एक कदम सनातन संस्कृति की ओर

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एक कदम सनातन संस्कृति की ओर भारत पुनः विश्वगुरु हो यह संकल्प हमारा

13/04/2022
जैनों गांठ बांध लो।"""""""""""'""""""""""""""""🪢 _लड़कियों का विवाह 21 वें वर्ष और लड़के का विवाह 24 वें वर्ष में हर स्थ...
02/12/2021

जैनों गांठ बांध लो।
"""""""""""'""""""""""""""""
🪢 _लड़कियों का विवाह 21 वें वर्ष और लड़के का विवाह 24 वें वर्ष में हर स्थिति में हो जाना चाहिए।_
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🪢 _फ्लैट भूलकर मत लो जमीन खरीदो और उस पर मकान बनाओ वर्ना बच्चों का भविष्य पिंजरे के पंछी की तरह हो जाएगा।_
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🪢 _नयी युवा पीढ़ी को कम से कम तीन संतान पैदा करने के लिए प्रेरित करो।_
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🪢 _गांव से नाता जोड़ कर रखो।और गांव की पैतृक सम्पत्ति और वहां से नाता जोड़कर रखो।_
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🪢 _बच्चों को धर्म की शिक्षा अवश्य दो और उनके शारीरिक विकास पर ध्यान दो।_
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🪢 _हिंदी भाषा का अधिक से अधिक प्रयोग और प्रचार-प्रसार करो।_
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🪢 _घर में बागवानी करने की आदत डालो और यदि प्रयाप्त जगह है तो देशी गाय पालो।_
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🪢_हर घर अरिहंत की जीवनी और आगम की पुस्तकें होनी चाहिए जब होंगी तो पढ़ोगे भी।_
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🪢पर्युषण पर्व इत्यादि जितने भी जैन त्योहार आए उनमें सामूहिक साधना,सामायिक ,प्रतिक्रमण करें।_
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🪢 _अपने बच्चों को प्रत्येक वर्ष एक विद्या प्रदान करें।_
_जैसे संगीत विद्या-युद्ध विद्या-योग विद्या-तैराकी-भोजन बनाने की विद्या बच्चों को व्यस्त रखें।_
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🪢 _वर्ष में कम से कम दो पैदल तीर्थ अवश्य करें।_
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🪢 _प्रात: काल 5 बजे उठ जाएं और रात्रि को 9.30 बजे तक सोने का नियम बनाएं।_
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🪢 _यदि बच्चा पढ़ाई में असक्षम है तो उसको तकनीक ज्ञान दें।_
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🪢 _अगर शहर के निवासी हैं,आपके बच्चों को कम से कम तीन फोन नम्बर स्मरण होने चाहिए और आपको भी।_
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🪢 _जब भी बाहर जाएं तो बच्चों को भी ले जाएं इससे उनका मानसिक विकास होगा।_
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🪢 _परिवार के साथ मिल बैठकर भोजन करने का प्रयास करें और भोजन करते समय सेल फोन और टीवी बंद कर लें।_
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🪢 _बच्चों को बालिवुड की फिल्मों से बचाएं और प्रेरणादायक फिल्में दिखाएं।_
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🪢 _जंक फूड और फास्ट फूड से बचें।_
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🪢 _सांयकाल के समय 10 मिनट भक्ति संगीत लगाएं।_
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🪢 _दिखावे के चक्कर में व्यर्थ का खर्चा ना करें।_
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🪢 _दो किमी तक जाना हो तो पैदल जाएं ।_
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🪢 _अपने बच्चों के मन में किसी भी प्रकार के नशे के विरुद्ध चेतना पैदा करें।_
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_लड़कियां पैदा होने पर अधिक प्रसन्न हों क्यों कि एक लड़की 10 पुत्रों के बराबर होती है।_
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शीश कटीया और धड़ लड़िया #रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना "" 7 मार्च 1679 ई0 की बात है, ठाकुर सुजान सिंह अपनी शादी की बारात ल...
26/11/2021

शीश कटीया और धड़ लड़िया
#रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना ""
7 मार्च 1679 ई0 की बात है, ठाकुर सुजान सिंह अपनी शादी की बारात लेकर जा रहे थे, 22 वर्ष के सुजान सिंह किसी देवता की तरह लग रहे थे,
ऐसा लग रहा था मानो देवता अपनी बारात लेकर जा रहे हों

