09/08/2024
#अद्भुत_शंका_समाधान
४२६. जिज्ञासु:- मैं प्रवचन् से श्रीमान् जी का पैतीस या तीस साल पहले वर्मा में सुना था, महामंडलेश्वर के नाम से। सदानन्द जी महाराज थे और आपका भाषण हमें इतना जंचा कि गीता का मैं अनुयायी हो गया। यहाँ तक कि आपके स्वर में आप थे या नहीं। आपने कहा था कि सोलहवां अध्याय का पहला श्लोक का ही अगर स्मरण मनुष्य कर ले तो वो किसी से डरेगा नहीं। उस पर यहाँ तक कि भयानक जानवर या भयानक अस्त्र-शस्त्र भी उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। तभी से मैं 10 साल से आ रहा हूँ। मैं आज तक कुछ भी कहने का मौका नहीं मिला और मैं उस महामंडलेश्वर स्वामी सदानन्द महाराज को अपने ह्रदय में धारण किया हुआ हूँ और मैं समझता हूँ कि वही ज्ञानेश्वर होकर के आप हैं। इसलिए मैं आपको नमस्कार करता हूँ। कम से कम ये बताने का कृपा करें।
सन्त ज्ञानेश्वर जी:- बोलिए परमप्रभु परमेश्वर की जय sss। जरा गीता लाना जी। बोलना तभी सत्य है जब वो व्यवहार में सही हो। कथनी और करनी दोनों जब तक होती हैं तब उसे सत्य कहते हैं। कथनी और करनी जब दोनों में टकराव होता है तो या तो कथनी झूठी होगी या जो व्यवहार है वो गलत होगा। कथनी और करनी तो वो महामंडलेश्वर पहले तो वो यह नहीं है। वो करपात्री के महामंडलेश्वर नहीं हैं। वो करपात्री के शिष्य थे, यह स्वर्गाश्रम जो है उसी में वो रहते हैं। ऋषिकेश आश्रम में। महात्मा सदानन्द के नाम से प्रचलित है। तो करपात्री के शिष्य है। वो क्या जाने परमात्मा के विषय में। वो क्या जाने? वो तो इतना डरपोक हैं सब। वो हैं वहीं उसके सामने कुत्ता दौड़ा दीजिये तो भागने लगेगा। बड़े जन्तु-जानवर की बात छोड़ दीजिये। बोलने के लिए तो कुछ भी बोला जायेगा। बोलने के लिए तो कुछ भी बोला जायेगा। मंच पर हैं तो कोई बाघ-शेर थोड़े आ रहा है कि उनको प्रेक्टिकल होगा कि वो भय खाते हैं कि नहीं, भयभीत होते है कि नहीं। कुल मिलाकर के गीता में भगवान् श्री कृष्ण के प्राप्ति वाला प्रकरण से मतलब रखना चाहिये। क्योंकि जब तक भगवत् प्राप्ति नहीं होती, भगवद् ज्ञान नहीं मिलेगा, संसार में असत्य क्या है और सत्य क्या है? ये जाना ही नहीं जा सकता। भगवद्ज्ञान के बगैर, तत्त्वज्ञान के बगैर इस संसार में झूठ क्या है और सत्य क्या है? जाना ही नहीं जा सकता। त्याज्य, ग्राह्य कैसे विधान लागू होगा? कर्तव्य मेरा क्या है? कैसे जानेंगे? जब तक असत्य और सत्य, झूठ और साँच दोनों को स्पष्टतः जानेंगे देखेंगे नहीं, तब तक किस आधार पर अपने कर्तव्य का निर्धारण करेंगे? हम शरीर हैं कि हम जीव हैं कि हम आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म-शिव हैं कि हम परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्म-खुदा-गॉड-भगवान् हैं? जब तक हम ये जानेंगे नहीं, तब तक हम अपने कर्त्तव्य का निर्धारण कैसे कर लेंगे?
