Sunder Bhakti Dham

25/05/2026

*नवतपा 25 मई से 2 जून*

*रोहिणी नक्षत्र का सूर्य 25 मई सोमवार को रात्रि 8 बजकर 10 मिनट से आएगा।इसी समय से नवतपा आरंभ होगा।*

*नवतपा के हर दो-दो दिन का अलग-अलग प्राकृतिक और कृषि क्षेत्र में प्रभाव माना जाता है।*

*पहले 2 दिन, यदि इन दिनों में तेज गर्मी न पड़े और लू न चले, तो साल भर चूहों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हो सकती है।*

*तीसरा और चौथा दिन, यदि इन दो दिनों में तापमान कम रहे और तपन न हो, तो फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़े (कातरा) और टिड्डियां पैदा हो सकते हैं।*

*पांचवां और छठा दिन, इन दिनों में गर्मी कम पड़ने से सांप, बिच्छू और अन्य जहरीले कीड़े-मकौड़ों की संख्या बढ़ सकती है।*

*अंतिम 3 दिन (सातवां, आठवां और नौवां दिन), इन दिनों का पूरी तरह से तपना सबसे ज्यादा जरूरी होता है। माना जाता है कि ये दिन जितने अधिक तपेंगे, आने वाले सावन और भादों के महीनों में बारिश उतनी ही अच्छी होगी।*

*25 मई को सूर्य रोहिणी में प्रवेश करने का प्रभाव।*

*सरसों का तेल, गुड़, खांड, सुपारी, रुई, सूत, सन, आदि चीजें मंहगी होगी।*

*ट्रांसपोर्ट संबंधित व्यवसायियों को सरकार के किसी निर्णय से कष्ट होगा।*

*आपका तन मन स्वस्थ्य रहें आप दीर्घायु हों आपका जीवन मंगलमय हो प्रभू की कृपा अनवरत आप पर बनी रहे।*

23/05/2026

एक बार देवर्षि नारद कैलाश पहुँचे, वहाँ उन्हें भगवान शंकर और माता पार्वती के दर्शन हुए। दोनों को प्रणाम करने के पश्चात देवर्षि ने महादेव से पूछा कि "हे प्रभु! पृथ्वी पर मनुष्य अत्यंत दुखी है और उनके दुखों का निवारण आपके द्वारा ही संभव है। अतः आप मुझे वो विधि बताइये जिससे मनुष्य आपको शीघ्र और सरलता से प्रसन्न कर सके। इसे जानकार मानव जाति का कल्याण होगा।"

नारद का प्रश्न सुनकर महादेव बोले - "देवर्षि! मुझे प्रसन्न करने के लिए किसी पूजा विधि की आवश्यकता नहीं है। मैं तो अपने भक्त भक्तिभाव से ही प्रसन्न हो जाता हूँ। किन्तु आपने पूछा है तो मैं बताता हूँ। मुझे बिल्वपत्र अत्यंत प्रिय है अतः जो मनुष्य भक्तिभाव से मुझे केवल जल और बिल्वपत्र अर्पण करता है, मैं उससे ही प्रसन्न हो जाता हूँ।"

नारद उनकी बात सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और उनकी आज्ञा लेकर पृथ्वी की ओर चले। उनके जाने के पश्चात देवी पार्वती ने पूछा कि क्या कारण है कि उन्हें बिल्वपत्र इतना प्रिय है। तब भगवान शिव ने कहा "हे देवी! बिल्वपत्र स्वयं देवी लक्ष्मी का ही रूप है और उन्होंने इसी से मेरी पूजा की थी इसी कारण ये मुझे अत्यंत प्रिय है।" ये सुनकर देवी पार्वती ने वो कथा सुनाने का आग्रह किया कि क्यों देवी लक्ष्मी ने उनकी पूजा की थी।

उनका प्रश्न सुन कर महादेव ने कहा - "हे देवी! एक बार भगवान ब्रह्मा ने नारायण और अन्य देवताओं के साथ मेरे रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की पूजा की। उस पूजा में वाग्देवी (देवी सरस्वती) ने मेरी स्तुति इतने मधुर स्वर में की कि सभी के साथ भगवान विष्णु भी मंत्रमुग्ध हो गए। वाग्देवी का स्वर और प्रभाव देख कर श्रीहरि का मन उनके प्रति श्रद्धा से भर गया और उन्होंने उनके सम्मान में कई छंदों की रचना कर दी। वाग्देवी के प्रति इतना प्रेम देख कर देवी लक्ष्मी ईर्ष्या से भर उठी और रूठ कर वे पृथ्वीलोक चली आयी। वहाँ उनके अश्रुओं से बिल्बवृक्ष की उत्पत्ति हुई और उसी स्थान पर देवी लक्ष्मी ने १००० वर्षों तक उसके पत्रों से मेरी तपस्या की।

बिल्वपत्रों द्वारा की गयी उनकी तपस्या से मैं अतिप्रसन्न हुआ और उन्हें दर्शन देकर वर माँगने को कहा। तब उन्होंने मुझसे कहा - "हे भगवन! मेरे स्वामी के लिए अब मैं प्रिय नहीं रही और उन्हें वाग्देवी से अनुराग हो गया है। अब आप ही श्रीहरि के हृदय में पुनः मेरा वास करवा सकते हैं। अतः हे सर्वेश्वर आप मुझे यही वरदान दीजिये कि मेरे स्वामी का मन वाग्देवी से हट कर पुनः मुझमे लग जाये।" उनकी ऐसी बात सुनकर मैंने हँसते हुए कहा - "देवी! नारायण को वाग्देवी से कोई अनुराग नहीं हुआ है अपितु उनके प्रति नारायण के मन में केवल श्रद्धा का भाव है। श्रीहरि के ह्रदय में आपके अतिरिक्त और कोई नहीं है अतः आप निश्चिंत होकर वैकुण्ठ अपने स्वामी के पास जाइये।" मेरे इस प्रकार सांत्वना देने पर देवी लक्ष्मी संतुष्ट हुई और प्रसन्न मन से वापस नारायण के पास लौटी। उन्होंने सहस्त्र वर्षों तक बिल्वपत्र द्वारा मेरी पूजा की थी इसी कारण ये मुझे अत्यंत प्रिय है।