उन्होंने अपने दुल्हन का मुख भी नहीं देखा था, शाम हो चुकी थी इसलिए रात्रि विश्राम के लिए "छापोली" में पड़ाव डाल दिये । कुछ ही क्षणों में उन्हें गायों में लगे घुंघरुओं की आवाजें सुनाई देने लगी, आवाजें स्पष्ट नहीं थीं, फिर भी वे सुनने का प्रयास कर रहे थे, मानो वो आवाजें उनसे कुछ कह रही थी ।

सुजान सिंह ने अपने लोगों से कहा, शायद ये चरवाहों की आवाज है जरा सुनो वे क्या कहना चाहते हैं ।
गुप्तचरों ने सूचना दी कि युवराज ये लोग कह रहे है कि कोई फौज "देवड़े" पर आई है। वे चौंक पड़े । कैसी फौज, किसकी फौज, किस मंदिर पे आयी है ?

जवाब आया "युवराज ये औरंगजेब की बहुत ही विशाल सेना है, जिसका सेनापति दराबखान है, जो खंडेला के बाहर पड़ाव डाल रखी है ।
कल खंडेला स्थित श्रीकृष्ण मंदिर को तोड़ दिया जाएगा । निर्णय हो चुका था,

एक ही पल में सब कुछ बदल गया । शादी के खुशनुमा चहरे अचानक सख्त हो चुके थे, कोमल शरीर वज्र के समान कठोर हो चुका था ।
जो बाराती थे, वे सेना में तब्दील हो चुके थे, वे अपने सेना के लोगों से विचार विमर्श करने लगे । तब उनको पता चला कि उनके साथ मात्र 70 लोगों की छोटी सी एक सेना थी ।
तब वे रात्रि के समय में बिना एक पल गंवाए उन्होंने पास के गांव से कुछ आदमी इकठ्ठे कर लिए ।
करीब 500 घुड़सवार अब उनके पास हो चुके थे,

अचानक उन्हें अपनी पत्नी की याद आयी, जिसका मुख भी वे नहीं देख पाए थे, जो डोली में बैठी हुई थी । क्या बीतेगी उसपे, जिसने अपनी लाल जोड़े भी ठीक से नहीं देखी हो ।

वे तरह तरह के विचारों में खोए हुए थे, तभी उनके कानों में अपनी माँ को दिए वचन याद आये, जिसमें उन्होंने राजपूती धर्म को ना छोड़ने का वचन दिया था, उनकी पत्नी भी सारी बातों को समझ चुकी थी, डोली के तरफ उनकी नजर गयी, उनकी पत्नी महँदी वाली हाथों को निकालकर इशारा कर रही थी । मुख पे प्रसन्नता के भाव थे, वो एक सच्ची क्षत्राणी के कर्तब्य निभा रही थी, मानो वो खुद तलवार लेकर दुश्मन पे टूट पड़ना चाहती थी, परंतु ऐसा नहीं हो सकता था ।
सुजान सिंह ने डोली के पास जाकर डोली को और अपनी पत्नी को प्रणाम किये और कहारों और नाई को डोली सुरक्षित अपने राज्य भेज देने का आदेश दे दिया और खुद खंडेला को घेरकर उसकी चौकसी करने लगे ।

लोग कहते हैं कि मानो खुद कृष्ण उस मंदिर की चौकसी कर रहे थे, उनका मुखड़ा भी श्रीकृष्ण की ही तरह चमक रहा था।
8 मार्च 1679 को दराबखान की सेना आमने सामने आ चुकी थी, महाकाल भक्त सुजान सिंह ने अपने इष्टदेव को याद किये और हर हर महादेव के जयघोष के साथ 10 हजार की मुगल सेना के साथ सुजान सिंह के 500 लोगो के बीच घनघोर युद्ध आरम्भ हो गया ।

