22/08/2026
_*सावन और शिव महिमा की ज्ञानवर्धक कथा।*_
( प्रजापति दक्ष के यज्ञ की कथा )
*भाग - 5*
गत पोस्ट से आगे ......
शिव को उनकी प्राण प्रिया का देह-त्याग के बारे में सूचित करने हेतु दौड़ पड़े शिवगणों के विलाप का कोई ओर-छोर नहीं था! उनकी चेतना नितांत लुप्त हो गई थी, वे अपना सुधबुझ पूर्णतः खो बैठे थे! मार्ग में बारंबार गिर-पड़ जा रहे थे। कई बार तो एक-दूसरे पर ही गिर-पड़ जा रहे थे। अपनी छाती पर मुक्का मारते हुए नितांत ऊँचे स्वर में रोते हुए जा रहे थे, "माता को हम नहीं बचा पाए! महादेव को क्या कहेंगे, कैसे कहेंगे! उन्होंने तो हमारी माता का ध्यान रखने को कहा था। किंतु माता ने ही हमें कुछ भी नहीं कर पाने को विवश कर दिया था...!" वे भय से थर-थर काँपते भी जा रहे थे कि कहीं उनके शंभु उन्हीं पर कुपित न हो जाएँ!
बात जब अपने माता-पिता, किसी अन्य पारिवारिक सदस्य, प्रियजन अथवा आराध्य के मान-अपमान की आ जाए; तो नीच से नीच व्यक्ति भी कुछ भी करने पर उतर आता है! फिर शिवगणों के लिए तो उनके महादेव सर्वप्रिय और सर्वश्रेष्ठ आराध्य होने के साथ-साथ माता और पिता भी थे। विवाह करने से पूर्व तक महादेव ने ही उन्हें पाला-पोसा था, संरक्षण प्रदान किया था। ऐसे में, यदि माता सती ने उन्हें विवश नहीं किया होता तो अकेले नंदी महाराज ही इतने सक्षम थे कि उन्हें देह-त्याग करने से रोक देते। भले ही अपना प्राण गँवा बैठते, परंतु दक्ष को नितांत कठोर उत्तर अवश्य देते।
इधर यज्ञशाला में हाहाकार मचा हुआ था! "धिक्कार है! धिक्कार है!!" का शोर गूँज रहा था! असुरों को छोड़कर सबके-सब दक्ष को धिक्कार रहे थे कि उसके जैसा पापी पिता पूरी सृष्टि में कोई नहीं है। कई ऋषि-मुनि और मनुष्य बाहर ही निकल गए थे। जो रह गए थे, वे भी अंदर से रुदन, क्रोध और भय की अग्नि में जल रहे थे। सबने मान लिया था कि अब तो महाप्रलय होकर ही रहेगा, भले ही यहाँ स्वयं ब्रह्मा और नारायण ही उपलब्ध क्यों न हों। अब ये दोनों भी कुछ नहीं कर पाएँगे। स्वयं भगवान् विष्णु ने इस बात की पुष्टि भी कर दी, "दक्ष! तुमने अपने सोचे अनुसार *'न भूतो न भविष्यति' वाला यज्ञ-कार्य कर लिया।* अब महादेव का 'न भूतो न भविष्यति' वाले विनाश-कार्य की प्रतीक्षा करो!"... किंतु दक्ष के मुख पर तनिक भी ग्लानि, दुःख अथवा भय का भाव नहीं था। असुरगण तो अंदर ही अंदर बहुत प्रसन्न हो रहे थे कि शिव अब शक्तिहीन हो गए हैं। समस्त सृष्टि के आधार 'ब्रह्मा, विष्णु और महेश' में से महेश अब कुछ नहीं रह गए हैं। अर्थात् उनके लिए अब देवी-देवताओं को जीतना बहुत आसान हो गया है।
यद्यपि श्रीहरि चाहते तो अपने सुदर्शन चक्र के केवल एक वार से ही महादुष्ट दक्ष का शीश काट देते। यज्ञशाला में जो कुछ भी हुआ था, उन्हें नहीं होने देते। वैसे भी, उनके सर्वप्रिय शिव ही हैं, वे शिववल्लभ हैं। उसी भाँति, जिस भाँति शिव विष्णुवल्लभ हैं।... और वे क्रोधित हुए भी थे। परम विष्णुभक्त होते हुए भी दक्ष को कई बार समझाया था, विनाश के प्रति सावधान किया था। आज घटित हुए अत्यंत मार्मिक घटना को भी टालने का प्रयास किए थे। किंतु केवल टाल ही सकते थे, रोक नहीं सकते थे। इस यज्ञ का संरक्षण करने हेतु वचनबद्ध जो थे। अपने दिए वचन की मर्यादा रखने हेतु विवश थे।... अब यदि ईश्वर भी मर्यादा और अपने दायित्वों से परे हो जाएँ, तो फिर वह कैसा ईश्वर! स्वयं अर्धनारीश्वर भी कहाँ परे हो पाए थे, केवल टालने हेतु ही तो सारे प्रयास कर पाए थे।
