Sunder Bhakti Dham

24/08/2026

*शिव* को पतिरूप में पाने के लिए तपस्या करतीं माता पार्वती की परीक्षा लेने गए सप्तर्षियों ने कहा, "किसके लिए तप कर रही हो देवी? उस शिव के लिए जिसके पास न घर है न दुआर? न खेत है न बाग-बगीचे? कुछ काम धाम करता नहीं, भांग खा कर मस्त पड़ा रहता है। जिसके पास स्वयं पहनने के लिए कपड़े नहीं वह तुमको क्या पहनाएगा भला? तुम जैसी विदुषी और सुन्दर कन्या का विवाह तो किसी राजकुल में होना चाहिए, छोड़ो यह तप घर चलो..."

पार्वती माता जगदम्बा थीं, जानती थीं कि शिव पर केवल और केवल उन्ही का अधिकार है। उसी अधिकार से कहा, "सुनिए साधु बाबा! जिसने भेजा है उससे जा कर कह दीजिये कि वे स्वयं मना करें तब भी नहीं मानूँगी... शिव के लिए करोड़ जन्म लेने पड़े तब भी कोई दिक्कत नहीं, पर पति चाहिए तो शिव ही चाहिए..."

सप्तर्षियों की ड्यूटी पूरी हुई, वे हँसते हुए शिव के लोक चले। जा कर बताया, "विवाह कर लीजिए देवता! माता नहीं मानेंगी..."
शास्त्रों से इतर लोक में जो शिव पार्वती का स्वरूप है, उसके हिसाब से शिव इस सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ पति हैं। माता पार्वती हमारे घर बार की सामान्य स्त्रियों की तरह बार बार पति से गुस्सा होती हैं, और बेचारे भोले बाबा उनको मनाते रहते हैं और उनकी हर इच्छा पूरी करते रहते हैं। जीवन में धन-धान्य का नाम तक नहीं है, फिर भी पत्नी की कोई इच्छा खाली नहीं जाती। इसीलिए गाँव की लड़कियां अब भी सावन के सोमबार को शिव की आराधना कर के उन से उन्ही जैसा वर मांगती हैं। "भोला भाला पति, जिसके हृदय में पत्नी के लिए कोई छल न रहे... धन दौलत तनिक कम भी रहे, पर गुस्सा होने पर पति मनाए... उसे उसकी पूरी प्रतिष्ठा, पूरा सम्मान दे, हर इच्छा पूरी करे..." इससे अच्छा पति और कैसा होगा...


अब शिव की ओर से देखिये, वे हमेशा अपनी ही दुनिया में मगन रहने वाले पुरुष हैं। तपस्या में गए तो युगों युगों तक किसी की कोई चिन्ता ही नहीं। न घर, न पत्नी, न बच्चे, न सेवकों की चिन्ता... औघड़दानी व्यक्तित्व, जिसने जो मांगा उसे वह सहज भाव से दे दिया। भारतीय पुरुष सामान्यतः ऐसे ही होते हैं। ऐसे व्यक्ति के साथ कोई स्त्री कैसे निर्वाह करे? पर माता पार्वती ने किया... उन्ही के रंग में रङ्ग गयीं। शिव दैत्यों को उटपटांग वरदान दे देते, फिर माता शक्तिरूप में आ कर उनसे मुक्ति दिलातीं... कभी विरोध नहीं किया, कभी हाथ नहीं रोका... सम्बन्धों के मध्य धर्म था, और धर्म के पीछे पीछे प्रेम! सो पति की बुराइयां भी अधिक बुरी नहीं लगीं। सो दुर्गम पहाड़ों के बीच भी जीवन स्वर्गिक हो गया...

पति की सामाजिक प्रतिष्ठा पत्नी ही तय करती है। शिव की शक्ति माता पार्वती ही थीं...

सच पूछिए तो जीवन में यदि धर्म के पथ पर हाथ पकड़ कर चलने वाला, निश्छल और प्रेम करने वाला संगी मिल गया तो जीवन सुन्दरतम हो जाता है। धन, वैभव, सामाजिक प्रतिष्ठा सब द्वितीयक है...

प्रेम में बड़ी शक्ति होती है। सम्बन्धों को निभाने के लिए ढेर सारे संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। धर्म, प्रेम और समर्पण हो तो हर सम्बन्ध चिरंजीवी हो जाता है, और जीवन सुख से भर जाता है। कभी आजमा कर देखिएगा, पति पत्नी के बीच उपजे सामान्य विवादों को एक सहज मुस्कान समाप्त कर देती है।

भगवान शिव और माता पार्वती के वैवाहिक जीवन को भारतीय लोक ने आदर्श समझा और माना था, तभी भारतीय विवाहों में अब भी शिव पार्वती के ही गीत गाये जाते हैं।

*हर हर महादेव* 🙏

23/08/2026

_*।। सावन और शिव महिमा की ज्ञानवर्धक कथा ।।*_
( प्रजापति दक्ष के यज्ञ की कथा )
*भाग - 6 अंतिम*


