सहजयोग समाचार

सहजयोग समाचार "सहजयोग" परम् पूजनीय श्रीमाताजी के द्वारा बताई गयी ध्यान करने की अत्यंत सरल और निशुल्क विधि है.

परम् पूजनीय श्री माताजी निर्मला देवी द्वारा प्रतिपादित सहजयोग ध्यान द्वारा साधक की कुंडलिनी शक्ति तत्क्षण जाग्रत होकर साधक की चेतना को परम् चेतना के साथ एकाकार कर देती है. साधक इस परम् चेतना की अनुभूति अपने अंदर तुरंत स्थापित हुई दिव्य शांति और हाथ की हथेलियों और सर के तालु भाग पर शीतल लहरियों के रूप में तत्क्षण करता है. ध्यान के नियमित अभ्यास से साधक की चेतना षडरिपुओं (काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद,मत्सर ) को पार कर परम् तत्व में स्थित होती है और एक दिव्य मानवीय व्यक्तित्व का निर्माण करती है.

सहजयोग की स्थापना परम् पूजनीय श्री माताजी निर्मला देवी द्वारा 5 मई 1970 को गुजरात के नारगोल शहर से की गयी थी. तब से सतत चली आ रही इस यात्रा में आज संसार भर के 150 देशो के करोड़ो साधक नियमित जुड़े हुए है और नियमित ध्यान द्वारा अपने शारीरिक,मानसिक और आध्यात्मिक उत्थान को ऊपर उठा रहे है.

सहजयोग पूरी तरह से अनुभूतिजन्य और सर्वदा निशुल्क है. अपने शहर में आपके करीबी ध्यान केंद्र का पता जानने के लिए आप आप हमारे टोल फ्री नंबर 1800 3070 0800 अथवा मोबाइल नंबर 8963877777 काल कर सकते है.

श्री परमात्मा की विनम्रता की परिसीमा को दर्शाता वह अद्भुत संबोधन। जिसके द्वारा श्री परमात्मा ने सदा सर्वदा हम सभी आम मान...
21/08/2026

श्री परमात्मा की विनम्रता की परिसीमा को दर्शाता वह अद्भुत संबोधन। जिसके द्वारा श्री परमात्मा ने सदा सर्वदा हम सभी आम मानवों से अपना संवाद प्रारंभ किया है।

जय श्री माताजी

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20/08/2026
25 मार्च 1999 को पुणे में दी गई अपनी स्पीच में श्री माताजी द्वारा बताया गया था कि किस प्रकार आजादी के पश्चात भारत में पा...
18/08/2026

25 मार्च 1999 को पुणे में दी गई अपनी स्पीच में श्री माताजी द्वारा बताया गया था कि किस प्रकार आजादी के पश्चात भारत में पाश्चात्य संस्कृति का आगमन प्रारंभ हुआ था और किस प्रकार इसे प्रारंभ करने में हमारे नेताओं का भी इसमें योगदान रहा था।

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17/08/2026

*सहज के दैवीय अनुभव*

मिलिए चौमू (राजस्थान) के मशहूर चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉक्टर श्री गौरव गर्ग (M.D. Pedia) से।

डॉक्टर गौरव के जीवन में सहज चमत्कारों की पूरी एक श्रृंखला है। इस छोटे वीडियो में उनके जीवन के कुछ बेहद चमत्कारिक अनुभवों को सुनिए।

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(बाबा मामा द्वारा लिखी पुस्तक मेरे संस्मरण से साभार)अगस्त १९४२ में मेरे पिताजी जेल में थे और परिवार के सम्मुख आर्थिक समस...
14/08/2026

(बाबा मामा द्वारा लिखी पुस्तक मेरे संस्मरण से साभार)

