सनातन दर्शन

सनातन दर्शन सनातन धर्म के ग्रंथों पर सनातन दर्शन का अपना शोध विभाग है

20/09/2025

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26/06/2025

द टाइम ट्रैवल।..........

26/06/2025

सवर्णों में एक जाति आती है ब्राह्मण जिस पर सदियों से राक्षस, यवन, मुगल, अंग्रेज, कांग्रेस, सपा, बसपा, वामपंथी, भाजपा, सभी राजनीतिक पार्टियाँ, विभिन्न जातियाँ आक्रमण करते आ रहे है!

आरोप ये लगे कि ब्राह्मणों ने जाति का बटवारा किया

उत्तर: सबसे प्राचीन ग्रंथ वेद जो अपौरुषेय जिसका संकलन वेदव्यास जी ने किया, जो ब्राह्मण नहीं थें

१८-पुराण, महाभारत, गीता सब व्यास विरचित है जिसमें वर्णव्यवस्था और जाति व्यवस्था दी गई है, रचनाकार व्यास ब्राह्मण जाति से नही थे

ऐसे ही कालीदास या कई कवि जो वर्णव्यवस्था और जाति-व्यवस्था के पक्षधर थे पर जन्मजात ब्राह्मण नहीं थे

मेरा प्रश्न:- कोई एक भी ग्रन्थ का नाम बतलाइए जिसमें जातिव्यवस्था लिखी गई हो और ब्राह्मण ने लिखा हो?

शायद एक भी नही मिलेगा, मुझे पता है आप मनुस्मृति का ही नाम लेंगे, जिसके लेखक मनु महाराज थे, जो कि क्षत्रिय थे, मनु स्मृति जिसे आपने कभी पढ़ा ही नहीं और पढ़ा भी तो टुकड़ों में! कुछ श्लोकों को जिसके कहने का प्रयोजन कुछ अन्य होता है और हम समझते अपने विचारानुसार है

अब रही बात कि ब्राह्मणों ने क्या किया? तो सुनें! यंत्रसर्वस्वम् (इंजीनियरिंग का ग्रन्थ) भारद्वाज
वैमानिक शास्त्रम् (विमान बनाने हेतु) भारद्वाज
सुश्रुतसंहिता (सर्जरी चिकित्सा)- सुश्रुत
चरकसंहिता (चिकित्सा) चरक
अर्थशास्त्र (जिसमें सैन्यविज्ञान, राजनीति, युद्धनीति, दण्डविधान, कानून आदि कई महत्वपूर्ण विषय हैं) कौटिल्य
आर्यभटीयम् (गणित) आर्यभट्ट

ऐसे ही छन्दशास्त्र, नाट्यशास्त्र, शब्दानुशासन, परमाणुवाद, खगोल विज्ञान, योगविज्ञान सहित प्रकृति और मानव कल्याणार्थ समस्त विद्याओं का संचय अनुसंधान एवं प्रयोग हेतु ब्राह्मणों ने अपना पूरा जीवन भयानक जंगलों में, घोर दरिद्रता में बिताए!

उसके पास दुनियाँ के प्रपंच हेतु समय ही कहां शेष था? कोई बताएगा समस्त विद्याओं में प्रवीण होते हुए भी, सर्वशक्तिमान् होते हुए भी ब्राह्मण ने पृथ्वी का भोग करने हेतु गद्दी स्वीकारा हो?

विदेशी मानसिकता से ग्रसित वामपंथियों ने कुचक्र रचकर गलत तथ्य पेश किया, आजादी के बाद इतिहास संरचना इनके हाथों सौपी गई और ये विदेश संचालित षड़यन्त्रों के तहत देश में जहर बोने लगे

ब्राह्मण हमेशा से यही चाहता रहा है कि हमारा राष्ट्र शक्तिशाली हो अखण्ड हो, न्याय व्यवस्स्था सुदृढ़ हो

सर्वे भवन्तु सुखिन:सर्वे सन्तु निरामया: सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दु:ख भाग्भवेत्.. का मन्त्र देने वाला ब्राह्मण, वसुधैव कुटुम्बकम् का पालन करने वाला ब्राह्मण सर्वदा काँधे पर जनेऊ कमर में लंगोटी बाँधे एक गठरी में लेखनी, मसि, पत्ते, कागज, और पुस्तक लिए चरैवेति-चरैवेति का अनुशरण करता रहा, मन में एक ही भाव था लोक कल्याण!

ऐसा नहीं कि लोक कल्याण हेतु मात्र ब्राह्मणों ने ही काम किया, बहुत सारे ऋषि, मुनि, विद्वान्, महापुरुष अन्य वर्णों के भी हुए जिनका महत् योगदान रहा है, किन्तु आज ब्राह्मण के विषय में ही इसलिए कह रहा हूँ कि जिस देश की शक्ति के संचार में ब्राह्मणों के त्याग तपस्या का इतना बड़ा योगदान रहा!

जिसने मुगलों, यवनों, अंग्रेजों और राक्षसी प्रवृत्ति के लोंगों का भयानक अत्याचार सहकर भी यहां की संस्कृति और ज्ञान को बचाए रखा, वेदों, शास्त्रों को जब जलाया जा रहा था तब ब्राह्मणों ने पूरा का पूरा वेद और शास्त्र कण्ठस्थ करके बचा लिया और आज भी वे इसे नई पीढ़ी में संचारित कर रहे हैं वे सामान्य कैसे हो सकते हैं?

👉 ब्राह्मण अपनी रोजी रोटी कैसे चलाए?

पढ़ाई के लिए सबसे ज्यादा फीस
काम्प्टीशन के लिए सबसे ज्यादा फीस
नौकरी मांगने के लिए लिए सबसे ज्यादा फीस

सरकारी सारी सुविधाएँ OBC, SC, ST, अल्पसंख्यक के नाम पर पूँजीपति या गरीब के नाम पर अयोग्य लोंगों को दी जाती हैं, इस देश में गरीबी से नहीं जातियों से लड़ा जाता है

जिसने शिक्षा को बचाने के लिए सर्वस्व त्याग दिया उसके साथ इतनी भयानक ईर्ष्या क्यों?

मैं ब्राह्मण हूँ अत: मुझे किसी जाति विशेष से द्वेष नही है, मैने शास्त्रों को जीने का प्रयास किया है, अत: जातिगत छुआछूत को पाप मानता हूँ

गलत तथ्यों के आधार पर हमें क्यों सताया जा रहा है? हमारे धर्म के प्रतीक शिखा और यज्ञोपवीत, वेश भूषा का मजाक क्यों बनाया जा रहा हैं?

