Sanatan Gyan Ganga

Sanatan Gyan Ganga This page is an effort to awaken our society about our heritage, culture & inheritance.

05/05/2020

भारत मे मुगलों के आक्रमण के उपरान्त, हमारी भाषा और संस्कृति खिचड़ी हो गयी और हम सभी प्रतिदिन के संवाद में उर्दू, फ़ारसी और अन्य उधार ली गयी शब्दों का प्रयोग करते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण चलचित्र जगत ( फ़िल्म इंडस्ट्री) और टीवी चैनल हैं। आज भी समाचार वाचक ९०% शब्द तो उर्दू और फ़ारसी का ही प्रयोग करते हैं।

निम्नलिखित वो ल शब्द हैं जो आप प्रतिदिन प्रयोग करते हैं, इन शब्दों को त्याग कर मातृभाषा का प्रयोग करें...

*उर्दू* *हिंदी*
01 ईमानदार - निष्ठावान
02 इंतजार - प्रतीक्षा
03 इत्तेफाक - संयोग
04 सिर्फ - केवल, मात्र
05 शहीद - बलिदान
06 यकीन - विश्वास, भरोसा
07 इस्तकबाल - स्वागत
08 इस्तेमाल - उपयोग, प्रयोग
09 किताब - पुस्तक
10 मुल्क - देश
11 कर्ज - ऋण
12 तारीफ - प्रशंसा
13 तारीख - दिनांक, तिथि
14 इल्ज़ाम - आरोप
15 गुनाह - अपराध
16 शुक्रिया - धन्यवाद, आभार
17 सलाम - नमस्कार, प्रणाम
18 मशहूर - प्रसिद्ध
19 अगर - यदि
20 ऐतराज - आपत्ति
21 सियासत - राजनीति
22 इंतकाम - प्रतिशोध
23 इज्जत - मान, प्रतिष्ठा
24 इलाका - क्षेत्र
25 एहसान - आभार, उपकार
26 अहसानफरामोश - कृतघ्न
27 मसला - समस्या
28 इश्तेहार - विज्ञापन
29 इम्तेहान - परीक्षा
30 कुबूल - स्वीकार
31 मजबूर - विवश
32 मंजूरी - स्वीकृति
33 इंतकाल - मृत्यु, निधन
34 बेइज्जती - तिरस्कार
35 दस्तखत - हस्ताक्षर
36 हैरानी - आश्चर्य
37 कोशिश - प्रयास, चेष्टा
38 किस्मत - भाग्य
39 फैसला - निर्णय
40 हक - अधिकार
41 मुमकिन - संभव
42 फर्ज - कर्तव्य
43 उम्र - आयु
44 साल - वर्ष
45 शर्म - लज्जा
46 सवाल - प्रश्न
47 जवाब - उत्तर
48 जिम्मेदार - उत्तरदायी
49 फतह - विजय
50 धोखा - छल
51 काबिल - योग्य
52 करीब - समीप, निकट
53 जिंदगी - जीवन
54 हकीकत - सत्य
55 झूठ - मिथ्या, असत्य
56 जल्दी - शीघ्र
57 इनाम - पुरस्कार
58 तोहफा - उपहार
59 इलाज - उपचार
60 हुक्म - आदेश
61 शक - संदेह
62 ख्वाब - स्वप्न
63 तब्दील - परिवर्तित
64 कसूर - दोष
65 बेकसूर - निर्दोष
66 कामयाब - सफल
67 गुलाम - दास
68 जन्नत -स्वर्ग
69 जहरनुम -नर्क
70 खौफ -डर
71 जश्न -उत्सव
72 मुबारक -बधाई/शुभेच्छा
73 लिहाजा -अर्थात
74 निकाह -विवाह/ परिणय बंधन
75 आशिक -प्रेमी
76 मासुका -प्रेमिका
77 हकीम -वैद्य
78 नवाब -राजसाहब
79 रुह -आत्मा
80 खुदखुशी -आत्महत्या
81 इजहार -प्रस्ताव
82 बादशाह -राजा/महाराजा
83 ख़्वाहिश -महत्वाकांक्षा
84 जिस्म -शरीर/अंग
85 हैवान -दैत्य/असुर
86 रहम -दया
87 बेरहम -बेदर्द/दर्दनाक
88 खारिज -रद्द
89 इस्तिफा -त्यागपत्र
90 रोशनी -प्रकाश
91मसिहा -देवदुत
92 पाक -पवित्र
93 कत्ल -हत्या
94 कातिल -हत्यारा
95 इजहार. - अभिव्यक्त
96 खौफ. - भय
97 ज़मीर - अन्तरात्मा
98 अमानत - धरोहर
99 एहसान - उपकार/ कृतज्ञता
100 ईनाम - पुरस्कार
101 जानकारी - बोध, ज्ञान
102 जानकर - भिज्ञ, ज्ञानी
103 मुबारक - शुभ, कल्याणकारी
104 मुबारकबाद - अभिनंदन, शुभकामना
105 तरफ़ - ओर, दिशा, पक्ष
106 मुकदमा - अभियोग, प्रकरण
107 शायद - कदाचित
108 लेकिन - परन्तु, किंतु
109 बेबाक - निर्भय, निडर
110 मजबूत - दृढ़
111 मौजूद - उपस्थित
112 वक़्त - समय
113 बात - कथन, चर्चा, प्रसंग
114 नाराज़ - असंतुष्ट, अप्रसन्न
115 कायम - स्थापित
116 जल्द - शीघ्र
117 मुराद - मनोकामना
118 रफ्तार - गति
119 यकीन। - विश्वास
120 बाद -पश्चात
121 साबित - सिद्ध
122 कदम - पग
123- दुनिया - संसार
124 खबर - सूचना
125 जारी - प्रभावशील
126 तकलीफ - दुःख, कष्ट
127 मज़म्मत- निन्दा