अगस्त १९४२ में मेरे पिताजी जेल में थे और परिवार के सम्मुख आर्थिक समस्याएं थीं। इस स्थिति में श्रीमाताजी, जो कि साइन्स कॉलेज में पढ़ रहीं थीं, ने हमारे स्वाधीनता दिवस १५ अगस्त के दिन कॉलेज छोड़ने का निर्णय किया और कॉलेज के द्वार पर ही धरना दिया। मेरी माताजी यद्यपि पुराने विचारों की थीं फिर भी उन्होंने श्रीमाताजी की राजनीतिक गतिविधियों का विरोध नहीं किया। विरोध के रूप में श्रीमाताजी ने धरना देने का तथा कॉलेज में प्रवेश करने वाले सभी विद्यार्थियों को रोकने का निर्णय किया। कॉलेज के प्रधानाचार्य परिवार के अच्छे मित्र थे परन्तु उन्हें अंग्रेज अधिकारियों की आज्ञा थी कि धरना देने वाले तथा महाविद्यालय के नियमों का उल्लंघन करने वाले सभी लोगों को निकाल दिया जाए। उपप्रधानाचार्य श्री.कृष्णमूर्ति को भेजा गया कि श्रीमाताजी को रोकें और उन्हें बताएं कि अब यदि उन्होंने धरना दिया तो उन्हें कॉलेज छोड़ने का प्रमाणपत्र दे दिया जाएगा। निकाले जाने का अर्थ उन दिनों ये होता था कि आप किसी अन्य कॉलेज में भी प्रवेश नहीं ले सकेंगे। श्रीमाताजी के सम्मुख जब ये बात रखी गई तो श्रीमाताजी ने कहा कि अंग्रेजों द्वारा चलाए गए कॉलेज के अधिकारियों का अहसान लेने के स्थान पर वे कॉलेज से निकाला जाना पसन्द करेंगी। धरना देने से श्रीमाताजी को रोक पाने से असफल होकर श्रीकृष्णमूर्ति वापिस प्रधानाचार्य श्री.शाब्दे के पास लौटे। प्रधानाचार्य अंग्रेजों के पक्ष में थे और उन्होंने विद्यार्थियों को कक्षा में आने से रोकने की अवज्ञा के लिए प्रेरित करने और कॉलेज को चलाए जाने का विरोध करने के जुर्म में, श्रीमाताजी को कॉलेज से निकाले जाने का पत्र (Letter of Rustication) पकड़ाया। दिलचस्प बात ये है कि सेवानिवृत्त होने के पश्चात् श्रीकृष्णमूर्ति पुणे में बस गए। मेरे विचार से वर्ष १९९१ में वृद्ध श्रीकृष्णमूर्ति श्रीमाताजी से मिले, उनके चरण कमलों को छुआ और कहा कि ऐसे दिव्य व्यक्ति को कॉलेज से निकालने के लिए वे आज भी लज्जित हैं। परन्तु श्रीमाताजी के चरण स्पर्श करने से उनके सारे पाप धुल गए। उनकी इस भंगिमा से श्रीमाताजी का हृदय बहुत आंदोलित हुआ और उन्होंने कहा कि उस समय उन्होंने जो किया था वह कॉलेज के प्रति कर्तव्य था और जो उस समय श्रीमाताजी ने किया था वह उनका राष्ट्र के प्रति कर्तव्य था। इसलिए किसी ने भी अपराध नहीं किया। श्रीमाताजी के मन में
उनके प्रति किसी भी प्रकार का गिला शिकवा न था क्योंकि श्रीकृष्ण मूर्ति तो अत्यन्त सज्जन व्यक्ति थे। वे कहने लगे कि जब उन्होंने श्रीमाताजी को निर्भीकता पूर्वक अंग्रेज सिपाहियों और उनकी बन्दूकों का सामना करते हुए देखा तो उनके मन में एक ही विचार आया कि वे दुर्गा अवतार हैं।

