30/04/2026
श्रीनृसिंह जयंती महोत्सव की अनन्त शुभकामनाएं। 🙏🌺🌹
नखकोटिविनिर्भिन्नदैत्याधिपतिवक्षसे ।
नमो नृसिंहरूपाय रामायापन्निवारिणे ॥
(श्रीराम आपदुद्धारकस्तोत्रम् )
कोटि नखों से दैत्यपति हिरण्यकशिपु के वक्ष को विदीर्ण करनेवाले, आपत्तियों का निवारण करनेवाले, श्रीनृसिंह स्वरुप भगवान श्रीराम को मेरा नमन हैं।
(नृसिंह,शरभ,प्रत्यंगिरा, जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं)
नृसिंह निग्रह
एकदा तु पुनर्विष्णुर्हिरण्यं दानवेश्वरम् ॥
संहरिष्यन् समभ्यर्च्य शिवं लब्धवरो बली ।
नृसिंहवपुुुरास्थाय वक्षों भित्त्वा नखैः पुनः ॥
पपौ क्रोधेन तद्रक्तं संहत्यासुरसैनिकान् ॥
अहङ्कारेण तेनैव सर्वान् संहर्तुमुद्यतः ।
ततो देवा भयाविष्टाः शरणं प्रापुरीश्वरम् ॥
एक समय की बात है, भगवान विष्णु ने दानवों के राजा हिरण्यकश्यप का वध करने का संकल्प लिया। इसके लिए उन्होंने भगवान शिव की आराधना की और उनसे वरदान प्राप्त कर अत्यंत बलशाली हो गए।
तपश्चात्, उन्होंने नृसिंह अवतार (आधा सिंह और आधा मनुष्य) धारण किया और अपने तीखे नाखूनों से हिरण्यकश्यप की छाती को चीर डाला। क्रोध के आवेग में उन्होंने न केवल असुर की सेना का विनाश किया, बल्कि उसका रक्त भी पी लिया।
उस समय, अपने अपार बल के अहंकार (या उग्रता) वश नृसिंह भगवान समस्त ब्रह्मांड का संहार करने के लिए उद्यत हो गए। भगवान नृसिंह के उस भयानक और रौद्र रूप को देखकर सभी देवता भयभीत हो गए और रक्षा के लिए ईश्वर (भगवान शिव) की शरण में पहुंचे।
वीरभद्रं तदा देवः सन्दिदेशास्य निग्रहे।
शारभं रूपमास्थाय वीरभद्रः प्रतापवान् ॥
गृहीत्वा नारसिंहं तं द्विधा कृत्वात्मलीलया।
भित्त्वा त्वचमतिस्वच्छामुपायनमुपाहरत् ॥
तदाप्रभृति देवोऽयं नारसिंहाम्बरोऽभवत् ।
सोऽपि देवं समाराध्य विगतैना बभूव ह ॥
तब महादेव (भगवान शिव) ने भगवान नृसिंह के क्रोध को नियंत्रित करने के लिए वीरभद्र को आदेश दिया। प्रतापी वीरभद्र ने अत्यंत शक्तिशाली शरभ का रूप धारण किया।
उन्होंने अपनी लीला से नृसिंह भगवान को पकड़ लिया और उन्हें दो भागों में विभक्त कर दिया। वीरभद्र ने उनकी निर्मल त्वचा (खाल) को अलग किया और उसे उपहार स्वरूप भगवान शिव को अर्पित कर दिया।
तभी से भगवान शिव 'नारसिंहाम्बर' (नृसिंह की खाल को वस्त्र के रूप में धारण करने वाले) कहलाए। इसके बाद, भगवान नृसिंह ने भी महादेव की आराधना की और वे पुनः अपने शांत व पाप-रहित (क्रोध मुक्त) स्वरूप में स्थित हो गए। 🌺🌹🚩🙏
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