Sadanand TV - सदानन्द टेलीविज़न

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Sadanand TV - सदानन्द टेलीविज़न TV Programs of Satsang Speech by Sant Gyaneshwar Swami sadanand Ji Paramhans.

 #अद्भुत_शंका_समाधान४२६. जिज्ञासु:- मैं प्रवचन् से श्रीमान् जी का पैतीस या तीस साल पहले वर्मा में सुना था, महामंडलेश्वर ...
09/08/2024

#अद्भुत_शंका_समाधान

४२६. जिज्ञासु:- मैं प्रवचन् से श्रीमान् जी का पैतीस या तीस साल पहले वर्मा में सुना था, महामंडलेश्वर के नाम से। सदानन्द जी महाराज थे और आपका भाषण हमें इतना जंचा कि गीता का मैं अनुयायी हो गया। यहाँ तक कि आपके स्वर में आप थे या नहीं। आपने कहा था कि सोलहवां अध्याय का पहला श्लोक का ही अगर स्मरण मनुष्य कर ले तो वो किसी से डरेगा नहीं। उस पर यहाँ तक कि भयानक जानवर या भयानक अस्त्र-शस्त्र भी उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। तभी से मैं 10 साल से आ रहा हूँ। मैं आज तक कुछ भी कहने का मौका नहीं मिला और मैं उस महामंडलेश्वर स्वामी सदानन्द महाराज को अपने ह्रदय में धारण किया हुआ हूँ और मैं समझता हूँ कि वही ज्ञानेश्वर होकर के आप हैं। इसलिए मैं आपको नमस्कार करता हूँ। कम से कम ये बताने का कृपा करें।

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- बोलिए परमप्रभु परमेश्वर की जय sss। जरा गीता लाना जी। बोलना तभी सत्य है जब वो व्यवहार में सही हो। कथनी और करनी दोनों जब तक होती हैं तब उसे सत्य कहते हैं। कथनी और करनी जब दोनों में टकराव होता है तो या तो कथनी झूठी होगी या जो व्यवहार है वो गलत होगा। कथनी और करनी तो वो महामंडलेश्वर पहले तो वो यह नहीं है। वो करपात्री के महामंडलेश्वर नहीं हैं। वो करपात्री के शिष्य थे, यह स्वर्गाश्रम जो है उसी में वो रहते हैं। ऋषिकेश आश्रम में। महात्मा सदानन्द के नाम से प्रचलित है। तो करपात्री के शिष्य है। वो क्या जाने परमात्मा के विषय में। वो क्या जाने? वो तो इतना डरपोक हैं सब। वो हैं वहीं उसके सामने कुत्ता दौड़ा दीजिये तो भागने लगेगा। बड़े जन्तु-जानवर की बात छोड़ दीजिये। बोलने के लिए तो कुछ भी बोला जायेगा। बोलने के लिए तो कुछ भी बोला जायेगा। मंच पर हैं तो कोई बाघ-शेर थोड़े आ रहा है कि उनको प्रेक्टिकल होगा कि वो भय खाते हैं कि नहीं, भयभीत होते है कि नहीं। कुल मिलाकर के गीता में भगवान् श्री कृष्ण के प्राप्ति वाला प्रकरण से मतलब रखना चाहिये। क्योंकि जब तक भगवत् प्राप्ति नहीं होती, भगवद् ज्ञान नहीं मिलेगा, संसार में असत्य क्या है और सत्य क्या है? ये जाना ही नहीं जा सकता। भगवद्ज्ञान के बगैर, तत्त्वज्ञान के बगैर इस संसार में झूठ क्या है और सत्य क्या है? जाना ही नहीं जा सकता। त्याज्य, ग्राह्य कैसे विधान लागू होगा? कर्तव्य मेरा क्या है? कैसे जानेंगे? जब तक असत्य और सत्य, झूठ और साँच दोनों को स्पष्टतः जानेंगे देखेंगे नहीं, तब तक किस आधार पर अपने कर्तव्य का निर्धारण करेंगे? हम शरीर हैं कि हम जीव हैं कि हम आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म-शिव हैं कि हम परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्म-खुदा-गॉड-भगवान् हैं? जब तक हम ये जानेंगे नहीं, तब तक हम अपने कर्त्तव्य का निर्धारण कैसे कर लेंगे?
हम शरीर होगा तो इसका कर्त्तव्य कुछ और होगा। हम जीव होगा तो इसका कर्त्तव्य-मंजिल कुछ और होगा। हम आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म-शिव होगा तो इसका कर्त्तव्य-मंजिल कुछ और होगा। हम परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्म-खुदा-गॉड-भगवान् होगा तो इसका कर्त्तव्य कुछ और होगा। जब तक ये पता ही नहीं चलेगा कि इन चार में से ‘हम’ कौन है?शरीर है कि जीव है कि आत्मा है कि परमात्मा है, शरीर है कि जीव है कि ईश्वर है कि परमेश्वर है, शरीर है कि जीव है कि ब्रह्म है कि परमब्रह्म है, शरीर है कि जीव है कि शिव है कि भगवान् है, बॉडी है कि सेल्फ है कि सोल है कि गॉड है, जिस्म है कि रूह है कि नूर है कि अल्लातआला है। यानी शरीर है कि अहं है कि हंस है कि परमतत्त्वम् है। जब तक इन चारों को हम अलग-अलग जानेंगे नहीं, अलग-अलग देखेंगे नहीं, अलग-अलग परिचय-पहचान नहीं करेंगे, तब तक हम इसमें से कैसे कहेंगे कि हम कौन है? क्या है? और जब ‘हम’ हम ही को नहीं जानेंगे। अपने अस्तित्त्व पद का पता ही नहीं होगा तो हम अपना कर्त्तव्य कैसे जान लेंगे। क्योंकि कर्त्तव्य तो अस्तित्त्व पद के अनुसार तय होता है। कर्त्तव्य तो पद अथवा अस्तित्त्व के अनुसार तय होता है। जब हमको अपने अस्तित्त्व पद का पता ही नहीं चलेगा तो हम कौन सा व्यवहार देंगे? औरत की शरीर एक होती है। एक ही जैसे होती है। कोई लड़की कहलाती है तो कोई बहन कहलाती है तो कोई पत्नी कहलाती है तो कोई माँ कहलाती है। हम जानेंगे ही नहीं कि उस औरत से मेरा सम्बन्ध क्या है? लड़की का है कि बहन का है कि पत्नी का है कि माता का है, हम उसके साथ कौन सा व्यवहार अदा करेंगे? कौन सा व्यवहार हम उसके साथ करेंगे? जब तक हम वास्तविक पद को नहीं जानेंगे, कर्त्तव्य का निर्धारण ही नहीं हो पायेगा। हम अपने कर्त्तव्य करेंगे कैसे? और वही जिम्मेदारी फट से पढ़ा-लिखा है अच्छा। कहता है भाई ! हाँ, परिवार भी तो जिम्मेदारी है निभाना। रे मूर्ख कहीं के ! जिम्मेदारी का अर्थ भी मालूम भी है कि खाली बोल देना है। अपने अस्तित्त्व के अनुसार कर्त्तव्य का निर्धारण होता है और ईमान से कर्त्तव्य के पालन को ही दायित्व कहते हैं, जिम्मेदारी कहते हैं। ईमान से ही अपने कर्त्तव्य के पालन को ही जिम्मेदारी दायित्व कहते हैं। कर्त्तव्य को, अस्तित्त्व का पता नहीं तो कर्त्तव्य कहाँ से आ जायेगा? और अस्तित्त्व कर्त्तव्य है ही नहीं तो जिम्मेदारी कहाँ से आ गयी? दायित्व कहाँ से आ गया? दायित्व होता है जिम्मेदारी निभाने का नाम। यानी दायित्व होता है जिम्मेदारी होती है कर्त्तव्य निभाने का नाम। कर्त्तव्य निर्धारित होता है अस्तित्व अथवा कर्त्तव्य के द्वारा। जब तक हम अस्तित्व नहीं जानेंगे कर्त्तव्य का ही पता नहीं चलेगा। जिम्मेदारी कहाँ से आ जायेगी? तो इस तरह से जो है तत्त्वज्ञान के लिये। ध्यान में होने की स्थिति। तत्त्वज्ञान वाला हो जायेगा तो भगवान् का रहेगा कि ब्रह्माण्ड में किसी और का रहेगा? तत्त्वज्ञान वाला भगवान् वाला होता है। उसका कौन क्या बिगाड़ लेगा? इसमें भी तत्त्वज्ञान ही है।

