Huỳnh Ngọc Toàn 01

Huỳnh Ngọc Toàn 01 Exposed.... Fake Gurus

दूर्लभ शंका समाधान ३५४. जिज्ञासु:- किन्तु, परन्तु उचित-अनुचित के विषय में नहीं। स्पष्टता के विषय में, उस बोधगम्यता के वि...
21/06/2024

दूर्लभ शंका समाधान
३५४. जिज्ञासु:- किन्तु, परन्तु उचित-अनुचित के विषय में नहीं। स्पष्टता के विषय में, उस बोधगम्यता के विषय में मैं कहना चाहता हूँ। वो बोधगम्यता के लिये इसलिये मैं कह रहा हूँ कि ठीक है। मैं शरीर हूँ तो क्या मैं अपने को शरीर ही समझ के उसी में रह जाऊँ लेकिन जहाँ से ये शरीर मिला है, जिस माध्यम से प्रभु की कृपा से माता-पिता को हित-मात्र बनाकर के परिवार में रहा, जहाँ संतोष मिला, प्यार मिला, ममत्व मिला, लालन-पालन-पोषण हुआ तो क्या उसको बड़े होने पर समर्थ होने पर हर दृष्टि से समक्ष होने पर उसे एकदम त्याज्य समझकर के त्याग दें या क्या यह कृतज्ञता ज्ञापित करना होगा। ये उचित होगा, जीव के लिये उस व्यक्ति के लिये परिवार के प्रति और अगर नहीं होगा तो उसे किस प्रकार से परिवार से सम्बंधित रह के अपने कृतज्ञता को ज्ञापित करना चाहिए और बाकी समाज के लिये अपने को समर्पित करना चाहिए।

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- बोलिये परमप्रभु परमेश्वर की जय। सवाल ये है कि मैं किसी बूढ़ा-बूढ़ी को पकड़ लूँ हे माताजी ! आप मेरी माताजी हैं। किसी औरत को पकड़ लूँ, मैं शादीशुदा हूँ, मेरे पास पत्नी है। अब अपनी पत्नी का अता-पता नहीं किसी और औरत को पकड़-पकड़ कर के हे मेरी पत्नी जी ! आप मेरी प्राणप्रिया जी हैं तो वहाँ जानते हैं उचित-अनुचित कोई नहीं पूछेगा, पहले कूट-काट करेगा तो पहले हम कोई नकली गाड़ी वाला माता-पिता को पूछें तो कूट-पीट नहीं होगा, नाश नहीं होगा। हमको अपनी असली माता-पिता को पूछना है कि नकली। हम ड्राइवर हैं हम गाड़ी वाले कारखाना में जायें या हम जिस परिवार के हैं उसमें जायें। हमको अपने असली माता-पिता को देखना है कि नकली। हम गाड़ी वाले एजेन्ट के यहाँ जायें कि आप मेरा घर हो, मेरा परिवार हो, ये मेरी पत्नी है। जैसे पत्नी कहना शुरू करूँगा, वही पीट-पाट शुरू हो जायेगा। हम परिवार में आयेंगे तो अपनी पत्नी को पत्नी कहेंगे तो खुशयाली, प्यार खिलेगा। हम अपनी माताजी को माताजी कह करके और हम अपने घर में लाकर रख लें और हम उनके साथ रह लें, खुशियाली होगी, लेकिन दूसरी किसी वृद्ध महिला को घसीट कर ले चलें। चल तू कहाँ जा रही है, मेरी माताजी है, मेरे घर चल तब भी कूट-पीट शुरू हो जायेगा। तो सवाल है कि नकली असली पहचानना है कि नहीं, नकली असली पहचानना है कि नहीं। नकली को करना है, दूसरे वाले को करना है या अपने असली को करना है। हम मारुति गाड़ी वाले हैं, हम मारुति कम्पनी में जाकर कहें कि ये हमारा घर है, हम इसी में रहेंगे, कारखाना वाले हमको रहने देंगे। हम अपने असली घर में, गाड़ी हमारे घर में रहेगी तो ये गाड़ी हमको मिली, हम ईश्वर, परमेश्वर वाले माता-पिता के यहाँ शरण में रहें, गड़िया भी उसकी शरण में रहे। ये सिस्टम है कि हम अपने असली माता-पिता जो शिव-शक्ति है, ब्रह्म-शक्ति है जो को छोड़ दें और नकली मरण-धरण आज रहेंगे, कल नहीं रहेंगे। इनको फंसा कर रखेंगे तो नाश में ही तो जायेंगे। यमराज खूब कुटे-पीटेगा कि रे ! तो नकली को क्यों पकड़ा, असली को क्यों नहीं। जब नकली औरत को बनाकर पकड़कर रखूँगा तो दरोगाजी खूब कूटेंगे-पीटेंगे। नहीं पिटेंगे? तो दरोगा माने यमराज, यमराज माने दरोगा। अरबी में या उर्दू में यमराज को दरोगा तो कहते हैं तो दरोगा जी कूटे-पीटे बगैर छोड़ेंगे क्या? जब किसी के बेटा को बेटा कहकर गोदी में उठा दें तो कूटाई-पिटाई करने लगेंगे कि तू अपहरणकर्ता है। तो वही हाल है, जब तक हम अनजान थे, तब तक जो था, वही हमारा था, जब हम जान गये कि हम संसार-परिवार, परिवार के नहीं हैं, हम भगवान् और शिव-शक्ति परिवार के हैं, भगवान् और ब्रह्म-शक्ति परिवार के हैं, तब भी हम भगवान् ब्रह्म-शक्ति को छोड़कर के ये विनाशी, कूट-पीट वाले परिवार में जाऊँ। यही उचित होगा। फिर ये उचित होगा?
कि मैं भगवान् का, मेरा सब भगवान् का, ये लोग बेईमान नहीं होते तो मैं मैं अपने को मेरा नहीं कहते। देखिए सुरुचि उत्तम को अपना बनाई, राजकुमार घोषित कराई, उत्तानपाद राजा से। सुनीति एक बार कह दी कि बेटा ध्रुव ! तेरा पिता तो भगवान् है। एक बार सुना ध्रुव ने कि मेरा पिता भगवान् है तो कहा कि मैं अपने पिता से मिलूँगा। अब तो सुनीति के लिये आफत हो गया। कही कि भई भगवान् खोजा कि मालूम है उत्तम मारा गया और दुर्गति के साथ मारा गया। राज छीन गया। उत्तानपाद की दुर्गति हुई कि बाघ शेर नोंच-नोंच करके खाये और भगवान् भी मिला ध्रुव को, राज भी मिला ध्रुव को। भगवान् वाले को ही राज करने का अधिकार होता है। मैं मेरा वाला तो नाश को जाता है। क्या उचित होगा? भगवान् को अपनाना, परमेश्वर को अपनाना या परमेश्वर छोड़कर परिवार को अपनाना?

