Arya Samaj Korba

Arya Samaj Korba इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् ।
अपघ्नन्तो अराव्णः

पंडित जे०पी० चौधरी जी की विद्वता का नमूना-•एक समय काशी के ब्राह्मणों द्वारा एक अभियान चलाया गया था "अछूतों का मंदिर प्रव...
23/05/2026

पंडित जे०पी० चौधरी जी की विद्वता का नमूना-

•एक समय काशी के ब्राह्मणों द्वारा एक अभियान चलाया गया था "अछूतों का मंदिर प्रवेश निषेध।" यह कैंपेन फॉरेस्ट फायर में बदल गया। पौराणिकों ने अछूतों को गिरा-गुजरा सिद्ध करने के लिए पुस्तकें लिखीं। पूरे भारत में यह व्यवस्था लागू हो गई। इस व्यवस्था के अग्रदूत काशी के ही 83 पौराणिक पंडितों की पलटन थी।

उन दिनों पंडित जे०पी० चौधरी इकलौते ऐसे विद्वान् थे जिन्होंने इस विषय पर एक छोटी सी पुस्तिका "हरिजनों का मंदिर प्रवेश शास्त्र-सम्मत है" लिखते हुए उसपर 5000₹ का चैलेंज रखा। इसमें उन 83 विद्वानों की नामावली भी दर्ज की। यह पुस्तिका "हिंदू सभा काशी" से प्रकाशित हुई। अंततः पूरे भारत में उसके खंडन में एक किताब कोई पौराणिक न लिख पाया। सबने घुटने टेक दिए। पंडित जी ने इसमें अछूत, हरिजन, निषाद आदि सभी को मंदिर में प्रवेश का अधिकार वेदादि शास्त्रों से सिद्ध किया।

उल्लेखनीय है कि अथर्ववेद के एक पाठ "अप्राण कौशिक सूत्र" का जिक्र सायण आदि भाष्य में आया है। आर्यजगत में यह पाठ कभी उपलब्ध नहीं था। चौधरी जी को इसकी दुर्लभ प्रति किसी पुस्तकालय में मिली थी। उन्होंने इसे अपने सहयोगी से एक कॉपी पर हूबहू लिखवा लिया था ताकि इसे पुनः प्रकाशित कराकर आर्यजनता के लिए उपलब्ध कराया जा सके। सार्वदेशिक पत्रिका में इसे छापने की अपील भी छपी। कोई आर्य महानुभाव सहयोग हेतु आगे न आया और आज हम सभी उस सूत्र पाठ से वंचित रह गए हैं।

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पंडित जे०पी० चौधरीजी के जीवन-दर्शन से यह बात सामने आती है कि कैसे एक पौराणिक परिवार में जन्मा बालक तथाकथित ब्राह्मण समाज से अकेले लोहा लेकर विद्वत्ता के बल पर ब्राह्मणत्व को प्राप्त करता है और शूद्र जाति के लिए शास्त्रीय शिक्षा का द्वार खोलता है। चौधरी जी ने अनेक ट्रैक्ट्स लिखे। सैकड़ों शास्त्रार्थ किए और कभी पराजित नहीं हुए। सौभाग्य से पंडित जी के लगभग सभी साहित्य मेरे संग्रह में हैं। साथ ही उनके लेख, शास्त्रार्थ और हस्तलिखित पत्र की फोटो भी मेरे पास मौजूद हैं। मैं इन सबको प्रकाशित कराना चाहता हूं। मगर दुर्भाग्य है कि अब आर्यसमाज में पाठकों की रुचि आलस्य को प्राप्त हो चुकी है।

-प्रियांशु सेठ

23.5.2026        संसार में ऐसा देखा जाता है, कि बहुत से लोग अपनी गलतियां तो सुधारते नहीं, केवल दूसरों की गलतियां ही ढूंढ...
23/05/2026