४२७. जिज्ञासु:- इससे अभय हो जाता है। मनुष्य उसके जान पर अभय हो जाता है।

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- जब तत्त्वज्ञान वाला होगा तो संसार में अभय नहीं हो जायेगा तो क्या होगा? जब जन्म-मृत्यु उसका खतम हो जायेगा। भगवान् के शरण में है जन्म-मृत्यु खतम हो जायेगा, अमरत्व को प्राप्त हो जायेगा तो डरेगा किससे? अगर भगवान् का भय न हो। शरणागत के, तत्त्वज्ञान के विधान का भय न हो तो वो जो है सब लोगों को अकेले ठीक कर देगा। बानर हनुमान ठीक किया था, भगवान् के शरण के बल पर। तो वो तो तत्त्वज्ञान वाला को ऐसा होता ही है। ये कौन कहता है कि तत्त्वज्ञान वाला किसी से डरेगा? उसका भय भगवान् से होता है केवल और सत्य विधान से होता है। वो किसी देवी-देवता, भूत-प्रेत किसी और से नहीं डरता। लेकिन जादूगरी चमत्कार भी नहीं करता है। अब तत्त्वज्ञान पाये और चेलवन के तरह से आप कहिये कि मैं तो तत्त्वज्ञान पाया हूँ।
दो चेला थे। किसी गुरुजी के यहाँ से ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके आ रहे थे। गुरुजी पढ़ा दिये कि चेला तेरे में भी भगवान् ब्रह्म, मेरे में भी ब्रह्म, हाथी में भी ब्रह्म, घोड़े में भी ब्रह्म, गाय में भी ब्रह्म, सुअर में भी ब्रह्म, सारे कण-कण में भी ब्रह्म। हम सभी ब्रह्म वाले हैं। सब ब्रह्म ही ब्रह्म हैं। ऐसा ज्ञान लेकर के दोनों चेला बेचारे आये। इधर से रास्ते में आये तो एक हाथी सनका हुआ था, पिलवान् चिल्ला रहा था कि भागो, भागो हाथी सनका हुआ है भागो। एक दोस्त कहता है अरे दोस्त ! भागो, भागो हाथी सनका है, वो पिलवान् हल्ला कर रहा है, हाथी सनका है भागो। वो दूसरा बोलता है-हैं ! अभी ज्ञान लेकर आ रहा है गुरुजी से कि मेरे में ब्रह्म, तेरे में ब्रह्म, हाथी में भी ब्रह्म सबमें ब्रह्म ही ब्रह्म तो मुझ ब्रह्म को हाथी ब्रह्म क्या करेगा? दोस्त बार-बार कहा कि ऐ कहा कि नहीं मैं नहीं भागूंगा। मैं भी ब्रह्म, हाथी भी ब्रह्म, ब्रह्म, ब्रह्म को क्या करेगा? हाथी बेचारा आया और इनको फाड़ दिया। उठाकर टांग खींचकर फाड़ दिया। अब बेचारा दोस्त जो बचा था, भागे-भागे गुरुजी के पास आया कहा कि गुरुजी आपने मेरे दोस्त को मरवा दिया। पूछा मैंने कैसे मरवा दिया? तो कहा कि आपने ऐसा ब्रह्मज्ञान दिया कि ऐसा-ऐसा हुआ। वो तो ब्रह्मज्ञान में लीन हो गया और जब हाथी सनका हुआ आ रहा था। पिलवान् चिल्ला रहा था भागो-भागो हाथी सनका है। मैंने भी कहा भागो सनका हाथी आ रहा है। कहा कि मेरे में ब्रह्म, हाथी में ब्रह्म ये सब ब्रह्म ही ब्रह्म है तो मुझ ब्रह्म को हाथी ब्रह्म क्या करेगा? और हाथी आया फाड़ दिया। आपने तो मरवा दिया मेरे दोस्त को। तो कहे कि अरे भाई ! थोड़ा समझने का कोशिश करो। जब यह दोस्त तेरा ब्रह्म था। यानी पिलवान् ब्रह्म की बात काटा। दोस्त ब्रह्म की बात काटा तो जब दो-दो ब्रह्म की बात काटा तो तीसरा ब्रह्म दंडित करेगा न। इसलिये हाथी ब्रह्म फाड़ दिया। इसमें मेरा क्या दोष है? यानी वो ब्रह्म सबमें देख रहा है तो पिलवान् ब्रह्म की बात उसको माननी चाहिए थी। मित्र ब्रह्म की भी भइया! ऐसा ही है अभय के नाम पर कहीं जाकर के आग में मत कूद जाइयेगा कि हम अभय हो गये हैं नहीं तो अगिया (आग) नहीं समझेगी कि अभय हो गये हैं। हाँ, यदि भगवद्मय आपने यदि अपने को ईमान से कर दिये हैं तो सत्य में यदि कोई आपको आग में डालेगा तो शायद भगवान् आपकी रक्षा करेगा। नहीं जलेंगे। प्रहलाद का रिकार्ड भी है। बोलिये परमप्रभु प्रभु परमेश्वर की जय sss। परिस्थिति आयेगी रक्षा हो जायेगा।

