Sri Sri Sidheshwari Tara Mandir Foundation

Sri Sri Sidheshwari Tara Mandir Foundation Sri Sri Sidheswari Tara Mandir. Darshan Timings
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22/08/2026

এই বিশ্বমাঝারে তুমি একমাত্র সত্য।
Sri Sri Sidheshwari Tara Mandir Foundation Swami Kailashanand Giri ji Shri Mahant Dr. Ravindra Puri Lord of the Universe Tarapith - তারাপীঠ Krishno Kali Bari

নমস্তে আস্তিকমাতা তক্ষকের জননী।নমস্তে দেবী জরৎকারু রমণী ||নমস্তে বিষহরি সর্বদুঃখ নাশিনী।নমস্তে জগৎমাতা ভবভয় নাশিনী ||নমস...
18/08/2026

নমস্তে আস্তিকমাতা তক্ষকের জননী।
নমস্তে দেবী জরৎকারু রমণী ||
নমস্তে বিষহরি সর্বদুঃখ নাশিনী।
নমস্তে জগৎমাতা ভবভয় নাশিনী ||
নমস্তে পাতালরূপা পুষ্পবনবাসিনী।
নমস্তে অখিলরূপা রবিসুততাপিনী ||
নমোনমঃ নাগরূপা নাগবংশ রক্ষিণী |
নমোনমঃ ভগবতী হরগৌরী মোহিনী ||
নমস্তে মনসা দেবী সর্বশঙ্কানাশিনী |
নমোনমঃ জগৎমাতা সর্বসিদ্ধিদায়িনী ||
তুমি সূক্ষ্ম তুমি মোক্ষ তুমি বিশ্বজননী |
তুমি জল তুমি স্থল চরাচরবন্দিনী ||
সৃষ্টি স্থিতি প্রলয় তুমি, তুমি মূলধারিণী ||

(চাঁদ সওদাগর কৃত আদ্যাশক্তি মনসা দেবী স্তোত্র)

#মনসা #মামনসা #মনসাদেবী #পদ্মা #মনসাপূজা
Sri Sri Sidheshwari Tara Mandir Foundation Swami Kailashanand Giri ji Shri Mahant Dr. Ravindra Puri Lord of the Universe

শয়ন একাদশী (দেবশয়নী একাদশী / পদ্মা একাদশী)শয়ন একাদশী, যা দেবশয়নী একাদশী, হরিশয়নী একাদশী, পদ্মা একাদশী এবং আষাঢ়ী এক...
25/07/2026

শয়ন একাদশী (দেবশয়নী একাদশী / পদ্মা একাদশী)

শয়ন একাদশী, যা দেবশয়নী একাদশী, হরিশয়নী একাদশী, পদ্মা একাদশী এবং আষাঢ়ী একাদশী নামেও পরিচিত, আষাঢ় মাসের শুক্লপক্ষের একাদশী তিথিতে পালিত হয়। বৈষ্ণব শাস্ত্র অনুসারে এই তিথিতে ভগবান শ্রীবিষ্ণু ক্ষীরসাগরে অনন্তনাগের শয্যায় যোগনিদ্রায় প্রবেশ করেন। এই তিথি থেকেই চাতুর্মাস্য ব্রত-এর সূচনা হয় এবং কার্তিক মাসের শুক্লপক্ষের একাদশী, অর্থাৎ প্রবোধিনী একাদশী পর্যন্ত এই ব্রত পালন করা হয়।
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শাস্ত্রীয় নামসমূহ

শয়ন একাদশী

দেবশয়নী একাদশী

হরিশয়নী একাদশী

পদ্মা একাদশী

আষাঢ়ী একাদশী

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প্রধান শাস্ত্রীয় উৎস

১. ভবিষ্যোত্তর পুরাণ

শয়ন একাদশীর মাহাত্ম্য ভবিষ্যোত্তর পুরাণে শ্রীকৃষ্ণ ও মহারাজ যুধিষ্ঠিরের সংলাপের মাধ্যমে বর্ণিত হয়েছে। সেখানে ভগবান শ্রীকৃষ্ণ বলেন যে, আষাঢ় মাসের শুক্ল একাদশী সর্বপাপহরিণী, সর্বকামপ্রদায়িনী এবং ভক্তকে বিষ্ণুলোকে প্রতিষ্ঠিত করে। এই তিথি থেকেই চাতুর্মাস্য ব্রতের সূচনা হয়।
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২. পদ্ম পুরাণ (উত্তরখণ্ড)

পদ্ম পুরাণের উত্তরখণ্ডে একাদশী ব্রতের মাহাত্ম্য বিশেষভাবে বর্ণিত হয়েছে। ভগবান শ্রীহরি ঘোষণা করেন যে, একাদশী তাঁর অতি প্রিয় তিথি। এই দিনে উপবাস, রাত্রিজাগরণ, হরিনাম-সংকীর্তন, শাস্ত্রপাঠ ও বিষ্ণুপূজা অক্ষয় পুণ্যদায়ক।
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৩. স্কন্দ পুরাণ (বৈষ্ণব খণ্ড)

স্কন্দ পুরাণের বৈষ্ণব খণ্ডে শয়ন একাদশীকে চাতুর্মাস্যের সূচনাদিবস বলা হয়েছে। এই সময়ে ভক্তদের জপ, তপ, দান, ব্রহ্মচর্য, নিরামিষ আহার ও সংযম পালন করার নির্দেশ দেওয়া হয়েছে।
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৪. বিষ্ণু পুরাণ

বিষ্ণু পুরাণে ভগবান শ্রীবিষ্ণুর যোগনিদ্রার বর্ণনা পাওয়া যায়। ক্ষীরসমুদ্রে অনন্তনাগের শয্যায় ভগবানের শয়ন বিশ্বচক্রের এক গভীর আধ্যাত্মিক প্রতীক। এটি সৃষ্টির অন্তর্লীন অবস্থা ও ঈশ্বরের লীলাময় বিশ্রামের রূপক।
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৫. হরিভক্তিবিলাস

শ্রীল সনাতন গোস্বামী প্রণীত হরিভক্তিবিলাসে একাদশী ব্রতের বিস্তারিত বিধান বর্ণিত হয়েছে। সেখানে উপবাস, জাগরণ, তুলসীপত্র নিবেদন, বিষ্ণুনাম জপ এবং দ্বাদশীতে যথাবিধি পারণের নির্দেশ দেওয়া হয়েছে।
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সংস্কৃত শ্লোক (বাংলা লিপিতে)