23.5.2026
संसार में ऐसा देखा जाता है, कि बहुत से लोग अपनी गलतियां तो सुधारते नहीं, केवल दूसरों की गलतियां ही ढूंढते रहते हैं। यह व्यवहार तो ठीक नहीं है। "क्योंकि गलतियां करने से तो दुख ही बढ़ता है, अपना भी और दूसरों का भी।"
"अब जो लोग स्वयं अपनी गलतियां ढूंढते नहीं और उन्हें दूर नहीं करते। उनकी तो उन्नति का दरवाजा ही बंद हो गया। क्योंकि वे गलतियां करते रहेंगे, तथा उन गलतियों से वे स्वयं भी दुखी रहेंगे और दूसरों को भी दुख देंगे। इसलिए यह कोई बुद्धिमत्ता की बात नहीं है।"
"न्याय, सभ्यता और बुद्धिमत्ता की बात यह है, कि व्यक्ति पहले अपनी गलतियां ढूंढे। उन्हें दूर करे। फिर जब उसकी अपनी बहुत सी गलतियां छूट जाएं, तब वह दूसरों की गलतियां ढूंढे और उन्हें दूर करने का प्रयास करे।" अर्थात उन्हें सुझाव देवे कि "पहले मैं भी बहुत सी गलतियां करता था, तब मैं बहुत दुखी था। अब मैंने वे गलतियां छोड़ दी और मैं सुखी हो गया। आप भी इसी पद्धति से विचार करें। यदि आपके अंदर भी कोई गलतियां हों, कोई दोष हों, कमियां हों, तो आप भी उन्हें अपने अंदर ढूंढें तथा दूर करें।" "यदि आपकी इच्छा हो तो इस कार्य में मैं भी आपकी सहायता कर सकता हूं।"
"इस प्रकार से यदि आप अपनी गलतियों को ढूंढेंगे, उन्हें स्वीकार करेंगे, उन्हें दूर करेंगे, तो आपकी भी उन्नति होगी। आप भी सुखी हो जाएंगे। जब आप स्वयं सुखी हो जाएंगे, तब आप भी दूसरों को भविष्य में सुझाव दे सकेंगे। उनकी गलतियां दूर कर सकेंगे, और बहुत सा पुण्य प्राप्त कर सकेंगे।"
ऐसा कहने पर यदि दूसरा व्यक्ति ऐसा कहे, "कि हां जी। आप मेरा सहयोग करें। मैं अपनी गलतियां दूर करना चाहता हूं। अपनी उन्नति करके सुखी होना चाहता हूं।" "तब आप उसकी गलतियां ढूंढने में अपना समय और शक्ति खर्च करें। तब आपको पुण्य मिलेगा और दूसरे का भी कल्याण होगा।"
"जो व्यक्ति अपनी गलतियां तो दूर करता नहीं, उसे दूसरों को गलती बताने का अधिकार भी नहीं होता।" "इसलिए पहले अपना कर्तव्य निभाएं तो आपको अधिकार स्वयं ही मिल जाएगा। तब उसका उपयोग करें। ऐसा करने से ही सबका जीवन सुखमय बनेगा।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़ गुजरात।"

22.5.2026        "सुखी होने के लिए व्यक्ति का शरीर और मन दोनों स्वस्थ होने चाहिएं, तभी व्यक्ति सुख पूर्वक जीवन जी सकता ह...
22/05/2026

22.5.2026
"सुखी होने के लिए व्यक्ति का शरीर और मन दोनों स्वस्थ होने चाहिएं, तभी व्यक्ति सुख पूर्वक जीवन जी सकता है।"
अब संसार में अनेक घटनाएं होती रहती हैं, अच्छी भी और बुरी भी। "जब बुरी घटनाएं होती हैं तब व्यक्ति दूसरों के साथ झगड़ा करता है। उससे उसकी मानसिक शांति खो जाती है। मन में चिंता और तनाव बढ़ जाते हैं।"
"दूसरी ओर यदि व्यक्ति झगड़ा न करे, प्रेम से रहे, दुष्टों से बचकर रहे, दूर रहे, तो मन की शांति बनी रहती है। इस प्रकार से यदि मन शांत रहे, तो व्यक्ति का शरीर भी स्वस्थ रहता है। खाना पीना पढ़ना लिखना व्यापार नौकरी करना ईश्वर का ध्यान करना आदि सब कार्यों में उसका मन लगता है। तब वह सुख पूर्वक जीवन जी सकता है।"
"और यदि लड़ाई झगड़ा करे, तो शरीर और मन दोनों रोगी हो जाते हैं। और फिर व्यक्ति तनाव युक्त जीवन जीता है। तब जीवन का पूरा लाभ नहीं हो पाता।"
इसलिए सब प्रकार से सुखी होने के लिए व्यक्ति को मन और शरीर से स्वस्थ होना आवश्यक है। और उसका उपाय यही है, कि "व्यक्ति झगड़ों से दूर रहे, प्रेम और शांति से से जीवन जीए, तो ही वह सुखी हो सकता है।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