कदाचित् माता सती का जन्म दक्ष के अहंकार का विनाश का निमित्त बनने हेतु ही हुआ था। जब-जब अधर्म चरम पर पहुँचता है, उसका नाश करने हेतु धर्म को अपना प्रचंड रूप धारण करना ही पड़ता है। और धर्म-अधर्म के इस युद्ध में धर्म को भी कुछ-न-कुछ की आहुति देनी ही पड़ती है। बाद के त्रेता युग में श्रीराम को रावण का अंत करने हेतु चौदह वर्ष का वनवास, पितृ-शोक और सीता-वियोग रूपी आहुति देनी पड़ी थी। तो द्वापर युग में पाँचों पांडवों के पुत्रों, वीर अभिमन्यु समेत न जाने कितनों के प्राणों की आहुति देनी पड़ी थी।... जो व्यक्ति अथवा समाज अधर्म की व्याप्ति की उलाहना तो देते रहता है, किंतु किसी रूप में कोई आहुति देने से डरता है, उसका एक दिन पूर्णतः पतन होकर ही रहता है।
अंततः शिवगण कैलाश पहुँच ही गए। उनके माथे पर बल पड़ गए, क्योंकि शंकर अपने आसन पर दिखाई नहीं दे रहे थे। कदाचित् उन्हें यह भी सुध नहीं रह गया था कि सर्वभूताधिवासी और सर्वज्ञानी को कोई क्या ही सूचना देगा।... तत्क्षण उन्होंने देखा कि वामदेव यज्ञ-स्थल की ओर देखते हुए खड़े हैं। जब गणों ने उनके नेत्रों को देखा, तो काँपकर रह गए... उनके नेत्र नितांत रक्तिम हो उठे थे! नख से लेकर शिख तक पूर्णतः कठोर हो गए थे! उनके भोलेनाथ अब साक्षात् महारुद्र बन गए थे!
सहसा महारुद्र ने अपनी एक जटा को उखाड़कर नीचे पटक दिया। उसी क्षण कोयले के रंग के समान एक नितांत भयावह जीव प्रकट हुआ। इतना भयावह कि उन्हें केवल देखकर ही सहस्त्रों के प्राण निकल जाएँ! उनकी आठ भुजाएँ थीं, और प्रत्येक भुजा में भिन्न-भिन्न भयानक शस्त्र थे। वे कोई और नहीं, महादेव का ही सर्वाधिक रौद्र रूप वीरभद्र थे। भूतनाथ ने उसी भाव में एक और जटा को उखाड़ते हुए नीचे पटका। अब अमावस्या की रात्रि के समान नितांत काली भद्रकाली प्रकट हुईं। वे महादेवी का ही भयंकर और आंतकी रूप थीं। उनकी अठारह भुजाएँ थीं। उन भुजाओं ने शंख, चक्र, कमल, गदा, त्रिशूल, भाला, कृपाण, खड्ग, वज्र, किसी राक्षस का कटा शीश, प्याला, अंकुश, जलपात्र, बड़ा चाकू, ढाल, धनुष और बाण थामे हुए थे।
शूली ने उन दोनों से यज्ञशाला की ओर संकेत करते हुए भयोत्पादक स्वर में कहा, "विनाश हो!! सर्वनाश हो!!"
और स्वयं ऊँची ध्वनि में डमरू बजाने लगे। सहसा पूरे ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया! धरती, आकाश समेत अन्य सारे लोक भी डोलने लगे! डमरू के प्रत्येक थाप पर असंख्य ऊर्जाएँ प्रकट होने लगीं! जो भी व्यक्ति और वस्तु उन ऊर्जाओं के संपर्क में आया, उसी क्षण जलकर राख होने लगा! समुद्रों में ज्वार उमड़ने लगा, पेड़ उखड़कर गिरने लगे, बादल अत्यंत भयावह रूप में गरजने लगे, कई सारे पर्वत खंडित होने लगे, ग्लेशियर टूटने लगे! सर्वत्र "त्राहिमाम-त्राहिमाम!!" गूँजने लगा!
