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7.10.2026        समाज को सुखी बनाने के लिए योग दर्शन में एक उपाय बताया है, कि "अपनी आवश्यकता से अधिक सामान इकट्ठा न करें...
07/10/2026

7.10.2026
समाज को सुखी बनाने के लिए योग दर्शन में एक उपाय बताया है, कि "अपनी आवश्यकता से अधिक सामान इकट्ठा न करें। चाहे धन संपत्ति हो, चाहे कपड़े हों, जूते चप्पल हों, बर्तन हों, बिस्तर हों, कोई भी समान हो, अपनी आवश्यकता से अधिक संग्रह न करें।" योग दर्शन में इसे 'अपरिग्रह' के नाम से कहा जाता है।
इससे दो लाभ होंगे। "एक तो व्यक्ति को अधिक धन कमाना और खर्च नहीं करना पड़ेगा।" "दूसरा जब वह अपनी आवश्यकता तक ही वस्तुएं रखेगा, तो उन लोगों को भी वस्तुएं मिल सकेंगी जिनको सामान्य वस्तु रूप से वस्तुओं की कमी रहती है।" अर्थात समाज में देश में वस्तुओं की कमी नहीं रहेगी, सबको वस्तुएं प्रयोग करने के लिए मिल जाएंगी। "इससे व्यक्ति भी सुखी रहेगा, व्यर्थ के तनाव से बचेगा और समाज को भी सब वस्तुओं की आपूर्ति होती रहेगी। सबका जीवन सुखमय बनेगा।"
इसके साथ-साथ अपरिग्रह के अंतर्गत दूसरी बात विचारों की है। "व्यर्थ के विचार या हानिकारक विचार भी मन में संग्रहीत न करें।"
आज हम देखते हैं, "व्यक्ति व्यर्थ की बातों पर बहुत समय खर्च करते हैं। व्यापार जनसंख्या भुखमरी बेरोजगारी राजनीति इत्यादि ऐसे विषयों पर बहुत चर्चाएं और समय नष्ट करते हैं, जिनमें वे कुछ भी परिवर्तन नहीं ला सकते। इससे व्यक्ति का समय नष्ट होता है उसका तनाव बढ़ता है और व्यर्थ ही मन में अशांति उत्पन्न होती है।"
"यदि आप इन समस्याओं से छूटना चाहते हों, तो अपने काम से संबंधित विचार करें। उस पर अधिक ध्यान दें। अपनी आध्यात्मिक भौतिक शारीरिक उन्नति करें, और प्रसन्न रहें।"
देश की समस्याओं पर चिंतन करना उनके समाधान ढूंढना और उनको देश में लागू करना, जिन लोगों के क्षेत्र का यह कार्य है, इस कार्य को वे लोग कर लेंगे, उन्हें करने दीजिए। "इन बातों पर फालतू विचार करके आप अपना तनाव मत बढ़ाइए। क्योंकि आप इन क्षेत्रों में कोई परिवर्तन सुधार आदि कर नहीं सकते। न आपके पास इतनी संपत्ति है, ना सत्ता है, न अधिकार है। न शक्ति सामर्थ्य है।" "इसलिए अपने काम से काम रखें। भगवान का भजन करें। यथाशक्ति समाज की सेवा करें, और प्रसन्न रहें। यही तरीका है ठीक ढंग से जीवन जीने का।"

---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

6.10.2026          "यदि किसी के जीवन में कष्ट आए और वह उसका अनुभव करे, तो इसका अर्थ है कि वह व्यक्ति जीवित है।"         ...
06/10/2026