वीरभद्र के एक ही प्रहार से दक्ष का शीश धड़ से अलग हो गया। यज्ञशाला में उपस्थित सभी लोग भय और विस्मय से स्तब्ध रह गए। दक्ष का कटा शीश यज्ञाग्नि के पास गिरा, और उसका शरीर भूमि पर धराशायी हो गया। असुर, जो पहले दक्ष के पक्ष में प्रसन्न हो रहे थे, अब भयाक्रांत होकर इधर-उधर भागने लगे। किंतु वीरभद्र और भद्रकाली का रौद्र रूप देखकर कोई भी उनके सामने टिक नहीं पाया। शिवगणों ने भी यज्ञशाला को पूर्णतः तहस-नहस कर दिया। यज्ञ के पात्र, हवन सामग्री, और वहाँ उपस्थित सभी प्रतीकों को नष्ट कर दिया गया। जो देवता और ऋषि-मुनि वहाँ उपस्थित थे, वे भयवश सिर झुकाए खड़े रहे, क्योंकि वे जानते थे कि यह महादेव का न्याय है, जिसके सामने कोई कुछ नहीं कर सकता। इधर, महारुद्र के डमरू की ध्वनि अब भी ब्रह्मांड में गूँज रही थी। उनका तांडव नृत्य और भी प्रचंड हो गया था। प्रत्येक थाप के साथ सृष्टि का एक हिस्सा काँप उठता था। समस्त लोकों में हाहाकार मच गया था। सूर्य का प्रकाश मंद पड़ गया, चंद्रमा का तेज क्षीण हो गया, और पवन की गति रुक-सी गई। यह सृष्टि का वह क्षण था, जब स्वयं काल भी महाकाल के सामने नतमस्तक हो गया था। श्रीहरि विष्णु, जो यज्ञ के संरक्षक के रूप में वहाँ उपस्थित थे, अपने वचन की मर्यादा को पूर्ण करते हुए अब चुपचाप एक ओर खड़े थे। उन्होंने दक्ष को पहले ही चेतावनी दी थी, और अब जब दक्ष का अंत हो चुका था, वे अपने प्रिय शिव के क्रोध को शांत करने की आवश्यकता समझ रहे थे। किंतु वे यह भी जानते थे कि यह क्रोध केवल दक्ष के अहंकार का विनाश करने तक सीमित नहीं था। यह माता सती के देह-त्याग का वह दुख था, जो महादेव के हृदय को विदीर्ण कर रहा था। तत्क्षण, ब्रह्मा और विष्णु सहित सभी देवता कैलाश की ओर दौड़े। वे जानते थे कि यदि महादेव का यह रौद्र रूप शांत नहीं हुआ, तो सृष्टि का संपूर्ण विनाश अनिवार्य हो जाएगा। कैलाश पहुँचकर उन्होंने देखा कि महारुद्र अब भी अपने तांडव में लीन हैं। उनके नेत्रों से अग्नि की ज्वालाएँ निकल रही थीं, और उनके डमरू की ध्वनि से समस्त दिशाएँ काँप रही थीं। ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवताओं ने उनके चरणों में नतमस्तक होकर प्रार्थना शुरू की, "हे महादेव! हे विश्वनाथ! आपकी प्रिया माता सती के देह-त्याग का हमें असीम दुख है। किंतु आप सृष्टि के आधार हैं। आपका क्रोध समस्त सृष्टि को भस्म कर देगा। कृपया इसे शांत करें। दक्ष का अहंकार नष्ट हो चुका है, उसका दंड पूर्ण हो चुका है। अब कृपा करें, हे करुणानिधान!" महादेव के हृदय में माता सती के प्रति असीम प्रेम और उनके वियोग का दुख अभी भी प्रबल था। किंतु सृष्टि के कल्याण हेतु, और अपने प्रिय विष्णु और ब्रह्मा की प्रार्थना को स्वीकार करते हुए, उन्होंने धीरे-धीरे अपने डमरू को रोक दिया। उनका तांडव धीमा पड़ने लगा। उनके नेत्रों की अग्नि शांत होने लगी, और उनका रौद्र रूप धीरे-धीरे उनके शांत भोलेनाथ स्वरूप में परिवर्तित होने लगा। महादेव ने अपने गणों और वीरभद्र-भद्रकाली को यज्ञशाला से वापस बुलाया। उन्होंने सभी को आदेश दिया कि अब और विनाश की आवश्यकता नहीं है। तब ब्रह्मा ने आगे बढ़कर कहा, "हे शंकर! दक्ष ने जो पाप किया, उसका दंड उसे मिल चुका है। किंतु वह एक पिता भी था, और इस यज्ञ का संरक्षक होने के नाते श्रीहरि ने उसे वचन दिया था। अब यदि आपकी कृपा हो, तो दक्ष को जीवनदान प्रदान करें, ताकि यज्ञ पूर्ण हो सके और सृष्टि का संतुलन बना रहे।" महादेव, जो करुणा के सागर हैं, ने ब्रह्मा की बात स्वीकार की। उन्होंने अपने गणों को आदेश दिया कि दक्ष के धड़ पर एक बकरे का शीश जोड़ दिया जाए, क्योंकि उसका मूल शीश यज्ञाग्नि में भस्म हो चुका था। वीरभद्र ने तत्क्षण ऐसा ही किया। दक्ष को पुनर्जनन प्राप्त हुआ, और बकरे के शीश के साथ वह जीवित हो उठा। जीवन पाकर दक्ष का अहंकार पूर्णतः नष्ट हो चुका था। उसने महादेव के चरणों में गिरकर क्षमा माँगी और कहा, "हे शंकर! मैंने आपके और माता सती के प्रति अपराध किया। मेरा अहंकार मुझे ले डूबा। कृपया मुझे क्षमा करें।" महादेव ने अपनी करुणा भरी दृष्टि से दक्ष को देखा और कहा, "दक्ष, तुम्हारा अहंकार ही तुम्हारा शत्रु था। अब इसे त्यागकर धर्म के मार्ग पर चलो। इस यज्ञ को पूर्ण करो, और सृष्टि के कल्याण हेतु कार्य करो।" दक्ष ने तत्क्षण यज्ञ को पुनः शुरू किया, और इस बार उसने महादेव और माता सती का भी पूर्ण सम्मान करते हुए हवन किया। यज्ञ सफलतापूर्वक संपन्न हुआ, और सृष्टि में संतुलन पुनः स्थापित हो गया। इधर, महादेव माता सती के देह-त्याग के स्थान पर पहुँचे। उन्होंने माता सती के निर्जन देह को अपनी गोद में उठाया और असीम दुख के साथ पूरे ब्रह्मांड में भटकने लगे। उनका यह दुख देखकर सृष्टि पुनः काँप उठी। तब श्रीहरि विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के देह को खंड-खंड कर दिया। जहाँ-जहाँ माता सती के अंग गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई। ये शक्तिपीठ आज भी माता के भक्तों के लिए पवित्र तीर्थस्थल हैं। इस प्रकार, माता सती के देह-त्याग और दक्ष के यज्ञ के विनाश की कथा सृष्टि को यह संदेश देती है कि अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित है। धर्म और सत्य की रक्षा हेतु स्वयं महादेव और महादेवी को भी बलिदान देना पड़ता है। यह कथा हमें यह भी सिखाती है कि क्रोध और दुख के क्षणों में भी करुणा और क्षमा का मार्ग ही सृष्टि के कल्याण का आधार है।
*ॐ नमः शिवाय*
*हर हर महादेव* 🙏🙇🙌!
( कथा समाप्त )

22/08/2026

😊
*जय श्री राम जय हनुमान*

*"संस्कार भी एक वसीयत की तरह ही है.. जो दुनिया को बताते है कि हमारे पूर्वजों ने हमें क्या दिया है?".....*
🌹🙏🌹🙏🌹
"स्नेह वंदन",
*"शुभ शनिवार"..*
"आप हमेशा स्वस्थ एवं खुश रहें, इसी मंगलभावना के साथ..
*"शुभ प्रभात"...*
💖🌲🌿🍀🌻😊

*🚩┈┉══❀((卐))❀══┉┈🚩**🔱•।| श्री शनिश्चराय नम: |।•🔱*  🦚●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬●🦚*कीचड़ का कारण भी जल है .... और कीचड़ का निवारण भी जल है...
22/08/2026

*🚩┈┉══❀((卐))❀══┉┈🚩*
*🔱•।| श्री शनिश्चराय नम: |।•🔱*
🦚●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬●🦚
*कीचड़ का कारण भी जल है .... और कीचड़ का निवारण भी जल है,*
*मन को मन ही गंदा करता है.... और मन की धुलाई भी मन ही करता है।*
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🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
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22/08/2026

_*सावन और शिव महिमा की ज्ञानवर्धक कथा।*_
( प्रजापति दक्ष के यज्ञ की कथा )
*भाग - 5*

गत पोस्ट से आगे ......

शिव को उनकी प्राण प्रिया का देह-त्याग के बारे में सूचित करने हेतु दौड़ पड़े शिवगणों के विलाप का कोई ओर-छोर नहीं था! उनकी चेतना नितांत लुप्त हो गई थी, वे अपना सुधबुझ पूर्णतः खो बैठे थे! मार्ग में बारंबार गिर-पड़ जा रहे थे। कई बार तो एक-दूसरे पर ही गिर-पड़ जा रहे थे। अपनी छाती पर मुक्का मारते हुए नितांत ऊँचे स्वर में रोते हुए जा रहे थे, "माता को हम नहीं बचा पाए! महादेव को क्या कहेंगे, कैसे कहेंगे! उन्होंने तो हमारी माता का ध्यान रखने को कहा था। किंतु माता ने ही हमें कुछ भी नहीं कर पाने को विवश कर दिया था...!" वे भय से थर-थर काँपते भी जा रहे थे कि कहीं उनके शंभु उन्हीं पर कुपित न हो जाएँ!

