श्री श्री पीली कोठी के राजा

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16/05/2026

मित्रों आज शनिवार है, शनिमहाराज जी का दिन है। आज हम आपको बतायेगें,दिव्य वृक्ष पीपल की पूजा क्यों और कैसे की जाती है ?

‘अश्वत्थ: पूजितो यत्र पूजिता: सर्वदेवता:’ अर्थात् पीपल वृक्ष की पूजा करने से समस्त देवता पूजित हो जाते हैं; इसीलिए हिन्दू धर्म में पीपल की पूजा अनादि काल से होती आई है ।

पीपल वृक्ष की पूजा क्यों की जाती है ?
पीपल भूलोक का कल्पवृक्ष है । इसकी हम कितनी भी पूजा करें; इसके उपकारों को मानव जाति भुला नहीं सकती है । दिव्य वृक्ष पीपल की पूजा इन कारणों से की जाती है—

प्राचीन काल में दैत्यों से पीड़ित देवता भगवान विष्णु की शरण में गए और उनसे प्रार्थना करते हुए कहा—‘भगवन् ! हम राक्षसों से पीड़ित हैं । हमारे दु:खों की शान्ति किस प्रकार हो सकती है ?’

तब भगवान विष्णु ने कहा—‘मैं अश्वत्थ वृक्ष के रूप में भूतल पर विद्यमान हूँ । तुम लोग अश्वत्थ वृक्ष की सेवा-पूजा करो ।’

▪️माना जाता है कि पीपल के मूल में भगवान विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में श्रीहरि और फलों में सब देवताओं के साथ भगवान अच्युत सदा निवास करते हैं; इसलिए पीपल वृक्ष की पूजा की जाती है ।

▪️पीपल वृक्ष को ‘अश्वत्थ’ भी कहते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता ( १०।२६) में भगवान श्रीकृष्ण पीपल वृक्ष को अपनी विभूति बताते हुए कहते हैं—‘अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम्’ अर्थात् ‘मैं वृक्षों में पीपल हूँ ।’ भगवान श्रीकृष्ण का विभूतिस्वरूप होने के कारण पीपल दिव्य वृक्ष है; इसलिए इसकी पूजा की जाती है । श्रीकृष्ण की तरह यह संसार को कर्मयोग की शिक्षा देता है । पीपल के पत्ते तब भी हिलते रहते हैं, जब अन्य पेड़ों के पत्ते नहीं हिलते हैं । इसी कारण पीपल को ‘चल-पत्र’ भी कहते हैं । प्रकृति में एकमात्र यही वृक्ष है जो बराबर प्राणवायु ‘ऑक्सीजन’ छोड़ता रहता है; इसलिए यह पर्यावरण को निरन्तर शुद्ध करता रहता है ।

▪️द्वापरयुग में परमधाम गमन से पूर्व भगवान श्रीकृष्ण इस पवित्र अश्वत्थ वृक्ष के नीचे बैठ कर ध्यानावस्थित हुए थे; इसलिए मृत आत्मा की शान्ति के लिए पीपल वृक्ष के मूल में जल चढ़ाते हैं ।

▪️पीपल के मूल (जड़) की सेवा (सीचने) से मनुष्य के पापों का नाश व सभी कामनाओं की पूर्ति होती है । वैशाख मास में पीपल वृक्ष को सींचने का महान फल बतलाया गया है । पीपल वृक्ष के नित्य दर्शन करने व प्रणाम करने से मनुष्य की धन-सम्पत्ति बढ़ती है और दीर्घायुष्य की प्राप्ति होती है ।

▪️प्रत्येक मनुष्य की जन्मकुण्डली में कोई-न-कोई दोष अवश्य होता है । पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ पीपल की पूजा करने से कुण्डली के दोष—ग्रह पीड़ा, पितृदोष, कालसर्पयोग, विष योग आदि दूर हो जाते हैं ।

▪️पीपल की सेवा प्रत्येक शनिवार करने से शनि देव प्रसन्न होते हैं । शनि की साढ़ेसाती और ढैया के प्रभाव से बचने के लिए हर शनिवार को व शनिश्चरी अमावस्या को पीपल वृक्ष की पूजा और 7 परिक्रमा करके काले तिल से युक्त सरसों के तेल के दीपक को जला कर छाया-दान करने से शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है ।

▪️पीपल से निरन्तर ऑक्सीजन का निकलना तथा पत्तों की मधुर आवाज एकाग्रचित्तता में सहायक होती है जो कि साधना की आवश्यक शर्त है । पीपल वृक्ष के आस-पास ही ऋषि-मुनि, ज्ञानी-ध्यानी रहते थे । अत: ऐसा माना जाता है कि पीपल ज्ञान प्रदान करने में सहायता करता है । भगवान बुद्ध को गया में पीपल वृक्ष के नीचे ही ज्ञान प्राप्त हुआ था ।

▪️पीपल की छाया और पत्तों से छनी हुई हवा मानसिक चेतनता तथा स्फूर्ति प्रदान करती है। अत: यह नीरोग रखने में सहायता करता है ।

▪️वेद में कहा गया है कि कुष्ठ से मुक्ति के लिए पीपल की उपासना करनी चाहिए ।

पीपल की पूजा विधि!!!!!!