6.10.2026
"यदि किसी के जीवन में कष्ट आए और वह उसका अनुभव करे, तो इसका अर्थ है कि वह व्यक्ति जीवित है।"
यदि उसे कोई कष्ट नहीं हो रहा। तो इसका अर्थ है कि वह मर चुका है। जैसे शव होता है। "शव को कोई कष्ट नहीं होता। उसे काट डालो अग्नि में जला दो कुछ भी कर लो, उसे कोई अनुभूति नहीं होती। जब किसी व्यक्ति की ऐसी स्थिति हो जाए, तो लोग समझ जाते हैं, कि यह व्यक्ति मर चुका है।"
लेकिन किसी को थोड़ी भी सुई चुभोई जाए, और उसे कष्ट होता है, तो इसका अर्थ है कि वह जीवित है।
"यदि किसी व्यक्ति को कष्ट दिया जाए और उसे देखकर आपको कष्ट होता है, आप उसके कष्ट को समझते हैं, और मन में सोचते हैं कि "यह तो बहुत अन्याय हो रहा है, ऐसा नहीं होना चाहिए।" तो इसका अर्थ है कि आप मननशील हैं, आप 'मनुष्य' हैं।"
"और यदि आप दूसरे लोगों का कष्ट समझ कर उस कष्ट को दूर करने का पुरुषार्थ भी करते हैं, फिर तो आप 'देवता' ही हैं।"
"अतः यदि आप जीवित व्यक्ति से 'मनुष्य' बनें, और मनुष्य से ऊपर उठकर 'देवता' बनने का प्रयत्न करें, तो ही आप का मनुष्य जीवन सार्थक है, अन्यथा नहीं।"

---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

5.10.2026          "प्रतिदिन सुबह सूर्य उदय होता है। उसका जैसा स्वभाव है उसके अनुसार वह अपना प्रकाश फैलाता है, चमकता है।...
05/10/2026

5.10.2026
"प्रतिदिन सुबह सूर्य उदय होता है। उसका जैसा स्वभाव है उसके अनुसार वह अपना प्रकाश फैलाता है, चमकता है। सबको सुख देता है। कोई दिखावा नहीं करता। बल्कि स्वाभाविक रूप से अपना काम करता है।"
"सूर्य तो पहले से ही परफेक्ट है। परंतु आप पहले से परफेक्ट नहीं हैं।" "इसलिए आप परफेक्ट होने की कोशिश अवश्य करें। फिर भी सूर्य से इतना अवश्य सीखें, कि "जीवन में दिखावा करना सुखदायक नहीं है। स्वाभाविक जीवन जीना चाहिए। क्योंकि उसमें आनन्द है। दिखावे में आनन्द नहीं है।"
"जैसे सूर्य दिखावा नहीं करता, स्वाभाविक रूप से अपना कार्य करता है, और सबको सुख देता है। ऐसे ही आप भी दिखावा न करें, अपना कार्य स्वाभाविक रूप से करें, और सूर्य के समान सबको सुख देवें।"
"आजकल दिखावे का ज़माना तो है, परंतु दिखावा करके भी लोग सुखी नहीं हैं। क्योंकि सुख या आनन्द तो स्वाभाविक जीवन जीने में ही है।"

---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़ गुजरात।"

4.10.2026          "यदि आप किसी क्षेत्र में विशेष परिश्रम करते हैं, अच्छी आदतें अपनाते हैं, ईमानदारी और बुद्धिमत्ता से क...
04/10/2026

4.10.2026
"यदि आप किसी क्षेत्र में विशेष परिश्रम करते हैं, अच्छी आदतें अपनाते हैं, ईमानदारी और बुद्धिमत्ता से काम करते हैं, और आप उस क्षेत्र में सफल हो जाते हैं, तो आपको जो यह सफलता मिली, यह आपकी अच्छी आदतों ईमानदारी तथा बुद्धिमत्ता से किए गए पुरुषार्थ का ही फल है। कोई चमत्कार नहीं है। अथवा इसमें कोई और छुपा हुआ रहस्य नहीं है।"
"अतः किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए अपना कार्य पूरी ईमानदारी, बुद्धिमत्ता एवं पुरुषार्थ से करें। सफलता प्राप्त करने का यही रहस्य है।"

--- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़ गुजरात।"

3.10.2026         "जैसे ठंडा लोहा कठोर होता है वह जल्दी से इधर-उधर नहीं मुड़ता। ऐसे ही जब व्यक्ति का मस्तिष्क ठंडा होता ...
03/10/2026