21/05/2026

ज्येष्ठ मास महात्मय {अठारहवां अध्याय}

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भीमसेन व्यासजी से बोले कि हे तात ! जो आपने एकादशी का व्रत और उसका अद्भुत माहात्म्यं कहा है, वह मूढ चित्त होने के कारण मुझको सत्य प्रतीत नहीं होता है ॥ १ ॥

इसलिये वात्सल्य भावना का त्याग कर सत्य वचन कहिये । हे तात! यदि आप सत्य वचन न कहेगे तो मैं विदुर वचन (धृतराष्ट्र के प्रति जो विदुर के प्रोक्त वचन) है उनके समानःनष्ट हो जाऊँगा ॥ २॥

हे तात ! मन्त्री पुरोहित और वैद्य ये तीन जिसके साथ प्रिय वचन बोलते हैं उसके कोश (धननिधि), धर्म और शरीर इन तीनों का नाश हो जाता है ॥३॥

व्यास जी बोले कि हे भीमसेन ! हे वत्स ! हमने पहिले जो संक्षेप में आपसे कहा है, हे पवनपुत्र ! वह सर्वथा सत्य है उसको मिथ्या नहीं मानना ॥४॥

मैं इस विषय में पुरातन इतिहास को कहूँगा, तुम्हारा संशय विशाख (स्कन्द जी) के वचन श्रवण से दूर हो जायगा ।।५।।

पूर्वकाल में कालाञ्जन पर्वत पर पुलिन्द नाम से विख्यात समस्त धर्म का ज्ञाता राजा हुआ। उसने निष्कण्टक राज्य करके ।। ६ ।।

वहाँ द्वारिका के समान महान् पुर बनाया। और स्वयं अनेकों रथ, पत्ती (सेना) ऐरावत समान हाथी ॥ ७ ॥

उच्चैःश्रवा समान अनेकों घोड़ा से परिवारित (आवृत) होकर और सचिवों मे अनुमोदित वह राजा विजययात्रा के लिये निकला ॥ ८॥

सौ योजन मे विस्तृत राजा की सेना पुर (नगर) से निकली, और राजा के साथ चलने वाली वह सेनाङ्ग जो पदाति (पैदल सेना) है वह पृथिवी को आच्छादित कर जा रही थी ॥९॥

और सात व्यूह '' (रचना विशेष) से युक्त वह सेना सात महा समुद्र के समान मालूम होती थी। राजा पुलिन्द ने बड़े २ माण्डलिक, वीर, राजा और राजसेवकों को जीत लिया ॥ १० ॥

और उनसे विपुल (बहुत) कर भार लेकर पुर को गया। उसी तरह भूलोक के चक्रवर्ती राजाओ को जीत कर ॥ ११ ॥

जिस जिस सेनापति को बलवान् सुनता था, मद से गर्वित वह राजा पुलिन्द वहाँ वेगपूर्वक जाकर उनको जीतता था ॥ १२ ॥

इस तरह पर्यटन करते राजा पुलिन्द से चारों (गुप्तचरों) ने आकर कहा कि हे राजन् ! सभों का मालिक परम धर्मात्मा एक राजा है ॥ १३॥

जो कि श्रुति स्मृति पुराण का वेत्ता, देवता अतिथि का पूजक, शूर और सत्यप्रतिज्ञ है, उसको किसी ने भी नही जीता है, ॥१४॥

उसको विना जीते इस भूमण्डल मे आपकी कीर्ति सुतोपिणी (सन्तुष्ट करने वाली) न होवेगी। गुप्तचरों के यह वचन सुनकर अपने मन्त्रियों के साथ उस राजा पुलिन्द ने ॥ १५ ॥

सेना सहित प्राचीन वीं के सम्पूर्ण नगर को जाकर चारों तरफ से अच्छी तरह घेर लिया और पुलिन्द के सैनिक उस नगर के चारो तरफ स्थित हो गये ॥ १६ ॥

जैसे वन में वृकों (सियारों) के भुण्ड से एक सिह घेर लिया जाय, इस तरह उसे चारो तरफ से घेर लिया। हे तपोधन । उस समय उस नगर मे बड़ा कोलाहल मचा ॥ १७ ॥

कुछ लोगों ने राजा से, कुछ लोगो ने मन्त्रियों से जाकर समाचार कहा। हे राजन् ! उस दिन ज्येष्ठमास के शुक्लतच्क्ष की एकादशी तिथि थी ।॥ १८ ॥

उस नगर के वासी सभी लोग स्नान कर प्रसन्नता के साथ विष्णु पूजा मे रत हो गये और विष्णु भगवान् मे लीन होने के कारण परस्पर बात चीत भी नहीं करते थे ॥ १९ ॥

उस समय राजा पुलिन्द के सैनिक ग्राम में घुस गये और लूटने में लग गये, उन लुटेरों को किसीने मना न किया ॥ २० ॥

