन पीछे उनसे विलग हो गया।

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