३५५. जिज्ञासु:- महाराज जी मैं अपनाने की बात नहीं कर रहा हूँ.......

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- मैं अपनाने की बात कर रहा हूँ, रहने की बात कर रहा हूँ।

३५६. जिज्ञासु:- मेरा प्रश्न केवल यही था..........

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- मेरा उत्तर ये है कि ऊपर उठेंगे, नीचे छूटेगा। आगे बढ़ेंगे, पीछे छूटेगा।

३५७. जिज्ञासु:- ये स्थिति कब होनी चाहिए? मेरा प्रश्न यही था।

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- मेरे प्रश्न में आपका उत्तर है। परमेश्वर भी सामने हो, परिवार भी सामने हो।

३५८. जिज्ञासु:- ये नहीं प्रश्न था.............

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- मेरा तो यही जवाब है। नहीं, नहीं, नहीं। आप अधूरा प्रश्न मत करें। परिवार छोड़ना कहाँ हैं?

३५९. जिज्ञासु:- छोड़ने की बात नहीं मैं कर रहा।

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- फिर बात क्या करते हैं?

३६०. जिज्ञासु:- न, न, न। परिवार के प्रति भी अपना कर्तव्य..........

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- हम कह रहे हैं कि कर्तव्य, कर्तव्य ही तो मैं पढ़ा रहा हूँ। अपना कर्तव्य, अस्तित्व का जो मंजिल हो, उसी मार्ग पर चलना अपना कर्तव्य है। अस्तित्व का जो मंजिल हो, उसी मार्ग पर चलना अपना कर्तव्य है। अब हमें बताइये कि हमारा अस्तित्व मंजिल परमेश्वर है कि परिवार है? जब है तो परमेश्वर। तो हमें परमेश्वर के मार्ग में रहना-चलना चाहिये, परमेश्वर के शरण में रहना-चलना चाहिए या परिवार के।

३६१. जिज्ञासु:- नहीं परमेश्वर के।

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- फिर और क्या?

३६२. जिज्ञासु:- केवल इसलिये..............

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- केवल माने क्या?

