Swami Sanatan Shri - Sanatan Aashram

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वेद जो हमारे पूर्वजों की बहुमूल्य धरोहर है ,आज अतिदुर्लभ है दुर्भाग्यवश आज वेद मात्र कर्मकाण्ड तक सीमित रहगए है और स्वामीजी के अलावा कोई वेद का ज्ञान नहीं दें पा रहां, अतः हम इस बहुमूल्य प्रसाद को तिरस्कृत न करें और इस ज्ञान को हम अपने जीवन में धारण करें

24/04/2026

सूर्य आत्मा का कारक है, और गोचर में जब वह परम उच्च के हो रहे है, ऐसे पावन समय में खुलता है ब्रह्मांड का एक अनुपम रहस्य, जिसे आजतक हम प्रत्येक हवन यज्ञ और पूजा के बोलते तो आए पर कभी अर्थ नहीं समझ पाएं । यह है ऋग्वेद के सविता सूक्त में वर्णित सूर्य का मंत्र । कौन कहता है वेद समझ नहीं आते? या वेद को समझा नहीं जा सकता । असल में हमें इस पावन आत्मज्ञान से परिचय ही नहीं पाने दिया । किंतु आज इस पावन अवसर को जाने न दें, अवश्य सुनिए

न भूतो न भविष्यति। वैदिक सूर्यमंत्र “आ कृष्णेन रजसा” का रहस्योद्घाटन | Swami Sanatan Shri Ji Maharaj

🔱 मंत्र:
ॐ आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन्।

🙏 अगर आप सनातन ज्ञान, वेद और ज्योतिष के गूढ़ रहस्यों को समझना चाहते हैं —
तो इस पेज को Follow अवश्य करें ।

14/03/2026
15/02/2026

Shiva Tandav Stotram ke Sath Rudraabhishek

15/02/2026

शिव आराधना

28/12/2025

प्रहलाद की कथा में उभरती भक्त मात्र की कहानी - स्वामी सनातन श्री

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27/12/2025

कलियुग केवल नाम अधारा । सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा ।।

संत तुसली के मानस के दोहे का तत्त्वार्थ

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11/11/2025

स्वामी सनातन श्री महाराज द्वारा आदिभारती पत्रिका में...

वेद उपदेश श्रृंखला - १३महाभारत का क्रमबद्ध धारावाहिक - १रूरू और प्रमद्वरा की कथा भगवान वेदव्यास के द्वारा महाभारत की कल्...
12/06/2025

वेद उपदेश श्रृंखला - १३

महाभारत का क्रमबद्ध धारावाहिक - १

रूरू और प्रमद्वरा की कथा

भगवान वेदव्यास के द्वारा महाभारत की कल्पना एवं उसका उद्देश्य।

नारद की कथा

शुकदेव की कथा

मेधातिथि काण्व १३ सुस॑मिद्धो न॒ आव॑ह दे॒वाँ अ॑ग्ने ह॒विष्म॑ते। होतः॑ पावक॒ यक्षि॑ च ॥ १.२.२.१ ॥

सु = दिव्य, अलौकिक
स॑म् = समान, अदृश्य
इद्धः = चमकने, प्रकाशित होने वाले
नः॒ = हमलोग
आ = आकर, आवाहन द्वारा
व॒ह॒ = वहन, धारण करने वाले
दे॒वान् = देवता, देवत्व प्रदान करने वाले, आत्मा के रूप में शरीरों में व्याप्त ।
ह॒विष्म॑ते = हवन सामग्रियों को ग्रहण करने वाले, यज्ञ में हवन सामग्री को भस्म करने वाले
होत॒: = यज्ञकर्ता, यज्ञ में न्यौछावर होने वाला,यजमान !
पा॒व॒क॒ = पवित्र अग्नियों में, यज्ञ ज्वालाओं में
यक्षि॑ = यजन, पूजन, समर्पण, व्याप्त होने वाला
च॒ = तथा, इस प्रकार ॥१.२.२.१॥

वेद उपदेश श्रृंखला - १३महाभारत का क्रमबद्ध धारावाहिक - १रूरू और प्रमद्वरा की कथा भगवान वेदव्यास के द्वारा महाभारत ...