> শেষে শয়ানং দেবেশং ক্ষীরোদার্ণবমধ্যগম্।
আষাঢ়শুক্লৈকাদশ্যাং পূজয়েদ্ ভক্তিতৎপরঃ॥
বাংলা অর্থ :
আষাঢ় মাসের শুক্ল একাদশীতে ক্ষীরসমুদ্রস্থিত অনন্তশয্যায় শয়নরত দেবেশ ভগবান শ্রীবিষ্ণুর ভক্তিভরে পূজা করা উচিত।
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> একাদশ্যাং নিরাহারঃ বিষ্ণুভক্তিপরায়ণঃ।
সর্বপাপবিনির্মুক্তো বিষ্ণুলোকং স গচ্ছতি॥

বাংলা অর্থ :
যিনি একাদশী তিথিতে উপবাস পালন করে ভগবান শ্রীবিষ্ণুর ভক্তিতে নিবিষ্ট থাকেন, তিনি সর্বপ্রকার পাপ থেকে মুক্ত হয়ে বিষ্ণুলোকে গমন করেন।
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চাতুর্মাস্যের তাৎপর্য

শয়ন একাদশী থেকে প্রবোধিনী একাদশী পর্যন্ত চার মাসকে চাতুর্মাস্য বলা হয়। এই সময় ভগবান শ্রীবিষ্ণু যোগনিদ্রায় অবস্থান করেন বলে শাস্ত্রে বর্ণিত হয়েছে। এই চার মাসে—

শ্রীবিষ্ণুর বিশেষ উপাসনা।

জপ, তপ ও ধ্যান।

দান ও সেবাকর্ম।

নিরামিষ ও সাত্ত্বিক আহার।

ইন্দ্রিয়সংযম ও ব্রত পালন।
এই সকল সাধনা অত্যন্ত ফলপ্রদ এবং মোক্ষদায়ক বলে শাস্ত্রে প্রশংসিত হয়েছে।
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শয়ন একাদশী ব্রত পালনের বিধান

ব্রহ্মমুহূর্তে জাগ্রত হয়ে পবিত্র স্নান করা।

শ্রীবিষ্ণু, শ্রীলক্ষ্মীদেবী ও শালগ্রাম শিলার পূজা করা।

তুলসীপত্র নিবেদন করা।

"ওঁ নমো নারায়ণায়" অথবা "ওঁ নমো ভগবতে বাসুদেবায়" মন্ত্র জপ করা।

উপবাস অথবা ফলাহার পালন করা।

সারাদিন হরিনাম, শ্রীমদ্ভগবদ্গীতা, শ্রীমদ্ভাগবত এবং বিষ্ণু সহস্রনাম পাঠ করা।

রাত্রিতে জাগরণ ও হরিনাম-সংকীর্তন করা।

দ্বাদশী তিথিতে শাস্ত্রবিধি অনুসারে পারণ করা এবং ব্রাহ্মণ, বৈষ্ণব অথবা অভাবগ্রস্ত ব্যক্তিকে অন্নদান করা।
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শাস্ত্রে উল্লিখিত ফল

শাস্ত্রানুসারে শয়ন একাদশী ব্রত পালনের ফলে—

মহাপাপের বিনাশ হয়।

ভগবান শ্রীবিষ্ণুর কৃপা লাভ হয়।

চাতুর্মাস্য ব্রতের পূর্ণ ফল লাভ হয়।

ভক্তি, বৈরাগ্য ও আত্মসংযম বৃদ্ধি পায়।

সংসার-বন্ধন শিথিল হয়।

অন্তিমকালে বিষ্ণুলোক প্রাপ্তির যোগ্যতা অর্জিত হয়।

শয়ন একাদশী কেবল একটি উপবাসের দিন নয়; এটি ভক্তি, সংযম, আত্মশুদ্ধি এবং চাতুর্মাস্য সাধনার সূচনাতিথি। পুরাণ, স্মৃতি এবং বৈষ্ণব আচার্যগণের বাণীতে এই একাদশীর মাহাত্ম্য বিশেষভাবে প্রশংসিত হয়েছে। ভগবান শ্রীবিষ্ণুর যোগনিদ্রার এই দিবস ভক্তকে বাহ্যিক আচার থেকে অন্তর্মুখী সাধনার পথে পরিচালিত করে। অতএব, শাস্ত্রসম্মতভাবে শয়ন একাদশী পালন করলে ভক্ত ভগবানের কৃপা, চিত্তশুদ্ধি এবং পরম কল্যাণ লাভ করেন।

शयन एकादशी (देवशयनी एकादशी / पद्मा एकादशी)

शयन एकादशी, जिसे देवशयनी एकादशी, हरिशयनी एकादशी, पद्मा एकादशी तथा आषाढ़ी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। वैष्णव शास्त्रों के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीविष्णु क्षीरसागर में अनन्त शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में प्रविष्ट होते हैं। इसी तिथि से चातुर्मास्य व्रत का आरम्भ होता है, जो कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी (प्रबोधिनी एकादशी) तक चलता है।

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शास्त्रीय नाम

शयन एकादशी

देवशयनी एकादशी

हरिशयनी एकादशी

पद्मा एकादशी

आषाढ़ी एकादशी

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मुख्य शास्त्रीय स्रोत

१. भविष्योत्तर पुराण

शयन एकादशी की महिमा भविष्योत्तर पुराण में भगवान श्रीकृष्ण और महाराज युधिष्ठिर के संवाद के माध्यम से वर्णित है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली, सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली तथा भक्त को विष्णुलोक प्रदान करने वाली है। इसी दिन से चातुर्मास्य व्रत का आरम्भ माना गया है।

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२. पद्म पुराण (उत्तरखण्ड)

पद्म पुराण के उत्तरखण्ड में एकादशी व्रत की महिमा का विशेष वर्णन मिलता है। भगवान श्रीहरि स्वयं कहते हैं कि एकादशी उनकी अत्यन्त प्रिय तिथि है। इस दिन उपवास, रात्रि-जागरण, हरिनाम-संकीर्तन, शास्त्र-पाठ तथा विष्णु-पूजन अक्षय पुण्य प्रदान करने वाले माने गए हैं।

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३. स्कन्द पुराण (वैष्णव खण्ड)

स्कन्द पुराण के वैष्णव खण्ड में शयन एकादशी को चातुर्मास्य का प्रारम्भ दिवस कहा गया है। इस अवधि में जप, तप, दान, ब्रह्मचर्य, सात्त्विक आहार तथा इन्द्रिय-संयम का विशेष विधान बताया गया है।