इसी बीच में किसी ग्रामवासी ने राजा पुलिन्द को नमस्कार कर हाथ जोड़कर साम (शान्ति) उपाय से यह वचन कहा कि ॥ २१ ॥

हे नृपश्रेष्ठ ! आज पुण्यप्रद एकादशी का व्रत है, हे राजन् ! समस्त नागरिकों के साथ राजा उपासना मे स्थित है ॥ २२ ॥

और आज नागरिक लोग तथा राजा भोजन, भाषण, हिंसा, मिथ्या वचन, दोषकर्म न करेगे ॥ २३ ॥

इसलिये हे राजन् ! आज और कल्ह के लिये द्या कीजिये और मैं राजा की आज्ञा से नहीं आया हूँ, परन्तु मैं आपसे यहाँ की निश्चित जो वात है उसको कहता हूँ ॥ २४ ॥

हे नृपते ! दो दिन तक आप जो कुछ करेंगे राजा वह सब सहन करेंगे, परन्तु परसों क्या होगा ? यह मैं नहीं जानता ॥२५॥

इति श्रीभविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसाद-व्यासेन कृतायां भाषाटीकायां अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

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21/05/2026

*काकभुशुण्डि का परिचय और जन्म कथा*

कथा श्रवण और कौआ रूप: जब भगवान शिव माता पार्वती को एकांत में रामकथा सुना रहे थे, तब एक कौवे ने गुप्त रूप से उसे सुन लिया। वही कौवा आगे चलकर काकभुशुण्डि बना। वे अनन्य रामभक्त थे और उनके मुख से रामकथा सुनकर महादेव ने उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान दिया था।

महादेव का श्राप और आशीर्वाद: एक कल्प पहले, काकभुशुण्डि अयोध्या में शूद्र जाति में जन्मे थे। शिवभक्ति के अहंकार में उन्होंने भगवान विष्णु की निंदा की। इस पर क्रोधित होकर महादेव ने उन्हें 1000 निम्न योनियों में भटकने का श्राप दिया। हालांकि, उनकी क्षमा-याचना पर शिव जी ने आशीर्वाद भी दिया कि उन्हें हर जन्म का स्मरण रहेगा, ज्ञान क्षीण नहीं होगा और अंत में रामभक्ति मिलेगी।

लोमश ऋषि का श्राप और काकभुशुण्डि रामायण: 1000 वें जन्म में वे ब्राह्मण बने और ज्ञान हेतु लोमश ऋषि के पास गए। वहाँ बहस करने के कारण ऋषि ने उन्हें कौवा (काग) बनने का श्राप दिया। काकभुशुण्डि ने इस श्राप को भी सहर्ष स्वीकार कर ऋषि को रामकथा सुनाई। प्रसन्न होकर लोमश ऋषि ने उन्हें इच्छामृत्यु और राममंत्र दिया। काकभुशुण्डि को अपने इस काग रूप से प्रेम हो गया और उन्होंने "काकभुशुण्डि रामायण" की रचना की। उन्होंने ११ बार रामायण और १६ बार महाभारत की घटनाओं को होते हुए देखा था।

गरुड़ जी का संशय और निवारणमेघनाद का नागपाश: लंका युद्ध के दौरान मेघनाद ने माय युद्ध के बल पर श्रीराम और लक्ष्मण को नागपाश में बांधकर अचेत कर दिया। तब जांबवंत के कहने पर हनुमान जी भगवान विष्णु के वाहन पक्षीराज गरुड़ को बुलाकर लाए।गरुड़ जी का भ्रम: गरुड़ जी ने आकर नागपाश काट दिया और दोनों भाइयों की रक्षा की। परंतु, सर्वशक्तिमान विष्णु के अवतार श्रीराम और शेषनाग के अवतार लक्ष्मण को एक साधारण मानव की तरह नागपाश में बंधा और अचेत देखकर गरुड़ के मन में संशय उत्पन्न हो गया कि क्या श्रीराम सचमुच भगवान हैं?

समाधान की खोज: गरुड़ जी अपनी शंका लेकर क्रमशः नारद जी, ब्रह्मा जी और अंत में महादेव के पास गए। महादेव ने उनसे कहा कि राम पर संदेह करना साक्षात नारायण पर संदेह करना है और इसका समाधान पृथ्वी पर उनके भक्त काकभुशुण्डि ही कर सकते हैं।भ्रम का निवारण: गरुड़ जी काकभुशुण्डि जी के पास पहुंचे। काकभुशुण्डि जी ने उन्हें समझाया कि श्रीराम साक्षात हरि के अवतार हैं, परंतु वे मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में पृथ्वी पर आए हैं। वे एक साधारण मनुष्य की तरह लीला कर रहे हैं ताकि मानव जाति के लिए एक आदर्श स्थापित कर सकें। बिना उनकी इच्छा के उन्हें त्रिलोक में कोई मूर्छित नहीं कर सकता; यह सब केवल उनकी लीला थी।यह सब जानकर पक्षीराज गरुड़ का सारा भ्रम दूर हो गया और उन्होंने श्रीराम से मन ही मन क्षमा मांगी।

राधे राधे

21/05/2026

🌼*7 पुरी - सप्त मोक्षदायिनी पुरियां*🌼

चार धाम के बाद सप्त पुरियों का महत्व है। कहा जाता है - "अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका। पुरी द्वारावती चैव सप्तैते मोक्षदायिकाः।"
इन 7 नगरों के दर्शन से मोक्ष मिलता है। ये भी पंच महाभूतों से जुड़ी हैं।

