Hindu Unity Movement

Hindu Unity Movement Eradicating discrimination on the basis of “Varna & Caste”
to establish equal opportunity amongst every person in any social or religious field.

30/06/2023

!! नमो राघवाय !!Jagadguru Sri Rambhadracharya ji शूद्र वर्ण बहुत पवित्र है जाने कैसेब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,शूद्र वर्ण को भगवान ने कैसे .....

06/11/2021

कुछ दिनों पहले अमेरिका में एक सम्मेलन आयोजित हुआ था, जिसका विषय था - पूरी दुनिया में मौजूद हिंदुत्व को खत्म करना। सद...

12/09/2020

|| Hindu Unity Movement ||

चारो वर्ण के प्रतीक श्रीराम में वैश्यत्व व शूद्रत्व

मित्रों,

भगवान श्रीराम परमात्मस्वरुप से चारो वर्णों के जनक हैं इस कारण उनमें चारो वर्ण बीजरूप से अवश्य थे|उन्होने राम रूप में अवतार लिया,इसलिए उनके अवताररूप में भी चारो वर्ण होना चाहिए|हमने अपनी पिछली पोस्टों में धर्मशास्त्रों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि मनुष्य रूप में अवतरित दशरथनन्दन श्रीराम को ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ण का कैसे कहा जा सकता है|

आज की पोस्ट के माध्यम से हम प्रभु श्रीराम में वैश्यत्व और शूद्रत्व कैसे कहा जा सकता है,धर्मशास्त्रों के आधार पर कहने का प्रयास करेंगे|जिन किन्ही सज्जन को यह पोस्ट पढ़कर त्रुटि लगे वे मेरे माता पिता की भांति इसे बालवचन मानकर विनोद स्वरूप ले लेवें |
श्रीमद् भगवतगीता के अनुसार :-

'' कृषि वाणिज्य गोरक्ष्य वैश्य कर्म स्वभावजम ''
अर्थात कृषि,व्यापार ,गाय की रक्षा वैश्य का स्वाभाविक कर्म है|
वैश्य के लिए यह कत्तई आवश्यक नही है कि वह तीनो कर्म को करता हो,यदि इन तीन में से व्यक्ति स्वभावत: कोई एक भी कर्म करता हो तो उसे वैश्य कहा जायेगा|

रामचरितमानस के अनुसार श्रीराम के अवतार के प्रमुख उद्देश्यों में गायों की रक्षा एक प्रमुख उद्देश्य था|यथा:-
''विप्र धेनु सुर सन्त हित लीन्ह मनुज अवतार''
अर्थात श्रीराम ने विप्र,गाय,देवता और सन्त का भला करने( रक्षा) हेतु अवतार लिया|

इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि श्रीराम में वैश्यत्व विद्यमान था|
जहाँ तक शूद्रत्व की बात है तो देखिए श्रीराम के शरीर का रंग श्याम(नीला)था|यथा:-

''नीलाम्बुजश्यामल कोमलांगं ''
अथवा
''नील सरोरुह नीलमणि नील नील घनश्याम''
अब जरा हरिवंशपुराण के अनुसार वर्ण व्यवस्था देखिए:-
श्वेतलौहितकैवर्णै: पीतैर्नीलैश्च ब्राह्मणा:|
अभिनिर्वर्तिता वर्णाश्चिन्यमानेन विष्णुना|
ततो वर्णत्वमापन्ना: प्रजालोकचतुर्विधा|
ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: शूद्राश्च महीपते|
साराशंत: हे ब्राह्मण भगवान विष्णु द्वारा चिन्तन करने पर सफेद,लाल,पीले और नीले रंग के चार वर्ण उत्पन्न हुए जो प्रजारूप से क्रमश: ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र कहलाए|
इससे यह स्पष्ट होता है कि शूद्र का रंग नीला हुआ|श्रीराम का रंग भी तो नीला ही था|
एक अन्य दृष्टि से विचार करें|''शूद्र'' शब्द की व्युतपत्ति 'शूँ, धातु से हुयी है|महर्षि पाणिनि के अनुसार 'शूँ,पावने अर्थात जो पावन करता हो|राम को 'पावनं पावनानाम्'कहा गया है|उनके नाम को भी पावन करने वाला कहा गया है,यथा:-
सुमिरि पवनसुत पावन नामू|अपने बस करि राखे रामू||
उपरोक्त प्रकार से यदि देखा जाए तो श्रीराम में वैश्य और शूद्र वर्ण की विद्यमानता से इन्कार नही किया जा सकता है|

धन्यवाद|

15/08/2020

|| Hindu Unity Movement ||

चारो वर्ण के प्रतीक श्रीराम में वैश्यत्व व शूद्रत्व

मित्रों,

भगवान श्रीराम परमात्मस्वरुप से चारो वर्णों के जनक हैं इस कारण उनमें चारो वर्ण बीजरूप से अवश्य थे|उन्होने राम रूप में अवतार लिया,इसलिए उनके अवताररूप में भी चारो वर्ण होना चाहिए|हमने अपनी पिछली पोस्टों में धर्मशास्त्रों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि मनुष्य रूप में अवतरित दशरथनन्दन श्रीराम को ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ण का कैसे कहा जा सकता है|