३६३. जिज्ञासु:- केवल इसलिये कि परिवार को।

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- अब सुन लीजिये। परिवार को छोड़कर हम नौकरी-चाकरी कर रहे हो, हम दूसरा परिवार बसा रहे हो, तब हम दोषी-अपराधी हैं लेकिन परिवार को छोड़कर हम ईश्वर-परमेश्वर शरण में जा रहे है तो मैं तो अपने गति में जा रहा हूँ, अपने कर्तव्य में जा रहा हूँ, यहाँ अनुचित क्या होगा? यही तो कर्तव्य है। मैं तो ईश्वर-परमेश्वर की शरण में ले जा रहा हूँ। मेरा यहाँ तो छोड़ना कहाँ है? अपने को कर्तव्य को जोड़ते हुये मंजिल को पाना है। परमेश्वर के शरण में जाना है। परिवार कहाँ रह जायेगा?

३६४. जिज्ञासु:- पूरे परिवार के साथ जाना है।

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- परिवार अपना होगा तो पीछे आयेगा ही।

३६५. जिज्ञासु:- क्योंकि भगवान् तो सबका है।

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- नहीं भईया ! एक बात कोई भी आदमी के पीछे नहीं चलता है। नौकरी वाले को कहिये की नौकरी छोड़ के परिवार के पीछे रहो। नौकरी के पीछे परिवार भले रहे, नौकरी परिवार में नहीं आयेगी। उसी तरह से परमेश्वर के पीछे भले परिवार भले रहे, नौकरी परिवार में नहीं आयेगी। उसी तरह से परमेश्वर के पीछे भले परिवार आय, परमेश्वर परिवार के पीछे नहीं चलता। परमेश्वर वर्जित नहीं किया है कि तेरे पीछे तेरा परिवार न आवे। यदि तेरे पीछे नहीं आ रहा है तो तेरा है ही नहीं। ये प्रश्न है और जब तेरा है ही नहीं तो रहे चाहे जाय। मैं तो यही बोल रहा हूँ, मैं तो यही कर रहा हूँ।

३६६. जिज्ञासु:- थोड़ा सा हमको समझने में हो सकता है भूल.............

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- नहीं, नहीं । यही बात है, ऐसा ही है।

३६७. जिज्ञासु:- इसलिये ये मैंने शंका-समाधान किया था.............

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- जब हम अपने माता-पिता घर-परिवार को छोड़कर दूसरा कोई परिवार बसायें नौकरी-चाकरी करते हुये, वहाँ मैं अपराधी हूँ और मेरा अपराध अक्षम्य होगा लेकिन जब मैं सांसारिकता-पारिवारिकता छोड़कर ईश्वर और परमेश्वर की तरफ बढ़ रहा हूँ, परमेश्वर के शरण में रहने लगा तो परिवार कहाँ?

३६८. जिज्ञासु:- फिर परिवार अगर बाधक है तो त्याज्य है परिवार।

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- बस वही बात तो मैं भी कह रहा हूँ। ऐसा ही है। भाई बन्धु।

३१६. जिज्ञासु:- समाधिस्थ अवस्था क्या है?सन्त ज्ञानेश्वर जी:- जीव जब आत्मा को पाकर के जब आत्मा में स्थित हो जाता है उस आत...
26/04/2024

३१६. जिज्ञासु:- समाधिस्थ अवस्था क्या है?

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- जीव जब आत्मा को पाकर के जब आत्मा में स्थित हो जाता है उस आत्मा में स्थित का नाम निर्विकल्प समाधि या सबीज समाधि या सम्प्रज्ञात समाधि तथा दूसरा निर्विकल्प समाधि या निर्बीज समाधि या असम्प्रज्ञात समाधि। यही असली समाधि है। जब तक अलग रह करके हम कुछ सीन देख रहे हैं, तब तक सभी सम्प्रज्ञात समाधि है, सुविचार समाधि है। यह दोष पूर्ण है, तो समाधि की दो प्रकार होते हैं। सविचार और निर्विचार, सविकल्प और निर्विकल्प यानी सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात। तो पहले समाधि जो सविचार, सविकल्प, सम्प्रज्ञात वाला है यह दोष पूर्ण है। असली समाधि निर्विचार, निर्विकल्प, असम्प्रज्ञात वाला है। इसमें जीव का आत्मामय स्थिति में हो जाता है। जब जीव आत्मामय स्थिति में हो जाता है और ठहरता है उसका नाम है असली समाधि।

३१७. जिज्ञासु:- यहाँ हमारे जितना ऋषि-महर्षि हुये हैं यह सब कहते हैं। ईश्वर कण-कण में व्याप्त है यदि ईश्वर कण-कण में व्याप्त है तो वह हमें कैसा दिखाई पड़ेगा और हमें ईश्वर की दर्शन कैसे हो सकता है। इसके विषय में...........