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४. विष्णु पुराण

विष्णु पुराण में भगवान श्रीविष्णु की योगनिद्रा का वर्णन मिलता है। क्षीरसागर में अनन्त शेष की शय्या पर भगवान का शयन सृष्टि के अन्तर्निहित रहस्य तथा ईश्वर की दिव्य लीला का प्रतीक माना गया है।

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५. हरिभक्ति-विलास

श्रील सनातन गोस्वामी द्वारा रचित हरिभक्ति-विलास में एकादशी व्रत की विस्तृत विधि दी गई है। इसमें उपवास, रात्रि-जागरण, तुलसी-दल अर्पण, विष्णु-नाम जप तथा द्वादशी को विधिपूर्वक पारण करने का निर्देश मिलता है।

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संस्कृत श्लोक (देवनागरी)

> शेषे शयानं देवेशं क्षीरोदार्णवमध्यगम्।
आषाढशुक्लैकादश्यां पूजयेद् भक्तितत्परः॥

हिंदी अर्थ :
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन क्षीरसागर में अनन्त शेष की शय्या पर विराजमान भगवान श्रीविष्णु की श्रद्धा एवं भक्ति से पूजा करनी चाहिए।

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> एकादश्यां निराहारः विष्णुभक्तिपरायणः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति॥

हिंदी अर्थ :
जो व्यक्ति एकादशी के दिन उपवास रखकर भगवान श्रीविष्णु की भक्ति में लीन रहता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त होता है।

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चातुर्मास्य का महत्व

शयन एकादशी से लेकर प्रबोधिनी एकादशी तक के चार महीनों को चातुर्मास्य कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस अवधि में भगवान श्रीविष्णु योगनिद्रा में रहते हैं। इन चार महीनों में—

भगवान श्रीविष्णु की विशेष उपासना।

जप, तप एवं ध्यान।

दान तथा सेवा।

सात्त्विक एवं निरामिष आहार।

इन्द्रिय-संयम एवं व्रत-पालन।

इन सभी साधनाओं को अत्यन्त फलदायक एवं मोक्षप्रद कहा गया है।

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शयन एकादशी व्रत-विधि

ब्रह्ममुहूर्त में जागकर पवित्र स्नान करें।

भगवान श्रीविष्णु, माता लक्ष्मी तथा शालग्राम शिला का पूजन करें।

तुलसी-दल अर्पित करें।

"ॐ नमो नारायणाय" अथवा "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जप करें।

उपवास अथवा फलाहार करें।

दिनभर हरिनाम-संकीर्तन, श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत तथा विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।

रात्रि में जागरण एवं हरिनाम-संकीर्तन करें।

द्वादशी तिथि में शास्त्र-विधि के अनुसार पारण करें तथा ब्राह्मण, वैष्णव अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को अन्नदान करें।

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शास्त्रों में वर्णित फल

शास्त्रों के अनुसार शयन एकादशी व्रत के पालन से—

महापापों का नाश होता है।

भगवान श्रीविष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

चातुर्मास्य व्रत का पूर्ण फल मिलता है।

भक्ति, वैराग्य एवं आत्म-संयम की वृद्धि होती है।

संसार-बन्धन शिथिल होते हैं।

अन्तकाल में विष्णुलोक प्राप्ति की योग्यता प्राप्त होती है।

शयन एकादशी केवल उपवास का दिन नहीं, बल्कि भक्ति, आत्मशुद्धि, संयम और चातुर्मास्य साधना के शुभारम्भ का पावन पर्व है। पुराणों, स्मृतियों तथा वैष्णव आचार्यों ने इस एकादशी की महिमा का अत्यन्त गौरवपूर्ण वर्णन किया है। भगवान श्रीविष्णु की योगनिद्रा का यह पावन दिवस साधक को बाह्य आडंबर से हटाकर अंतर्मुखी साधना की ओर प्रेरित करता है। अतः जो श्रद्धापूर्वक एवं शास्त्रसम्मत विधि से शयन एकादशी का पालन करता है, वह भगवान की कृपा, चित्तशुद्धि तथा परम कल्याण का अधिकारी बनता है।
Sri Sri Sidheshwari Tara Mandir Foundation Swami Kailashanand Giri ji Shri Mahant Dr. Ravindra Puri Lord of the Universe

21/07/2026

🌺🪷রাজরাজেশ্বরী🪷🌺
Sri Sri Sidheshwari Tara Mandir Foundation Lord of the Universe Shri Mahant Dr. Ravindra Puri Swami Kailashanand Giri ji

শ্রাবণের প্রথম সোমবার  শ্রীশ্রী সিদ্ধেশ্বর ভৈরবের শৃঙ্গার।নমঃ পার্বতীপতয়ে, হর হর মহাদেব। Sri Sri Sidheshwari Tara Mandi...
20/07/2026

শ্রাবণের প্রথম সোমবার শ্রীশ্রী সিদ্ধেশ্বর ভৈরবের শৃঙ্গার।

নমঃ পার্বতীপতয়ে, হর হর মহাদেব।
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🪷🪷হেরা পঞ্চমী🪷🪷হেরা পঞ্চমী শ্রীজগন্নাথদেবের রথযাত্রার অন্যতম গুরুত্বপূর্ণ লীলা-উৎসব। রথযাত্রার পঞ্চম দিনে, অর্থাৎ আষাঢ় ...
19/07/2026

🪷🪷হেরা পঞ্চমী🪷🪷

হেরা পঞ্চমী শ্রীজগন্নাথদেবের রথযাত্রার অন্যতম গুরুত্বপূর্ণ লীলা-উৎসব। রথযাত্রার পঞ্চম দিনে, অর্থাৎ আষাঢ় মাসের শুক্লপক্ষের পঞ্চমী তিথিতে এই উৎসব পালিত হয়। এই দিন শ্রীমন্দির থেকে মহালক্ষ্মীদেবী রাজকীয় শোভাযাত্রায় গুণ্ডিচা মন্দিরের উদ্দেশ্যে গমন করেন শ্রীজগন্নাথদেবকে ফিরিয়ে আনার জন্য। এটি কেবল একটি আচার নয়; বরং ভগবান ও ভগবতী, শক্তি ও পুরুষ, প্রেম ও মান, ঐশ্বর্য ও মাধুর্যের এক গভীর তাত্ত্বিক প্রকাশ।