आज की पोस्ट के माध्यम से हम प्रभु श्रीराम में वैश्यत्व और शूद्रत्व कैसे कहा जा सकता है,धर्मशास्त्रों के आधार पर कहने का प्रयास करेंगे|जिन किन्ही सज्जन को यह पोस्ट पढ़कर त्रुटि लगे वे मेरे माता पिता की भांति इसे बालवचन मानकर विनोद स्वरूप ले लेवें |

श्रीमद् भगवतगीता के अनुसार :-

'' कृषि वाणिज्य गोरक्ष्य वैश्य कर्म स्वभावजम ''
अर्थात कृषि,व्यापार ,गाय की रक्षा वैश्य का स्वाभाविक कर्म है|
वैश्य के लिए यह कत्तई आवश्यक नही है कि वह तीनो कर्म को करता हो,यदि इन तीन में से व्यक्ति स्वभावत: कोई एक भी कर्म करता हो तो उसे वैश्य कहा जायेगा|

रामचरितमानस के अनुसार श्रीराम के अवतार के प्रमुख उद्देश्यों में गायों की रक्षा एक प्रमुख उद्देश्य था|यथा:-
''विप्र धेनु सुर सन्त हित लीन्ह मनुज अवतार''
अर्थात श्रीराम ने विप्र,गाय,देवता और सन्त का भला करने( रक्षा) हेतु अवतार लिया|

इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि श्रीराम में वैश्यत्व विद्यमान था|
जहाँ तक शूद्रत्व की बात है तो देखिए श्रीराम के शरीर का रंग श्याम(नीला)था|यथा:-

''नीलाम्बुजश्यामल कोमलांगं ''
अथवा
''नील सरोरुह नीलमणि नील नील घनश्याम''
अब जरा हरिवंशपुराण के अनुसार वर्ण व्यवस्था देखिए:-
श्वेतलौहितकैवर्णै: पीतैर्नीलैश्च ब्राह्मणा:|
अभिनिर्वर्तिता वर्णाश्चिन्यमानेन विष्णुना|
ततो वर्णत्वमापन्ना: प्रजालोकचतुर्विधा|
ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: शूद्राश्च महीपते|

साराशंत: हे ब्राह्मण भगवान विष्णु द्वारा चिन्तन करने पर सफेद,लाल,पीले और नीले रंग के चार वर्ण उत्पन्न हुए जो प्रजारूप से क्रमश: ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र कहलाए|
इससे यह स्पष्ट होता है कि शूद्र का रंग नीला हुआ|श्रीराम का रंग भी तो नीला ही था|

एक अन्य दृष्टि से विचार करें|''शूद्र'' शब्द की व्युतपत्ति 'शूँ, धातु से हुयी है|महर्षि पाणिनि के अनुसार 'शूँ,पावने अर्थात जो पावन करता हो|राम को 'पावनं पावनानाम्'कहा गया है|उनके नाम को भी पावन करने वाला कहा गया है,यथा:-

सुमिरि पवनसुत पावन नामू|अपने बस करि राखे रामू||
उपरोक्त प्रकार से यदि देखा जाए तो श्रीराम में वैश्य और शूद्र वर्ण की विद्यमानता से इन्कार नही किया जा सकता है|

धन्यवाद|

10/08/2020

|| Hindu Unity Movement ||

चारों वर्णों के जनक,राम में क्षत्रियत्व

मित्रों,
हमने अपनी पिछली पोस्टों में यह प्रमाणित किया था कि राम परमात्मस्वरूप से चारो वर्णों के जनक हैं,अर्थात चारो वर्ण राम से ही उत्पन्न हुए,इसलिए चारो वर्ण उनमें विद्यमान थे|हमने आपका परिचय इस वास्तविकता से भी कराया कि दशरथसुतराम के रूप में अवतरित श्रीराम में न केवल ब्राह्मण के समस्त शास्त्रोक्त गुण थे बल्कि उनके जन्म के समय जो ग्रह स्थिति थी,उस समय चन्द्रमा कर्क राशि में था इसलिए ज्योतिष के अनुसार उनका वर्ण ब्राह्मण था|

आज की पोस्ट में भगवान श्रीराम में क्षत्रियत्व की विद्यमानता कैसे थी,यह आपके सामने रखा जा रहा है|
सर्वप्रथम तो यह जान लें कि मनुस्मृति के अनुसार :-

सर्ववर्णेषु तुल्य़ांसु पत्नीष्वक्षत योनिषु|
आनुलोम्येन सम्भूता जात्या ग्येयास्त एव ते||

अर्थात सभी वर्णों में सजातीय अक्षत योनि वाली स्त्रियों से अनुलोम विधि से जो संतान होगी वह उसी वर्ण की होगी|
राजा दशरथ और माता कौशल्या का वर्ण क्षत्रिय था इसलिए भगवान राम का वर्ण क्षत्रिय माना गया|