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- पहले तो मैं इस मान्यता को ही नहीं स्वीकारता कि ईश्वर और परमेश्वर कण-कण में होता है। कण-कण में तो जीव ही नहीं होता है, ईश्वर-परमेश्वर कैसे हो जायेंगे। यह जो धारणा हैं बिल्कुल झूठी और काल्पनिक हैं चाहे जिस किसी ऋषि-महर्षि, योगी-यति, आलिम-औलिया, पैगम्बर, प्रोफेट्स सारा ने मान्यता दिया गया हो बिल्कुल झूठा और कल्पना पर आधारित है। सच्चाई इसमें कुछ नहीं है, क्योंकि परमात्मा कण-कण तो छोड़ दीजिये धरती पर ही नहीं होता है। इस ब्रह्माण्ड में नहीं होता है। वह तो बियोंड यूनिवर्स होता है। वह तो इस ब्रह्माण्ड से परे समय पर-----जब-जब होई धरम की हानि, बाढ़ें असुर अधम अभिमानी.........तब-तब जब-जब और तब तब धरी प्रभु मनुज शरीरा..........

३१८. जिज्ञासु:- ‘हरि ब्यापक सर्वत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मै जाना।।‘ इसमें हरि से कितना प्रेम हुआ जाये तो प्रकट हो जाते है।