—पीपल की पूजा प्राय: शनिवार को की जाती है ।

—शनिवार को प्रात:काल तेल का आड़ी बत्ती वाला दीपक जला कर पीपल वृक्ष के पास रखें।

—फिर तांबे के लोटे में जल लेकर पीपल की जड़ में चढ़ाएं ।

—जिस प्रकार भगवान विष्णु की उपासना की जाती है; उसी प्रकार नारायणमय पीपल वृक्ष को सफेद चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप व भोग अर्पित करना चाहिए ।

—इसके बाद पीपल की पांच, सात या ग्यारह जितनी बार कर सकें, परिक्रमा करनी चाहिए।

—फिर इस मंत्र से प्रार्थना करते हुए नमस्कार करे —

अश्वत्थ सुमहाभाग सुभग प्रियदर्शन ।
इष्टकामांश्च मे देहि शत्रुभ्यस्तु पराभवम् ।।
आयु: प्रजां धनं धान्यं सौभाग्यं सर्वसम्पदम् ।
देहि देव महावृक्ष त्वामहं शरणं गत: ।। (अश्वत्थ स्तोत्र १८-१९)

अर्थात्—महाभाग अश्वत्थ ! आप सुन्दर तथा प्रियदर्शन हो । आप मेरी मनोकामनाओं को पूर्ण करें । मेरे काम आदि शत्रुओं को हराएं । मुझे दीर्घ आयु, संतान, धन-धान्य, सौभाग्य तथा सभी प्रकार का ऐश्वर्य प्रदान करें । हे महावृक्ष मैं आपकी शरण में हूँ ।

—अंत में पीपल की जड़ का स्पर्श कर मस्तक से हाथ लगाएं ।

—पीपल के नीचे बैठकर मंत्र जप करना स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक है ।

—जिस कन्या की कुण्डली में ‘वैधव्य योग’ हो उसे ‘अश्वत्थ व्रत’ का पालन करना चाहिए ।

—अनुष्ठान आदि में और विशेष पर्वों जैसे—सोमवती अमावस्या, वट सावित्री अमावस्या आदि में पीपल वृक्ष की सूत्र (कलावा) लपेटते हुए १०८ परिक्रमा की जाती हैं ।

पीपल वृक्ष लगाने का पुण्य!!!!!!!!

पीपल वृक्ष लगाने की बड़ी महिमा है । इसका पुण्य अक्षय होता है—

—ऐसा कहा जाता है कि जिस प्रकार मनुष्य पीपल की छाया में बैठ कर अत्यंत सुखी होता है, उसी प्रकार पीपल वृक्ष लगाने वाला मृत्यु के बाद परमात्मा के निकट निवास करता हुआ अत्यंत सुखी होता है । उसे न तो यमलोक की यंत्रणा सहनी पड़ती है और न ही दारुण संताप।

—इससे मनुष्य की वंश-परम्परा अक्षुण्ण रहती है और समस्त ऐश्वर्य और दीर्घायु की प्राप्ति होती है । यदि किसी शुभ दिन मनुष्य पीपल वृक्ष को लगा कर आठ वर्षों तक निरन्तर सींचे, उसका पुत्र के समान पालन करे, पूजन करे तो अक्षय लक्ष्मी की प्राप्ति होती है ।

—पीपल वृक्ष को लगाने वाले के पितृगण मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं ।

पीपल के वृक्ष को काटना है निषेध!!!!!

पीपल के वृक्ष को बिना प्रयोजन काटना अपने पितरों को काट देने के समान है । ऐसा करने से वंश की हानि होती है । यज्ञ आदि की समिधा के लिए इसको काटने पर कोई दोष नहीं लगता; बल्कि अक्षय स्वर्ग की प्राप्ति होती है । अगर कभी पीपल वृक्ष को हटाना या काटना पड़ जाए तो उसकी शास्त्रों में अलग से विधि दी गयी है ।

16/05/2026

सत्यवान सावित्री की कथा!!!!!!

सत्यवान सावित्री की कथा प्राचीन भारत की ऐसी कथाओं में से एक है, जो भारत की पवित्रता को दर्शाती है। इसी कथा को आधार मानकर आज के समय में कई स्त्रियां वट सावित्री का व्रत को विधान की साथ करती हैं। वट सावित्री व्रत कथा सत्यवान सावित्री की कथा से प्रेरित है।

यह कथा एक ऐसी भारतीय नारी की है, जो अपने पति के प्राण बचाने के लिए यमराज से लड़ जाती है और अपने पति की जान बचाने में सफल भी हो जाती है। इस कहानी में कितनी सच्चाई है। यह तो हमे नहीं पता लेकिन हम आपके बीच इस कहानी को प्राचीन ग्रंथों के आधार पर प्रस्तुत कर रहे है।

सत्यवान सावित्री की कथा !!!!!!

बहुत प्राचीन युग की बात है, भारत के दक्षिण कश्मीर में अश्वपति नाम का राजा राज्य करता था। वह बहुत धर्मात्मा न्यायकारी और दयालु राजा था। उसके कोई संतान न थी ज्यों-ज्यों राजा की अवस्था बीत रही थी, उसे संतान होने से चिंता बढ़ रही थी।

ज्योतिषियों ने उसकी जन्म कुंडली देखकर बताया कि- "आपके ग्रह बता रहे हैं कि आपको संतान होगी"। इसके लिए आप सावित्री देवी की पूजा कीजिए। राजा अश्वपति राज्य छोड़कर वन चले गए 18 वर्ष तक उन्होंने तपस्या की। तब उन्हें वरदान मिला और उनके घर एक कन्या हुई। उसका नाम उन्होंने सावित्री रखा।

सावित्री अत्यंत सुंदर थी। उसकी सुंदरता और गुण की प्रशंसा दूर-दूर तक फैलने लगी। जैसे जैसे सावित्री बढ़ने लगी, वैसे वैसे उसका रूप निखरने लगा था। पिता को उसके विवाह की चिंता होने लगी। अश्वपति चाहते थे कि उसी के अनुरूप सावित्री को पति भी मिले किंतु कोई मिलता ना था।