3.10.2026
"जैसे ठंडा लोहा कठोर होता है वह जल्दी से इधर-उधर नहीं मुड़ता। ऐसे ही जब व्यक्ति का मस्तिष्क ठंडा होता है, तो वह इधर-उधर नहीं भटकता, बल्कि शांति से सही निर्णय लेता है।"
"और जब लोहा गर्म होता है तब वह नरम हो जाता है, और तब उसे किसी भी दिशा में आसानी से मोड़ा जा सकता है।"
"ठीक इसी प्रकार से जब व्यक्ति का दिमाग भी गर्म होता है, अर्थात जब वह गुस्से में होता है, तब उसकी निर्णय शक्ति घट जाती है। और उसके दिमाग को इधर-उधर मोड़ना सरल होता है। ऐसी स्थिति में कोई भी चालाक व्यक्ति उस व्यक्ति को भटका सकता है, जिसका दिमाग गर्म हो। अर्थात जो गुस्से में हो।"
"अतः भटकने से बचने के लिए गुस्सा करने से बचें। अपने मन को शांत रखें। तब आपको दूसरे लोग नहीं भटका पाएंगे।"

---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

2.10.2026          शब्द पैसों से नहीं खरीदे जाते। इसलिए उनका प्रयोग करते समय भी कोई धन खर्च नहीं होता। "शब्दों का सदुपयो...
02/10/2026

2.10.2026
शब्द पैसों से नहीं खरीदे जाते। इसलिए उनका प्रयोग करते समय भी कोई धन खर्च नहीं होता। "शब्दों का सदुपयोग भी किया जा सकता है, और दुरुपयोग भी।"
"जो लोग क्रोधी स्वभाव के होते हैं, वे प्रायः शब्दों का दुरुपयोग करते हैं। और अनेक बार उन्हें यह दुरुपयोग बहुत महंगा भी पड़ता है। बदले में बहुत सी डांट या मार भी खानी पड़ जाती है।"
"और जो लोग बुद्धिमान जितेन्द्रिय संयमी सदाचारी तथा विनम्र होते हैं, वे शब्दों का प्रयोग बहुत संयम से करते हैं। इन शब्दों का सदुपयोग करते हुए, बिना कुछ धन खर्च किए, मुफ्त में शब्द प्रयोग करते हुए, दूसरों के हृदय तक को छू लेते हैं। ऐसी स्थिति में कभी कभी कुछ लोग उन्हें बहुत सुंदर पुरस्कारों से सम्मानित भी करते हैं।"
"अतः शब्दों का सदुपयोग करें। बहुत ही सोच समझकर बोलें। दूसरों को प्रसन्न कर वाले या उनके हृदय को छू लेने वाले शब्दों का प्रयोग करें।"

---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

1.10.2026       ईश्वर की वाणी यजुर्वेद में कहा है कि "यजमान के पशुओं की रक्षा करें."         जो भी अच्छे काम करता है, वह...
01/10/2026

1.10.2026
ईश्वर की वाणी यजुर्वेद में कहा है कि "यजमान के पशुओं की रक्षा करें."
जो भी अच्छे काम करता है, वह हर व्यक्ति यजमान है। "जो यजमान है, वह सुख चाहता है। यदि वह अच्छे काम करेगा, तो ईश्वर उसे सुख देगा। यदि वह बुरे काम करेगा, तो ईश्वर उसे दंड देगा।"
"अब पशुओं को सताना मारना उन्हें खा जाना, यह तो भारी पाप है।" "क्योंकि वेदों में ईश्वर ने मना किया है, कि प्राणियों को मत मारो। वे भी संसार में आवश्यक हैं।" "मनुष्यों की सहायता से गौ घोड़ा गधा बकरी कुत्ता आदि अन्य प्राणी अपना जीवन चलाते हैं। और ऐसे ही अनेक प्राणियों की सहायता से मनुष्यों का जीवन ठीक-ठाक चलता है। ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, अतः ये दोनों एक दूसरे की रक्षा करें। यदि कोई किसी को न मारे, कोई किसी को दुख न दे, तो ईश्वर सबको सुख देगा।"
"इसलिए पशु पक्षियों की रक्षा करें।" "यह ईश्वर का आदेश है। इसका पूरी तरह से पालन करना चाहिए। तभी सबका कल्याण होगा।"