'হেরা' শব্দটি ওଡ଼িয়া ভাষার 'ହେରିବା' (হেরিবা) ধাতু থেকে উদ্ভূত, যার অর্থ দেখা, দর্শন করা বা খোঁজ নেওয়া। তাই 'হেরা পঞ্চমী' অর্থ—যে পঞ্চমী তিথিতে মহালক্ষ্মীদেবী শ্রীজগন্নাথের দর্শন বা তাঁকে খোঁজ করতে গুণ্ডিচা মন্দিরে গমন করেন।
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শাস্ত্রীয় ভিত্তি

যদিও 'হেরা পঞ্চমী' নামে পৃথক কোনও অধ্যায় প্রধান পুরাণসমূহে পাওয়া যায় না, তবুও এই উৎসবের মূল তত্ত্ব ও আচার নিম্নলিখিত গ্রন্থসমূহে প্রতিষ্ঠিত হয়েছে—

স্কন্দপুরাণ (পুরুষোত্তম মাহাত্ম্য)

ব্রহ্মপুরাণ (পুরুষোত্তম ক্ষেত্র মাহাত্ম্য)

নীলাদ্রি মহোদয়

কপিল সংহিতা

মাদলাপাঞ্জি

শ্রীচৈতন্যচরিতামৃত (মধ্যলীলা, চতুর্দশ অধ্যায়)

এই সমস্ত গ্রন্থে রথযাত্রা, গুণ্ডিচা গমন, লক্ষ্মীদেবীর মানলীলা এবং শ্রীমন্দিরের নীতির বিভিন্ন দিক বর্ণিত হয়েছে।
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স্কন্দপুরাণে হেরা পঞ্চমীর তাত্ত্বিক ভিত্তি

স্কন্দপুরাণের পুরুষোত্তম মাহাত্ম্যে বর্ণিত হয়েছে যে, প্রতি বছর শ্রীজগন্নাথ ভক্তদের কল্যাণের উদ্দেশ্যে গুণ্ডিচা মন্দিরে গমন করেন। সেখানে তিনি কিছুদিন অবস্থান করে পুনরায় নীলাচলে প্রত্যাবর্তন করেন।

যদিও 'হেরা পঞ্চমী' শব্দটি সরাসরি ব্যবহৃত হয়নি, তথাপি লক্ষ্মীদেবীর মাহাত্ম্য ও ভগবানের সঙ্গে তাঁর অবিচ্ছেদ্য সম্পর্ক এই উৎসবের মূল ভিত্তি।
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ব্রহ্মপুরাণে লক্ষ্মীতত্ত্ব

ব্রহ্মপুরাণে শ্রীক্ষেত্রকে লক্ষ্মী-নারায়ণের নিত্যধাম বলা হয়েছে। সেখানে মহালক্ষ্মী কেবল পত্নী নন; তিনি ভগবানের ঐশ্বর্যশক্তি।

অতএব, ভগবান যখন দীর্ঘ সময় শ্রীমন্দিরের বাইরে অবস্থান করেন, তখন দেবীর মান বা অভিমান একটি স্বাভাবিক লীলারূপে প্রকাশিত হয়।
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নীলাদ্রি মহোদয়ে হেরা পঞ্চমী

উৎকলীয় জগন্নাথ পরম্পরায় নীলাদ্রি মহোদয় একটি অতি গুরুত্বপূর্ণ গ্রন্থ।

এখানে লক্ষ্মীদেবীর শোভাযাত্রা, নন্দিঘোষ রথের নিকট আগমন, আজ্ঞামালা গ্রহণ, রথের প্রতীকী ক্ষতিসাধন এবং গোপন পথে প্রত্যাবর্তনের বিস্তারিত বিবরণ পাওয়া যায়।
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মাদলাপাঞ্জিতে হেরা পঞ্চমী

মাদলাপাঞ্জি শ্রীজগন্নাথ মন্দিরের ঐতিহাসিক ঘটনাপঞ্জি ও নীতিপঞ্জি।
এখানে হেরা পঞ্চমীর নীতিসমূহের ধারাবাহিক বিবরণ সংরক্ষিত হয়েছে। বর্তমান পুরী মন্দিরে পালিত অধিকাংশ নীতি এই গ্রন্থের ঐতিহ্য অনুসরণ করে।
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শ্রীচৈতন্যচরিতামৃতে হেরা পঞ্চমী

গৌড়ীয় বৈষ্ণব সাহিত্যে হেরা পঞ্চমী "লক্ষ্মী-বিজয়োৎসব" নামে সুপরিচিত।

শ্রীকৃষ্ণদাস কবিরাজ গোস্বামী লিখেছেন—

"পঞ্চম দিবসে লক্ষ্মীর বিজয়োৎসব।"

এই সময় শ্রীচৈতন্য মহাপ্রভু স্বয়ং এই লীলা দর্শন করেন এবং স্বরূপ দামোদর গোস্বামীর নিকট এর গুপ্ত রসতত্ত্ব শ্রবণ করেন।
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উৎকলীয় নীতি

হেরা পঞ্চমীর দিন পুরীধামে নিম্নলিখিত নীতিসমূহ পালিত হয়—

১। মহালক্ষ্মীর বিশেষ স্নান, শৃঙ্গার ও পূজা।

২। রাজকীয় পালঙ্কিতে মহালক্ষ্মীর বিজয়যাত্রা।

৩। ঘণ্টা, শঙ্খ, বাদ্য, ছত্র, চামরসহ শোভাযাত্রা।

৪। নন্দিঘোষ রথের নিকট আগমন।

৫। শ্রীজগন্নাথের পক্ষ থেকে আজ্ঞামালা প্রদান।

৬। মহালক্ষ্মীর মান প্রকাশ।

৭। সেবকদের দ্বারা নন্দিঘোষ রথের একটি অংশ প্রতীকীভাবে ক্ষতিগ্রস্ত করা।

৮। মহালক্ষ্মীর হেরা গোহিরি সাহি পথ দিয়ে প্রত্যাবর্তন।

৯। পরদিন দক্ষিণ মোড় নীতি অনুসারে রথ দক্ষিণমুখী করা।
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রথ ভাঙার আধ্যাত্মিক অর্থ