सावित्री का मन बहलाने के लिए अश्वपति ने उसे तीर्थयात्रा के लिए भेज दिया, और उसे आज्ञा दी कि- 'तुझे पति चुन लेने की पूर्ण स्वतंत्रता देता हूं"। सावित्री का रथ जा रहा था, कि उसे एक अद्भुत स्थान दिखाई दिया। अनेक सुंदर वृक्ष के चारों ओर हरियाली थी।

वहीं एक युवक घोड़े के बच्चे के साथ खेल रहा था। उसके सिर पर जटा बनी थी, वह छाल पहने हुए था। उसके मुख पर तेज था। सावित्री ने देखा और मंत्री से कहा कि-- "आज यही विश्राम करना चाहिए"। रथ जब ठहरा वह युवक परिचय पाने के लिए उनके पास आया।

उसे जब पता चला कि वह राजकुमारी है तो वह उन्हें बड़े सम्मान से अपने पिता के आश्रम में ले गया। उसने यह भी बताया कि मेरे माता-पिता दृष्टिहीन है। मेरे पिता किसी समय सालवा देश के राजा थे। वह इस समय यहां तपस्या कर रहे है और मेरा नाम सत्यवान है।

दूसरे दिन सावित्री घर लौट गई और बड़ी लज्जा तथा शालीनता से उसने सत्यवान से विवाह करने की अनुमति मांगी। राजा अश्वपति बहुत प्रसन्न हुए कि-- "सावित्री को उसके अनुरूप वर मिल गया है"।

किंतु बाद में ज्योतिषियों से पता चला कि सत्यवान की आयु बहुत कम है। वह 1 साल से अधिक जीवित नहीं रहेगा। यह जानने के बाद सावित्री के पिता को बहुत दुख हुआ। उन्होंने सावित्री को सब प्रकार से समझाया कि-- "ऐसा विवाह करना जन्म भर के लिए दुख मोल लेना है"।

सावित्री ने कहा-- "पिताजी! मुझे इस संबंध में आपसे कुछ कहते हुए संकोच तथा लज्जा का अनुभव हो रहा है। मैं विनम्रता के साथ यह निवेदन करना चाहती हूं कि- आपने मुझे वर चुनने की स्वतंत्रता दी थी। मैंने सत्यवान को चुन लिया।

अब अपनी बात से हटना आपके आदर्श का अपमान हुआ और युग-युग के लिए अपने तथा अपने परिवार के ऊपर कलंक लगाना हुआ"। अश्वपति सावित्री की बात सुनकर निरुत्तर हो गए। उन्होंने विद्वानों को बुलाकर विचार विमर्श किया।

अंत में राजा अश्वपति ने सावित्री को तथा और लोगों के साथ लेकर सत्यवान के पिता के आश्रम में विवाह करने के लिए चले दिए। जब आश्रम निकट आया तब अश्वपति सब को छोड़कर आश्रम में गए और सत्यवान के पिता घुमंत्सेन से सावित्री का सत्यवान के साथ विवाह करने का विचार प्रकट किया।

घुमंत्सेन ने पहले तो अस्वीकार कर दिया। वह बोले-- "महाराज मैं दरिद्र हूं। तपस्या कर रहा हूं, किसी समय में राजा था , किंतु अब तो कंगाल हूं। राजकुमारी को किस प्रकार अपनी यहां रखूंगा"?

तब अश्वपति ने उन्हें सारी स्थिति बता दी और विवाह कर लेने के लिए आग्रह किया। अंत में सत्यवान के पिता मान गए और वहीं वन में दोनों का विवाह हो गया। अश्वपति विवाह में बहुत साधन अलंकार आदि दे रहे थे। घुमत्सेन ने कुछ भी नहीं लिया।

उन्होंने कहा-- "मुझे इससे क्या काम? विवाह के पश्चात सावित्री वहीं आश्रम में रहने लगी। उसने अपने सास-ससुर तथा पति सत्यवान की सेवा में अपना मन लगा दिया। सत्यवान और सावित्री सदा लोक-कल्याण तथा उपकार की बात करते थे।

सावित्री दिन भर घर का काम काज करती थी। जब कभी उसे अवकाश मिलता था तो वह भगवान से अपने पति की लंबी आयु की प्रार्थना करती थी। जैसे-जैसे समय निकट आता गया उनकी चिंता बढ़ती गई। जब सत्यवान के जीवन के 3 दिन शेष रह गए तो सावित्री ने भोजन छोड़ दिया और दिन-रात प्रार्थना करने लगी।

लोग उसे भोजन करने के लिए समझाते किंतु वह सबका अनुरोध टालती रही। तीसरे दिन जब सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने जा रहे थे, सावित्री भी उनके साथ चली।

सत्यवान ने समझाया कि-- "तुमने 3 दिन से कुछ खाया नहीं है, तुम मेरे साथ मत जाओ"। किंतु! वह नहीं मानी और सत्यवान के साथ वन को चली गई।सत्यवान एक पेड़ पर लकड़ी काटने के लिए चढ़ गया। थोड़ी देर में उसने लकड़ी काटकर गिरा दी।

सावित्री ने कहा-- "लकड़ी बहुत है उतर आइए"। सत्यवान पेड़ से उतरा। सत्यवान ने कहा-- "मेरे सिर में चक्कर आ रहा है"। धीरे-धीरे सिर में चक्कर बढ़ने लगा। सत्यवान धीरे-धीरे बेहोश होने लगा और कुछ क्षण में उसके प्राण पखेरू उड़ गए।

यह सब सावित्री पहले से जानती थी। फिर भी उसने अपने पति को निष्प्राण देखा और वह रोने लगी। इसी समय उसे ऐसा जान पड़ा कि कोई भयानक तेज पूर्ण परछाई उसके सामने खड़ी है। उसे देखकर सावित्री भयभीत हो गई। फिर अचानक न जाने कहां से उसमें बोलने का साहस आ गया।