21.5.2026        संसार के लोगों में शुद्ध ज्ञान भी होता है, और अशुद्ध भी। "अशुद्ध ज्ञान को अविद्या कहते हैं। और शुद्ध ज्...
21/05/2026

21.5.2026
संसार के लोगों में शुद्ध ज्ञान भी होता है, और अशुद्ध भी। "अशुद्ध ज्ञान को अविद्या कहते हैं। और शुद्ध ज्ञान को विद्या कहते हैं।"
शुद्ध ज्ञान अर्थात विद्या के भी दो स्तर हैं। "एक शाब्दिक ज्ञान और दूसरा तत्वज्ञान।" "जब व्यक्ति कुछ शाब्दिक ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तब उसमें अभिमान नामक दोष उत्पन्न होता है, जैसे रावण और दुर्योधन में उत्पन्न हो गया था। यह अभिमान व्यक्ति की बुद्धि को नष्ट कर देता है। उसे व्यावहारिक जीवन में भी असफल बनाता है, तथा ईश्वर साक्षात्कार में तो अत्यंत ही बाधक है।"
परंतु जब व्यक्ति को तत्वज्ञान हो जाता है/ वास्तविक ज्ञान हो जाता है, तब उसका अभिमान नष्ट हो जाता है। "जैसे श्री रामचंद्र जी महाराज और श्री कृष्ण जी महाराज का अभिमान नष्ट हो गया था। जिसके कारण उनकी बुद्धि ठीक चलती थी, तथा उनमें वीरता विद्या सेवा परोपकार बुद्धिमत्ता न्यायकारिता आदि उत्तम गुण थे। इन गुणों के कारण वे अपने जीवन में सफल हो गए। इसीलिए आज तक संसार में उनका सम्मान होता है।"
"यदि आप भी रावण और दुर्योधन के समान शाब्दिक ज्ञान प्राप्त करके रुक जाएंगे, और तत्वज्ञान को प्राप्त नहीं करेंगे, तो आपके अंदर भी अभिमान उत्पन्न होगा, और वह आपके विनाश का कारण बनेगा।"
"और यदि आप शाब्दिक ज्ञान प्राप्त करके तत्वज्ञान की ओर बढ़ेंगे, तो अभिमान नहीं आएगा। जो भी शाब्दिक ज्ञान प्राप्त करते हुए थोड़ा बहुत अभिमान उत्पन्न हुआ भी होगा, तो वह भी नष्ट हो जाएगा।" "तब आप भी श्री रामचंद्र जी महाराज एवं श्री कृष्ण जी महाराज के समान शुद्ध व्यवहार करेंगे। तभी आपका जीवन सुखमय एवं सफल हो पाएगा। शुद्ध ज्ञान/तत्त्वज्ञान प्राप्त करना कठिन तो है, परंतु असंभव नहीं है।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

20.5.2026        "बहुत से लोग तब आलसी हो जाते हैं, जब उनकी जेब में खूब पैसे होते हैं।" परंतु कुछ लोग तब भी पुरुषार्थी हो...
20/05/2026

20.5.2026
"बहुत से लोग तब आलसी हो जाते हैं, जब उनकी जेब में खूब पैसे होते हैं।" परंतु कुछ लोग तब भी पुरुषार्थी होते हैं। वे सोचते हैं, कि "यदि हम आगे पुरुषार्थ बंद कर देंगे, तो जो आज हमारी जेब भरी है, कल वह खाली हो जाएगी।" "अपनी जेब भरी रहे," इसके लिए वे सदा पुरुषार्थी बने रहते हैं।
जिनकी जेब खाली होती है, "वह खाली जेब तो उनको सदा प्रेरित करती ही रहती है, कि पैसे कमाओ अन्यथा जीवन कैसे चलेगा?"
इसलिए आपकी खाली जेब आपको प्रेरित करती है, कि "पुरुषार्थ करें, धन कमाएं, और जीवन की सुरक्षा करें।" "अपनी भरी जेब देखकर भी आलसी न बनें, तब भी पुरुषार्थ करते रहें, ताकि आपकी जेब सदा भरी रहे और खाली होने की समस्या न आए।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

