अंजली यादव सनातन मंच

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🙏सनातन आस्था और राष्ट्रभक्ति के दीवाने और अपने पूर्वजों के सच्चे इतिहास पर गर्व करने वाले सभी योद्धाओ का स्वागत है यहां झूठे इतिहास और दोहरी मानसिकता वाली राजनीति को भी एक्सपोज किया जाता है 🙏 [email protected] तत्काल सम्पर्क धन्यवाद 🚩🚩

कांग्रेस पार्टी और उनके युवराज राहुल गांधी का हिंदू-विरोधी चेहरा बार-बार देश के सामने उजागर होता रहा है! जरा सोचिए, जिस ...
28/08/2026

कांग्रेस पार्टी और उनके युवराज राहुल गांधी का हिंदू-विरोधी चेहरा बार-बार देश के सामने उजागर होता रहा है! जरा सोचिए, जिस आदमी को मनुस्मृति के एक श्लोक का अर्थ तक नहीं पता, वह खुले मंच पर चिल्ला-चिल्लाकर ज्ञान बांट रहा है कि 'मनुस्मृति में महिलाओं को आजादी नहीं है'। हद तो तब हो जाती है जब यह बयान एक हिजाब और बुर्के में ढकी महिला के सामने दिया जाता है कि 'महिलाओं को आजादी हिंदू धर्म में नहीं है'। समझ नहीं आता कि वो कौन से हिंदू हैं जो आज भी कांग्रेस का समर्थन करते हैं? इसी को असल मायनों में मानसिक गुलामी कहते हैं! इतिहास उठाकर देख लीजिए, जिस प्रकार 1192 में मोहम्मद गोरी और पृथ्वीराज चौहान का युद्ध हुआ, तो पृथ्वीराज चौहान ने गोरी को वह मार लगाई कि वह कांप उठा, लेकिन हजारों बार कुरान की दुहाई देने और कसमें खाने पर उसे जिंदा छोड़ दिया। ठीक एक साल बाद वह फिर आया और कुछ जयचंदों की गद्दारी की वजह से पृथ्वीराज चौहान हार गए, जिसके बाद गोरी ने अपने गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को उत्तराधिकारी बनाकर गुलाम वंश की नींव रखी; ठीक वैसे ही अंग्रेजों के जाने के बाद उनके चहेते सत्ता में बैठे और उन्हीं के मानसिक गुलाम आज भी गुलामी कर रहे हैं! इन्हीं राहुल गांधी और कांग्रेसियों से मेरा सीधा और कड़ा सवाल है—जिस सनातन धर्म में हजारों-हजार साल से महिलाओं का ऐसा सर्वोच्च सम्मान रहा है, क्या उसकी बराबरी दुनिया का कोई अन्य मजहब या पंथ कर सकता है? अगर सनातन में स्त्रियों को पर्दे या गुलामी में रखने का आदेश होता, तो हमारी महान परंपरा और इतिहास में मां दुर्गा, मां काली, माता सीता, श्री राधा, गार्गी, मैत्रेयी, मीराबाई, रानी दुर्गावती, गुजरात की रानी नायकी देवी, अहिल्याबाई होल्कर, रानी लक्ष्मीबाई, सावित्रीबाई फुले, सरोजिनी नायडू और किरण बेदी जैसी वीरांगनाओं और विदुषियों के अदम्य साहस, ज्ञान, नेतृत्व और शौर्य के उदाहरण कभी नहीं मिलते। अगर राहुल गांधी या किसी कांग्रेसी में जरा सी भी हिम्मत है, तो दुनिया के किसी भी अन्य मजहब में किसी एक भी महिला का नाम बता दें जो इतिहास में सनातन की इन देवियों और वीरांगनाओं की तरह सम्मानित, पूजित और प्रेरणास्रोत हुई हो! इनकी तथाकथित आजादी वाली पोल तो तब खुली जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हिजाब को इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा मानने से साफ इंकार कर दिया और फैसला आते ही कांग्रेसी छाती