भाषा बचाइये, संस्कृति बचाइये।

04/05/2020

चतुः श्लोकी भागवत
भगवान् विष्णु जी ने ब्रह्मा जी को चार श्लोकों में ज्ञान दिया जिसे चतुः श्लोकी भागवत कहते हैं। चतुःश्लोकी में ब्रह्म, माया, जगत तथा ब्रह्म प्राप्ति का साधन, इन्हीं चार विषयों का वर्णन है।
प्रथम श्लोक मे ब्रह्मा का स्वरूप दर्शाया गया है।
दूसरे श्लोक में माया का स्वरूप निरूपित है।
तीसरे श्लोक में जगत क्या है यह कहा गया है और
चौथे श्लोक में ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति का साधन कहा गया है ।

श्लोक १

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम्।
पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्।।

अनुवाद : ‘अहं एव आसम्’ और ‘आसम एवं अग्रे’, सृष्टि के पहले केवल मैं ही था। सत्, असत् या उससे परे मुझसे भिन्न कुछ भी नहीं था। सृष्टि न रहने पर (प्रलय काल में) भी मैं ही रहता हूँ। यह सब सृष्टि रूप भी मैं ही हूँ और जो कुछ इस सृष्टि, स्थिति तथा प्रलय से बचा रहता है, वह भी मै ही हूँ॥१॥

श्लोक २

ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि।
तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः।।

अनुवाद : जो मुझ मूल तत्त्व के अतिरिक्त (सत्य सा) प्रतीत होता(दिखाई देता) है परन्तु आत्मा में प्रतीत नहीं होता (दिखाई नहीं देता), उस अज्ञान को आत्मा की माया समझो जो प्रतिबिम्ब या अंधकार की भांति मिथ्या है॥२॥

श्लोक ३

यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु।
प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ।।

अनुवाद : जैसे पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) संसार के छोटे-बड़े सभी पदार्थों में प्रविष्ट होते हुए भी उनमें प्रविष्ट नहीं हैं, वैसे ही मैं भी सबमें व्याप्त होने पर भी सबसे पृथक् हूँ।॥३॥

श्लोक ४

एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्या त् सर्वत्र सर्वदा ।।

अनुवाद : आत्म-तत्त्व को जानने की इच्छा रखने वाले के लिए इतना ही जानने योग्य है कि अन्वय (सृष्टि) अथवा व्यतिरेक (प्रलय) क्रम में जो तत्त्व सर्वत्र एवं सर्वदा(स्थान और समय से परे) रहता है, वही आत्मतत्त्व है॥४॥