उसने कहा-- "प्रभु! आप कौन हैं"। उस छाया ने कहा-- "मैं यमराज हूं। मुझे लोग धर्मराज भी कहते हैं, मैं तुम्हारे पति के प्राण लेने आया हूं। तुम्हारे पति की आयु पूरी हो गई है, मैं उसके प्राण लेकर जा रहा हूं"। इतना कहकर यमराज सत्यवान के प्राण लेकर चलने लगे।

सत्यवान का शरीर धरती पर पड़ा रहा। सावित्री भी यमराज के पीछे पीछे चलने लगी। थोड़ी देर बाद यमराज ने मुड़ कर पीछे देखा तो सावित्री भी चली आ रही थी। यमराज ने कहा-- "सावित्री! तुम कहां चली आ रही हो, तुम्हारी आयु बाकी है।

तुम हमारे साथ नहीं आ सकती लौट जाओ"!! इतना कहकर यमराज आगे बढ़े कुछ देर बाद यमराज ने फिर मुड़ कर देखा तो सावित्री चली आ रही थी। यमराज ने फिर कहा-- "तुम क्यों मेरे पीछे आ रही हो"। सावित्री बोली-- "महाराज! मैं अपने पति को कैसे छोड़ सकती हूं"।

यमराज ने कहा-- "जो ईश्वर का नियम है, वह नहीं बदला जा सकता, तुम चाहो तो कोई वरदान मुझसे मांग लो। केवल सत्यवान का जीवन छोड़कर जो मांगना है मांग लो और चली जाओ। सावित्री ने बहुत सोच कर कहा-- "मेरे सास और ससुर देखने लगे और उनका राज्य वापस मिल जाए यमराज ने कहा ऐसा ही होगा"।

थोड़ी देर बाद यमराज ने देखा कि सावित्री फिर पीछे-पीछे आ रही है। यमराज ने सावित्री को बहुत समझाया और कहा-- "अच्छा एक वरदान और मांग लो। सावित्री ने कहा-- "मेरे पिता को संतान प्राप्त हो जाए। यमराज ने वरदान दे दिया और आगे बढ़ गए।

कुछ दूर जाने के बाद उन्होंने पीछे गर्दन घुमाकर देखा सावित्री चली आ रही है। उन्होंने कहा-- "सावित्री तुम क्यों चली आ रही हो ऐसा कभी नहीं हुआ कोई जीवित शरीर मेरे साथ नहीं जा सकता। इसीलिए तुम लौट जाओ। सावित्री ने कहा अपने पति को छोड़ कर नहीं जा सकती। शरीर का त्याग कर सकती हूँ"।

यमराज चकराया कि यह एक कैसी स्त्री है। इतनी देर से कोई बात नहीं मानती पता नहीं क्या करना चाहती है। उन्होंने कहा-- "अच्छा! एक वरदान मुझसे और मांग लो। मेरा कहना मानो भगवान की जो इच्छा है उसके विरुद्ध लड़ना बेकार है।

सावित्री ने कहा-- "महाराज! आप यदि वरदान ही देना चाहते हैं। तो यह वरदान दीजिए कि मुझे संतान प्राप्त हो जाए। यमराज ने कहा ऐसा ही होगा यमराज आगे बढ़े किंतु कुछ ही दूरी पर उन्हें ऐसा लगा कि वह लौटी नहीं यमराज को क्रोध आ गया। यमराज ने कहा-- "तुम मेरा कहना नहीं मानती हो। सावित्री ने कहा धर्मराज आप मुझे संतान प्राप्ति का आशीर्वाद दे चुके हैं।

और मेरे पति को अपने साथ लिए जा रहे हैं यह कैसे संभव है"। यमराज को अब ध्यान आया। उन्होंने सत्यवान के प्राण छोड़ दिया और सावित्री की दृढ़ता और धर्म की प्रशंसा करते हुए चले गए।

इधर सावित्री उस पेड़ के पास पहुंची जहां सत्यवान जीवित पड़ा था। सावित्री ने अपनी धर्म तथा तपस्या के बल से असंभव को संभव बना दिया। तप और दृढ़ता में इतना बल होता है कि उसके आगे देवता भी झुक जाते है। इसी कारण सावित्री हमारे देश की नारियों में सर्वश्रेष्ठ हो गई और आज तक वह हमारे देश का आदर्श बनी हुई है।

16/05/2026
25/03/2026

मित्रो आज सातवां नवरात्रा है। आज के दिन माँ कालरात्रि की पूजा की जाती है।
“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥


सप्तम दुर्गा : श्री कालरात्रि
“एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥

वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।
वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥“

श्री दुर्गा का सप्तम रूप श्री कालरात्रि हैं। ये काल का नाश करने वाली हैं, इसलिए कालरात्रि कहलाती हैं। नवरात्रि के सप्तम दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है। इस दिन साधक को अपना चित्त भानु चक्र (मध्य ललाट) में स्थिर कर साधना करनी चाहिए।
संसार में कालो का नाश करने वाली देवी ‘कालरात्री’ ही है। भक्तों द्वारा इनकी पूजा के उपरांत उसके सभी दु:ख, संताप भगवती हर लेती है। दुश्मनों का नाश करती है तथा मनोवांछित फल प्रदान कर उपासक को संतुष्ट करती हैं।

