Shri Mahasaraswati Puja Samiti, Grain Market, Ganesh Ganj, Lucknow.

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Shri Mahasaraswati Puja Samiti, Grain Market, Ganesh Ganj, Lucknow. We are registered religious organisation � under Society Registration Act Government of india.

समस्त वेदों की अंतिम आज्ञा है एकमात्र परमेश्वर शिव का ही ध्यान करना चाहिये 🔱शिखाऽप्याथर्वणी साध्वी सर्ववेदोत्तमोत्तमा ।अ...
24/08/2026

समस्त वेदों की अंतिम आज्ञा है एकमात्र परमेश्वर शिव का ही ध्यान करना चाहिये 🔱

शिखाऽप्याथर्वणी साध्वी सर्ववेदोत्तमोत्तमा ।
अस्मिन्नर्थे समाप्ता सो' श्रुतयश्वापरा अपि ॥ ३१ ॥
यथा साक्षात्परं ब्रह्म प्रतिष्ठा सकलस्य च ।
तथैवाऽऽथर्वणो वेदः प्रतिष्ठैवाखिलश्रुतेः ॥ ३२ ॥
( सूत संहिता)

सारे वेदों में उत्तम निर्दुष्ट अथर्वशिखोपनिषत् भी यही कहकर समाप्त हुई है 'कल्याणकारी शिव ही अकेले ध्येय हैं । बाकी सब छोड़कर उन्हीं का ध्यान करना चाहिये ।' (अथर्वशिखा को सर्वोत्तम कहने का अभिप्राय है कि वेदों में आखिरी माना जाता है अथर्व, उसमें भी मन्त्र और ब्राह्मण के अनन्तर आती है उपनिषत्, एवं च सारे वेदों की अंतिम आज्ञा है 'सब अन्य व्यापार छोड़ एक शिव का ध्यान करो', अंत में दी आज्ञा सबसे महत्त्वपूर्ण होती है यह लोकसिद्ध है ही अतः उक्त शिखा सबसे अधिक महत्तावाली निश्चित है ।) ॥ ३१ ॥ जैसे निखिल जगत् का आश्रय परब्रह्म है ऐसे सारी श्रुति की आश्रयभूत है आथर्वणश्रुति है॥३२॥

सर्वमिदं ब्रह्मविष्णुरुद्रेन्द्रास्ते सम्प्रसूयन्ते सर्वाणि चेन्द्रियाणि सह भूतैर्न कारणं कारणानां ध्याता कारणं तु ध्येयः सर्वैश्वर्यसम्पन्नः सर्वेश्वरः शंभु- राकाशमध्ये ध्रुवं स्तब्ध्वाऽधिकं क्षणमेकं क्रतुशतस्यापि चतुःसप्तत्या यत्फलं तदवाप्नोति कृत्स्नमोंकारगतिश्च सर्वध्यानयोगज्ञानानां यत् फलमोंकारो वेद पर ईशो वा शिव एको ध्येयः शिवंकरः सर्वमन्यत् परित्यज्य ॥4॥
( अथर्वशिखोपनिषत्)

जिससे यह सारा जगत् और ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र जन्म लेते हैं, वह सबका कारणरूप ईश्वर नाम का ब्रह्म ही है | उसके अतिरिक्त ये सभी इन्द्रियाँ और पंचमहाभूत कोई कारण नहीं है। इसलिएध्याता (परमेश्वर) ही सर्वध्येयरूप होकर सबका कारण बनता है । वह सर्वैश्वर्य से युक्त है, वह सर्वेश्वर है, वही शंभु है । ऐसे शाश्वत आत्मा को जो कोई भी पुरुष अपने हृदयाकाश में एक क्षण या क्षणार्ध भी स्थिर होकर ध्यान करे, तो उसको उसी स्वरूप की प्राप्तिरूप फल ही तो है, पर अन्तराल फल में एक सौ चौहत्तर यज्ञानुष्ठान के फलों की भी प्राप्ति होती है । ओंकार की पूर्ण गति को भी वह जान लेता है । इस प्रकार जो ओंकार को जानता है वह मुनि सभी ध्यान, योग और ज्ञान का जो फल होता है, उसे प्राप्त करता है। इसलिए और सभी वस्तुओं को छोड़कर एकमात्र शिव (ईश) का ही ध्यान करना चाहिए। वही कल्याणकारी है ।

आप सभी को भारतीय स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक मंगल कामनाए एवं शुभकामनायें. इस शुभ अवसर पर हमारे समस्त वीर शहीद योद्धाओ को ...
15/08/2026

आप सभी को भारतीय स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक मंगल कामनाए एवं शुभकामनायें. इस शुभ अवसर पर हमारे समस्त वीर शहीद योद्धाओ को उनके अप्रतिम शौर्य के लिए वंदन.