यदि गुण,कर्म और लक्षण की दृष्टि से उनके वर्ण का विचार किया जाय तो आप पायेंगे उनमें क्षत्रिय के भी सारे गुण और कर्म भी विद्यमान थे|इसको इस प्रकार से देखा जा सकता है:-
क्षत्रिय के आवश्यक गुण और कर्म जैसे शास्त्रों में वर्णित हैं वे निम्न प्रकार से हैं :-

श्रीमद् भगवत गीता के अनुसार:-

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्|
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्|

अर्थात शूरवीरता,तेज,धैर्य,चतुरता,सन्मुख युद्ध से न भागना,दान देना,सब पर स्वामिभाव,क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं |

१- श्रीराम की शूरवीरता और धैर्य से युक्त होना:-
सर्वप्रथम तो स्वयं श्रीराम ने स्वयं में इस गुण की विद्यमानता अपने श्रीमुख से लंकाकांड में विभीषणजी से कही है,जब विभीषण रावण के सम्मुख युद्ध में उन्हे पैदल देख राम से संदेह व्यक्त किया कि रावण रथ पर सवार है और आप न तो पगत्राण(जूता)पहने हैं और न रथ पर सवार हैं,जबकि रावण रथ पर आसीन है,युद्ध कैसे जीतेंगे,तब राम जी ने कहा कि मैं जिस रथ पर सवार हूँ ,उसमें शौर्य और धैर्य रूपी पहिया है:-

सौरज धीरज जेहि रथ चाका|
इस प्रकार यह दोनो गुणों की स्वयं में विद्यमानता श्रीराम ने स्वयं बतायी है|

२-श्रीराम का तेजयुक्त होना:-
यद्पि प्रभु श्रीराम को ब्रम्हरूप से परमप्रकाशरूप बार-बार कहा गया गया है,यथा;-
''जगत प्रकास्य प्रकासक रामू'' अर्थात राम परम प्रकाशरूप और जगत के प्रकाशक हैं |

अथवा भगवान शिव द्वारा यह कहा गया है''पुरुष प्रसिद्ध प्रकाशनिधि''अर्थात राम प्रकाश का खजाना हैं |

फिर भी मनुष्यरूप में भी उन परमप्रकाशरूप को उनके गुरु विश्वामित्र द्वारा जो विद्या प्रदान की गयी वह उनके तन में अतुलित बल और तेज प्रकाशित करती थी|यथा:-

तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही|विद्यानिधि कहुँ विद्या दीन्ही|
जाते लाग न छुधा पिपासा|अतुलित बल तन तेज प्रकासा|
सीतास्वयंवर प्रसंग में जब श्रीराम की धनुषभंग करने को चले तो माता सुनयना को उनकी सामर्थ्य पर शंका होने पर एक चतुर सखी ने उनसे कहा कि:-

बोली चतुर सखी मृदु बानी|तेजवंत लघु गनिअ न रानी|
अर्थात एक चतुर सखी ने सुनयना जी से कहा कि हे रानी राम तेज से युक्त हैं उन्हे छोटा न समझो|

३-श्रीराम में दान और चतुरतारूपी गुण:-रामकथा को यदि जरा भी ध्यान से देखा जाए तो यह स्पष्टरूप से परिलक्षित होता है श्रीराम दान और चतुरतारूप गुण से परिपूर्ण थे|चतुरता के लिए आवश्यक है बुद्धिमान होना|क्यों कि चतुरता तो बुद्धि का एक श्रेष्ठ गुण है|श्रीराम ने स्वयं मे अतितीव्र बुद्धि का होना कहा है|विभीषण को यह बताया कि वे जिस अध्यात्मिक रथ पर सवार है,उसमें दानरूप फरसा है और बुद्धिरूप प्रचंड शक्ति है|यथा:-

''दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा''
४-श्रीराम का युद्ध से न भागने का गुण:-सूर्पणषा की नासिकाभंग के पश्चात जब खर-दूषण ने राम और लक्षमण को नृपबालक जानकर यह सोचकर कि वे वध के योग्य नही हैं,दूत भेजकर श्रीराम से कहलवाया कि सीता देकर जीवन की रक्षा कर चले जाओ तो श्रीराम ने उत्तर दिया कि:-

रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं |एक बार कालहु सन लरहीं |
अर्थात हम बलवान शत्रु देखकर हम डरते नही और काल के सामने होने पर उससे भी युद्ध करते हैं |

राम जी के संपूर्ण चरित्र को देखने से स्पष्ट है कि उन्होने बार-बार शत्रु को अवसर दिया कि शत्रु भूल सुधार ले और युद्ध न करे परन्तु युद्ध सन्मुख होने की अवस्था में युद्ध से हटे नही और न ही कभी युद्ध से पलायन किया|