दुर्गा पूजा का सातवां दिन – सप्तमी – कालरात्रि पूजा

मां दुर्गा के सातवें स्वरूप या शक्ति को कालरात्रि कहा जाता है, दुर्गा-पूजा के सातवें दिन माँ काल रात्रि की उपासना का विधान है. मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, इनका वर्ण अंधकार की भाँतिकाला है, केश बिखरे हुए हैं, कंठ में विद्युत की चमक वाली माला है, माँ कालरात्रि के तीन नेत्र ब्रह्माण्ड की तरह विशाल व गोल हैं, जिनमें से
बिजली की भाँति किरणें निकलती रहती हैं, इनकी नासिका से श्वास तथा निःश्वाससे अग्नि की भयंकर ज्वालायें निकलती रहती हैं. माँ का यह भय उत्पन्न करने वाला स्वरूप केवल पापियों का नाश करने के लिए.
माँ कालरात्रि अपने भक्तों को सदैव शुभ फल प्रदान करने वाली होती हैं इस कारण इन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है. दुर्गा पूजा के सप्तम दिन साधक का मन ‘सहस्रार’ चक्र में अवस्थित होता है.कालरात्रिमर्हारात्रिर्मोहरात्रिश्र्च दारूणा. त्वं श्रीस्त्वमीश्र्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा..मधु कैटभ नामक महापराक्रमी असुर से जीवन की रक्षा हेतु भगवान
विष्णु को निंद्रा से जगाने के लिए ब्रह्मा जी ने इसी मंत्र से मां की स्तुति की थी. यह देवी काल रात्रि ही महामाया हैं और भगवान विष्णु की योगनिद्रा हैं. इन्होंने ही सृष्टि को एक दूसरे से जोड़ रखा है.देवी काल-रात्रि का वर्ण काजल के समान काले रंग का है जो अमावस की रात्रि से भी अधिक काला है. मां कालरात्रि के तीन बड़े बड़े उभरे हुए
नेत्र हैं जिनसे मां अपने भक्तों पर अनुकम्पा की दृष्टि रखती हैं. देवी की चार भुजाएं हैं दायीं ओर की उपरी भुजा से महामाया भक्तों को वरदान दे रही हैं और नीचे की भुजा से अभय का आशीर्वाद प्रदान कर रही हैं.बायीं भुजा में क्रमश: तलवार और खड्ग धारण किया है. देवी कालरात्रि के बाल खुले हुए हैं और हवाओं में लहरा रहे हैं. देवी काल रात्रि गर्दभ पर सवार हैं. मां का वर्ण काला होने पर भी कांतिमय और अद्भुत दिखाई देता है. देवी कालरात्रि का यह विचित्र रूप भक्तों के लिए अत्यंत शुभ है अत: देवी को शुभंकरी भी कहा गया है.

सप्तमी दिन – कालरात्रि की पूजा विधि :
देवी का यह रूप ऋद्धि सिद्धि प्रदान करने वाला है. दुर्गा पूजा का सातवां दिन तांत्रिक क्रिया की साधना करने वाले भक्तों के लिए अति महत्वपूर्ण होता है ।
सप्तमी पूजा के दिन तंत्र साधना करने वाले साधक मध्य रात्रि में देवी की तांत्रिक विधि से पूजा करते हैं. इस दिन मां की आंखें
खुलती हैं।

षष्ठी पूजा के दिन जिस विल्व को आमंत्रित किया जाता है उसे आज तोड़कर लाया जाता है और उससे मां की आँखें बनती हैं. दुर्गा पूजा में सप्तमी तिथि का काफी महत्व बताया गया है. इस दिन से भक्त जनों के लिए देवी
मां का दरवाज़ा खुल जाता है और भक्तगण पूजा स्थलों पर देवी के दर्शन हेतु पूजा स्थल पर जुटने लगते हैं।

सप्तमी की पूजा सुबह में अन्य दिनों की तरह ही होती परंतु रात्रि में विशेष विधान के साथ देवी की पूजा की जाती है. इस दिन अनेक प्रकार के मिष्टान एवं कहीं कहीं तांत्रिक विधि से पूजा होने पर मदिरा भी देवी को अर्पित कि जाती है. सप्तमी की रात्रि ‘सिद्धियों’ की रात भी कही जाती है. कुण्डलिनी जागरण हेतु जो साधक साधना में लगे होते हैं आज
सहस्त्रसार चक्र का भेदन करते हैं.पूजा विधान में शास्त्रों में जैसा वर्णित हैं उसके अनुसार पहलेकलश की पूजा करनी चाहिए फिर नवग्रह, दशदिक्पाल, देवी के परिवार में उपस्थित देवी देवता की पूजा करनी चाहिए फिर मां कालरात्रि की पूजा करनी चाहिए. देवी की पूजा से पहले उनका ध्यान करना चाहिए ।
” देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्तया, निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां, भक्त नता: स्म विदाधातु शुभानि सा न:..

देवी कालरात्रि के मंत्र :

1- या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

2- एक वेधी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकणी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।।

वामपदोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी।।

देवी कालरात्रि के ध्यान :
करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।
कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥

दिव्यं लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्।
अभयं वरदां चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम॥

महामेघ प्रभां श्यामां तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा।
घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥

सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्।
एवं सचियन्तयेत् कालरात्रिं सर्वकाम् समृध्दिदाम्॥

देवी कालरात्रि के स्तोत्र पाठ :

हीं कालरात्रि श्री कराली च क्लीं कल्याणी कलावती।
कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता॥

कामबीजजपान्दा कमबीजस्वरूपिणी।
कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥

क्लीं हीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी।
कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥

देवी कालरात्रि के कवच :

ऊँ क्लीं मे हृदयं पातु पादौ श्रीकालरात्रि।
ललाटे सततं पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥

रसनां पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।
कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशंकरभामिनी॥

वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।
तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥

