27/01/2026
सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसने लोगों को असहज कर दिया है। वीडियो में एक युवती ऊँचे स्थान पर खड़ी होकर यह कहते हुए दिखाई देती है कि “मेरे पापा जी मर गए हैं।” लेकिन जो बात सबसे ज्यादा चौंकाती है, वह उसके चेहरे का भाव है—जहाँ दुख या शोक के बजाय एक अजीब-सी मुस्कान नजर आती है।
वीडियो के नीचे का दृश्य इसके उलट है। कुछ लोग मृत व्यक्ति की अर्थी उठाए हुए हैं। चेहरों पर गहरी उदासी है, आंखों में सन्नाटा और माहौल में शोक की गंभीरता साफ झलकती है। ऐसे में ऊपर खड़ी युवती का हाव-भाव कई सवाल खड़े कर देता है।
यह मामला सिर्फ एक वीडियो तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज की संवेदनशीलता और सोशल मीडिया संस्कृति पर बहस छेड़ देता है। सवाल यह नहीं है कि कोई व्यक्ति दुख को कैसे व्यक्त करता है—क्योंकि हर इंसान का शोक मनाने का तरीका अलग हो सकता है। लेकिन सवाल यह जरूर उठता है कि क्या अपनों की मौत भी अब कंटेंट बनती जा रही है?
जिस समाज में माता-पिता को भगवान का दर्जा दिया जाता रहा है, उसी समाज में उनकी मृत्यु को रील और व्यूज़ के नजरिए से देखा जाना कई लोगों को विचलित कर रहा है। क्या लाइक्स, फॉलोअर्स और वायरल होने की होड़ ने संवेदनाओं को पीछे छोड़ दिया है?
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि कुछ लोग सदमे की स्थिति में असामान्य व्यवहार भी कर सकते हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर इस तरह की प्रस्तुति सामूहिक सोच को प्रभावित करती है। यही वजह है कि ऐसे वीडियो केवल व्यक्तिगत नहीं रह जाते, बल्कि सामाजिक संदेश भी बन जाते हैं।
यह वायरल वीडियो एक गंभीर सवाल छोड़ जाता है—
अगर मौत जैसे सबसे संवेदनशील क्षण पर भी मुस्कान और कैमरा हावी हो जाए, तो आने वाले समय में इंसानियत और रिश्तों की मर्यादा कहाँ बचेगी?