23/05/2026
पंडित जे०पी० चौधरी जी की विद्वता का नमूना-
•एक समय काशी के ब्राह्मणों द्वारा एक अभियान चलाया गया था "अछूतों का मंदिर प्रवेश निषेध।" यह कैंपेन फॉरेस्ट फायर में बदल गया। पौराणिकों ने अछूतों को गिरा-गुजरा सिद्ध करने के लिए पुस्तकें लिखीं। पूरे भारत में यह व्यवस्था लागू हो गई। इस व्यवस्था के अग्रदूत काशी के ही 83 पौराणिक पंडितों की पलटन थी।
उन दिनों पंडित जे०पी० चौधरी इकलौते ऐसे विद्वान् थे जिन्होंने इस विषय पर एक छोटी सी पुस्तिका "हरिजनों का मंदिर प्रवेश शास्त्र-सम्मत है" लिखते हुए उसपर 5000₹ का चैलेंज रखा। इसमें उन 83 विद्वानों की नामावली भी दर्ज की। यह पुस्तिका "हिंदू सभा काशी" से प्रकाशित हुई। अंततः पूरे भारत में उसके खंडन में एक किताब कोई पौराणिक न लिख पाया। सबने घुटने टेक दिए। पंडित जी ने इसमें अछूत, हरिजन, निषाद आदि सभी को मंदिर में प्रवेश का अधिकार वेदादि शास्त्रों से सिद्ध किया।
उल्लेखनीय है कि अथर्ववेद के एक पाठ "अप्राण कौशिक सूत्र" का जिक्र सायण आदि भाष्य में आया है। आर्यजगत में यह पाठ कभी उपलब्ध नहीं था। चौधरी जी को इसकी दुर्लभ प्रति किसी पुस्तकालय में मिली थी। उन्होंने इसे अपने सहयोगी से एक कॉपी पर हूबहू लिखवा लिया था ताकि इसे पुनः प्रकाशित कराकर आर्यजनता के लिए उपलब्ध कराया जा सके। सार्वदेशिक पत्रिका में इसे छापने की अपील भी छपी। कोई आर्य महानुभाव सहयोग हेतु आगे न आया और आज हम सभी उस सूत्र पाठ से वंचित रह गए हैं।
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पंडित जे०पी० चौधरीजी के जीवन-दर्शन से यह बात सामने आती है कि कैसे एक पौराणिक परिवार में जन्मा बालक तथाकथित ब्राह्मण समाज से अकेले लोहा लेकर विद्वत्ता के बल पर ब्राह्मणत्व को प्राप्त करता है और शूद्र जाति के लिए शास्त्रीय शिक्षा का द्वार खोलता है। चौधरी जी ने अनेक ट्रैक्ट्स लिखे। सैकड़ों शास्त्रार्थ किए और कभी पराजित नहीं हुए। सौभाग्य से पंडित जी के लगभग सभी साहित्य मेरे संग्रह में हैं। साथ ही उनके लेख, शास्त्रार्थ और हस्तलिखित पत्र की फोटो भी मेरे पास मौजूद हैं। मैं इन सबको प्रकाशित कराना चाहता हूं। मगर दुर्भाग्य है कि अब आर्यसमाज में पाठकों की रुचि आलस्य को प्राप्त हो चुकी है।
-प्रियांशु सेठ