सूक्तिसिन्धु

सूक्तिसिन्धु कृताऽभ्यस्ता विद्या येन स कृतविद्यः।

[one who has practiced learning.]

अक्षय तृतीया या आखा तीज वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं। पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ...
22/04/2023

अक्षय तृतीया या आखा तीज वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं। पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है। इसी कारण इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है। वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किन्तु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तो में मानी गई है।

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#परशुराम_जयंती_की_हार्दिक_शुभकामनाएँ

श्री हनुमज्जन्मोत्सव उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक सभी धर्मग्रंथों के अनुसार मनाया जाता है। इस दिन हम भगवान हनुमान क...
05/04/2023

श्री हनुमज्जन्मोत्सव उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक सभी धर्मग्रंथों के अनुसार मनाया जाता है। इस दिन हम भगवान हनुमान के शक्ति और दृढ़ता को याद करते हुए उन्हें पूजते हैं और उनके लिए विभिन्न भोग अर्पित करते हैं। जन्मोत्सव के दिन लोग भजन, कीर्तन और अन्य धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। यह त्योहार हमें अपने संकटों से निकालने की शक्ति देता है और हमें अधिक सकारात्मक बनाता है। हमें उम्मीद है कि भगवान हनुमान हमें हमेशा अपनी कृपा और आशीर्वाद देंगे ।
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अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहम्
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् |
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशम्
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ||
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मैं अतुलित बल के धाम को नमन करता हूँ, सोने के पहाड़ जैसा सुडौल शरीर वाले, जो ज्ञान के रूप में, दानवों रूपी जंगल को नष्ट कर देते हैं, सभी गुणों की सम्पदा, वानरस्वामी, श्री रघुनाथ जी के प्रिय भक्त पवनपुत्र श्री हनुमान जी को मैं प्रणाम करता हूं |
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🙏

शुभ राम नवमी।---------------------अतिकृश्यमाणे जीवने, सर्वाभीष्ट सिद्धिदम् । राम नवमी त्वयि स्नेहः, शुभं कुरुतु मानवः ॥-...
29/03/2023

शुभ राम नवमी।
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अतिकृश्यमाणे जीवने, सर्वाभीष्ट सिद्धिदम् । राम नवमी त्वयि स्नेहः, शुभं कुरुतु मानवः ॥
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इस चुनौतीपूर्ण जीवन में, रामनवमी आपकी सभी मनोकामनाओं को पूरा करे।
राम नवमी का उत्सव आपके हृदय को प्रेम से भर दे और आपके लिए समृद्धि और प्रसन्नताएं लाए।
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In this challenging life, may Ram Navmi bring you the fulfillment of all your desires. May the celebration of Ram Navmi fill your heart with love and bring you prosperity and happiness.

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त्वत्तः नववर्षस्य  शुभासमये उत्साहान्विताः वसन्तः काननोत्सवः प्रतिभाति। तव जीवने सुखमस्तु, तव मनः शान्तिरस्तु, समृद्धिः ...
21/03/2023

त्वत्तः नववर्षस्य शुभासमये उत्साहान्विताः वसन्तः काननोत्सवः प्रतिभाति। तव जीवने सुखमस्तु, तव मनः शान्तिरस्तु, समृद्धिः प्राप्यताम्। तव शरीरे रोगाः निवर्तन्तु, धनं अस्तु तव वित्तेषु आशीर्वदं ददातु, विद्या अस्तु तव बुद्धौ स्थिरं च, यशः अस्तु तव सर्वत्र। त्वत्तः सदा धर्मः प्रतिपाद्यताम्, समस्तस्य लोकस्य सुखमस्तु ते। नववर्षाभिनन्दनानि।"

"सनातन नव वर्ष के इस शुभ अवसर पर, जीवंत वसंत उत्सव उत्साह के साथ प्रकट होता है। आपका जीवन खुशियों से भरा रहे, आपका मन शांत रहे, और आप समृद्धि प्राप्त करें। शरीर के सभी कष्ट दूर हो सकते हैं, और हो सकता है अपार धन के रूप में आपको आशीर्वाद दिया जाए। आपका ज्ञान और बुद्धि स्थिर रहे, और आपकी प्रतिष्ठा हर जगह प्रसिद्ध हो। आप हमेशा धर्म का पालन करें, और पूरी दुनिया खुश रहे। आपको नव वर्ष की शुभकामनाएं!"

"On this auspicious occasion of the Sanatan New Year, the vibrant spring festival manifests with enthusiasm. May your life be filled with happiness, your mind be at peace, and may you attain prosperity. May any afflictions of the body be dispelled, and may blessings be bestowed upon you in the form of abundant wealth. May your knowledge and wisdom remain steadfast, and may your reputation be renowned everywhere. May you always uphold righteousness, and may the entire world be happy. Wishing you a Happy New Year!"