५- श्रीराम का स्वामिभाव:-यद्यपि यह निर्विवाद है कि श्रीराम सारे जगत के स्वामी हैं|समस्त ऋषिगण ने बार-बार उन्हे स्वामीरूप से संबोधित किया है|उदाहरण के महर्षि अत्रि ने उन्हे संबोधित करते हुए कहा कि:-

केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी|कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी|
श्रीराम ने सुतीक्ष्ण ने भी श्रीराम को संबोधित करते हुए कहा था:-

जे जानहि ते जानहुँ स्वामी|सगुन अगुन उर अंतरजामी|
उन्हे वर देकर अपना स्वामिभाव प्रदर्शित किया|लक्षमण को यह कहते हुये कि मैं भक्ति से शीघ्र प्रसन्न होता हूँ और|शबरी जी को नवधाभक्ति का उपदेश देते हुए यह कहते हुए कि नौ मे से भक्ति का एक भी रूप रखने वाला मुझे अत्यधिक प्रिय है,अपने स्वामिभाव का ही प्रदर्शन किया और उनके पूरे जीवन में बारंबार इस भाव का प्रदर्शन मिलता है|

मित्रजन,उपरोक्त प्रकार से यह स्पष्ट है प्रभु श्रीराम में एक क्षत्रिय के सम्पूर्ण गुण अपनी सर्वश्रेष्ठ अवस्था में विद्यमान थे|
अगली पोस्ट में श्रीराम में बाकी दो वर्णो की विद्यमानता से आपका परिचय कराने का प्रयास करूंगा |

धन्यवाद।

08/08/2020

|| Hindu Unity Movement ||

राम में चारो वर्ण व वर्ण से अतीत राम (१)

मित्रों,
भगवान राम के कई रूपों का शास्त्रों में वर्णन मिलता है|उन्हे निराकार निर्गुण,निराकार सगुण,साकार सगुण,पुराण पुरुष व इतिहास पुरुष के रूप में जाना,माना व बखाना गया है|कबीर दास ने उनके चार रूपों को बताया है|यथा :-

एक राम दशरथ का बेटा|एक राम घट घट में बैठा|
एक राम का सकल पसारा|एक राम है सबसे न्यारा|

अर्थात एक राम दशरथ के पुत्र हैं,एक राम प्रत्येक शरीर मे प्रकाशरूप से रहते हैं,एक राम का ही सब कुछ विस्तार है और एक राम इन सबसे परे है|

सन्त श्री गोस्वामी तुलसीदास ने अपने ग्रन्थ रामचरितमानस के माध्यम से यह बताया है कि दशरथ पुत्र राम है ,वही पुराण का भी पुरुष है,जो दशरथ का बेटा है,वही घट-घट में बैठा है,वही सब जगह जगत रूप से विस्तृत है और वही सबसे परे भी|यथा:-

जय जय अविनासी सब घट वासी व्यापक परमानन्दा|
पुरुष प्रसिद्ध प्रकाशनिधि प्रगट परावर नाथ|
रघुकुलमणि मम स्वामि सोइ कहि शिव नायउ माथ||
सीयराम मय सब जग जानी|करहु प्रनाम जोरि जुग पानी|
अर्थात हे अविनाशी आपकी जय हो,आप समस्त घटों में वास करते हैं,आप सर्वत्र व्याप्त हैं और परमानन्द स्वरूप हैं, जो पुरुष प्रकाश के समुद्र के रूप में विख्यात है,सबके नाथ के रूप मे प्रगट है वह रघुकुलमणि राम मेरा स्वामी है|(तत्व विज्ञान के अनुसार मूल तत्व पुरुष है,महत, प्रधानादि शेष समस्त तत्व उसी से उत्पन्न हैं,उसी पुरुष को परमात्मा कहा गया है)मैं सारे जगत को सीताराम मय जानकर दोनो हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ| कबीर और तुलसी के राम को भिन्न भिन्न कहने वाले भूल कर रहे हैं|कबीर ने जो ''एक राम''शब्द का प्रयोग किया है|वह महत्वपूर्ण है|

हम विषयान्तर के भय से विस्तार से बचकर यहाँ पर राम को मात्र इतिहास पुरुष के रूप में लेकर चर्चा करेंगे|
मित्रजन,आज जो लिखा जा रहा है,हो सकता है कि वह आपके लिए अद्भुत हो,राम स्वयं अद्भुत हैं |जो भी कहा जाये कम है|

शास्त्रों के अनुसार परमात्मा से ही चारो वर्ण प्रकट हुये हैं| रामचरितमानस के अनुसार विष्णु के अवतार भगवान राम ने स्वयं कहा है कि :-

सब मम प्रिय सब मम उपजाये|सबते अधिक मनुज मोहि भाये|
अर्थात सभी मुझको प्रिय व सभी मेरे द्वारा उत्पन्न किये गये हैं|सभी में मनुष्य मुझे सबसे अधिक प्रिय हैं|
विष्ण के ही अवतार कृष्ण भगवतगीता अ०४श्लोक १३ में कहते हैं कि :-