*1. अयोध्या - उत्तर प्रदेश*
*महाभूत*: आकाश तत्व प्रधान।
*क्यों*: राम जन्मभूमि। आकाश यानी ब्रह्म। राम मर्यादा पुरुषोत्तम, सबसे ऊंचे आदर्श। सरयू नदी पर बसी है पर तत्व आकाश है।
*देवता*: भगवान राम।
*विशेष*: धर्म और मर्यादा का केंद्र। मन की शुद्धि होती है।

*2. मथुरा - उत्तर प्रदेश*
*महाभूत*: पृथ्वी तत्व प्रधान।
*क्यों*: कृष्ण जन्मभूमि। पृथ्वी पर अवतार, ब्रज की रज, गोवर्धन पर्वत। सब ठोस, भौतिक, प्रेम लीला।
*देवता*: भगवान कृष्ण।
*विशेष*: प्रेम और भक्ति का केंद्र। स्थिरता और आनंद देती है।

*3. माया/हरिद्वार - उत्तराखंड*
*महाभूत*: जल तत्व प्रधान।
*क्यों*: गंगा का मैदान में प्रवेश। हर की पैड़ी। जल ही जल। मोक्षद्वार कहा जाता है।
*देवता*: माया देवी, गंगा मैया।
*विशेष*: पाप नाश करती है। कफ दोष शांत होता है। कुंभ यहीं लगता है।

*4. काशी/वाराणसी - उत्तर प्रदेश*
*महाभूत*: आकाश तत्व प्रधान।
*क्यों*: भगवान शिव की नगरी। त्रिशूल पर टिकी है। यहाँ मृत्यु भी मंगल है। आकाश यानी शून्य, मोक्ष।
*देवता*: काशी विश्वनाथ शिव।
*विशेष*: ज्ञान और मुक्ति का केंद्र। चार धाम के बाद काशी जरूरी। मणिकर्णिका घाट।

*5. काञ्ची/कांचीपुरम - तमिलनाडु*
*महाभूत*: पृथ्वी तत्व प्रधान।
*क्यों*: दक्षिण की काशी। पृथ्वी तत्व यानी स्थिरता। हजार मंदिरों का शहर। कामाक्षी मंदिर।
*देवता*: देवी कामाक्षी और भगवान वरदराज।
*विशेष*: शक्ति और विष्णु दोनों। गृहस्थ जीवन को बल देती है। रेशम के लिए प्रसिद्ध।

*6. अवन्तिका/उज्जैन - मध्य प्रदेश*
*महाभूत*: अग्नि तत्व प्रधान।
*क्यों*: महाकाल की नगरी। काल का अर्थ समय यानी अग्नि। यहाँ महाकाल की भस्म आरती होती है। शिप्रा नदी पर बसी है पर तत्व अग्नि है।
*देवता*: महाकालेश्वर शिव।
*विशेष*: काल पर विजय। पित्त बैलेंस करती है। कुंभ यहीं लगता है। एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग।

*7. द्वारावती/द्वारका - गुजरात*
*महाभूत*: वायु तत्व प्रधान।
*क्यों*: समुद्र तट, हर समय हवा। कृष्ण की कर्मभूमि। द्वारका मतलब दरवाजा, यानी गति। ये चार धाम में भी है और सप्त पुरी में भी।
*देवता*: द्वारकाधीश कृष्ण।
*विशेष*: कर्म और गति का केंद्र। वात दोष बैलेंस करती है।

*पंच महाभूत बंटवारा 7 पुरियों में*:
*आकाश*: अयोध्या, काशी = 2
*पृथ्वी*: मथुरा, काञ्ची = 2
*जल*: हरिद्वार = 1
*अग्नि*: उज्जैन = 1
*वायु*: द्वारका = 1

इस तरह 5 महाभूत पूरे हो गए।

*चार धाम vs सप्त पुरी*:
चार धाम 4 दिशाओं में महाभूत बैलेंस करते हैं। सप्त पुरी 7 चक्रों को जागृत करती हैं। दोनों मिलकर शरीर और आत्मा दोनों शुद्ध करते हैं।

*यात्रा का फल*: अयोध्या धर्म देती है, मथुरा प्रेम देती है, हरिद्वार शुद्धि देती है, काशी मुक्ति देती है, काञ्ची शक्ति देती है, उज्जैन काल से मुक्ति देती है, द्वारका कर्म देती है।

17/05/2026

*अमिट पुण्य अर्जित करने का अवसर : पुरुषोत्तम मास*
(पुरुषोत्तम/अधिक मास : 17 मई से 15 जून)

अधिक मास में सूर्य की संक्रांति (सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश) न होने से इसे ‘मल मास’ (मलिन मास) कहा गया है । स्वामीरहित होने से यह मास देव-पितर आदि की पूजा तथा मंगल कर्मों के लिए त्याज्य माना गया । इससे लोग इसकी घोर निंदा करने लगे ।

मल मास ने भगवान को प्रार्थना की, भगवान बोले : ‘‘मल मास नहीं, अब से इसका नाम ‘पुरुषोत्तम मास’ होगा । इस महीने में जो *जप, सत्संग, ध्यान, पुण्य दान आदि* करेंगे, उन्हें विशेष फायदा होगा । अंतर्यामी आत्मा के लिए जो भी कर्म करेंगे, तेरे मास में वह विशेष फलदायी हो जायेगा । तब से मल मास का नाम पड़ गया ‘पुरुषोत्तम मास’ ।’’
*विशेष लाभकारी*