बात जब अपने माता-पिता, किसी अन्य पारिवारिक सदस्य, प्रियजन अथवा आराध्य के मान-अपमान की आ जाए; तो नीच से नीच व्यक्ति भी कुछ भी करने पर उतर आता है! फिर शिवगणों के लिए तो उनके महादेव सर्वप्रिय और सर्वश्रेष्ठ आराध्य होने के साथ-साथ माता और पिता भी थे। विवाह करने से पूर्व तक महादेव ने ही उन्हें पाला-पोसा था, संरक्षण प्रदान किया था। ऐसे में, यदि माता सती ने उन्हें विवश नहीं किया होता तो अकेले नंदी महाराज ही इतने सक्षम थे कि उन्हें देह-त्याग करने से रोक देते। भले ही अपना प्राण गँवा बैठते, परंतु दक्ष को नितांत कठोर उत्तर अवश्य देते।

इधर यज्ञशाला में हाहाकार मचा हुआ था! "धिक्कार है! धिक्कार है!!" का शोर गूँज रहा था! असुरों को छोड़कर सबके-सब दक्ष को धिक्कार रहे थे कि उसके जैसा पापी पिता पूरी सृष्टि में कोई नहीं है। कई ऋषि-मुनि और मनुष्य बाहर ही निकल गए थे। जो रह गए थे, वे भी अंदर से रुदन, क्रोध और भय की अग्नि में जल रहे थे। सबने मान लिया था कि अब तो महाप्रलय होकर ही रहेगा, भले ही यहाँ स्वयं ब्रह्मा और नारायण ही उपलब्ध क्यों न हों। अब ये दोनों भी कुछ नहीं कर पाएँगे। स्वयं भगवान् विष्णु ने इस बात की पुष्टि भी कर दी, "दक्ष! तुमने अपने सोचे अनुसार *'न भूतो न भविष्यति' वाला यज्ञ-कार्य कर लिया।* अब महादेव का 'न भूतो न भविष्यति' वाले विनाश-कार्य की प्रतीक्षा करो!"... किंतु दक्ष के मुख पर तनिक भी ग्लानि, दुःख अथवा भय का भाव नहीं था। असुरगण तो अंदर ही अंदर बहुत प्रसन्न हो रहे थे कि शिव अब शक्तिहीन हो गए हैं। समस्त सृष्टि के आधार 'ब्रह्मा, विष्णु और महेश' में से महेश अब कुछ नहीं रह गए हैं। अर्थात्‌ उनके लिए अब देवी-देवताओं को जीतना बहुत आसान हो गया है।

यद्यपि श्रीहरि चाहते तो अपने सुदर्शन चक्र के केवल एक वार से ही महादुष्ट दक्ष का शीश काट देते। यज्ञशाला में जो कुछ भी हुआ था, उन्हें नहीं होने देते। वैसे भी, उनके सर्वप्रिय शिव ही हैं, वे शिववल्लभ हैं। उसी भाँति, जिस भाँति शिव विष्णुवल्लभ हैं।... और वे क्रोधित हुए भी थे। परम विष्णुभक्त होते हुए भी दक्ष को कई बार समझाया था, विनाश के प्रति सावधान किया था। आज घटित हुए अत्यंत मार्मिक घटना को भी टालने का प्रयास किए थे। किंतु केवल टाल ही सकते थे, रोक नहीं सकते थे। इस यज्ञ का संरक्षण करने हेतु वचनबद्ध जो थे। अपने दिए वचन की मर्यादा रखने हेतु विवश थे।... अब यदि ईश्वर भी मर्यादा और अपने दायित्वों से परे हो जाएँ, तो फिर वह कैसा ईश्वर! स्वयं अर्धनारीश्वर भी कहाँ परे हो पाए थे, केवल टालने हेतु ही तो सारे प्रयास कर पाए थे।

कदाचित् माता सती का जन्म दक्ष के अहंकार का विनाश का निमित्त बनने हेतु ही हुआ था। जब-जब अधर्म चरम पर पहुँचता है, उसका नाश करने हेतु धर्म को अपना प्रचंड रूप धारण करना ही पड़ता है। और धर्म-अधर्म के इस युद्ध में धर्म को भी कुछ-न-कुछ की आहुति देनी ही पड़ती है। बाद के त्रेता युग में श्रीराम को रावण का अंत करने हेतु चौदह वर्ष का वनवास, पितृ-शोक और सीता-वियोग रूपी आहुति देनी पड़ी थी। तो द्वापर युग में पाँचों पांडवों के पुत्रों, वीर अभिमन्यु समेत न जाने कितनों के प्राणों की आहुति देनी पड़ी थी।... जो व्यक्ति अथवा समाज अधर्म की व्याप्ति की उलाहना तो देते रहता है, किंतु किसी रूप में कोई आहुति देने से डरता है, उसका एक दिन पूर्णतः पतन होकर ही रहता है।

अंततः शिवगण कैलाश पहुँच ही गए। उनके माथे पर बल पड़ गए, क्योंकि शंकर अपने आसन पर दिखाई नहीं दे रहे थे। कदाचित् उन्हें यह भी सुध नहीं रह गया था कि सर्वभूताधिवासी और सर्वज्ञानी को कोई क्या ही सूचना देगा।... तत्क्षण उन्होंने देखा कि वामदेव यज्ञ-स्थल की ओर देखते हुए खड़े हैं। जब गणों ने उनके नेत्रों को देखा, तो काँपकर रह गए... उनके नेत्र नितांत रक्तिम हो उठे थे! नख से लेकर शिख तक पूर्णतः कठोर हो गए थे! उनके भोलेनाथ अब साक्षात् महारुद्र बन गए थे!

सहसा महारुद्र ने अपनी एक जटा को उखाड़कर नीचे पटक दिया। उसी क्षण कोयले के रंग के समान एक नितांत भयावह जीव प्रकट हुआ। इतना भयावह कि उन्हें केवल देखकर ही सहस्त्रों के प्राण निकल जाएँ! उनकी आठ भुजाएँ थीं, और प्रत्येक भुजा में भिन्न-भिन्न भयानक शस्त्र थे। वे कोई और नहीं, महादेव का ही सर्वाधिक रौद्र रूप वीरभद्र थे। भूतनाथ ने उसी भाव में एक और जटा को उखाड़ते हुए नीचे पटका। अब अमावस्या की रात्रि के समान नितांत काली भद्रकाली प्रकट हुईं। वे महादेवी का ही भयंकर और आंतकी रूप थीं। उनकी अठारह भुजाएँ थीं। उन भुजाओं ने शंख, चक्र, कमल, गदा, त्रिशूल, भाला, कृपाण, खड्ग, वज्र, किसी राक्षस का कटा शीश, प्याला, अंकुश, जलपात्र, बड़ा चाकू, ढाल, धनुष और बाण थामे हुए थे।

शूली ने उन दोनों से यज्ञशाला की ओर संकेत करते हुए भयोत्पादक स्वर में कहा, "विनाश हो!! सर्वनाश हो!!"