कूटने लगे। मेरा उनसे सीधा सवाल है—यह हिजाब और बुर्का मुस्लिम महिलाओं के लिए पिंजरा है या खुला आकाश? क्योंकि राहुल गांधी ने इस पिंजरे को बहुत लोकप्रिय बनाने का ठेका ले रखा है। कोर्ट का फैसला आते ही कांग्रेस के बड़े नेता पवन खेड़ा और जयराम रमेश जैसे लोग सोशल मीडिया पर पोस्ट ठोकने लगे कि 'धार्मिक मान्यताओं की समीक्षा धार्मिक विद्वानों पर छोड़ देनी चाहिए'। जरा इनकी बेशर्मी तो देखिए! हिजाब और बुर्का जरूरी है या नहीं, इसकी व्याख्या ये मुस्लिम मौलानाओं पर छोड़ने की बात करते हैं, लेकिन मनुस्मृति की समीक्षा राहुल गांधी करेंगे? आखिर कौन हैं राहुल गांधी? क्या वो कोई हिंदू धार्मिक विद्वान, धर्माचार्य, शंकराचार्य, महामंडलेश्वर, जगद्गुरु या परमहंस हैं? उत्तर है—कुछ नहीं! मतलब हिजाब पर कोई गैर-मुस्लिम लीडर ना बोले, केवल मुस्लिम धार्मिक नेता बोलें, लेकिन मनुस्मृति पर राहुल गांधी धुआंधार बोलेंगे? यह खुलेआम 100 करोड़ हिंदुओं के मुंह पर करारा तमाचा है! मनुस्मृति की व्याख्या राहुल गांधी करेंगे, लेकिन कुरान की व्याख्या केवल मुस्लिम धर्मगुरु करेंगे, वरना कांग्रेस बुरा मान जाएगी—यह दोहरा चरित्र और पाखंड अब किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा! शायद कांग्रेसियों की बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी है, क्या इनको नहीं पता कि इसी हिजाब और बुर्के के खिलाफ बाबा साहब भीमराव अंबेडकर अपनी किताब 'पाकिस्तान ऑर द पार्टीशन ऑफ इंडिया' में साफ लिख गए हैं कि 'हिजाब और बुर्के से गलीज और घटिया किस्म की कोई प्रथा हो ही नहीं सकती मुस्लिम स्त्रियों के लिए'। क्या किसी कांग्रेसी, सोनिया, राहुल या खड़गे में इतनी हिम्मत है कि वे बाबा साहब को गलत बोलकर दिखा दें? अगर ऐसा बोलकर दिखा दें तो मैं इनको राणा सांगा का वंशज मान लूँ! जब कोई नेहरू की विनाशकारी नीतियों की आलोचना करता है तो यही कांग्रेसी चिल्लाने लगते हैं कि '60 साल पुराने नेहरू पास्ट टेंस हैं, वर्तमान की बात करो', लेकिन हजारों साल पुरानी मनुस्मृति इनके लिए प्रेजेंट टेंस बन जाती है और उस पर विष वमन करने राहुल गांधी पुणे पहुंच जाते हैं, मानो उसके दो-दो पन्ने रोज छपकर आ रहे हों! मनुस्मृति की समीक्षा से किसी को आपत्ति नहीं, लेकिन क्या ऐसा ही साहस ये शरिया, कुरान या बाइबिल के लिए दिखा सकते हैं? अगर हिम्मत है, तो लाओ एक मंच पर मनुस्मृति, कुरान, शरिया और हदीस को और हो जाए खुला वैचारिक महाकुंभ! पर सच तो यह है कि कांग्रेस में यह हिम्मत कभी नहीं हो सकती, क्योंकि इनका एकमात्र मकसद हिंदुत्व के खिलाफ छल, कपट और दोहरा व्यवहार करना है, जिसका करारा जवाब आज पूरा देश मांग रहा है!🚩🚩❤️❤️💫💫

कांग्रेस भी अजीब पार्टी है सुरु की एक अंग्रेज ने चला रहे इटली वाले समर्थक है पाकिस्तान और बांग्लादेश के और मुर्ख हिन्दुस...
26/08/2026

कांग्रेस भी अजीब पार्टी है सुरु की एक अंग्रेज ने चला रहे इटली वाले समर्थक है पाकिस्तान और बांग्लादेश के और मुर्ख हिन्दुस्तानियो को बना रहे💫💫😉😉