श्री हनुमान प्रसाद जी पोद्दार जिन्हें प्रायः गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित मासिक पत्र कल्याण के आदि संपादक के रूप में ज...
11/08/2026

श्री हनुमान प्रसाद जी पोद्दार जिन्हें प्रायः गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित मासिक पत्र कल्याण के आदि संपादक के रूप में जाना जाता है, वे वस्तुतः एक दिव्य विभूति थे। अपनी जन्मभूमि रतनगढ, राजस्थान से निकलकर उन्होंने व्यापार किया। अपार हानि सही। सट्टा भी खेला। किंतु साधक भी उच्च कोटि के थे। पोद्दार जी को स्नेहवश सभी "भाईजी" कहकर प्रायः संबोधित करते थे ।
एक दिन पूजन के समय समाधिस्थ अवस्था मैं उन्हें लगा कि जैसे स्वयं श्री किशोरी जी (श्रीराधारानी) उन्हें संदेश दे रही हों कि–"मुगलकाल के भीषण अत्याचारों–हाहाकारों के मध्य कांपती हुई आस्था को अचलाश्रय प्रदान करने वाले गोस्वामी तुलसीदास जी का श्रीरामचरितमानस केवल आठ आने (पचास पैसे) में जन–जन को प्रदान करो" उन्होंने उसी अवस्था में उत्तर दिया कि "जब आप करा रही हैं तो क्यों नहीं होगा।"
पूजन के पश्चात भोजन करके वे वामकुक्षी (बाईं करवट लेटना) किया करते थे। वो लेटे ही थे कि ध्यानावस्था में फिर एक ध्वनि सुनी कि "अरे, तुम लेट गए। कार्य कैसे संपन्न होगा?" तुरंत उठकर बैठ गए। कागज–पेंसिल लेते ही मन में विचार आया कि मानस के इस प्रथम संस्करण की पचास हजार प्रतिएं प्रकाशित होनी चाहिए।कागज–कंपोजिंग (जो उन दिनों टाइप सेटिंग से हुआ करती थी) छपाई आदि का व्यय लगाने पर यह भी विचार किया की यह घर में छ: आने (37 पैसे) की पड़नी चाहिए। एक आना (6 पैसे) तो विक्रेता भी चाहेगा। और एक आना व्यय के लिए, सब जोड़ घटाकर देखा कि, एक लाख पैंतीस हजार ₹ (उस जमाने के जब सोने का भाव बीस–बाइस ₹ तोला हुआ करता था) का घाटा आता है।
वे हिसाब लगाकर अपनी पत्नी से बोले, "हमारा झोला लगा दो। हमें कलकत्ते जाना है।" झोला क्या धोती–कुर्ता, लंगर–बंडी, संध्या पात्र, और माला, लग गया झोला। गोरखपुर स्टेशन जाकर, टिकिट लेकर रेल में जा बैठे। कलकत्ता जाकर एक पैड़ी पर उतर गए।मारवाड़ी संस्कृति में पेड़ी सेठ–साहूकारों की गद्दी को कहते हैं। उनके पहुंचते ही चारों ओर "भाईजी आओ – पधारो" की ध्वनि ऐसे गूंजने लगी मानो किसी देवपुरुष का ही अवतरण हो गया हो। पेड़ी के स्वामी ने प्रश्न किया, "भाईजी! थे (आप) कदसी पधारे?"
भाईजी ने उत्तर दिया– "गोरखपुर से सीधे चले आ रहे हैं।""तो आप स्नान–पूजनादि कर निवास पर भोजन करने पधारिए।""ठीक है, भोजन तो करेंगे! किंतु दक्षिणा लेकर करेंगे।""तो अब बाणियों ने भी भोजन दक्षिणा लेकर करने की परंपरा आरंभ कर दी क्या?" "हां, ब्राह्मण भोजन करके दक्षिणा ले, और वैश्य दक्षिणा लेकर भोजन करे।" कहते हुए हिसाब का पर्चा जो गोरखपुर में तैयार किया था,वह उनके सामने रख दिया।पर्चा देखकर सेठ बोले "जब रामजी ने कहा है तो वे सब करेंगे। आप उठकर स्नानादि करें।"
भाईजी कुछ ही समय में स्नान–पूजन से निवृत होकर आ गए। सेठ बोले, "चलिए, बग्घी तैयार है।" " ठीक है हम चलते हैं किंतु हम दक्षिणा लेकर ही भोजन करेंगे। थाली लाकर अन्न भगवान का अपमान न करा देना, यही कहना है।" "ठीक है आप उठिए तो सही" भाईजी सेठ के निवास पर आ पहुंचे। देखा कि वहां दो भद्र–पुरुष पहले से बैठे थे। थाली खाली रखी हुई थी।
भाईजी के बैठते ही दोनों सज्जनों ने अपनी–अपनी ओर से मोड़कर दो चैक थाली के पास रख दिए। इतने में ही नीचे से आवाज आई " ब्याईजी सा (समधीजी)" और उत्तर में "आओ–आओ, पधारो–पधारो," कहते ही दो सज्जनों ने प्रवेश किया, थाली के पास अपने अपने चैक रखकर बैठ गए। तभी अंदर से सेठ जी की वृद्धा माता नाभिस्पर्शी घुंघट काढ़े (निकाले) हुए, धीरे धीरे सरकती हुई आईं और उन्होंने पैंतीस हजार रूपये नगद रख दिए। चारों चैक पच्चीस–पच्चीस हज़ार अर्थात् एक लाख के थे। एक लाख पैंतीस हजार कि पूर्ति पर्चे के अनुसार देखकर, भाईजी हंसते हुए बोले, "शीघ्रता से भोजन लाओ, भूख भयंकर लग रही है।"
तभी हंसते हुए सेठ बोले,"भाईजी! थे कच्चे बाणिए हो! अरे, इतना पांच–छ: सौ पृष्ठों का मोटा ग्रंथ बिना जिल्द के दोगे क्या? दो दिन में हाथ में आ जाएगा।" भाईजी को सोच में पड़ा देखकर सेठ जी बोले, "जिस समय आप निवृत होने चले गए थे, उसी समय हमने एक जिल्दसाज को बुलाकर, ब्यौरा ले लिया था। दस–बारह हजार का उसने खर्चा बताया। यह पन्द्रह हज़ार मानकर, एक सेवक को भेजकर डेढ़ लाख का ड्राफ्ट तैयार करा लिया। यह दक्षिणा लीजिए और बाणिया श्रेष्ठ कांसा आरोगिए (भोजन कीजिए)। भोजन करते ही भाईजी बोले, " अब गोरखपुर जाने वाली गाड़ी का क्या समय है?" "अभी तीन–चार घंटे हैं। आप पैड़ी पर पहुंचकर अपने वामकुक्षी धर्म का निर्वाह कीजिए। आपको गाड़ी पर पहुंचा दिया जाएगा।"
श्रीभाईजी अगले दिन गोरखपुर पहुंच गए। श्रीरामचरितमानस की कंपोजिंग युद्धस्तर पर होने लगी। डेढ़ मास के अंदर–अंदर मानस की प्रतियां बाजार में आकर, घर–घर पहुंचने लगी। मानस के सुंदरकांड और अखंड पाठों की बाढ़ आ गई। प्रवचनकर्ताओं की पौध देश के धार्मिक क्षेत्र में हरितिमा का संचार करने लगी। मानस के पश्चात समग्र तुलसी–सूर के साथ अनेकानेक संतो का साहित्य मुद्रित होने लगा।
आठ आने के चमत्कार से देश का वातावरण चमत्कृत हो उठा। अपने कार्य की पूर्ति के लिए श्रीसीताराम जी ने जिन्हें निमित्त के रूप में निर्वाचित कि मनोनित किया वे श्रीभाईजी हनुमान प्रसाद जी पोद्दार विश्वभर के श्रीराम – भक्तों के लिए स्मरणीय बन गए।