और स्वयं ऊँची ध्वनि में डमरू बजाने लगे। सहसा पूरे ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया! धरती, आकाश समेत अन्य सारे लोक भी डोलने लगे! डमरू के प्रत्येक थाप पर असंख्य ऊर्जाएँ प्रकट होने लगीं! जो भी व्यक्ति और वस्तु उन ऊर्जाओं के संपर्क में आया, उसी क्षण जलकर राख होने लगा! समुद्रों में ज्वार उमड़ने लगा, पेड़ उखड़कर गिरने लगे, बादल अत्यंत भयावह रूप में गरजने लगे, कई सारे पर्वत खंडित होने लगे, ग्लेशियर टूटने लगे! सर्वत्र "त्राहिमाम-त्राहिमाम!!" गूँजने लगा!

इतने सारे अपशकुन एक साथ!! सबके-सब तो पहले ही इस महाप्रलय को भाँप चुके थे। जो असुर पहले बहुत प्रसन्न हो रहे थे, वे भी भयाक्रांत हो गए कि देवी-देवताओं को तो तब जीता जाएगा, जब वे इस महाप्रलय में बच जाएँगे। उनके मन में दो-एक बार यह भी विचार आया था कि वे दक्ष का साथ देंगे। किंतु अब तो कोई प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता था। किंतु दक्ष... वह तो जैसे अपनी मृत्यु की ही व्यग्रता से प्रतीक्षा कर रहा था! वह रुके हुए यज्ञ को पुनः आरंभ कराने पर तुला हुआ तो था, परंतु सफल नहीं हो पा रहा था। यज्ञाग्नि बारंबार बुझ जा रही थी।

वीरभद्र और भद्रकाली यज्ञ-स्थल की ओर दौड़ पड़े। महादेवी के अन्य आठ रूप भी भद्रकाली का साथ देने हेतु आ गईं। वे आठ रूप थे—चामुंडा, मुंडमर्दिनी, ईशानी, काली, कात्यायनी, भद्रा, वैष्णवी और त्वरिता। शिवगण भी कहाँ पीछे रहने वाले थे! उन्हें भी तो अपनी पूजनीया माताजी, उनके आराध्य की सर्वप्रिया का प्रतिशोध लेना था। तो सारे के सारे गण अपने उच्चतम स्वर में "हर हर महादेव! हर हर महादेव!!" कहते हुए साथ ही दौड़ने लगे।... जो भी मार्ग में आया और जो कोई भी वस्तु उनके गंतव्य में बाधक बन रही थी, उन सबका नाश करते हुए आगे बढ़ते रहे। वीरभद्र और भद्रकाली तो जाने कैसा स्वर निकाल रही थीं कि उन्हें सुनकर ही प्राण निकल जाने का भय उत्पन्न हो रहा था! इसलिए जो भी उनके निकट आया, वह अपने दोनों कानों को ढँकते हुए भाग जा रहा था।

उधर नृत्य, संगीत और नाट्यशास्त्र के रचयिता अब कुछ और ही रचने में लगे हुए थे! विनाश का तांडव नृत्य!! महारुद्र अब नटराज रूप में आ गए थे।

वीरभद्र, भद्रकाली एवं सारे गणों ने और विनाशकारी रूप धर लिया। वे यज्ञशाला के निकट आते जा रहे थे।... अंततः जब दक्ष के सेनापति ने उन्हें सूचित किया कि समस्त सेना का अंत हो गया है और सब यहाँ पहुँचने ही वाले हैं; तब जाकर दक्ष को भी अपना भावी दिख गया। वह तत्क्षण अपने आराध्य की ओर दौड़कर उनके चरणों में गिर गया, "हे मेरे कुलदेव! हे कृपासिंधु! मुझ पर कृपा करें। आपने इस यज्ञ का अर्थात्‌ मुझे भी संरक्षण करने का वचन दिया था।" श्रीहरि ने कहा, "मैंने तुम्हें कितनी बार समझाया था। सावधान किया था। तुम मुझे आराध्य तो मानते हो, परंतु मेरी ही बात तुमने कदापि नहीं मानी। तुम्हारा अंत तो निश्चित है। परंतु मैं अपने वचन की मर्यादा भी रखूँगा।"

नारायण 'लीलाधर' भी हैं। उनके लिए इसका उपाय करना कौन-सी बड़ी बात थी कि उनके दिए वचन का मान भी रह जाए और उसके उपरांत वचनमुक्त होकर वे अपने सबसे प्रिय एवं आराध्य शिव के मार्ग से हट भी जाएँ। उन्होंने ऐसा ही किया।... अंततः दक्ष को जब प्रतीत हो गया कि अब उसके बचने की कोई संभावना नहीं है, तो वह बचने हेतु इधर-उधर भागने लगा। वीरभद्र ने उसका पीछा करते हुए एक ही वार में उस महापापी दक्ष का शीश काट डाला।
क्रमशः ......

ॐ नम: शिवाय 🙏

21/08/2026

_*सावन और शिव महिमा की ज्ञानवर्धक कथा।*_
( प्रजापति दक्ष के यज्ञ की कथा )
*भाग - 4*

गत पोस्ट से आगे ......

माता सती अपने नैहर के जितनी निकट आती जा रही थीं, उनकी प्रसन्नता उतनी ही बढ़ती जा रही थी। उनके मन में कैसी-कैसी भावनाएँ उमड़ रही थीं, इसे एक स्त्री ही भली-भाँति समझ सकती हैं। वह स्त्री, जो विवाहित हो और पहली बार मायके जा रही हो। माता सती पहली बार ही पीहर आ रही थीं।

उनके मुख और नेत्रों की दमक भी बढ़ती जा रही थी। कई मील दूर से ही उनके पिता द्वारा किए जा रहे अद्वितीय यज्ञ के प्रमाण अनुभव जो होने लगे थे। विवाहोपरांत स्त्री तो मायके से जुड़ी छोटी-सी-छोटी बात पर भी गर्व करने लगती है। नैहर से उसका लगाव दुगुना-तिगुना हो जाता है।... मीलों दूर तक की वायु में यज्ञ की सुगंधि व्याप्त हो गई थी। मंत्र-जाप, शंख, वीणा और मृदंग के स्वर सुनाई देने लगे थे। अब जिस यज्ञ-स्थल पर सहस्रों ऋषि-मुनि एक साथ मंत्र-जाप कर रहे हों, और समस्त देवी-देवताओं के साथ स्वयं माता सरस्वती, माता लक्ष्मी, लोकपितामह ब्रह्मा एवं भगवान् विष्णु विराजे हों; उसका प्रभाव मीलों दूर तक होना ही था!

सहसा उन्होंने मध्य मार्ग में ही नंदी महाराज और अन्य गणों को भी आदेश किया, "वहाँ चाहे कुछ भी हो जाए, मेरे ऊपर संकट ही क्यों न आ जाए, परंतु तुम सबमें से कोई कुछ भी नहीं कहेगा।" अब यह तो बहुत कठिनाई हो गई! उधर उनके सर्वेसर्वा, परमेश्वर ने ध्यान रखने को कहा था, और इधर माताजी यह कह रही हैं!

उधर शिव उतने ही विचलित होते जा रहे थे! वे ध्यान में सदैव की भाँति डूब नहीं पा रहे थे! जब घर-परिवार पर संकट की बात आ जाए, तो क्या साधारण मनुष्य और क्या देवी-देवतागण; सबके-सब विचलित होने लगते हैं!... सती को तो केवल मायका दिख रहा था, किंतु कैलाशपति को विनाशकारी भावी भी दिख रहा था। उस विनाशकारी भावी को टालने के लिए उन्होंने सती को कितना समझाया था, परंतु वे तो कुछ और ही रट लगाई हुई थीं!