04/05/2020

एक ग्रंथ ऐसा भी है हमारे सनातन धर्म मे।

इसे तो सात आश्चर्यों में से पहला आश्चर्य माना जाना चाहिए ---

यह है दक्षिण भारत का एक ग्रन्थ

क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो राम कथा के रूप में पढ़ी जाती है और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े
तो कृष्ण कथा के रूप में होती है ।

जी हां, कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ "राघवयादवीयम्" ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है।

इस ग्रन्थ को
‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे
पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और
विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा। इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक, लेकिन कृष्णकथा (उल्टे यानी विलोम)के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक।

पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है ~ "राघवयादवीयम।"

उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक हैः

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥

अर्थातः
मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं, जो
जिनके ह्रदय में सीताजी रहती है तथा जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के लिए सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा वनवास पूरा कर अयोध्या वापिस लौटे।

अब इस श्लोक का विलोमम्: इस प्रकार है

सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥

अर्थातः
मैं रूक्मिणी तथा गोपियों के पूज्य भगवान श्रीकृष्ण के
चरणों में प्रणाम करता हूं, जो सदा ही मां लक्ष्मी के साथ
विराजमान है तथा जिनकी शोभा समस्त जवाहरातों की शोभा हर लेती है।

" राघवयादवीयम" के ये 60 संस्कृत श्लोक इस प्रकार हैं:-

राघवयादवीयम् रामस्तोत्राणि
वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥

विलोमम्:
सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥

साकेताख्या ज्यायामासीद्याविप्रादीप्तार्याधारा ।
पूराजीतादेवाद्याविश्वासाग्र्यासावाशारावा ॥ २॥

विलोमम्:
वाराशावासाग्र्या साश्वाविद्यावादेताजीरापूः ।
राधार्यप्ता दीप्राविद्यासीमायाज्याख्याताकेसा ॥ २॥

कामभारस्स्थलसारश्रीसौधासौघनवापिका ।
सारसारवपीनासरागाकारसुभूरुभूः ॥ ३॥

विलोमम्:
भूरिभूसुरकागारासनापीवरसारसा ।
कापिवानघसौधासौ श्रीरसालस्थभामका ॥ ३॥

रामधामसमानेनमागोरोधनमासताम् ।
नामहामक्षररसं ताराभास्तु न वेद या ॥ ४॥

विलोमम्:
यादवेनस्तुभारातासंररक्षमहामनाः ।
तां समानधरोगोमाननेमासमधामराः ॥ ४॥

यन् गाधेयो योगी रागी वैताने सौम्ये सौख्येसौ ।
तं ख्यातं शीतं स्फीतं भीमानामाश्रीहाता त्रातम् ॥ ५॥

विलोमम्:
तं त्राताहाश्रीमानामाभीतं स्फीत्तं शीतं ख्यातं ।
सौख्ये सौम्येसौ नेता वै गीरागीयो योधेगायन् ॥ ५॥

मारमं सुकुमाराभं रसाजापनृताश्रितं ।
काविरामदलापागोसमावामतरानते ॥ ६॥

विलोमम्:
तेन रातमवामास गोपालादमराविका ।
तं श्रितानृपजासारंभ रामाकुसुमं रमा ॥ ६॥

रामनामा सदा खेदभावे दया-वानतापीनतेजारिपावनते ।
कादिमोदासहातास्वभासारसा-मेसुगोरेणुकागात्रजे भूरुमे ॥ ७॥

विलोमम्:
मेरुभूजेत्रगाकाणुरेगोसुमे-सारसा भास्वताहासदामोदिका ।
तेन वा पारिजातेन पीता नवायादवे भादखेदासमानामरा ॥ ७॥

सारसासमधाताक्षिभूम्नाधामसु सीतया ।
साध्वसाविहरेमेक्षेम्यरमासुरसारहा ॥ ८॥

विलोमम्:
हारसारसुमारम्यक्षेमेरेहविसाध्वसा ।
यातसीसुमधाम्नाभूक्षिताधामससारसा ॥ ८॥

सागसाभरतायेभमाभातामन्युमत्तया ।
सात्रमध्यमयातापेपोतायाधिगतारसा ॥ ९॥

विलोमम्:
सारतागधियातापोपेतायामध्यमत्रसा ।
यात्तमन्युमताभामा भयेतारभसागसा ॥ ९॥

तानवादपकोमाभारामेकाननदाससा ।
यालतावृद्धसेवाकाकैकेयीमहदाहह ॥ १०॥

विलोमम्:
हहदाहमयीकेकैकावासेद्ध्वृतालया ।
सासदाननकामेराभामाकोपदवानता ॥ १०॥

वरमानदसत्यासह्रीतपित्रादरादहो ।
भास्वरस्थिरधीरोपहारोरावनगाम्यसौ ॥ ११॥

विलोमम्:
सौम्यगानवरारोहापरोधीरस्स्थिरस्वभाः ।
होदरादत्रापितह्रीसत्यासदनमारवा ॥ ११॥

