21/06/2024
दूर्लभ शंका समाधान
३५४. जिज्ञासु:- किन्तु, परन्तु उचित-अनुचित के विषय में नहीं। स्पष्टता के विषय में, उस बोधगम्यता के विषय में मैं कहना चाहता हूँ। वो बोधगम्यता के लिये इसलिये मैं कह रहा हूँ कि ठीक है। मैं शरीर हूँ तो क्या मैं अपने को शरीर ही समझ के उसी में रह जाऊँ लेकिन जहाँ से ये शरीर मिला है, जिस माध्यम से प्रभु की कृपा से माता-पिता को हित-मात्र बनाकर के परिवार में रहा, जहाँ संतोष मिला, प्यार मिला, ममत्व मिला, लालन-पालन-पोषण हुआ तो क्या उसको बड़े होने पर समर्थ होने पर हर दृष्टि से समक्ष होने पर उसे एकदम त्याज्य समझकर के त्याग दें या क्या यह कृतज्ञता ज्ञापित करना होगा। ये उचित होगा, जीव के लिये उस व्यक्ति के लिये परिवार के प्रति और अगर नहीं होगा तो उसे किस प्रकार से परिवार से सम्बंधित रह के अपने कृतज्ञता को ज्ञापित करना चाहिए और बाकी समाज के लिये अपने को समर्पित करना चाहिए।
सन्त ज्ञानेश्वर जी:- बोलिये परमप्रभु परमेश्वर की जय। सवाल ये है कि मैं किसी बूढ़ा-बूढ़ी को पकड़ लूँ हे माताजी ! आप मेरी माताजी हैं। किसी औरत को पकड़ लूँ, मैं शादीशुदा हूँ, मेरे पास पत्नी है। अब अपनी पत्नी का अता-पता नहीं किसी और औरत को पकड़-पकड़ कर के हे मेरी पत्नी जी ! आप मेरी प्राणप्रिया जी हैं तो वहाँ जानते हैं उचित-अनुचित कोई नहीं पूछेगा, पहले कूट-काट करेगा तो पहले हम कोई नकली गाड़ी वाला माता-पिता को पूछें तो कूट-पीट नहीं होगा, नाश नहीं होगा। हमको अपनी असली माता-पिता को पूछना है कि नकली। हम ड्राइवर हैं हम गाड़ी वाले कारखाना में जायें या हम जिस परिवार के हैं उसमें जायें। हमको अपने असली माता-पिता को देखना है कि नकली। हम गाड़ी वाले एजेन्ट के यहाँ जायें कि आप मेरा घर हो, मेरा परिवार हो, ये मेरी पत्नी है। जैसे पत्नी कहना शुरू करूँगा, वही पीट-पाट शुरू हो जायेगा। हम परिवार में आयेंगे तो अपनी पत्नी को पत्नी कहेंगे तो खुशयाली, प्यार खिलेगा। हम अपनी माताजी को माताजी कह करके और हम अपने घर में लाकर रख लें और हम उनके साथ रह लें, खुशियाली होगी, लेकिन दूसरी किसी वृद्ध महिला को घसीट कर ले चलें। चल तू कहाँ जा रही है, मेरी माताजी है, मेरे घर चल तब भी कूट-पीट शुरू हो जायेगा। तो सवाल है कि नकली असली पहचानना है कि नहीं, नकली असली पहचानना है कि नहीं। नकली को करना है, दूसरे वाले को करना है या अपने असली को करना है। हम मारुति गाड़ी वाले हैं, हम मारुति कम्पनी में जाकर कहें कि ये हमारा घर है, हम इसी में रहेंगे, कारखाना वाले हमको रहने देंगे। हम अपने असली घर में, गाड़ी हमारे घर में रहेगी तो ये गाड़ी हमको मिली, हम ईश्वर, परमेश्वर वाले माता-पिता के यहाँ शरण में रहें, गड़िया भी उसकी शरण में रहे। ये सिस्टम है कि