हमारे मन्त्रों और पूजा पद्धति का उपहास होता है और आप सहन कैसे करते हैं? विश्व की सबसे समृद्ध और एकमात्र वैज्ञानिक भाषा संस्कृत को हम भारतीय हेय दृष्टि से क्यों देखते हैं

👉 हमें पता है आप कुतर्क करेंगें, आजादी के बाद भी 76 साल से अत्याचार होता रहा है, हमारा हक मारकर खैरात में बाँट दिया गया, किसी सरकार ने हमारा सहयोग तो नही किया किन्तु बढ़चढ़ के दबाने का प्रयास जरूर किया फिर भी हम जिन्दा है और जिन्दा रहेंगे!

31/12/2024
बायोटेक्नोलाॅजी के जनक जार्ज मेंडल, वाट्सन और क्रिक नहीं योगेश्वर श्रीकृष्ण थे।स्कूल कॉलेजों में हमें यही सिखाया जाता है...
18/11/2024

बायोटेक्नोलाॅजी के जनक जार्ज मेंडल, वाट्सन और क्रिक नहीं योगेश्वर श्रीकृष्ण थे।

स्कूल कॉलेजों में हमें यही सिखाया जाता है कि बायोटेक्नॉलाजी को विदेशी वैज्ञानिकों ने खोजा, लेकिन असल में बायोटेक्नोलाॅजी के असली जनक हमारे कान्हा यानि भगवान श्रीकृष्ण थे।

भक्ति वेदांत स्वामी आदि देव सरस्वती जी महाराज जी का दावा है कि ये सिद्धांत करीब 5000 साल पहले भगवान श्रीकृष्ण ने दिए थे। उनका दावा है कि गीता के कई श्लोकों में इस बात का जिक्र है, जिससे साबित होता है कि बायोटेक के जनक भगवान श्री कृष्ण थे। उनका कहना है ​कि गीता के श्लोक बायोटेक के सिद्धांतों को खुद में समेटे हुए हैं। उनका कहना है कि गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक ग्रंथ भी है। कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया ज्ञान वैज्ञानिक नजरिए पर आधारित था। इसी ज्ञान आधार पर आज कई वैज्ञानिक अवधारणाओं का जन्म हुआ है। उनका कहना है कि श्रीमद् भागवत गीता के सात श्लोकों में जीवन की उत्पत्ति का पूरा सार मौजूद है। स्वामी आदि देव महाराज जी का दावा है कि इन श्लोकों के द्वारा श्री कृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र के मैदान में ही मानव की उत्पत्ति का विज्ञान दे दिया था।

जीव आत्मा अणु और परमाणु से बनी है

स्वामी आदिदेव सरस्वती के अनुसार सामवेद के तीसरे अध्याय के 10वें खंड में पहला व नौवां श्लोक इन पांच तत्व (एटीजीसीयू) की पुष्टि करता है। यानी जीव आत्मा अणु और परमाणु से बनी है। नौवें श्लोक में ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण अणु और परमाणु के रूप में किया है।

ये हैं गीता के वे सात श्लोक

मय्यासक्तामना: पार्थ योग युजजन्मदाश्रय:।
असंशय समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु।।

इस श्लोक में शरीर की आंतरिक ऊर्जा के आधार के बारे में बताया गया है। जिसे वैज्ञानिक भाषा में माइटोकोंड्रिया कहते हैं, जिसका अध्ययन सेल बॉयोलॉजी में करते हैं। यही शरीर में ऊर्जा पैदा करने वाला एडीनोसिन ट्राई फॉस्फेट पैदा करता है।

ज्ञानं तेहं सविज्ञामिदं वक्ष्याम्यशेषत:।
यज्ञात्वा नेह भूयोन्यज ज्ञातव्यमविशष्यते।।

इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया को बताया। पृथ्वी पर निर्जीव से जीव की उत्पत्ति के बारे में जानकारी दी और बताया कि वह कौन से कण थे, जिनसे शरीर का निर्माण हुआ।

मनुष्याणां सहस्त्रेषु कशिचद्यतति सद्धिये।
यततामिप सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वत:।।

तीसरे श्लोक में तत्व ज्ञान को विस्तार से समझाया। आत्मा और मोक्ष पर विस्तार से जानकारी दी। यह भी बताया कि तत्व ज्ञान समझना ही दुष्कर है। इसे जिसने समझ लिया, उसे कुछ और जानने की जरूरत नहीं।

भूमिरापोनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं में भिन्ना प्रकृतिरष्टयां।।

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रर्कृंत विद्वि में पराम।
जीवभूतां महाबाहों ययेदं धार्यते जगत्।।

चौथे और पांचवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने कई ऐसी बातें कही हैं जिससे सिद्ध होता है कि लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण ने गुणसूत्र के बारे में भी जानकारी दी थी।

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय।
अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा।

मत्त परतरं नान्यत् किचिदस्ति धनंजय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।।

छठे और सातवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने उत्पत्ति का आधार आठ तत्वों को बताया। अर्जुन को बताया कि मृत्यु शरीर की होती है, शरीर के अंदर मौजूद तत्वों की नहीं, जिसे आत्मा कहते हैं।

डीएनए कभी नहीं मिलता

1940 में एरविन चार्जफ ने कहा था कि डीएनए कभी नहीं बदलता है। चाहे किसी भी रूप में मृत्यु हो, जबकि यही बात गीता में श्रीकृष्ण ने बहुत पहले ही बता दी थी।

वैज्ञानिक नजरिया

डीएनए- सूत्र का सूत्र में मनियों की तरह गुथा होना (एटीजीसीयू) है। श्रीकृष्ण के अनुसार सूत्र में सूत्र के मनियों के सदृश मुझमें गुथा हुआ है। यानी जीव में विद्यमान है। यह श्लोक डीएनए को ही परिभाषित करता है। श्रीकृष्ण के इसी वाक्य को अगर हम बॉयोकेमेस्ट्री की किसी भी पुस्तक में देखें, तो वहां स्ट्रिंग्स ऑन द रॉल्स इंग्लिश में पढ़ते हैं। इसके अलावा यूएसए की बॉयोकेमेस्ट्री की किताब लेनिनजर में भी यही बताया गया है।