४२८. जिज्ञासु:- इसमें गीता में कहा गया है कि जीव जो है पुराने शरीर को छोड़कर नये शरीर में प्रवेश लेता है तो बच्चे कैसे मर जाते हैं? यही हम जानना चाहते हैं।

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- बोलो परमप्रभु परमेश्वर की जय sss। मैं दिखाता हूँ ऐसा। मैं दिखाता हूँ ऐसा कि जीव जो है जब चाहे शरीर को उतार कर रख दे और जब चाहे शरीर धारण कर ले। ये व्यास की पचड़ी है, पचखी है। भगवान् कृष्ण उस ज्ञान वाले नहीं थे, बूढ़ा ही शरीर जो है यानी वस्त्र बदलेगा, नया नहीं। ये व्यास ने घुसेड़ दिया है। भगवान् कृष्ण जी का तत्त्वज्ञान ऐसा नहीं था। वो तो ऐसा है वह जब ज्ञान देंगे तो ज्ञान प्राप्त कर्ता जब चाहे तब शरीर को वस्त्र जैसे उतार कर रख दे और जब चाहे तब शरीर को धारण कर ले। ठीक वस्त्र जैसे। ये तो मैं दिखाता हूँ। जैसे दो तारीख को इसको दिखाऊँगा और देखेंगे, जब चाहे तब उतार दे। जब चाहे तब धारण कर लें। तो भगवान् कृष्ण ऐसा दिखाये थे। व्यास ने उसको समझा नहीं तो वो नया-पुराना से जोड़ दिया। ये बात है। बोलो परमप्रभु परमेश्वर की जय sss।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गह्णाति नरोsपराणि ।
ये नवानि और जीर्णानि शब्द व्यास का है। भगवान कृष्ण का नहीं है।

 #दुर्लभ_शंका_समाधान ४१२. जिज्ञासु:- गुरुजी का प्रवचन मैंने जो आज सुना है इस तरह का प्रवचन तो लगता है, मैं पहली बार सुन ...
07/08/2024

#दुर्लभ_शंका_समाधान
४१२. जिज्ञासु:- गुरुजी का प्रवचन मैंने जो आज सुना है इस तरह का प्रवचन तो लगता है, मैं पहली बार सुन रहा हूँ, बहुत ही मैं प्रभावित हुआ हूँ। इसलिए मैं पूछने का ये दु:साहस भी किया है। ध्यान केंद्रित करने का कुछ उपाय अपने प्रवचन में बतावें तो बड़ी कृपा होगी।