साभार

06/08/2026

॥🔺श्री दुर्गा आपदुद्धाराष्टकम्🔺॥
नमस्ते शरण्ये शिवे सानुकम्पे, नमस्ते जगद्व्यापिके विश्वरूपे।
नमस्ते जगद्वन्द्य पादारविन्दे, नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥ १ ॥
नमस्ते जगच्चिन्त्यमान स्वरूपे, नमस्ते महायोगि विज्ञान रूपे।
नमस्ते नमस्ते सदानन्द रूपे, नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥ २ ॥
अनाथस्य दीनस्य तृष्णातुरस्य, भयार्तस्य भीतस्य बद्धस्य जन्तोः।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तार कर्त्री, नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥ ३ ॥
अरण्ये रणे दारुणे शत्रुमध्ये, जले संकटे राजगेहे प्रवाते।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तार हेतुर्नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥ ४ ॥
अपारे महादुस्तरेऽत्यन्तघोरे, विपत्सागरे मज्जतां देहभाजाम्।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तार नौका, नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥ ५ ॥
नमश्चण्डिके चण्डदोर्दण्डलीला-समुत्खण्डिता खण्डलाशेषशत्रोः।
त्वमेका गतिर्विघ्न सन्द‍ोह हर्त्री, नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥ ६ ॥
त्वमेका सदाराधिता सत्यवादिन्यनेकाखिला क्रोधना क्रोधनिष्ठा।
इड़ा पिङ्गला त्वं सुषुम्णा च नाड़ी, नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥ ७ ॥
नमो देवि दुर्गे शिवे भीमनादे, सदा सर्व सिद्धि प्रदातृ स्वरूपे।
विभूतिः सतां कालरात्रिः स्वरूपे, नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥ ८ ॥
फलश्रुति (स्तोत्र पाठ का महत्व)
इदं स्तोत्रं मया ख्यातमापदुद्धारमष्टकम्। त्रिसन्ध्यमेकं सन्ध्यं वा पठनादेव संकटात् ॥ १ ॥
मुच्यते नात्र संदेहो भुवि स्वर्गे रसातले। सिद्धेश्वरतन्त्रे हरगौरी संवादे आपदुद्धाराष्टकं स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
स्तोत्र का हिंदी अनुवाद (तस्वीर के अनुसार)
१. हे शिवे! भक्तों को शरण देने वाली तेरे लिये नमस्कार है। हे दया करने वाली सम्पूर्ण जगत् में व्यापक विश्व रूपे तेरे लिये नमस्कार है। संसार से तेरे चरण कमल वन्दित हैं तेरे लिये नमस्कार है। संसार के आवागमन से छुटाने वाली दुर्गे देवि रक्षा कर तेरे लिये नमस्कार है।
२. चिन्त्यमान स्वरूप जगत के चराचर में व्याप्त तुझे नमस्कार है, हे महायोग विज्ञान (ब्रह्मज्ञान) स्वरूप तेरे लिये नमस्कार है। हे सत्य आनन्द स्वरूप तेरे लिये नमस्कार है। हे संसार के आवागमन को छुटाने वाली तेरे लिये नमस्कार है। दुर्गे रक्षा कर।
३. अनाथ, दीन, तृष्णा में भ्रमण करने वाला, भय से दुखी, डरा हुआ, बन्धन में पड़े हुए जीव को पार करने के लिये हे देवि तू एक ही है। जगत के आवागमन को छुटाने वाली दुर्गे रक्षा कर।
४. निर्जन वन में दारुण युद्ध, शत्रुओं के मध्य, जल में, संकट में, राजद्वार में, अंधकार आदि स्थानों में, सहायता करने वाली कारण स्वरूप एक तू ही गति है तेरे लिये नमस्कार है, हे संसार के आवागमन को छुटाने वाली दुर्गे! रक्षा कर।
५. जो पार न हो सके बड़ा दुस्तर घोर विपत्तियों के समुद्र में डूबे हुए मनुष्यों को तू एक ही नौका रूप पार करने की गति है तेरे लिये नमस्कार, हे संसार के आवागमन को छुड़ाने वाली दुर्गे रक्षा कर।
६. हे चंडिके! तेरे लिये नमस्कार! चंड आदि भयंकर जो राक्षस हैं और इन्द्र के अशेष शत्रुओं को नाश करने वाली तू एक ही गति समस्त विघ्नों को हरने वाली तेरे लिये नमस्कार है। हे दुर्गे! संसार के आवागमन को छुटाने वाली रक्षा कर।
७. तू एक ही हमेशा सेवा कराने वाली सत्यवादिनी और क्रोध करने वालों में एक ही क्रोध की निष्ठा है। इड़ा (सूर्य स्वर), पिंगला (चन्द्र स्वर), सुषुम्ना (दोनों मिले स्वर) नाड़ी रूप तू ही है तेरे लिये नमस्कार, हे संसार के आवागमन को छुटाने वाली दुर्गे! रक्षा कर।
८. हे देवि! हे दुर्गे! हे शिवे! हे भीमनादे! (भयंकर शब्द वाली) नित्य प्रति सब सिद्धि प्रदान करने वाली सज्जनों की विभूति कालरात्रि स्वरूप तेरे लिये नमस्कार है। हे संसार के आवागमन को छुटाने वाली दुर्गे! रक्षा कर।
फलश्रुति: यह आपदुद्धाराष्टक स्तोत्र मैंने कहा। जो कोई तीनों समय या एक बार पाठ करेगा वह संकट से छूट जायगा स्वर्ग पाताल वा मृत्युलोक कहीं होय!!
भज दुर्गे 🔺🌹