सुजान सिंह ने दराबखान को मारने के लिए उसकी ओर लपके और 40 मुगल सेना को मौत के घाट उतार दिए । ऐसे पराक्रम को देखकर दराबखान पीछे हटने में ही भलाई समझी, लेकिन ठाकुर सुजान सिंह रुकनेवाले नहीं थे ।
जो भी उनके सामने आ रहा था वो मारा जा रहा था । सुजान सिंह साक्षात मृत्यु का रूप धारण करके युद्ध कर रहे थे । ऐसा लग रहा था मानो खुद महाकाल ही युद्ध कर रहे हों ।
इस बीच कुछ लोगों की नजर सुजान सिंह पे पड़ी,
लेकिन ये क्या सुजान सिंह के शरीर में सिर तो है ही नहीं...
😭😭😭😭😭😭
लोगों को घोर आश्चर्य हुआ, लेकिन उनके अपने लोगों को ये समझते देर नहीं लगी कि सुजान सिंह तो कब के मोक्ष को प्राप्त कर चुके हैं ।
ये जो युद्ध कर रहे हैं, वे सुजान सिंह के इष्टदेव हैं । सबों ने मन ही मन अपना शीश झुककर इष्टदेव को प्रणाम किये ।

अब दराबखान मारा जा चुका था, मुगल सेना भाग रही थी, लेकिन ये क्या, सुजान सिंह घोड़े पे सवार बिना सिर के ही मुगलों का संहार कर रहे थे ।
उस युद्धभूमि में मृत्यु का ऐसा तांडव हुआ, जिसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुगलों की 7 हजार सेना अकेले सुजान सिंह के हाथों मारी जा चुकी थी । जब मुगल की बची खुची सेना पूर्ण रूप से भाग गई, तब सुजान सिंह जो सिर्फ शरीर मात्र थे, मंदिर का रुख किये ।

इतिहासकार कहते हैं कि देखनेवालों को सुजान के शरीर से दिव्य प्रकाश का तेज निकल रहा था, एक अजीब विश्मित करनेवाला प्रकाश निकल रहा था, जिसमें सूर्य की रोशनी भी मन्द पड़ रही थी ।

ये देखकर उनके अपने लोग भी घबरा गए थे और सबों ने एक साथ श्रीकृष्ण की स्तुति करने लगे, घोड़े से नीचे उतरने के बाद सुजान सिंह का शरीर मंदिर के प्रतिमा के सामने जाकर लुढ़क गया और एक शूरवीर योद्धा का अंत हो गया ।

🚩🚩🙏🙏माँ भारती के इस शूरवीर योद्धा को कोटि-कोटि नमन 🚩🚩🙏🙏

*******24 नवंबर 1675 की तारीख गवाह बनी थी, हिन्दू के हिन्दू बने रहने की !!*दोपहर का समय और जगह चाँदनी चौक दिल्ली लाल किल...
25/11/2021

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*24 नवंबर 1675 की तारीख गवाह बनी थी, हिन्दू के हिन्दू बने रहने की !!*
दोपहर का समय और जगह चाँदनी चौक दिल्ली लाल किले के सामने जब मुगलिया हुकूमत की क्रूरता देखने के लिए लोग इकट्ठे हुए पर बिल्कुल शांत बैठे थे !
लोगो का जमघट !!
और सबकी सांसे अटकी हुई थी ! शर्त के मुताबिक अगर गुरु तेग बहादुरजी इस्लाम कबूल कर लेते हैं, तो फिर सब हिन्दुओं को मुस्लिम बनना होगा, बिना किसी जोर जबरदस्ती के !
औरंगजेब के लिए भी ये इज्जत का सवाल था
समस्त हिन्दू समाज की भी सांसे अटकी हुई थी क्या होगा? लेकिन गुरु जी अडिग बैठे रहे। किसी का धर्म खतरे में था धर्म का अस्तित्व खतरे में था तो दूसरी तरफ एक धर्म का सब कुछ दांव पे लगा था ! हाँ या ना पर सब कुछ निर्भर था। खुद चल के आया था औरगजेब, लालकिले से निकल कर सुनहरी मस्जिद के काजी के पास,,,
उसी मस्जिद से कुरान की आयत पढ़ कर यातना देने का फतवा निकलता था ! वो मस्जिद आज भी है !
*गुरुद्वारा शीष गंज, चांदनी चौक, दिल्ली !* के पास पुरे इस्लाम के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न था ! आखिरकार जब इसलाम कबूलवाने की जिद्द पर इसलाम ना कबूलने का हौसला अडिग रहा तो जल्लाद की तलवार चली और प्रकाश अपने स्त्रोत में लीन हो गया ।
ये भारत के इतिहास का एक ऐसा मोड़ था जिसने पुरे हिंदुस्तान का भविष्य बदलने से रोक दिया ।
*हिंदुस्तान में हिन्दुओं के अस्तित्व में रहने का दिन !!* सिर्फ एक हाँ होती तो यह देश हिन्दुस्तान नहीं होता !
*गुरु तेग बहादुर जी* जिन्होंने हिन्द की चादर बनकर तिलक और जनेऊ की रक्षा की उनका अदम्य साहस भारतवर्ष कभी नही भूल सकता । कभी एकांत में बैठकर सोचिएगा अगर गुरु तेग बहादुर जी अपना बलिदान न देते तो हर मंदिर की जगह एक मस्जिद होती और घंटियों की जगह अज़ान सुनायी दे रही होती।

