19/07/2026
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হেরা পঞ্চমী শ্রীজগন্নাথদেবের রথযাত্রার অন্যতম গুরুত্বপূর্ণ লীলা-উৎসব। রথযাত্রার পঞ্চম দিনে, অর্থাৎ আষাঢ় মাসের শুক্লপক্ষের পঞ্চমী তিথিতে এই উৎসব পালিত হয়। এই দিন শ্রীমন্দির থেকে মহালক্ষ্মীদেবী রাজকীয় শোভাযাত্রায় গুণ্ডিচা মন্দিরের উদ্দেশ্যে গমন করেন শ্রীজগন্নাথদেবকে ফিরিয়ে আনার জন্য। এটি কেবল একটি আচার নয়; বরং ভগবান ও ভগবতী, শক্তি ও পুরুষ, প্রেম ও মান, ঐশ্বর্য ও মাধুর্যের এক গভীর তাত্ত্বিক প্রকাশ।
'হেরা' শব্দটি ওଡ଼িয়া ভাষার 'ହେରିବା' (হেরিবা) ধাতু থেকে উদ্ভূত, যার অর্থ দেখা, দর্শন করা বা খোঁজ নেওয়া। তাই 'হেরা পঞ্চমী' অর্থ—যে পঞ্চমী তিথিতে মহালক্ষ্মীদেবী শ্রীজগন্নাথের দর্শন বা তাঁকে খোঁজ করতে গুণ্ডিচা মন্দিরে গমন করেন।
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শাস্ত্রীয় ভিত্তি
যদিও 'হেরা পঞ্চমী' নামে পৃথক কোনও অধ্যায় প্রধান পুরাণসমূহে পাওয়া যায় না, তবুও এই উৎসবের মূল তত্ত্ব ও আচার নিম্নলিখিত গ্রন্থসমূহে প্রতিষ্ঠিত হয়েছে—
স্কন্দপুরাণ (পুরুষোত্তম মাহাত্ম্য)
ব্রহ্মপুরাণ (পুরুষোত্তম ক্ষেত্র মাহাত্ম্য)
নীলাদ্রি মহোদয়
কপিল সংহিতা
মাদলাপাঞ্জি
শ্রীচৈতন্যচরিতামৃত (মধ্যলীলা, চতুর্দশ অধ্যায়)
এই সমস্ত গ্রন্থে রথযাত্রা, গুণ্ডিচা গমন, লক্ষ্মীদেবীর মানলীলা এবং শ্রীমন্দিরের নীতির বিভিন্ন দিক বর্ণিত হয়েছে।
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স্কন্দপুরাণে হেরা পঞ্চমীর তাত্ত্বিক ভিত্তি
স্কন্দপুরাণের পুরুষোত্তম মাহাত্ম্যে বর্ণিত হয়েছে যে, প্রতি বছর শ্রীজগন্নাথ ভক্তদের কল্যাণের উদ্দেশ্যে গুণ্ডিচা মন্দিরে গমন করেন। সেখানে তিনি কিছুদিন অবস্থান করে পুনরায় নীলাচলে প্রত্যাবর্তন করেন।
যদিও 'হেরা পঞ্চমী' শব্দটি সরাসরি ব্যবহৃত হয়নি, তথাপি লক্ষ্মীদেবীর মাহাত্ম্য ও ভগবানের সঙ্গে তাঁর অবিচ্ছেদ্য সম্পর্ক এই উৎসবের মূল ভিত্তি।
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ব্রহ্মপুরাণে লক্ষ্মীতত্ত্ব
ব্রহ্মপুরাণে শ্রীক্ষেত্রকে লক্ষ্মী-নারায়ণের নিত্যধাম বলা হয়েছে। সেখানে মহালক্ষ্মী কেবল পত্নী নন; তিনি ভগবানের ঐশ্বর্যশক্তি।
অতএব, ভগবান যখন দীর্ঘ সময় শ্রীমন্দিরের বাইরে অবস্থান করেন, তখন দেবীর মান বা অভিমান একটি স্বাভাবিক লীলারূপে প্রকাশিত হয়।
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নীলাদ্রি মহোদয়ে হেরা পঞ্চমী
উৎকলীয় জগন্নাথ পরম্পরায় নীলাদ্রি মহোদয় একটি অতি গুরুত্বপূর্ণ গ্রন্থ।
এখানে লক্ষ্মীদেবীর শোভাযাত্রা, নন্দিঘোষ রথের নিকট আগমন, আজ্ঞামালা গ্রহণ, রথের প্রতীকী ক্ষতিসাধন এবং গোপন পথে প্রত্যাবর্তনের বিস্তারিত বিবরণ পাওয়া যায়।
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মাদলাপাঞ্জিতে হেরা পঞ্চমী