उन्हें कॉलेज से निकाले जाने का एक और भी कारण था। श्री.पॉल नामक एक व्यक्ति हमारे परिवार के अच्छे मित्र थे और वे शिक्षा निदेशक भी थे। उनका बेटा कॉलेज में श्रीमाताजी की कक्षा में सहपाठी था। जिस दिन श्रीमाताजी धरना दे रही थीं उन्होंने छोटे पॉल से कहा यदि वह सच्चा भारतीय है तो वह कक्षा में नहीं जाएगा और धरना देने में उनकी मदद करेगा। छोटे पॉल ने जो कि भूरे साहबों (Brown Sahib) का विशेष उदाहरण था श्रीमाताजी का साथ देने से साफ इन्कार कर दिया और खुल्लम-खुल्ला गाँधीजी और उनके अहिंसात्मक आन्दोलन की आलोचना की। उसने ये भी कहा कि अंग्रेजों के शासन में वह बहुत प्रसन्न है तथा अहिंसात्मक आन्दोलन से भारत किसी भी प्रकार स्वतंत्रता प्राप्त नहीं कर सकता। उसने आगे कहा, कि भारतीय देश को नहीं चला सकते क्योंकि उनमें इसकी योग्यता ही नहीं है। उसकी बात सुनकर श्रीमाताजी और उनकी सहेलियों ने अपनी चूड़ियाँ उतरीं और उसे पेश की। भारत में पुरुषों का चूड़ियाँ पहनना पुरुषत्वहीनता, कायरता और भीरुता का पर्याय माना जाता है। छोटे पॉल को इस बात पर बहुत क्रोध आया और उसने इस मामले की शिकायत अपने पिता से की। श्री.पॉल यद्यपि परिवार के मित्र थे फिर भी उन्होंने श्रीमाताजी को कॉलेज से निकलवा दिया।

जय श्री माताजी

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इस स्वतंत्रता दिवस ,श्री माताजी के इन्हीं आशीर्वचनों की छांव में हम सभी अपने अंदर विद्यमान षड्रिपुओ से मुक्ति पाकर सच्ची...
14/08/2026

इस स्वतंत्रता दिवस ,श्री माताजी के इन्हीं आशीर्वचनों की छांव में हम सभी अपने अंदर विद्यमान षड्रिपुओ से मुक्ति पाकर सच्ची आत्मिक स्वतंत्रता को प्राप्त हो।

हृदय में इसी कामना के साथ ...

जय श्री माताजी

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(सभी के लिए अवश्य पढ़ने वाली अद्भुत घटना)गगनगिरी महाराज नाथ संप्रदाय के एक महान हठ योगी थे। छोटी उम्र में ही घर छोड़ने क...
14/08/2026

(सभी के लिए अवश्य पढ़ने वाली अद्भुत घटना)

गगनगिरी महाराज नाथ संप्रदाय के एक महान हठ योगी थे। छोटी उम्र में ही घर छोड़ने के बाद, वे शीघ्र ही नाथ संप्रदाय के संपर्क में आ गए।

लगभग 1975-1977 के दौरान, श्री माताजी निर्मला देवी उनसे मिलने गगन बावड के किले पर गईं। किले पर चढ़ते समय बहुत तेज बारिश होने लगी और वे पूरी तरह भीग गईं। जब वे किले पर पहुँचीं, तो महाराज बहुत क्रोधित थे। वे बोले, “माँ, आपने मुझे बारिश क्यों नहीं रोकने दी? क्या यह मेरे अहंकार की परीक्षा थी?”

श्री माताजी मुस्कुराईं और कहा, “मुझे पता था कि आप मेरे लिए एक साड़ी लाए हैं, और यह भी पता था कि हम संन्यासियों द्वारा दी गई साड़ी स्वीकार नहीं कर सकते। लेकिन भीग जाने के बाद वस्त्र स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है, इसीलिए मैंने आपको बारिश नहीं रोकने दी! इसमें इतनी बड़ी बात क्या है?”