রথ ভাঙা কখনও ক্রোধ বা ধ্বংসের প্রতীক নয়।

এটি—

মহালক্ষ্মীর মানলীলা।

দিব্য দাম্পত্য প্রেমের প্রকাশ।

জগন্নাথের নরলীলার একটি অংশ।

শক্তি ও পুরুষের অবিচ্ছেদ্য সম্পর্কের প্রতীক।

এই আচার বোঝায়—শ্রী (লক্ষ্মী) ব্যতীত ভগবানের লীলা পূর্ণতা লাভ করে না।
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গৌড়ীয় বৈষ্ণব ব্যাখ্যা

গৌড়ীয় বৈষ্ণব দর্শনে এই উৎসব অত্যন্ত গভীর রসতাত্ত্বিক তাৎপর্য বহন করে।

মহালক্ষ্মী বৈকুণ্ঠের ঐশ্বর্যরসের অধিষ্ঠাত্রী।

গুণ্ডিচা মন্দিরকে বৃন্দাবনের প্রতীক ধরা হয়।

শ্রীজগন্নাথ সেখানে বৃন্দাবনের মাধুর্যরস আস্বাদন করেন।

লক্ষ্মীদেবী সেই মাধুর্যরসে প্রবেশ করতে পারেন না।

তাই তাঁর মান ও অভিমান প্রকাশ পায়।

শ্রীচৈতন্য মহাপ্রভু এই লীলার মাধ্যমে বৈকুণ্ঠের ঐশ্বর্য এবং বৃন্দাবনের মাধুর্যের পার্থক্য ব্যাখ্যা করেন।
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তান্ত্রিক ব্যাখ্যা

শাক্ত ও তান্ত্রিক দৃষ্টিভঙ্গিতে মহালক্ষ্মী কেবল বিষ্ণুপত্নী নন; তিনি আদ্যাশক্তির এক বিশেষ প্রকাশ।

তন্ত্রমতে—

জগন্নাথ পুরুষতত্ত্ব।

লক্ষ্মী শক্তিতত্ত্ব।

শক্তি ব্যতীত পুরুষ অচল।

হেরা পঞ্চমী শক্তির স্বীয় অধিকারের স্মরণ করিয়ে দেয়।

এই লীলার মধ্যে শক্তি ও পুরুষের চিরন্তন ঐক্যের প্রতিফলন ঘটে।
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উৎকলীয় সংস্কৃতিতে হেরা পঞ্চমী

ওড়িশায় হেরা পঞ্চমীকে "ମହାଲକ୍ଷ୍ମୀଙ୍କ ମାନ ଲୀଳା" অর্থাৎ মহালক্ষ্মীর মানলীলা বলা হয়।

এটি কেবল ধর্মীয় অনুষ্ঠান নয়; বরং দাম্পত্য, প্রেম, বিরহ, অভিমান, পুনর্মিলন এবং ভক্তির এক অনন্য সাংস্কৃতিক প্রকাশ। এই লীলার মাধ্যমে মানবজীবনের আবেগকে ঈশ্বরীয় প্রেমে উন্নীত করা হয়েছে।

হেরা পঞ্চমী কেবল রথযাত্রার একটি আনুষ্ঠানিক পর্ব নয়; এটি শ্রীজগন্নাথ সংস্কৃতির এক গভীর দার্শনিক ও আধ্যাত্মিক অধ্যায়। শাস্ত্র, তন্ত্র, গৌড়ীয় বৈষ্ণব রসতত্ত্ব এবং উৎকলীয় মন্দির-নীতির সমন্বয়ে এই উৎসব ভারতীয় ধর্ম-সংস্কৃতির এক অনন্য সম্পদ। এখানে মহালক্ষ্মীর মান, শ্রীজগন্নাথের নরলীলা, শক্তি-পুরুষের ঐক্য এবং ভক্তি-রসের অপূর্ব সমন্বয় প্রকাশিত হয়েছে।

এই কারণেই হেরা পঞ্চমী শুধু একটি উৎসব নয় এটি শ্রীজগন্নাথ তত্ত্বের অন্যতম গভীর লীলার প্রকাশ|

हेरा पंचमी

हेरा पंचमी भगवान श्रीजगन्नाथ की रथयात्रा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिव्य लीला-उत्सव है। रथयात्रा के पाँचवें दिन, अर्थात आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को यह उत्सव मनाया जाता है। इस दिन श्रीमंदिर से महालक्ष्मी देवी राजकीय शोभायात्रा के साथ गुंडिचा मंदिर जाती हैं, ताकि भगवान श्रीजगन्नाथ को पुनः श्रीमंदिर वापस लाने का आग्रह कर सकें। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भगवान और भगवती, शक्ति और पुरुष, प्रेम और मान तथा ऐश्वर्य और माधुर्य के गहन आध्यात्मिक तत्त्व का प्रतीक है।

'हेरा' शब्द ओड़िया भाषा की धातु 'ହେରିବା' (हेरिबा) से निकला है, जिसका अर्थ है देखना, दर्शन करना या खोज करना। अतः 'हेरा पंचमी' का अर्थ है—वह पंचमी तिथि जिस दिन महालक्ष्मी देवी भगवान श्रीजगन्नाथ के दर्शन अथवा उन्हें खोजने के लिए गुंडिचा मंदिर जाती हैं।

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शास्त्रीय आधार

यद्यपि 'हेरा पंचमी' नाम से किसी प्रमुख पुराण में पृथक अध्याय उपलब्ध नहीं है, तथापि इस उत्सव का तत्त्व एवं इसकी परंपरा निम्नलिखित ग्रंथों में प्रतिष्ठित है—

स्कन्दपुराण (पुरुषोत्तम माहात्म्य)

ब्रह्मपुराण (पुरुषोत्तम क्षेत्र माहात्म्य)

नीलाद्रि महोदय

कपिल संहिता

मादलापांजी

श्रीचैतन्यचरितामृत (मध्यलीला, अध्याय १४)

इन ग्रंथों में रथयात्रा, गुंडिचा गमन, महालक्ष्मी की मान-लीला तथा श्रीमंदिर की विविध नीतियों का वर्णन मिलता है।

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स्कन्दपुराण में हेरा पंचमी का तात्त्विक आधार

स्कन्दपुराण के पुरुषोत्तम माहात्म्य में वर्णित है कि भगवान श्रीजगन्नाथ प्रत्येक वर्ष भक्तों के कल्याण हेतु गुंडिचा मंदिर की यात्रा करते हैं। वहाँ कुछ दिनों तक निवास करने के पश्चात वे पुनः नीलाचल लौटते हैं।