पिङ्गल नामक विक्रम नवसंवत्सर की हार्दिक शुभकामनाएं

#नववर्ष #नववर्षकीशुभकामना #2080 #संस्कृत

शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खाः यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान् ।सुचिन्तितं चौषधामातुराणाम् न नाममात्रेण करोत्यरोग...
16/03/2023

शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खाः यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान् ।
सुचिन्तितं चौषधामातुराणाम् न नाममात्रेण करोत्यरोगम् ।।

शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद भी लोग मूर्ख रह जाते हैं, लेकिन जो शास्त्रों को पढ़ कर अपने जीवन में उनका अनुकरण करते हैं वही विद्वान हैं । जैसे रोग दूर करने के लिए दवा की अच्छी जानकारी होना या दवा का नाम ले लेना पर्याप्त नही अपितु दवा का नियमित सेवन करना आवश्यक एवम् लाभदायक होता है।

Swasti Vachan or Swasti Vaachan is a Hindu ritual that is performed before the beginning of any auspicious event or cere...
13/03/2023

Swasti Vachan or Swasti Vaachan is a Hindu ritual that is performed before the beginning of any auspicious event or ceremony. The term "Swasti" means good fortune, and "Vachan" means speech or recitation. The Swasti Vachan is a recitation of mantras and prayers seeking the blessings of the divine and invoking their presence to bless the event or ceremony.
The Swasti Vachan is usually performed by a priest or a learned person who is well-versed in the Vedic texts. The recitation of the Swasti Vachan varies depending on the occasion and the particular tradition or region. However, the common elements of the Swasti Vachan include the recitation of Vedic mantras such as the Gayatri Mantra, the Ganesh Mantra, and the Shanti Mantra.
The Swasti Vachan is an important part of Hindu culture and is performed at various events such as weddings, housewarming ceremonies, and other auspicious occasions. The recitation of these mantras is believed to create a positive and auspicious atmosphere and bring blessings and good fortune to the participants.

Mantra -
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

****ka















छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती की शुभकामनाएं।
19/02/2023

छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती की शुभकामनाएं।

13/02/2023
















कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि॥भगवान श्री राम की परम भक्त एवं मातंग ऋषि की शिष्...
13/02/2023

कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि॥

भगवान श्री राम की परम भक्त एवं मातंग ऋषि की शिष्या माता शबरी जी की जयंती पर शतशः नमन🙏

॥ श्रीविजयलक्ष्मीसमेतसुदर्शनचक्रराजपरब्रह्मणेनमः ॥                 श्री सुदर्शनशतकम् -४आरादारात्सहस्राद्विसरति विमतक्षेप...
06/11/2022

॥ श्रीविजयलक्ष्मीसमेतसुदर्शनचक्रराजपरब्रह्मणेनमः ॥

श्री सुदर्शनशतकम् -४

आरादारात्सहस्राद्विसरति विमतक्षेपदक्षाद्यदक्षा-
न्नाभेर्भास्वत्सनाभेर्निजविभवपरिच्छिन्नभूमेश्च नेमेः ।
आम्नायैरेककण्ठैः स्तुतमहिम महो माधवीयस्य हेते-
स्तद्वो दिक्ष्वेधमानं चतसृषु चतुरः पुष्यतात्पूरुषार्थान् ॥

शब्दार्थ: सहस्रात्-हजारों, आरात् =अर समूह से विमत-शत्रुओं का, क्षेप-मर्दन करने में, दक्षात् = कुशल, अक्षात् =सुदर्शन भगवान् के अक्ष से,भास्वत् = सूर्य के सदृश तेज वाली,सनाभे:- नाभि से एवं , निज-अपने, विभव-विस्तार से, परिच्छिन्नभूमेः=पृथ्वी को नापने वाली, नेनेः सकाशात् = नेमि से, सञ्जातम् निकला हुआ, यत् मह:- जो तेज है, वह, आरात्-पास में ही, विसरति=व्याप्त रहता है। आम्नायैः- वेदों के द्वारा, एककण्ठैः- एक स्वर (एक मत) से, स्तुतमहिम = जिनकी महिमा गायी जाती है, वह तेज, चतसृषु = चारों दिशाओं में, वर्धमानं= बढ़ रहा है, माधवीयस्य =लक्ष्मीपति भगवान् के, हेतेः= चक्र का, तत् महः =वह तेज, व:- आपके, चतुरः पुरुषार्थान्= धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का, पुष्यतात्=पोषण करे अर्थात् बढ़ाये ||