देवी की पूजा के बाद शिव और ब्रह्मा जी की पूजा भी अवश्य करनी चाहिए।

दुर्गा सप्तशती के प्रधानिक रहस्य में बताया गया है कि जब देवी ने इस सृष्टि का निर्माण शुरू किया और ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश का प्रकटीकरण हुआ उसस पहले देवी ने अपने स्वरूप से तीन महादेवीयों को उत्पन्न किया. सर्वेश्वरी महालक्ष्मी ने ब्रह्माण्ड को अंधकारमय और तामसी गुणों से भरा हुआ देखकर सबसे पहले तमसी रूप में जिस देवी को उत्पन्न किया वह देवी हीकालरात्रि हैं. देवी कालरात्रि ही अपने गुण और कर्मों द्वारा महामाया, महामारी, महाकाली, क्षुधा, तृषा, निद्रा, तृष्णा, एकवीरा, एवं दुरत्यया कहलाती हैं।

25/03/2026
24/03/2026

मित्रो आज छठवाँ नवरात्रा है। हम आपको माँ के आदिशक्ति श्री दुर्गा का षष्ठम् रूप श्री कात्यायनी की कथा बतायेगें।

आदिशक्ति श्री दुर्गा का षष्ठम् रूप श्री कात्यायनी। महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया था। इसलिए वे कात्यायनी कहलाती हैं। नवरात्रि के षष्ठम दिन इनकी पूजा और आराधना होती है। श्री कात्यायनी की उपासना से आज्ञा चक्र जाग्रति की सिद्धियां साधक को स्वयंमेव प्राप्त हो जाती है।

वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौलिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है तथा उसके रोग, शोक, संताप, भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं। महर्षि कात्यायन ने इनका पालन-पोषण किया तथा महर्षि कात्यायन की पुत्री और उन्हीं के द्वारा सर्वप्रथम पूजे जाने के कारण देवी दुर्गा को कात्यायनी कहा गया.

देवी कात्यायनी अमोद्य फलदायिनी हैं इनकी पूजा अर्चना द्वारा सभी संकटों का नाश होता है, माँ कात्यायनी दानवों तथा पापियों का नाश करने वाली हैं. देवी कात्यायनी जी के पूजन से भक्त के भीतर अद्भुत शक्ति का संचार होता है. इस दिन साधक का मन ‘आज्ञा चक्र’ में स्थित रहता है. योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है. साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होने पर उसे सहजभाव से मां कात्यायनी के दर्शन प्राप्त होते हैं. साधक इस लोक में रहते हुए अलौकिक तेज से युक्त रहता है।

देवी कात्यायनी जी के संदर्भ में एक पौराणिक कथा प्रचलित है जिसके अनुसार एक समय कत नाम के प्रसिद्ध ॠषि हुए तथा उनके पुत्र ॠषि कात्य हुए, उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध कात्य गोत्र से, विश्वप्रसिद्ध ॠषि कात्यायन उत्पन्न हुए थे. देवी कात्यायनी जी देवताओं ,ऋषियों के संकटों को दूर करने लिए महर्षि कात्यायन के आश्रम में उत्पन्न होती हैं. महर्षि कात्यायन जी ने देवी पालन पोषण किया था।

जब महिषासुर नामक राक्षस का अत्याचार बहुत बढ़ गया था, तब उसका विनाश करने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अपने अपने तेज़ और प्रताप का अंश देकर देवी को उत्पन्न किया था और ॠषि कात्यायन ने भगवती जी कि कठिन तपस्या, पूजा की इसी कारण से यह देवी कात्यायनी कहलायीं।

महर्षि कात्यायन जी की इच्छा थी कि भगवती उनके घर में पुत्री के रूप में जन्म लें. देवी ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार की तथा अश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेने के पश्चात शुक्ल सप्तमी, अष्टमी और नवमी, तीन दिनों तक कात्यायन ॠषि ने इनकी पूजा की, दशमी को देवी ने महिषासुर का वध किया ओर देवों को महिषासुर के अत्याचारों से मुक्त किया।

जो साधक कुण्डलिनी जागृत करने की इच्छा से देवी अराधना में समर्पित हैं उन्हें दुर्गा पूजा के छठे दिन माँ कात्यायनी जी की सभी प्रकार से विधिवत पूजा अर्चना करनी चाहिए फिर मन को आज्ञा चक्र में स्थापित करने हेतु मां का आशीर्वाद लेना चाहिए और साधना में बैठना चाहिए. इस प्रकार जो साधक प्रयास करते हैं उन्हें भगवती कात्यायनी सभी प्रकार के भय से मुक्त करती हैं. माँ कात्यायनी की भक्ति से मनुष्य को अर्थ, कर्म, काम, मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

दुर्गा पूजा के छठे दिन भी सर्वप्रथम कलश और उसमें उपस्थित देवी देवता की पूजा करें फिर माता के परिवार में शामिल देवी देवता की पूजा करें जो देवी की प्रतिमा के दोनों तरफ विरजामन हैं. इनकी पूजा के पश्चात देवी कात्यायनी जी की पूजा कि जाती है. पूजा की विधि शुरू करने पर हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम कर देवी के मंत्र का ध्यान किया जाता है।

देवी की पूजा के पश्चात महादेव और परम पिता की पूजा करनी चाहिए. श्री हरि की पूजा देवी लक्ष्मी के साथ ही करनी चाहिए।

माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यन्त दिव्य और स्वर्ण के समान चमकीला है. यह अपनी प्रिय सवारी सिंह पर विराजमान रहती हैं. इनकी चार भुजायें भक्तों को वरदान देती हैं, इनका एक हाथ अभय मुद्रा में है, तो दूसरा हाथ वरदमुद्रा में है अन्य हाथों में तलवार तथा कमल का फूल है।

ध्यान
वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥
स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रसन्नवदना पञ्वाधरां कांतकपोला तुंग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम॥