संत ज्ञानेश्वर जी:- बोलिए परमप्रभु परमेश्वर की जय sss। ऐसा है तत्त्वज्ञान एक सम्पूर्ण जीवन विधान है। इसलिए चार क्षेत्र है कुल संसार। संसार और शरीर के बीच का शरीर प्रधान। शरीर और जीव के क्षेत्र का जीव प्रधान। जीव और आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म-शिव के बीच आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म-शिव प्रधान। आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म-शिव और परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्म-खुदा-गॉड-भगवान् के बीच का परमात्मा-परमेश्वर प्रधान, विधान। चार हुआ। चार क्षेत्र है। इन चार क्षेत्रों के नाम, रूप, स्थान, गुण, कर्म, प्रभाव कार्य का विधान, देखने की आँखें, प्राप्त होने वाली उपलबद्धियाँ सब अलग-अलग हैं, यहाँ तक की हम लोग जो शब्द उच्चारण करते हैं वो भी उन चारों क्षेत्रों के अलग-अलग हैं। जो नाजानकार है, वो इसमें खिचड़ी और ताल-मेल बनाते हैं लेकिन जो जानकार हैं, शरीर और संसार और शरीर के बीच शरीर प्रधान जो विधान है उसके शब्द भी अलग है। उसके जानने के विधान भी अलग है। उसमें रहने-चलने के विधान कर्तव्य भी अलग है। उसमें पाने के उपलब्धियाँ भी अलग है। शरीर और जीव प्रधान जो क्षेत्र है, उसके भी अपने शब्द अलग हैं। उसके भी अपने जानने की पद्धति अलग है, देखने की आँखें अलग हैं, पाने की उपलब्धियाँ, सब अलग-अलग होती हैं, ये चारों विधान।
तो संसार और शरीर के बीच का शरीर प्रधान जो विधान है इसको जानने के लिए शिक्षा है एजुकेशन, जानने का जो विधान है वो शिक्षा है, एजुकेशन है। देखने के लिए शिक्षा दृष्टि है। अखबार में सब समाचार देश-दुनिया का निकल रहा है। जो शिक्षित नहीं है वो सामने देखते हुये भी नहीं देख पायेगा। उसके लिए ये सटी हुई चीटियों का फोटो है अखबार। सटी हुई चीटी-चीटा का फोटो है अखबार। लेकिन जिसके पास शिक्षा दृष्टि है, वो अखबार देख कर के देश-दुनिया के समाचार को देख लेता है, जान लेता है। इसी प्रकार से ये शिक्षा दृष्टि ये शिक्षा जानने का माध्यम, शिक्षा दृष्टि, संसार जानने-समझने का माध्यम और सांसारिकता में करने पाने का माध्यम। अब रही शरीर तो शरीर प्रधान है। इसमें शिक्षा दृष्टि और स्थूल दृष्टि संयुक्त रूप में काम करते हैं। क्योंकि शरीर और संसार दोनों स्थूल क्षेत्र के हैं। तो इसको जानने के लिए शिक्षा है, देखने के लिए शिक्षा और स्थूल दृष्टियाँ हैं, स्थूल दृष्टियाँ हैं। पाने के लिए कर्म और भोग। कर्म करो, भोग भोगो। कर्म करो, भोग भोगो। यही इनके व्यवहार है।
जब आप शरीर और जीव के क्षेत्र में अपने को स्थित-स्थापित करेंगे, जीव प्रधान जीवन जीने का जीव-रूह-सेल्फ-अहं ये नाम, इसके नामकरण है। तो जब इसके प्रधान में जब आप ले चलेंगे, तब इनकी जानकारी के लिए मनमाना नहीं है। जीव की जानकारी प्राप्त करनी होगी तो शिक्षा से प्राप्त नहीं हो सकती। एक जन्म नहीं लाखों जन्म धारण कीजिये और शोध पी॰एच॰डी॰ करते रहिए, आप जीव नहीं जान पायेंगे, डाक्टरी, इंजिनियरिंग करते रहिए आप जीव नहीं जान पायेंगे। जीव जानना होगा तो आपको स्वाध्याय, सेल्फरेलिजेशन से गुजरना होगा। जैसे संसार शरीर जानने के लिए शिक्षा एजुकेशन है, वैसी ही जीव से सम्बंधित जीव जगत् जानने-देखने के लिए आपको स्वाध्याय की जरूरत पड़ेगी। स्वाध्याय में तीन चरण, स्वाध्याय में तीन चरण। श्रवण यानी कोई भी अपने आप स्वाध्याय नहीं कर सकता, जानता ही नहीं करेगा कैसे? पहले किसी जीव के जानकार से जीव की जानकारियाँ सुननी होंगी, श्रवण। पहला चरण है श्रवण यानी जो जीव का जानकार है। उसको जीव से सम्बंधित जानकारियाँ पहले सुननी होंगी। जब सुनेंगे तब आप स्वयं जीव हैं, आप मनन कीजिये, चिंतन कीजिये, जो सुन रहे हैं आप उसका मनन-चिंतन कीजिये, मनन-चिंतन आपको आभास करा देगा कि आप जो सुन रहे हैं वो सही है कि नहीं। क्यों? आभास करा देगा कि आप स्वयं जीव तो है ही हैं। ये ‘हम’ जीव ही तो हैं। तो ‘हम’ जीव जब ‘हम’ जीव के विषय में सुनेगा तो आभास होने लगेगा कि इसकी जानकारी गलत आ रही है कि सही आ रही है। इसको कहते हैं मनन-चिन्तन। श्रवण पहला चरण। मनन-चिन्तन दूसरा चरण और निदिध्यासन। निदिध्यासन वह स्थित है जिसमे शरीर और जीव दोनों अलग-अलग आमने-सामने खड़े होते हैं। आपको सूक्ष्म दृष्टि से जाकर के उसमें दोनों को अलग-अलग जानना-पहचानना होता है। तो जो श्रवण सुने हैं, जो मनन-चिन्तन के माध्यम से आभासित किए हैं। उसी को स्पष्ट होने के लिए ये निदिध्यासन है। स्पष्ट होने के लिए कि हमें जो आभास हो रहा है, अब मैं उसे देख रहा हूँ, देखते हुये स्पष्ट हो रहा हूँ कि ‘हम’ जो है एक सूक्ष्म आकृति है और वो ‘हम’ है ये शरीर ‘हम’ नहीं है। ये शरीर तो हमारा एक वस्त्र है, हमारी एक गाड़ी है, हमारा एक घर है। गौर कर रहे हैं कि नहीं कर रहे हैं। तो ये श्रवण, मनन-चिन्तन और निदिध्यासन। तीनों संयुक्त रूप में कहलाता है स्वाध्याय (सेल्फरेलाइजेशन)।
ये सांसारिकता क्या है? शरीर से, शरीर के लिए, शरीर तक, इन्द्रियों से, इन्द्रियों के लिए, इन्द्रियों तक। सांसारिकता है परिवारिकता है। शारीरिकता है। आप द सेल्फ, बाई द सेल्फ एण्ड फॉर द सेल्फ। Of the Self, by the Self and for the Self. जीव से, जीव के लिए, जीव के द्वारा, जीव तक। जो सारी स्थितियाँ है, वो है स्वाध्याय (सेल्फ रेलाइजेशन)। सेल्फ यानी सेल्फ यानी जीव। तो सेल्फ जीव को जानना है, जीव के द्वारा जानना है, जीव के द्वारा देखना है और अन्ततः जीव मय अभ्यास में लग जाना है। ये होता है स्वाध्याय (सेल्फ रेलाइजेशन)। जीव देखने की आँख है सूक्ष्म दृष्टि और उसकी अनुभूति है आनन्द। स्वरूपानन्द, आनन्द, स्वरूपानन्द। ये जीव के अनुभूतियाँ उपलब्धि है। और एक श्रेणी जब ऊपर उठेंगे जीव जब शरीरमय बहिर्मुखी इन्द्रियों से, सब इन्द्रियों को बन्द करके बहिर्मुखी होने के बजाय जब अंतर्मुखी होकर के बाहरी संसार-परिवार के तरफ जाने-देखने के बजाय, जब आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म-शिव की तरफ चलने लगता है तो इस प्रक्रिया का नाम है योग, अध्यात्म, आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान, आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान, योग, अध्यात्म माने ‘अधी’ उपसर्ग है ‘आत्म’ शब्द है। जीव जब इन्द्रियों के माध्यम से पारिवारिकता में न जाने के बगैर जीव जब इन्द्रियों को बन्द करके आन्तरिक रास्ते से जब आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म-शिव से मिलने चलता है तो इस मिलन की प्रक्रिया का नाम है योग। योग, इस योग में पहले जानकारियाँ है। आठ चरण है इसमें। यम, नियम, आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। आठ अंग हैं। बोलिए परमप्रभु परमेश्वर की जय।
सीधे ध्यान के विषय में मैं बताने लगूँ, तो भ्रम हो जायेगा क्यों? प्रत्याहार के बगैर धारणा बनेगी ही नहीं। पाँचवा स्टेप है प्रत्याहार। पाँचवाँ सीड़ी है प्रत्याहार। पाँचवा मंजिल है प्रत्याहार। पाँचवा मंजिल बनायेंगे नहीं तो छठवाँ आयेगा ही नहीं। छठवाँ कैसे बनायेंगे और पाँचवा-छठवाँ रहेगा नहीं तो सातवाँ मंजिल किस पर बनायेंगे। प्रत्याहार के बगैर धारणा बनेगी नहीं। प्रत्याहार माने इन्द्रियों का अपने विषयों से विमुख हो जाना। तो जब इन्द्रियाँ अपने विषयों से विमुख हो जायेंगी तो परिवार रह ही कहाँ जायेगा। परिवार तो इन्द्रियों से है। परिवार तो इन्द्रियों के लिए है। परिवार तो इन्द्रियों जनित विषयों के लिए है। जब इन्द्रिय अपने विषयों में रह ही नहीं जायेगी तब परिवार माने क्या? परिवार रह ही नहीं जायेगा। परिवार रहेगा तो प्रत्याहार नहीं। प्रत्याहार होगा तो परिवार नहीं और जब परिवार में रहेंगे तो प्रत्याहार ही नहीं हुआ। तो धारणा कहाँ सेट करेंगे। परिवार में माताजी हैं, पिताजी हैं, पत्नी जी हैं, पतिदेव जी हैं यानी पुत्रजी हैं, पुत्रीजी हैं, भाईसाहब हैं, बहनजी हैं, नाना तरह के लोग है। इन नानात्व में एकत्व कैसे पाना चाहते हैं? परिवार माने नानात्व, अनेकत्व और धारणा माने एकत्व एक। सैटलाइट होना, कन्संट्रेट होना। जब आप इन इन्द्रियों में रहेंगे। इन्द्रियों माने दस। मन, बुद्धि दो संचालन के लिए तो बारह। बारह के बीच बैठकर के आप कन्संट्रेशन में, सैटलेशन में कैसे पहुँचेंगे? कैसे आप कन्संट्रेशन होंगे? कैसे आप एकीकत्व होंगे? सेटेलाइट कैसे होंगे। केन्द्रित कैसे होंगे। बारह इंद्रियाँ, मन, बुद्धि तो आपके साथ है। एक बार बनारस में कार्यक्रम चल रहा था। 42 लाउड स्पीकर लगे थे तो बी॰एच॰यू॰ के हेड आफ द डिपार्टमेंट, धर्म विभाग के थे उनके बंगले के सामने भी एक माईक लगा हुआ था। अब अपने बंगले में बैठकर के बड़े इत्मीनान से सत्संग सुनते थे। पहले दिन सुने, दूसरे दिन सुने, तीसरे दिन अपने को रोक नहीं पाये। पहुँच गये अस्सी क्षेत्र में जो पञ्च मंदिर है दुर्गा मंदिर के पूरब वही कार्यक्रम चल रहा था, वहाँ वो पहुँच गये। वहाँ सत्संग सुनने के बाद वो अपने को रोक नहीं पाये। तो फिर आए हम जहाँ ठहरे थे, न्यू कालोनी में। वहाँ कहने लगे कि हमको दो मिनट समय दो और फिर बातें हुई तो कहे कि हम एकांत में मिलना चाहते हैं, गुरुजी से। अब हमारे पास खबर आया एकांत में मिलने का। हम खबर भिजवाये कि अन्त में एक ही होता है, एकांत। याने अन्ततः जहाँ एक। ब्रह्माण्ड में हमने दो तो देखा ही नहीं।अन्ततः तो एक ही है भगवान्। अनादि है भगवान् अनन्त है भगवान् तो अन्ततः तो एक है ही है। तो दो चार है ही नहीं तो इसमें क्यों वो शंका करने लगे। अन्ततः तो हम एक है ही हैं। कहे कि ऐसा नहीं, ऐसा हम अकेले में मिलना चाहते हैं तो हम पूछे कि अकेले हम हो ही कैसे सकते हैं। ये हमारे पास पाँच ज्ञानेद्रियाँ हैं। पाँच कर्मेन्द्रियाँ है। मन है, बुद्धि है, अहंकार है, चित्त है तो दस चार चौदह गो तो सीधे बैठे हैं। इन चौदहों को रखकर के कैसे मिलूँ मैं उनसे। यही सचिव महोदय गये। गये तो महाराज जी तो कह रहे हैं कि चौदह गो तो हमारे सथवे हैं। हम अकेले कैसे मिलेंगे इन चौदहों को रखकर के, छोड़कर के। कहे कि नहीं, नहीं, नहीं, हम ऐसे नहीं कह रहे हैं, ये रखें कहे कि हमारे इर्द-गिर्द जो सेवक हैं, वो हमारे अंग-प्रत्यंग तो हैं, वो हमारे अंग प्रत्यंग तो हैं। हमारे इंद्रिय और ये मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार तो हैं। इनको छोड़कर मैं अकेले कैसे रहूँगा-चलूँगा? कहे ठीक है जिसको चाहे रख लें। कहने का मतलब ये है कि जहाँ अनेकता है उसमें यानी आप कुल संप्रेषण की बात करेंगे तो कैसे सम्भव है? जहाँ बहुत्व है वहाँ आप सेन्टरलाईज्ड होना चाहते हैं तो सेन्टरलाईज्ड तो किसी बिन्दु पर माना जायेगा जो एक होगा। दो ही बिन्दु हो जाता तो आप सेन्टरलाईज्ड किस पर होंगे। दो ही तीन बिन्दु हो तो आप किस बिन्दु पर केन्द्रित होंगे। दो ही तीन की संख्या हो, तो कहाँ अपने को कन्संट्रेट करेंगे। कहाँ अपने को सेटअप करेंगे, सुनिश्चित करेंगे? इसलिए परिवार तो प्रत्याहार नहीं और प्रत्याहार नहीं तो धारणा नहीं। ध्यान किसका आप करेंगे? धारणा के बगैर ध्यान होगा। इसलिए सीधे मैं ध्यान वर्णन नहीं करूँगा। जब मुझे वर्णन करना होगा तो थोड़ा-बहुत यम, नियम का संकेत करते हुये उसमे आसान, प्राणायाम का भी थोड़ा-बहुत अंश लेना होगा। लेकिन प्राणायाम और धारणा, प्राणायाम और धारणा दो अनिवार्य है योग के लिए। प्राणायाम और धारणा दो मिलकर के जाप होता है। जिसके माध्यम से ईश्वर को बुलाया जाता है। प्राणायाम और धारणा दो मिलकर के आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म-शिव को बुलाता है और तब उससे मिलना और देखना। ये काम दिव्य दृष्टि ध्यान कराता है। ये तो है।