भावार्थ:- अर, अक्ष, नाभि और नेमि ये सब श्रीसुदर्शन चक्र के अंग हैं। इन सभी अवयवों से तेज निकलता है। उसी तेज का दूसरा नाम सौदर्शनी ज्याला है। श्री सुदर्शनचक्र हजारों अरसमूह से शत्रुओं को मारने में कुशल है। सुदर्शन भगवान् के अक्ष से सूर्य के सदृश तेज वाली नाभि से एवं अपने विस्तार से पृथ्वी को नापने वाली नेमि के पास से निकला हुआ जो तेज है, उसकी वेदों के द्वारा एक स्वर से महिमा गायी जाती है। वह तेज चारों दिशाओं में बढ़ रहा है। लक्ष्मीपति भगवान् के चक्र का वह तेज आपके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का पोषण करे अर्थात् बढ़ाये ||

पूर्णे पूरैः सुधानां सुमहति लसतः सोमबिम्बालवाले बाहाशाखावरुद्धक्षिति गगनदिवश्चक्रराजद्रुमस्य । ज्योतिश्छद्मा-प्रवालः प्र...
05/11/2022

पूर्णे पूरैः सुधानां सुमहति लसतः सोमबिम्बालवाले बाहाशाखावरुद्धक्षिति गगनदिवश्चक्रराजद्रुमस्य । ज्योतिश्छद्मा-प्रवालः प्रकटितसुमनः सम्पदुत्तंसलक्ष्मीं पुष्णन्नाशामुखेषु प्रदिशतु भवतां सप्रकर्षं प्रहर्षम् ॥३॥

शब्दार्थ:- सुधानां पूरै: =अमृत रस से परिपूर्ण, सुमहति = विशाल, सोम-बिम्ब-आलवाले = चन्द्रमण्डल रूप क्यारी में, लसतः = विराजमान एवं प्रकाशमान, बाहाः= भुजाओं रूपी शाखा शाखाओं से, अवरुद्ध=ढक लिया है, क्षिति-गगन - दिव:= पृथ्वी, आकाश और स्वर्ग जिसने ऐसे, चक्रराज- द्रुमस्य= सुदर्शन चक्रराज रूप वृक्ष की, ज्योतिश्छद्मा= ज्योति जैसे लगने वाले, प्रवाल:= पल्लव और पत्ते, प्रकटितः =प्रकट कर रहे हैं, वे, सुमनः सम्पत्=पुष्पों की शोभा को, आशामुखेषु = दिशाओं में, उत्तंस-लक्ष्मीम् =श्रेष्ठ कर्णालंकार रूप शोभा को, पुष्णन्= बढ़ाते हुये, भवताम्=आपके, सप्रकर्षं प्रहर्षम्=अतिशय प्रकर्ष को, अतिशय आनन्द को, प्रदिशतु =प्रदान करें ।। ।।

भावार्थ:- इस पद्य में श्रीसुदर्शन चक्रराज को कल्पवृक्ष माना गया है। वृक्ष जल की क्यारी में रहता है। वृक्ष की अनेक शाखायें, पल्लव, पत्ते आदि होते हैं। देखिये कि उक्त कल्पवृक्ष का वर्णन इस पद्य में किस तरह से किया गया है- कल्पवृक्ष के रूप में विद्यमान श्रीसुदर्शनजी अमृत रस से परिपूर्ण विशाल चन्द्रमण्डल की क्यारी में विराजमान हैं और उनकी भुजा-रूपी शाखाओं ने पृथ्वी, आकाश और स्वर्ग को ढक लिया है। ऐसे सुदर्शन चक्रराज की ज्योति ही पत्तों की शोभा को प्रकट रही है और उनके कर्णालंकार चारों दिशाओं में पुष्प की शोभा बिखेर रहे हैं। यहाँ पर सुमनस्-शब्द है, इसके दो अर्थ होते हैं- पुष्प और देवता । सुमनःसम्पत् के भी दो अर्थ होंगे- देवताओं का ऐश्वर्य और पुष्पों की समृद्धि। जैसे वृक्ष पुष्पों की समृद्धि बढ़ाता है, वैसे ही श्रीचक्रराज देवों की खोई हुई ऐश्वर्यलक्ष्मी को पुनः प्रदान करते हैं। ऐसे श्रीसुदर्शन भगवान् आपको अतिशय आनन्द प्रदान करें ।। ३ ।।

प्रत्युद्यातम्मयूखैर्नभसि दिनकृतः प्राप्तसेवम्प्रभाभि-र्भूमौ सौमेरवीभिर्दिवि वरिवसितं दीप्तिभिर्देवधाम्नाम्। भूयस्यै भूत...
02/11/2022

प्रत्युद्यातम्मयूखैर्नभसि दिनकृतः प्राप्तसेवम्प्रभाभि-
र्भूमौ सौमेरवीभिर्दिवि वरिवसितं दीप्तिभिर्देवधाम्नाम्।
भूयस्यै भूतये वः स्फुरतु सकलदिग्भ्रान्तसान्द्रस्फुलिङ्ग
चाक्रञ्जाग्रत्प्रतापं त्रिभुवन-विजय- व्यग्रमुग्रम्महस्तत्॥२॥