स्तोत्र पाठ |
कंचनाभा वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोअस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां।
सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥
परमांवदमयी देवि परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति,कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥

कवच |
कात्यायनी मुखं पातु कां स्वाहास्वरूपिणी।
ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥
कल्याणी हृदयं पातु जया भगमालिनी॥

देवी कात्यायनी का मंत्र ।

सरलता से अपने भक्तों की इच्छा पूरी करने वाली माँ कात्यायनी का उपासना मंत्र है-

चंद्र हासोज्ज वलकरा शार्दू लवर वाहना|
कात्यायनी शुभं दद्या देवी दानव घातिनि||

पूजा में उपयोगी खाद्य साम्रगी: षष्ठी तिथि के दिन देवी के पूजन में मधु का महत्व बताया गया है। इस दिन प्रसाद में मधु यानि शहद का प्रयोग करना चाहिए। इसके प्रभाव से साधक सुंदर रूप प्राप्त करता है।

विशेष: मां कात्यायनी अमोघ फलदायिनी मानी गई हैं। शिक्षा प्राप्ति के क्षेत्र में प्रयासरत भक्तों को माता की अवश्य उपासना करनी चाहिए।

23/03/2026

मित्रोआज पाँचवा नवरात्रा है, आज के दिन माँ स्कंदमाता की पूजा की जाती है। आज हम आपको इन्ही के बारे में संक्षेप में बतायेगें,,,,,,,,,

श्रीमद् देवी भागवत् पुराण के अनुसार माँ दुर्गा के पांचवे स्वरूप में नवरात्र की पंचमी तिथि पर माँ स्कन्दमाता की आराधना का विधान है, आदिशक्ति दुर्गा के स्कन्दमाता स्वरूप की कृपा से मूढ़ व्यक्ति भी ज्ञानी हो जाता है, माँ की उपासना से भक्त की सर्व इच्छायें पूर्ण हो जाती हैं एवम् भक्त को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

सज्जनों! स्कन्द का अर्थ है कुमार कार्तिकेय, अर्थात माता पार्वती और भगवान् शंकरजी के जेष्ठ पुत्र कार्तिकेय, इन्हें दक्षिण भारत में भगवान मुर्गन के नाम से भी जाना जाता है, तथा माता का अर्थ है माँ अर्थात जो भगवान स्कन्द कुमार की माता हैं वही मां स्कन्दमाता है, शास्त्रों में ऐसा वर्णन है की इनके विग्रह में भगवान स्कंद बालरूप में इनकी गोद में विराजित हैं अतः ये ममता की मूर्ति हैं।

देवी स्कन्दमाता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं, तथा इनकी मनोहर छवि पूरे ब्रह्मांड में प्रकाशमान होती है, शास्त्रों के अनुसार देवी स्कन्दमाता ने अपनी दाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा से बाल स्वरुप में भगवान कार्तिकेय को गोद में लिया हुआ है, दाईं तरफ की नीचे वाली भुजा में इन्होंने कमल पुष्प का वरण किया हुआ है, बाईं तरफ ऊपर वाली भुजा से माँ ने जगत को तारने के लिए वरदमुद्रा बना रखी हैं, और नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प है।

देवी स्कन्दमाता का वर्ण पूर्णत: शुभ्र है, जिस प्रकार सारे रंग मिलकर मिश्रित रंग बनता है, इसी तरह इनका ध्यान जीवन में हर प्रकार की परिस्थितियों को स्वीकार करके अपने भीतर आत्मबल का तेज उत्पन्न करने की प्रेरणा देता है, ये कमल के पुष्प पर विराजमान हैं, इसी कारण इन्हें पद्मासना देवी और विद्यावाहिनी दुर्गा कहकर भी संबोधित किया जाता है, शास्त्रों के अनुसार इनकी सवारी सिंह के रूप में वर्णित है।

या देवी सर्वभू‍तेषु स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

नवरात्र की पंचमी तिथि को देवी स्कन्दमाता के स्वरूप की ही उपासना की जाती है, देवी स्कन्दमाता विद्वानों और को पैदा करने वाली शक्ति हैं, अर्थात चेतना का निर्माण करने वाली देवी हैं, इन्हें दुर्गा सप्तसती शास्त्र में चेतान्सि कहकर संबोधित किया गया है, नवरात्रि-पूजन के पांचवें दिन देवी स्कन्दमाता के पूजन का शास्त्रों में बहुत अधिक महत्व बताया गया है।

स्कंदमाता की उपासना से बालरूप स्कंद भगवान् की उपासना भी स्वमेव हो जाती है, यह विशेषता केवल इन्हीं को प्राप्त है, अतः साधक को स्कंदमाता की उपासना की ओर विशेष ध्यान देना चाहिये, इनकी पूजा का सबसे अच्छा समय है दोपहर से मध्यान्ह के बीच, माता की पूजा सफेद कनेर के फूलों से करनी चाहिये।

इन्हें मूंग से बने मिष्ठान का भोग लगाना चाहिये तथा श्रृंगार में इन्हें हरे रंग की चूडियाँ अर्पित करना शुभ माना गया है, स्कन्दमाता की उपासना से मंदबुद्धि व्यक्ति को भी बुद्धि और चेतना प्राप्त होती है, पारिवारिक सुख-शांति मिलती है, इनकी कृपा से ही रोगियों को रोगों से मुक्ति मिलती है तथा समस्त व्याधियों का अंत होता है।

सिंहासना गता नित्यं पद्माश्रि तकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।।