इतने सारे अपशकुन एक साथ!! सबके-सब तो पहले ही इस महाप्रलय को भाँप चुके थे। जो असुर पहले बहुत प्रसन्न हो रहे थे, वे भी भयाक्रांत हो गए कि देवी-देवताओं को तो तब जीता जाएगा, जब वे इस महाप्रलय में बच जाएँगे। उनके मन में दो-एक बार यह भी विचार आया था कि वे दक्ष का साथ देंगे। किंतु अब तो कोई प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता था। किंतु दक्ष... वह तो जैसे अपनी मृत्यु की ही व्यग्रता से प्रतीक्षा कर रहा था! वह रुके हुए यज्ञ को पुनः आरंभ कराने पर तुला हुआ तो था, परंतु सफल नहीं हो पा रहा था। यज्ञाग्नि बारंबार बुझ जा रही थी।
वीरभद्र और भद्रकाली यज्ञ-स्थल की ओर दौड़ पड़े। महादेवी के अन्य आठ रूप भी भद्रकाली का साथ देने हेतु आ गईं। वे आठ रूप थे—चामुंडा, मुंडमर्दिनी, ईशानी, काली, कात्यायनी, भद्रा, वैष्णवी और त्वरिता। शिवगण भी कहाँ पीछे रहने वाले थे! उन्हें भी तो अपनी पूजनीया माताजी, उनके आराध्य की सर्वप्रिया का प्रतिशोध लेना था। तो सारे के सारे गण अपने उच्चतम स्वर में "हर हर महादेव! हर हर महादेव!!" कहते हुए साथ ही दौड़ने लगे।... जो भी मार्ग में आया और जो कोई भी वस्तु उनके गंतव्य में बाधक बन रही थी, उन सबका नाश करते हुए आगे बढ़ते रहे। वीरभद्र और भद्रकाली तो जाने कैसा स्वर निकाल रही थीं कि उन्हें सुनकर ही प्राण निकल जाने का भय उत्पन्न हो रहा था! इसलिए जो भी उनके निकट आया, वह अपने दोनों कानों को ढँकते हुए भाग जा रहा था।
उधर नृत्य, संगीत और नाट्यशास्त्र के रचयिता अब कुछ और ही रचने में लगे हुए थे! विनाश का तांडव नृत्य!! महारुद्र अब नटराज रूप में आ गए थे।
वीरभद्र, भद्रकाली एवं सारे गणों ने और विनाशकारी रूप धर लिया। वे यज्ञशाला के निकट आते जा रहे थे।... अंततः जब दक्ष के सेनापति ने उन्हें सूचित किया कि समस्त सेना का अंत हो गया है और सब यहाँ पहुँचने ही वाले हैं; तब जाकर दक्ष को भी अपना भावी दिख गया। वह तत्क्षण अपने आराध्य की ओर दौड़कर उनके चरणों में गिर गया, "हे मेरे कुलदेव! हे कृपासिंधु! मुझ पर कृपा करें। आपने इस यज्ञ का अर्थात् मुझे भी संरक्षण करने का वचन दिया था।" श्रीहरि ने कहा, "मैंने तुम्हें कितनी बार समझाया था। सावधान किया था। तुम मुझे आराध्य तो मानते हो, परंतु मेरी ही बात तुमने कदापि नहीं मानी। तुम्हारा अंत तो निश्चित है। परंतु मैं अपने वचन की मर्यादा भी रखूँगा।"
नारायण 'लीलाधर' भी हैं। उनके लिए इसका उपाय करना कौन-सी बड़ी बात थी कि उनके दिए वचन का मान भी रह जाए और उसके उपरांत वचनमुक्त होकर वे अपने सबसे प्रिय एवं आराध्य शिव के मार्ग से हट भी जाएँ। उन्होंने ऐसा ही किया।... अंततः दक्ष को जब प्रतीत हो गया कि अब उसके बचने की कोई संभावना नहीं है, तो वह बचने हेतु इधर-उधर भागने लगा। वीरभद्र ने उसका पीछा करते हुए एक ही वार में उस महापापी दक्ष का शीश काट डाला।
क्रमशः ......
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