यह सुनकर महाराज एक छोटे बच्चे की तरह हँसे और श्री माताजी के दिव्य स्वरूप के दर्शन किए।

गगनगिरी महाराज: माँ, मुझे ज्ञात था कि आप इस दिन मुझे मेरा आत्म-साक्षात्कार प्रदान करने के लिए आने वाली हैं। मैं हजारों वर्षों से इस क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था। अपनी कठोर तपस्या और कठिन जीवन से, मैं मूलाधार से आज्ञा चक्र तक प्रत्येक चक्र को स्वच्छ करने में सक्षम हो पाया। लेकिन, मैं जानता था कि अंत में केवल आप ही मुझे आज्ञा चक्र से सहस्रार तक की छलांग लगाने और उस परम आनंद को प्राप्त करने में मदद कर सकती हैं। जब आप पहाड़ी पर चढ़ रही थीं, तो मैं आपको आपके आदिशक्ति के मूल स्वरूप में देख सकता था, जिसके साथ सभी देवी-देवता एक दिव्य जुलूस में नृत्य कर रहे थे।

(फिर उन्होंने श्री माताजी को साड़ी अर्पित की। उसके बाद उन्होंने श्री माताजी के साथ आए सभी सहज योगियों की ओर देखा।)

गगनगिरी महाराज: माँ, आप इतने सारे लोगों को यह अनमोल उपहार (आत्म-साक्षात्कार) क्यों दे रही हैं? क्या वे इसका वास्तविक मूल्य समझते हैं? क्या वे जानते हैं कि उन्होंने कितनी सहजता से क्या प्राप्त किया है? मुझे अपना साक्षात्कार पाने में हजारों वर्ष लग गए। मुझे अनगिनत कठोर तपस्याओं और कठिनाइयों से गुजरना पड़ा।

श्री माताजी: आप एक गुरु हैं और एक माँ नहीं हो सकते। मैं एक माँ हूँ और आपके जैसी गुरु नहीं हो सकती। एक माँ हमेशा अपने बच्चों को निस्वार्थ भाव से सब कुछ देती है। एक गुरु चाहता है कि उसका शिष्य आशीर्वाद प्राप्त करने से पहले सभी परीक्षाओं से गुजरे, लेकिन एक माँ ऐसा नहीं कर सकती। तो, अब जब आपने वह अवस्था प्राप्त कर ली है, तो आप मेरे इस कार्य में मेरी मदद क्यों नहीं करते?

गगनगिरी महाराज: जैसा आप कहें, माँ। ...मैं पहले इतना भाग्यशाली नहीं था कि मुझे आप जैसी माँ मिलती...!!!

गगनगिरी महाराज: (सभी सहज योगियों से) आप सभी बहुत भाग्यशाली हैं कि आप स्वयं माँ के हाथों से इतना कुछ प्राप्त कर रहे हैं। इसलिए, इसके मूल्य को समझें और इसे अपने भीतर विकसित करें।!!!

कुछ दिनों बाद, महाराज के प्रिय शिष्य श्री मधु पवार, जो महाराज के सभी भजन लिखते थे, को एक योग शिविर के लिए माउंट आबू जाना था। इसके लिए वे महाराज से अनुमति लेने गए। महाराज ने कहा, "जाओ! और जाते समय दिल्ली में श्री माताजी से मिलकर जाना!"

उन्होंने दिल्ली में श्री माताजी से भेंट की और उनके श्री चरणों में नमन कर अनुमति मांगी। उसी समय श्री माताजी ने सौ रुपये के नोटों का एक बंडल मंगवाया और उन्हें देने लगीं, लेकिन वे मना करने लगे। श्री माताजी ने जबरदस्ती वह बंडल उनके हाथ में दिया और कहा, "इसे प्रसाद के रूप में रख लो, यह काम आएगा।" उन्होंने पैसे ले लिए और चले गए।