आरक्षण पर चाहे जितना भी हंगामा कर लिया जाए, लेकिन एक कड़वा सच यही है कि सत्ता में चाहे कोई भी सरकार आ जाए, आरक्षण को खत्...
25/08/2026

आरक्षण पर चाहे जितना भी हंगामा कर लिया जाए, लेकिन एक कड़वा सच यही है कि सत्ता में चाहे कोई भी सरकार आ जाए, आरक्षण को खत्म करने की हिम्मत कोई नहीं दिखा सकती। सबसे ज्यादा खतरनाक बात तो यह है कि अगर बीजेपी सत्ता से हटी, तो देश की कमान उन पार्टियों के हाथों में चली जाएगी जो सरकारी तो छोड़िए, अब प्राइवेट सेक्टर में भी आरक्षण ठूंसने की वकालत कर रहे हैं; ऐसे में सवर्ण समाज आखिर करे तो क्या करे? एक तरफ जहां देश की असली प्रतिभाओं का सरेआम गला घोटा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ जिनकी औकात और योग्यता एक चपरासी की नौकरी पाने की भी नहीं है, वे आरक्षण की खैरात के दम पर आईएएस और जज बनकर कुर्सियों पर ऐश फरमा रहे हैं। बीजेपी ने कम से कम सवर्ण समाज के दर्द को समझते हुए ईडब्ल्यूएस (EWS) के जरिए 10% आरक्षण देकर उन्हें मुख्यधारा में लाने का एक ठोस प्रयास तो किया, वरना किसी और पार्टी ने आज तक सवर्णों के लिए ऐसी सिफारिश करने की हिम्मत तक नहीं दिखाई। सच तो यह भी है कि क्रीमी लेयर को लेकर बीजेपी जो नई और पारदर्शी नीति बनाने की कोशिश कर रही है—ताकि लाभ वास्तव में उन पिछड़े और कमजोर लोगों तक पहुंचे जो आज तक वंचित रहे हैं—उस पर भी यह गिद्ध रूपी विपक्ष अपनी घटिया राजनीति चमकाने में लगा है, क्योंकि विपक्ष का सीधा सा मतलब बस यही रह गया है कि आंखें मूंदकर खैरात बांटते रहो और देश में आलसी और निकम्मों की फौज पालते रहो। ना तो किसी पार्टी को दो-तिहाई बहुमत मिलेगा और न ही यह दीमक रूपी आरक्षण कभी खत्म होगा, इसलिए सबसे बेहतर और क्रांतिकारी रास्ता तो यही होगा कि सेना को छोड़कर देश के बाकी हर एक सेक्टर का पूरी तरह से निजीकरण कर दिया जाए—ना रहेगा बांस और ना बजेगी बांसुरी! जिसके अंदर अपनी असली योग्यता और दम होगा, वही नौकरी पाएगा और यह जो सरकारी बाबू मुफ़्त की मलाई चाट-चाटकर हरामखोर, आलसी और कामचोर बन चुके हैं, देश को हमेशा के लिए इनसे मुक्ति भी मिल जाएगी। यकीन न हो तो किसी भी खटारा सरकारी बैंक में जाकर देख लीजिए कि वहां क्या बदहाली और बदतमीजी फैली है, और वहीं दूसरी ओर किसी प्राइवेट बैंक में कदम रखकर देख लीजिए कि वहां कैसी विश्वस्तरीय सुविधा और अनुशासन मिलता है। जैसा कि साफ कहा गया है, देश के हर एक विभाग का निजीकरण तुरंत ठोंक दिया जाए और इसके बाद भी अगर अपनी घटिया राजनीति के चलते कोई जाहिल प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण मांगने की जुर्रत करता है, तो उसके लिए एक विशेष किस्म का जूता हमेशा तैयार रखना चाहिए!

