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10/08/2026
हनुमान जी की उपासना सम्बंधित संशय समाधान🙏हनुमान जी की उपासना महिलाएं व पुरूष दोनों कर सकते हैं लेकिन बहुत से लोगों का मा...
07/08/2026

हनुमान जी की उपासना सम्बंधित संशय समाधान🙏
हनुमान जी की उपासना महिलाएं व पुरूष दोनों कर सकते हैं लेकिन बहुत से लोगों का मानना है की महिलाओं को हनुमान जी की पूजा नहीं करनी चाहिए क्योंकि वो बाल ब्रह्मचारी थे ऐसा मानना गलत है हनुमान जी के लिए सभी महिलाएं बहन, बेटी और पुत्री के समान हैं। वे अपने भक्तों में किसी भी प्रकार का लिंग भेद नहीं करते।

जब राम जी लक्ष्मण और सीता सहित अयोध्या लौट आए तो एक दिन हनुमान जी माता सीता के कक्ष में पहुंचे। उन्होंने देखा कि माता सीता लाल रंग की कोई चीज मांग में सजा रही हैं।
हनुमान जी ने उत्सुक हो माता सीता से पूछा यह क्या है जो आप मांग में सजा रही हैं। माता सीता ने कहा यह सौभाग्य का प्रतीक सिंदूर है। इसे मांग में सजाने से मुझे राम जी का स्नेह प्राप्त होता है और उनकी आयु लंबी होती है। यह सुन कर हनुमान जी से रहा न गया ओर उन्होंने अपने पूरे शरीर को सिंदूर से रंग लिया तथा मन ही मन विचार करने लगे इससे तो मेरे प्रभु श्रीराम की आयु ओर लम्बी हो जाएगी ओर वह मुझे अति स्नेह भी करेंगे। सिंदूर लगे हनुमान जी प्रभु राम जी की सभा में चले गए।

राम जी ने जब हनुमान को इस रुप में देखा तो हैरान रह गए। राम जी ने हनुमान से पूरे शरीर में सिंदूर लेपन करने का कारण पूछा तो हनुमान जी ने साफ-साफ कह दिया कि इससे आप अमर हो जाएंगे और मुझे भी माता सीता की तरह आपका स्नेह मिलेगा।

हनुमान जी की इस बात को सुनकर राम जी भाव विभोर हो गए और हनुमान जी को गले से लगा लिया। उस समय से ही हनुमान जी को सिंदूर अति प्रिय है और सिंदूर अर्पित करने वाले पर हनुमान जी प्रसन्न रहते हैं।

🔹महिलाएं हनुमान जी को सिंदूर नहीं चढ़ाती। वे केवल अपने पति, पुत्र और देवी मां को ही सिंदूर लगा सकती हैं। वे सिंदूर के स्थान पर लाल रंग के फूल चढ़ाएं।

🔹हनुमान जी को सिंदूर और चमेली का तेल लगाने से रोग, शोक और ग्रह दोष समाप्त होते हैं।

🔹अपने जीवन का नियम बना लें की प्रत्येक मंगलवार को हनुमान जी के चरणों में सिंदूर अर्पित करना ही है ऐसा करने से हनुमान जी सदा आपके अंग-संग रहेंगे और जब भी किसी काम के लिए घर से बाहर निकलने लगें तो उनके चरणों के सिंदूर को अवश्य अपने माथे पर लगाएं। ऐसा करने से अपनी बुद्धि कुशाग्र होगी और अनचाहे संकट टल जाएंगे।
🔹मंगल ग्रह को अपने अनुकुल करने के लिए हनुमान जी को सिंदूर अर्पित करें।

"क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान शिव को 'अनंत' क्यों कहा जाता है? एक ऐसी अद्भुत घटना पुराणों में वर्णित है, जहाँ स्वयं ब्...
04/08/2026