मणि- श्रीकृष्ण ने यहां डीएनए की रासायनिक प्रकृति को समझाया है। यहां मणि रूप का मतलब डीएनए जो कि केमिकल थ्रेड (धागों) से मिलकर बना है। यहां धागों का मतलब बॉडिंग से है कि किस तरह से निर्जीव पदार्थ आपस में जुड़कर जीवन का निर्माण करते हैं।

जय श्रीपरशुरामजी जय हो प्रभु ----------------------------------------------------------------------------  #सैन्य_विज्ञा...
12/11/2021

जय श्रीपरशुरामजी जय हो प्रभु
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-------- #सैन्य_विज्ञान - #मार्शल_आर्ट_का_जन्म --------
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‘सैन्य विज्ञान मानव ज्ञान की वह शाखा है जो आदि काल से ही सामाजिक शान्ति स्थापना करने तथा बाह्य आक्रमण से निजी प्रभुसत्ता की रक्षा करने के लिए महत्वपूर्ण समझी जाती रही है, इसके अन्तर्गत शान्ति स्थापन साधनों, सेना के संगठन, शस्त्रास्त्रों के प्रयोग और विकास, युद्ध शैलियों का मानसिक, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाता है।’’

सैन्य विज्ञान के प्रमुख अंग है युद्ध कला , मार्शल आर्ट तथा शस्त्राभ्यास जिसका उद्गम भी वैदिक साहित्य ही हैं। वेदों में अट्ठारह (18) ज्ञान तथा कलाओं के विषयों पर मौलिक ज्ञान अर्जित है। यजुर्वेद का उपवेद ‘धनुर्वेद’ पूर्णतया धनुर्विद्या को समर्पित है। अग्नि पुराण में भी धनुर्वेद के विषय में विस्तृत उल्लेख किया गया है जिसमे निम्न पांच विधाएं प्रमुख है -

#यन्त्र_मुक्ता – अस्त्र-शस्त्र के उपकरण जैसे घनुष और बाण।
#पाणि_मुक्ता – हाथ से फैंके जाने वाले अस्त्र जैसे कि भाला।
#मुक्ता_मुक्ता – हाथ में पकड कर किन्तु अस्त्र की तरह प्रहार करने वाले शस्त्र जैसे कि बर्छी, त्रिशूल आदि।
#हस्त_शस्त्र – हाथ में पकड कर आघात करने वाले हथियार जैसे तलवार, गदा अदि।

#बाहू_युद्ध – निशस्त्र हो कर युद्ध करना।

आज हम सिर्फ बाहू-युद्ध की बात करते है , बाहु युद्ध खुद में एक विस्तृत विषय है लेकिन इसमें भी आज सिर्फ मार्शल आर्ट की बात करेंगे युद्ध कला और शस्त्राभ्यास के विषय मे आगे पोस्ट करूँगा, आज का आधुनिक वैश्विक मार्शल आर्ट कैसे भारतीय संस्कृति से प्रभावित है और उसका मूल स्थान भारत वर्ष कैसे है इसको देखते है ।।

#मार्शल_आर्ट - “यह कला अभ्यास और समर्पण पर निर्भर करती है”। दुनिया की सबसे प्रचलित ख़तरनाक और बेहतरीन मार्शल आर्ट्स जो भारतीय संस्कृति से निकले -

#ताईक्वान्डो -
यह कला मूल रूप से कोरिया से निकली है और करीब 5,000 साल पुरानी मानी जाती है, ताईक्वान्डो को इसकी तेज़ और घूमती हुई ऊंची किक की वजह से दुनिया में जानी जाती है, इसका अर्थ है किक और पंच (Tai का मतलब पैर और Kwan का अर्थ मुट्ठी), यह दुनिया की पहली ऐसी मार्शल आर्ट है, जिसे ओलिंपिक में जगह मिली हुई है।
भारतीय मूल - नियुद्ध क्रीडे

#ऐकिडो -
ऐकिडो बहुत ही प्रभावी और बेहतरीन मार्शल आर्ट (Martial Art) है। यह अन्य मार्शल आर्ट्स (Martial Art) की तरह ज़्यादा पुराना या परम्परागत भी नहीं है। ऐकिडो की उत्पत्ति और विकास मास्टर ‘Morihei Ueshiba’ ने की थी।

भारतीय मूल - कुट्टू वरिसाई

#जुसुत्सू -
जुसुत्सू, जापान की एक प्राचीन युद्ध कला (Martial Art) है, जिसका प्रयोग समुराई अपने हथियारहीन होने की दशा में करते थे। जुसुत्सू एक विशेष मार्शल आर्ट् (Martial Art) इसलिए भी है, क्योंकि इसमें अपने प्रतिद्वंदी के गुस्से और उसकी आक्रामकता का उसी के ख़िलाफ प्रयोग किया जाता है।

भारतीय मूल - मल्ल युद्ध

#निन्जुत्सू -
निन्जुत्सू मार्शल आर्ट सीखने वाले को ‘निंजा’ कहते है। आपने कई फ़िल्म्स में इनको देखा भी होगा। कुछ समय पहले तक यह दुनिया की सबसे रहस्यमयी मार्शल आर्ट्स में से एक थी। जापान में निंजा मार्शल आर्ट को हत्यारे और गुरिल्ला योद्धा सीखते थे। इस मार्शल आर्ट में तलवार, छोटे चाकू, फेंकने वाले हथियार और कुछ तरह के केमिकल का प्रयोग भी किया जाता है।

भारतीय मूल - गतका और अदिथाडा

#विंग_चुन -
विंग चुन लगभग 17वीं शताब्दी में तेज़ी से लोकप्रिय हुआ मार्शल आर्ट है। इसे सबसे पहले एक बौद्ध भिक्षुणी 'नग मुई' ने अविष्कार किया था। पशु, पक्षी और कीट-पतंगों से प्रेरित हो कर इस कला को विकसित किया गया था। आज के समय में विंग चुन के फाइटर्स दुनिया के सबसे जाने-माने फाइटर्स हैं।

भारतीय मूल -सरित सरक

#कराटे -
भारत में मार्शल आर्ट्स (Martial Art) के लिए अगर कोई सबसे ज़्यादा प्रयोग किये जाने वाला शब्द है, तो वो है ‘कराटे’। कराटे एक जापानी शब्द है जिसका अर्थ है ‘खाली हाथ’। इसमें हाथ और पैर को तलवार और चाकू की तरह प्रयोग किया जाता है। इसे बेस्ट सेल्फ़ डिफेंस भी माना गया है।