प्रधानमंत्री मोदी को को गहरे समंदर में उतरकर जलमग्न द्वारका जी के दर्शन करने क्यों जाना पड़ा,?ये बात आज के तथाकथित सेकुल...
24/08/2026

प्रधानमंत्री मोदी को को गहरे समंदर में उतरकर जलमग्न द्वारका जी के दर्शन करने क्यों जाना पड़ा,?ये बात आज के तथाकथित सेकुलर हिंदुओं को कभी समझ में नहीं आएगी क्योंकि जिन लोगों को यह सिर्फ एक राजनीतिक नौटंकी या धार्मिक प्रदर्शन लगता है, वे उस गहरी सभ्यतागत चोट और सुनियोजित घेराबंदी को देखने से पूरी तरह अंधे बने हुए हैं, जिसे समझ पाना किसी आम दृष्टिकोण के बस की बात नहीं है। बेट द्वारका केवल एक साधारण तटीय द्वीप नहीं था, बल्कि यह सनातन संस्कृति का वह ऐतिहासिक और पवित्र केंद्र था जिसे रणनीतिक रूप से एक सोची-समझी साजिश के तहत घेरा जा रहा था, जहाँ प्राचीन द्वारकाधीश मंदिर के चारों ओर अवैध निर्माणों और मजारों की चादर बिछाई जा चुकी थी और स्थिति यहाँ तक पहुँच गई थी कि स्थानीय आर्थिक संसाधनों, ट्रांसपोर्ट और मछली पकड़ने के व्यवसाय पर एक खास सिंडिकेट का कब्जा हो चुका था, जिसके कारण बहुसंख्यक समाज को अपने ही देश के इस पवित्र स्थल से पलायन करने पर मजबूर होना पड़ रहा था और श्रद्धालुओं का वहाँ पहुँचना तक दुश्वार कर दिया गया था। ऐसे माहौल में जब गुजरात सरकार ने अपनी तटीय और आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करते हुए सरकारी जमीनों से अवैध कब्जों का सफाया किया, वक्फ बोर्ड के उन दावों को कचरे के डिब्बे में फेंका जिसने श्री कृष्ण की इस नगरी के टापुओं पर अपना मालिकाना हक ठोक दिया था, और 900 करोड़ से अधिक की लागत से सुदर्शन सेतु का निर्माण करके आवाजाही के उस एकाधिकार को जड़ से खत्म कर दिया, तब जाकर उस क्षेत्र की सांसें बहाल हुईं, और ठीक इसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री मोदी का समुद्र की अगाध गहराइयों में उतरकर भगवान कृष्ण की पौराणिक नगरी के अवशेषों के समक्ष पूजा-अर्चना करना कोई महज एक डुबकी नहीं थी, बल्कि यह भारत के शीर्ष नेतृत्व द्वारा दुनिया और अपने ही देश के सुप्त पड़े समाज को दिया गया एक प्रचंड और स्पष्ट सांस्कृतिक संदेश था कि जिस सनातन धरोहर को भौगोलिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय रूप से मिटाने या दबाने की कोशिशें की जा रही थीं, उसकी जड़ें इस देश के जल, थल और समंदर की गहराइयों में इतनी गहरी हैं कि उन्हें कोई भी साजिश मिटा नहीं सकती, और यही वह कड़वा सच है जो तुष्टिकरण का चश्मा पहने सेकुलर हिंदुओं की समझ से हमेशा परे रहेगा। अपने हक के लिए लड़ना बिल्कुल सही है लेकिन दूसरे के नॉरेटिव में पड़कर खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेना आत्महत्या के समान है जय श्री राम ❤️❤️🙏🙏🚩🚩

1937 में जवाहर काका जिन्ना से समझौता किए थे कि हम पूरा वन्दे मातरम नहीं गाएंगे और उसके बावजूद ​जिन्ना ने पाकिस्तान ले लि...
23/08/2026

1937 में जवाहर काका जिन्ना से समझौता किए थे कि हम पूरा वन्दे मातरम नहीं गाएंगे और उसके बावजूद ​जिन्ना ने पाकिस्तान ले लिया और कब्र में चला गया!लेकिन उसकी परम्पराओं को भारत में उसकी नाजायज औलादें निभा रही हैं
​और चमचे सड़क पर आजादी की कहानियां सुना रहे हैं😂😂