४१३. जिज्ञासु:- हमने गुरुजी से पुछ करके काफी तसल्ली प्राप्त की है और जब तक रहेंगे प्रयाग में तसल्ली प्राप्त करते रहेंगे। गुरुदेव महाराज की जय हो।

03/08/2024
 #दुर्लभ_शंका_समाधान   ४१०. जिज्ञासु:- गुरुजी से हमें ये पूछना है कि आपने हमें पहले बताया था कि ज्ञान प्रभु की प्रेरणा स...
27/07/2024

#दुर्लभ_शंका_समाधान
४१०. जिज्ञासु:- गुरुजी से हमें ये पूछना है कि आपने हमें पहले बताया था कि ज्ञान प्रभु की प्रेरणा से मिलता है। हमें ये बातें अच्छी लगी हमने इसे स्वीकार किया और मैं ये सोचता हूँ कि कोई व्यक्ति पैदाइशी विद्वान तो होता तो नहीं है तो विद्वान लोगों से मिलने से, बातें करने से दुनिया को देखने-जाँचने-परखने से वो कुछ सीखता है। भगवान् अगर मन लगाने से वो कुछ ज्ञान प्राप्त करता है तो गुरुजी से मुझे ये पूछना है कि मन तो हमेशा भगवान् को सोचता है। अच्छा सोचता है, उसकी सोच अच्छी होती है, कुछ गलत नहीं सोच सकता और इन्सान का एक दिमाग होता है, मस्तिष्क होता है वो ये सोचता है कि हम जो करना चाहते हैं या फिर कर रहे हैं, वो कितना गलत है, कितना सही है। मैं यह स्पष्ट कराना चाहता हूँ कि हमसे कुछ गलतियाँ हो जाती है, हम नहीं करना चाहते हैं और बाद में पछताते हैं। तो वो कौन होता है जो हमसे गलतियाँ कराता है?