মাদলাপাঞ্জি শ্রীজগন্নাথ মন্দিরের ঐতিহাসিক ঘটনাপঞ্জি ও নীতিপঞ্জি।
এখানে হেরা পঞ্চমীর নীতিসমূহের ধারাবাহিক বিবরণ সংরক্ষিত হয়েছে। বর্তমান পুরী মন্দিরে পালিত অধিকাংশ নীতি এই গ্রন্থের ঐতিহ্য অনুসরণ করে।
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শ্রীচৈতন্যচরিতামৃতে হেরা পঞ্চমী
গৌড়ীয় বৈষ্ণব সাহিত্যে হেরা পঞ্চমী "লক্ষ্মী-বিজয়োৎসব" নামে সুপরিচিত।
শ্রীকৃষ্ণদাস কবিরাজ গোস্বামী লিখেছেন—
"পঞ্চম দিবসে লক্ষ্মীর বিজয়োৎসব।"
এই সময় শ্রীচৈতন্য মহাপ্রভু স্বয়ং এই লীলা দর্শন করেন এবং স্বরূপ দামোদর গোস্বামীর নিকট এর গুপ্ত রসতত্ত্ব শ্রবণ করেন।
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উৎকলীয় নীতি
হেরা পঞ্চমীর দিন পুরীধামে নিম্নলিখিত নীতিসমূহ পালিত হয়—
১। মহালক্ষ্মীর বিশেষ স্নান, শৃঙ্গার ও পূজা।
২। রাজকীয় পালঙ্কিতে মহালক্ষ্মীর বিজয়যাত্রা।
৩। ঘণ্টা, শঙ্খ, বাদ্য, ছত্র, চামরসহ শোভাযাত্রা।
৪। নন্দিঘোষ রথের নিকট আগমন।
৫। শ্রীজগন্নাথের পক্ষ থেকে আজ্ঞামালা প্রদান।
৬। মহালক্ষ্মীর মান প্রকাশ।
৭। সেবকদের দ্বারা নন্দিঘোষ রথের একটি অংশ প্রতীকীভাবে ক্ষতিগ্রস্ত করা।
৮। মহালক্ষ্মীর হেরা গোহিরি সাহি পথ দিয়ে প্রত্যাবর্তন।
৯। পরদিন দক্ষিণ মোড় নীতি অনুসারে রথ দক্ষিণমুখী করা।
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রথ ভাঙার আধ্যাত্মিক অর্থ
রথ ভাঙা কখনও ক্রোধ বা ধ্বংসের প্রতীক নয়।
এটি—
মহালক্ষ্মীর মানলীলা।
দিব্য দাম্পত্য প্রেমের প্রকাশ।
জগন্নাথের নরলীলার একটি অংশ।
শক্তি ও পুরুষের অবিচ্ছেদ্য সম্পর্কের প্রতীক।
এই আচার বোঝায়—শ্রী (লক্ষ্মী) ব্যতীত ভগবানের লীলা পূর্ণতা লাভ করে না।
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গৌড়ীয় বৈষ্ণব ব্যাখ্যা
গৌড়ীয় বৈষ্ণব দর্শনে এই উৎসব অত্যন্ত গভীর রসতাত্ত্বিক তাৎপর্য বহন করে।
মহালক্ষ্মী বৈকুণ্ঠের ঐশ্বর্যরসের অধিষ্ঠাত্রী।
গুণ্ডিচা মন্দিরকে বৃন্দাবনের প্রতীক ধরা হয়।
শ্রীজগন্নাথ সেখানে বৃন্দাবনের মাধুর্যরস আস্বাদন করেন।
লক্ষ্মীদেবী সেই মাধুর্যরসে প্রবেশ করতে পারেন না।
তাই তাঁর মান ও অভিমান প্রকাশ পায়।
শ্রীচৈতন্য মহাপ্রভু এই লীলার মাধ্যমে বৈকুণ্ঠের ঐশ্বর্য এবং বৃন্দাবনের মাধুর্যের পার্থক্য ব্যাখ্যা করেন।
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তান্ত্রিক ব্যাখ্যা
শাক্ত ও তান্ত্রিক দৃষ্টিভঙ্গিতে মহালক্ষ্মী কেবল বিষ্ণুপত্নী নন; তিনি আদ্যাশক্তির এক বিশেষ প্রকাশ।
তন্ত্রমতে—
জগন্নাথ পুরুষতত্ত্ব।
লক্ষ্মী শক্তিতত্ত্ব।
শক্তি ব্যতীত পুরুষ অচল।
হেরা পঞ্চমী শক্তির স্বীয় অধিকারের স্মরণ করিয়ে দেয়।
এই লীলার মধ্যে শক্তি ও পুরুষের চিরন্তন ঐক্যের প্রতিফলন ঘটে।
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উৎকলীয় সংস্কৃতিতে হেরা পঞ্চমী