हम अपने असली माता-पिता जो शिव-शक्ति है, ब्रह्म-शक्ति है जो को छोड़ दें और नकली मरण-धरण आज रहेंगे, कल नहीं रहेंगे। इनको फंसा कर रखेंगे तो नाश में ही तो जायेंगे। यमराज खूब कुटे-पीटेगा कि रे ! तो नकली को क्यों पकड़ा, असली को क्यों नहीं। जब नकली औरत को बनाकर पकड़कर रखूँगा तो दरोगाजी खूब कूटेंगे-पीटेंगे। नहीं पिटेंगे? तो दरोगा माने यमराज, यमराज माने दरोगा। अरबी में या उर्दू में यमराज को दरोगा तो कहते हैं तो दरोगा जी कूटे-पीटे बगैर छोड़ेंगे क्या? जब किसी के बेटा को बेटा कहकर गोदी में उठा दें तो कूटाई-पिटाई करने लगेंगे कि तू अपहरणकर्ता है। तो वही हाल है, जब तक हम अनजान थे, तब तक जो था, वही हमारा था, जब हम जान गये कि हम संसार-परिवार, परिवार के नहीं हैं, हम भगवान् और शिव-शक्ति परिवार के हैं, भगवान् और ब्रह्म-शक्ति परिवार के हैं, तब भी हम भगवान् ब्रह्म-शक्ति को छोड़कर के ये विनाशी, कूट-पीट वाले परिवार में जाऊँ। यही उचित होगा। फिर ये उचित होगा?
कि मैं भगवान् का, मेरा सब भगवान् का, ये लोग बेईमान नहीं होते तो मैं मैं अपने को मेरा नहीं कहते। देखिए सुरुचि उत्तम को अपना बनाई, राजकुमार घोषित कराई, उत्तानपाद राजा से। सुनीति एक बार कह दी कि बेटा ध्रुव ! तेरा पिता तो भगवान् है। एक बार सुना ध्रुव ने कि मेरा पिता भगवान् है तो कहा कि मैं अपने पिता से मिलूँगा। अब तो सुनीति के लिये आफत हो गया। कही कि भई भगवान् खोजा कि मालूम है उत्तम मारा गया और दुर्गति के साथ मारा गया। राज छीन गया। उत्तानपाद की दुर्गति हुई कि बाघ शेर नोंच-नोंच करके खाये और भगवान् भी मिला ध्रुव को, राज भी मिला ध्रुव को। भगवान् वाले को ही राज करने का अधिकार होता है। मैं मेरा वाला तो नाश को जाता है। क्या उचित होगा? भगवान् को अपनाना, परमेश्वर को अपनाना या परमेश्वर छोड़कर परिवार को अपनाना?
३५५. जिज्ञासु:- महाराज जी मैं अपनाने की बात नहीं कर रहा हूँ.......
सन्त ज्ञानेश्वर जी:- मैं अपनाने की बात कर रहा हूँ, रहने की बात कर रहा हूँ।
३५६. जिज्ञासु:- मेरा प्रश्न केवल यही था..........
सन्त ज्ञानेश्वर जी:- मेरा उत्तर ये है कि ऊपर उठेंगे, नीचे छूटेगा। आगे बढ़ेंगे, पीछे छूटेगा।
३५७. जिज्ञासु:- ये स्थिति कब होनी चाहिए? मेरा प्रश्न यही था।
सन्त ज्ञानेश्वर जी:- मेरे प्रश्न में आपका उत्तर है। परमेश्वर भी सामने हो, परिवार भी सामने हो।
३५८. जिज्ञासु:- ये नहीं प्रश्न था.............
सन्त ज्ञानेश्वर जी:- मेरा तो यही जवाब है। नहीं, नहीं, नहीं। आप अधूरा प्रश्न मत करें। परिवार छोड़ना कहाँ हैं?
३५९. जिज्ञासु:- छोड़ने की बात नहीं मैं कर रहा।
सन्त ज्ञानेश्वर जी:- फिर बात क्या करते हैं?
३६०. जिज्ञासु:- न, न, न। परिवार के प्रति भी अपना कर्तव्य..........