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- ऐ भइया ! देखिये दो समय है एक समय है अवतार बेला का। दूसरा समय है अवतार रहित बेला। अवतार रहित बेला में आत्मा का महत्व व्यवहार में श्रेष्ठ मानी जाती है। हालांकि भक्ति-सेवा उससे श्रेष्ठ है लेकिन व्यवहार में आत्मा वाले श्रेष्ठ घोषित कहलाया जाता है। क्योंकि यहाँ साधना होती है दर्शन होती है ईश्वर का। इसलिए वह श्रेष्ठता के मान्यता में आ जाता है। ऐ शंकर जी ‘हरि व्यापक सर्वत्र समाना’ कब कहे थे उस समय को देखिए किसी भी चित्र का सही अर्थ भाव आपको देश काल परिस्थिति के आधार पर मिलेगा। मनमाना नहीं। यह कब का है तो दोहा, चौपाई आप इसको गौर कीजिये। चारों तरफ धरती बेचारी देखी---धर्म वाले ही अधर्म करने लगे हैं। ऐ धरती बेचारी देखी कि ‘अतिसय देखइ धर्म की ग्लानि। परम सभीत धरा अकुलानी।।
धरम परमप्रभु परमेश्वर की विधान होता है धर्म जो है ईमान, सच्चाई, संयम से चलने वाला जीवन-विधान है। धर्म जो है परमप्रभु परमेश्वर का सत्य-प्रधान दोष रहित विधान है। वह विधान जब लुप्त होने लगता है। उस सत्य विधान की जब हानि होने, ग्लानि हों लगती है तो धरती बेचारी व्याकुल हो जाती है कि धरती को भरण-पोषण के लिये परमप्रभु परमेश्वर ने बनाया साधु, सज्जन के लिये, सयंमी के लिये, दुर्जन इसको कब्जा कर लेते हैं। दुर्जन इस पर कब्जा कर लेते हैं तो धरती बेचारी परेशान हो जाती है। देखइ सकल धर्म बिपरीता। कहहि न सकइ रावण भयभीता।।‘ जितने ऋषि-महर्षि होते हैं सब भक्ति सेवा करने के लिये भगवान् ही बन जाते हैं। आज हजारों भगवान् जी हैं। आपके मेला में पण्डाल में हैं, जानकारी जीव की भी नहीं है, उल्टा धरम में चल रहे हैं यानी विपरीत धर्म अपना रहे हैं। आये जनमानस के कल्याण के लिये जनमानस का धर्म धन दोनों शोषण करने में लगे हुयें हैं। सारे के सारे पण्डाल वाले जो कोई कहे न मैं प्रमाणित करके बतला दूँ। सरकार दे रही है, हम लोगों को टेंट पडाण्ल आने वाले स्नार्थियों के सहायता-सहयोग के लिये है। इसी पण्डाल में रहने का भाड़ा-किराया लिया जा रहा है। इन्ही गुरु महात्मा लोगों द्वारा, इन्ही धर्मात्मा लोगों द्वारा। यानी ठहरने का पैसा लिया जा रहा है खाना दे रहे हैं जनता सेवा करने के लिये उस खानवा के पैसा महात्मा जी लोग ले रहे हैं। यहाँ रहने का भाड़ा किराये वसूल रहे हैं। टेंट दिया सरकार ने जनता के सेवा करने के लिये, टेंट में रहकर जनमानस से पैसा वसूल रहे हैं। यह विपरीत धर्म है। यह सब धर्म नहीं है। धर्म माने हम जनता का कल्याण सोचें धर्म माने हम जनता के सेवा जनता के सहयोग सोंचे यानी धर्म वह नहीं है कि अपने कैम्प में आने वाले जनता को कैसे दोहन-शोषण करें कैसे धन वसूलें। ये कभी धर्म नहीं रहा। उस समय का ऋषि-महर्षि जी लोग भी करने लगे। जो चेला उनके शरण में आया इसको अपने में फँसाकर के एक बार भी भगवान् के तरफ एक बार भी उन्होंने मुड़ने नहीं दिया। वशिष्ठ जी के बहुत शिष्य चेला थे एक से उन्होंने नहीं कहा---राम भगवान् जी हैं स्वीकार कर लो, एक चेला को राम जी के तरफ नहीं मोड़ें जबकि अपने गुरुवाई अपने क्षमा-प्रार्थना करते हुये हाथ जोड़कर के रामजी के चरण-शरण, भक्ति-सेवा किया लेकिन किसी शिष्यों को नहीं रामजी के पास जाने दिया। यही याज्ञवल्य ने किया, यही भारद्वाज ने किया यही बाल्मिकी ने किया, वहीं अगस्त सारे मुनियों ने किया। किसी भी ऋषि-महर्षि-ब्रहर्षि ने अपने किसी शिष्य को भगवान् के तरफ नहीं मोड़ा, अपने भगवान् बनकर के भटकाये रखा। आज भी ऋषि लोग यही कर-करा रहे हैं लाखों शिष्यों को फंसाकर के ठग रहे हैं। जानकारी जीव की भी नहीं है वसूली उसका सब कर रहे हैं। यह सब विपरीत धर्म हैं। ऐसे धर्म को देखकर