भारतीय मूल -नियुद्ध क्रीडे

#कुंग_फु -
कुंग फु एक चाइनीज़ मार्शल आर्ट (Martial Art) है, जिसका सरल शब्दों में अर्थ होता है ‘अपने से बड़े व शक्तिशाली पर विजय प्राप्त करना’। अगर हम इसके मूल में जाए तो हम पाते हैं कि चीन में इस कला को लाने वाले एक भारतीय राजकुमार ‘बोधिधर्मन’ थे। इनका नाम चीनवासी आदर के साथ लेते हैं। चीनियों ने इस कला को अपनाया और इसका विकास किया। लेकिन हम भारतीयों का दुर्भाग्य है कि हमने भारत में इस कला का दमन ही कर दिया।

भारतीय मूल - कल्लारिपयट्टु

#मुएय_थाई -
मुएय थाई, थाईलैंड का राष्ट्रीय खेल है और यह दुनिया की सबसे घातक मार्शल आर्ट में भी शामिल है। कुछ लोग इसे आठ अंगो का मार्शल आर्ट भी कहते है जिसमें कोहनी, मुट्ठी, घुटने और पैरो कि पिंडलियां शामिल हैं।

भारतीय मूल - वज्र मुष्टि

#कराव_मागा -
कराव मागा, दुनिया की सबसे बेहतरीन और श्रेष्ठ सेल्फ़ डिफेन्स टेक्निक्स में से एक है। इसका अविष्कार लमी लीचटेनफील्ड (Imi Lichtenfeld) ने किया था। वे दुनिया के बेहतरीन रेसलर, बॉक्सर और जिमनास्ट थे। इन्होंने कराव मागा को यहूदी समुदाय को बचाने के उद्देश्य से विकसित किया था। कराव मागा मार्शल आर्ट को इस्राइली सेना और पुलिस प्रयोग करती है।

भारतीय मूल - इनबुआन द्वंद्व

उपरोक्त सभी विधाओं का मूल भारतीय है सिर्फ नाम बदल गए है । सुश्रुत लिखित सुश्रुत संहिता में मानव शरीर के 107 स्थलों का उल्लेख है जिन में से 49 अंग अति संवेदनशील बताये गये हैं। यदि उन पर घूंसे से या किसी अन्य वस्तु से आघात किया जाये तो मृत्यु हो सकती है। भारतीय शस्त्राभ्यास के समय उन स्थलों पर आघात करना तथा अपने आप को आघात से कैसे बचाना चाहिये सिखाया जाता था। लगभग 630 ईस्वी में पल्लवराज नरसिंह्म वर्मन ने कई पत्थर की प्रतिमायें लगवायी थी जिन को निश्स्त्र अभ्यास करते समय अपने प्रतिद्वंद्वी को निष्क्रिय करते दर्शाया गया था। प्राचीन भारत मे कुल 124 युद्ध विधाएं वर्णित है लेकिन अभी सिर्फ 17 ही अस्तित्व में है जो निम्न है बाकी की सभी लुप्त हो चुकी है या मृतप्रायः है ।

1- अदिथाडा (Adithada)
2 - बोथाटी (Bothati)
3 - गतका (Gatka)
4 - इनबुआन द्वंद्व (Inbuan Wrestling)
5 - कल्लारिपयट्टु (Kalaripayattu)
6 - कुट्टू वरिसाई (Kuttu Varisai)
7 - लाठी (Lathi)
8 - मल्ल युद्ध (Mall Yudh)
9 - मलयुथम (Malyutham)
10 - मुकना (Mukna)
11 - नियुद्ध क्रीडे (Niyudh Kride)
12 - पहलवानी (Pehalwani)
13 - सरित सरक (Sarit Sarak)
14 - सिलम्बम (Silambam)
15 - थांग ता (Thang Ta)
16 - वरमा कलई (Varma Kalai)
17 - वज्र मुष्टि (Vajra Mushti)

#कलारिप्पयात

कलारिप्पयात या कलरीपायट्टु की व्याख्या पौराणिक गाथाओं में की गई है। इसका जन्म धनुर्वेद से हुआ है। धारणाओं के अनुसार कलरीपायट्टु सदियों पहले ही इजाद हो गया है। इस कला को दुनिया के सामने लाने वाले और उन्हें सिखाने वाले व्यक्ति थे भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम थे।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बाद के समय मे श्रीकृष्ण ने मार्शल आर्ट का विकास ब्रज क्षेत्र के वनों में किया था। डांडिया रास उसी का एक नृत्य रूप है।
सारी युद्ध कलाएं भगवान परशुराम जी द्वारा प्रदत्त कलरीपायट्टु की ही उपशाखाएं है ।।

कलारीपयट्टू युद्ध कला के आज के प्रचलित रूप को महर्षि अगस्त्य ने विकसित किया । उन्होंने कलरीपायट्टु का इस्तेमाल खास तौर पर जंगली जानवरों से लड़ने के लिए किया । अगस्त्य मुनि जंगलों में भ्रमण करते थे। उस समय इस क्षेत्र में काफी तादाद में जंगली जानवर रहते थे। जंगली जानवर इंसानों पर हमला कर देते थे इन हमलों से अपने बचाव के लिए अगस्त्य मुनि ने जंगली जानवरों से लड़ने का एक तरीका विकसित किया जो कलारिप्पयात का ही एक रूप था और वही आज का प्रचलित रूप है ।।

आज के कलरीपायट्टु का असल विस्तार हुआ 9वीं शताब्दी में जब केरल के योद्धाओं ने इसे युद्ध के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया, माना जाता है कि 11 वीं शताब्दी में चोल राजवंश, पाण्ड्य राजवंश और चेर साम्राज्य के बीच 100 साल तक चले एक युद्ध में कलरीपायट्टु का खूब इस्तेमाल किया गया , यह प्राचीनतम युद्ध कला यदि अभी तक जीवित है, तो इसका श्रेय यहाँ के लोगों को जाता है जिन्होंने इसे अभी तक जीवित रखा है। केरल की योद्धा जातियां जैसे नायर और चव्हाण ने इसमें मुख्य भूमिका निभाई है। यह जातियां केरल की योद्धा जातियां थी जोकि अपने राजा और राज्य की रक्षा के लिए इस युद्ध कला का अभ्यास किया करती थीं। कलरीपायट्टु मल्लयुद्ध का परिष्कृत रूप भी माना जाता है। कलरीपायट्टु शब्द अपने आप में इस कला का बखान करता है, यह शब्द दो शब्दों को जोड़ कर बना है। पहला “कलारी” जिसका मलयालम में अर्थ होता है व्यायामशाला है, तथा दूसरा “पयाट्टू” जिसका अर्थ होता है युद्ध, व्यायाम या “कड़ी मेहनत करना”