वेद उपदेश श्रृंखला - ९( महाशिवरात्री विशेष )मेधातिथि काण्व ९ यो अ॒ग्निं दे॒ववी॑तये ह॒विष्माँ॑ आ॒विवा॑सति। तस्मै॑ पावक मृ...
03/06/2025

वेद उपदेश श्रृंखला - ९

( महाशिवरात्री विशेष )
मेधातिथि काण्व ९ यो अ॒ग्निं दे॒ववी॑तये ह॒विष्माँ॑ आ॒विवा॑सति। तस्मै॑ पावक मृळय॥१.२.१.९॥

यो - जो
अ॒ग्निं - ब्रह्मज्ञानियों में
दे॒व - अमर
वी॑तये - व्याप्त हो गए
ह॒विष्माँ॑ - हव्य, सामग्री के समान
आ॒विवा॑सति - आकर वास कर गए, अग्नियों में संकल्य ।
तस्मै॑ - उनको
पावक - पवित्र अग्नियों में
मृळय - अमर अवस्थाओं में, सदा सदा के लिए लय अर्थात व्याप्त कर लिया ॥
फिर प्रलय द्वारा आवागमन नहीं हुआ उनका ।

वेद उपदेश श्रृंखला - ९( महाशिवरात्री विशेष )मेधातिथि काण्व ९ यो अ॒ग्निं दे॒ववी॑तये ह॒विष्माँ॑ आ॒विवा॑सति। तस्मै॑...

वेद उपदेश श्रृंखला ८ ( महाभारत एवं श्रीमद्भगवद्गीता की पृष्ठभूमि एवं अर्जुन के पांच संशय )मेधातिथि काण्व ८ यस्त्वाम॑ग्ने...
03/06/2025

वेद उपदेश श्रृंखला ८

( महाभारत एवं श्रीमद्भगवद्गीता की पृष्ठभूमि एवं अर्जुन के पांच संशय )

मेधातिथि काण्व ८ यस्त्वाम॑ग्ने ह॒विष्प॑तिर्दू॒तं दे॑व सप॒र्यति॑। तस्य॑ स्म प्रावि॒ता भ॑व ॥ १.२.१.८ ॥

यः - जो
त्वाम् - आपमें
अ॒ग्ने॒ - हे अग्ने ! हे ब्रह्मज्वाला!
ह॒विःऽप॑तिः - सामग्री के अधिपति अर्थात यज्ञ
दू॒तम् - दूत है, प्रतिनिधि है,
दे॒व॒ - आत्मा के
स॒प॒र्यति॑ - समर्पित होता, पर्याय बनता , यज्ञ का, यज्ञ को अर्पित होकर, यज्ञ का ही पर्याय बनकर, जीवन को धारण करता है ।
तस्य॑ - उनके ऐसे तपस्वियों में आप
स्म॒ - समाधिस्थ, समाहित होकर
भ॒व॒ - प्रदान करते
प्रावि॒ता - विशिष्ट उत्पत्ति, नित्य अमर जन्म ।

वेद उपदेश श्रृंखला ८ ( महाभारत एवं श्रीमद्भगवद्गीता की पृष्ठभूमि एवं अर्जुन के पांच संशय )मेधातिथि काण्व ८ यस्त्व....

20/05/2025

परम श्रद्धेय स्वामी सनातन श्रीजी महाराज जी की अध्यक्षता में श्री सनातन आश्रम द्वारा प्रकाशित आदि भारती मासिक पत्रिका के प्रथम वर्ष का प्रथम अंक ( विमोचन एवं स्थापना अंक :- मकर संक्रांति जनवरी १९८९ )

स्वामी सनातन श्री जी महाराज की अध्यक्षता में श्री सनातन...

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