यानयानघधीतादा रसायास्तनयादवे ।
सागताहिवियाताह्रीसतापानकिलोनभा ॥ १२॥

विलोमम्:
भानलोकिनपातासह्रीतायाविहितागसा ।
वेदयानस्तयासारदाताधीघनयानया ॥ १२॥

रागिराधुतिगर्वादारदाहोमहसाहह ।
यानगातभरद्वाजमायासीदमगाहिनः ॥ १३॥

विलोमम्:
नोहिगामदसीयामाजद्वारभतगानया ।
हह साहमहोदारदार्वागतिधुरागिरा ॥ १३॥

यातुराजिदभाभारं द्यां वमारुतगन्धगम् ।
सोगमारपदं यक्षतुंगाभोनघयात्रया ॥ १४॥

विलोमम्:
यात्रयाघनभोगातुं क्षयदं परमागसः ।
गन्धगंतरुमावद्यं रंभाभादजिरा तु या ॥ १४॥

दण्डकां प्रदमोराजाल्याहतामयकारिहा ।
ससमानवतानेनोभोग्याभोनतदासन ॥ १५॥

विलोमम्:
नसदातनभोग्याभो नोनेतावनमास सः ।
हारिकायमताहल्याजारामोदप्रकाण्डदम् ॥ १५॥

सोरमारदनज्ञानोवेदेराकण्ठकुंभजम् ।
तं द्रुसारपटोनागानानादोषविराधहा ॥ १६॥

विलोमम्:
हाधराविषदोनानागानाटोपरसाद्रुतम् ।
जम्भकुण्ठकरादेवेनोज्ञानदरमारसः ॥ १६॥

सागमाकरपाताहाकंकेनावनतोहिसः ।
न समानर्दमारामालंकाराजस्वसा रतम् ॥ १७ विलोमम्:
तं रसास्वजराकालंमारामार्दनमासन ।
सहितोनवनाकेकं हातापारकमागसा ॥ १७॥