24 नवम्बर का यह इतिहास सभी को पता होना चाहिए !
इतिहास के वो पृष्ठ जो पढ़ाए नहीं गये !
🙏💐🚩🚩🚩🚩 💐🙏
*वाहे गुरु जी का खालसा !!*
*वाहे गुरूजी की फ़तेह !!*
🙏🙏🙏🙏

06/09/2021

कृपया हर सनातनी मां बाप अपने बच्चो को ऐसे संस्कार जरूर दे 🙏

ये सन्त प्रहलाद बाबा जो 80 वर्षो से बिना अन्न ~ जल ग्रहण किये बिना ये तपस्या भगवान की भक्ति में लिन थे ये आज इनकी मृत्यु...
23/07/2021

ये सन्त प्रहलाद बाबा जो 80 वर्षो से बिना अन्न ~ जल ग्रहण किये बिना ये तपस्या भगवान की भक्ति में लिन थे ये आज इनकी मृत्यु हो गई भगवान इनकी आत्मा को शांती दे शिव ~ शिव यह हमारे सनातन धर्म के सुपरस्टार हैं आज अगर कोई हीरो मर जाता पूरे फेसबुक पर छा जाता हमारे समस्त सत्य सनातन धर्म सबको पता लगे इसलिए सभी से अनुरोध करता हूं कि जिस तरह बॉलीवुड के हीरो मर जाते हैं उनके लिए चिल्ला चिल्ला कर फेसबुक पर तुम जो रोते हो कम से कम अपने सत्य सनातन धर्म को भी देख लिया करो 🙏🙏🙏

हमारे पास तो पहले से ही अमृत से भरे कलश थे...🧐फिर हम वो अमृत फेंक कर उनमें कीचड़ भरने का काम क्यों कर रहे हैं... ?🤔*जरा ...
23/06/2021

हमारे पास तो पहले से ही अमृत से भरे कलश थे...
🧐
फिर हम वो अमृत फेंक कर उनमें कीचड़ भरने का काम क्यों कर रहे हैं... ?
🤔
*जरा इन पर विचार करें...*
🧐👇🏻
० यदि *मातृनवमी* थी,
तो मदर्स डे क्यों लाया गया ?

० यदि *कौमुदी महोत्सव* था,
तो वेलेंटाइन डे क्यों लाया गया ?

० यदि *गुरुपूर्णिमा* थी,
तो टीचर्स डे क्यों लाया गया ?

० यदि *धन्वन्तरि जयन्ती* थी,
तो डाक्टर्स डे क्यों लाया गया ?

० यदि *विश्वकर्मा जयंती* थी,
तो प्रद्यौगिकी दिवस क्यों लाया गया ?

० यदि *सन्तान सप्तमी* थी,
तो चिल्ड्रन्स डे क्यों लाया गया ?

० यदि *नवरात्रि* और *कन्या भोज* था,
तो डॉटर्स डे क्यों लाया गया ?

० *रक्षाबंधन* है तो सिस्टर्स डे क्यों ?

० *भाई-दूज* है ब्रदर्स डे क्यों ?

० *आंवला नवमी, तुलसी विवाह* मनाने वाले हिंदुओं को एनवायरमेंट डे की क्या आवश्यकता ?

० केवल इतना ही नहीं, *नारद जयन्ती* ब्रह्माण्डीय पत्रकारिता दिवस है...