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- पहले ही आपने सही नहीं बोला। मैं प्रेरणा को महत्व कभी नहीं देता। प्रेरणा का महत्व तब होता है जब हम उसे जान-देख लेते हैं अथवा दूर रहते हैं। यहाँ तक सीधे ज्ञान की महत्ता है, सत्संग की महत्ता है। प्रेरणा से तत्त्वज्ञान मिलेगा, ऐसा नहीं है। सत्संग के माध्यम से शंका-समाधान द्वारा तत्त्वज्ञान मिलेगा। प्रेरणा से तत्त्वज्ञान नहीं मिलेगा। हाँ, प्रेरणा से आप यहाँ तक पहुँचे हैं। तत्त्वज्ञान प्रेरणा से नहीं मिलेगा। ये तो सत्संग, शंका-समाधान और तत्त्वज्ञान से मिलेगा। तत्त्वज्ञान जब भी मिलेगा सत्संग और शंका-समाधान के माध्यम से मिलेगा। भगवान् और मन-बुद्धि के विषय में आपको पता ही नहीं है। मन शैतान का प्रतिनिधित्व करता है, इस पिण्ड में, इस शरीर में। यही तो सब बुराई-विकृति कराता है। मन तो अच्छा कभी सोच ही नहीं सकता है। मन तो कभी अच्छा सोच ही नहीं सोचता क्योंकि शैतान का प्रतिनिधि है। ये तो हमेशा शैतानियत करायेगा आपसे। कुछ अन्दर है आपके जो अच्छी सोच लगती है। अच्छी सोचती है, वो मन नहीं है, वो बुद्धि है। जिसकी अच्छी सोच है, जो अच्छा कराती है, इंद्रियाँ नहीं, मन यदि हावी होगा इन्द्रियों पर तो बुराई विकृति ही करायेगा। झूठ, छल, कपट, चोरी, भ्रष्टता, व्यभिचार, चोरी, बेईमानी यही सब कराता है मन। इन्द्रियों से मन ही है जो ये सब कराता है बुराई-विकृति। बुद्धि है जो इन्द्रियों से अच्छाई कराती है। किसी का सहायता करना, ऐ कहेगी कि ऐ अभिमानी मत कर, पाप लगेगा। ऐ चोरी मत कर पाप लगेगा। ऐ गलत मत कर दोष लगेगा, पाप लगेगा तो ऐसा सोच जो है बुद्धि करती है। ये बुद्धि का है, मन का नहीं है। ये कार्य तो इन्द्रियों से अच्छाई कराने का है। बुराई-विकृति जब इंद्रियाँ सो, तो समझिये कि इन्द्रियों पर मन हावी हो गया। आप बुराई-विकृति रोक न सके, वो कर ही कराई ले इन्द्रियों के द्वारा, तब समझिये कि मन के द्वारा हो रहा है। यदि अच्छाई स्वीकृति हो रही है, भलाई यदि इंद्रियाँ कुछ करने में लगी हैं। अच्छा करने में लगी है तब समझिये कि इंद्रियाँ पर जो है इस समय मन नहीं, बल्कि बुद्धि जो है, इन्द्रियों से कर-करा रही है। जब परमेश्वर का सोच, परमेश्वर का विचार, परमेश्वर पाने का भाव आवे, तो समझिये कि आपका विवेक सोया हुआ है, वो आपको उत्प्रेरित कर रहा है कि भगवत् प्राप्ति का प्रयत्न कर। भगवान् जानने की कोशिश कर। भगवान् के शरण में रहने-चलने की कोशिश कर। यदि आपके अन्दर कुछ हो रहा हो, तो समझिये कि आपका जो विवेक है वो जग रहा है। वो उत्प्रेरित कर रहा है परमप्रभु से मिलने के लिए। क्यों? ये विवेक जो होता है वो परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है, देव देवता जो माया के प्रतिनिधि हैं और विवेक जो भगवान् का प्रतिनिधित्व करता है। ये सिस्टम है।
अब रही चीजें कि हटात्-बलात् नहीं चाहते हुये भी हो जाती है। नहीं चाहते हुये भी बुराई-विकृतियाँ हो जाती है तो इसका एक ही अर्थ है कि आपके इन्द्रियों पर मन हावी हो गया है। इसलिए बुद्धि आपकी मन हावी हो गया है, बुद्धि आपकी कमजोर है, मन आपका बलवान है। अव सवाल है कब मन बलवान होता है? कब बुद्धि बलवान होता है। जब आप दुष्ट दुर्जनों के साथ बैठना-उठना, बात-व्यवहार करेंगे तब मन बलवान हो जायेगा तब वह इन्द्रियों से गलत करवायेगा ही करवायेगा। जब आप सज्जनों के साथ उठना-बैठना शुरू करेंगे, जब सज्जनों से बात-व्यवहार शुरू करेंगे, दुर्जनों को दूर से ही त्याग देंगे, तब आपका मन कमजोर पड़ जायेगा। आपकी बुद्धि बलवान हो जायेगी। क्यों? ‘सन्त संसर्गे दोष-गुण भवन्ति’ संसर्ग से ही दोष-गुण आते हैं, संसर्ग से ही दोष-गुण जाते हैं। “सत्संगत कथा किन्नकरोति” जो कुसंग है वो किसको बर्बाद नहीं कर देता है? सत्संग जो है किसको महापुरुषत्व नहीं प्रदान कर-करा देता है? इसी को उर्दू अरबी में सोहबते अरबत जैसा आपका सोहबत होगा, जैसा आपका व्यवहार होगा उसका असर पड़ेगा आप पर। तो इसलिए यदि आप दुर्जन का साथ करेंगे तो नहीं चाहते हुये आपकी इंद्रियाँ बुराई-विकृति की ओर जायेगी ही जायेगी। आप दुर्जन को दूर से त्यागिये, सज्जनों के साथ उठना-बैठना शुरू कीजिये। बुद्धि बलवान हो जायेगी। फिर आपको बुराई-विकृति से बुद्धि रोक करके अच्छाई-भलाई करा लेगी। ये सिस्टम है इसका।

४११. जिज्ञासु:- मैं गुरुजी की बातों से काफी प्रभावित हुआ हूँ और मुझे कुछ सीख मिला जो भ्रांतियाँ थी वो समाप्त हो गई। बोलिए परम प्रभु परमेश्वर की जय।

२९४. जिज्ञासु:- हमको शंका यही है कि परमतत्त्वम् की प्राप्ति कैसे हो?सन्त ज्ञानेश्वर जी:- तत्त्वदर्शी सत्पुरुष से।२९५. जि...
26/07/2024

२९४. जिज्ञासु:- हमको शंका यही है कि परमतत्त्वम् की प्राप्ति कैसे हो?

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- तत्त्वदर्शी सत्पुरुष से।

२९५. जिज्ञासु:- तत्त्वदर्शी सत्पुरुषों के पास हम कैसे समझें कि तत्त्वदर्शी सत्पुरुष हैं?