अधिक मास में आँवला और तिल के उबटन से स्नान पुण्यदायी और स्वास्थ्य व प्रसन्नता में बढ़ोतरी करनेवाला है अथवा तो आँवला, जौ और तिल का मिश्रण बनाकर रखो और स्नान करते समय थोड़ा मिश्रण बाल्टी में डाल दिया । इससे भी स्वास्थ्य और प्रसन्नता पाने में मदद मिलती है । इस मास में आँवले के पेड़ के नीचे बैठकर भोजन करना अधिक प्रसन्नता और स्वास्थ्य देता है ।

आँवले व पीपल के पेड़ को स्पर्श करने से स्नान करने का पुण्य होता है, सात्त्विकता और प्रसन्नता की बढ़ोतरी होती है । इन्हें स्नान करने के बाद स्पर्श करने से दुगुना पुण्य होता है । पीपल और आँवला सात्त्विकता के धनी हैं ।

इस मास में धरती पर (बिस्तर बिछाकर) शयन व पलाश की पत्तल पर भोजन करे और ब्रह्मचर्य व्रत पाले तो पापनाशिनी ऊर्जा बढ़ती है और व्यक्तित्व में निखार आता है । इस पुरुषोत्तम मास को कई वरदान प्राप्त हैं और शुभ कर्म करने हेतु इसकी महिमा अपरम्पार है ।

*अधिक मास में वर्जित*
पुरुषोत्तम मास व चतुर्मास में नीच कर्मों का त्याग करना चाहिए । वैसे तो सदा के लिए करना चाहिए लेकिन आरम्भवाला भक्त इन्हीं महीनों में त्याग करे तो उसका नीच कर्मों के त्याग का सामर्थ्य बढ़ जायेगा । इस मास में शादी-विवाह अथवा सकाम कर्म एवं सकाम व्रत वर्जित हैं । जैसे - कुएँ, बावली, तालाब और बाग आदि का आरम्भ तथा प्रतिष्ठा, नवविवाहिता वधू का प्रवेश, देवताओं का स्थापन (देवप्रतिष्ठा), यज्ञोपवीत संस्कार, नामकरण, मकान बनाना, नये वस्त्र एवं अलंकार पहनना आदि । इस मास में किये गये निष्काम कर्म कई गुना विशेष फल देते हैं ।

*अधिक मास में करने योग्य*
जप, कीर्तन, स्मरण, ध्यान, दान, स्नान आदि तथा पुत्रजन्म के कृत्य, पितृमरण के श्राद्ध आदि एवं गर्भाधान, पुंसवन जैसे संस्कार किये जा सकते हैं ।
‘देवी भागवत’ के अनुसार यदि दान आदि का सामर्थ्य न हो तो संतों-महापुरुषों की सेवा (उनके दैवी कार्यों में सहभागी होना) सर्वोत्तम है । इससे तीर्थ, तप आदि के समान फल प्राप्त होता है । इस माह में दीपकों का दान करने से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं । दुःख-शोकों का नाश होता है । वंशदीप बढ़ता है, ऊँचा सान्निध्य मिलता है, आयु बढ़ती है । इस मास में गीता के 15वें अध्याय का अर्थसहित प्रेमपूर्वक पाठ करना और गायों को घास व दाना दान करना चाहिए । भक्तिपूर्वक सद्गुरु से अध्यात्म विद्या का श्रवण करने से ब्रह्महत्याजनित पाप नष्ट हो जाते हैं तथा दिन-प्रतिदिन अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है । निष्काम भाव से यदि श्रवण किया जाय तो जीव मुक्त हो जाता है ।

*व्रत-विधि*
भगवान श्रीकृष्ण इस मास की व्रत-विधि एवं महिमा बताते हुए कहते हैं : ‘‘इस मास में मेरे उद्देश्य से जो स्नान (ब्राह्ममुहूर्त में उठकर भगवत्स्मरण करते हुए किया गया स्नान), दान, जप, होम, गुरु-पूजन, स्वाध्याय, पितृतर्पण, देवार्चन तथा और जो भी शुभ कर्म किये जाते हैं, वे सब अक्षय हो जाते हैं । जो प्रमाद से इस मास को खाली बिता देते हैं, उनका जीवन मनुष्यलोक में दारिद्र्य, पुत्रशोक तथा पाप के कीचड़ से निंदित हो जाता है, इसमें संदेह नहीं ।
शंख की ध्वनि के साथ कपूर से आरती करें । ये न हों तो रूई की बत्ती से ही आरती कर लें । इससे अनंत फल की प्राप्ति होती है । चंदन, अक्षत और पुष्पों के साथ ताँबे के पात्र में पानी रखकर भक्ति से प्रातःपूजन के पहले या बाद में अर्घ्य दें ।
पुरुषोत्तम मास का व्रत दारिद्र्य, पुत्रशोक और वैधव्य का नाशक है । इसके व्रत से ब्रह्महत्या आदि सब पाप नष्ट हो जाते हैं ।

*विधिवत् सेवते यस्तु पुरुषोत्तममादरात् ।*
*कुलं स्वकीयमुद्धृत्य मामेवैष्यत्यसंशयम् ।।*
पुरुषोत्तम मास के आगमन पर जो व्यक्ति श्रद्धा-भक्ति के साथ व्रत, उपवास, पूजा आदि शुभ कर्म करता है, वह निःसंदेह अपने समस्त परिवार के साथ मेरे लोक में पहुँचकर मेरा सान्निध्य प्राप्त करता है ।’’

16/05/2026

वट सावित्री व्रत की कथा:-

मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री ने द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना। नारद मुनि ने पहले ही सावित्री को चेतावनी दी थी कि सत्यवान अल्पायु हैं और विवाह के ठीक एक साल बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी। इसके बावजूद सावित्री ने सत्यवान से विवाह किया और वन में सास-ससुर के साथ रहने लगीं।