जंतर-मंतर पर जमा होकर यह नारा लगाना कि "आरक्षण हटाओ वरना सरकार गिरा देंगे" व्यावहारिक धरातल पर पूरी तरह से तर्कहीन लगता ...
23/08/2026

जंतर-मंतर पर जमा होकर यह नारा लगाना कि "आरक्षण हटाओ वरना सरकार गिरा देंगे" व्यावहारिक धरातल पर पूरी तरह से तर्कहीन लगता है, क्योंकि 240 सीटों पर टिकी कोई भी सरकार रातों-रात आरक्षण जैसी संवैधानिक व्यवस्था को खत्म नहीं कर सकती। जो लोग ऐसी मांगों और धमकियों पर भरोसा कर रहे हैं, वे या तो देश के राजनीतिक-संवैधानिक ढांचे को नहीं समझते या फिर वे किसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा बने हुए हैं। मैं भी यही चाहती हूँ आरक्षण हटना चाहिए लेकिन कैसे?
​सच्चाई यह है कि आरक्षण का ढांचा बदलना कोई ऐसा सरकारी फरमान नहीं है जिसे एक रात में लागू कर दिया जाए। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, देश की आधी से ज्यादा राज्य विधानसभाओं से इसे पारित कराना पड़ता है और अंत में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ के कड़े परीक्षण से गुजरना होता है। जब विपक्ष के 'संविधान खतरे में है' और 'आरक्षण खत्म हो जाएगा' के नैरेटिव मात्र से भाजपा जैसी पार्टी 400 पार के दावों के बावजूद 240 सीटों पर आकर रुक गई, तो 240 सीटों की सीमा में बंधी कोई भी सरकार ऐसा संवैधानिक बदलाव करने का जोखिम कैसे उठा सकती है?​अगर कोई 'मोदी-योगी हटाओ' का झंडा उठाकर यह दावा करता है कि विकल्प आने पर आरक्षण खत्म हो जाएगा, तो सवाल उठता है कि वह विकल्प कौन है? उत्तर प्रदेश में सपा का 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला हो या बिहार में प्रशांत किशोर का बयान—विपक्ष तो निजी क्षेत्र (प्राइवेट सेक्टर) में भी आरक्षण की वकालत कर रहा है। वहीं कांग्रेस का पूरा एजेंडा 'जितनी आबादी, उतना हक' और जातिगत जनगणना के इर्द-गिर्द घूम रहा है। ऐसे में वर्तमान सत्ता को हटाने से आरक्षण खत्म होना तो दूर, उसकी सीमा और दायरे के और बढ़ने की संभावना बन जाती है।
​वास्तव में, यह विरोध प्रदर्शन आरक्षण हटाने का वास्तविक प्रयास कम और आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर की जा रही राजनीतिक लामबंदी ज्यादा नजर आता है। सवर्ण अस्मिता और आरक्षण के मुद्दे को भुनाकर पारंपरिक वोट बैंक में बिखराव पैदा करने की यह रणनीति कोई नई नहीं है। "आरक्षण हटाओ" से शुरू हुआ यह घटनाक्रम अंततः "सरकार हटाओ" के राजनीतिक नैरेटिव में बदल जाता है, जो पूरी तरह से स्थापित चुनावी खेल का हिस्सा है।

23/08/2026

ये जो आरक्षण विरोधी अभियान स्वर्णो को मोहरा बनाकर चल रहा है और जो लोग इसको हवा दे रहे ये सब बिपक्ष के मोहरे है ज्यादातर इनका मकसद up से योगीजी को हटाना है

22/08/2026

अब समय आ गया है एक देश एक कानून और हर समाज को एक जैसा दर्जा मिले एससी एसटी आरक्षण और अल्पसंख्यक बहुसंख्यक इस सब को एक धारा में लाया जाए और सब के ऊपर एक कानून लागू हो

तो आखिर तिलचट्टा पार्टी के कुछ उपद्रवियों को जयपुर के किसी गांव में आम ग्रामीणों ने कूट ही दिया। एक आध थप्पड़ की बात नही...
21/08/2026