सौमेरवीभिरमरगिरिसम्बन्धिनीभिः प्रभाभिर्द्युतिभिर्भूमौ विश्वम्भरायां प्रत्तसेवं प्रकृतसेवं कृतपरिचर्याम् । अच उपसर्गात्तः इति तत्त्वे दकारलोपः । अमरगिरिकिरणपरिचरितमित्यर्थः । दिनकृतः सूर्यस्य मयूखैः किरणैर्नभस्याकाशे प्रत्युद्यातं प्रत्यागत्य परिपूजितम् । प्रभाकरप्रभाविर्भावसम्भावितमित्यर्थः । देवधाम्नाममरसौधानां नक्षत्राणां वा दीप्तिभिः प्रभाभिर्दिवि स्वर्गलोके वरिवसितमुपासितम्। सुरवरनिकरकनकमयसदनरुचिररुचिचयपरिचरितमित्यर्थः। नक्षत्रप्रभासेवितमिति वार्थः। सकलदिग्भ्रान्तसान्द्रस्फुलिङ्गं सर्वासु दिक्षु भ्रान्ताः सान्द्रा निबिडाः स्फुलिङ्गाः कृशानुकणा यस्य तत् । सकलदिगन्तरालबम्भ्रम्य- माणनीरन्ध्रकरालाग्निकणमिति यावत् । त्रिभुवनविजयव्यग्रं त्रयाणां भुवनानां विजये व्यग्रं ससम्भ्रमम्। त्रिभुवनविजयव्यासङ्गनिर्जितत्रिभुवनान्तरालवर्तमान- परिपन्थिपरम्परमित्यर्थः। उग्रं प्रतिभटभयङ्करम् । चाक्रं चक्रस्येदं चक्रराजसम्बन्धि तत्प्रसिद्धं महस्तेजो वो युष्माकं भूयस्यै बहुतरायै भूतये भूयात् । बहोर्लोपो भूच बहोः इति ॥ २ ॥

शब्दार्थः - सौमेरवीभिः = सुमेरु पर्वत से निकलने वाली, प्रभाभिः = प्रभाओं से, भूमौ = पृथ्वी में, प्रत्तसेवम्=जो सेवा प्राप्त करता है, नभसि = आकाश में, दिनकृत: =सूर्य की, मयूखै:=किरणों से, प्रत्युद्यातम् = जिसका स्वागत होता है, दिवि =स्वर्ग में, देवधाम्नाम्=देवताओं के दिव्य भवनों के, दीप्तिभिः= दिव्य तेजोमय किरणों से,वरिवसितम् = जिसकी उपासना की जाती है, सकलदिक्= समस्त दिशाओं में, भ्रान्त = घुम रहे हैं, सान्द्र=घने, स्फुलिङ्गम्=स्फुलिंग (अग्निकण) जिसके, ऐसे, त्रिभुवन - विजय- व्यग्रम्=तीनों लोकों में विजय प्राप्त करने के लिए व्यग्र, उग्रम् =शत्रुओं के प्रति अतिशय भयंकर, चाक्रम्=सुदर्शनचक्र का, तत्=वह प्रसिद्ध, महः=तेज, वः = आप लोगों के, भूयस्यै = बहुत - बहुत, भूतये= कल्याण के लिये, स्फुरतु= स्फुरित होवे अर्थात् आपको अधिक से अधिक कल्याण प्रदान करे॥

भावार्थ:- श्रीसुदर्शन भगवान् का तेज सुमेरु पर्वत से निकलने वाली प्रभाओं से पृथ्वी में (सुमेरु पर्वत) की सेवा प्राप्त करता है। उस तेज का आकाश में सूर्य की किरणों से स्वागत होता है। स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भवनों के दिव्य तेजोमय किरणों से जिसकी उपासना की जाती है। श्रीसुदर्शनचक्र के घने स्फुलिंग (अग्निकण, चिनगारियाँ) तीनों लोकों में विजय प्राप्त करने के लिए व्यग्र रहते हैं। वे शत्रुओं के प्रति अतिशय भयंकर लगते हैं। उनका तेज शत्रुओं को क्रूरता एवं भक्तों को अभीष्ट पदार्थ प्रदान करता है। सुदर्शन चक्र का वह प्रसिद्ध तेज आप लोगों के बहुत-बहुत कल्याण के लिये होवे, अर्थात् आपको अधिक से अधिक कल्याण प्रदान करे। इस पद्य से भगवान् श्री सुदर्शन की सेवा सभी देवतागण करते हैं- यह बात बतायी गयी है ॥

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