ওড়িশায় হেরা পঞ্চমীকে "ମହାଲକ୍ଷ୍ମୀଙ୍କ ମାନ ଲୀଳା" অর্থাৎ মহালক্ষ্মীর মানলীলা বলা হয়।
এটি কেবল ধর্মীয় অনুষ্ঠান নয়; বরং দাম্পত্য, প্রেম, বিরহ, অভিমান, পুনর্মিলন এবং ভক্তির এক অনন্য সাংস্কৃতিক প্রকাশ। এই লীলার মাধ্যমে মানবজীবনের আবেগকে ঈশ্বরীয় প্রেমে উন্নীত করা হয়েছে।
হেরা পঞ্চমী কেবল রথযাত্রার একটি আনুষ্ঠানিক পর্ব নয়; এটি শ্রীজগন্নাথ সংস্কৃতির এক গভীর দার্শনিক ও আধ্যাত্মিক অধ্যায়। শাস্ত্র, তন্ত্র, গৌড়ীয় বৈষ্ণব রসতত্ত্ব এবং উৎকলীয় মন্দির-নীতির সমন্বয়ে এই উৎসব ভারতীয় ধর্ম-সংস্কৃতির এক অনন্য সম্পদ। এখানে মহালক্ষ্মীর মান, শ্রীজগন্নাথের নরলীলা, শক্তি-পুরুষের ঐক্য এবং ভক্তি-রসের অপূর্ব সমন্বয় প্রকাশিত হয়েছে।
এই কারণেই হেরা পঞ্চমী শুধু একটি উৎসব নয় এটি শ্রীজগন্নাথ তত্ত্বের অন্যতম গভীর লীলার প্রকাশ|
हेरा पंचमी
हेरा पंचमी भगवान श्रीजगन्नाथ की रथयात्रा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिव्य लीला-उत्सव है। रथयात्रा के पाँचवें दिन, अर्थात आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को यह उत्सव मनाया जाता है। इस दिन श्रीमंदिर से महालक्ष्मी देवी राजकीय शोभायात्रा के साथ गुंडिचा मंदिर जाती हैं, ताकि भगवान श्रीजगन्नाथ को पुनः श्रीमंदिर वापस लाने का आग्रह कर सकें। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भगवान और भगवती, शक्ति और पुरुष, प्रेम और मान तथा ऐश्वर्य और माधुर्य के गहन आध्यात्मिक तत्त्व का प्रतीक है।
'हेरा' शब्द ओड़िया भाषा की धातु 'ହେରିବା' (हेरिबा) से निकला है, जिसका अर्थ है देखना, दर्शन करना या खोज करना। अतः 'हेरा पंचमी' का अर्थ है—वह पंचमी तिथि जिस दिन महालक्ष्मी देवी भगवान श्रीजगन्नाथ के दर्शन अथवा उन्हें खोजने के लिए गुंडिचा मंदिर जाती हैं।
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शास्त्रीय आधार
यद्यपि 'हेरा पंचमी' नाम से किसी प्रमुख पुराण में पृथक अध्याय उपलब्ध नहीं है, तथापि इस उत्सव का तत्त्व एवं इसकी परंपरा निम्नलिखित ग्रंथों में प्रतिष्ठित है—
स्कन्दपुराण (पुरुषोत्तम माहात्म्य)
ब्रह्मपुराण (पुरुषोत्तम क्षेत्र माहात्म्य)
नीलाद्रि महोदय
कपिल संहिता
मादलापांजी
श्रीचैतन्यचरितामृत (मध्यलीला, अध्याय १४)
इन ग्रंथों में रथयात्रा, गुंडिचा गमन, महालक्ष्मी की मान-लीला तथा श्रीमंदिर की विविध नीतियों का वर्णन मिलता है।
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स्कन्दपुराण में हेरा पंचमी का तात्त्विक आधार
स्कन्दपुराण के पुरुषोत्तम माहात्म्य में वर्णित है कि भगवान श्रीजगन्नाथ प्रत्येक वर्ष भक्तों के कल्याण हेतु गुंडिचा मंदिर की यात्रा करते हैं। वहाँ कुछ दिनों तक निवास करने के पश्चात वे पुनः नीलाचल लौटते हैं।