यद्यपि वे देवों के देव... महादेव हैं, वे चाहते तो सती को कैसे भी रोक लेते। चाहते तो दक्ष के द्वारा यज्ञ को आयोजित ही नहीं होने देते। वे कुछ भी कर सकते थे, कुछ भी कर सकते हैं! किंतु वे उस समय केवल महादेव ही नहीं थे, अपितु एक प्रेमी और पति भी थे। एक प्रेमी और पति की मर्यादा एवं दायित्व से भली-भाँति विदित थे। सती से उन्हें इतना प्रेम था कि वे उनकी एक भी इच्छा टाल नहीं सकते थे, न ही उन्हें एक भी क्षण के लिए दुखी देख सकते थे। किंतु उनके साथ बलपूर्वक व्यवहार भी नहीं कर सकते थे। यह बलपूर्वक व्यवहार न कर पाना केवल मर्यादा और दायित्व का पालन करने का ही नहीं, अपितु उनके विराट प्रेम का भी अद्भुत प्रमाण था।... दक्ष के यज्ञ को आयोजित नहीं होने देते, तब भी सती उतनी ही दुखी होतीं।

अंततः सती यज्ञ-स्थल पर पहुँच ही गईं। प्रथम तो वे उस स्थल की अद्भुत भव्यता देखते ही मोहित हो गईं। तत्पश्चात् अपने माता-पिता को देखकर उनकी प्रसन्नता और दमक चरम पर पहुँच गईं। उनकी बहनों ने आकर उनका स्वागत किया, उन्हें अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक गले लगाया। माता भी उन्हें देखते ही गले लगाने को दौड़ पड़ीं। वे भी दक्ष के समान सती से ही सर्वाधिक स्नेह करती थीं।... किंतु दक्ष ने उन्हें रोक लिया। स्वयं खड़े तो हो गए, परंतु न एक पग आगे बढ़े, न ही एक शब्द भी कुछ कहा।

वहाँ उपस्थित सभी गणमान्य सती के प्रति खड़े होकर अपनी-अपनी प्रसन्नता और सम्मान प्रकट करने वाले थे। अपने नैहर में आगमन करने वाली एक पुत्री के प्रति नहीं, अपितु महादेव की अर्धांगिनी के प्रति! अप्रत्यक्ष रूप से महादेव के भी प्रति। किंतु वे सब दक्ष का यह व्यवहार देखकर रुक गए। सबके-सब आश्चर्यचकित रह गए। एक तो सब ऋषि दधीचि के शाप को लेकर पहले से ही आशंकित थे। सब जानते थे कि दधीचि जैसे ऋषि की वाणी कभी मिथ्या नहीं हो सकती है। परंतु स्वयं को यह समझाकर सांत्वना भी दिए हुए थे कि यहाँ साक्षात् ब्रह्मा और विष्णु हैं, कुछ होगा भी तो यह दोनों संभाल लेंगे।

सती भी दक्ष के व्यवहार पर किंचित् आश्चर्य में पड़ गईं। फिर उन्होंने स्वयं को समझाया कि कदाचित् कुछ और ही बात हो। स्नेहिल स्मित के साथ पास आकर पिता का चरण-स्पर्श करने के लिए झुकीं। परंतु दक्ष उसी क्षण पीछे हट गए।... अचानक से मंत्रों का जाप होना और संगीत का बजना बंद हो गया। सब दक्ष की ओर देखने लगे। दक्ष के मुख पर कठोरता स्पष्ट रूप से दिख रही थी। सती पुनः स्वयं को समझाने के प्रयास में चारों ओर देखने लगीं। तभी उन्होंने ध्यान दिया कि सभी देवता अपनी देवियों के साथ यथायोग्य आसन पर विराजे हुए हैं, किंतु उनके स्वामी के लिए कोई आसन नहीं रखा गया है। यह देखकर उन्हें बहुत दुःख हुआ। पहली बार उन्हें अनुभव हुआ कि उनके पिता भूले नहीं थे, अपितु जान-बूझकर ही उन्हें निमंत्रित नहीं किए थे।... किंतु तत्क्षण ही उन्हें स्मरण हुआ कि वे तो अपने पिता और स्वामी की आपसी शत्रुता को समाप्त करने के लिए भी आई हैं।

उन्होंने स्वयं पर बहुत कठिनाई से नियंत्रण रखते हुए और बलपूर्वक मुस्कराते हुए पूछा, "पिताजी, क्या आपने अपनी इस सर्वप्रिय पुत्री और जामाता के लिए कोई आसन नहीं रखवाया है? आपने मेरे स्वामी को निमंत्रित क्यों नहीं किया था?"

दक्ष ने व्यंग्यात्मक हँसी हँसते हुए कहा, "यह इतना भव्य यज्ञ समस्त ब्रह्मांड के गणमान्यों और मेरे स्नेहीजनों के लिए आयोजित किया गया है। न कि अधनंगों और भिखमंगों के लिए।" चारों ओर सन्नाटा छा गया! सती के स्वर में किंचित् आवेश प्रकट हुआ, "पिताजी!"

"क्या पिताजी! वह अधनंगा ही तो है! पहनने के नाम पर केवल व्याघ्र-चर्म पहनता है। और उसके जैसा कोई भिखमंगा ही निमंत्रित न किए जाने पर भी अपनी भार्या को यहाँ भेज देता है।" दक्ष विषवमन करते रहे, "तुमने सोच भी कैसे लिया कि मैं उस कपाली को निमंत्रित करूँगा?? वह एक भी रीति-रिवाज को न जानने वाला महामूर्ख है! मर्यादा का कभी भी पालन न करने वाला महादुष्ट है! भूतों, प्रेतों और पिशाचों के मध्य में रहने वाले उस श्मशानवासी के तो इधर पग रखते ही यह महायज्ञ-स्थल नितांत अपवित्र हो जाएगा!!"

अब सती को स्वयं पर नियंत्रण रखना असंभव-सा हो गया। उनका स्वर ऊँचा हो गया, "अपनी वाणी को विराम दीजिए, पिताजी!" ब्रह्मा भी पास आकर डाँटने लगे, "अरे मूर्ख!! क्यों साक्षात् महाकाल के द्वारा अपने काल को बुलावा दे रहे हो! जब मुझे उनसे रंच-मात्र भी कोई विवाद नहीं है, तो क्यों मेरे नाम पर उनसे शत्रुता पाले हुए हो? उस समय उन्होंने मेरे अहंकार का विनाश करके नितांत उचित ही किया था।" भगवान् विष्णु भी समझाने लगे, "भले ही तुमने मुझे इस यज्ञ का संरक्षण करने का भार सौंपा है, किंतु ऐसा कुछ भी मत करो कि मैं भी तुम्हारी रक्षा करने में असमर्थ हो जाऊँ! ऐसे में महाकाल को महाविनाश करने से कोई भी नहीं रोक पाएगा, कोई भी नहीं!!"