''चतुर्वर्णेन मया स्रष्टं''
अर्थात कृष्ण कहते हैं कि चारो वर्ण की रचना मेरे द्वारा की गयी है|
हरिवंश पुराण के अनुसार :-
''अभिनिर्वर्तिता वर्णाश्चिन्त्यमानेन विष्णुना,,
अर्थात भगवान विष्णु ने चिंतना से चारो वर्णों की उत्पत्ति की|
वेद में वर्णित पुरुष सूक्त के अनुसार :-
ब्राह्मणो मुखमासीद् बाहु: राजन्य:कृत:|
उरुतदस्य यद्वैश्य पदभ्याम् शूद्रो अजायत्|
अर्थात जिस परमात्मरूप पुरुष का ब्राह्मण मुख हैं,क्षत्रिय जिसकी भुजायें से उत्पन्न हैं,जिसका उदर वैश्य हैं ,जिसके पद से शूद्र हुये हैं|

स्वाभाविक प्रश्न उत्पन्न होता है कि जिस राम से समस्त वर्णों की उत्पत्ति हुयी हो,क्या उसका कोई वर्ण विशेष हो सकता है|बुद्धि यह भी विचार करती है कि जब जीव मनुष्य शरीर धारण करता है तो उसका एक वर्ण होता है,परन्तु जब परमात्मा लोक कल्याण हेतु मनुष्य शरीर धारण करता है,अर्थात अवतार लेता है,तो क्या वह किसी वर्ण विशेष की सीमा से आबद्ध होता है या उसके पार|जब इस प्रश्न का गंभीरता पूर्वक विचार किया तो यह पाया कि भगवान राम को यद्यपि शास्त्रों में राजा दशरथ के कुल में जन्म लेने के कारण,क्षत्रिय कहा गया है,परन्तु भगवान राम स्वयं में चारो वर्ण बीज रूप से विद्यमान थे,और चारो वर्ण प्रगट भी थे|वे चारो वर्णों के कर्ता भी थे और प्रतीक भी|वे चारो वर्णो से अतीत और पार भी थे|
मित्रजन,अगली कुछ पोस्टों के माध्यम से यथा संभव आपके समक्ष यह रखा जायेगा कि भगवान राम में चारो वर्ण अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र कैसे थे|और वे चारो वर्ण से अतीत कैसे|

धन्यवाद|

07/08/2020

ॐॐॐ Hindu Unity Movement ॐॐॐ

चारो वर्ण के प्रतीक राम में ब्राह्मणत्व कैसे?

मित्रों/प्रिय पाठक गण,

इस पोस्ट को लिखने से पूर्व मेरे मन ने श्रीमद् गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लिखित निम्नवर्णित चौपाईयों का स्मरण किया:-

छमिहहि सज्जन मोर ढिठाई|सुनिहहि बाल वचन मन लाई|
जो बालक कह तोतरि बाता|सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता|

गोस्वामी जी से प्रेरणा पाकर हम यह निवेदन करते हैं कि यदि आपको कोई त्रुटि या भूल लगे तो कृपया इस लेख के लेखक को माता-पिता की भांति अपने अबोध बालक का कथन जानकर आप हमें क्षमा कर दें |

भगवान श्रीराम जो इतिहास के पुरुष रूप में भी जाने जाते हैं,लेखक के व्यक्तिगत मत एवं विचारानुसार परमात्म स्वरूप में चारो वर्ण के सृजक थे और चारो वर्ण उनमें बीज रूप से विद्यमान और प्रकट भी थे और उनकी यह विशेषता उन्हे परमात्मरूप में प्रतिष्ठित करती है|आज की पोस्ट के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया जा रहा है कि भगवान राम ब्रह्मणत्व के प्रतीक भी थे|

भगवान श्रीराम का जन्म चैत्र मास में शुक्ल पक्ष की नवमीं तिथि में अभिजित मुहूर्त में होना गोस्वामी तुलसीदास ने वर्णित किया है:-

नौमी तिथि मधुमास पुनीता|शुकुल पक्ष अभिजित हरि प्रीता|

महर्षि बाल्मीकि ने भगवान राम के जन्म समय की ग्रह स्थिति का वर्णन रामायण के अठारहवें सर्ग में किया है,जो निम्न प्रकार से है:-

ततो यग्ये समाप्ते तु ऋतूनां षट् समत्ययु:|
ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ|!८!
नक्षत्रे९दितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पंचसु|
ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह |!९!
प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्वलोक नमस्कृतम्|
कौशल्या जनयद् रामं दिव्यलक्षण संयुतं|!१०!