"क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान शिव को 'अनंत' क्यों कहा जाता है? एक ऐसी अद्भुत घटना पुराणों में वर्णित है, जहाँ स्वयं ब्रह्मा और विष्णु भी महादेव के आदि और अंत का पता नहीं लगा सके। आइए सुनते हैं 'अनंत ज्योतिर्लिंग' की दिव्य कथा..." 🔱🙏🏻

एक बार भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच विवाद हुआ कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। तभी उनके सामने अचानक एक अनंत अग्नि-स्तंभ (ज्योतिर्लिंग) प्रकट हुआ, जिसका न आदि दिखाई देता था और न अंत।
भगवान विष्णु वराह रूप धारण करके उस स्तंभ का अंत खोजने नीचे की ओर गए, जबकि ब्रह्मा हंस बनकर उसका आरंभ खोजने ऊपर उड़ चले। अनंत समय तक खोजने के बाद भी दोनों को उस दिव्य ज्योति का न आदि मिला, न अंत।
भगवान विष्णु ने लौटकर सत्य स्वीकार कर लिया कि वे अंत नहीं खोज सके। किंतु ब्रह्मा ने असत्य कहा कि उन्होंने शिखर देख लिया है और एक केतकी पुष्प को झूठी गवाही के लिए साथ ले आए।
उसी क्षण उस अग्नि-स्तंभ से भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने विष्णु की सत्यनिष्ठा की प्रशंसा की और ब्रह्मा के असत्य पर उन्हें दंड दिया। तभी से मान्यता है कि ब्रह्मा की पूजा बहुत कम होती है और केतकी का पुष्प शिव-पूजा में अर्पित नहीं किया जाता।
हर हर महादेव! 🔱🙏🏻

🌕 गुरुपूर्णिमा की प्रेरणादायक कहानीशीर्षक: "गुरु का सच्चा उपहार"बहुत समय पहले एक आश्रम में अनेक शिष्य शिक्षा प्राप्त करत...
29/07/2026

🌕 गुरुपूर्णिमा की प्रेरणादायक कहानी

शीर्षक: "गुरु का सच्चा उपहार"

बहुत समय पहले एक आश्रम में अनेक शिष्य शिक्षा प्राप्त करते थे। गुरुपूर्णिमा का दिन आया। सभी शिष्य अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार गुरुजी के लिए महंगे वस्त्र, फल, मिठाइयाँ और स्वर्ण-रजत के उपहार लेकर पहुँचे।

एक गरीब शिष्य दूर जंगल से आया। उसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं था। उसने रास्ते में खिले हुए जंगली फूलों का एक छोटा-सा गुच्छा बनाया और गुरुजी के चरणों में रखते हुए बोला,

> "गुरुदेव, मेरे पास धन नहीं है। मैं आपको केवल अपना प्रेम, श्रद्धा और जीवनभर आपके बताए मार्ग पर चलने का वचन दे सकता हूँ।"

गुरुजी की आँखें भर आईं। उन्होंने उस शिष्य को गले लगाते हुए कहा,

"सबसे बड़ा उपहार वस्तुएँ नहीं, बल्कि शिष्य का चरित्र, विनम्रता और गुरु के ज्ञान को जीवन में उतारने का संकल्प होता है।"

उस दिन गुरुजी ने सभी शिष्यों से कहा,

"गुरुपूर्णिमा केवल उपहार देने का पर्व नहीं, बल्कि अपने भीतर के अज्ञान को त्यागकर ज्ञान, सेवा, सत्य और सदाचार को अपनाने का संकल्प लेने का दिन है।"

🌼 संदेश

"गुरु वह दीपक हैं जो स्वयं जलकर शिष्य के जीवन को प्रकाशमय बना देते हैं।
गुरुपूर्णिमा पर आइए, अपने गुरुजनों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करें और उनके आदर्शों को जीवन में उतारने का संकल्प लें।"