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- तत्त्वदर्शी सत्पुरुष जो होगा वो भगवान् मिला देने, दिखा देने, परिचय-पहचान करा देने, मुक्ति-अमरता कृतार्थ होने का बोध करा देना ये सब वो कर लेता है, करा लेगा। आप अपने को समर्पित-शरणागत कर दीजिये, हो जाइये।

२९६. जिज्ञासु:- पूर्ण ब्रह्म परमात्मा का दर्शन हो जायेगा?

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- परमब्रह्म परमात्मा का नहीं तो और दूसर परमात्मा होता है क्या?

२९७. जिज्ञासु:- अवांग गोचर का होता है क्या?

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- उसी का। जो आप कह रहे हैं।

२९८. जिज्ञासु:- वैसे शंका हमारी यथावत है। आपसे प्रार्थना करना चाहते हैं-

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- जब यथावत है तो क्या प्रार्थना करेंगे? हम कह रहे हैं आपका शंका यथावत क्यों हैं? इसलिए कि आपको समर्पण करना नहीं है।

२९९. जिज्ञासु:- परमतत्त्वम् को तो हम जान नहीं पाये।

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- परमतत्त्वम् पाने आये हैं तो लौटकर के भाग लेने के लिए क्या? भाई किसी भी कार्य का एक विधान है। जल ही है तो उसका एक विधान है पीने का। ऐसा कोई चीज ब्रह्माण्ड में नहीं है जो बगैर विधान के प्राप्त हो। तो परमतत्त्वम् पाने का एक विधान है जो आपको बतला रहे हैं। उस विधान से गुजर कर के प्राप्त कर लीजिये। अब आप कहे कि हम आये हमको नहीं मिला, परन्तु हम आये और कुर्सी पर बैठे हमको परमतत्त्वम् नहीं मिला। मेरा शंका-समाधान नहीं हुआ।

३००. जिज्ञासु:- हम वेदान्त के पहले प्रश्न पर आ रहे हैं उसी पर हम चल रहे हैं कि जो घटाकाश है.......

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- वेदान्त माने क्या होता है?

३०१. जिज्ञासु:- वेदान्त जो वेद का है उसका अन्त हो जाता हो जाता है वहाँ पर उसकी वेदान्त परमतत्त्वम् को जो परमतत्त्वम् होता है, वो परमतत्त्वम् को सीमा को बतलाता है। वही तत्त्व बतला देता है वेदान्त।

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- वेदान्त आप बोलेंगे?

३०२. जिज्ञासु:- आप बोलिये।

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- तत्त्व हम दिखला रहे हैं, तत्त्व हम मिला रहे हैं तो बार-बार वेदान्त आप बोल रहे हैं। हम तो एक बार भी वेदान्त नहीं बोले।

३०३. जिज्ञासु:- नहीं तो हम तो प्रश्न वेदान्त से ही किये हैं।

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- सवाल है आप वेदान्त जानते ही कहाँ हैं? भइया ! आप जानने के लिए तो तैयार होइये। हम जना-मिला देंगे।

३०४. जिज्ञासु:- हमारी वेदान्त कहता है कि जैसे घटाकाश है..........

संत ज्ञानेश्वर जी:- अरे भाई ! वेदान्त पढ़ने के लिये पहले ज्ञान चाहिए। प्रज्ञाहीनस्य पठनं यथाअंधस्य च दर्पणम्। किसी ज्ञानहीन व्यक्ति का ग्रन्थ पढ़ना वैसा ही है जैसे अन्धे द्वारा दर्पण देखना। जब अंधा ही है तो दर्पण क्या देखेगा? भगवान् विष्णु की वाणी है। ज्ञानहीन पुरुष ग्रन्थ क्या जानेगा?

३०५. जिज्ञासु:- जब चक्षु नहीं होती तो हम वेदान्त से प्रश्न ही नहीं करते।

संत ज्ञानेश्वर जी:- हम अब भी कह रहे हैं कि चक्षु नहीं है। चक्षु रहता, चक्षु रहता तो दिख रहा होता। चक्षु रहता तो दिख रहा होता।

३०६. जिज्ञासु:- वेदान्त कहता है कि जिसे घटाकाश जो तत्त्व दर्शन कर लेता है वो स्वयं उसमें मिल जाता है।

संत ज्ञानेश्वर जी:- अरे भाई ! ऐसा ही होता है। तो तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करता है। परमतत्त्वम् आत्मतत्त्वम् अद्वैत्तत्त्वम् भगवत्तत्त्वम् जब प्राप्त होता है तो दिखलाई देता है कि जो दर्शन करता है, प्राप्त करता है, वह ब्रम्हाण्ड सहित उसी में प्रविष्ट रहता है। ये दिखाई देता है। जो भी दर्शन करता है अपने आप को उसमें प्रविष्ट हो जाता है। ऐसा दिखाई देता है।

३०७. जिज्ञासु:- यशोदा ने परमात्मा के मुख में देखा कि ब्रम्हाण्ड अपने मुख में दिखाया।

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- अब जिसे मिलेगा मुख में ही मिलेगा।

३०८. जिज्ञासु:- मुख में दिखाया भगवान ने।

सन्त ज्ञानेश्वर जी :- अरे भाई ! यहाँ भी मुख ही में मिलेगा देखने को।

३०९. जिज्ञासु:- इसके बाद उन्होने प्रार्थना किया कि हमारे माया को ख़त्म कर देना।

सन्त ज्ञानेश्वर जी :- यहाँ भी माया ख़त्म करने के लिये प्रार्थना लोग करते हैं, यहाँ यहाँ माया ख़त्म करके और भगवान के साथ कर दिया जाता है।

४०८. जिज्ञासु:- महाराज जी आपके अनुयायी लोग कहते हैं कि मेरे महाराज जी भगवान् का अवतार हैं। आप तो अवतारी पुरुष और भगवान् ...
24/07/2024

४०८. जिज्ञासु:- महाराज जी आपके अनुयायी लोग कहते हैं कि मेरे महाराज जी भगवान् का अवतार हैं। आप तो अवतारी पुरुष और भगवान् के भक्तों में अष्ट सिद्धियाँ भी रहती है और अंतर्यामी हैं तो ये आप जान सकते हैं कि कौन पापी है और कौन अन्यायी हैं तो पापी को आप विनाश खुद कर सकते हैं। सुदर्शन चक्र छोड़ सकते हैं, यदि किसी तरह नहीं मानता तो। पापी का विनाश आपको करना चाहिये तुरन्त। देर ही अंधेर का कारण है, इसीलिए पाप बढ़ते जा रहे हैं। जो पापी है उनकी छंटनी कर दीजिये।