सती की माता ने भी समझाने का प्रयास किया, किंतु दक्ष आज कहाँ किसी की सुनने वाले थे! वह तो जैसे अपनी मृत्यु से ही वार्तालाप करने में लगा हुआ था! पुनः सती से कहा, "तुम तो मेरे लिए उसी दिन मर गई थी, जिस दिन तुमने मेरे सबसे बड़े शत्रु का वरण किया था।"

यह सुनते ही सती की भावनाएँ चरम पर पहुँचने लगीं। वे झटके से नीचे बैठ गईं, उन्होंने अपने कानों को ढँक लिया, उनके नेत्रों से अश्रुओं की अविराम वर्षा होने लगी!... उन्हें वह सब कुछ स्मरण होने लगा, जो उनके स्वामी ने उन्हें समझाया था, 'वहाँ जाने पर तुम्हारा घोर अपमान किया जाएगा। इतना घोर अपमान कि तुम किसी भी मूल्य पर सहन नहीं कर पाओगी...।'

उन्हें अब समझ में आया कि क्यों वे यहाँ आने से रोकने हेतु समझाने का प्रत्येक प्रयास कर रहे थे। साक्षात् परमेश्वर होकर, सब कुछ जानने और कर सकने में समर्थ होने पर भी बलपूर्वक नहीं रोकना... कितना कष्ट हुआ होगा उन्हें... उनका विराट प्रेम, असहनीय दर्द भी समझ में आने लगा। उन्हें यह लगने लगा कि उन्होंने उस विराट प्रेम का अपमान कर दिया। उन्हें पछतावा होने लगा कि उनकी बात क्यों नहीं मानीं। तदनंतर अपराध-बोध से भर गईं कि उनका पतिव्रत धर्म खंडित हो गया है। अपने स्वामी की निंदा सुनना, किंतु सुनकर भी कुछ नहीं कर पाना! यद्यपि वे दक्ष का वध भी कर सकने में पूर्णतः सक्षम थीं। परंतु पितृ-हत्या का पाप अपने सर नहीं लेना चाहती थीं।... 'अब जीने की कोई सार्थकता नहीं है। अब अगले जन्म ही केवल और केवल शिव की हो सकूँगी।'

सहसा उनके नेत्रों में प्रचंड क्रोध रूपी अंगारे प्रकट होने लगे, "दक्ष!! तुम्हारी पुत्री होना मेरे लिए कलंक के समान है। जब तक मैं जीवित रहूँगी, सब मुझे तुम्हारी पुत्री 'दक्षायिणी' कहकर बुलाते रहेंगे। स्वयं मेरे स्वामी भी। किंतु मैं अब यह कलंक नहीं ढो सकती हूँ। उनका प्रेम का वहन करने में भी मैं सक्षम नहीं हूँ। अतः मुझे इस देह का त्याग करना ही होगा!... किंतु आज तुमने जो कुछ भी किया, उसका दंड तो तुम्हें भुगतना ही होगा! तुम्हें ही नहीं, यहाँ उपस्थित सभी को किसी न किसी रूप में भुगतना होगा!"

यह कहते ही सती ने अपने स्वामी को नमन करते हुए, केवल और केवल उन्हें ही ध्यान में रखते हुए अपनी योगशक्ति के बल पर प्राण त्याग दिया। तत्क्षण उनका देह एक कटे पेड़ के समान नीचे गिर पड़ा।

यह देखते ही भूतनाथ के आए हुए सारे गण उनकी ओर, कैलाश की ओर अत्यधिक विलाप करते हुए दौड़ पड़े।
क्रमशः ......
ॐ नम: शिवाय 🙏🙌

20/08/2026

_*सावन और शिव महिमा की ज्ञानवर्धक कथा।*_
( प्रजापति दक्ष के यज्ञ की कथा )
*भाग - 3*

गत पोस्ट से आगे ......

किसी पिता के यहाँ इतना विशाल और भव्य कोई कार्यक्रम हो और उसकी पुत्री तक सूचना न पहुँचे; ऐसा कहीं होता है क्या! माता सती तक सूचना पहुँचनी ही थी... और पहुँच भी गई।

उनकी बड़ी बहन रोहिणी अपने स्वामी चंद्रदेव के साथ कहीं जाती हुई दिख गईं। सती ने पता लगवाया कि वे कहाँ जा रहे हैं। तब जाकर उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके पिता दक्ष ने एक अद्भुत यज्ञ का आयोजन किया है, और वे दोनों वहीं जा रहे हैं। यह भी कि कौन-कौन उधर गए हुए हैं और कैसी-कैसी व्यवस्था की गई हैं। यह सब जानकर उन्हें दुःख तो हुआ, परंतु उससे कई गुना अधिक आश्चर्य हुआ कि इस यज्ञ की सूचना उन्हें क्यों नहीं थी, उन्हें क्यों नहीं बुलाया गया है। उन्होंने बहुत सोच-विचार किया, किंतु एक भी संतोषजनक उत्तर नहीं मिल पाया। तदनंतर वे अपने स्वामी शिव के पास गईं कि कहीं उन्हें पता हो, उन्हीं से सटीक उत्तर मिल सके।

किंतु वहाँ जाकर क्या देखती हैं? शिवाप्रिय हमेशा की भाँति नेत्र बंद किए ध्यान में डूबे हुए हैं। यद्यपि वे जानती थीं कि उनके स्वामी सर्वज्ञानी हैं, सर्वद्रष्टा हैं; तथापि वे रोषपूर्वक बोलीं, "आपको कुछ पता भी है कि नहीं! वहाँ मेरे पिताजी नितांत अनुपम यज्ञ करा रहे हैं। सारे देवर्षि, महर्षि, देवी-देवता और ब्रह्मा तक वहाँ गए हुए हैं। आपके सर्वप्रिय विष्णु भी पधारे हुए हैं। और एक आप हैं कि अकेले में ध्यान लगाए हुए बैठे हैं!"

सुंदरेश्वर धीरे-धीरे, कोमलता से अपने नेत्र खोलने लगे। जैसे-जैसे उनके नेत्र खुलते गए; उनके स्मित पर सरलता, नेत्रों में निश्छलता और मुख पर भोलापन बढ़ते गया। सरलता, निश्छलता और भोलापन... मुख्यतः ये ही वे तीन गुण हैं, जिन्हें देखकर सती उनके प्रति शत्रुता का मार्ग त्यागकर प्रेम और पूर्ण समर्पण के पथ पर चलने लगी थीं। उनसे सुंदर भी कहाँ कोई है, इसलिए ही तो वे ईश्वरों में भी सबसे सुंदर, 'सुंदरेश्वर' कहे जाते हैं। उनकी प्रचंड विकरालता के बारे में क्या ही कहना है! वे तो काल के भी काल, 'महाकाल' हैं!