अर्थात यज्ञ की समाप्ति के पश्चात जब छह ऋतुयें बीत गयीं,तब बारहवें मास में चैत्र के शुक्ल पक्ष की नवमीं तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र एवं कर्क लग्न में कौश्ल्या देवी ने दिव्य लक्षणों से युक्त सर्वलोक वन्दित जगदीश्वर श्रीराम को जन्म दिया|उस समय पाँच ग्रह(सूर्य,मंगल,शनि, गुरु और शुक्र) अपनी उच्च राशि में विद्यमान थे तथा लग्न में चंद्रमा के साथ बृहस्पति विराजमान थे|

ज्योतिष ग्रन्थों के अनुसार पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में जब चन्द्रमा होता है तो जातक की जन्मराशि कर्क ही होती है और कर्क राशि के जातक का जन्म वर्ण ''ब्राह्मण'' होता है|इस प्रकार से यदि विचार किया जाए तो राम का वर्ण ''ब्राह्मण''सिद्ध होता है|

आइये एक दूसरे तरीके से राम के ब्राह्मणवर्ण का विचार करें और देखें कि क्या राम में ब्राह्मणत्व प्रकट भी था या नही|श्रीमद् भगवद् गीता के अध्याय ४शलोक १३ के अनुसार वर्ण का विभाग गुण और कर्मो के अनुसार किया गया है|यथा:-

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:|
तस्य कर्तारपि माम विद्धयकर्तामव्ययम|

अर्थात चारो वर्ण की सृष्टि मेरे द्वारा गुण और कर्म के विभागपूर्क की गयी है|उनका कर्ता भी तुम मुझ अविनाशी को जानो|

त्रेतायुग में जब राम का जन्म हुआ और उन्होने लोक लीला की उस समय ब्राह्मण में नौ गुण विशेष हुआ करते थे,ऐसा गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा है:-

नवगुन परम पुनीत तुम्हारे|नाथ एक गुन धनुष हमारे|
ब्राह्मण के आवश्यकीय नौ गुण हमारे धर्मशास्त्रों में निम्न प्रकार से बताये गये हैं -

ऋजु: तपस्वी संतोषी क्षमा लज्जा जितेन्द्रिय:|
ज्ञानी दाता दयालुश्च ब्राह्मणो नवभिर्गुणै:|

अर्थात कोमलता,तप करने का स्वभाव,संतोष,क्षमा,लज्जायुक्त, जितेन्द्रियता,ज्ञानवान,दानीपन,और दयालुता ब्राह्मण के गुण होते हैं |

आइये देखिए यह समस्त गुण राम में विद्यमान थे,ऐसा प्रकट है|

१-राम का कोमल होना:- गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं :-

कोमल चित अति दीनदयाला|कारन बिनु रघुनाथ कृपाला|
अर्थात रघुनाथ श्रीराम दीनदयाल और बिना कारण सब पर कृपा करने वाले और अत्यन्त कोमल चित्त वाले हैं |

२-राम का तपस्वी होना:-माता कैकेई ने राजा दशरथ से जो दो वर मांगे थे,उनमे एक वर यह भी था कि राम तपस्वी का भेष धारण कर संसार से उदास रहकर वन में रहें |यथा:-

तापस बेष विशेषि उदासी|चौदह बरिस रामु वनवासी|
पिता के उस वचन की रक्षार्थ राम वन गये और तपस्या की|सन्त तुलसीदास जी लिखते हैं कि:-

आगें रामु लखनु बने पाछें |तापस बेष विराजत काछें |
और
तहँ बसि कंद मूल फल खाई|प्रात नहाइ चले रघुराई|
और
कोल किरात बेष सब आए|रचे परन तृन सदन सुहाए|

श्रीराम जी माता कैकेई के द्वारा मांगे गये वरदान कि राम तपस्वी का भेष धारण कर चौदह वर्ष के लिये वन में रहे,पर्ण कुटी बनाकर कंद मूल और फल खाकर रहे|यह प्रमाणित करता है राम तपस्वी की भांति रहते थे|

३-संतोषी राम:-संतोष को किसी वस्तु की हानि और अप्राप्ति की अवस्था अविचलित रहने को कहते हैं|श्रीराम का पूरा जीवन देखा जाए तो वे कभी भी असंतुष्ट दिखे ही नही|जब राम को युवराज पद दिये जाने की घोषणा हो चुकी थी और उनका अभिषेक किये जाने की तैयारी चल रही थी,उन्हे अपने पिता के वचन की रक्षा हेतु वन की बात माता कैकेई द्वारा बतायी गयी तो जो राम की प्रतिक्रिया थी ,वह उनके संतोषरूपी गुण का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था|गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं:-

मन मुसुकाइ भानुकुल भानू|राम सहज आनंद निधानू|
सुनु जननी सोइ सुत बड़भागी|जो पितु मातु वचन अनुरागी|
राज्य की अप्राप्ति की दशा में सहज आनंदनिधान राम द्वारा यह कहना कि वह पुत्र बड़भागी है जो माता पिता के वचन के प्रति अनुराग रखता हो|उनके संतोषी स्वभाव को प्रमाणित करता है|

४-राम का क्षमाशील होना:-जहाँ तक क्षमारूपी गुण की बात है|राम सहज ही क्षमा से युक्त थे|गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं :-