 #शिव_को_जाने_साजिशो से बचे।वामपंथीयो की साजिश मे फँसकर, हिन्दू अपने स्वधर्म का ही अपमान करते रह्ते है, कभी दिन मे 5 मिन...
26/07/2026

#शिव_को_जाने_साजिशो से बचे।

वामपंथीयो की साजिश मे फँसकर, हिन्दू अपने स्वधर्म का ही अपमान करते रह्ते है, कभी दिन मे 5 मिनट भी धर्मशास्त्र पढते नही है, इसलिए पथ विचलित करने वालो के लिए आसानी होती है, सत्य को जाने....

कुछ मूढ़ लोग भगवान शिव का चिलम पीते हुए फोटो अपलोड करके ॐ नमः शिवाय लिख रहे हैं, वे जल्द से जल्द इस तरह की फोटो अपलोड करना बंद कर दे....

एक पैसे की अकल नहीं है, महादेव कभी चिल्लम या भांग नहीं लेते थे .... कुछ लोगो के द्वारा बनाये हुए मनगढंत फोटो को मानना बंद करो ..

कुछ समय निकालकर वेद, उपनिषद् पढ़ा होता तो बुद्धि आती ....और इन सब चीज़ो के लिए भी क्या पूरा वेद पढ़ना आवश्यक है.......ये जरूर है की उनको प्रसाद के रूप में भांग, धतूरा, दूध, घी, शहद, चीनी चढ़ाई जाती है ...उसके पीछे का कारण भी जान लो.....विश्व का हलाहल विष उन्होंने पीया था, समस्त जगत पटल की रक्षा हेतु.... इसलिए भांग चढ़ाकर हम अपने अंदर के नशे (इंटोक्सिकेशन) जैसे माया, कुसंगति, गलत आचरण आदि को ) उन्हें चढ़ाकर ये कहते है, हे प्रभु जिस तरह आपने हलाहल पीया था मानव कल्याण की रक्षा हेतु वैसे ही हमारे अंदर की इन सारी बुराइयों को समाप्त करो ..
धतूरा चढ़ाकर कहते हैं, हे प्रभु आप तो विषधारी हैं, मेरे अंदर के द्वेष जलन, घृणा रुपी ज़हर को आत्मसात कर लो...
दूध चढ़ाकर उनसे अपने ह्रदय और अंतरात्मा को दूध की तरह ही स्वेतचरित्र और शुद्ध करने की कामना करते हैं ....
घी शहद और चीनी भी धनधान्य, शुद्धता और मिठास के लिए कामना करते है.....

