31/05/2026
दोनों गुरु और शिष्य एक गांव के बाहर एक स्थान में ठहर गये । गुुरु मछिन्दर नाथ के मन में गोरख नाथ की गुरु-भक्ति की परिक्षा लेने का विचार आया । उन्होनें गोरख नाथ से इस प्रकार कहा । बेटा गोरख नाथ इस समय मुझे बहुत जोर की भूख लगी है । तुम गांव में जाकर मेरे लिए भिक्षा मांग लाओ ।
गुरु की आज्ञा पाकर गोरख नाथ भिक्षा मांगने के लिए गांव में जा पहुंचे । उस दिन गांव के एक ब्राह्मण के घर श्राद्ध था । उसके उपलक्ष में ब्रह्मभोज का आयोजन किया गया था ।
गोरख नाथ ने उसी घर के दरवाजे पर जाकर अलख जगाई। ब्रह्मणी ने जब यह देखा के कोई साधु उसके द्वार पर भिक्षा मांगने आया हुआ है तो वह बहुत प्रसन्न हुई और अनेक प्रकार के व्यंजन लेकर गोरख नाथ को भिक्षा देनें पहुंच गई। गोरख नाथ भिक्षा लेकर गुरु जी के पास लौट गए। गुरु मछिन्दर नाथ ने बड़े प्रेम के साथ भोजन किया । उसके बाद भोजन सामाग्री की प्रशंसा करते हुए गोरख नाथ से कहा । हे पुत्र यह खाना अत्यंत स्वादिष्ट था । और इसमें जो बड़े थे वो तो मुझे बहुत अच्छे लगे । बड़ो की और से मेरी इच्छा अभी तृप्त नहीं हुई है । यदी तुम दो एक बड़े और मांगकर ला सको तो मुझे सन्तोष प्राप्त हो जायेगा। ऋ
गुरु जी की बात सुनकर गोरख नाथ दुबारा उसी ब्रह्मणी के दरवाजे पर जा पहुंच कर अलख जगाई। जोगी को पुन:आया देखकर गृह स्वामिनी को क्रोध आया और तिरस्कार भरे शब्दों में कहा अभी कुछ देर पहले ही तुम यहां से भिक्षा लेकर गये थे ।मैंने प्रयाप्त मात्रा में भोजन दिया था । अब तुम दुबारा मांगने क्यों आ गए। यह सुनकर गोरख नाथ ने अत्यन्त नम्रतापूर्वक कहा हे माई आप ने जो भोजन दिया था । उसे खाकर मेरे गुरु अत्यंत सन्तुष्ट हुए है परन्तु आपके दिये हुए बड़े उनको बहुत अच्छे लगे ।इसलिये उन्होनें मुझे दो एक बड़े लाने के लिए फिर से भेजा है । यदि आप मुझे दो एक बड़े और दें दें तो बड़ी कृपा होगी । यह सुनकर ब्रह्मणी बोली लगता है तुम सच्चे जोगी न होकर कोई पेट के पुजारि हो । इस तरह मांग कर खाने में तुम्हें लज्जा नहीं आती ।
गोरख नाथ ने हाथ जोड़कर कहा हे माई मै अपने लिए कुछ नहीं मांग रहा अपने गुरु के लिए मांगता हुं ।कृपा करके आप मुझे एक बड़ा और दे दिजीए और उसके बदले आप जो चाहे वह मुझसे मांग लिजिए मै आपकी मांग को अवश्य पुरा करुगां। यह सुनकर ब्रह्मणी और भी क्रोधित हो उठी और बोली भीख मांगने निकले हो और दुसरों को दान देनें की बात करते हो ।अच्छा मेरे पास एक बड़ा है मै वह तुम्हें दे दुंगी परन्तु उसके बदले में मुझे तुम्हारी एक आंख चाहिए। ब्रह्मणी के मुंह से ज्यों हीं ये शब्द सुने। बालक गोरख नाथ ने अपनें एक आंख निकालकर बोले लो माई तुम्हारी मांग मैनें पुरी कर दी अब मुंझें बड़ा दे दो । यह दृश्य देखकर ब्रह्मणी रोयीं और बोली बाबा मुझे माफ कर दे । और दौड़कर बडा लाकर गोरख नाथ के हाथ में रख दिया और अंदर चली गई। एक हाथ में बड़ा और एक हाथ आंख पर रख गोरख नाथ गुरु जी के पास पहुंच गए गुरु जी को आंख के बारे कुछ पता नं चले इस लिए आंख पर पट्टी बांध ली ।गोरख नाथ को आंख पर पट्टी बांधें देखकर गुरु मछिन्दर नाथ ने पुछा गोरख तुम्हारी आंख में क्या हो गया तब गोरख नाथ ने ब्रह्मणी की सारी बात कह सुनाई और गुरु मछिन्दर नाथ सुनकर बहुत प्रश्न हुए। तब गुरु मछिन्दर नाथ ने गोरख नाथ की आंख को ज्यों का त्यों ठीक कर दिया और गोरख नाथ को गुरु मछिन्दर नाथ ने आशिर्वाद देते हुए कहा हे पुत्र संसार में तुम्हारा यश मुझसे भी अधिक प्रकाशित होगा ।
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