तां स गोरमदोश्रीदो विग्रामसदरोतत ।
वैरमासपलाहारा विनासा रविवंशके ॥ १८॥

विलोमम्:
केशवं विरसानाविराहालापसमारवैः ।
ततरोदसमग्राविदोश्रीदोमरगोसताम् ॥ १८॥

गोद्युगोमस्वमायोभूदश्रीगखरसेनया ।
सहसाहवधारोविकलोराजदरातिहा ॥ १९॥

विलोमम्:
हातिरादजरालोकविरोधावहसाहस ।
यानसेरखगश्रीद भूयोमास्वमगोद्युगः ॥ १९॥

हतपापचयेहेयो लंकेशोयमसारधीः ।
राजिराविरतेरापोहाहाहंग्रहमारघः ॥ २०॥

विलोमम्:
घोरमाहग्रहंहाहापोरातेरविराजिराः ।
धीरसामयशोकेलं यो हेये च पपात ह ॥ २०॥

ताटकेयलवादेनोहारीहारिगिरासमः ।

हासहायजनासीतानाप्तेनादमनाभुवि ॥ २१॥

विलोमम्:
विभुनामदनाप्तेनातासीनाजयहासहा ।
ससरागिरिहारीहानोदेवालयकेटता ॥ २१॥

भारमाकुदशाकेनाशराधीकुहकेनहा ।
चारुधीवनपालोक्या वैदेहीमहिताहृता ॥ २२॥

विलोमम्:
ताहृताहिमहीदेव्यैक्यालोपानवधीरुचा ।
हानकेहकुधीराशानाकेशादकुमारभाः ॥ २२॥

हारितोयदभोरामावियोगेनघवायुजः ।
तंरुमामहितोपेतामोदोसारज्ञरामयः ॥ २३॥

विलोमम्:
योमराज्ञरसादोमोतापेतोहिममारुतम् ।
जोयुवाघनगेयोविमाराभोदयतोरिहा ॥ २३॥

भानुभानुतभावामासदामोदपरोहतं ।
तंहतामरसाभक्षोतिराताकृतवासविम् ॥ २४॥

विलोमम्:
विंसवातकृतारातिक्षोभासारमताहतं ।
तं हरोपदमोदासमावाभातनुभानुभाः ॥ २४॥

हंसजारुद्धबलजापरोदारसुभाजिनि ।
राजिरावणरक्षोरविघातायरमारयम् ॥ २५॥

विलोमम्:
यं रमारयताघाविरक्षोरणवराजिरा ।
निजभासुरदारोपजालबद्धरुजासहम् ॥ २५॥

सागरातिगमाभातिनाकेशोसुरमासहः ।
तंसमारुतजंगोप्ताभादासाद्यगतोगजम् ॥ २६॥

विलोमम्:
जंगतोगद्यसादाभाप्तागोजंतरुमासतं ।
हस्समारसुशोकेनातिभामागतिरागसा ॥ २६॥

वीरवानरसेनस्य त्राताभादवता हि सः ।
तोयधावरिगोयादस्ययतोनवसेतुना ॥ २७॥

विलोमम्
नातुसेवनतोयस्यदयागोरिवधायतः ।
सहितावदभातात्रास्यनसेरनवारवी ॥ २७॥

हारिसाहसलंकेनासुभेदीमहितोहिसः ।
चारुभूतनुजोरामोरमाराधयदार्तिहा ॥ २८॥

विलोमम्
हार्तिदायधरामारमोराजोनुतभूरुचा ।
सहितोहिमदीभेसुनाकेलंसहसारिहा ॥ २८॥

नालिकेरसुभाकारागारासौसुरसापिका ।
रावणारिक्षमेरापूराभेजे हि ननामुना ॥ २९॥

विलोमम्:
नामुनानहिजेभेरापूरामेक्षरिणावरा ।
कापिसारसुसौरागाराकाभासुरकेलिना ॥ २९॥

साग्र्यतामरसागारामक्षामाघनभारगौः ॥
निजदेपरजित्यास श्रीरामे सुगराजभा ॥ ३०॥

विलोमम्:
भाजरागसुमेराश्रीसत्याजिरपदेजनि ।स
गौरभानघमाक्षामरागासारमताग्र्यसा ॥ ३०॥

॥ इति श्रीवेङ्कटाध्वरि कृतं श्री ।।

कृपया अपना थोड़ा सा कीमती वक्त निकाले और उपरोक्त श्लोको को गौर से अवलोकन करें कि यह दुनिया में कहीं भी ऐसा न पाया जाने वाला ग्रंथ है ।

शत् शत् प्रणाम है सनातन धर्म को।
जय श्रीकृष्ण । जय श्रीराम ।

03/05/2020

सनातन संस्कृति में अभिवादन के लिए प्रायः राम राम कहते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि बहुत से लोग जब एक दूसरे से मिलते हैं तो आपस में एक दूसरे को दो बार ही "राम राम" क्यों बोलते हैं ? एक बार या तीन बार क्यों नही बोलते ? दो बार "राम राम" बोलने के पीछे बड़ा गूढ़ रहस्य है क्योंकि यह आदि काल से ही चला आ रहा है । हिन्दी की शब्दावली में "र" सत्ताईसवाँ शब्द है, "आ" की मात्रा दूसरा और "म" पच्चीसवां शब्द है. अब तीनो अंको का योग करें तो २७ + २+ २५ = ५४, अर्थात एक “राम” का योग ५४ हुआ. इसी प्रकार दो "राम राम" का कुल योग १०८ होगा। हम जब कोई जाप करते हैं तो १०८ मनके की माला गिनकर करते हैं। सिर्फ "राम राम" कह देने से ही पूरी माला का जाप हो जाता है।
पाश्चात्य संस्कृति की नकल करते करते हम सब अपनी वास्तविक संस्कृति से अत्यधिक दूर आ गए हैं, क्या ये उचित समय नही है कि हम अपने जीवन में राम राम अभिवादन को अपनाएं और आने वाली पीढ़ी को भी इसके लिए प्रेरित करें ?

01/05/2020

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