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

🙏 सभी देशवासियों को गुरुपूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ।

हनुमान जी की अमरत्व प्राप्ति (चिरंजीवी वरदान)हनुमान जी की अमरत्व प्राप्ति रामायण की एक अत्यंत भावपूर्ण और आध्यात्मिक दृष...
22/07/2026

हनुमान जी की अमरत्व प्राप्ति (चिरंजीवी वरदान)
हनुमान जी की अमरत्व प्राप्ति रामायण की एक अत्यंत भावपूर्ण और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण घटना है। यह केवल एक समय की घटना नहीं है, बल्कि उन्हें दो अलग-अलग अवसरों पर अमर होने का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था। इसका संपूर्ण विवरण निम्नलिखित है:
१. माता सीता द्वारा प्रथम आशीर्वाद (अशोक वाटिका)
जब हनुमान जी समुद्र पार करके लंका की अशोक वाटिका में माता सीता से पहली बार मिले और उन्हें प्रभु श्रीराम की मुद्रिका (अंगूठी) प्रदान की, तब माता सीता अत्यंत प्रसन्न हुई थीं। हनुमान जी की निष्ठा, पराक्रम और विनम्रता से मुग्ध होकर उन्होंने उन्हें आशीर्वाद दिया था।
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस घटना का वर्णन करते हुए लिखा है:
"अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥"
अर्थात्: हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापे से रहित) और अमर होओ। तुम सभी गुणों के निधान (खजाने) बनो और प्रभु श्रीराम तुम पर सदैव अपनी अपार कृपा बनाए रखें।
२. प्रभु श्रीराम द्वारा वरदान (राज्याभिषेक के बाद)
रावण वध के पश्चात जब श्रीराम अयोध्या लौटे और उनका राज्याभिषेक संपन्न हुआ, तब सभी सहयोगियों (सुग्रीव, विभीषण, जाम्बवान आदि) को विदाई के समय उपहार दिए जा रहे थे।
हनुमान जी का निस्वार्थ अनुरोध: जब हनुमान जी की बारी आई, तो प्रभु राम ने उनसे पूछा कि उन्हें क्या वरदान चाहिए। हनुमान जी ने कोई सांसारिक सुख, पद, धन या मोक्ष भी नहीं मांगा। उन्होंने केवल इतना मांगा, "हे प्रभु! मेरे मन में केवल आपके प्रति निरंतर भक्ति बनी रहे और आपके गुणों की कथा सुनने का अवसर मुझे सदैव मिलता रहे।"
श्रीराम के अमोघ वचन: हनुमान जी का यह निस्वार्थ प्रेम देखकर प्रभु राम भावविभोर हो गए। उन्होंने हनुमान जी को गले से लगा लिया और कहा, "हे मारुति! जब तक इस सृष्टि में पर्वत, नदियां और समुद्र रहेंगे, और जब तक इस पृथ्वी पर मेरी रामकथा प्रचलित रहेगी, तब तक तुम सदेह (शरीर के साथ) इस मृत्युलोक में विद्यमान रहोगे।"
३. मृत्युलोक (पृथ्वी) पर रहने का प्रमुख उद्देश्य
जब श्रीराम ने अपनी मानव लीला समाप्त करके सरयू नदी में जल समाधि ली और अपने वास्तविक स्वरूप में वैकुंठ धाम लौट गए, तब कई वानर और भालू भी उनके साथ गए थे। लेकिन, श्रीराम ने हनुमान जी को आदेश दिया था कि वे पृथ्वी पर ही रहेंगे। इसके मुख्य कारण थे:
आने वाले कलियुग में धर्म की रक्षा करना और अधर्म का विनाश करना।
श्रीराम के भक्तों का मार्गदर्शन करना और उनके संकटों को दूर करना (संकटमोचन की भूमिका)।
४. अष्ट चिरंजीवियों में से एक
सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, हमारे पुराणों में 8 महापुरुषों को अमर माना जाता है, जिन्हें 'अष्ट चिरंजीवी' कहा जाता है। इन आठों में हनुमान जी का नाम प्रमुख है। एक प्रसिद्ध श्लोक के अनुसार:
"अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः॥"
(इन 7 के अलावा बाद में महर्षि मार्कण्डेय को भी इस सूची में शामिल किया गया, जिससे यह संख्या 8 हो गई है।)
वर्तमान मान्यता:
इस अमरत्व प्राप्ति के कारण आज भी यह सर्वत्र विश्वास किया जाता है कि जहां भी पूर्ण श्रद्धा के साथ रामायण का पाठ किया जाता है, सुंदरकांड पढ़ा जाता है या राम नाम का संकीर्तन होता है, वहां प्रभु हनुमान किसी न किसी रूप में अवश्य उपस्थित रहते हैं।