क्षमहु क्षमा मन्दिर दोउ भ्राता|
गएें सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि|
राम स्वयं भी अपने क्षमारूपी गुण से संपन्न होने की बात, विभीषण से उस दशा में जब विभीषण रावण को रथारूढ़ और राम रथ से हीन देखकर अधीर होता है,बताते हैं और कहते हैं कि वे जिस अध्यात्मिक रथ पर सवार हैं,उसमे क्षमारूपी रस्सी जुड़ी है,अर्थात वे क्षमा से युक्त हैं |यथा:-

बल विवेक दम परहित घोरे|क्षमा कृपा समता रजु जोरे|
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि राम क्षमारूप गुण से युक्त थे|
५-राम का लज्जा से युक्त होना:-लज्जा अर्थात शर्म कुपथ पर चलने से बचाव का मनोभाव है|रघुनाथ जी पुष्पवाटिका प्रसंग में स्वयं अपने मुख अपने गुण को बताते हुए कहते हैं|

रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ|मनु कुपंथ पग धरइ न काऊ|
मोहि अतिसय प्रतीत मन केरी|जेहिं सपनेहु परनारि न हेरी|
अर्थात रघुवंशियो का यह सहज स्वभाव है कि उनका मन कुपथ पर पैर नही रखता हैमुझे अपने मन का पूर्ण विश्वास है कि उसने स्वप्न मे भी परायी स्त्री को खोजा नही है|इससे अधिक लज्जा क्या होगी|

६-राम का जितेन्द्रिय होना:-जितेन्द्रियता,इन्द्रियों के दमन को कहते है और इन्द्रिय संयम को भी|यह दम नाम से अधिक प्रयुक्त है|प्रभु श्रीराम ने स्वयं अपने में दमरूपी होना विभीषण से लंकाकांड में बताया है|यथा :-

बल विवेक दम परहित घोरे|क्षमा कृपा समता रजु जोरे|
अर्थात मै जिस अध्यात्मिक रथ पर सवार हूँ उसमें विवेकरूपी बल और इन्द्रिय दमन और परहित रूपी घोड़े जुड़े हैं |
भगवान श्रीराम के संपूर्ण चरित्र को देखने से स्पष्ट है कि इन्द्रियो को उन्होने जीत रखा था ,उन्होने कोई ऐसा कार्य नही किया जो इन्द्रिय से प्रेरित रहा हो|

७-राम का ज्ञानी होना:-महर्षि विस्वामित्र के अनुसार तो राम स्वयं ज्ञान के आश्रय थे|यथा:-

ग्यान बिराग सकल गुन अयना|सो प्रभु मैं देखब भरि नयना|
अर्थात प्रभु श्रीराम ज्ञान और वैराग के भवन हैं,उन प्रभु को मैं अपनी आखों से भर भर कर देखूंगा |

सारी रामायणों में राम को परम ज्ञानी कहा गया है|उनके अनेकानेक उपदेश राम कथाओं में संकलित हैं |

८-राम में दानशीलता का होना:-अपने में दानरूपी गुण होने की बात श्रीराम द्वारा स्वयं कही गयी है|वास्तव में लंकाकांड राम विभीषण से अपने को जिस रथ पर सवार होना कहते हैं,वह उनके ब्राह्मणत्व का संक्षित परिचय है|वह कहते हैं कि वे जिस अध्यात्मिक रथ पर सवार हैं:-

दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा|बर बिग्यान कठिन कोदंडा|
अर्थात उस रथ में दान रूपी फरसा है और बुद्धिरूपी प्रचंड शक्ति है और श्रेष्ठ विज्ञानरूपी धनुष है|
राम चरित्र देखने से स्पष्ट होता है कि वे सदैव स्वभावत:दान करते थे|

९-राम की दयालुता:-रामचरित मानस में बारंबार श्रीराम के लिए दयासिन्धु,दयानिधि और दयानिधान शब्दों का प्रयोग किया गया है|प्रमाण के लिए:-

जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई|
और

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी|
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि राम में ब्राह्मणोचित सारे नौ के नौ गुण विद्यमान थे,इस कारण से राम में ब्राह्मणत्व होना प्रत्यक्ष दिखायी पड़ता है|

मित्रजन,अगली पोस्टों में राम में अन्य वर्ण का होना आपके सामने रखा जायेगा |

धन्यवाद।

01/08/2020

|| Hindu Unity Movement ||

मित्रजन,
आज जो लिखा जा रहा है,हो सकता है कि वह आपके लिए अद्भुत हो,राम स्वयं अद्भुत हैं | जो भी कहा जाये कम है|

~राम में चारो वर्ण व वर्ण से अतीत राम (१)~

मित्रों,
भगवान राम के कई रूपों का शास्त्रों में वर्णन मिलता है|उन्हे निराकार निर्गुण,निराकार सगुण,साकार सगुण,पुराण पुरुष व इतिहास पुरुष के रूप में जाना,माना व बखाना गया है|कबीर दास ने उनके चार रूपों को बताया है|यथा :-

एक राम दशरथ का बेटा|एक राम घट घट में बैठा|
एक राम का सकल पसारा|एक राम है सबसे न्यारा|