दक्ष ने कदाचित् शिव के प्रति शत्रुता निभाने और उनका नाश करने के लिए ही घोर तपस्या करके आदिशक्ति से उन्हें उनकी पुत्री के रूप में जन्म लेने का वर मांगा था। सती के प्रेम और समर्पण का स्तर इतना ऊँचा था कि उनके पिता के प्रजापति के पद पर और ब्रह्मा-पुत्र होने पर भी, एवं उनके द्वारा सारे कुचक्रों को अपना लिए जाने पर भी उन दोनों को एक होने से कोई नहीं रोक पाया। उन्हें एक होना ही था... शिव-शक्ति इस सृष्टि के रचे जाने के पूर्व से एक-दूसरे के हैं... और इसका विनाश हो जाने के बाद भी, हमेशा-हमेशा एक ही रहेंगे! शिव शक्ति से मिलकर ही 'शिव' होते हैं, अन्यथा वे शव होते हैं! शक्ति भी शिव के बिना शक्तिहीन हैं।

शशिशेखर बोले, "मुझे यज्ञ के बारे में ज्ञात था। किंतु आपको जान-बूझकर नहीं बताया था कि कहीं निमंत्रण न मिलने की बात सुनकर आप दुखी न हो जाएँ।"

सती आवेश में आ गई, "भला यह भी कोई उपाय हुआ! इतने विशाल और भव्य यज्ञ की व्यवस्था करने में पिताजी अति व्यस्त रहे होंगे। हो सकता है कि उन्हें हमें बुलाने का समय न मिला हो, अथवा वे भूल गए हों। यह तो घर की बात है, बिन बुलाए भी तो जा ही सकते हैं। आपको मेरे साथ चलना ही होगा!"

"नहीं, सती!" कपर्दी पास आकर बहुत स्नेह से समझाने लगे, "हमें जान-बूझकर ही नहीं बुलाया गया है। मेरे प्रति आपके पिताजी के विचार से आप भली-भाँति परिचित हैं। इसके पूर्व हुए यज्ञ में उन्होंने मुझे क्या-क्या कहकर अपमानित किया था, वह सब भी आपको स्मरण ही होगा। यद्यपि मुझे उसका रंच-मात्र भी दुःख नहीं है। मेरे लिए तो क्या ही सम्मान, क्या ही अपमान! मैं तो केवल भावों का भूखा हूँ। किंतु प्रजापति दक्ष ने पूर्णतः अनुचित होते हुए भी, उल्टे मुझसे ही अपमानित अनुभव किया। और यह यज्ञ उसी अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए आयोजित किया गया है।"

सती ने तो जैसे कुछ सुना ही नहीं। वे उन्हें ही समझाने का प्रयास करने लगीं, "नहीं, ऐसा नहीं हो सकता है। पिताजी की तो मैं सर्वाधिक प्रिय पुत्री हूँ। मेरे जन्म से अब तक, वे मुझसे ही सबसे अधिक प्रेम करते हैं। कोई भी शुभ कार्य वे मेरे बिना कर ही नहीं सकते हैं।" कुछ क्षण रुककर, कुछ सोचने के उपरांत पुनः बोलीं, "सबसे उत्तम यही रहेगा कि मैं पहले अकेले ही चली जाती हूँ। वहाँ जाकर न बुलाए जाने का कारण जानूँगी। यदि पिताजी ने जान-बूझकर ही नहीं बुलाया होगा, तो उन्हें समझाने का प्रयास करुँगी।"

"प्रथम तो आप समझने का प्रयास करें। केवल मायके जाने अथवा मिलने जाने की बात होती, तो कदाचित् कुछ अंतर नहीं पड़ता। परंतु वहाँ कार्यक्रम हो रहा है, सब आए हुए हैं। ऐसे में, बिना निमंत्रण के कदापि नहीं जाना चाहिए। तुम्हारा घोर अपमान किया जाएगा। इतना घोर अपमान कि तुम किसी भी मूल्य पर सहन नहीं कर पाओगी।"

वस्तुतः आशुतोष सर्वज्ञ हैं, त्रिकालदर्शी हैं। वे एक-एक शब्द सत्य ही कह रहे थे... हमेशा सत्य ही कहते हैं। सती भी जानती थीं कि वे साक्षात् परमेश्वर हैं। किंतु वे स्वयं को ही नहीं जानती थीं। वे आदिशक्ति का अवतार तो थीं, परंतु उन्हें इस बात का पूर्णतः अनुभव नहीं हुआ था। उनमें अभी भी कुछ मानवीय दोष थे, उनका संपूर्ण विकास नहीं हुआ था।... उनकी आत्मा भी कह रही थी कि उनके प्रभु कभी मिथ्या भाषण नहीं करते हैं, वे सब कुछ जानते हैं। किंतु उस समय उनके मन और हृदय प्रबलतर हो उठे थे। मोह-माया प्रबलतम हो उठी थीं।... उनके मन-हृदय यह कहकर छल कर रहे थे कि यदि आज वहाँ नहीं गए, तो मायका से संबंध हमेशा के लिए टूट जाएगा। न बुलाने और न आने-जाने की परंपरा ही बन जाएगी। यह खाई बढ़ती जाए, इसके पहले उसको भर देना ही उचित होगा। उनके स्वामी और पिता की आपसी शत्रुता को समाप्त करना ही ठीक रहेगा।

अंततः उस दिन मानवीय हठ के आगे परमात्मा को झुकना ही पड़ गया! कदाचित् प्रत्येक दिन ही झुकना पड़ता है! ईश्वर रूपी आत्मा मनुष्य को सटीक राह दिखाती रहती हैं, शक्ति रूपी प्रकृति भी कई सारे संकेत करती रहती हैं... परंतु मनुष्य मोह, माया आदि रूपी छल में पड़कर उन्हें अनसुनी करते रहता है।... दिगंबर को सारे उपाय कर लेने के उपरांत, तनिक भी न चाहते हुए भी "हाँ" कहना ही पड़ा! उन्होंने अपने कुछ गणों को सती के साथ जाने और उनका ध्यान रखने को कहा। सती उन गणों के साथ मायके की ओर चल पड़ीं।
क्रमशः .......
ॐ नम: शिवाय 🙏

19/08/2026

_*सावन और शिव महिमा की ज्ञानवर्धक कथा।*_
( प्रजापति दक्ष के यज्ञ की कथा )
*भाग - 2*

गत पोस्ट से आगे .......
आज की भाँति तब भी अनेक मत-पंथ थे। कोई शिव का भक्त था, कोई विष्णु का, कोई अन्य देवी-देवता का। कुछ उद्भट विद्वान-ऋषि नास्तिक भी होते थे। परंतु इससे किसी को कुछ भी न तब समस्या होती थी, न ही आज होती है। सनातन इतना विराट सागर है कि वह प्राचीनकाल से विश्व के सारे मत-पंथों को स्वयं में समा लेने की क्षमता रखता आया है, और सदैव रखेगा। समस्या तो तब उत्पन्न होती है; जब कोई अपने मत, पंथ अथवा प्रिय आराध्य की महिमा गाते-गाते अन्य भक्तजनों के मत, पंथ अथवा आराध्यों को तुच्छ-नगण्य प्रमाणित करने में लग जाता है।... और इस यज्ञ में यही हुआ था।

सब जानते थे कि प्रजापति दक्ष श्रीविष्णु के परम भक्त थे। वे उन्हें ही सर्वेसर्वा मानते थे। किंतु इसे लेकर कभी किसी को तनिक भी कठिनाई नहीं हुई, कष्ट नहीं हुआ। अनुचित तो तब होता था, जब वे रुद्रदेव को अपमानित करने लगते थे। उन्हें केवल देवों में ही नहीं, अपितु पूरे ब्रह्मांड में... असुरों तक से भी तुच्छ प्रमाणित करने में लग जाते थे। और वे ऐसा प्रायः ही किया करते थे। स्वयं उनके पिता ब्रह्मा और आराध्य हरि भी उन्हें कई बार भली-भाँति डाँट-समझा चुके थे, महेश्वर की महिमा गा चुके थे, और ऐसा किए जाने पर कभी भारी विनाश हो जाने की आशंका प्रकट कर चुके थे। किंतु जब किसी का विनाश होना ही होता है; तो उसकी बुद्धि नितांत विपरीत हो जाती है, परिपूर्ण तथ्य-सत्य भी अनुचित प्रतीत होने लगते हैं और अहंकार सर चढ़कर बोलने लगता है! त्रेतायुग में रावण श्रीराम की और द्वापरयुग में दुर्योधन, दु:शासन, कर्ण इत्यादि श्रीकृष्ण की भगवत्ता-दिव्यता को प्रत्यक्ष नेत्रों से बारंबार देखते आ रहे थे; तथापि वे कहाँ माने थे!