तो आखिर तिलचट्टा पार्टी के कुछ उपद्रवियों को जयपुर के किसी गांव में आम ग्रामीणों ने कूट ही दिया। एक आध थप्पड़ की बात नहीं है, जबरदस्त कूटा है लोगों ने... दौड़-दौड़ा कर, खदेड़-खदेड़ कर... बेल्टे-बेल्ट मारा है धोती वालों ने... इनके ऊपर गोबर मिट्टी जूता लात लाठी डंडा बेल्ट सबसे सेवा की है और इनकी गाड़ियां भी तोड़ी, पत्थर भी चलाए... और यकीन मानिए, इस देश के किसी भी स्वाभिमानी नागरिक का कलेजा यह देखकर ठंडा ही हुआ होगा!
​ये नव-साक्षर हुड़दंगी चले थे स्कूलों की 'जांच' करने! इनका दावा है कि ये पूरे देश के शिक्षा तंत्र का 'ऑडिट' करेंगे। अरे कोई इन बिन-पैंदे के लोटों से पूछे—किस हैसियत से भाई? संविधान के किस अनुच्छेद या कानून की किस किताब ने तुम्हें यह अधिकार दे दिया कि मुंह उठाकर किसी भी सरकारी विद्यालय या दफ्तर में घुसे चले आओ? जिस स्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी या चपरासी बनने के लिए गरीब का बच्चा रात-रात भर पढ़कर दो-दो परीक्षाएं देता है, वहां तुम रातों-रात सीधे 'प्रधान शिक्षा अधिकारी' के बाप बन बैठे?
​कैमरे के आगे दो-चार नौटंकी करके और सोशल मीडिया पर चंद भाड़े के फॉलोअर्स बटोरकर क्या तुम्हें लगता है कि तुम पूरे देश के व्यवस्थापक हो गए? इस जाहिलियत भरे तर्क से तो कल को कोई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर या सनी लियोनी भी उठकर देश के किसी भी सरकारी दफ्तर में बैठकर अफसरों की क्लास लेने लगेगी!
​चालीस-पचास लफंगों का झुंड बनाकर किसी स्कूल के भीतर घुस जाना, वहां अपनी जिंदगी खपा रहे सम्मानित शिक्षकों को कैमरे के आगे हड़काना, उन्हें जलील करते हुए धांस जमाना और फिर उस गुंडागर्दी की 'रील' बनाकर व्यूज बटोरना... क्या इससे देश की शिक्षा व्यवस्था सुधरती है? नहीं! यह बात देश का बच्चा-बच्चा जानता है कि इससे शिक्षा का एक तिनका नहीं सुधरता, इससे केवल इन राजनीतिक परजीवियों की गंदी राजनीति चमकती है और इनकी रील का धंधा चलता है।
​शिक्षकों की इस यात्रा का दर्द क्या समझोगे तुम? अपने राज्य की बात करूं तो एक शिक्षक बनने के लिए अभ्यर्थियों को अपनी जवानी के कई साल घिसने पड़ते हैं। पहले दो साल का B.Ed/D.El.Ed करो, फिर दिन-रात एक करके TET निकालो, उसके बाद BPSC जैसी कठिन परीक्षा के दो-दो चरण पार करो... तब जाकर एक सम्मानित नौकरी मिलती है। बाकी राज्यों का भी यही कठिन नियम है। और इन तमाम अग्निपरीक्षाओं को पास करके आए शिक्षक के सामने जब कल का कोई सड़कछाप उचक्का आकर कहे कि "चल बे, आज मैं तेरा टेस्ट लूंगा," तो उसका वही इलाज होना चाहिए जो राजस्थान के स्वाभिमानी ग्रामीणों ने बेल्टों से किया है! जो गधे अपनी पूरी जिंदगी में एक चपरासी की परीक्षा पास करने की औकात नहीं रखते, वे अब देश के योग्य शिक्षकों की योग्यता का सर्टिफिकेट बांटेंगे?
​व्यवस्था सुधारने का ढोंग रचने वाले ये धूर्त कभी किसी ज़िला शिक्षा अधिकारी, सचिव या मंत्री के दफ्तर के बाहर चिल्लाते देखे हैं? अगर किसी स्कूल की छत टपक रही है, वहां शौचालय नहीं है या शिक्षकों की भारी कमी है—तो इसके लिए वो शिक्षक दोषी है जो 40 बच्चों को संभाल रहा है, या वो सिस्टम चलाने वाला आला अफसर? लेकिन ये हुड़दंगी कभी किसी बड़े साहब के कमरे में नहीं घुसेंगे, क्योंकि वहां से दुम दबाकर भागना पड़ेगा और वायरल होने लायक रील नहीं बन पाएगी! अंततः इनकी पूरी औकात और नीयत सिर्फ और सिर्फ व्यूज और रील तक ही सीमित है।
​जो कुंठित लोग यह नैरेटिव गढ़ रहे हैं कि आधा दर्जन कठिनतम परीक्षाएं पास करके आए हमारे शिक्षक अयोग्य हैं, उनसे बस इतना पूछो—तुम्हारी खुद की योग्यता क्या है? किस तराजू में तोल रहे हो तुम देश के अध्यापकों को?
​अगर तुम्हारे भीतर समाज सेवा का इतना ही उफान मार रहा है, तो जाओ, पहले किसी संवैधानिक संस्था से चुनाव लड़कर आओ। जीत हासिल करो, नीतियां बनाओ और व्यवस्था बदलो। लोकतंत्र में सुधार का यही एकमात्र संवैधानिक रास्ता है। लेकिन अगर सुधार के नाम पर गुंडागर्दी और हुड़दंगई करने सड़क पर उतरोगे, तो याद रखना... इस देश की जनता तुम्हें तुम्हारी ही भाषा में, और वो भी बेल्ट की नोक पर, जवाब देना बहुत अच्छे से जानती है!