पृथ्वी परेशान हो जाती है। अब सकल धर्म देखइ बिपरीता। कहि न सकइ रावण भयभीता।। रावण के भय से विपरीत धर्म करने वालों को रावण सरंक्षण देता था। सही धर्म में चलने वालों को मार-काट कर के फेंक देता था यानी विपरीत धर्म वालों को सरंक्षण देता था धर्म निरपेक्ष दरोगा जी, एस॰पी॰साहेब इस समय के तरह से तैयार है, खबरदार जो जैसा करेगा, धर्म करेगा जो मन करेगा वही धर्म कहलायेगा। खबरदार दूसरे को लेकर दूसरे के पण्डाल में मत जाना। लूटो, मिलो बांटो, खाओ। शान्ति बनाये रखो, हल्ला होना नहीं चाहिये। शोर नहीं मचना चाहिये। तुम ठीक हो, सही हो। उनको मतलब है शान्ति से। क्योंकि सरकार वही चाहती है धर्म-निरपेक्ष संविधान है संविधान के नियम का पालन करना है। अब लीजिये यह हजारों पंडाल क्या है? लूटने का तो बहाना है। सत्य तो एक था एक रहने वाला है। अब सब लोग सत्य खोजिये वह एक ही को संचालन में सब होती, लूट-पाट नहीं होता। पैसा-रूपया प्रधान नहीं बनता, प्रधान बनता जनकल्याण प्रधान बनता है। जनता के सेवायें प्रधान बनती हैं। उनका सहयोग तो आज हम क्या कर रहे हैं? आप सभी ऋषि-ब्रह्मर्षि-महर्षि सब लोग भगवान् बनकर के बैठे थे। धरती बेचारी सामान्य तो थी वह जब चलने लगी तो ऋषि-महर्षि-ब्रह्मर्षि लोग छोड़कर के भागने लगे जो मिला वह कह रहे हैं भगवान् मिला है। एक ऋषि-महर्षि-ब्रह्मर्षि कह दे कि भगवान् मिला है। एक नहीं मिला। नारद बाबा मिले नारद बाबा धरती पर अपना परमप्रभु का पता बताओं मैं उनकी पुकार करना चाहती हूँ। आज मुझे यह भार सहन नहीं हो सकता है। यह धर्म की ग्लानि, यह विपरीत धर्म की व्यवस्था, मुझे परमप्रभु का पता बताओ। मैं उनको पुकार करूँगी, वह आकर के मेरी रक्षा करेंगी, भार हरेंगे। नारद जी बोल गए पता नहीं। चलो-चलो ब्रह्मा जी बतायेंगे, सृष्टि के रचयिता हैं। ब्रह्मर्षि भी साथ में हुये धरती बेचारी गो रूप धरी साथ में नारद बाबा भी साथ ही गये। सब मिलकर गये ब्रह्माजी के पास। ब्रह्मा जी दूर से ही नारद बाबा, ब्रह्मर्षि, धरती बेचारी को देख लिये।सब मिलकर गये ब्रह्माजी के पास। पहले से ही समझ गये कि काम तो गड़बड़ा गया। हम भी प्रभु जी को नहीं जानते, चलो, चलो, चलो, चलो शंकर जी के पास चलो वही बतायेंगे परमप्रभु के विषय में। बोलिये परमप्रभु परमेश्वर की जय ! अब ब्रह्मा जी, सुरेश (इन्द्र), नारद बाबा और कुछ ब्रह्मर्षि सब लोग मिलकर के चल दिये। महादेव जी के यहाँ, शंकर बाबा के यहाँ और भी देवी-देवता साथ हो लिये। अब सभा होने लगा। सभा होने लगा। शंकर जी ने कहा वह परमप्रभु कहाँ मिलेगा? कैसे पुकारा जाय? तो सभा का अर्थ होता है हर किसी को बोलने को छूट मिलता है। सब का मतलब होता है जो जानकार होता है उसको सभा में बोलने का मौका दिया जाय। वही सभा में भी हुआ। बैठे सुर सब करहिं बिचारा। कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा।। सब देवी-देवता, ऋषि-महर्षि मिलकर के विचार करने लगे। वह परमप्रभु कहाँ मिलेगा ताकि हम उसका पुकार करें, तो कोई कह रहे हैं पुर बैकुंठ में रहता है उसी में कोई कहा ना, ना, ना कोई कह रहा है भाई ! बैकुंठ वाला नहीं है वह क्षीरसागर में सोया है न, क्षीरसागर में जो सोया है वही परमप्रभु है। उसी में कोई कहा------जाके ह्रदय भगति जसि प्रीती। प्रभु तहँ प्रगट होहि तेहि रीती।। वह तो सबके ह्रदय में रहता है जैसे धरती है वैसे ही परमप्रभु प्रकट होता है। सब लोग ऐसे-ऐसे अपने मत देते रह गये। अन्त में पंक्ति बारी महादेव जी का हो गया, शंकर जी सर्टिफिकेट भी दे रहे हैं।