इसलिए कुछ पोस्ट करने से पहले सावधानी बरते, सही गलत का चुनाव करे .....
हर सनातनी की जागरुकता जरूरी है,
🙏🙏हर हर महादेव🙏🙏

कृष्ण और सुदामा का प्रेम बहुत गहरा था। प्रेम भी इतना कि कृष्ण, सुदामा को रात दिन अपने साथ ही रखते थे। कोई भी काम होता, द...
22/07/2026

कृष्ण और सुदामा का प्रेम बहुत गहरा था। प्रेम भी इतना कि कृष्ण, सुदामा को रात दिन अपने साथ ही रखते थे।
कोई भी काम होता, दोनों साथ-साथ ही करते।

एक दिन दोनों वनसंचार के लिए गए और रास्ता भटक
गए। भूखे-प्यासे एक पेड़ के नीचे पहुंचे। पेड़ पर एक
ही फल लगा था।

कृष्ण ने घोड़े पर चढ़कर फल को अपने हाथ से तोड़ा। कृष्ण ने फल के छह टुकड़े
किए और अपनी आदत के मुताबिक पहला टुकड़ा सुदामा को दिया।
सुदामा ने टुकड़ा खाया और बोला,
'बहुत स्वादिष्ट! ऎसा फल कभी नहीं खाया। एक
टुकड़ा और दे दें। दूसरा टुकड़ा भी सुदामा को मिल
गया।

सुदामा ने एक टुकड़ा और कृष्ण से मांग
लिया। इसी तरह सुदामा ने पांच टुकड़े मांग कर खा
लिए।

जब सुदामा ने आखिरी टुकड़ा मांगा, तो कृष्ण ने
कहा, 'यह सीमा से बाहर है। आखिर मैं भी तो भूखा
हूं।

मेरा तुम पर प्रेम है, पर तुम मुझसे प्रेम नहीं
करते।' और कृष्ण ने फल का टुकड़ा मुंह में रख
लिया।

मुंह में रखते ही कृष्ण ने उसे थूक दिया, क्योंकि वह
कड़वा था।
कृष्ण बोले,
'तुम पागल तो नहीं, इतना कड़वा फल कैसे खा गए?

'
उस सुदामा का उत्तर था,
'जिन हाथों से बहुत मीठे फल खाने को मिले, एक
कड़वे फल की शिकायत कैसे करूं?

सब टुकड़े इसलिए
लेता गया ताकि आपको पता न चले।

जँहा मित्रता हो वँहा संदेह न हो, आओ
कुछ ऐसे रिश्ते रचे...

कुछ हमसे सीखें , कुछ हमे
सिखाएं।

किस्मत की एक आदत है कि
वो पलटती जरुर है

और जब पलटती है,

तब सब कुछ पलटकर रख देती है।


इसलिये अच्छे दिनों मे अहंकार
न करो और

खराब समय में थोड़ा सब्र करो. 🌺🌺🌻🌻🌸🌸🌼🌼

भगवान जगत के नाथ श्री जगन्नाथजी, देवि सुभद्रा, एवं बलभद्र जी के नगर भ्रमण जगन्नाथ रथ यात्रा के शुभ अवसर पर आइये हम सभी उ...
16/07/2026

भगवान जगत के नाथ श्री जगन्नाथजी, देवि सुभद्रा, एवं बलभद्र जी के नगर भ्रमण जगन्नाथ रथ यात्रा के शुभ अवसर पर आइये हम सभी उनका शत शत अभिनंदन एवं वंदन करें.

स्तोत्र का पाठ:कृपा पारावारः सजल जलद श्रेणिरुचिरोरमा वाणी रामः स्फुरद् अमल पङ्केरुहमुखः।सुरेन्द्रैर् आराध्यः श्रुतिगण शिखा गीत चरितोजगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे॥

सरल अर्थ:कृपा पारावारः...: आप कृपा के सागर हैं। आप सुंदर और जल से भरे काले बादल जैसे हैं।रमा वाणी...: माता लक्ष्मी और सरस्वती सदा आपके साथ हैं। आपका मुख खिले हुए कमल जैसा है।सुरेन्द्रैर्...: देवराज इंद्र भी आपकी पूजा करते हैं। वेद और पुराण आपकी गाथा गाते हैं।नयन पथ गामी...: हे जगन्नाथ स्वामी! आप मेरी आँखों के रास्ते होकर मेरे मन (हृदय) में वास करें।यह स्तोत्र भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण (जगन्नाथ) की स्तुति है。इसे गाने से मन को बहुत शांति मिलती है。यह स्तोत्र आपके सभी कष्टों को दूर करता है。💐🙏

सालबेग का जन्म १७वीं शताब्दी में एक मुस्लिम सेनापति के घर हुआ था। उसकी मां एक हिंदू ब्राह्मण महिला थी। एक बार युद्ध के म...
11/07/2026

सालबेग का जन्म १७वीं शताब्दी में एक मुस्लिम सेनापति के घर हुआ था। उसकी मां एक हिंदू ब्राह्मण महिला थी। एक बार युद्ध के मैदान में सालबेग को एक बहुत ही भयानक और लालाज बीमारी लग गई। उसका पूरा शरीर गलने लगा। हकीमों और डॉक्टरों ने कह दिया कि यह लड़का अब कुछ ही दिनों का मेहमान है।
सालबेग बिस्तर पर पड़ा तड़प रहा था। तब उसकी माँ ने रोते हुए उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, "बेटा, दुनिया के सारे हकीम हार गए, अब तू केवल मेरे शामलिया (कृष्ण/जगन्नाथ) को पुकार। वही तुझे ठीक कर सकता है।"
सालबेग ने आँखें बंद कीं और साक्षात जगन्नाथ जी का ध्यान करने लगा। चमत्कार हुआ! कुछ ही दिनों में उसका शरीर बिल्कुल स्वस्थ हो गया। सालबेग रो पड़ा। उसने अपनी पूरी जिंदगी जगन्नाथ जी के चरणों में सौंप दी।