सावित्री को सत्यवान की मृत्यु का दिन पता था, इसलिए उन्होंने तीन दिन पहले ही व्रत (उपवास) शुरू कर दिया था। उस दिन जब सत्यवान वन में लकड़ी काटते समय अचेत होकर गिर पड़े, तो सावित्री ने उन्हें बरगद के पेड़ के नीचे लेटा दिया। उसी समय भैंसे पर सवार होकर यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए। सावित्री ने उन्हें पहचाना और सावित्री ने कहा कि आप मेरे सत्यवान के प्राण न लें। यम ने इसे अनदेखा कर उसके पति के प्राण लेकर वे आकाश मार्ग से जाने लगे। सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चल पड़ीं।

यमराज यह देखकर आश्चर्य करने लगे की यह स्त्री मेरे पीछे कैसे और किस शक्ति के बल पर आ रही है। यमराज ने सावित्री से कहा कि तुम्हें इस मार्ग पर नहीं आना चाहिए यह अनुचित है। तुम्हें वापस चले जाना चाहिए। यम ने मना किया, मगर वह वापस नहीं लौटी। लेकिन सावित्री अपने निष्ठा और पतिव्रता पर अडिग रही। यमराज ने सावित्री की निष्ठा और बुद्धिमानी से प्रसन्न होकर कहा कि अपने पति के जीवनदान के बदले कोई भी 3 वरदान मांग लो।

1. सावित्री ने पहले वरदान में सास-ससुर की आंखों की रोशनी और खोया हुआ राज्य मांगा।
2. दूसरे वरदान में अपने पिता के लिए संतान सुख मांगा।
3. तीसरे वरदान में अपने लिए 100 पुत्रों की मां बनने का वरदान मांगा।

वरदान देते समय यमराज को यह एहसास हुआ कि सत्यवान के बिना सावित्री 100 पुत्रों की मां नहीं बन सकती। सावित्री की चतुराई और पतिव्रता धर्म से प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान के प्राण लौटा दिए।

मान्यता है कि जिस वट (बरगद) के पेड़ के नीचे सावित्री ने अपने पति के प्राण वापस पाए थे, वह वट वृक्ष त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का निवास स्थान माना जाता है, इसलिए इस दिन वट वृक्ष की पूजा की जाती है।