कुण्डलिनी जागरण के उद्देश्य से जो साधक दुर्गा उपासना करते हैं, उनके लिए नवरात्र पंचमी विशिष्ट साधना का दिन होता है, देवी स्कन्दमाता साधना के लिए साधक अपने मन को विशुद्धि चक्र में स्थित करते हैं, इस चक्र का भेदन करने के लिये देवी स्कन्दमाता की विधिवत पूजा करने का विधान है, पूजा के लिए कम्बल का आसन श्रेष्ठ रहता है।

माँ स्कन्दमाता की साधना का संबंध बुद्ध ग्रह से है, कालपुरूष सिद्धांत के अनुसार कुण्डली में बुद्ध ग्रह का संबंध तीसरे और छठे घर से होता है, अतः मां स्कन्दमाता की साधना का संबंध व्यक्ति की सेहत, बुद्धिमत्ता, चेतना, तंत्रिका-तंत्र और रोगमुक्ति से है, जिन व्यक्तियों कि कुण्डली में बुद्ध ग्रह नीच अथवा मंगल से पीड़ित हो रहा है, अथवा मीन राशि में आकर नीच एवं पीड़ित है, उन्हें सर्वश्रेष्ठ फल देती है।

माँ स्कन्दमाता कि साधना से व्यक्ति के असाध्य रोगों का निवारण होता है, गृहक्लेश से मुक्ति मिलती है, भाई-बहनों! स्कन्दमाता मोक्ष के द्वार खोलने वाली परम सुखदायी हैं, माँ अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं, आप सभी को आज के पावन दिवस की पावन सुप्रभात् मंगलमय् हो, माँ आपकी समस्त कामनाओं को पूर्ण करें, एवम् आप सभी को आरोग्य और सौभाग्य प्रदान करें।

जय माँ स्कन्द माता!
जय अम्बे!

23/03/2026

मित्रोआज चतुर्थ नवरात्रा है, आज हम आपको माँ कुष्मांडा की कथा बतायेंगे!!!!!!!

नवरात्र के चौथें दिन दुर्गा जी के चतुर्थ रूप मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है। माना जाता है कि जब सृष्टि में चारों ओर अंधकार था और कोई भी जीव-जंतु नही था। तब मां ने सृष्टि की रचना की। इसी कारण इन्हें कुष्मांडा देवी के नाम से जाना जाता है।

आदिशक्ति दुर्गा के कुष्मांडा रूप में चौथा स्वरूप भक्तों को संतति सुख प्रदान करने वाला है। आज के दिन पहले मां का ध्यान मंत्र पढ़कर उनका आहवान किया जाता है और फिर मंत्र पढ़कर उनकी आराधना की जाती है।

कूष्मांडा का मतलब है कि जिन्होंने अपनी मंद (फूलों) सी मुस्कान से सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड को अपने गर्भ में उत्पन्न किया। माना जाता है कि मां कूष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं। इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है। मां कूष्मांडा अत्यल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली हैं। इनकी आराधना करने से भक्तों को तेज, ज्ञान, प्रेम, उर्जा, वर्चस्व, आयु, यश, बल, आरोग्य और संतान का सुख प्राप्त होता है।

पंडितजी के अनुसार मां की उपासना भवसागर से पार उतारने के लिए सर्वाधिक सुगम और श्रेयष्कर मार्ग है। जैसा कि दुर्गा सप्तशती के कवच में लिखा गया है -

कुत्सित: कूष्मा कूष्मा-त्रिविधतापयुत: संसार: ।
स अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्या: सा कूष्मांडा ।।

अर्थात: "वह देवी जिनके उदर में त्रिविध तापयुक्त संसार स्थित है वह कूष्मांडा हैं। देवी कूष्मांडा इस चराचार जगत की अधिष्ठात्री हैं। जब सृष्टि की रचना नहीं हुई थी। उस समय अंधकार का साम्राज्य था।"

मां कूष्मांडा की उपासना करने से सारे कष्ट और बीमारियां दूर हो जाती है। उनकी पूजा से हमारे शरीर का अनाहत चक्र जागृत होता है। इनकी उपासना से जीवन के सारे शोक खत्म हो जाते हैं। इससे भक्तों को आयु, यश, बल और आरोग्य की प्राप्ति होती है। देवी मां के आशीर्वाद से सभी भौतिक और आध्यात्मिक सुख भी हासिल होते हैं।

मान्यता के अनुसार ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति हैं। इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है। वहाँ निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। इनके शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान हैं।

देवी कुष्मांडा का स्वरूप: इनके तेज और प्रकाश से दसों दिशाएं प्रकाशित हो रही हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है। मां की आठ भुजाएं हैं। अतः ये अष्टभुजा देवी के नाम से भी विख्यात हैं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। इनका वाहन सिंह है।

श्लोक:
सुरासंपूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च |
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ||

मां कूष्माण्डा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं। इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है। माँ कूष्माण्डा अत्यल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली हैं। यदि मनुष्य सच्चे हृदय से इनका शरणागत बन जाए तो फिर उसे अत्यन्त सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती है।

पंडितजी के अनुसार विधि-विधान से मां के भक्ति-मार्ग पर कुछ ही कदम आगे बढ़ने पर भक्त साधक को उनकी कृपा का सूक्ष्म अनुभव होने लगता है। यह दुःख स्वरूप संसार उसके लिए अत्यंत सुखद और सुगम बन जाता है। मां की उपासना मनुष्य को सहज भाव से भवसागर से पार उतारने के लिए सर्वाधिक सुगम और श्रेयस्कर मार्ग है।

मां कूष्माण्डा की उपासना मनुष्य को आधियों-व्याधियों से सर्वथा विमुक्त करके उसे सुख, समृद्धि और उन्नति की ओर ले जाने वाली है। अतः अपनी लौकिक, पारलौकिक उन्नति चाहने वालों को इनकी उपासना में सदैव तत्पर रहना चाहिए।

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