वह दौड़कर पुरी के जगन्नाथ मंदिर पहुँचा। लेकिन उस दौर की सामाजिक व्यवस्था के कारण, मुस्लिम कुल में पैदा होने की वजह से उसे मंदिर के भीतर जाने की अनुमति नहीं मिली। उसे अछूत कहकर धक्का दे दिया गया।
सालबेग मंदिर के सिंहद्वार के बाहर बैठकर फुट-फुटकर रोने लगा। उसने प्रभु से कहा—"प्रभु! मैं जानता हूँ कि मेरा शरीर और मेरा कुल अपवित्र है, इसलिए मैं आपकी चौखट पार नहीं करूँगा। लेकिन मैं आपके दर्शन के बिना जी भी नहीं पाऊंगा।"
पुजारियों ने उसे समझाया कि सालबेग, साल में एक बार महाप्रभु खुद मंदिर से बाहर निकलकर रथ पर सवार होते हैं, तब तुम दर्शन कर लेना।

एक बार रथयात्रा के ठीक कुछ दिन पहले, सालबेग किसी काम से पुरी से बहुत दूर 'वृंदावन' गया हुआ था। वहाँ अचानक वह बहुत बुरी तरह बीमार हो गया। उसका शरीर इतना कमजोर हो गया कि वह उठ भी नहीं पा रहा था।
उधर पुरी में रथयात्रा शुरू होने वाली थी। सालबेग वृंदावन में ज़मीन पर पड़ा-पड़ा तड़प रहा था। उसकी आँखों से आंसुओं के समंदर बह रहे थे। उसने पुरी की दिशा में हाथ जोड़कर रोते हुए पुकारा:
हे जगन्नाथ! हे मेरे प्रभु! मैं बहुत अभागा हूँ। मैं पैदल चलकर पुरी नहीं पहुँच सकता। मेरा यह शरीर यहीं दम तोड़ देगा। पर मेरी एक आखिरी साध है नाथ... जब तक आपका यह सालबेग पुरी की मुख्य सड़क पर आपके दर्शन के लिए पहुँच न जाए, तब तक आप मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) मत जाना। अपनी इस दासी के बेटे के लिए ज़रा रुक जाना प्रभु!

पुरी में रथयात्रा का दिन आया। बड़े-बड़े रस्सों से खींचकर महाप्रभु जगन्नाथ, सुभद्रा जी और बलभद्र जी के रथ आगे बढ़ने लगे। ढोल-नगाड़े बज रहे थे। लेकिन जैसे ही जगन्नाथ जी का रथ पुरी की मुख्य सड़क पर 'बड़ा डांड' (सालबेग की कुटिया के पास) पहुँचा, अचानक रथ रुक गया।
लगाम खींचने वाले हैरान थे। हज़ारों भक्तों ने पूरी ताकत लगा दी, राजा के बड़े-बड़े हाथियों को बुलाया गया, घोड़ों को लगाया गया, लेकिन महाप्रभु का वह लकड़ी का रथ अपनी जगह से एक इंच भी आगे नहीं हिला। ऐसा लगा जैसे रथ ज़मीन के भीतर धंस गया हो। पुरी के राजा और बड़े-बड़े पंडित चिंता में पड़ गए कि प्रभु क्यों रूठ गए?
तभी मुख्य पुजारी को साक्षात जगन्नाथ जी ने स्वप्न जैसी प्रेरणा दी—तुम लोग व्यर्थ में जोर लगा रहे हो। मेरा एक परम भक्त वृंदावन से घिसटते हुए मेरे दर्शन के लिए आ रहा है। जब तक वह नहीं आएगा, मेरा रथ यहाँ से एक कदम आगे नहीं बढ़ेगा।

कई घंटे बीत गए। पूरी नगरी शांत होकर उस भक्त का इंतजार कर रही थी। तभी दूर से धूल में सना हुआ, फटे कपड़ों में, रोता-बिलखता हुआ सालबेग घिसटते हुए रथ के सामने पहुँचा।
जैसे ही सालबेग ने रथ पर बैठे अपने साक्षात काले कन्हाई (जगन्नाथ) को देखा, वह उनके चरणों की धूल सिर पर लगाकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। उसने चिल्लाकर कहा—"प्रभु! आप सचमुच आ गए? आपने इस अछूत के लिए अपना रथ रोक दिया?"
सालबेग ने जैसे ही रोते हुए प्रभु की आरती उतारी और उन्हें प्रणाम किया, चमत्कार देखिए... भक्तों ने बिना किसी हाथी-घोड़े के जैसे ही रथ के रस्से को छुआ, रथ अपने आप बेहद हल्के फूलों की तरह आगे बढ़ गया।

।।जय श्री कृष्णा।।

चित्र एवं पोस्ट साभार इंटरनेट से 🙏

*“क्यों बीमार पड़ते हैं श्री जगन्नाथ भगवान् ?”*           (भक्त माधव दास जी)          उड़ीसा प्रान्त में जगन्नाथ पूरी में ...
10/07/2026

*“क्यों बीमार पड़ते हैं श्री जगन्नाथ भगवान् ?”*
(भक्त माधव दास जी)