यद्यपि 'हेरा पंचमी' शब्द का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं मिलता, तथापि महालक्ष्मी की महिमा तथा भगवान के साथ उनके अविभाज्य संबंध का वर्णन इस उत्सव का मूल आधार है।
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ब्रह्मपुराण में लक्ष्मी-तत्त्व
ब्रह्मपुराण में श्रीक्षेत्र को लक्ष्मी-नारायण का नित्यधाम कहा गया है। वहाँ महालक्ष्मी केवल भगवान की अर्धांगिनी नहीं, बल्कि उनकी ऐश्वर्यशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
अतः जब भगवान कुछ समय के लिए श्रीमंदिर से बाहर रहते हैं, तब देवी का मान (अभिमान) उनकी दिव्य लीला का स्वाभाविक रूप माना जाता है।
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नीलाद्रि महोदय में हेरा पंचमी
उत्कलीय जगन्नाथ परंपरा में नीलाद्रि महोदय एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
इसमें महालक्ष्मी की शोभायात्रा, नन्दिघोष रथ के समीप आगमन, आज्ञामाला की प्राप्ति, रथ के प्रतीकात्मक भंजन तथा गुप्त मार्ग से श्रीमंदिर लौटने का विस्तृत वर्णन मिलता है।
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मादलापांजी में हेरा पंचमी
मादलापांजी श्रीजगन्नाथ मंदिर का ऐतिहासिक अभिलेख एवं नीतिपुस्तक है।
इसमें हेरा पंचमी की परंपराओं और अनुष्ठानों का क्रमबद्ध विवरण सुरक्षित है। वर्तमान पुरी श्रीमंदिर में प्रचलित अधिकांश नीतियाँ इसी परंपरा का अनुसरण करती हैं।
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श्रीचैतन्यचरितामृत में हेरा पंचमी
गौड़ीय वैष्णव साहित्य में हेरा पंचमी को "लक्ष्मी-विजयोत्सव" कहा गया है।
श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी लिखते हैं—
"पञ्चम दिवसे लक्ष्मीर विजयोत्सव।"
इसी अवसर पर श्रीचैतन्य महाप्रभु ने इस लीला का दर्शन किया तथा स्वरूप दामोदर गोस्वामी से इसके गूढ़ रसतत्त्व का श्रवण किया।
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उत्कलीय मंदिर-नीति
हेरा पंचमी के दिन पुरी श्रीमंदिर में निम्नलिखित नीतियाँ सम्पन्न होती हैं—
१. महालक्ष्मी का विशेष स्नान, श्रृंगार एवं पूजन।
२. राजकीय पालकी में महालक्ष्मी की विजय-यात्रा।
३. शंख, घंटा, वाद्य, छत्र एवं चँवर सहित भव्य शोभायात्रा।
४. नन्दिघोष रथ के समीप आगमन।
५. भगवान श्रीजगन्नाथ की ओर से आज्ञामाला प्रदान।
६. महालक्ष्मी का मान प्रकट होना।
७. सेवकों द्वारा नन्दिघोष रथ के एक भाग का प्रतीकात्मक भंजन।
८. महालक्ष्मी का हेरा गोहिरि साही मार्ग से श्रीमंदिर लौटना।
९. अगले दिन दक्षिण मोड़ नीति के अनुसार रथों को दक्षिण दिशा की ओर मोड़ना।
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रथ भंजन का आध्यात्मिक अर्थ