यद्यपि 'हेरा पंचमी' शब्द का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं मिलता, तथापि महालक्ष्मी की महिमा तथा भगवान के साथ उनके अविभाज्य संबंध का वर्णन इस उत्सव का मूल आधार है।

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ब्रह्मपुराण में लक्ष्मी-तत्त्व

ब्रह्मपुराण में श्रीक्षेत्र को लक्ष्मी-नारायण का नित्यधाम कहा गया है। वहाँ महालक्ष्मी केवल भगवान की अर्धांगिनी नहीं, बल्कि उनकी ऐश्वर्यशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

अतः जब भगवान कुछ समय के लिए श्रीमंदिर से बाहर रहते हैं, तब देवी का मान (अभिमान) उनकी दिव्य लीला का स्वाभाविक रूप माना जाता है।

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नीलाद्रि महोदय में हेरा पंचमी

उत्कलीय जगन्नाथ परंपरा में नीलाद्रि महोदय एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है।

इसमें महालक्ष्मी की शोभायात्रा, नन्दिघोष रथ के समीप आगमन, आज्ञामाला की प्राप्ति, रथ के प्रतीकात्मक भंजन तथा गुप्त मार्ग से श्रीमंदिर लौटने का विस्तृत वर्णन मिलता है।

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मादलापांजी में हेरा पंचमी

मादलापांजी श्रीजगन्नाथ मंदिर का ऐतिहासिक अभिलेख एवं नीतिपुस्तक है।

इसमें हेरा पंचमी की परंपराओं और अनुष्ठानों का क्रमबद्ध विवरण सुरक्षित है। वर्तमान पुरी श्रीमंदिर में प्रचलित अधिकांश नीतियाँ इसी परंपरा का अनुसरण करती हैं।

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श्रीचैतन्यचरितामृत में हेरा पंचमी

गौड़ीय वैष्णव साहित्य में हेरा पंचमी को "लक्ष्मी-विजयोत्सव" कहा गया है।

श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी लिखते हैं—

"पञ्चम दिवसे लक्ष्मीर विजयोत्सव।"

इसी अवसर पर श्रीचैतन्य महाप्रभु ने इस लीला का दर्शन किया तथा स्वरूप दामोदर गोस्वामी से इसके गूढ़ रसतत्त्व का श्रवण किया।

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उत्कलीय मंदिर-नीति

हेरा पंचमी के दिन पुरी श्रीमंदिर में निम्नलिखित नीतियाँ सम्पन्न होती हैं—

१. महालक्ष्मी का विशेष स्नान, श्रृंगार एवं पूजन।

२. राजकीय पालकी में महालक्ष्मी की विजय-यात्रा।

३. शंख, घंटा, वाद्य, छत्र एवं चँवर सहित भव्य शोभायात्रा।

४. नन्दिघोष रथ के समीप आगमन।

५. भगवान श्रीजगन्नाथ की ओर से आज्ञामाला प्रदान।

६. महालक्ष्मी का मान प्रकट होना।

७. सेवकों द्वारा नन्दिघोष रथ के एक भाग का प्रतीकात्मक भंजन।

८. महालक्ष्मी का हेरा गोहिरि साही मार्ग से श्रीमंदिर लौटना।

९. अगले दिन दक्षिण मोड़ नीति के अनुसार रथों को दक्षिण दिशा की ओर मोड़ना।

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रथ भंजन का आध्यात्मिक अर्थ

रथ का प्रतीकात्मक भंजन क्रोध या विनाश का प्रतीक नहीं है।

यह—

महालक्ष्मी की मान-लीला है।

दिव्य दाम्पत्य प्रेम की अभिव्यक्ति है।

श्रीजगन्नाथ की नरलीला का एक अंग है।

शक्ति और पुरुष के अविभाज्य संबंध का प्रतीक है।

यह परंपरा इस सत्य को व्यक्त करती है कि श्री (महालक्ष्मी) के बिना भगवान की लीला पूर्ण नहीं होती।

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गौड़ीय वैष्णव दृष्टिकोण

गौड़ीय वैष्णव दर्शन में यह उत्सव अत्यंत गहन रसतात्त्विक महत्व रखता है।

महालक्ष्मी वैकुण्ठ की ऐश्वर्य-रस की अधिष्ठात्री हैं।

गुंडिचा मंदिर को वृन्दावन का प्रतीक माना जाता है।

श्रीजगन्नाथ वहाँ वृन्दावन के माधुर्य-रस का आस्वादन करते हैं।

महालक्ष्मी उस माधुर्य-रस में प्रवेश नहीं कर पातीं।

इसी कारण उनका मान और अभिमान प्रकट होता है।

श्रीचैतन्य महाप्रभु ने इस लीला के माध्यम से वैकुण्ठ के ऐश्वर्य और वृन्दावन के माधुर्य के मध्य भेद को स्पष्ट किया।
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तांत्रिक दृष्टिकोण

शाक्त एवं तांत्रिक परंपरा में महालक्ष्मी केवल भगवान विष्णु की अर्धांगिनी नहीं, बल्कि आद्याशक्ति का दिव्य स्वरूप हैं।

तंत्र के अनुसार—

श्रीजगन्नाथ पुरुषतत्त्व हैं।

महालक्ष्मी शक्तितत्त्व हैं।

शक्ति के बिना पुरुष निष्क्रिय है।

हेरा पंचमी शक्ति के दिव्य अधिकार का स्मरण कराती है।

इस लीला में शक्ति और पुरुष के सनातन ऐक्य का दर्शन होता है।
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उत्कलीय संस्कृति में हेरा पंचमी

ओड़िशा में हेरा पंचमी को "महालक्ष्मींक मान लीला" कहा जाता है।

यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि दाम्पत्य, प्रेम, विरह, मान, पुनर्मिलन और भक्ति की अद्वितीय सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। इस लीला के माध्यम से मानवीय भावनाओं को दिव्य प्रेम में रूपांतरित किया गया है।

हेरा पंचमी केवल रथयात्रा का एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि श्रीजगन्नाथ संस्कृति का एक गहन दार्शनिक एवं आध्यात्मिक अध्याय है। शास्त्र, तंत्र, गौड़ीय वैष्णव रसतत्त्व तथा उत्कलीय मंदिर-नीति के समन्वय से यह उत्सव भारतीय धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा की अमूल्य धरोहर बन गया है। इसमें महालक्ष्मी का मान, श्रीजगन्नाथ की नरलीला, शक्ति और पुरुष का ऐक्य तथा भक्ति-रस का अद्भुत समन्वय प्रकट होता है।