कलारीपयाट्टू की कई शैलियाँ हैं, जैसे उत्तरी कलारीपयाट्टू, दक्षिणी कलारीपयाट्टू, केंद्रीय कलारिपयाट्टू। ये तीन मुख्य विचार शैलियाँ अपने पर हमला करने और और सामने वाले के हमले से स्वयं को बचाने के तरीकों से पहचानी जाती हैं। इन शैलियों का सम्बन्ध दक्षिण के अलग-अलग क्षेत्रों से है। जैसे -

#दक्षिणी_कलारीपयाट्टू -
दक्षिणी कलारीपयाट्टू का सम्बन्ध त्रावणकोर से माना जाता है, इस शैली में हथियारों का प्रयोग वर्जित है यह स्कूल केवल खाली हाथ की तकनीक पर जोर देता है।

#उत्तरी_कलारीपयाट्टू -
उत्तरी कलारीपयाट्टू जिसका सम्बन्ध मालाबार से है यह शैली खाली हाथों की अपेक्षा हथियारों पर अधिक बल देता है।

#केंद्रीय_कलारिपयाट्टू -
केंद्रीय कलारिपयाट्टू का सम्बन्ध केरल के कोझीकोड, मलप्पुरम, पालाक्काड, त्रिश्शूर और एर्नाकुलम से है, इस पद्धति में दक्षिणी और उत्तरी शैली का मिलाजुला रूप देखने को मिलता है। यहाँ कोचीन सांस्कृतिक केन्द्र में इन तीन मुख्य शैलियों का प्रदर्शन किया जाता है।

#कलारीपयाट्टू_प्रशिक्षण मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा गया है – मिथारी, कोल्थारी और अंक्थरी–

#मिथारी -
इसमें सबसे पहले शरीर की मजबूती और ताकत को बढ़ाने के लिए विभिन्न कसरत कराई जाती है। एक अच्छा योद्धा बनने के लिए सबसे जरूरी है कि शरीर पूरी तरह मजबूत हो, ताकि सामने आने वाली किसी भी बाधा से निपटा जा सके।

#कोल्थारी -
इस पड़ाव में अलग-अलग प्रकार के लकड़ी के हथियार होते हैं, जिनसे लड़ना सिखाया जाता है। किसी शुरूआती योद्धा को धारदार हथियारों से लड़वाना सही नहीं माना जाता। चूंकि नए योद्धा हथियारों से अनजान होते हैं, इसलिए वह खुद को क्षति पहुँचा सकते हैं। इस वजह से योद्धा की शुरूआती ट्रेनिंग लकड़ी के बने हथियारों से होती है।

#अंक्थरी -
इसी तरह इस पड़ाव तक आने में योद्धा लकड़ी के हथियारों से खुद को पूरी तरह युद्ध के लायक बना लेता है। अब बस समय आता है कि उसे असली हथियार दिए जाएं ताकि वह असली जिम्मेदारी को समझ पाएं। इस पड़ाव में उसे भाले, ढाल, तलवार आदि जैसे खतरनाक हथियार दिए जाते हैं। कई बार लड़ाई में ऐसे मौके भी आ सकते हैं जिसमें योद्धा के हाथ में हथियार न हो। ऐसी परिस्थिति के लिए भी कलरी में योद्धाओं को तैयार किया जाता है। कहते हैं कि उन्हें बिना हथियार भी दुश्मन का सामना करने के लिए ट्रेनिंग दी जाती है। इसके बाद यह सुनिश्चित हो जाता है कि वह किसी भी परिस्थिति में कमजोर नहीं पड़ने वाला।

इस कला के अंत में कलरी ‘मार्मा’ का विशेष प्रशिक्षण होता है। इसका उद्देश्य मानव शरीर के सभी 107 ऊर्जा बिंदुओं को जानने और सक्रिय करना होता है। इन महत्वपूर्ण बिंदुओं का उपयोग शरीर में ऊर्जा-प्रवाह को सुधारने के लिए किया जाता है।

#भारतीय_युद्ध_कलाओं_का_निर्यात -

भारत ने कभी उन लोगों का इतिहास नहीं लिखा या संरक्षित नहीं किया जो भारत के लिए महत्वपूर्ण थे उनमें से एक थे बोधीधर्मन। दुनिया के महान भिक्षुओं में से एक बोधीधर्मन को जो नहीं जानता वह मार्शल आर्ट के इतिहास को भी नहीं जानता होगा। चीन में मार्शल आर्ट और कुंग फू जैसी विद्या को सिखाया था बोधीधर्मन ने।
बोधिधर्म का जन्म दक्षिण भारत में पल्लव राज्य के कांचीपुरम के राजा परिवार में हुआ था। छोटी आयु में ही उन्होंने राज्य छोड़ दिया और भिक्षुक बन गए। 22 साल की उम्र में उन्होंने संबोधि (मोक्ष की पहली अवस्था) को प्राप्त किया। प्रबुद्ध होने के बाद राजमाता के आदेश पर उन्हें सत्य और ध्यान के प्रचार-प्रसार के लिए चीन में भेजा गया। 522 ईसवी में वह चीन के महाराज लियांग-नुति के दरबार में आए। उन्होंने चीन के मोंक्स को कलारिप्पयातकी कला का प्रशिक्षण दिया ताकि वह अपनी रक्षा स्वयं कर सकें। शीघ्र ही वह शिक्षार्थी इस कला के पारांगत हो गये जिसे कालान्तर शाओलिन मुष्टिका प्रतियोग्यता के नाम से पहचाना गया। बोधिधर्म ने जिस कला के साथ प्राणा पद्धति (चीं) को भी संलगित किया और उसी से आक्यूपंक्चर का समावेश भी हुआ। ईसा से 500 वर्ष पूर्व जब बुद्ध मत का प्रभाव भारत में फैला तो नटराज को बुद्ध धर्म संरक्षक के रूप में पहचाना जाने लगा। उन का नया नामकरण नरायनादेव ( चीनी भाषा में ना लो यन तिंय) पडा तथा उन्हें पूर्वी दिशा मण्डल के संरक्षक के तौर पर जाना जाता है।
देखते ही देखते यह नई युद्ध विद्या चीन से निकल और आस-पास के बाकी देशों तक फैल गई। बोधिधर्मन की सिखाई इस विद्या को ‘जेन बुद्धिज्म’ का नाम दिया गया।और इस तरह भारतीय संस्कृति से निकली मार्शल आर्ट्स अलग अलग नमो से विभिन्न देशों में फैलती चली गयी ।।