19.5.2026         यह सब का अनुभव है कि "इच्छाओं को पूरा करने से इच्छाएं बढ़ती हैं, और सारी इच्छाएं कभी किसी की आज तक न प...
19/05/2026

19.5.2026
यह सब का अनुभव है कि "इच्छाओं को पूरा करने से इच्छाएं बढ़ती हैं, और सारी इच्छाएं कभी किसी की आज तक न पूरी हुई, न हो रही हैं, और न भविष्य में होंगी। इसलिए सुखी होने के लिए आपको कुछ इच्छाएं तो छोड़नी ही होंगी।"
इच्छाओं की व्यवस्था इस प्रकार से है। "आपकी जो इच्छाएं पूरी हो चुकी हैं। उसके लिए ईश्वर का धन्यवाद करें, क्योंकि ईश्वर की कृपा और सहायता के बिना किसी की इच्छाएं पूरी नहीं हो सकती।"
जो इच्छाएं बची हुई हैं, उनमें से जो पूरी हो सकती हैं, उनको पूरा करने के लिए पुरुषार्थ करें। वे भी पूरी हो जाएंगी।"
"परंतु जो इच्छाएं पूरी हो ही नहीं सकती, जो आपके सामर्थ्य से बाहर हैं, उन इच्छाओं को तो अवश्य ही छोड़ दें अन्यथा वे आपको सदा दुख ही देती रहेंगी।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

18.5.2026         संसार में कुछ काम सही होते हैं, और बहुत से गलत। सही काम कम होते हैं, और गलत काम अधिक होते हैं। "क्योंक...
18/05/2026

