02/09/2025
चार दिन जो मिले थे खुदा से, सँवारने को नसीब,
सँवारते ही रह गए हम, ताउम्र वाह वाही की कमीज |
भीतर ना झाँका, जहाँ थी मंजिल-ए-कैफ,
राह के चंद खोटे सिक्के, बटोरने की किये तरकीब।
सबको अपना मानते रहे, बस एक उन्हें छोड़कर,
वो कहते ही रह गए, मैं ही हूँ तेरा सबसे अजीज |
भूल की जो माना ना, उन्हें अपना रूह-ए-चारागर,
मन को हक़ीम बना के हम आज भी है मरीज|
घुटनों पर आ गए, रख दिया सर आपके पाँव पर,
अब दुनिया की तरफ न देखूं आप ही मेरे हबीब |
अब रहा नहीं भरम तनिक मुझे, आपके करम पर
_आक़ा... आप सा ना कोई 'कृपालु' मुझ सा ना कोई गरीब ||_...✍️