16/05/2026

।। पुण्यों का मोल।।

दान से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है और साथ ही जाने-अनजाने में किए गए पाप कर्मों के फल भी नष्ट हो जाते हैं।
शास्त्रों में दान का विशेष महत्व बताया गया है। इस पुण्य कर्म में समाज में समानता का भाव बना रहता है और जरुरतमंद व्यक्ति को भी जीवन के लिए उपयोगी चीजें प्राप्त हो पाती है।
एक व्यापारी जितना अमीर था उतना ही दान-पुण्य करने वाला. वह सदैव यज्ञ-पूजा आदि कराता रहता था.
एक यज्ञ में उसने अपना सबकुछ दान कर दिया. अब उसके पास परिवार चलाने लायक भी पैसे नहीं बचे थे.
व्यापारी की पत्नी ने सुझाव दिया कि पड़ोस के नगर में एक बड़े सेठ रहते हैं. वह दूसरों के पुण्य खरीदते हैं.
आप उनके पास जाइए और अपने कुछ पुण्य बेचकर थोड़े पैसे ले आइए जिससे फिर से काम-धंधा शुरू हो सके.
पुण्य बेचने की व्यापारी की बिलकुल इच्छा नहीं थी लेकिन पत्नी के दबाव और बच्चों की चिंता में वह पुण्य बेचने को तैयार हुआ. पत्नी ने रास्ते में खाने के लिए चार रोटियां बनाकर दे दीं.
व्यापारी चलता-चलता उस नगर के पास पहुंचा जहां पुण्य के खरीदार सेठ रहते थे. उसे भूख लगी थी.
नगर में प्रवेश करने से पहले उसने सोचा भोजन कर लिया जाए. उसने जैसे ही रोटियां निकालीं एक कुतिया तुरंत के जन्मे अपने तीन बच्चों के साथ आ खड़ी हुई.
कुतिया ने बच्चे जंगल में जन्म दिए थे. बारिश के दिन थे और बच्चे छोटे थे इसलिए वह उन्हें छोड़कर नगर में नहीं जा सकती थी.
व्यापारी को दया आ गई. उसने एक रोटी कुतिया को खाने के लिए दे दिया.
कुतिया पलक झपकते रोटी चट कर गई लेकिन वह अब भी भूख से हांफ रही थी.
व्यापारी ने दूसरी रोटी, फिर तीसरी और फिर चारो रोटियां कुतिया को खिला दीं. खुद केवल पानी पीकर सेठ के पास पहुंचा.
व्यापारी ने सेठ से कहा कि वह अपना पुण्य बेचने आया है. सेठ व्यस्त था. उसने कहा कि शाम को आओ.
दोपहर में सेठ भोजन के लिए घर गया और उसने अपनी पत्नी को बताया कि एक व्यापारी अपने पुण्य बेचने आया है. उसका कौन सा पुण्य खरीदूं.
सेठ की पत्नी बहुत पतिव्रता और सिद्ध थी. उसने ध्यान लगाकर देख लिया कि आज व्यापारी ने कुतिया को रोटी खिलाई है.
उसने अपने पति से कहा कि उसका आज का पुण्य खरीदना जो उसने एक जानवर को रोटी खिलाकर कमाया है. वह उसका अब तक का सर्वश्रेष्ठ पुण्य है.
व्यापारी शाम को फिर अपना पुण्य बेचने आया. सेठ ने कहा- आज आपने जो यज्ञ किया है मैं उसका पुण्य लेना चाहता हूं.
व्यापारी हंसने लगा. उसने कहा कि अगर मेरे पास यज्ञ के लिए पैसे होते तो क्या मैं आपके पास पुण्य बेचने आता!
सेठ ने कहा कि आज आपने किसी भूखे जानवर को भोजन कराकर उसके और उसके बच्चों के प्राणों की रक्षा की है. मुझे वही पुण्य चाहिए.
व्यापारी वह पुण्य बेचने को तैयार हुआ. सेठ ने कहा कि उस पुण्य के बदले वह व्यापारी को चार रोटियों के वजन के बराबर हीरे-मोती देगा.
चार रोटियां बनाई गईं और उसे तराजू के एक पलड़े में रखा गया. दूसरे पलड़े में सेठ ने एक पोटली में भरकर हीरे-जवाहरात रखे.
पलड़ा हिला तक नहीं. दूसरी पोटली मंगाई गई. फिर भी पलड़ा नहीं हिला.
कई पोटलियों के रखने पर भी जब पलड़ा नहीं हिला तो व्यापारी ने कहा- सेठजी, मैंने विचार बदल दिया है. मैं अब पुण्य नहीं बेचना चाहता.
व्यापारी खाली हाथ अपने घर की ओर चल पड़ा. उसे डर हुआ कि कहीं घर में घुसते ही पत्नी के साथ कलह न शुरू हो जाए.
जहां उसने कुतिया को रोटियां डाली थीं वहां से कुछ कंकड़-पत्थर उठाए और साथ में रखकर गांठ बांध दी.
घर पहुंचने पर पत्नी ने पूछा कि पुण्य बेचकर कितने पैसे मिले तो उसने थैली दिखाई और कहा इसे भोजन के बाद रात को ही खोलेंगे. इसके बाद गांव में कुछ उधार मांगने चला गया.
इधर उसकी पत्नी ने जबसे थैली देखी थी उसे सब्र नहीं हो रहा था. पति के जाते ही उसने थैली खोली.
उसकी आंखे फटी रह गईं. थैली हीरे-जवाहरातों से भरी थी.
व्यापारी घर लौटा तो उसकी पत्नी ने पूछा कि पुण्यों का इतना अच्छा मोल किसने दिया ? इतने हीरे-जवाहरात कहां से आए ?
व्यापारी को अंदेशा हुआ कि पत्नी सारा भेद जानकर ताने तो नहीं मार रही लेकिन उसके चेहरे की चमक से ऐसा लग नहीं रहा था.
व्यापारी ने कहा- दिखाओ कहां हैं हीरे-जवाहरात. पत्नी ने लाकर पोटली उसके सामने उलट दी. उसमें से बेशकीमती रत्न गिरे. व्यापारी हैरान रह गया.
फिर उसने पत्नी को सारी बात बता दी. पत्नी को पछतावा हुआ कि उसने अपने पति को विपत्ति में पुण्य बेचने को विवश किया.
दोनों ने तय किया कि वह इसमें से कुछ अंश निकालकर व्यापार शुरू करेंगे. व्यापार से प्राप्त धन को इसमें मिलाकर जनकल्याण में लगा देंगे.
ईश्वर आपकी परीक्षा लेता है. परीक्षा में वह सबसे ज्यादा आपके उसी गुण को परखता है जिस पर आपको गर्व हो.
अगर आप परीक्षा में खरे उतर जाते हैं तो ईश्वर वह गुण आपमें हमेशा के लिए वरदान स्वरूप दे देते हैं.
अगर परीक्षा में उतीर्ण न हुए तो ईश्वर उस गुण के लिए योग्य किसी अन्य व्यक्ति की तलाश में लग जाते हैं.
इसलिए विपत्तिकाल में भी भगवान पर भरोसा रखकर सही राह चलनी चाहिए. आपके कंकड़-पत्थर भी अनमोल रत्न हैं।।

16/05/2026

*पुरुषोत्तम मास, मलमास अथवा अधिकमास 17 मई से 15 जून तक।*

*हर महीने सूर्य का राशि परिवर्तन (संक्रांति) होता है, लेकिन जब किसी महीने में सूर्य राशि परिवर्तन नहीं करते हैं, तो वह महीना अधिकमास कहा जाता है. इस पवित्र महीने में कुछ काम वर्जित होते हैं, तो आइए जानते हैं पंडित रमेश पाण्डेय जी से कि पुरुषोत्तम मास में क्या करें और क्या न करें।*

*सनातन धर्म में अधिकमास को बहुत विशेष, पावन और महत्वपूर्ण माह माना जाता है. अधिकमास को पुरुषोत्तम मास और मलमास भी कहा जाता है. ये माह जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित किया गया है. इस माह में भगवान विष्णु का व्रत और पूजन बहुत पुण्यदायी माना गया है. इस बार 17 मई 2026 से 15 जून 2026 तक अधिकमास रहने वाला है.*

*यह केवल एक अतिरिक्त महीना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना और आत्मचिंतन का विशेष अवसर माना जाता है.*

*अधिकमास में, तामसिक चीजों का सेवन न करें, अधिकमास पवित्र महीना है, इसमें शराब-नॉनवेज किसी भी तरह की तामसिक चीजों के सेवन से बचें. इस पूरे महीने केवल सात्विक भोजन खाएं. वरना जीवन में दुर्भाग्य और नकारात्मकता बढ़ सकती है.*