हम शरीर होगा तो इसका कर्त्तव्य कुछ और होगा। हम जीव होगा तो इसका कर्त्तव्य-मंजिल कुछ और होगा। हम आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म-शिव होगा तो इसका कर्त्तव्य-मंजिल कुछ और होगा। हम परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्म-खुदा-गॉड-भगवान् होगा तो इसका कर्त्तव्य कुछ और होगा। जब तक ये पता ही नहीं चलेगा कि इन चार में से ‘हम’ कौन है?शरीर है कि जीव है कि आत्मा है कि परमात्मा है, शरीर है कि जीव है कि ईश्वर है कि परमेश्वर है, शरीर है कि जीव है कि ब्रह्म है कि परमब्रह्म है, शरीर है कि जीव है कि शिव है कि भगवान् है, बॉडी है कि सेल्फ है कि सोल है कि गॉड है, जिस्म है कि रूह है कि नूर है कि अल्लातआला है। यानी शरीर है कि अहं है कि हंस है कि परमतत्त्वम् है। जब तक इन चारों को हम अलग-अलग जानेंगे नहीं, अलग-अलग देखेंगे नहीं, अलग-अलग परिचय-पहचान नहीं करेंगे, तब तक हम इसमें से कैसे कहेंगे कि हम कौन है? क्या है? और जब ‘हम’ हम ही को नहीं जानेंगे। अपने अस्तित्त्व पद का पता ही नहीं होगा तो हम अपना कर्त्तव्य कैसे जान लेंगे। क्योंकि कर्त्तव्य तो अस्तित्त्व पद के अनुसार तय होता है। कर्त्तव्य तो पद अथवा अस्तित्त्व के अनुसार तय होता है। जब हमको अपने अस्तित्त्व पद का पता ही नहीं चलेगा तो हम कौन सा व्यवहार देंगे? औरत की शरीर एक होती है। एक ही जैसे होती है। कोई लड़की कहलाती है तो कोई बहन कहलाती है तो कोई पत्नी कहलाती है तो कोई माँ कहलाती है। हम जानेंगे ही नहीं कि उस औरत से मेरा सम्बन्ध क्या है? लड़की का है कि बहन का है कि पत्नी का है कि माता का है, हम उसके साथ कौन सा व्यवहार अदा करेंगे? कौन सा व्यवहार हम उसके साथ करेंगे? जब तक हम वास्तविक पद को नहीं जानेंगे, कर्त्तव्य का निर्धारण ही नहीं हो पायेगा। हम अपने कर्त्तव्य करेंगे कैसे? और वही जिम्मेदारी फट से पढ़ा-लिखा है अच्छा। कहता है भाई ! हाँ, परिवार भी तो जिम्मेदारी है निभाना। रे मूर्ख कहीं के ! जिम्मेदारी का अर्थ भी मालूम भी है कि खाली बोल देना है। अपने अस्तित्त्व के अनुसार कर्त्तव्य का निर्धारण होता है और ईमान से कर्त्तव्य के पालन को ही दायित्व कहते हैं, जिम्मेदारी कहते हैं। ईमान से ही अपने कर्त्तव्य के पालन को ही जिम्मेदारी दायित्व कहते हैं। कर्त्तव्य को, अस्तित्त्व का पता नहीं तो कर्त्तव्य कहाँ से आ जायेगा? और अस्तित्त्व कर्त्तव्य है ही नहीं तो जिम्मेदारी कहाँ से आ गयी? दायित्व कहाँ से आ गया? दायित्व होता है जिम्मेदारी निभाने का नाम। यानी दायित्व होता है जिम्मेदारी होती है कर्त्तव्य निभाने का नाम। कर्त्तव्य निर्धारित होता है अस्तित्व अथवा कर्त्तव्य के द्वारा। जब तक हम अस्तित्व नहीं जानेंगे कर्त्तव्य का ही पता नहीं चलेगा। जिम्मेदारी कहाँ से आ जायेगी? तो इस तरह से जो है तत्त्वज्ञान के लिये। ध्यान में होने की स्थिति। तत्त्वज्ञान वाला हो जायेगा तो भगवान् का रहेगा कि ब्रह्माण्ड में किसी और का रहेगा? तत्त्वज्ञान वाला भगवान् वाला होता है। उसका कौन क्या बिगाड़ लेगा? इसमें भी तत्त्वज्ञान ही है।
४२७. जिज्ञासु:- इससे अभय हो जाता है। मनुष्य उसके जान पर अभय हो जाता है।
सन्त ज्ञानेश्वर जी:- जब तत्त्वज्ञान वाला होगा तो संसार में अभय नहीं हो जायेगा तो क्या होगा? जब जन्म-मृत्यु उसका खतम हो जायेगा। भगवान् के शरण में है जन्म-मृत्यु खतम हो जायेगा, अमरत्व को प्राप्त हो जायेगा तो डरेगा किससे? अगर भगवान् का भय न हो। शरणागत के, तत्त्वज्ञान के विधान का भय न हो तो वो जो है सब लोगों को अकेले ठीक कर देगा। बानर हनुमान ठीक किया था, भगवान् के शरण के बल पर। तो वो तो तत्त्वज्ञान वाला को ऐसा होता ही है। ये कौन कहता है कि तत्त्वज्ञान वाला किसी से डरेगा? उसका भय भगवान् से होता है केवल और सत्य विधान से होता है। वो किसी देवी-देवता, भूत-प्रेत किसी और से नहीं डरता। लेकिन जादूगरी चमत्कार भी नहीं करता है। अब तत्त्वज्ञान पाये और चेलवन के तरह से आप कहिये कि मैं तो तत्त्वज्ञान पाया हूँ।