आज सीजेपी के गुंडों के साथ जयपुर में वही हुआ जो बहुत पहले हो जाना चाहिए था। आज ग्रामीणों द्वारा कॉकरोचों पर जो हिट डाला ...
21/08/2026

आज सीजेपी के गुंडों के साथ जयपुर में वही हुआ जो बहुत पहले हो जाना चाहिए था। आज ग्रामीणों द्वारा कॉकरोचों पर जो हिट डाला गया वो काबिले तारीफ है! पूरी इस घटना के पीछे इनका एक घटिया ऐलान है कि हम अलग-अलग सरकारी स्कूलों में जाएंगे, अलग-अलग राज्यों में या जहां मन चाहेगा वहां घुसेंगे और वहां स्कूलों का निरीक्षण करके जवाब-सवाल करेंगे। क्यों भाई, तुम होते कौन हो? क्या शिक्षा विभाग तुम्हारे लिए दरी बिछाएगा? स्कूलों का ठेका ले रखा है तुमने? इनके इस गुंडागर्दी वाले नौटंकी अभियान को देखते हुए देश की तमाम राज्य सरकारों ने साफ प्रतिबंध लगा दिया कि स्कूल में कोई भी बाहरी उपद्रवी तत्व बिना प्रशासन और हेड की परमिशन के दाखिल न हो, न मुआयना करे, न फोटोग्राफी-वीडियोग्राफी की ड्रामेबाजी करे। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी के स्वयंभू प्रवक्ता आशुतोष राका आज अपनी गुंडों की पलटन लेकर जयपुर शहर के ग्रामीण इलाके के एक सरकारी स्कूल में जबरन घुस गए। लेकिन यहाँ के ग्रामीणों ने इनका दिल्ली वाला फर्जी आंदोलन पहले ही देख रखा था, इसलिए जयपुर के ग्रामीण लाठी में तेल लगाकर पूरी तरह तैयार बैठे थे। जैसे ही ये लोग गाँव में घुसे, ग्रामीणों ने तुरंत घेर लिया और साफ कह दिया कि यहाँ नौटंकी और उत्तेजना पैदा करने की इजाजत बिल्कुल नहीं है। हमारा गाँव है, हमारे स्कूल हैं, हमारे बच्चे हैं, हम व्यवस्था खुद दुरुस्त कर लेंगे, तुम यहाँ से दफा हो जाओ! असलियत यह थी कि जर्जर बिल्डिंग से बच्चों को सुरक्षित हटाकर पास में अस्थाई तौर पर पढ़ाया जा रहा था और राजस्थान सरकार ने नई बिल्डिंग के लिए बजट आवंटित करके काम शुरू करा दिया था। लेकिन इन्हें तो बस अपनी गुंडागर्दी और नौटंकी चमकानी थी, फिर ग्रामीणों के साथ वही कुटाई का दौर शुरू हुआ—डंडा, लाठी, जूता, गोबर, धूल-मिट्टी सब चला और ऐसा हाहाकार मचा कि राका एंड कंपनी की हेकड़ी निकल गई। सुनने में तो यहाँ तक आया है कि राका को दो-तीन करारे कंटाप भी जड़ दिए गए, बाकी सच्चाई पुलिस जाने, लेकिन ग्रामीणों ने कूट-काटकर इन्हें भगा दिया और खुद धरने पर बैठ गए कि