18.5.2026
संसार में कुछ काम सही होते हैं, और बहुत से गलत। सही काम कम होते हैं, और गलत काम अधिक होते हैं। "क्योंकि संसार में बुरे काम करने के फलस्वरूप पशु पक्षी कीड़े मकोड़े आदि प्राणियों की संख्या बहुत अधिक है। और अच्छे काम करने के फलस्वरूप मनुष्यों की संख्या बहुत कम है। ये अच्छे बुरे काम अनादि काल से चल रहे हैं, और आगे अनंत काल तक चलते रहेंगे।"
"गलत कामों को आज तक सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान परमात्मा भी नहीं रोक पाया, फिर आप कौन से खेत की मूली हैं, जो आप रोक लेंगे?" "यह वाक्य बोलकर मैं परमात्मा की निंदा नहीं करना चाहता। परमात्मा की शक्तिहीनता नहीं बताना चाहता। और आप जो सुधार का प्रयास कर रहे हैं, उस कार्य में आपका उत्साह भंग करना नहीं चाहता। आपके अंदर कोई निराशा के भाव उत्पन्न करना नहीं चाहता। और न ही मैं निराश हूं। इसका प्रमाण यह है, कि मैं स्वयं 365 दिन समाज सुधार के लिए पूरे उत्साह के साथ पूर्ण पुरुषार्थ करता हूं। वर्ष भर में एक भी छुट्टी नहीं मनाता।"
"संसार में पाप कर्म बंद नहीं होंगे', यह बात कहकर मैं आपको यह समझाना चाहता हूं, कि "प्रत्येक व्यक्ति कर्म करने में स्वतंत्र है। वह अपनी इच्छा और अपनी बुद्धि से ही काम करता है। जैसे आप भी अपने सब काम अपनी इच्छा और अपनी बुद्धि से करते हैं। ऐसे ही दूसरे लोग भी करते हैं। काम चाहे अच्छा हो चाहे बुरा हो, लोगों को इस बात की परवाह नहीं है। लोग तो बस अपनी इच्छा और अपनी बुद्धि के हिसाब से ही काम करना चाहते हैं, और करते हैं।"
"यदि ईश्वर चाहे, तो सब बुरे कामों को एक झटके में रोक सकता है। परंतु ऐसा करना सब लोगों के साथ अन्याय होगा। ईश्वर न्यायकारी है, इसलिए किसी भी अपराधी का हाथ नहीं पकड़ता, कि उसे ग़लत काम करने ही न दे।"
"क्योंकि जब आत्मा स्वभाव से कर्म करने में स्वतंत्र है, और ईश्वर उसकी स्वाभाविक स्वतंत्रता को यदि छीन ले, उसे अपनी स्वतंत्रता से कोई बुरा काम करने ही न दे, तो क्या यह उसके साथ अन्याय नहीं होगा?" "ईश्वर अन्यायकारी नहीं है। वह किसी की स्वतंत्रता को नहीं छीनता। इसीलिए पाप करते समय किसी को जबरदस्ती नहीं रोकता।"
हां, दयालु होने के कारण सबके मन में भय शंका लज्जा के भाव उत्पन्न कर के सबको सूचना अवश्य देता है, कि "भाइयो! बुरे काम मत करो, अन्यथा आपको दंड मिलेगा। अच्छे काम करो, तो मैं आपको सुख दूंगा।" "क्या लोग सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान ईश्वर के इस सुझाव को मान लेते हैं? नहीं मानते।"
"जब लोग सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान ईश्वर के सुझाव को भी नहीं मानते और अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करते हैं, फिर भी बुरे काम करते हैं, तो आपका सुझाव तो लोग क्या ही मानेंगे? आपका ज्ञान और शक्ति ईश्वर के सामने क्या है? कुछ भी नहीं है।"
"इसलिए संसार की अधिक चिंता न करें। यह काम राजा लोगों का है। प्रशासनिक अधिकारी लोग बुरे कामों को अवश्य रोकें। यह उनका क्षेत्र है। आम जनता को इस विषय में ज्यादा सोचने की आवश्यकता नहीं है।" "हां, दुष्टों तथा अत्याचारियों से अपना बचाव तो अवश्य करें।" "और राजा लोग भी अपराधों को रोकने का पूरा प्रयत्न अवश्य करें। परन्तु फिर भी यह न समझें, कि सारे अपराध समाप्त हो जाएंगे। क्योंकि सबके अंदर अविद्या और स्वार्थ बहुत अधिक मात्रा में भरा पड़ा है, जिसके कारण संसार में सारे पाप होते हैं। उस अविद्या और स्वार्थ को पूरी तरह से हटाना बहुत कठिन है।"
संसार में पहले भी बुरे काम होते थे, और आगे भी होते रहेंगे। इसका प्रमाण यह है, कि "पहले भी पशु पक्षी कीड़े मकोड़े कुत्ते गधे वृक्ष वनस्पति आदि पैदा होते थे। आज भी होते हैं, और आगे भी होते रहेंगे। ये सब योनियां पाप कर्मों का फल है। इसलिए पूरी तरह से पाप को कोई नहीं रोक सकता।"
तो मुख्य बात यह है, कि "संसार में जो बुरे काम हो रहे हैं, उन पर अधिक ध्यान न दें। उन कामों से, तथा उनके दुष्परिणामों से अपनी रक्षा तो अवश्य करें। परंतु उन्हें सोच सोच कर दुखी न हों। परेशान न हों, अन्यथा आप स्वयं डिप्रेशन में चले जाएंगे, और आपका जीवन नष्ट हो जाएगा। अतः अपना सोचने का दृष्टिकोण बदलें।"
ऐसे सोचें -- "क्या संसार में कुछ अच्छे काम भी हो रहे हैं? यदि हां, तो उन अच्छे कार्यों को देख देखकर अपना उत्साह बढ़ाएं।" "इससे आपका मन प्रसन्न एवं प्रफुल्लित रहेगा, और आप भी आगे अच्छे-अच्छे काम करेंगे। इससे आप आनंद से जीवन जिएंगे। आपका यह जन्म भी सुखमय होगा, और अगला जन्म भी आप को अच्छे मनुष्य का मिलेगा।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़ गुजरात।"

17.5.2026         "हर व्यक्ति अपने गुणों के माध्यम से चमकना चाहता है।" अच्छी बात है, चमकना चाहिए। इसके लिए आपको सुबह से ...
17/05/2026