#विशेष -
धनुर्वेद यजुर्वेद का उपवेद है जिसमें धनुष चलाने की विद्या का निरूपण है। वैशम्पायन द्वारा रचित नीतिप्रकाश या नीतिप्रकाशिका नामक ग्रन्थ में धनुर्वेद के बारे में जानकारी है। धनुर्वेद के अलावा इस ग्रन्थ में राजधर्मोपदेश, खड्गोत्पत्ति, मुक्तायुधनिरूपण, सेनानयन, सैन्यप्रयोग एवं राज व्यापार पर आठ अध्यायों में तक्षशिला में वैशम्पायन द्वारा जन्मेजय को दिया गया शिक्षण है। इस ग्रंथ में राजशास्त्र के प्रवर्तकों का उल्लेख है। भारतीय सैन्य विज्ञान का नाम धनुर्वेद होना सिद्ध करता है कि वैदिक काल में भी प्राचीन भारत में धनुर्विद्या प्रतिष्ठित थी।

संहिताओं और #ब्राह्मणों में वज्र के साथ ही धनुष बाण का भी उल्लेख मिलता है। भारत की सैन्यकला विश्वविख्यात है।दुनिया भर में लोग भारतीय युद्ध कला को समझते और सीखते हैं, लेकिन भारत में जन्मी सबकी जननी जिसे उस दर्जे की पहचान और लोकप्रियता नहीं मिली जिसकी वह हक़दार है। वह है कलरीपायट्टु! भारतीय संस्कृति और सभ्यता की बात करें तो उसमें बहुत कुछ है जिसने दुनिया को सभ्य बनाया। समय के साथ सब कुछ बदलता रहता है लेकिन उनमें से कुछ बदलाव लाभदायक होते हैं और कुछ नुकसानदायक। कुछ बातों को छोड़ने से आपकी पहचान मिट जाती है और इसके दुष्परिणाम आपकी आने वाले पीढ़ियों को भुगतना होते हैं। आप जब भी संस्कृति और सभ्यता की बात करेंगे तो आपको निश्चित ही रूढ़िवादी या कट्टरवादी माना जाने लगेगा। ऐसी मानसिकता को आपके दिमाग में भरने वाले वे ही लोग हैं, जो आपकी संस्कृति और सभ्यता को आधुनिकता या बौद्धिकता के नाम पर समाप्त करना चाहते हैं। आपको अपने देश और संस्कृति से विद्रोह करना सिर्फ एक दिन में नहीं सिखाया गया है। यह तो सैकड़ों साल की गुलामी और बाजारवाद का परिणाम है। जब हम भारतीय संस्कृति की बात करते हैं तो उसका हिस्सा सभी धर्म, जाति, प्रांत और समाज के लोग हैं। अत: संस्कृति को बचाना उन सभी लोगों की जिम्मेदारी है जो खुद को सनातनी कहते है ।।

।। #धर्मसंस्थापनार्थाय_सम्भवामि_युगे_युगे ।।

Om namah Shivay
13/10/2021

Om namah Shivay

🚩  #हिन्दू" शब्द की खोज 🚩"हीनं दुष्यति इति हिन्दूः।”अर्थात जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं।'हिन्दू...
31/03/2021

🚩 #हिन्दू" शब्द की खोज 🚩
"हीनं दुष्यति इति हिन्दूः।”

अर्थात जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं।

'हिन्दू' शब्द, करोड़ों वर्ष प्राचीन,
संस्कृत शब्द है!

अगर संस्कृत के इस शब्द का सन्धि विछेदन करें तो पायेंगे ....
#हीन+दू = हीन भावना + से दूर

अर्थात जो हीन भावना या दुर्भावना से दूर रहे, मुक्त रहे, वो हिन्दू है !

हमें बार-बार, हमेशा झूठ ही बतलाया जाता है कि हिन्दू शब्द मुगलों ने हमें दिया, जो "सिंधु" से "हिन्दू"हुआ l

हिन्दू शब्द की वेद से ही उत्पत्ति है !

जानिए, कहाँ से आया हिन्दू शब्द, और कैसे हुई इसकी उत्पत्ति ?

भारत में बहुत से लोग हिन्दू हैं, एवं वे हिन्दू धर्म का पालन करते हैं l
अधिकतर लोग "सनातन धर्म" को हिन्दू धर्म मानते हैं।

कुछ लोग यह कहते हैं कि *हिन्दू शब्द सिंधु से बना है* औऱ यह फारसी शब्द है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं है!

हमारे "वेदों" और "पुराणों" में *हिन्दू शब्द का उल्लेख* मिलता है। आज हम आपको बता रहे हैं कि हमें हिन्दू शब्द कहाँ से मिला है!

"ऋग्वेद" के *"ब्रहस्पति अग्यम"* में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार आया हैं :-
*“हिमलयं समारभ्य
*यावत इन्दुसरोवरं ।
*तं देवनिर्मितं देशं
*हिन्दुस्थानं प्रचक्षते।

अर्थात : हिमालय से इंदु सरोवर तक, देव निर्मित देश को हिंदुस्तान* कहते हैं!

केवल #वेद" ही नहीं, बल्कि #शैव" ग्रन्थ में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार किया गया हैं:-

"हीनं च दूष्यतेव् हिन्दुरित्युच्च ते प्रिये।”

अर्थात :- जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं!
इससे मिलता जुलता लगभग यही श्लोक " #कल्पद्रुम" में भी दोहराया गया है :

"हीनं दुष्यति इति हिन्दूः।”

अर्थात जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं।

"पारिजात हरण" में हिन्दू को कुछ इस प्रकार कहा गया है :-

”हिनस्ति तपसा पापां
दैहिकां दुष्टं ।
हेतिभिः श्त्रुवर्गं च
स हिन्दुर्भिधियते।”

अर्थात :- जो अपने तप से शत्रुओं का, दुष्टों का, और पाप का नाश कर देता है, वही हिन्दू है !