० *पितृपक्ष* 7 पीढ़ियों तक के पूर्वजों का पितृपर्व है...

० *नवरात्रि* को स्त्री के नवरूप दिवस के रूप में स्मरण कीजिये...

*सनातन पर्वों को अवश्य मनाईये...*
आपकी सनातन संस्कृति में मनाए जाने वाले विभिन्न पर्व और त्योहार मिशनरीयों के धर्मांतरण की राह में बाधक हैं, बस इसीलिए आपके धार्मिक परंपराओं से मिलते-जुलते Program लाए जा रहे हैं मिशनरीयों द्वारा।

ताकि आपको सनातन सभ्यता से तोड़कर धर्मांतरण की ओर प्रेरित किया जा सके...

अब पृथ्वी के सनातन भाव को स्वीकार करना ही होगा। यदि हम समय रहते नहीं चेते तो वे ही हमें वेद, शास्त्र, संस्कृत भी पढ़ाने आ जाएंगे !

इसका एक ही उपाय है कि अपनी जड़ों की ओर लौटिए। अपने सनातन मूल की ओर लौटिए, व्रत, पर्व, त्यौहारों को मनाइए, अपनी संस्कृति और सभ्यता को जीवंत कीजिये। जीवन में भारतीय पंचांग अपनाना चाहिए, जिससे भारत अपने पर्वों, त्यौहारों से लेकर मौसम की भी अनेक जानकारियां सहज रूप से जान व समझ लेता है...

*संस्कृति रक्षा अभियान...*

अधिकतर हिन्दू नहीं जानते कि महाराज विक्रमादित्य कौन थे और विक्रमी संवत् क्या है।महाभारत के विनाशकारी युद्ध के लगभग 3000 ...
23/06/2021

अधिकतर हिन्दू नहीं जानते कि महाराज विक्रमादित्य कौन थे और विक्रमी संवत् क्या है।

महाभारत के विनाशकारी युद्ध के लगभग 3000 वर्ष बाद और आज से लगभग 2100 वर्ष पहले आर्यावर्त के महान सम्राट हुए विक्रमादित्य। जिनके बारे में कम ही लोग जानते हैं क्योंकि पिछले 1100 वर्षों में भारत के इतिहास को मुगलों, अंग्रेजों और वामपंथियों ने जान-बूझकर तोड़ा मरोड़ा, तथ्यों को मिटाया और भ्रमित किया और विक्रमादित्य को एक मिथकीय चरित्र बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी, क्योंकि विक्रमादित्य आर्यों के इतिहास में महान व्यक्तित्व और शक्ति का प्रतीक रहे, जबकि मुगलों और अंग्रेजों को यह सिद्ध करना जरूरी था कि उस काल में बाकि दुनिया अज्ञानता में जी रही थी। दरअसल, विक्रमादित्य का शासन अरब और मिस्र तक फैला था और संपूर्ण धरती के लोग उनके नाम से परिचित थे।

चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की राजधानी उज्जैन थी। विक्रमादित्य अपने ज्ञान, वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे जिनके दरबार में नवरत्न रहते थे। विक्रमादित्य बड़े पराक्रमी थे और सम्राट विक्रमादित्य युद्ध-कला एवम शस्त्र-संचालन में निष्णात थे। उनका सम्पूर्ण संघर्षों से भरे अध्यवसायी जीवन विदेशी आक्रान्ताओं, विशेषकर शकों के प्रतिरोध में व्यतीत हुआ। अंततः ईसा पूर्व 56 में उन्होंने शकों को परास्त किया, शकों पर विजय के कारण वे ‘शकारि’ कहलाये। और इस तरह ‘विक्रम-युग’ अथवा ‘विक्रमी सम्वत’ की शुरुआत हुई। आज भी भारत और नेपाल की विस्तृत हिन्दू परम्परा में यह पंचांग व्यापक रूप से प्रयुक्त होता है। विक्रमादित्य के शौर्य का वर्णन करते हुए समकालीन अबुलगाजी लिखता है— जहाँ परमार विक्रम का दल आक्रमण करता था वहाँ शत्रुओं की लाशों के ढेर लग जाते थे और शत्रुदल मैदान छोड़कर भाग जाते।