---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

30.9.2026        यदि "धन संपत्ति और वेदों की उत्तम विद्या" इन दोनों की तुलना की जाए, कि "दोनों में से कौन बड़ा है? तो शा...
30/09/2026

30.9.2026
यदि "धन संपत्ति और वेदों की उत्तम विद्या" इन दोनों की तुलना की जाए, कि "दोनों में से कौन बड़ा है? तो शायद आप समझ ही गए होंगे, कि धन संपत्ति से विद्या का मूल्य अधिक है।"
परंतु आजकल संसार में लोगों का चिंतन इससे उल्टा ही है। "लोग धनवान व्यक्ति को बड़ा समझते हैं, और वेदों के विद्वान तथा उत्तम आचरण वाले व्यक्ति को धनवान से छोटा समझते हैं। यह समझ उल्टी है।" "इस उल्टी समझ को उल्टा करके सीधा करें।" और यह समझें कि "जिसके पास धन संपत्ति भले ही अधिक हो, परंतु उसके पास यदि वेदों का शुद्ध ज्ञान नहीं है, और उसका आचरण भी वेदानुकूल नहीं है, तो वह छोटा व्यक्ति है।"
और इसके विपरीत, "जिसके पास वेदों का शुद्ध ज्ञान है, उसका आचरण भी वेदों के अनुकूल है। जो ईश्वर को साक्षी मानकर वेदोक्त उत्तम कर्म करता है, वही व्यक्ति संसार में सबसे बड़ा संपत्तिशाली है। हम सबको उसी का अनुकरण करना चाहिए। वह उस वैदिक ज्ञान और उत्तम आचरण के कारण सुखी है। उसका यह जीवन भी अच्छा है और उसका आगे भविष्य भी बहुत अच्छा है।"

---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़ गुजरात।"

29.9.2026        व्यक्ति खाली तो बैठता नहीं। मन में सारा दिन कुछ न कुछ सोचता ही रहता है, विचार करता रहता है। तो क्या विच...
29/09/2026

29.9.2026
व्यक्ति खाली तो बैठता नहीं। मन में सारा दिन कुछ न कुछ सोचता ही रहता है, विचार करता रहता है। तो क्या विचार करता है? "यही संसार की बातें खाना-पीना कपड़े फैशन सोना चांदी शॉपिंग इत्यादि। और भी अनेक प्रकार के शौक पूरे करने के लिए संसार की बातें ही सोचता है।"
"परंतु सांसारिक बातें सोचने से और वैसी योजनाएं बनाने से, उस के मन में चिंता तनाव राग द्वेष ईर्ष्या अभिमान आदि दोष उत्पन्न होते रहते हैं, और व्यक्ति मानसिक रूप से सूक्ष्म स्तर पर हर समय दुखी रहता है।"
यदि इस समस्या से बचना हो तो इसका समाधान है, कि "ईश्वर को अपने आसपास अपने अंदर बाहर आगे पीछे ऊपर नीचे सब जगह उपस्थित स्वीकार करें।"
मोटा उदाहरण है, कि "जैसे वायु हमारे अंदर बाहर सब जगह उपस्थित है। ऐसे ही ईश्वर भी हमारे अंदर बाहर सब जगह उपस्थित है। ऐसा बार-बार चिंतन करें। ऐसा सोचने से आपको कोई चिंता तनाव ईर्ष्या द्वेष खिन्नता भय आदि दोष नहीं सताएंगे, और ईश्वर चिंतन करने से आप स्वयं को सुखी तनावमुक्त राग द्वेष रहित और आनन्दित अनुभव करेंगे।"

--- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़ गुजरात।"

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