हे गिरिजा ! उस समाज में मैं भी था, मुझे भी एक वचन बोलने का मौका मिला। हरि ब्यापक सर्वत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहि मैं जाना।। तो वहाँ शंकर जी बोल रहे हैं कि हरि हरि व्यापक सर्वत्र समाना। क्योंकि उस समय शंकर जी आत्मा वाले थे, शंकर जी आत्मा वाले हैं, परमात्मा वाले नहीं हैं। आत्मा एक रोशनी है जिसका प्रकाश चारों तरफ फैला हुआ है वैसे ही परमात्मा परम आकाश रूप परमधाम में रहता है और उसका दिव्य ज्योति, अलिमे नूर, स्व-प्रकाश चारों तरफ ब्रह्माण्ड मे फैल जाता है तो अभी तो शंकर जी आत्मा वाले थे आत्मा वाले व्यापकता की बात कर दिया। जब वही शंकर जी जब राम रूप में यानी सर्वव्यापी थे तो शंकर जी, ब्रह्मा जी, इन्द्र जी, द्गारती महर्षि-ब्रह्मर्षि ये पुकार किसका कर रहे थे? जय सुरनायक ! जन सुखदायक ! यह पुकार किसका हो रहा है जब भगवान् व्यापक है ही तो। ऊपर से आदेश हो रहा है।
गौर कीजियेगा जिसमें देवराज इन्द्र हैं, इसमें सृष्टि के महानिरीक्षक नारद बाबा हैं जिसमें सृष्टि के संहारक शंकर जी हैं। देवता और पृथ्वी को भयभीत जानकर उनके करुणा युक्त बचन सुनकर शोक सन्देह हरने वाली आकाशवाणी ऊपर से हुई।
जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेशा।
तुम्हहिं लागि धरिहऊँ नरबेसा।।
अंशन्ह सहित मनुज अवतारा।।
इससे स्पष्ट होता है कि भगवान् न तो सर्वत्र, न कण-कण न घट-घट में है न उनको कोई जानता है बल्कि वह परमधाम से अवतरित होकर मनुष्य का शरीर धारण करते हैं।
यह आकाशवाणी आ रही है वह कौन हैं? जो इन्द्र को, ब्रह्मा को, नारद को, ब्रह्मर्षियों को शंकर जी को कह रहे हैं कि डरो नहीं, डरो नहीं, तुम्हारे लिये हि धरहूँ नर भेषा। वे लोगों को कह रहे हैं कि तेरे लिये मैं आ रहा हूँ। नर वेष धारण करके आ रहा हूँ, यह कौन था? आगे आइये 1-2 लाइन और जब राम जी के रूप में भगवान् का अवतार हो जा रहा है। भगवान् जी राम जी के रूप में विचरण कर रहे हैं राम लक्ष्मण जा रहे हैं। शंकर जी सती के साथ कह रहे हैं। वह शंकर जी क्या कह रहे हैं? जय सच्चिदानन्द ! जगपालन ! शंकर जी स्वयं कह रहे हैं जय सच्चिदानन्द जगपालन हार। सती को आश्चर्य लग रहा है। महादेव हि जगदीश हि शंकर जी है महेश्वर हि ये जो दशरथ के राजकुमार को नमस्कार प्रणाम कर रहे हैं वह जान समझ नहीं पाई। जय सच्चिदानन्द जगत पालनहारे। शंकर जी सच्चिदानन्द को कहाँ देखा राम में। सर्वव्यापकत्व की परिभाषा समाप्त हो गयी। आगे क्या कहा अमर गाथा गाने के बाद राम, रामेति रामेति.............राम नाम वरनने।। राम ने वह सर्वव्यापी का भ्रम समाप्त कर दिये। जब नहीं रहता है न लेकिन वास्तव में भगवान् का ज्ञान जहाँ होता है वहाँ भगवान् परमधाम, परमआकाश, बिहिस्त, पैराडाइज इंटर्नल पीस का वासी है, सर्वव्यापी नहीं है। सर्वव्यापकता कैसा है अब आप देख लीजिये सर्वव्यापी का अर्थ यह नहीं है कि भगवान् इसी में घुसा है। सर्वव्यापी का अर्थ है पंखुड़ी चारों ओर हाथ-पैर नहीं है। पंखुड़ी को चारों ओर हाथ नहीं है क्या इसका अर्थ यह है कि पंखुड़ी के चारों तरफ हाथ है वैसे ही परमेश्वर ही है। ब्रह्माण्ड परमेश्वर में होता है। ब्रह्माण्ड परमेश्वर में होते हैं। उसमें आप देखेंगे गीता अध्याय 13 श्लोक 13-
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोsक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
सबको घेर कर स्थित है, वह भगवान है। सबमें भगवान नहीं है। यह व्यापकत्व की परिभाषा है व्यापकत्व माने इसीलिए नहीं व्यापकत्व माने ऐसे यह ब्रह्माण्ड मानिये। ब्रह्माण्ड के सब ओर भगवान। जब दर्शन भगवान का कराऊँगा तो यही भगवान मिलेगा दर्शन में जिसमें ब्रह्माण्ड हैं। दिखाई देगा जब दर्शन होगा तो दिखाई देगा अपने आप सहित सारा ब्रह्माण्ड उसी भगवान में दिखाई देगा। व्यापकत्व की परिभाषा सर्व आवृत्ति तिष्ठति वाला है। सबमें घुसा हुआ नहीं है।