इतिहास ग्रंथों से पता चलता है कि अरब और मिश्र भी विक्रमादित्य के अधीन थे। विक्रमादित्य की अरब-विजय का वर्णन कवि जरहम किनतोई की पुस्तक सायर-उल-ओकुल में है। तुर्की की इस्ताम्बुल शहर की प्रसिध्द लाइब्रेरी मकतब-ए-सुल्तानिया में यह ऐतिहासिक ग्रन्थ आज भी उपलब्ध है, उसमें राजा विक्रमादित्य से संबंधित एक शिलालेख का उल्लेख है। जिसमें कहा गया है–
वे लोग भाग्यशाली है जो उस समय जन्मे और राजा विक्रम के राज्य में जीवन व्यतीत किया। वह बहुत दयालु, उदार और कर्तव्यनिष्ठ शासक था,जो हर एक व्यक्ति के बारे में सोचता था। उसने अपने पवित्र धर्म को हमारे बीच में फैलाया। अपने देश के सूर्य से भी तेज विद्वानों को इस देश में भेजा ताकि शिक्षा का उजाला फ़ैल सके। इन विद्वानों और ज्ञाताओं ने हमें भगवान की उपस्थिति और सत्य के सही मार्ग के बारे में बताकर एक परोपकार किया है। ये विक्रमादित्य के निर्देश पर यहाँ आये। यह शिलालेख हजरत मुहम्मद के जन्म के 165 वर्ष पहले का है। चीनी यात्री फाहियान लिखता है– देश की जलवायु सम और एकरूप है। जनसँख्या अधिक है और लोग सुखी हैं।

विक्रमादित्य के राजदरबार में धन्वन्तरी औषधि विज्ञान के ज्ञाता रहे, कवि कालिदास राजा के मंत्री रहे और वराह्महिर ज्योतिषविज्ञानी। उज्जैन तत्कालीन ग्रीनविच थी, जहाँ से मध्यान्ह की गणना की जाती थी। विक्रमादित्य के राज्य में प्रजा देहिक, देविक और भौतिक कष्टों से मुक्त थी।
यह जानकारी देने का उद्देश्य यही है कि हम अपने स्वर्णिम इतिहास को जानें और गर्व करें।
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इतिहास की कड़ियों को जोड़ने से पता चलता है कि ईसा मसीह भी सम्भवतः महाराजा विक्रमादित्य के साम्राज्य में ही हुआ था और पाखंड फ़ैलाने के लिए याजकों द्वारा उसे सूली पर टांग दिया गया था। यज्ञ करने वालों को याजक कहते हैं और आर्य ही यज्ञ करते हैं। हालाँकि इसमें अभी और शोध करने की आवश्यकता है।

इस साईकिल की फ्रेम में लगी बच्चे की गद्दीबता रही है कि परिंदे उड़ चुके है बस यादें शेष है...😥😥
18/06/2021

इस साईकिल की फ्रेम में लगी बच्चे की गद्दी
बता रही है कि परिंदे उड़ चुके है बस यादें शेष है...😥😥

गोत्र परम्परा वैज्ञानिक है। गोत्र परम्परा हमारे समाज में सदियों से चलती आयी हैं।  इस परम्परा के अनुसार अपने पिता, माता, ...
18/06/2021