रथ का प्रतीकात्मक भंजन क्रोध या विनाश का प्रतीक नहीं है।
यह—
महालक्ष्मी की मान-लीला है।
दिव्य दाम्पत्य प्रेम की अभिव्यक्ति है।
श्रीजगन्नाथ की नरलीला का एक अंग है।
शक्ति और पुरुष के अविभाज्य संबंध का प्रतीक है।
यह परंपरा इस सत्य को व्यक्त करती है कि श्री (महालक्ष्मी) के बिना भगवान की लीला पूर्ण नहीं होती।
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गौड़ीय वैष्णव दृष्टिकोण
गौड़ीय वैष्णव दर्शन में यह उत्सव अत्यंत गहन रसतात्त्विक महत्व रखता है।
महालक्ष्मी वैकुण्ठ की ऐश्वर्य-रस की अधिष्ठात्री हैं।
गुंडिचा मंदिर को वृन्दावन का प्रतीक माना जाता है।
श्रीजगन्नाथ वहाँ वृन्दावन के माधुर्य-रस का आस्वादन करते हैं।
महालक्ष्मी उस माधुर्य-रस में प्रवेश नहीं कर पातीं।
इसी कारण उनका मान और अभिमान प्रकट होता है।
श्रीचैतन्य महाप्रभु ने इस लीला के माध्यम से वैकुण्ठ के ऐश्वर्य और वृन्दावन के माधुर्य के मध्य भेद को स्पष्ट किया।
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तांत्रिक दृष्टिकोण
शाक्त एवं तांत्रिक परंपरा में महालक्ष्मी केवल भगवान विष्णु की अर्धांगिनी नहीं, बल्कि आद्याशक्ति का दिव्य स्वरूप हैं।
तंत्र के अनुसार—
श्रीजगन्नाथ पुरुषतत्त्व हैं।
महालक्ष्मी शक्तितत्त्व हैं।
शक्ति के बिना पुरुष निष्क्रिय है।
हेरा पंचमी शक्ति के दिव्य अधिकार का स्मरण कराती है।
इस लीला में शक्ति और पुरुष के सनातन ऐक्य का दर्शन होता है।
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उत्कलीय संस्कृति में हेरा पंचमी
ओड़िशा में हेरा पंचमी को "महालक्ष्मींक मान लीला" कहा जाता है।
यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि दाम्पत्य, प्रेम, विरह, मान, पुनर्मिलन और भक्ति की अद्वितीय सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। इस लीला के माध्यम से मानवीय भावनाओं को दिव्य प्रेम में रूपांतरित किया गया है।
हेरा पंचमी केवल रथयात्रा का एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि श्रीजगन्नाथ संस्कृति का एक गहन दार्शनिक एवं आध्यात्मिक अध्याय है। शास्त्र, तंत्र, गौड़ीय वैष्णव रसतत्त्व तथा उत्कलीय मंदिर-नीति के समन्वय से यह उत्सव भारतीय धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा की अमूल्य धरोहर बन गया है। इसमें महालक्ष्मी का मान, श्रीजगन्नाथ की नरलीला, शक्ति और पुरुष का ऐक्य तथा भक्ति-रस का अद्भुत समन्वय प्रकट होता है।
इसी कारण हेरा पंचमी केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि श्रीजगन्नाथ तत्त्व की अत्यंत गूढ़ एवं दिव्य लीलाओं में से एक मानी जाती है।
Sri Sri Sidheshwari Tara Mandir Foundation Swami Kailashanand Giri ji Shri Mahant Dr. Ravindra Puri Lord of the Universe