*क्रोध और अपमान, इस महीने में क्रोध और किसी का अपमान न करें. क्योंकि ऐसा करने से नकारात्मकता बढ़ती है. पुरुषोत्तम महीना शुभ विचारों वाला और जीवन में सकारात्मकता लाने वाला होता है.*

*शुभ और मांगलिक काम, इस माह में शादी, सगाई, नए कार्य की शुरुआत, मुंडन, जनेऊ संस्कार आदि न करें. इस माह में इन सभी शुभ कामों का शुभ फल प्राप्त नहीं होता.*

*किसी को भी खाली हाथ न लौटाएं, इस माह में किसी को भी खाली हाथ न लौटाएं. किसी का पैसा हड़पें. धोखेबाजी न करें. इससे आपको बड़ा नुकसान हो सकता है.*

*व्रत और उद्यापन: पुरुषोत्तम मास में न तो व्रत करें और ना ही उसका उद्यापन करें. इस दौरान किसी नए व्रत का संकल्प न लें. अधिकमास में इन कामों से मिलता है पुण्य इस पवित्र महीने में रोजाना भगवान विष्णु की पूजा करें. ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें. शाम को तुलसी के पास दीपक जलाएं गरीबों को दान करें.*

16/05/2026

वट सावित्री व्रत आज
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वट सावित्री का व्रत ज्येष्ठ माह में दो बार किया जाता है। पूर्व और उत्तर भारत में यह व्रत ज्येष्ठ अमावस्या को किया जाता है, जबकि दक्षिण और मध्य भारत में इसे ज्येष्ठ पूर्णिमा को किया जाता है। विवाहित महिलाओं के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र और सुखद दांपत्य जीवन की कामना के लिए वट वृक्ष की पूजा करती हैं।

वट सावित्री व्रत कब है ?
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पंचांग के अनुसार, इस बार ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि 16 मई, शनिवार को सुबह 5 बजकर 12 मिनट पर लगेगी और रात में 1 बजकर 31 मिनट पर समाप्त हो जाएगी। उदयातिथि को देखते हुए वट सावित्री व्रत 16 मई को किया जाएगा।

वट सावित्री व्रत पूजा मुहूर्त
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इस दिन पूजा के लिए शुभ समय अभिजीत मुहूर्त का रहेगा। सुहागिन महिलाएं 16 मई को सुबह 11 बजकर 50 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 44 मिनट तक शुभ मुहूर्त में पूजा कर सकती हैं।

वट सावित्री व्रत में बरगद पर जरूर अर्पित करें ये चीजें
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वट सावित्री व्रत के दिन वट वृक्ष की पूजा के दौरान सूती वस्त्र, लाल फूल, सिंदूर, कच्चा सूत, अक्षत (अटूट चावल), जनेऊ, चंदन और पान-सुपारी अर्पित करने चाहिए। वट वृक्ष के पास घी का दीपक जलाएं और श्रद्धा अनुसार, पेड़ की 7 या 108 बार परिक्रमा करते हुए कच्चा सूत या मौली (लाल/पीला धागा) लपेटें। ऐसा करने से वैवाहिक संबंध मजबूत होते हैं।

इस भोग के बिना अधूरा है वट सावित्री व्रत
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वट सावित्री व्रत में भीगे हुए चने (चने की दाल) का विशेष महत्व है, इसे सावित्री और सत्यवान को अर्पित करें। इसके बिना भोग पूरा नहीं माना जाता है। पूजा में 5 प्रकार के ऋतु फल (जैसे आम, जामुन, केला, तरबूज, खरबूज, नारियल पानी) भी जरूर शामिल करें। पूजा में गुड़ से बनी मिठाई या गुड़ से बनी मीठी पूरी भी अर्पित कर सकते हैं।

देवी सावित्री को शृंगार की सामग्री अर्पित करें
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वट सावित्री व्रत में माता सावित्री की भी विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। उनको सिंदूर, कुमकुम, मेहंदी, चूड़ियां और बिंदी जैसी शृंगार की सामग्री जरूर चढ़ाएं। मान्यता है कि माता सावित्री को सुहाग का सामान चढ़ाने से व्रती महिला को 'अखंड सौभाग्य' का आशीर्वाद मिलता है।

वट सावित्री व्रत पूजा विधि
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इस दिन सुहागिन महिलाओं को सुबह स्नान करके नए वस्त्र और सोलह श्रंगार करना चाहिए।
शाम के समय बरगद के पेड़ के नीचे माता सावित्री की पूजा करें।
पूजन सामग्री को पेड़ की जड़ में चढ़ाएं।
इसके बाद वट वृक्ष को प्रसाद का भोग लगाएं और धूप-दीपक दिखाएं।
इस के बाद हाथ जोड़कर माता सवित्री से पति की लंबी उम्र की कामना करें।
वट वृक्ष के चारों ओर 7 बार परिक्रमा करते हुए कच्चे धागे या मोली को 7 बार लपेटें।
अंत में बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर माता सावित्री-सत्यवान की कथा सुनें।

वट सावित्री व्रत पर क्यों होती है बरगद के पेड़ की पूजा
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हिंदू धर्म में बरगद के पेड़ को वट वृक्ष और अक्षय वट के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बरगद के पेड़ की जड़ में ब्रह्मा जी, तने में जगत के पालनहार भगवान विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का वास होता है। ज्येष्ठ मास की अमावस्या के दिन इसी पेड़ के नीचे माता सावित्री ने अपने पति को पुनर्जीवित कराया था। इसलिए विवाहित महिलाएं पति कि दीर्घायु और अखंड सौभाग्य के लिए इसकी पूजा करती है।

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