जब वे रेलवे स्टेशन पहुँचे और टिकट खरीदने के लिए अपना बटुआ निकाला, तो उन्होंने देखा कि उनके सारे पैसे खत्म हो चुके थे। वे हैरान रह गए और सोचने लगे कि श्री माताजी को कैसे पता चला कि मेरे पास पैसे नहीं हैं!!!
फिर उन्होंने अपनी आगे की पूरी यात्रा श्री माताजी द्वारा दिए गए पैसों से ही की और पूरे रास्ते वे केवल श्री माताजी का ही ध्यान करते रहे। शिविर समाप्त होने पर वे दिल्ली लौटे और फिर से श्री माताजी से मिले। इस बार उन्होंने श्री माताजी के श्री चरणों में एक भजन अर्पित किया जो उन्होंने लिखा था।

यही वह भजन था,
”सबको दुंआ देना, माँ सबको दुंआ देना l”

श्री माताजी को यह भजन बहुत पसंद आया और उन्होंने इसे सहज योग की 'आरती' के रूप में चुना।
इसीलिए इस भजन में एक पंक्ति है:

”जब दिल में आए तो मधु संगीत सुन लो “ll

यहाँ 'मधु' का अर्थ गगनगिरी महाराज के शिष्य, श्री मधु पवार से है।

जय श्री माताजी

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आज के अति व्यस्त जीवन में हम कई बार चाह कर भी परम् पूज्य श्री माताजी द्वारा बताई क्लीनिंग टेक्नीक का प्रयोग नहीं कर पाते...
13/08/2026

आज के अति व्यस्त जीवन में हम कई बार चाह कर भी परम् पूज्य श्री माताजी द्वारा बताई क्लीनिंग टेक्नीक का प्रयोग नहीं कर पाते है।

अभी श्री कृष्ण पूजा का शुभ अवसर सामने है। पूजन का पूर्ण आशीष ओर श्री कृष्ण तत्व की स्थापना हेतु हम सभी श्री माताजी द्वारा बताई इन विधियों का अभ्यास आज से प्रारंभ करते हैं।

इससे पूजा तक विशुद्धि चक्र की बेहतर स्वच्छता होगी और हम पूजन का आशीष ओर आनंद बहुत सुंदरता से ग्रहण कर पाएंगे।

जय श्री माताजी

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हम में से कई लोगों के लिए यह जानकारी बिल्कुल नई ओर अनोखी हो सकती है कि श्री माताजी ने कोटा यात्रा कब की ?आप सभी की जानका...
12/08/2026

हम में से कई लोगों के लिए यह जानकारी बिल्कुल नई ओर अनोखी हो सकती है कि श्री माताजी ने कोटा यात्रा कब की ?

आप सभी की जानकारी हेतु बाबा मामा की पुस्तक *मेरे संस्मरण* के पेज 79 पर इस घटना का स्पष्ट उल्लेख है।

भारत की आजादी से पूर्व श्री माताजी द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए दिल्ली जाने का निर्णय किया गया था। इसी यात्रा में श्री माताजी कोटा होकर गुजरे थे और कोटा में दो दिवस का प्रवास भी किया था।

इसी समय श्री माताजी द्वारा कोटा की इस मनमोहक झील की तारीफ की गई थी। आज इस झील को सब किशोर सागर के नाम से जानते है।

आप सभी के लिए उसी मनमोहक झील की तस्वीर प्रस्तुत है।

*एक मधुर सवाल–*

क्या श्री माताजी उन दो दिवसों के प्रवास के दौरान ग्राम बोरखंडी या उसके आस पास ही रुकी थी।

जहां आज उन्हीं के श्रीचरणों की कृपा से हम सभी का पावन आश्रम *श्री आदिशक्ति धाम* स्थित है ?

सोचिए ....... चैतन्य को महसूस कीजिए।

अत्यंत आनंद आएगा।

जय श्री माताजी

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Address

श्री आदिशक्ति धाम ( सहजयोग मुख्य ध्यान केंद्र-कोटा), नया नोहरा, बोरखंडी, कोटा ( राजस्थान)
Kota
324001

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