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भगवान जगन्नाथ के महाप्रसाद की कथाअधिकांशतः लोग सोचते हैं कि भगवान का महाप्रसाद सदा सदा से इस संसार में मिलता आया है। परन...
18/07/2026

भगवान जगन्नाथ के महाप्रसाद की कथा

अधिकांशतः लोग सोचते हैं कि भगवान का महाप्रसाद सदा सदा से इस संसार में मिलता आया है। परन्तु नीचे वर्णित लीला से पहले भगवान विष्णु का महाप्रसाद इस भौतिक संसार में उपलब्ध नहीं था , शिवजी तथा नारदमुनी जैसे ऋषियों के लिए भी नहीं। फिर कैसे महाप्रसाद इस संसार में आया ? इस सम्बन्ध में चैतन्य मंगल में एक कथा आती है।

एक दिन कैलाश पर्वत पर नारदमुनी की भेंट शिवजी से हुई। नारद मुनि उन्हें भगवान श्री कृष्ण और उद्धव के बीच वार्तालाप का वर्णन करने लगे। इस चर्चा में उद्धव भगवान के महाप्रसाद की महिमा गान करते हुए कहते हैं –

“ हे भगवन! आपकी महाप्रसादी माला, सुगन्धित तेल , वस्त्रों और आभूषणों और आपके उच्छिष्ठ भोजन की स्वीकार करने से आपके भक्त आपकी मायाशक्ति पर विजय प्राप्त कर लेते है। “

“ हे कैलाशपति !” नारदमुनी ने आगे कहना जारी रखा , “ यह सुनकर मेरे ह्रदय में भगवान् विष्णु का महाप्रसाद चखने की तीव्र उत्कंठा जागृत हुई है। इस आशा से मैं वैकुण्ठ गया और जी जान से माता लक्ष्मी की सेवा करने लगा। बारह वर्षों तक सेवा करने के पश्चात् एक दिन लक्ष्मी जी ने मुझसे पुछा, ‘ नारद ! मै तुम्हारी सेवा से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम मनचाहा वर मांग सकते हो। “

नारदजी ने हाथ जोड़कर कहा, “ हे माता ! चिरकाल से मेरा ह्रदय एक बात को लेकर पीड़ित है। मैंने आजतक कभी भगवान नारायण के महाप्रसाद का अस्वादन नहीं किया है। कृपया मेरी यह अभिलाषा पूरी कर दीजिये।“

लक्ष्मी देवी दुविधा में पड़ गई। “ लेकिन नारद , मेरे स्वामी ने मुझे कठोर निर्देश दिए है कि उनका महाप्रसाद किसी को भी न दिया जाए। मैं उनकी आज्ञा का उल्लंघन कैसे कर सकती हूं। परन्तु तुम्हारे लिए मैं अवश्य कुछ व्यवस्था करूंगी। “