सन्त ज्ञानेश्वर जी:- हम कह रहे हैं कि कर्तव्य, कर्तव्य ही तो मैं पढ़ा रहा हूँ। अपना कर्तव्य, अस्तित्व का जो मंजिल हो, उसी मार्ग पर चलना अपना कर्तव्य है। अस्तित्व का जो मंजिल हो, उसी मार्ग पर चलना अपना कर्तव्य है। अब हमें बताइये कि हमारा अस्तित्व मंजिल परमेश्वर है कि परिवार है? जब है तो परमेश्वर। तो हमें परमेश्वर के मार्ग में रहना-चलना चाहिये, परमेश्वर के शरण में रहना-चलना चाहिए या परिवार के।
३६१. जिज्ञासु:- नहीं परमेश्वर के।
सन्त ज्ञानेश्वर जी:- फिर और क्या?
३६२. जिज्ञासु:- केवल इसलिये..............
सन्त ज्ञानेश्वर जी:- केवल माने क्या?
३६३. जिज्ञासु:- केवल इसलिये कि परिवार को।
सन्त ज्ञानेश्वर जी:- अब सुन लीजिये। परिवार को छोड़कर हम नौकरी-चाकरी कर रहे हो, हम दूसरा परिवार बसा रहे हो, तब हम दोषी-अपराधी हैं लेकिन परिवार को छोड़कर हम ईश्वर-परमेश्वर शरण में जा रहे है तो मैं तो अपने गति में जा रहा हूँ, अपने कर्तव्य में जा रहा हूँ, यहाँ अनुचित क्या होगा? यही तो कर्तव्य है। मैं तो ईश्वर-परमेश्वर की शरण में ले जा रहा हूँ। मेरा यहाँ तो छोड़ना कहाँ है? अपने को कर्तव्य को जोड़ते हुये मंजिल को पाना है। परमेश्वर के शरण में जाना है। परिवार कहाँ रह जायेगा?
३६४. जिज्ञासु:- पूरे परिवार के साथ जाना है।
सन्त ज्ञानेश्वर जी:- परिवार अपना होगा तो पीछे आयेगा ही।
३६५. जिज्ञासु:- क्योंकि भगवान् तो सबका है।
सन्त ज्ञानेश्वर जी:- नहीं भईया ! एक बात कोई भी आदमी के पीछे नहीं चलता है। नौकरी वाले को कहिये की नौकरी छोड़ के परिवार के पीछे रहो। नौकरी के पीछे परिवार भले रहे, नौकरी परिवार में नहीं आयेगी। उसी तरह से परमेश्वर के पीछे भले परिवार भले रहे, नौकरी परिवार में नहीं आयेगी। उसी तरह से परमेश्वर के पीछे भले परिवार आय, परमेश्वर परिवार के पीछे नहीं चलता। परमेश्वर वर्जित नहीं किया है कि तेरे पीछे तेरा परिवार न आवे। यदि तेरे पीछे नहीं आ रहा है तो तेरा है ही नहीं। ये प्रश्न है और जब तेरा है ही नहीं तो रहे चाहे जाय। मैं तो यही बोल रहा हूँ, मैं तो यही कर रहा हूँ।
३६६. जिज्ञासु:- थोड़ा सा हमको समझने में हो सकता है भूल.............
सन्त ज्ञानेश्वर जी:- नहीं, नहीं । यही बात है, ऐसा ही है।
३६७. जिज्ञासु:- इसलिये ये मैंने शंका-समाधान किया था.............
सन्त ज्ञानेश्वर जी:- जब हम अपने माता-पिता घर-परिवार को छोड़कर दूसरा कोई परिवार बसायें नौकरी-चाकरी करते हुये, वहाँ मैं अपराधी हूँ और मेरा अपराध अक्षम्य होगा लेकिन जब मैं सांसारिकता-पारिवारिकता छोड़कर ईश्वर और परमेश्वर की तरफ बढ़ रहा हूँ, परमेश्वर के शरण में रहने लगा तो परिवार कहाँ?
३६८. जिज्ञासु:- फिर परिवार अगर बाधक है तो त्याज्य है परिवार।
सन्त ज्ञानेश्वर जी:- बस वही बात तो मैं भी कह रहा हूँ। ऐसा ही है। भाई बन्धु।