इसी कारण हेरा पंचमी केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि श्रीजगन्नाथ तत्त्व की अत्यंत गूढ़ एवं दिव्य लीलाओं में से एक मानी जाती है।
Sri Sri Sidheshwari Tara Mandir Foundation Swami Kailashanand Giri ji Shri Mahant Dr. Ravindra Puri Lord of the Universe

19/07/2026

🌺পঞ্চশূন্যে স্থিতা তাঁরা🌺
Sri Sri Sidheshwari Tara Mandir Foundation Swami Kailashanand Giri ji Shri Mahant Dr. Ravindra Puri

13/07/2026

"উগ্রতারা শূলপাণি সুভদ্রা ভুবনেশ্বরী, নীলাদ্রৌ তু জগন্নাথঃ সাক্ষাদ্ দক্ষিণকালিকা" এই শ্লোকটি ওড়িশার শাক্ত-তান্ত্রিক জগন্নাথ-পরম্পরায় অত্যন্ত গুরুত্বপূর্ণ একটি তাত্ত্বিক উক্তি। নীলাদ্রি মহোদয়, বৃহন্নীলতন্ত্র, রুদ্রযামল, কালিকা পুরাণ এবং ওড়িশার তান্ত্রিক আচার-পরম্পরায় এর ভাবার্থ সুস্পষ্টভাবে প্রতিফলিত হয়েছে। এই শ্লোকের মূল উদ্দেশ্য হল শ্রীজগন্নাথ, শ্রীবলভদ্র ও দেবী সুভদ্রার মধ্যে শাক্ত, শৈব ও বৈষ্ণব তত্ত্বের ঐক্য প্রতিষ্ঠা করা।

শ্লোকের প্রথম অংশে ‘উগ্রতারা’ শব্দ দ্বারা শ্রীজগন্নাথকে তারা-মহাবিদ্যার উগ্রতারা রূপে ব্যাখ্যা করা হয়েছে। তন্ত্রশাস্ত্রে উগ্রতারা হলেন মুক্তিদাত্রী, ব্রহ্মবিদ্যা-প্রদায়িনী এবং মহামায়ার এক উগ্র প্রকাশ। মুণ্ডমালা তন্ত্র ও তারা তন্ত্রে দেবী তারাকে মোক্ষদাত্রী পরাশক্তি বলা হয়েছে—“তারা পরা মহামায়া মোক্ষদা পরিকীর্তিতা”। অপরদিকে স্কন্দপুরাণের পুরুষোত্তম-মাহাত্ম্যে শ্রীজগন্নাথের দর্শনকে মোক্ষপ্রদ বলা হয়েছে—“দর্শনাদেব জগন্নাথং মুক্তির্ভবতি নিশ্চিতম্”। এই কারণে তান্ত্রিক ব্যাখ্যায় শ্রীজগন্নাথকে উগ্রতারা-তত্ত্বরূপে উপলব্ধি করা হয়।

‘শূলপাণি’ শব্দটি মহাদেব শিবের প্রসিদ্ধ উপাধি। ওড়িশার তান্ত্রিক জগন্নাথ-পরম্পরায় শ্রীবলভদ্রকে অনন্ত, রুদ্র ও শিবতত্ত্বরূপে কল্পনা করা হয়। স্কন্দপুরাণের পুরুষোত্তম-মাহাত্ম্য, নীলাদ্রি মহোদয় এবং বৃহন্নীলতন্ত্রে শ্রীবলভদ্রকে শৈবতত্ত্বের আধার হিসেবে ব্যাখ্যা করা হয়েছে। তাই এখানে ‘শূলপাণি’ শব্দটি শ্রীবলভদ্রের রুদ্রস্বরূপকে নির্দেশ করে।

‘সুভদ্রা ভুবনেশ্বরী’ অংশে দেবী সুভদ্রাকে আদ্যাশক্তি ভুবনেশ্বরীরূপে চিহ্নিত করা হয়েছে। তন্ত্রসার ও অন্যান্য শাক্ত আগমে ভুবনেশ্বরীকে সমগ্র বিশ্বব্রহ্মাণ্ডের অধিষ্ঠাত্রী মহাশক্তি বলা হয়েছে—“ভুবনানাম্ ঈশ্বরী দেবী ভুবনেশী প্রকীর্তিতা”। পুরীর তান্ত্রিক উপাসনা-পদ্ধতিতে সুভদ্রা কেবল শ্রীকৃষ্ণের ভগিনী নন; তিনি যোগমায়া, একানংশা, আদ্যাশক্তি এবং ভুবনেশ্বরীরূপেও পূজিতা।

শ্লোকের শেষ অংশ—‘নীলাদ্রৌ তু জগন্নাথঃ সাক্ষাদ্ দক্ষিণকালিকা’—সবচেয়ে গভীর তাত্ত্বিক বক্তব্য বহন করে। এখানে শ্রীজগন্নাথকে দক্ষিণাকালীর অভিন্ন তত্ত্বরূপে ব্যাখ্যা করা হয়েছে। মহানির্বাণ তন্ত্রে কালীকে পরব্রহ্মস্বরূপিণী বলা হয়েছে—“কালী পরব্রহ্মস্বরূপিণী”। শাক্ত দর্শনে কালী ও পরব্রহ্ম অবিচ্ছেদ্য; আবার বৈষ্ণব দর্শনে শ্রীজগন্নাথও পরব্রহ্ম। এই কারণে তান্ত্রিক ব্যাখ্যায় জগন্নাথ ও দক্ষিণাকালীর মধ্যে তাত্ত্বিক অভেদ প্রতিষ্ঠা করা হয়েছে। এটি কোনও বাহ্যিক রূপগত সমতা নয়, বরং পরমতত্ত্বের একত্বের প্রকাশ।