"माधव दिग्विजय" में भी हिन्दू शब्द को कुछ इस प्रकार उल्लेखित किया गया है :-

“ओंकारमन्त्रमूलाढ्य
पुनर्जन्म द्रढ़ाश्य:।
गौभक्तो भारत:
गरुर्हिन्दुर्हिंसन दूषकः ।

अर्थात : वो जो "ओमकार" को ईश्वरीय धुन माने, कर्मों पर विश्वास करे, गौपालक रहे, तथा बुराइयों को दूर रखे, वो हिन्दू है!

केवल इतना ही नहीं, हमार
"ऋगवेद" (८:२:४१) में

विवहिन्दू नाम के बहुत ही पराक्रमी और दानी राजा का वर्णन मिलता है, जिन्होंने ४६,००० गौमाता दान में दी थी! और "ऋग्वेद मंडल" में भी उनका वर्णन मिलता है l
बुराइयों को दूर करने के लिए सतत प्रयास रत रहनेवाले, सनातन धर्म के पोषक व पालन करने वाले हिन्दू हैं।
" हिनस्तु दुरिताम" 🙏🏻🙏🏻

औरो को भी बतायें।

आपको गर्व अनुभव होगा के हम अति प्राचीन ज्ञान के एकमात्र धारक सनातन धर्मीय परिवार में जन्म लिए है।भारतवर्ष में जन्म लिए ह...
30/12/2020

आपको गर्व अनुभव होगा के हम अति प्राचीन ज्ञान के एकमात्र धारक सनातन धर्मीय परिवार में जन्म लिए है।

भारतवर्ष में जन्म लिए है।

आज के वैज्ञानिक समय कैसे नापते है?

पिकोसेकेण्ड
नैनो सेकेण्ड
माईक्रो सेकेण्ड,
सेकेण्ड
60 सेकेण्ड मे 1 मिनट,
60 मिनट मे 1 घन्टा,
24 घन्टे मे 1 दिन,(पृथ्वी के आपनी धुरी पर घुमना)
30 दिन मे 1 माह
12 माह मे 1 साल या वर्ष ।(पृथ्वी का सुर्य को एक वार परिक्रमण करना)

वस?

अव वेद मे आते है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

*1 परमाणु = काल की सबसे सूक्ष्मतम अवस्था
*2 परमाणु = 1 अणु
*3 अणु = 1 त्रसरेणु
*3 त्रसरेणु = 1 त्रुटि
*10 ‍त्रुटि = 1 प्राण
*10 प्राण = 1 वेध
*3 वेध = 1 लव या 60 रेणु
*3 लव = 1 निमेष
*1 निमेष = 1 पलक झपकने का समय
*2 निमेष = 1 विपल (60 विपल एक पल होता है)
*3 निमेष = 1 क्षण
*5 निमेष = 2 सही 1 बटा 2 त्रुटि

*2 सही 1 बटा 2 त्रुटि = 1 सेकंड या 1 लीक्षक से कुछ कम।
*20 निमेष = 10 विपल, एक प्राण या 4 सेकंड
*5 क्षण = 1 काष्ठा
*15 काष्ठा = 1 दंड, 1 लघु, 1 नाड़ी या 24 मिनट
*2 दंड = 1 मुहूर्त
*15 लघु = 1 घटी=1 नाड़ी
*1 घटी = 24 मिनट, 60 पल या एक नाड़ी
*3 मुहूर्त = 1 प्रहर
*2 घटी = 1 मुहूर्त= 48 मिनट
*1 प्रहर = 1 याम
*60 घटी = 1 अहोरात्र (दिन-रात) (पृथ्वी के आपनी धुरी पर घुमना )

*15 दिन-रात = 1 पक्ष
*2 पक्ष = 1 मास (पितरों का एक दिन-रात)
*कृष्ण पक्ष = पितरों का एक दिन और शुक्ल पक्ष = पितरों की एक रात।
*2 मास = 1 ऋतु
*3 ऋतु = 6 मास

*6 मास = उत्तरायन (देवताओं का एक दिन-)वाकि 6 मास दक्षिणायण(देवता की रात)

*2 अयन = 1 वर्ष (पृथ्वी के सुर्य की परिक्रमा करना)

*मानवों का एक वर्ष = देवताओं का एक दिन जिसे दिव्य दिन कहते हैं।

*1 वर्ष = 1 संवत्सर=1 अब्द
*10 अब्द = 1 दशाब्द
*100 अब्द = शताब्द

*360 वर्ष = 1 दिव्य वर्ष अर्थात देवताओं का 1 वर्ष।

* 12,000 दिव्य वर्ष = एक महायुग (चारों युगों को मिलाकर एक महायुग) =43,20,000 मानव वर्ष

सतयुग : 4800 देवता वर्ष ×360(17,28,000मानव वर्ष)
त्रेतायुग : 3600 देवता वर्ष× 360(12,96000मानव वर्ष)
द्वापरयुग : 2400 देवता वर्ष×360 (8,64000मानव वर्ष)
कलियुग : 1200 देवता वर्ष×360 (4,32000 मानव वर्ष)

* 71 महायुग = 1 मन्वंतर
* चौदह मन्वंतर = एक कल्प।
* एक कल्प = ब्रह्मा का एक दिन। (ब्रह्मा का एक दिन बीतने के बाद महाप्रलय होती है और फिर इतनी ही लंबी रात्रि होती है)। इस दिन और रात्रि के आकलन से उनकी आयु 100 वर्ष होती है। उनकी आधी आयु निकल चुकी है और शेष में से यह प्रथम कल्प है।
* ब्रह्मा का वर्ष यानी 31 खरब 10 अरब 40 करोड़ वर्ष। ब्रह्मा की 100 वर्ष की आयु अथवा ब्रह्मांड की आयु- 31 नील 10 अरब 40 अरब वर्ष (31,10,40,00,00,00,000 वर्ष)

अव एक अहोरात्र (24 घंटे) पृथ्वी आपनी धुरी पर घुमती है।
एक वर्ष ( 365 दिन) मे जैसे पृथ्वी सुर्य की चारो तरफ घुमती है।