उड़ीसा प्रान्त में जगन्नाथ पूरी में एक भक्त रहते थे, श्री माधव दास जी अकेले रहते थे, कोई संसार से इनका लेना देना नही। अकेले बैठे बैठे भजन किया करते थे, नित्य प्रति श्री जगन्नाथ प्रभु का दर्शन करते थे, और उन्हीं को अपना सखा मानते थे, प्रभु के साथ खेलते थे। प्रभु इनके साथ अनेक लीलाएँ किया करते थे। प्रभु इनको चोरी करना भी सिखाते थे भक्त माधव दास जी अपनी मस्ती में मग्न रहते थे।
एक बार माधव दास जी को अतिसार (उलटी-दस्त) का रोग हो गया। वह इतने दुर्बल हो गए कि उठ-बैठ नहीं सकते थे, पर जब तक इनसे बना ये अपना कार्य स्वयं करते थे और सेवा किसी से लेते भी नही थे। कोई कहे महाराजजी हम कर दें आपकी सेवा तो कहते नही मेरे तो एक जगन्नाथ ही हैं वही मेरी रक्षा करेंगे। ऐसी दशा में जब उनका रोग बढ़ गया वो उठने-बैठने में भी असमर्थ हो गये, तब श्री जगन्नाथजी स्वयं सेवक बनकर इनके घर पहुँचे और माधवदासजी को कहा की हम आपकी सेवा कर दें।
क्योंकि उनका इतना रोग बढ़ गया था कि उन्हें पता भी नही चलता था, कब वे मल मूत्र त्याग देते थे। वस्त्र गंदे हो जाते थे। उन वस्त्रों को जगन्नाथ भगवान अपने हाथों से साफ करते थे, उनके पूरे शरीर को साफ करते थे, उनको स्वच्छ करते थे। कोई अपना भी इतनी सेवा नही कर सकता, जितनी जगन्नाथ भगवान ने भक्त माधव दास जी की करते थे।
जब माधवदासजी को होश आया, तब उन्होंने तुरन्त पहचान लिया की यह तो मेरे प्रभु ही हैं। एक दिन श्री माधवदासजी ने पूछ लिया प्रभु से - “प्रभु ! आप तो त्रिभुवन के मालिक हो, स्वामी हो, आप मेरी सेवा कर रहे हो। आप चाहते तो मेरा ये रोग भी तो दूर कर सकते थे, रोग दूर कर देते तो ये सब करना नही पड़ता।” ठाकुरजी कहते हैं - "देखो माधव ! मुझसे भक्तों का कष्ट नहीं सहा जाता, इसी कारण तुम्हारी सेवा मैंने स्वयं की। जो प्रारब्ध होता है उसे तो भोगना ही पड़ता है। अगर उसको इस जन्म में नहीं काटोगे तो उसको भोगने के लिए फिर तुम्हें अगला जन्म लेना पड़ेगा और मैं नहीं चाहता की मेरे भक्त को जरा से प्रारब्ध के कारण अगला जन्म फिर लेना पड़े। इसीलिए मैंने तुम्हारी सेवा की लेकिन अगर फिर भी तुम कह रहे हो तो भक्त की बात भी नहीं टाल सकता। (भक्तों के सहायक बन उनको प्रारब्ध के दुखों से, कष्टों से सहज ही पार कर देते हैं प्रभु) अब तुम्हारे प्रारब्ध में ये 15 दिन का रोग और बचा है, इसलिए 15 दिन का रोग तू मुझे दे दे।" 15 दिन का वो रोग जगन्नाथ प्रभु ने माधवदासजी से ले लिया।
वो तो हो गयी तब की बात पर भक्त वत्सलता देखो आज भी वर्ष में एक बार जगन्नाथ भगवान को स्नान कराया जाता है (जिसे स्नान यात्रा कहते हैं)। स्नान यात्रा करने के बाद हर साल 15 दिन के लिए जगन्नाथ भगवान आज भी बीमार पड़ते हैं। 15 दिन के लिए मन्दिर बन्द कर दिया जाता है। कभी भी जगन्नाथ भगवान की रसोई बन्द नही होती पर इन 15 दिन के लिए उनकी रसोई बन्द कर दी जाती है। भगवान को 56 भोग नही खिलाया जाता, (बीमार हो तो परहेज तो रखना पड़ेगा)
15 दिन जगन्नाथ भगवान को काढ़ो का भोग लगता है। इस दौरान भगवान को आयुर्वेदिक काढ़े का भोग लगाया जाता है। जगन्नाथ धाम मन्दिर में तो भगवान की बीमारी की जांच करने के लिए हर दिन वैद्य भी आते हैं। काढ़े के अलावा फलों का रस भी दिया जाता है। वहीं रोज शीतल लेप भी लगया जाता है। बीमार के दौरान उन्हें फलों का रस, छेना का भोग लगाया जाता है और रात में सोने से पहले मीठा दूध अर्पित किया जाता है।
भगवान जगन्नाथ बीमार हो गए है और अब 15 दिनों तक आराम करेंगे। आराम के लिए 15 दिन तक मंदिरों पट भी बन्द कर दिए जाते है और उनकी सेवा की जाती है। ताकि वे जल्दी ठीक हो जाएँ। जिस दिन वे पूरी तरह से ठीक होते हैं उस दिन जगन्नाथ यात्रा निकलती है, जिसके दर्शन हेतु असंख्य भक्त उमड़ते हैं।
खुद पे तकलीफ ले कर अपने भक्तों का जीवन सुखमयी बनाये, ऐसे भक्तवत्सलता है प्रभु जगन्नाथ जी की।
० ० ०
॥जय जय श्री जगन्नाथजी॥

सती मां अहिल्या द्वारा आनंदकंद भगवान् श्री राम स्तुति श्री राम चरित मानस परम श्रद्धेय गोस्वामी तुलसीदास रचित.....मिथिला ...
06/07/2026

सती मां अहिल्या द्वारा आनंदकंद भगवान् श्री राम स्तुति श्री राम चरित मानस परम श्रद्धेय गोस्वामी तुलसीदास रचित.....