हमारे बच्चों के स्कूल में यह तमाशा नहीं चलेगा। अब कॉकरोच और उनके भाड़े के ठेकेदार छाती कूट-कूटकर रो रहे हैं, दीपके कह रहा है कि पूरे देश में आंदोलन करेंगे, वरना हमें हर स्कूल में घुसने, हर रजिस्टर छीनकर जांचने की खुली छूट मिले, मानो गेट पर जाके कहें 'हम कॉकरोच हैं' और प्रिंसिपल नतमस्तक होकर सारे कागज इनके चरणों में रख दे! राका भी 48 घंटे की गीदड़ भभकी दे आया है कि पत्थर चलाने वालों को गिरफ्तार करो वरना अंजाम बुरा होगा, अरे भाई जब तुम खुद ही सांप की पूंछ पर पैर रखने गए थे तो कुटाई के सिवा क्या मिलता? अब यह मामला स्कूल का बचा ही नहीं, इसे राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के इस्तीफे तक खींचने का वही पुराना दिल्ली वाला घटिया टूलकिट प्लान है। सबसे मजेदार बात यह है कि जिन ग्रामीणों से इनकी मुठभेड़ हुई, उनके पास न कोई झंडा था न किसी पार्टी का नारा, लेकिन राका ने कूटते-पिटते ही अपनी 'दिव्य दृष्टि' से पहचान लिया कि वो 'भाजपा के गुंडे' थे! जयपुर का यह थप्पड़ सिर्फ जयपुर तक सीमित नहीं रहेगा, देश के तमाम राज्यों में इस कॉकरोच पार्टी का यही हश्र होने वाला है, लिख कर रख लीजिए। कभी सोचा है कि इन्होंने गैर-भाजपा या गैर-एनडीए शासित राज्यों में जाकर कभी ऐसा छाती-कूट डांस क्यों नहीं किया? झारखंड या अन्य राज्यों में इनकी दरी बिछाने की हिम्मत क्यों नहीं हुई? क्या सिर्फ भाजपा शासित राज्य ही इनके निशाने पर हैं? जाहिर है कि यह सब किसी आका के इशारे पर हो रहा है, जिसे कोई मूर्ख भी समझ सकता है। जनता अब तुम्हें पूरी तरह उपद्रवी तत्व मान चुकी है और अगर ऐसे ही कहीं भी जबरन घुसकर तांडव करोगे तो जनता ऐसे ही कूटकर सबक सिखाएगी। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि तुम न तो जिला विद्यालय निरीक्षक हो, न बेसिक शिक्षा अधिकारी, फिर तुम किस हैसियत से रजिस्टर हाथ में लेकर चेकिंग करने पहुँच जाते हो? प्रशासनिक काम सरकारी विभागों का है, अगर उसमें भी अपनी गुंडागर्दी घुसाओगे तो जनता को कानून हाथ में लेते देर नहीं लगेगी, इसलिए अभी भी वक्त है अपनी हरकतों से बाज आ जाओ और सुधर जाओ! जय श्री राम ❤️❤️🙏🙏🚩🚩🇮🇳🇮🇳🙏जय हिन्द वन्देमातरम भारत माता की जय❤️🙏❤️ 🇮🇳🇮🇳

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