३१९. जिज्ञासु :- अभी आपके द्वारा बताया गया कि किसी गुरु या महर्षि-ब्रह्मर्षि ने किसी शिष्य को भगवान के पास नहीं पहुँचाया जबकि मतंग ऋषि के आश्रम में सेवरी रहती थी और श्री राम जी के दर्शन हुआ। प्रहलाद को खम्भा से भगवान का दर्शन हुआ। जब जन-कण में व्याप्त नहीं हो सकते हैं। वह खम्भा में से कहाँ से आए। हिरण्यकश्यप ने पूछा – तुम्हारे खम्भा में भी है। हमारे अंदर भी है, तुम्हारे अन्दर भी है क्या? उसमें ईश्वर ने व्यापकत्व दिखाई सब में होता है कि ईश्वर कण-कण में होता है और दूसरी बात आपने बताया।

 #विलक्षण_शंका_समाधान ३१३. जिज्ञासु:- दूसरे पूर्व के तत्त्वज्ञानी है, यह लोग महाराज श्री वह लोग तत्त्वज्ञानी नहीं हैं, त...
07/04/2024

#विलक्षण_शंका_समाधान
३१३. जिज्ञासु:- दूसरे पूर्व के तत्त्वज्ञानी है, यह लोग महाराज श्री वह लोग तत्त्वज्ञानी नहीं हैं, तत्त्वज्ञान दाता हैं। पूर्व का तत्त्वज्ञान दाता भगवान् है, वह जो है दिव्य दृष्टि, तत्त्व दृष्टि दूर बैठाकर देते हैं।

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- मुझे भी जब दर्शन कराना होगा जिस दिन जीव दर्शन कराना होगा, सूक्ष्म दृष्टि देकर के ही जीव दर्शन कराऊँगा । जिस दिन आत्मा-ईश्वर-शिव-ब्रह्म का दर्शन कराना होगा, दिव्य दृष्टि देकर के दर्शन कराऊँगा । जिस दिन परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान् का दर्शन-परिचय-पहचान होगा ज्ञान दृष्टि देकर के ही कराऊँगा।

३१४. जिज्ञासु:- दिव्य दृष्टि दूर से दिया जाता है कि माथा पकड़ करके। दिव्य दृष्टि, अभी सारे बहुत सम्प्रदाय हैं भौतिक जगत् में, तो कहाँ से दिखाते हैं?

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- नहीं, नहीं, हमारे यहाँ ऐसा कुछ नहीं हैं। हमारे यहाँ ऐसा कुछ नहीं हैं। हमारे यहाँ सीधे आपको बतला दे रहा हूँ शंकर जी का मूर्ति फोटो देखा है आपने? उनके पास तीसरा नेत्र हैं देखा है आपने? वही तीसरा नेत्र देता हूँ। उसी से सारा दर्शन कराता हूँ। न इधर दबाता हूँ, न उधर दबाता हूँ।

३१५. जिज्ञासु:- समय की परिभाषा क्या है? क्या सरल मस्तिष्क वाला है समय?

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- काल, कर्म तो माया क्षेत्र में होते हैं। इसमें काल, कर्म कैसा? यह तो अकाल पुरुष वाला है, धर्म वाला है। काल, कर्म तो माया के क्षेत्र में होता है। काल कर्म परमेश्वर के यहाँ कहाँ है? वह तो अकाल पुरुष है, धर्म वाले हैं।

३१६. जिज्ञासु:- समाधिस्थ अवस्था क्या है?

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- जीव जब आत्मा को पाकर के जब आत्मा में स्थित हो जाता है उस आत्मा में स्थित का नाम निर्विकल्प समाधि या सबीज समाधि या सम्प्रज्ञात समाधि तथा दूसरा निर्विकल्प समाधि या निर्बीज समाधि या असम्प्रज्ञात समाधि। यही असली समाधि है। जब तक अलग रह करके हम कुछ सीन देख रहे हैं, तब तक सभी सम्प्रज्ञात समाधि है, सुविचार समाधि है। यह दोष पूर्ण है, तो समाधि की दो प्रकार होते हैं। सविचार और निर्विचार, सविकल्प और निर्विकल्प यानी सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात। तो पहले समाधि जो सविचार, सविकल्प, सम्प्रज्ञात वाला है यह दोष पूर्ण है। असली समाधि निर्विचार, निर्विकल्प, असम्प्रज्ञात वाला है। इसमें जीव का आत्मामय स्थिति में हो जाता है। जब जीव आत्मामय स्थिति में हो जाता है और ठहरता है उसका नाम है असली समाधि।

https://youtu.be/BXVijQUd_S0
11/07/2020

https://youtu.be/BXVijQUd_S0

धर्म का निर्णय वचन नहीं चरण करता है , हर किसी को आत्म विश्लेषण करना चाहिए - कल्कि अवतार भगवान् सदानन्द जी ...

https://youtu.be/DEPi3jV46zg
06/07/2020

https://youtu.be/DEPi3jV46zg

सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् प्रस्तुत करता है आप लोगों के लिए एक महान कार्यक्रम भविष्यवाणीयों का खुलासा , कौन है दु....

05/07/2020

🌹🌹जय प्रभु🌷🙏🌷सदानन्द जी 🌹🌹
#सद्गुरु_पूर्णिमा के अवसर पर सभी को हार्दिक बधाई ।
आइये जानते हैं कि वास्तव में #सद्गुरु_क्या_होता_है और #सच्चा_सद्गुरु_से_मिलने_वाली_उपलब्धि_क्या_होता_है ।

https://www.facebook.com/sadanandjiparamhans/videos/1732590916835167/

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