17.5.2026
"हर व्यक्ति अपने गुणों के माध्यम से चमकना चाहता है।" अच्छी बात है, चमकना चाहिए। इसके लिए आपको सुबह से ही पुरुषार्थ करना होगा।
"रात को सोने से पहले अगले दिन की योजना बना लें, कि कल मुझे क्या-क्या करना है।उसके लिए सभी आवश्यक साधन सामग्री रात को ही जुटा लें। और सुबह उठते ही चमकने के लिए तैयार हो जाएं।"
सुबह का सूर्योदय प्रतिदिन आपको एक उत्तम अवसर देता है। "अब यह आप पर निर्भर करता है, कि आप कितना पुरुषार्थ करते हैं, और कितना चमकते हैं!"
सुबह का सूर्य उदय देखकर बहुत उत्साह उत्पन्न होता है, उस उत्साह का लाभ उठाएं और चमकने के लिए तैयार हो जाएं। "पूरा दिन पुरुषार्थ करें, और संसार को अपनी योग्यता दिखलाएं। उसी से जब आप संसार में चमकेंगे, तभी कोई आपको धन और सम्मान देगा, और तभी आपका जीवन सफल होगा।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

16.5.2026         शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जो घड़ी न देखता हो। क्योंकि घड़ी देखे बिना तो कोई काम ठीक से संपन्न हो न...
16/05/2026

16.5.2026
शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जो घड़ी न देखता हो। क्योंकि घड़ी देखे बिना तो कोई काम ठीक से संपन्न हो नहीं पाता। "फिर मोबाइल फोन तो आजकल प्रायः सभी रखते हैं। मोबाइल में घड़ी भी होती ही है। फिर भी हमने ऐसे अनाड़ी लोग देखे हैं, जो हाथ में घड़ी भी बांधते हैं, मोबाइल फोन भी रखते हैं, फिर भी समय का पालन नहीं करते।"
"वे कितने आलसी और लापरवाह लोग हैं, जो समय का उल्लंघन करते हैं। और वे अनपढ़ भी नहीं होते। बहुत पढ़े-लिखे लोग भी हमने देखे हैं, जो जानबूझकर समय का उल्लंघन करते हैं।" "ऐसे लोग अपने मन इंद्रियों पर संयम नहीं रखते। दूसरों को मूर्ख समझते हैं। दूसरों का समय छीन लेते हैं। दूसरों का अधिकार छीन लेते हैं। ऐसे दुष्ट लोगों को तो ईश्वर ही दंड देगा।" आप भी ऐसे लोगों से सावधान रहें।
"और यदि यह दोष आपके अंदर भी हो, तो आप भी अपने इस दोष को दूर करने का प्रयास करें।" "क्योंकि ऐसे दोष करना सभ्यता नहीं है। ऐसे लोगों के प्रति समाज की श्रद्धा समाप्त हो जाती है। और यदि यह दोष लंबे समय तक चलता रहे, तो समाज के बुद्धिमान लोग, उन दुष्टों को समाज से उखाड़ भी फेंकते हैं।"
"अतः जो लोग अपना भविष्य और अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा अच्छी बनाए रखना चाहते हैं, तो उनसे निवेदन है, कि वे घड़ी अवश्य देखें, और समय का पालन भी करें। किसी भी परिस्थिति में आलसी न बनें।"
"स्मरण रहे, समय का पालन करना जीवन में सफल होने का सबसे पहला सूत्र है।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

15.5.2026         कुछ लोग बड़ी-बड़ी इच्छाएं करते हैं, बड़ी-बड़ी योजनाएं मन में रखते हैं। उनकी महत्वाकांक्षा बहुत अधिक हो...
15/05/2026