इस यज्ञ में तो नीलकंठ के प्रति दक्ष की दुष्टता चरम पर ही पहुँच गई थी। यद्यपि सदाशिव को तब भी कहाँ कुछ अंतर पड़ने वाला था! वे तो सदा की भाँति तब भी अपने कैलाश पर्वत पर ध्यान रूपी परमानंद में डूबे हुए थे। किंतु प्रत्येक व्यक्ति शिव की तरह निरपेक्ष, नियंत्रित रह जाए; भला यह कहाँ संभव है! जब यह भली-भाँति स्पष्ट हो गया कि इस यज्ञ को आयोजित करने की मूल मंशा क्या है; तो महान् शिव-भक्त ऋषि दधीचि अत्यंत व्याकुल हो उठे, स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख पाए। यद्यपि सबके-सब पूर्व में ही समझ चुके थे, किंतु नितांत शुभ कार्य 'यज्ञ' की मर्यादा रखने हेतु मौन थे। कदाचित् यह सोचकर भी मौन थे कि इतने शुभ और भव्य कार्य में कोई क्या ही कुछ अनुचित करेगा!

ऋषि दधीचि बोल पड़े, "मैं यहाँ पधारे हुए समस्त देवी-देवताओं के प्रति पूरे हृदय से नमन-सम्मान प्रकट करते हुए कुछ कहना चाहता हूँ। जिस मंगल कार्य में मेरे परमेश्वर पिनाकपाणि का आह्वान न किया जाए, वह मंगल कार्य कदापि फलित नहीं हो सकता है। सत्य तो यह है कि मैं और अन्य कई शिवभक्त भी यहाँ आना नहीं चाहते थे। किंतु स्वयं हमारे प्रभु ने समझाया था कि प्रजापति, यज्ञ और निमंत्रण की भी एक मर्यादा होती है। मेरे विश्वेश्वर ने कहा था कि यदि कट्टर शत्रु भी किसी कार्य में निमंत्रित करे और वहाँ जाने पर हानि न हो, तो अवश्य जाना चाहिए। स्वयं आपके पिता ब्रह्मा और भगवान् विष्णु भी त्रिदेवों के देव के बिना यहाँ नहीं आना चाहते थे; अर्थात्‌ वे दोनों भी उन्हीं के समझाने पर यहाँ आए हुए हैं।

ऋषि दधीचि ने कुछ क्षण रुककर पुनः कहा, "मुझे तो बहुत आश्चर्य हो रहा है कि जो समस्त देवताओं में सर्वाधिक भोले और सरल हैं, आपने उन्हें ही निमंत्रित क्यों नहीं किया! जिनके शीघ्र ही प्रसन्न हो जाने की सर्वाधिक संभावना होती है; जो असुरों तक से प्रसन्न होकर उनकी मनोकामनाओं को पूर्ण कर देने वाले औघड़ दानी और भोले भंडारी हैं; आपने उनका आह्वान कैसे नहीं किया! यदि आपके मन में शुभ विचार होते, अथवा केवल अपने लिए कुछ पाने की इच्छा होती, तो आप सबसे पहले उन्हें ही बुलाते। स्पष्ट है कि आपकी मंशा में कोई-न-कोई दोष अवश्य है।"

महादुष्ट दक्ष को लगा कि इतने विशाल जनसमूह और गणमान्य के मध्य में ऋषि दधीचि के द्वारा उनका घोर अपमान कर दिया गया। कदाचित् प्रजापति और ब्रह्मा-पुत्र होने का भी अहंकार हावी हो गया था, "जब समस्त देवताओं के मूल और मेरे आराध्य भगवान् विष्णु ही यहाँ आ गए हैं, तो कहाँ कुछ कमी रह जाती है! उनमें ही सनातन धर्म, यज्ञ और अन्य सारे कर्म प्रतिष्ठित हैं। जब वेदों, उपनिषदों और विविध आगमों के प्रतिपादक लोकपितामह ब्रह्मा आ गए हैं... देवराज इंद्र, अन्य सभी देवी-देवताओं, देवर्षियों के साथ आप जैसे उत्तम महर्षि भी आ गए हैं... तब तो यह यज्ञ स्वयं में ही महायज्ञ हो गया है! ऐसे मे उस कपाली, सर्पधारी और भस्मधारी के यहाँ आने पर तो यह महायज्ञ भी अपवित्र हो जाएगा। जिसके न रहने का कोई ठिकाना है, न पहनने का कुछ ढंग है; जो भूतों, प्रेतों और पिशाचों के साथ श्मशान में रहता हो, और जो कुछ भी करता-धरता नहीं हो, केवल मौन बैठे रहता हो; उसको यहाँ निमंत्रित करने का घोर पाप तो मैं अपने मस्तक पर कदापि नहीं ले सकता हूँ।"

अब ऋषि दधीचि के लिए वहाँ एक क्षण भी रुकना असंभव-सा हो गया! यदि किसी असुर के आराध्य का ऐसा अपमान किया गया होता, तो वह भले ही अपना प्राण गंवा बैठता, किंतु आक्रमण अवश्य कर बैठता! परंतु वे ऋषि दधीचि थे! उनके महेश्वर के कहे अनुसार प्रजापति, यज्ञ और निमंत्रण की मर्यादा को स्थिर रखने की बात थी। अत्यधिक कठिनाई से स्वयं पर नियंत्रण रखते हुए समझाने हेतु अंतिम प्रयास किया, "मैं अब भी कह रहा हूँ कि उन्हें ससम्मान बुला लीजिए। वे भोलेनाथ हैं। आपके सारे अनुचित कार्यों को एक ही क्षण में क्षमा कर देंगे।"

"कदापि नहीं!!"

अंततः क्रोध उबल ही पड़ा, "यदि ऐसा ही है, तो मैं ऋषि दधीचि अपने समस्त तपोबल से उन्हीं देवदेवेश्वर को साक्षी मानते हुए तुम्हें यह शाप देता हूँ कि यह यज्ञ किसी भी मूल्य पर सफल नहीं होगा! और तुम्हारा विनाश होकर ही रहेगा!!" यह कहकर वे उसी क्षण यज्ञशाला से बाहर निकल गए। उनके साथ अन्य कई सारे शिवभक्त भी चल दिए।

वहाँ उपस्थित सभी के मन-मस्तिष्क में हाहाकार मच गया! सबके-सब समझ गए कि आज कुछ भयंकर अशुभ होने वाला है, महाविनाश होने वाला है! इधर महामूर्ख दक्ष को यह प्रतीत होने लगा कि इस यज्ञ में जो कुछ भी विघ्न शेष था, वह सब दूर हो गया।
क्रमशः ......

ॐ नम: शिवाय 🙏

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