08/08/2020
|| Hindu Unity Movement ||
राम में चारो वर्ण व वर्ण से अतीत राम (१)
मित्रों,
भगवान राम के कई रूपों का शास्त्रों में वर्णन मिलता है|उन्हे निराकार निर्गुण,निराकार सगुण,साकार सगुण,पुराण पुरुष व इतिहास पुरुष के रूप में जाना,माना व बखाना गया है|कबीर दास ने उनके चार रूपों को बताया है|यथा :-
एक राम दशरथ का बेटा|एक राम घट घट में बैठा|
एक राम का सकल पसारा|एक राम है सबसे न्यारा|
अर्थात एक राम दशरथ के पुत्र हैं,एक राम प्रत्येक शरीर मे प्रकाशरूप से रहते हैं,एक राम का ही सब कुछ विस्तार है और एक राम इन सबसे परे है|
सन्त श्री गोस्वामी तुलसीदास ने अपने ग्रन्थ रामचरितमानस के माध्यम से यह बताया है कि दशरथ पुत्र राम है ,वही पुराण का भी पुरुष है,जो दशरथ का बेटा है,वही घट-घट में बैठा है,वही सब जगह जगत रूप से विस्तृत है और वही सबसे परे भी|यथा:-
जय जय अविनासी सब घट वासी व्यापक परमानन्दा|
पुरुष प्रसिद्ध प्रकाशनिधि प्रगट परावर नाथ|
रघुकुलमणि मम स्वामि सोइ कहि शिव नायउ माथ||
सीयराम मय सब जग जानी|करहु प्रनाम जोरि जुग पानी|
अर्थात हे अविनाशी आपकी जय हो,आप समस्त घटों में वास करते हैं,आप सर्वत्र व्याप्त हैं और परमानन्द स्वरूप हैं, जो पुरुष प्रकाश के समुद्र के रूप में विख्यात है,सबके नाथ के रूप मे प्रगट है वह रघुकुलमणि राम मेरा स्वामी है|(तत्व विज्ञान के अनुसार मूल तत्व पुरुष है,महत, प्रधानादि शेष समस्त तत्व उसी से उत्पन्न हैं,उसी पुरुष को परमात्मा कहा गया है)मैं सारे जगत को सीताराम मय जानकर दोनो हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ| कबीर और तुलसी के राम को भिन्न भिन्न कहने वाले भूल कर रहे हैं|कबीर ने जो ''एक राम''शब्द का प्रयोग किया है|वह महत्वपूर्ण है|
हम विषयान्तर के भय से विस्तार से बचकर यहाँ पर राम को मात्र इतिहास पुरुष के रूप में लेकर चर्चा करेंगे|
मित्रजन,आज जो लिखा जा रहा है,हो सकता है कि वह आपके लिए अद्भुत हो,राम स्वयं अद्भुत हैं |जो भी कहा जाये कम है|
शास्त्रों के अनुसार परमात्मा से ही चारो वर्ण प्रकट हुये हैं| रामचरितमानस के अनुसार विष्णु के अवतार भगवान राम ने स्वयं कहा है कि :-
सब मम प्रिय सब मम उपजाये|सबते अधिक मनुज मोहि भाये|
अर्थात सभी मुझको प्रिय व सभी मेरे द्वारा उत्पन्न किये गये हैं|सभी में मनुष्य मुझे सबसे अधिक प्रिय हैं|
विष्ण के ही अवतार कृष्ण भगवतगीता अ०४श्लोक १३ में कहते हैं कि :-
''चतुर्वर्णेन मया स्रष्टं''
अर्थात कृष्ण कहते हैं कि चारो वर्ण की रचना मेरे द्वारा की गयी है|
हरिवंश पुराण के अनुसार :-
''अभिनिर्वर्तिता वर्णाश्चिन्त्यमानेन विष्णुना,,
अर्थात भगवान विष्णु ने चिंतना से चारो वर्णों की उत्पत्ति की|
वेद में वर्णित पुरुष सूक्त के अनुसार :-
ब्राह्मणो मुखमासीद् बाहु: राजन्य:कृत:|
उरुतदस्य यद्वैश्य पदभ्याम् शूद्रो अजायत्|
अर्थात जिस परमात्मरूप पुरुष का ब्राह्मण मुख हैं,क्षत्रिय जिसकी भुजायें से उत्पन्न हैं,जिसका उदर वैश्य हैं ,जिसके पद से शूद्र हुये हैं|
स्वाभाविक प्रश्न उत्पन्न होता है कि जिस राम से समस्त वर्णों की उत्पत्ति हुयी हो,क्या उसका कोई वर्ण विशेष हो सकता है|बुद्धि यह भी विचार करती है कि जब जीव मनुष्य शरीर धारण करता है तो उसका एक वर्ण होता है,परन्तु जब परमात्मा लोक कल्याण हेतु मनुष्य शरीर धारण करता है,अर्थात अवतार लेता है,तो क्या वह किसी वर्ण विशेष की सीमा से आबद्ध होता है या उसके पार|जब इस प्रश्न का गंभीरता पूर्वक विचार किया तो यह पाया कि भगवान राम को यद्यपि शास्त्रों में राजा दशरथ के कुल में जन्म लेने के कारण,क्षत्रिय कहा गया है,परन्तु भगवान राम स्वयं में चारो वर्ण बीज रूप से विद्यमान थे,और चारो वर्ण प्रगट भी थे|वे चारो वर्णों के कर्ता भी थे और प्रतीक भी|वे चारो वर्णो से अतीत और पार भी थे|
मित्रजन,अगली कुछ पोस्टों के माध्यम से यथा संभव आपके समक्ष यह रखा जायेगा कि भगवान राम में चारो वर्ण अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र कैसे थे|और वे चारो वर्ण से अतीत कैसे|
धन्यवाद|