मिथिला में राजा जनक के धनुष यज्ञ को दिखाने के लिए गुरु विश्वामित्र उन्हें साथ लेकर जा रहे थे तो
'आश्रम एक दीख मग माहीं, खग, मृग, जीव जन्तु तंह नाहीं, पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी, सकल कथा मुनि कहा बिसेषी’।

गुरु विश्वामित्र ने बताया ‘गौतम नारी श्राप बस उपल देह धरि धीर, चरण कमल रज चाहति, कृपा करो रघुबीर’।

श्री राम जी के पवित्र एवं शोक का नाश करने वाले चरणों का स्पर्श पाते ही वह तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हो गई और भक्तों को सुख देने वाले प्रभु को सामने देखकर वह प्रभु चरणों से लिपट गई।

*परसत पद पावन सोकनसावन प्रगट भई तपपुंज सही।
देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही॥
अति प्रेम अधीरा पुलक शरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही।
अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही॥

भावार्थ:-श्री रामजी के पवित्र और शोक को नाश करने वाले चरणों का स्पर्श पाते ही सचमुच वह तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हो गई। भक्तों को सुख देने वाले श्री रघुनाथजी को देखकर वह हाथ जोड़कर सामने खड़ी रह गई। अत्यन्त प्रेम के कारण वह अधीर हो गई। उसका शरीर पुलकित हो उठा, मुख से वचन कहने में नहीं आते थे। वह अत्यन्त बड़भागिनी अहल्या प्रभु के चरणों से लिपट गई और उसके दोनों नेत्रों से जल (प्रेम और आनंद के आँसुओं) की धारा बहने लगी॥

*धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई।
अति निर्मल बानी अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई॥
मैं नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई।
राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई॥

भावार्थ:-फिर उसने मन में धीरज धरकर प्रभु को पहचाना और श्री रघुनाथजी की कृपा से भक्ति प्राप्त की। तब अत्यन्त निर्मल वाणी से उसने (इस प्रकार) स्तुति प्रारंभ की- हे ज्ञान से जानने योग्य श्री रघुनाथजी! आपकी जय हो! मैं (सहज ही) अपवित्र स्त्री हूँ, और हे प्रभो! आप जगत को पवित्र करने वाले, भक्तों को सुख देने वाले और रावण के शत्रु हैं। हे

कमलनयन! हे संसार (जन्म-मृत्यु) के भय से छुड़ाने वाले! मैं आपकी शरण आई हूँ, (मेरी) रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए॥

*मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना।
देखेउँ भरि लोचन हरि भव मोचन इहइ लाभ संकर जाना॥
बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना।
पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना॥

भावार्थ:-मुनि ने जो मुझे शाप दिया, सो बहुत ही अच्छा किया। मैं उसे अत्यन्त अनुग्रह (करके) मानती हूँ कि जिसके कारण मैंने संसार से छुड़ाने वाले श्री हरि (आप) को नेत्र भरकर देखा। इसी (आपके दर्शन) को शंकरजी सबसे बड़ा लाभ समझते हैं। हे प्रभो! मैं बुद्धि की बड़ी भोली हूँ, मेरी एक विनती है। हे नाथ ! मैं और कोई वर नहीं माँगती, केवल यही चाहती हूँ कि मेरा मन रूपी भौंरा आपके चरण-कमल की रज के प्रेमरूपी रस का सदा पान करता रहे॥

*जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी।
सोई पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी॥
एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी।
जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पति लोक अनंद भरी॥

भावार्थ:-जिन चरणों से परमपवित्र देवनदी गंगाजी प्रकट हुईं, जिन्हें शिवजी ने सिर पर धारण किया और जिन चरणकमलों को ब्रह्माजी पूजते हैं, कृपालु हरि (आप) ने उन्हीं को मेरे सिर पर रखा। इस प्रकार (स्तुति करती हुई) बार-बार भगवान के चरणों में गिरकर, जो मन को बहुत ही अच्छा लगा, उस वर को पाकर गौतम की स्त्री अहल्या आनंद में भरी हुई पतिलोक को चली गई॥

*अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल।
तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल॥

भावार्थ:-प्रभु श्री रामचन्द्रजी ऐसे दीनबंधु और बिना ही कारण दया करने वाले हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, हे शठ (मन)! तू कपट-जंजाल छोड़कर उन्हीं का भजन कर॥
!!राम राम सब कोई कहे,ठग ठाकुर और चोर!!
!! जिस राम से मीरा तले,वह राम कोई और!!

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