गोत्र परम्परा वैज्ञानिक है।

गोत्र परम्परा हमारे समाज में सदियों से चलती आयी हैं। इस परम्परा के अनुसार अपने पिता, माता, नानी और दादी के गोत्रों में विवाह करना वर्जित हैं। मीडिया और कुछ छदम बुद्दिजीवी सदा हमारी इस परम्परा की बुराई करते आये हैं। वैसे हमारी कोई भी अच्छी बात, अच्छी परम्परा हो ये लोग उसका सदा विरोध ही करते है। इनकी दुकानदारी हमारे विरोध से ही चलती हैं। इन तथाकथित बुद्धिजीवियों को यह भी नहीं मालूम कि अगर पशुओं में एक ही परिवार में सम्बन्ध बनने लगते है तो उनके बच्चे या तो कमजोर पैदा होते हैं अथवा कुछ ही दिनों में मर जाते हैं। गांव देहात के लोग जो गौ आदि पशु पालते है इस वैज्ञानिक सोच से भली प्रकार से जानते हैं।मगर पाकिस्तान में रहने वाले मुसलमान इस तथ्य को नहीं जानते। दो पीढ़ियों से पाकिस्तानी मुसलमान इग्लैंड जाकर बस गए। अपनी आदत के मुताबिक उन्होंने इंग्लैंड के ब्रैडफोर्ड, यॉर्कशायर में एक ही स्थान पर पर बसना शुरू कर दिया। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार उन्होंने केवल अपनी माँ का पेट छोड़कर आपस में विवाह करना शुरू कर दिया। खाला(मौसी) की बेटी, बुआ की बेटी, चाचा-ताऊ की बेटी, अपने ही बाप की दूसरी बीवी के बेटी आदि से भी सम्बन्ध बनाये। उनके इस प्रकार से सम्बन्ध बनाने का दुष्परिणाम आगे उनकी संतान में देखने में आया। इंग्लैंड जैसे देश में अगर एक भी बच्चे की मृत्यु अस्पताल में ईलाज के दौरान होती है तो उसका संज्ञान एक मेडिकल बोर्ड बनाकर लिया जाता हैं। ब्रैडफोर्ड, यॉर्कशायर के हस्पतालों में एशिया मूल की आबादी 20 से 30% हैं जबकि अस्पताल में भर्ती एवं मृत्यु दर में एशिया मूल के लोगों में 50% से अधिक पाई गई। मरने वाले बच्चों में तीन बातें समान पाई गई। पहली वे सभी मुस्लिम थे। दूसरी उन्होंने अपने ही परिवार में आपसी रिश्ते कायम किये थे। तीसरी वे दो तीन पीढ़ियों से ऐसा कर रहे थे। चिकित्सकों ने यह भी पाया कि सभी बच्चों में जो बीमारियां मिली वे अनुवांशिक अर्थात Genetic थी। वही इंग्लैंड में रहने वाले हिन्दुओं में ये बीमारियां बहुत न्यून मिली। इंग्लैंड में पैदा होने वाले पाकिस्तानी बच्चों की संख्या 3% है जबकि अनुवांशिक बिमारियों में उनका अनुपात 33% मिला। यानि हर तीन में से एक अनुवांशिक रोग से पीड़ित बच्चा पाकिस्तानी मुसलमान था। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार इसका मूल कारण गोत्र परम्परा को नहीं मानना था। इंग्लैंड के शोध को पाठक जेनेटिक ग्रुप स्टडी के नाम से गूगल पर आसानी से खोज सकते है।

इंग्लैंड के इस प्रसिद्द शोध के आकड़ें स्पष्ट रूप से यह सिद्ध करते है कि गोत्र परम्परा वैज्ञानिक है। मैंने स्वयं तमिल नाडु में अपनी MBBS की शिक्षा के दौरान एक ही हिन्दू परिवार के तीनों बच्चों को एक ही अनुवांशिक बीमारी से पीड़ित देखा था। कारण उनके माता-पिता आपस में मामा -भांजी थे। तमिल नाडु में कुछ परिवारों में आज भी गोत्र परम्परा को न मानकर आपस में विवाह किया था।

हमें गर्व है कि हम आर्यों की महान एवं वैज्ञानिक गोत्र परम्परा को मानने वाले है।

डॉ विवेक आर्य, शिशु रोग विशेषज्ञ, दिल्ली

उनचास मरुत🌪️🌪️🌪️🌪️🌪️🌪️🌪️सुंदरकांड पढ़ते हुए 25वें दोहे पर थोड़ा रुक गया । तुलसीदास ने सुन्दर कांड में जब हनुमान जी ने लं...
15/06/2021

उनचास मरुत
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सुंदरकांड पढ़ते हुए 25वें दोहे पर थोड़ा रुक गया । तुलसीदास ने सुन्दर कांड में जब हनुमान जी ने लंका मे आग लगाई थी, उस प्रसंग पर लिखा है -

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।

अर्थात : जब हनुमान जी ने लंका को अग्नि के हवाले कर दिया तो --
वे उनचासों पवन चलने लगे।
हनुमान जी अट्टहास करके गर्जे और आकार बढ़ाकर आकाश मार्ग से जाने लगे।