कुछ समय पश्चात् लक्ष्मी देवी ने भगवान नारायण से अपने ह्रदय की बात कही की कैसे उन्होंने गलती से नारदमुनी को भगवान का महाप्रसाद देने का वचन दे दिया है। भगवान् नारायण ने कहा, “ हे प्रिये! तुम्हे बड़ी भरी गलती की है। परन्तु अब क्या किया जा सकता है। तुम नारदमुनी को मेरा महाप्रसाद दे सकती हो , परन्तु मेरी अनुपस्थिति में। “(इसीलिए भक्तों को भी प्रसाद कभी भी अर्चा विग्रह के सामने बैठकर ग्रहण नहीं करना चाहिए)"

नारदमुनी ने आगे कहा, “ हे महादेव , आप विश्वास नहीं करेंगे , महाप्रसाद के मात्र स्पर्श से मेरा तेज और अध्यात्मिक शक्ति सौ गुना बढ़ गईं। मैं दिव्य भाव का अनुभव करने लगा और सुनाने यहाँ आया हूँ । ”

“ हे नारद ! निश्चित ही तुम्हारा तेज अलौकिक है परन्तु तुमने ऐसे दुर्लभ महाप्रसाद का एक कण भी मेरे लिए नहीं रखा।

लज्जित होकर नारद मुनी ने अपना सर झुका लिया परन्तु अभी उन्हें स्मरण हुआ की उनके पास अभी भी थोडा महाप्रसाद बचा हुआ है। उन्होंने तुरंत उसे महादेव को दिया जिसे उन्होंने अत्यंत सम्मानपूर्वक स्वीकार कर लिया।

उसे लेते ही शिवजी कृष्ण प्रेम में मदोंन्मत होकर नृत्य करने लगे। उनकी थिरकन से पृथ्वी कम्पायमान होने लगी और सम्पूर्ण ब्रम्हांड में खतरा महसूस किया जाने लगा तब भयभीत होकर माता पृथ्वी देवी पार्वती से महादेव को शांत करने का निवेदन करती हैं। जैसे तैसे माता पार्वती ने शिवजी को शांत किया और फिर उनसे इस उन्मत नृत्य करने का कारण जानना चाहा तो शिवजी ने कहा – देवी मेरे सौभाग्य की बात सुनो और सारा वृतांत सुना दिया और अंत में बोले आज भगवान का महाप्रसाद प्राप्त करके मैं उन्मत हो गया यही मेरे असामान्य भाव और तेज का कारण है। तभी माता पर्वती क्रुद्ध हो गईं और बोली – स्वामी आपको महाप्रसाद मुझे भी देना चाहिए था क्या आप नहीं जानते मेरा नाम वैष्णवी है आज मैं प्रतिज्ञा लेती हूं कि यदि भगवान नारायण मुझ पर अपनी करुणा दिखायेंगे तो मैं प्रयास करुँगी की उनका महाप्रसाद ब्रम्हांड के प्रत्येक व्यक्ति, देवता और यहां तक की कुत्तों बिल्लियों को भी प्राप्त होगा।

आश्चर्य जनक रूप से उसी क्षण भगवान विष्णु माता पर्वती के वचन की रक्षा हेतु वहां तत्क्षण प्रकट हुए और बोले – “ हे देवी पर्वती ! तुम सदैव मेरी भक्ति में संलग्न रहती हो। उमा और महादेव मेरे शरीर से अभिन्न हो। मैं तुम्हें वचन देता हु की मैं स्वयं तुम्हारी प्रतिज्ञा को पूर्ण करूँगा और पुरुषोत्तम क्षेत्र जगन्नाथ पुरी में प्रकट होऊंगा और ब्रम्हांड में प्रत्येक जीव को अपना महाप्रसाद प्रदान करूंगा।
आज भी जगन्नाथ पुरी में भगवान जगन्नाथ को भोग लगाने के पश्चात सर्व प्रथम प्रसाद विमलादेवी(माता पार्वती ) के मंदिर में अर्पित किया जाता है।
जय जगन्नाथ 🙏

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