ठीक उसी तरहा सुर्य भी सारे ग्रह के साथ आकाशगंगा नाम के निहारिका की (पुराणो में आकाश गंगा शिशुमार चक्र नाम से प्रसिद्ध है) परिक्रमा कर रहै।

सिर्फ हमारे सुर्य ही नही और भी सुर्य आपने ग्रह मण्डल को लेकर इसकी परिक्रमा करते है । वेद के अनुसार हमारे आकाश गंगा में (शिशुमार चक्र में) 8 सुर्य है।

1)आरोग
2)भाज
3)पटर
4)पतंग
5)स्वर्णर
6)ज्योतिषीमान
7)विभास
8)कश्यप

हमारे सुर्य का नाम आरोग है।

रुको रुको अभी भी वाकी है सुर्य को आकाश गंगा(शिशुमार चक्र) की एक चक्कर लगाने मे जितना समय लगता है उसे ही एक मनवंतर काल कहते है (4 युग मिलाकर 1 दिव्य युग 71 दिव्य युग मे एक मनवंतर पहले वता चुकी ) इये करने मे
4320000×71=30,84,48000 वर्ष लगते है।
आधुनिक विज्ञान इसे मानते है और उनके हिसाब से 25,00,00000 समय लगता है।

आधुनिक विज्ञान इस से आगे नही जा पाये।

मगर ऋषी खोज कर लिये

अभी भी वाकि है👉आकाशगंगा के जैसा कई निहारिका है जिसके अन्दर वहुतो सुर्य मण्डल और पृथ्वी जैसे ग्रह है।

ये सारी निहारिका एक व्रम्हाण्ड की परिक्रमा कर रहे। जिसके लिए एक कल्प (14 मन्वंतर मे एक कल्प) लग जाते हे। समय 4320000000 मानव वर्ष

ऐसे हाजारो व्रम्हाण्ड है। जो आपने इन निहारिका ग्रह नक्षत्र को लेकर ध्रुव मण्डल की परिक्रमा कर रहे।
इसमे व्रम्हा की 100 वर्ष (31,10,40,00,00,00,000 मानव वर्ष )समय लगता है

ये वात तब की है जब भगवान ने ध्रुव जी को ये मण्डल प्रदान करते हुए कहे। सारे व्रम्हाण्ड लय होने पर भी ध्रुव लोक नष्ट नही होगा तुम मेरे गोद मे सदा सुरक्षित रहो गे।
सप्त ॠषी आपने ग्रह नक्षत्र के साथ सदैव तुमको प्रदक्षिणा करेंगे ।(भागवतपुराण )

सबसे अद्भुत वात ये हे ये सव परस्पर आकर्षण वल के प्रभाव से एक नियम अनुसार आपने में निर्दिष्ट दुरी रख कर युगो से प्ररिक्रमा करके चल रहे।

क्या अब भी भगवान पर विश्वास नही?

क्या अब भी सोच रहे है ये सिस्टम अपने आप बना है?

फैसला आप पर।

सत्य सनातन धर्म की जय हो ।

 #ध्वनि_विज्ञानसभी भाषाओं में एक वचन और बहुवचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। इस द्विवचन पर ध्यान द...
12/11/2020

#ध्वनि_विज्ञान

सभी भाषाओं में एक वचन और बहुवचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। इस द्विवचन पर ध्यान दें तो पायेंगे कि यह द्विवचन बहुत ही उपयोगी और लाभप्रद है। जैसे :- राम शब्द के द्विवचन में निम्न रूप बनते हैं:- रामौ , रामाभ्यां और रामयो:। इन तीनों शब्दों के उच्चारण करने से योग के क्रमश: मूलबन्ध ,उड्डियान बन्ध और जालन्धर बन्ध लगते हैं, जो योग की बहुत ही महत्वपूर्ण क्रियायें हैं।

संस्कृत में जब दो शब्द पास में आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। उस बदले हुए उच्चारण में जिह्वा आदि को कुछ विशेष प्रयत्न करना पड़ता है।ऐसे सभी प्रयत्न एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति के प्रयोग हैं।"इति अहं जानामि" इस वाक्य को चार प्रकार से बोला जा सकता है, और हर प्रकार के उच्चारण में #वाक्_इन्द्रिय को विशेष प्रयत्न करना होता है।

यथा:- 1 इत्यहं जानामि। 2 अहमिति जानामि। 3 जानाम्यहमिति । 4 जानामीत्यहम्। इन सभी उच्चारणों में विशेष आभ्यंतर प्रयत्न होने से #एक्यूप्रेशर_चिकित्सा पद्धति का सीधा प्रयोग अनायास ही हो जाता है। जिसके फल स्वरूप मन बुद्धि सहित समस्त शरीर पूर्ण स्वस्थ एवं निरोग हो जाता है। इन समस्त तथ्यों से सिद्ध होता है कि संस्कृत भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान की भाषा ही नहीं ,अपितु मनुष्य के सम्पूर्ण विकास की कुंजी है। यह वह भाषा है, जिसके उच्चारण करने मात्र से व्यक्ति का कल्याण हो सकता है। इसीलिए इसे देवभाषा कहते हैं। संस्कृत भाषा का व्याकरण अत्यंत परिमार्जित एवं वैज्ञानिक है।

संस्कृत के एक वैज्ञानिक भाषा होने का पता उसके किसी वस्तु को संबोधन करने वाले शब्दों से भी पता चलता है। इसका हर शब्द उस वस्तु के बारे में, जिसका नाम रखा गया है, के सामान्य लक्षण और गुण को प्रकट करता है। ऐसा अन्य भाषाओं में बहुत कम है। पदार्थों के नामकरण ऋषियों ने वेदों से किया है और वेदों में यौगिक शब्द हैं और हर शब्द गुण आधारित हैं ।
इस कारण संस्कृत में वस्तुओं के नाम उसका गुण आदि प्रकट करते हैं। जैसे हृदय शब्द। हृदय को अंगेजी में हार्ट कहते हैं और संस्कृत में हृदय कहते हैं।

अंग्रेजी वाला शब्द इसके लक्षण प्रकट नहीं कर रहा, लेकिन संस्कृत शब्द इसके लक्षण को प्रकट कर इसे परिभाषित करता है। #बृहदारण्यकोपनिषद 5.3.1 में हृदय शब्द का अक्षरार्थ इस प्रकार किया है-

Address

Balaji Puram , Anand Lok Colony, Shah Pur Matiyari , Chinhat
Lucknow
226028

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