শ্রীক্ষেত্র পুরী নিজেই এক অনন্য সমন্বয়ের ক্ষেত্র, যেখানে বৈষ্ণব, শাক্ত, শৈব ও তান্ত্রিক সাধনার অপূর্ব মিলন ঘটেছে। শ্রীজগন্নাথের মন্দিরে দেবী বিমলার অধিষ্ঠান, মহাপ্রসাদকে প্রথমে দেবী বিমলার নিকট নিবেদন করার প্রথা, এবং পুরীতে ভুবনেশ্বরী, দক্ষিণাকালী, চামুণ্ডা, বগলামুখী প্রভৃতি শক্তিদেবীর পূজা—সবই এই সমন্বিত ধর্মতাত্ত্বিক ঐতিহ্যের উজ্জ্বল নিদর্শন। অতএব, “উগ্রতারা শূলপাণি সুভদ্রা ভুবনেশ্বরী, নীলাদ্রৌ তু জগন্নাথঃ সাক্ষাদ্ দক্ষিণকালিকা” শ্লোকটি শ্রীজগন্নাথকে কেবল বৈষ্ণব দেবতা হিসেবে নয়, বরং শাক্ত, শৈব ও বৈষ্ণব—এই তিন ধারার পরম ঐক্যস্বরূপ পরব্রহ্মতত্ত্বের প্রকাশ হিসেবে উপলব্ধি করার এক গভীর তান্ত্রিক ব্যাখ্যা।

"उग्रतारा शूलपाणि सुभद्रा भुवनेश्वरी, नीलाद्रौ तु जगन्नाथः साक्षाद् दक्षिणकालिका" — यह श्लोक ओड़िशा की शाक्त-तांत्रिक जगन्नाथ-परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण एक दार्शनिक एवं तात्त्विक उद्घोषणा मानी जाती है। नीलाद्रि महोदय, बृहन्नीलतन्त्र, रुद्रयामल, कालिका पुराण तथा ओड़िशा की तांत्रिक आचार-परंपरा में इसका भाव स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित होता है। इस श्लोक का मूल उद्देश्य श्रीजगन्नाथ, श्रीबलभद्र और देवी सुभद्रा के माध्यम से शाक्त, शैव और वैष्णव तत्त्वों की एकात्मता को स्थापित करना है।

श्लोक के प्रथम भाग में "उग्रतारा" शब्द द्वारा श्रीजगन्नाथ को दशमहाविद्याओं में वर्णित उग्रतारा के स्वरूप में समझाया गया है। तंत्रशास्त्र में उग्रतारा मोक्ष प्रदान करने वाली, ब्रह्मविद्या की अधिष्ठात्री तथा महामाया का उग्र स्वरूप मानी जाती हैं। मुण्डमाला तन्त्र और तारा तन्त्र में देवी तारा को "तारा परा महामाया मोक्षदा परिकीर्तिता" कहा गया है। दूसरी ओर स्कन्दपुराण के पुरुषोत्तम-माहात्म्य में श्रीजगन्नाथ के दर्शन को मोक्षदायक बताया गया है—"दर्शनादेव जगन्नाथं मुक्तिर्भवति निश्चितम्"। इसी कारण तांत्रिक परंपरा में श्रीजगन्नाथ को उग्रतारा-तत्त्व का मूर्त स्वरूप माना जाता है।

"शूलपाणि" भगवान शिव का प्रसिद्ध नाम है। ओड़िशा की तांत्रिक जगन्नाथ-परंपरा में श्रीबलभद्र को अनन्त, रुद्र तथा शिवतत्त्व का स्वरूप माना गया है। स्कन्दपुराण के पुरुषोत्तम-माहात्म्य, नीलाद्रि महोदय तथा बृहन्नीलतन्त्र में श्रीबलभद्र को शैवतत्त्व का आधार बताया गया है। इसलिए यहाँ "शूलपाणि" शब्द श्रीबलभद्र के रुद्रस्वरूप का द्योतक है।

"सुभद्रा भुवनेश्वरी" पद में देवी सुभद्रा को आद्याशक्ति भुवनेश्वरी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। तन्त्रसार तथा अन्य शाक्त आगमों में भुवनेश्वरी को समस्त ब्रह्माण्ड की अधिष्ठात्री महाशक्ति कहा गया है—"भुवनानाम् ईश्वरी देवी भुवनेशी प्रकीर्तिता"। पुरी की तांत्रिक उपासना-पद्धति में देवी सुभद्रा केवल श्रीकृष्ण की बहन नहीं हैं, बल्कि वे योगमाया, एकानंशा, आद्याशक्ति तथा भुवनेश्वरी के रूप में भी पूजित हैं।

श्लोक का अंतिम भाग—"नीलाद्रौ तु जगन्नाथः साक्षाद् दक्षिणकालिका"—इसका सबसे गहन तात्त्विक पक्ष प्रस्तुत करता है। यहाँ श्रीजगन्नाथ को स्वयं दक्षिणाकालिका के अभिन्न तत्त्व के रूप में समझाया गया है। महानिर्वाण तन्त्र में देवी काली को "परब्रह्मस्वरूपिणी" कहा गया है। शाक्त दर्शन में काली और परब्रह्म में कोई भेद नहीं माना जाता, और वैष्णव दर्शन में श्रीजगन्नाथ भी परब्रह्म हैं। इसी आधार पर तांत्रिक व्याख्या में श्रीजगन्नाथ और दक्षिणाकालिका के मध्य तात्त्विक अभेद की स्थापना की गई है। यह किसी बाह्य रूप की समानता नहीं, बल्कि परम सत्य की एकात्मक अभिव्यक्ति है।

श्रीक्षेत्र पुरी स्वयं शाक्त, शैव, वैष्णव और तांत्रिक साधना का अद्वितीय संगम है। श्रीजगन्नाथ मंदिर में देवी विमला की प्रतिष्ठा, महाप्रसाद को पहले देवी विमला को अर्पित करने की परंपरा तथा पुरी में भुवनेश्वरी, दक्षिणाकालिका, चामुण्डा, बगलामुखी आदि शक्तिदेवियों की उपासना इस समन्वित धार्मिक परंपरा के सशक्त प्रमाण हैं। अतः "उग्रतारा शूलपाणि सुभद्रा भुवनेश्वरी, नीलाद्रौ तु जगन्नाथः साक्षाद् दक्षिणकालिका" यह श्लोक श्रीजगन्नाथ को केवल वैष्णव देवता के रूप में नहीं, बल्कि शाक्त, शैव और वैष्णव—इन तीनों परंपराओं के परम समन्वित परब्रह्म-तत्त्व के रूप में प्रस्तुत करने वाली एक गहन तांत्रिक व्याख्या है।
Sri Sri Sidheshwari Tara Mandir Foundation Swami Kailashanand Giri ji Shri Mahant Dr. Ravindra Puri Lord of the Universe

12/07/2026

শ্রীশ্রী সিদ্ধেশ্বরী তারা মাতা ঠাকুরাণী

श्री श्री सिद्धेश्वरी तारा माता ठाकुरानी
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