दो चेला थे। किसी गुरुजी के यहाँ से ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके आ रहे थे। गुरुजी पढ़ा दिये कि चेला तेरे में भी भगवान् ब्रह्म, मेरे में भी ब्रह्म, हाथी में भी ब्रह्म, घोड़े में भी ब्रह्म, गाय में भी ब्रह्म, सुअर में भी ब्रह्म, सारे कण-कण में भी ब्रह्म। हम सभी ब्रह्म वाले हैं। सब ब्रह्म ही ब्रह्म हैं। ऐसा ज्ञान लेकर के दोनों चेला बेचारे आये। इधर से रास्ते में आये तो एक हाथी सनका हुआ था, पिलवान् चिल्ला रहा था कि भागो, भागो हाथी सनका हुआ है भागो। एक दोस्त कहता है अरे दोस्त ! भागो, भागो हाथी सनका है, वो पिलवान् हल्ला कर रहा है, हाथी सनका है भागो। वो दूसरा बोलता है-हैं ! अभी ज्ञान लेकर आ रहा है गुरुजी से कि मेरे में ब्रह्म, तेरे में ब्रह्म, हाथी में भी ब्रह्म सबमें ब्रह्म ही ब्रह्म तो मुझ ब्रह्म को हाथी ब्रह्म क्या करेगा? दोस्त बार-बार कहा कि ऐ कहा कि नहीं मैं नहीं भागूंगा। मैं भी ब्रह्म, हाथी भी ब्रह्म, ब्रह्म, ब्रह्म को क्या करेगा? हाथी बेचारा आया और इनको फाड़ दिया। उठाकर टांग खींचकर फाड़ दिया। अब बेचारा दोस्त जो बचा था, भागे-भागे गुरुजी के पास आया कहा कि गुरुजी आपने मेरे दोस्त को मरवा दिया। पूछा मैंने कैसे मरवा दिया? तो कहा कि आपने ऐसा ब्रह्मज्ञान दिया कि ऐसा-ऐसा हुआ। वो तो ब्रह्मज्ञान में लीन हो गया और जब हाथी सनका हुआ आ रहा था। पिलवान् चिल्ला रहा था भागो-भागो हाथी सनका है। मैंने भी कहा भागो सनका हाथी आ रहा है। कहा कि मेरे में ब्रह्म, हाथी में ब्रह्म ये सब ब्रह्म ही ब्रह्म है तो मुझ ब्रह्म को हाथी ब्रह्म क्या करेगा? और हाथी आया फाड़ दिया। आपने तो मरवा दिया मेरे दोस्त को। तो कहे कि अरे भाई ! थोड़ा समझने का कोशिश करो। जब यह दोस्त तेरा ब्रह्म था। यानी पिलवान् ब्रह्म की बात काटा। दोस्त ब्रह्म की बात काटा तो जब दो-दो ब्रह्म की बात काटा तो तीसरा ब्रह्म दंडित करेगा न। इसलिये हाथी ब्रह्म फाड़ दिया। इसमें मेरा क्या दोष है? यानी वो ब्रह्म सबमें देख रहा है तो पिलवान् ब्रह्म की बात उसको माननी चाहिए थी। मित्र ब्रह्म की भी भइया! ऐसा ही है अभय के नाम पर कहीं जाकर के आग में मत कूद जाइयेगा कि हम अभय हो गये हैं नहीं तो अगिया (आग) नहीं समझेगी कि अभय हो गये हैं। हाँ, यदि भगवद्मय आपने यदि अपने को ईमान से कर दिये हैं तो सत्य में यदि कोई आपको आग में डालेगा तो शायद भगवान् आपकी रक्षा करेगा। नहीं जलेंगे। प्रहलाद का रिकार्ड भी है। बोलिये परमप्रभु प्रभु परमेश्वर की जय sss। परिस्थिति आयेगी रक्षा हो जायेगा।
४२८. जिज्ञासु:- इसमें गीता में कहा गया है कि जीव जो है पुराने शरीर को छोड़कर नये शरीर में प्रवेश लेता है तो बच्चे कैसे मर जाते हैं? यही हम जानना चाहते हैं।
सन्त ज्ञानेश्वर जी:- बोलो परमप्रभु परमेश्वर की जय sss। मैं दिखाता हूँ ऐसा। मैं दिखाता हूँ ऐसा कि जीव जो है जब चाहे शरीर को उतार कर रख दे और जब चाहे शरीर धारण कर ले। ये व्यास की पचड़ी है, पचखी है। भगवान् कृष्ण उस ज्ञान वाले नहीं थे, बूढ़ा ही शरीर जो है यानी वस्त्र बदलेगा, नया नहीं। ये व्यास ने घुसेड़ दिया है। भगवान् कृष्ण जी का तत्त्वज्ञान ऐसा नहीं था। वो तो ऐसा है वह जब ज्ञान देंगे तो ज्ञान प्राप्त कर्ता जब चाहे तब शरीर को वस्त्र जैसे उतार कर रख दे और जब चाहे तब शरीर को धारण कर ले। ठीक वस्त्र जैसे। ये तो मैं दिखाता हूँ। जैसे दो तारीख को इसको दिखाऊँगा और देखेंगे, जब चाहे तब उतार दे। जब चाहे तब धारण कर लें। तो भगवान् कृष्ण ऐसा दिखाये थे। व्यास ने उसको समझा नहीं तो वो नया-पुराना से जोड़ दिया। ये बात है। बोलो परमप्रभु परमेश्वर की जय sss।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गह्णाति नरोsपराणि ।
ये नवानि और जीर्णानि शब्द व्यास का है। भगवान कृष्ण का नहीं है।