मैंने सोचा कि इन उनचास मरुत का क्या अर्थ है ? यह तुलसी दास जी ने भी नहीं लिखा। फिर मैंने सुंदरकांड पूरा करने के बाद समय निकालकर 49 प्रकार की वायु के बारे में जानकारी खोजी और अध्ययन करने पर सनातन धर्म पर अत्यंत गर्व हुआ। तुलसीदासजी के वायु ज्ञान पर सुखद आश्चर्य हुआ, जिससे शायद आधुनिक मौसम विज्ञान भी अनभिज्ञ है ।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि वेदों में वायु की 7 शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है। अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है, लेकिन उसका रूप बदलता रहता है, जैसे कि ठंडी वायु, गर्म वायु और समवायु, लेकिन ऐसा नहीं है।

दरअसल, जल के भीतर जो वायु है उसका वेद-पुराणों में अलग नाम दिया गया है और आकाश में स्थित जो वायु है उसका नाम अलग है। अंतरिक्ष में जो वायु है उसका नाम अलग और पाताल में स्थित वायु का नाम अलग है। नाम अलग होने का मतलब यह कि उसका गुण और व्यवहार भी अलग ही होता है। इस तरह वेदों में 7 प्रकार की वायु का वर्णन मिलता है।

ये 7 प्रकार हैं- 1.प्रवह, 2.आवह, 3.उद्वह, 4. संवह, 5. विवह, 6.परिवह और 7. परावह।

1. प्रवह :-पृथ्वी को लांघकर मेघमंडलपर्यंत जो वायु स्थित है, उसका नाम प्रवह है। इस प्रवह के भी प्रकार हैं। यह वायु अत्यंत शक्तिमान है और वही बादलों को इधर-उधर उड़ाकर ले जाती है। धूप तथा गर्मी से उत्पन्न होने वाले मेघों को यह प्रवह वायु ही समुद्र जल से परिपूर्ण करती है जिससे ये मेघ काली घटा के रूप में परिणित हो जाते हैं और अतिशय वर्षा करने वाले होते हैं।

2. आवह :-आवह सूर्यमंडल में बंधी हुई है। उसी के द्वारा ध्रुव से आबद्ध होकर सूर्यमंडल घुमाया जाता है।

3. उद्वह :- वायु की तीसरी शाखा का नाम उद्वह है, जो चन्द्रलोक में प्रतिष्ठित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध होकर यह चन्द्र मंडल घुमाया जाता है।

4. संवह :-वायु की चौथी शाखा का नाम संवह है, जो नक्षत्र मंडल में स्थित है। उसी से ध्रुव से आबद्ध होकर संपूर्ण नक्षत्र मंडल घूमता रहता है।

5. विवह :-पांचवीं शाखा का नाम विवह है और यह ग्रह मंडल में स्थित है। उसके ही द्वारा यह ग्रह चक्र ध्रुव से संबद्ध होकर घूमता रहता है।

6.परिवह:-* वायु की छठी शाखा का नाम परिवह है, जो सप्तर्षिमंडल में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध हो सप्तश्रर्षि आकाश में भ्रमण करते हैं।

7.परावह:-* वायु के सातवें स्कंध का नाम परावह है, जो ध्रुव में आबद्ध है। इसी के द्वारा ध्रुव चक्र तथा अन्यान्य मंडल एक स्थान पर स्थापित रहते हैं।

*इन सातों वायु के सात-सात गण(संचालित करने वाले) हैं जो निम्न जगह में विचरण करते हैं-*

ब्रह्मलोक, इंद्रलोक, अंतरिक्ष, भूलोक की पूर्व दिशा, भूलोक की पश्चिम दिशा, भूलोक की उत्तर दिशा और भूलोक कि दक्षिण दिशा। इस तरह
7x7=49। कुल 49 मरुत हो जाते हैं जो देव रूप में विचरण करते रहते हैं।

_है ना अद्भुत ज्ञान। हम अक्सर रामायण, भगवद् गीता पढ़ तो लेते हैं परंतु उनमें लिखी छोटी-छोटी बातों का गहन अध्ययन करने पर अनेक गूढ़ एवं ज्ञानवर्धक बातें ज्ञात होती हैं।*_

🚩 बोलो बजरंगबली महाराज की जय*🚩
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