22/07/2026
हनुमान जी की अमरत्व प्राप्ति (चिरंजीवी वरदान)
हनुमान जी की अमरत्व प्राप्ति रामायण की एक अत्यंत भावपूर्ण और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण घटना है। यह केवल एक समय की घटना नहीं है, बल्कि उन्हें दो अलग-अलग अवसरों पर अमर होने का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था। इसका संपूर्ण विवरण निम्नलिखित है:
१. माता सीता द्वारा प्रथम आशीर्वाद (अशोक वाटिका)
जब हनुमान जी समुद्र पार करके लंका की अशोक वाटिका में माता सीता से पहली बार मिले और उन्हें प्रभु श्रीराम की मुद्रिका (अंगूठी) प्रदान की, तब माता सीता अत्यंत प्रसन्न हुई थीं। हनुमान जी की निष्ठा, पराक्रम और विनम्रता से मुग्ध होकर उन्होंने उन्हें आशीर्वाद दिया था।
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस घटना का वर्णन करते हुए लिखा है:
"अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥"
अर्थात्: हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापे से रहित) और अमर होओ। तुम सभी गुणों के निधान (खजाने) बनो और प्रभु श्रीराम तुम पर सदैव अपनी अपार कृपा बनाए रखें।
२. प्रभु श्रीराम द्वारा वरदान (राज्याभिषेक के बाद)
रावण वध के पश्चात जब श्रीराम अयोध्या लौटे और उनका राज्याभिषेक संपन्न हुआ, तब सभी सहयोगियों (सुग्रीव, विभीषण, जाम्बवान आदि) को विदाई के समय उपहार दिए जा रहे थे।
हनुमान जी का निस्वार्थ अनुरोध: जब हनुमान जी की बारी आई, तो प्रभु राम ने उनसे पूछा कि उन्हें क्या वरदान चाहिए। हनुमान जी ने कोई सांसारिक सुख, पद, धन या मोक्ष भी नहीं मांगा। उन्होंने केवल इतना मांगा, "हे प्रभु! मेरे मन में केवल आपके प्रति निरंतर भक्ति बनी रहे और आपके गुणों की कथा सुनने का अवसर मुझे सदैव मिलता रहे।"
श्रीराम के अमोघ वचन: हनुमान जी का यह निस्वार्थ प्रेम देखकर प्रभु राम भावविभोर हो गए। उन्होंने हनुमान जी को गले से लगा लिया और कहा, "हे मारुति! जब तक इस सृष्टि में पर्वत, नदियां और समुद्र रहेंगे, और जब तक इस पृथ्वी पर मेरी रामकथा प्रचलित रहेगी, तब तक तुम सदेह (शरीर के साथ) इस मृत्युलोक में विद्यमान रहोगे।"
३. मृत्युलोक (पृथ्वी) पर रहने का प्रमुख उद्देश्य
जब श्रीराम ने अपनी मानव लीला समाप्त करके सरयू नदी में जल समाधि ली और अपने वास्तविक स्वरूप में वैकुंठ धाम लौट गए, तब कई वानर और भालू भी उनके साथ गए थे। लेकिन, श्रीराम ने हनुमान जी को आदेश दिया था कि वे पृथ्वी पर ही रहेंगे। इसके मुख्य कारण थे:
आने वाले कलियुग में धर्म की रक्षा करना और अधर्म का विनाश करना।
श्रीराम के भक्तों का मार्गदर्शन करना और उनके संकटों को दूर करना (संकटमोचन की भूमिका)।
४. अष्ट चिरंजीवियों में से एक
सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, हमारे पुराणों में 8 महापुरुषों को अमर माना जाता है, जिन्हें 'अष्ट चिरंजीवी' कहा जाता है। इन आठों में हनुमान जी का नाम प्रमुख है। एक प्रसिद्ध श्लोक के अनुसार:
"अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः॥"
(इन 7 के अलावा बाद में महर्षि मार्कण्डेय को भी इस सूची में शामिल किया गया, जिससे यह संख्या 8 हो गई है।)
वर्तमान मान्यता:
इस अमरत्व प्राप्ति के कारण आज भी यह सर्वत्र विश्वास किया जाता है कि जहां भी पूर्ण श्रद्धा के साथ रामायण का पाठ किया जाता है, सुंदरकांड पढ़ा जाता है या राम नाम का संकीर्तन होता है, वहां प्रभु हनुमान किसी न किसी रूप में अवश्य उपस्थित रहते हैं।
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