अर्थात एक राम दशरथ के पुत्र हैं,एक राम प्रत्येक शरीर मे प्रकाशरूप से रहते हैं,एक राम का ही सब कुछ विस्तार है और एक राम इन सबसे परे है|

सन्त श्री गोस्वामी तुलसीदास ने अपने ग्रन्थ रामचरितमानस के माध्यम से यह बताया है कि दशरथ पुत्र राम है ,वही पुराण का भी पुरुष है,जो दशरथ का बेटा है,वही घट-घट में बैठा है,वही सब जगह जगत रूप से विस्तृत है और वही सबसे परे भी| यथा:-

जय जय अविनासी सब घट वासी व्यापक परमानन्दा|
पुरुष प्रसिद्ध प्रकाशनिधि प्रगट परावर नाथ|
रघुकुलमणि मम स्वामि सोइ कहि शिव नायउ माथ||
सीयराम मय सब जग जानी|करहु प्रनाम जोरि जुग पानी|

अर्थात हे अविनाशी आपकी जय हो,आप समस्त घटों में वास करते हैं,आप सर्वत्र व्याप्त हैं और परमानन्द स्वरूप हैं, जो पुरुष प्रकाश के समुद्र के रूप में विख्यात है,सबके नाथ के रूप मे प्रगट है वह रघुकुलमणि राम मेरा स्वामी है|(तत्व विज्ञान के अनुसार मूल तत्व पुरुष है,महत, प्रधानादि शेष समस्त तत्व उसी से उत्पन्न हैं,उसी पुरुष को परमात्मा कहा गया है)मैं सारे जगत को सीताराम मय जानकर दोनो हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ| कबीर और तुलसी के राम को भिन्न भिन्न कहने वाले भूल कर रहे हैं|कबीर ने जो ''एक राम''शब्द का प्रयोग किया है|वह महत्वपूर्ण है|

हम विषयान्तर के भय से विस्तार से बचकर यहाँ पर राम को मात्र इतिहास पुरुष के रूप में लेकर चर्चा करेंगे|

शास्त्रों के अनुसार परमात्मा से ही चारो वर्ण प्रकट हुये हैं| रामचरितमानस के अनुसार विष्णु के अवतार भगवान राम ने स्वयं कहा है कि :-

सब मम प्रिय सब मम उपजाये|सबते अधिक मनुज मोहि भाये|
अर्थात सभी मुझको प्रिय व सभी मेरे द्वारा उत्पन्न किये गये हैं|सभी में मनुष्य मुझे सबसे अधिक प्रिय हैं|
विष्ण के ही अवतार कृष्ण भगवतगीता अ०४श्लोक १३ में कहते हैं कि :-

''चतुर्वर्णेन मया स्रष्टं''
अर्थात कृष्ण कहते हैं कि चारो वर्ण की रचना मेरे द्वारा की गयी है|
हरिवंश पुराण के अनुसार :-
''अभिनिर्वर्तिता वर्णाश्चिन्त्यमानेन विष्णुना,,
अर्थात भगवान विष्णु ने चिंतना से चारो वर्णों की उत्पत्ति की|
वेद में वर्णित पुरुष सूक्त के अनुसार :-
ब्राह्मणो मुखमासीद् बाहु: राजन्य:कृत:|
उरुतदस्य यद्वैश्य पदभ्याम् शूद्रो अजायत्|
अर्थात जिस परमात्मरूप पुरुष का ब्राह्मण मुख हैं,क्षत्रिय जिसकी भुजायें से उत्पन्न हैं,जिसका उदर वैश्य हैं ,जिसके पद से शूद्र हुये हैं|

स्वाभाविक प्रश्न उत्पन्न होता है कि जिस राम से समस्त वर्णों की उत्पत्ति हुयी हो,क्या उसका कोई वर्ण विशेष हो सकता है|बुद्धि यह भी विचार करती है कि जब जीव मनुष्य शरीर धारण करता है तो उसका एक वर्ण होता है,परन्तु जब परमात्मा लोक कल्याण हेतु मनुष्य शरीर धारण करता है,अर्थात अवतार लेता है,तो क्या वह किसी वर्ण विशेष की सीमा से आबद्ध होता है या उसके पार| जब इस प्रश्न का गंभीरता पूर्वक विचार किया तो यह पाया कि भगवान राम को यद्यपि शास्त्रों में राजा दशरथ के कुल में जन्म लेने के कारण,क्षत्रिय कहा गया है,परन्तु भगवान राम स्वयं में चारो वर्ण बीज रूप से विद्यमान थे,और चारो वर्ण प्रगट भी थे| वे चारो वर्णों के कर्ता भी थे और प्रतीक भी|वे चारो वर्णो से अतीत और पार भी थे|
मित्रजन,अगली कुछ पोस्टों के माध्यम से यथा संभव आपके समक्ष यह रखा जायेगा कि भगवान राम में चारो वर्ण अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र कैसे थे| और वे चारो वर्ण से अतीत कैसे|

धन्यवाद|

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