15.5.2026
कुछ लोग बड़ी-बड़ी इच्छाएं करते हैं, बड़ी-बड़ी योजनाएं मन में रखते हैं। उनकी महत्वाकांक्षा बहुत अधिक होती है। परंतु वे लोग यह भूल जाते हैं कि "हमारा सामर्थ्य शक्ति इतना नहीं है, कि हम इन इच्छाओं को पूर्ण कर सकें।" ऐसे लोग धीरे-धीरे डिप्रेशन में चले जाते हैं, और अपना बहुमूल्य जीवन खो देते हैं। ऐसी भूल नहीं करनी चाहिए।
"कोई भी योजना बनाने से पहले, कोई भी इच्छा उत्पन्न करने से पहले अपनी योग्यता और क्षमता का परीक्षण करना चाहिए, कि मुझ में कितनी योग्यता और क्षमता है? उसके अनुसार ही व्यक्ति को इच्छाएं और योजनाएं बनानी चाहिएं।यदि वह ऐसा करेगा, तो वह दुखी परेशान नहीं होगा, डिप्रेशन में नहीं जाएगा। और अपनी सभी इच्छाओं को पूरा करने में और योजनाओं को पूरा करने में वह सफल होगा। इस प्रकार से उसको जीवन में सफलता मिलेगी और उसका आनन्द बढ़ेगा।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

14.5.2026          संसार में कुछ बातें सच्ची होती हैं और कुछ झूठी। "जो घटनाएं आप आंख से देखते हैं, उनमें अधिकांश सच्ची ह...
14/05/2026

14.5.2026
संसार में कुछ बातें सच्ची होती हैं और कुछ झूठी। "जो घटनाएं आप आंख से देखते हैं, उनमें अधिकांश सच्ची होती हैं। परंतु यदि कोई व्यक्ति लापरवाही करे, तो आंख से देखकर भी उसे भ्रांति हो जाती है।"
इसी प्रकार से कान से सुनी हुई बातें भी सच्ची झूठी होती हैं। उन बातों के विषय में तो बहुत अधिक परीक्षा करनी पड़ती है, तभी सत्य और झूठ का पता चलता है।
जहां जहां आप कुछ घटनाएं अपनी आंख से स्वयं देख लेते हैं, वहां बहुत सी बातें या घटनाएं सच्ची होती हैं। परंतु वहां भी सावधान रहें, कि कहीं लापरवाही से देखने पर आपको भ्रांति न हो जाए। "जैसे सड़क पर एक लड़का और एक लड़की जा रहे हों। तो उन्हें देख कर लोगों को प्रायः भ्रांति हो जाती है, कि ये जो लड़का लड़की जा रहे हैं, इनका आपस में क्या संबंध है? वे प्रेमी भी हो सकते हैं। सगे भाई बहन भी हो सकते हैं, अथवा बहन कोई चाचा की मामा की बेटी भी हो सकती है। इसलिए आंख से देखकर भी बहुत सावधानी का प्रयोग करना चाहिए।"
और जो बातें आप कान से सुनते हैं, उनमें तो बहुत ही अधिक सावधानी रखनी चाहिए। क्योंकि उनमें बहुत सी बातें झूठी होती हैं। "लोग जोश में आकर बढ़ा चढ़ा कर नमक मसाला लगाकर बातें सुनाते हैं। इसलिए उन सुनी हुई बातों की वास्तविकता कुछ और होती है, और जब तक वे बातें आप तक पहुंचती हैं, तब तक वे कुछ और ही हो जाती हैं।"
"इसलिए जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में आपको कोई बात सुनाए, तो उसे यूं ही बिना परीक्षा किए न मान लें। उसकी पूरी परीक्षा करें। और उन बातों पर ही अधिक विश्वास करें, जो घटनाएं उस व्यक्ति के संबंध में आपने स्वयं देखी हों।" "तभी आप भ्रांतियों से बच पाएंगे। झूठी बातों को मानकर होने वाली हानियों से बच पाएंगे, और गुणवान व्यक्तियों से ठीक-ठीक लाभ ले पाएंगे।"
"यदि आपने बिना परीक्षा किए किसी व्यक्ति की बातों पर विश्वास कर लिया, तो जिसके संबंध में आपने बातें सुनीं, उसके विषय में आपको भ्रांति हो सकती है। और हो सकता है आप उससे अपना संबंध भी तोड़ दें। तब उस अच्छे व्यक्ति से जो जीवन भर आपको लाभ मिल सकता था, हो सकता है आप उसे भी खो दें। इसलिए ऐसा न करें। सब काम सावधानी से करें।"
"यदि आप इन कार्यों में सावधानी का प्रयोग करेंगे, तो अच्छे लोगों के साथ आपके संबंध जीवन भर सच्चे और मधुर बने रहेंगे, तथा आप उनसे बहुत सा लाभ ले पाएंगे।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

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