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- बोलिए परम प्रभु परमेश्वर की जय। भगवान् के अवतार रामजी भी थे लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया। जब समय पर चलते रहे बीच में जो पड़ते रहे, हिसाब-किताब करते रहे। भगवान् के अवतार भगवान कृष्ण रहे। उनके साथ आगे-पीछे छः महीना पाँच महीना जन्मने वाले सारे लड़के मार-काट दिये गये। भगवान् कृष्ण ने किसी की रक्षा तक नहीं की। जब मार-काट करने वाले जब उनके पल्ले आये तो उनका हिसाब-किताब कर दिये। भगवान् भी एक बहाना खोजता है। मारल राम लगावल हिल्ला। भगवान् मारेगा लेकिन कोई हिल्ला लगाकर। ये अपराधी, पापी, कुकर्मी लोग जब भगवान् चल रहा है तो कौनो न कौन सटने अइबे करेंगे और यहाँ से जइबे करेंगे, वो हो रहा है।

४०९. जिज्ञासु:- अभी आप बोले हैं गृहस्थ जीवन में रहते हुये अगर कुछ परमात्मा की शक्ति मिल जाती है तो उसे घोर नर्क है तो क्या रामकृष्ण परमहंस पत्नी के साथ थे तो क्या घोर अन्याय है।

सन्त ज्ञानेश्वर जी:- रामकृष्ण परमहंस परमात्मा वाले थोड़े थे वो तो सोsहँ वाले थे रामकृष्ण वचनामृत से कहिए तो दिखला दूँ कि उनका सारा ज्ञान सोsहँ का है। एक अंशावतारी थे इसलिए उनको थोड़ा बहुत लाभ मिला। वो तो सोsहँ वाले थे, पतन विनाश वाले थे। वे सोsहँ का प्रक्रिया लागू किया थे। अंशावतारी नहीं होते तो उनका भी नाश हुआ होता, अंशावतारी भगवान् के दूत होते हैं, भेजे जाते हैं वापस ले लिये जाते हैं। कहाँ विवेकानन्द को कुछ मिला सके। विवेकानन्द छटपटाते रह गये, उनको ईश्वर झलक एक भी नहीं दिखा सके।

सच्चा सद्गुरु अपने शिष्यों को वेद का तीनों सूत्र का सैद्धान्तिक और प्रायौगिक ज्ञान देकर अपनी अस्तित्त्व, मार्ग और मंजिल ...
23/07/2024

सच्चा सद्गुरु अपने शिष्यों को वेद का तीनों सूत्र का सैद्धान्तिक और प्रायौगिक ज्ञान देकर अपनी अस्तित्त्व, मार्ग और मंजिल तीनों का स्पष्टतः बोध कराते हैं जैसे की-
(1) ‘असदोमासद्गमय’ (असत्य नहीं, सत्य की ओर चलें !)- जिसके अन्तर्गत कर्मप्रधान सांसारिक जीवन जीने वालों को पूर्ण गुरु या सद्गुरु सबसे पहले ‘जगन्मिथ्या’ अर्थात् यह जगत झूठा है-- को प्रायौगिक रूप से दिखाता है । यानी सद्गुरु वही है जो सबसे पहले अनुभव और बोध सहित शिष्यों को यह स्पष्टतः जना और दिखा दे कि संसार और शरीर दोनों ही बिल्कुल मिथ्या है । तर्क से सिद्ध करके नहीं स्पष्टतः प्रायौगिक विधान से शरीर में स्थित जीव को शरीर से बाहर निकल कर जाने की युक्ति बताकर और तद्नुसार शरीर के बाहर निकाल कर साक्षात् दिखाता है कि देख इस संसार के अस्तित्त्व के असलियत को कि यह क्या और कैसा है ?
(2) ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ (मोह-अन्धकार नहीं, दिव्य ज्योति की ओर चलें !)- सद्गुरु जड़ जगत रूप मोह अन्धकार से बहिर्मुखी इन्द्रियों को आभ्यान्तर मुखी बनाते हुये अर्थात् जीव को शरीर व संसार के ममता, मोह, आसक्ति रूपी पतन विनाश व अन्धकार से मोड़कर आत्मा-ईश्वर-ब्रम्ह-सोल-नूर-स्पिरिट-सः ज्योति शिव को दिव्य दृष्टि से दिखाते हुये उससे जोड़ देना सद्गुरु का दूसरा क्रियात्मक उपदेश होता है हालाँकि इस विधान से जीव को मुक्ति और अमरता की प्राप्ति नहीं हो पाती क्योंकि यह विधान से सिर्फ आत्मा-ईश्वर-ब्रम्ह की प्राप्ति होती है परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रम्ह की नहीं जो एकमेव एक मुक्ति-अमरताका दाता होता है । अतः मनुष्य जीवन के मुक्ति और अमरता रूप मोक्ष रूप चरम व परम उपलब्धि के प्राप्ति के लिये सद्गुरु अपने शिष्यों को तीसरे व अगले उपदेश के तरफ ले चलता है ।
(3) ‘मृत्योर्माऽमृतं गमय’ (मृत्यु नहीं, अमरता के ओर चलें ! ) - सच्चे गुरु की पहचान सच्चे ज्ञान (तत्त्वज्ञान) के आधार पर होती है और सच्चा ज्ञान वह है जिसमें झाँकने पर चार अक्षर वाला विराट पुरुष रूप भगवान सामने ही दिखाई देता हो। भगवान् के सच्चे होने को तब स्वीकारें, जब उसमें सम्पूर्ण को सम्पूर्णतया (सारी सृष्टि जिसमें ब्रम्हा, इन्द्र और शंकर आदि-आदि भी सम्मिलित हैं, की उत्पत्ति, स्थिति व लय-विलय भी ) साक्षात् देखते हुये आमने-सामने ही बात-चीत सहित उनका परिचय-पहचान प्राप्त होता हो तथा उनमें मुक्ति और अमरता का साक्षात् बोध भी मिले। यदि ऐसा नहीं तो वह सच्चा भगवान नहीं और जब वह सच्चा भगवान नहीं तो वह ज्ञान सच नहीं और जब वह ज्ञान ही सच नहीं तो वह ज्ञानदाता गुरु भला कैसे सच हो सकता है ! सच्चे गुरु से सच्चा ज्ञान और सच्चे ज्ञान में सच्चा भगवान तथा सच्चे भगवान् से मुक्ति-अमरता का साक्षात् बोध तत्क्षण प्राप्त होता है । सच्चे भगवान वाले ज्ञान को ही तत्त्वज्ञान कहते हैं और तत्त्वज्ञानदाता को ही सद्गुरु कहते हैं । यही तत्त्वज्ञान वर्तमान में पूरे भ-मण्डल पर ही एकमेव एकमात्र एक सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस से प्राप्त हुवा है, सब भगवत् कृपा ।

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