06/11/2022
॥ श्रीविजयलक्ष्मीसमेतसुदर्शनचक्रराजपरब्रह्मणेनमः ॥
श्री सुदर्शनशतकम् -४
आरादारात्सहस्राद्विसरति विमतक्षेपदक्षाद्यदक्षा-
न्नाभेर्भास्वत्सनाभेर्निजविभवपरिच्छिन्नभूमेश्च नेमेः ।
आम्नायैरेककण्ठैः स्तुतमहिम महो माधवीयस्य हेते-
स्तद्वो दिक्ष्वेधमानं चतसृषु चतुरः पुष्यतात्पूरुषार्थान् ॥
शब्दार्थ: सहस्रात्-हजारों, आरात् =अर समूह से विमत-शत्रुओं का, क्षेप-मर्दन करने में, दक्षात् = कुशल, अक्षात् =सुदर्शन भगवान् के अक्ष से,भास्वत् = सूर्य के सदृश तेज वाली,सनाभे:- नाभि से एवं , निज-अपने, विभव-विस्तार से, परिच्छिन्नभूमेः=पृथ्वी को नापने वाली, नेनेः सकाशात् = नेमि से, सञ्जातम् निकला हुआ, यत् मह:- जो तेज है, वह, आरात्-पास में ही, विसरति=व्याप्त रहता है। आम्नायैः- वेदों के द्वारा, एककण्ठैः- एक स्वर (एक मत) से, स्तुतमहिम = जिनकी महिमा गायी जाती है, वह तेज, चतसृषु = चारों दिशाओं में, वर्धमानं= बढ़ रहा है, माधवीयस्य =लक्ष्मीपति भगवान् के, हेतेः= चक्र का, तत् महः =वह तेज, व:- आपके, चतुरः पुरुषार्थान्= धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का, पुष्यतात्=पोषण करे अर्थात् बढ़ाये ||
भावार्थ:- अर, अक्ष, नाभि और नेमि ये सब श्रीसुदर्शन चक्र के अंग हैं। इन सभी अवयवों से तेज निकलता है। उसी तेज का दूसरा नाम सौदर्शनी ज्याला है। श्री सुदर्शनचक्र हजारों अरसमूह से शत्रुओं को मारने में कुशल है। सुदर्शन भगवान् के अक्ष से सूर्य के सदृश तेज वाली नाभि से एवं अपने विस्तार से पृथ्वी को नापने वाली नेमि के पास से निकला हुआ जो तेज है, उसकी वेदों के द्वारा एक स्वर से महिमा गायी जाती है। वह तेज चारों दिशाओं में बढ़ रहा है। लक्ष्मीपति भगवान् के चक्र का वह तेज आपके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का पोषण करे अर्थात् बढ़ाये ||